Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 461–470

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 461–470

पृष्ठ 461

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 461 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड हिमवद्विन्ध्यशैलाभ्यां प्रायो व्याप्ता वसुन्धर ॥ सौम्यं पथ्यं च तत्राद्यमाग्नेयं विन्ध्यमौषधम् ॥ -- श्रष्टाङ्गः संग्रहः भेषजकल्प, अ०–८ । उत्तरदिशा में हिमालय पर्वत है, और दक्षिण दिशा में विन्ध्य पर्वत है, यह पहिले ही बतलाया जा चुका है । अग्निवेशसंहिता के प्रतिसंस्कर्त्ता भगवान् चरकने भी इसी मत की पुष्टि की है । पिच स्त्री सौम्या है, और पुरुष आग्नेय है, इसीलिए ऋतुकाल में गर्भाधान के लिए जब पति और पत्नी शय्या पर आरूढ होते हैं, तो उस समय उस शय्या पर पुरुष को पहले अपने दहिने पैर रखने का आदेश हैं, एवं स्त्री को बाँए पैर रखने की आज्ञा है ( देखिए! चरक शारीरस्थान ०८ प्र ० ७ ) अग्नि दक्षिण में रहता है, सोम उत्तर में रहता है | इस विषय में शास्त्रीय प्रमाण बतला दिए गए । अत्र एक दो प्रत्यक्ष प्रमाण बतला कर इस प्रक— रण को उपरत किया जाता | सब से पहिला प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा शरीर है । हमारे शरीर का वामभाग सोम से बना है, अतएव वह निर्बल है, एवं दहिना भाग अग्नि ना है, अतएव वह सबल है । जितना star आप दहिने हाथ से उठा सकते हैं, एवं जितना काम आप दहिने हाथ से कर सकते हैं, बाँए हाथ से आप न उतना बोझा ही उठा सकते, न उतना काम ही कर सकते । शिक्षक के दहिने हाथ से लड़के को जिस वेदना का अनुभव होता है, बाएँ हाथ से उतनी वेदना नहीं होती । बांए हाथ की अपेक्षा दहिने हाथ में अधिक दक्षता रहती है, अतएव इसे ' दक्षिण हस्त ' कहा जाता है । आती जाती सवारियों की मुठ-भेड़ को रोकने के लिए सड़कों पर स्थान स्थान पर साइनबोर्डों पर ' सवारी वाँएँ तरफ को ' यह लिखा रहता है | वेदविज्ञान से इसकी उपपत्ति भी विदित हो सकती है । सोम निर्बल है, यह कहा जा चुका है । यह सोम अग्नि में आहुत होता है । अग्नि प्रतिष्ठातत्त्व होने से अपने स्थान पर प्रतिष्ठित रहता है । झुकना सोम का स्वभाव है । सौम्य वामभाग जिस ऋजुता से झुक सकता है, आग्नेय दक्षिणभाग उतनी ऋजुता से नहीं झुकसकता । पूर्व के अक्षर इसी आधार पर लिखे गए हैं । सम्पूर्ण प्रपञ्च से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, स्त्रीरूप सोम पुरुषरूप अग्नि के उत्तर भाग में रहता है । क्योंकि प्रकृतियज्ञ में ऐसा है - अतएव हमें अपने इस वैधयज्ञ में भी स्त्रीरूप पानी को पुरुषरूप आहवनीय के उत्तरभाग में हीं रखना चाहिए । एक बात और है । यदि स्त्री पुरुष के उत्तरभाग में सोया करती है, तो प्रायः उसके पुत्र ही होता है । यदि स्त्री दक्षिण भाग में सोती है, तो कन्या होती है । कारण इसका यही है कि, दक्षिण - पुरुष का स्थान है, उस भाग में स्त्री का चला जाना पुरुषभाग पर स्त्री का अधि-कार ( स्त्री की प्रधानता ) हो जाना है, । एवं उत्तर स्त्री का स्थान है, इसकी ओर पुरुष का झुकना - पुरुष का स्त्री पर अधिकार होना है । दोनों में से जिस का भ्रूण प्रबल होता है, वह दूसरे निर्बल भ्रूण को अपने में लीन कर लेता है । ऐसी अवस्था में उस प्रबल भ्रूण के ही चिन्ह शेष रह जाते हैं । ज्योतिषशास्त्र का सिद्धान्त है कि, जिस पुरुष के पहिले पहिले कन्या होती हैं, उसका वंश शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । इस दोष को दूर करने के लिए महर्षियोंनें पुंसवनादि संस्कार रक्खे हैं । यह संस्कार तीसरे महीने में होता है । गर्भाशय में प्रतिष्ठित गर्भ में दूसरे तीसरे पर्य्यन्त स्त्री और पुरुष, दोनों के चिह्न रहते हैं | तीसरे महीने के अनन्तर योषाभ्रण और वृषा - भ्रूण, दोनों में से जो भ्रूण प्रचल होता है, दूसरे शब्दों १६८

पृष्ठ 462

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 462 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण में जिसका भ्रूण प्राण प्रबल होता है, उसकी वृद्धि होने लगती है । और दूसरे का ह्रास होने लगता है । यदि स्त्रीप्राण प्रबल होता है, तो स्त्री के चिन्ह उल्वण होने लगते हैं, और पुरुष के चिह्न नष्ट होने लगते हैं । यदि पुरुषप्राण प्रचल होता है, तो पुरुष के चिह्न उल्वण होने लगते हैं, और स्त्री के चिह्न नष्ट होने लगते हैं । स्त्री के सबल होने से, और पुरुष के निर्बल होने से, पुरुष का अधिक रूप से स्त्री के उत्तरभाग में सोने, गर्भाधान के समय स्त्री नक्षत्र की प्रधानता रहने से, ऋतुकाल के ई ३, ५ वें, ७ वें, ६ वें इसप्रकार अयुग्म दिनों में सम्बन्ध करने से ( देखो सुश्रुत शा ० स्थान ), एवं ओर भी कई एक कारणों से, जिनका कि विस्तारभय से प्रकृत में निरूपण नहीं किया जा सकता, स्त्री का भ्रूण प्रबल रहता है । ऐसी अवस्था में इसके प्रायः कन्या ही होती है । पहिले पहिले कन्या का होना वंशनाश का कारण है । इस आपत्ति को दूर करने के लिए दयालु महर्षियोंने ' ' पु ंसवन ' संस्कार का विधान किया है । माता के गर्भाशय में सिक्त पिता के शुक्र, और माता के शोणित ( रज ) के संयोग से गर्भ क्रमशः किन किन अवस्थाओं में परिणत होता है - इसका विवेचन करते हुए सुश्रुताचार्य्यं कहते हैं । ‘ प्रथमे मासि कललं जायते, द्वितीये शीतोष्मानिलैरभिपच्यमानानां महाभूतानां संघातो घन: -संजायते – यदि पिण्डः, ( तर्हि ) पुमान्, स्त्री चेत् - पेशी, नपुंसकं चेदर्बु दमिति ' ( सु ० शा ० ) -पहिले मास में वह शुक्रशोणित कललरूप में परिणत होता | हस्तपाद मुखादि चिह्नों से रहित पिघला हुआ, साथ ही में कुछ अँधा हुआ जो शुकशोणित का समुदाय है, उसे ही ' कलल ' कहते हैं । दूसरे महीने में शीत ( सर्दी ) उष्मा, ( गर्मी ) और प्रधान रूप से वायु, इन तीनों के सम्बन्ध होने से महाभूतों की समष्टिरूप शुक्रशोणित का समुदाय घनावस्था में परिणत हो जाता है । गर्भ की द्रवता जाती रहती है, एवं वह ठोस बन जाता है । विशकशित परमाणुः परस्पर ग्रन्थिबन्धन में आजाते हैं । यदि वह घनता पिण्डरूप में ( गोल-अण्ड के रूप में ) परिणत होती है, तो समझलो पुत्र होगा । यदि मांसपेशी के आकार में हैं, तो कन्या होगी, यदि दुन्दुभि ( नगारा ) जैसा है, तो नपुंसक होगा । वीर्य्य की अधिकता से पुत्र होता है, क्योंकि वीर्य्य पुरुष का भाग है । रज की अधिकता से कन्या होती है- क्योंकि रज ( शोणित ) स्त्री का भाग है । एवं शुक्रशोणित की समानता में नपुंसक होता है 1 । यदि शुक्र अधिक होता है, तो वह कलल पिण्डरूप में परि-णत होता है, रज की अधिकता में पेशीरूप में परिणत होता है, दोनों की समानता में अबुदरूप धारण करता है । इसी सम्पूर्ण विज्ञान को लक्ष्य में रख कर अभियुक्त कहते हैं—

आधिक्ये रेतसः पुत्रः कन्यास्यादाच ' वाधिके ।

नपुंसकं तयोः साम्ये यथेच्छा पारमेश्वरी ॥

-- भावप्रकाशे जबतक वह कलल पिण्डादि स्वरूप में परिणत न होने पावे, उससे पहिले पहिले पुंसवन संस्कार होना चाहिए । स्थिर चिह्न बन जाने के पश्चात् ' जातसंस्कार बाधायोगात् ' इस न्याय के अनुसार संस्कार करना व्यर्थ है । इस संस्कार में बड़की कूँ पल, सहदेवी, विश्वेदेवा, तीनों में से किसी एक को कूटकर उसका दुग्ध निकाल कर शास्त्रत्रिधि के अनुसार स्त्री के दहिने नासा - छिद्र में उस दूध की तीन, अथवा चार बिन्दु डाल— १६६

पृष्ठ 463

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 463 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड देनी चाहिए । स्त्री को चाहिए कि, उसे थूके नहीं, अपितु पी ही जाय । वीर्य्य की कमी से ही लड़की होती है । बटशुङ्गादि का दुग्ध वीर्य्य को बढ़ाता है । दहिना भाग पुरुष का है । उस में इस वीर्य्यवर्द्धक दुग्ध का सिञ्चन करने से शुक्रभाग की वृद्धि होती है, सुतरां रजभोग का ह्रास होजाता है । इसी अभिप्राय से कहते हैं- } - दक्षिणे ‘ बटशुङ्गसहदेवात्रिश्वेदेवानामन्यतमेन क्षीरेणाभिषुच्य त्रींश्चतुरो वा बिन्दून् दयात् - द नासापुटे पुत्रकामाय । न च तान् निष्ठीवेत्'- ( सुश्रुत शारीरस्थान इति । इस प्रयोग से स्त्री के चिह्न नष्ट होने लगते हैं, और पुरुष के चिह्न उल्वण होने लगते हैं । इस प्रकार इस संस्कार से श्रवश्यमेव पुत्र उत्पन्न होजाता है । इसीलिए ' पूमान्सूयते अनेन ' ( जिस संस्कार से पुत्र उत्पन्न किया जाता है ) इस व्युत्पत्ति से इसे ' पुंसवन ' कहा जाता है । पुंसवन संस्कार के अतिरिक्त दूसरा उपाय है - पुरुष का स्त्री के दक्षिण भाग में सोना । इससे पुरुषप्राण स्वभावतः प्रबल रहता है । हमें यज्ञपुरुष उःपन्न करना है । पुरुष की उत्पत्ति के लिए स्त्री का उत्तरभाग में रहना आवश्यक है । इस लिए भी योषारूप पानी को वृषारूप ग्राहवनीय के उत्तरभाग में रक्खा जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर— ' योषा वा आपः, वृषाग्निः । मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते । एवमेव हि मिथुनं क्लृप्तम् । उत्तरतो हि स्त्री पुमांसं समुपशेते " यह कहा गया है ॥२० ॥

" जब ग्राहवनीय के उत्तरभाग में पानी रख दिया जाता है, तो इस मन्त्रपूत पानी से, और दिव्या-ग्निमय आहवनीयसे एकप्रकार की विद्युत निकलती है । इन्हीं दोनों का परस्पर मिथुन होता है । इस मिथुन से नवीन आत्मा बनने वाला है । यदि इस समय कोई ऋत्विक् इस पानी, और ग्राहवनीय के मध्य में आजायगा, तो इन दोनों की विद्युत् में इस मनुष्य की विद्युत् प्रविष्ट हो जायगी | विजातीय विद्युत् - प्राण के समावेश से उसी क्षण इनका मिथुनभाव विच्छिन्न होजायगा । तात्पर्य यही है कि, इस समय पानी की शीत-लता आहवनीय अग्नि में मिल रही है, और अग्नि की गर्मी इस पानी में आ रही है । ऐसी अवस्था में यदि हम दोनों के बीच में घुस पड़ेंगे, तो हमारे शरीर की गर्मी उन दोनों के मिथुनभाव में प्रविष्ट होजायगी । विजातीय गर्मी के प्रविष्ट होते ही दैवात्मा में विकृति उत्पन्न होजायगी । एकप्रकार से आत्महत्या होगी । ऐसा न हो — इसलिए नियमित समय पर्य्यन्त इन दोनों के मध्य से किसी को नहीं निकलना चाहिए । इससे श्रुति शिक्षा देती है कि, जब कभी स्त्री पुरुष मिथुन भावापन्न हों, तत्र भूलकर भी किसी को वहाँ नहीं जाना चाहिए । यदि वह चला जायगा, तो उसे ब्रह्महत्या का पाप लगेगा । इस पानी को अग्नि से सर्वथा दूर भी नहीं रखना चाहिए, एवं सर्वथा समीप भी नहीं रखना चाहिए । क्योंकिं दोनों प्रकार से ही हानि है, जैसाकि अनुवाद में बतलाया जा चुका है । तात्पर्य्य यही है कि, अग्नि में एकप्रकार का रुद्रप्राण रहता है । पदार्थनिर्माण में, दूसरे शब्दों में प्रजोत्पत्ति में बाधा पहुँचाना ही इसका काम है । समीप में रक्खा हुआ पानी इस रुद्र के रुद्रत्त्व को अपने शीतल परमाणुत्रो से शान्त कर देता है, रुद्र को साम्ब सदाशिव बना डालता है । रुद्रभाव के निकलते ही वह प्राण शिवरूप २००

पृष्ठ 464

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 464 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण में परिणत होता हुआ प्रजोत्पत्ति का कारण बन जाता है । जिस रुद्र को निकालने के लिए, रुद्र को शिव बनाने लिए पानी रक्खा जाता है, वह प्रयोजन प्रणीतापात्र को बहुत दूर रखने से भी सिद्ध नहीं होसकता, एवं सर्वथा समीप रखने से भी काम नहीं चल सकता । इससे श्रुति शिक्षा देती है कि स्त्री, और पुरुष दोनों को अङ्गसम्बन्ध करके भी शयन नहीं करना चाहिए, एवं सर्वथा अन्तर भी नहीं रखना चाहिए । ' अतिसामीप्यात् ० ' ( सां ० का ० ) के अनुसार अङ्गस्पर्श से दोनों की विद्युत् नष्ट हो जाती है, एवं दूर

रहने से सम्बन्ध ही नहीं होने पाता । अपांसादन को यही संक्षिप्त उपपत्ति है ॥२१ ॥

इति श्रपांसादनोपपत्तिः इत्यपांप्रणयनम् ३ ४ थ परिस्तरणं पात्रासादनञ्च ( मूल ) – अथ तृणैः परिस्तृणाति 1 । द्वन्द्व पात्राण्युदाहरति- शूर्प चाग्निहोत्र -हवर्णी च, स्फ्यं च कपालानि च शम्यां च कृष्णाजिनं च, उलूखलमुसले, दृशदुपले, -“ तद्दश । दशाक्षरा वै विराट् । बिराड् वै यज्ञः । तद्विराज मेवैतद्यज्ञमभि संपादयति । अथ यद्वन्द्व ं – द्वन्द्व ं वै वीर्यम् । यदा वै द्वौ संरभेते - अथ तद्वीर्यं भवति । द्वन्द्व ं वै मिथुनम्प्र-जननम् । मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते ॥२२ ॥

इति प्रमथकाण्डे प्रथमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ( १।१।१ । ) इति प्रथमकाण्डे प्रथमप्रपाठके प्रथमं ब्राह्मणम् ( १११११ | ) अथ - प्रथमकाण्डे प्रमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ( १।१।२ । ) अथ प्रथमकाण्डे प्रथमप्रपाठके द्वितीयं ब्रह्मणम् ( १ | १ | २ | ) अथ शूर्पश्चाग्निहोत्रहवणीञ्चादत्त - ' कर्मणे वां वेषायवाम् ' ( १.६ मं. ) इति । यज्ञो वै कर्म्म, यज्ञाय हि 1 । तस्मादाह - कर्मणे वामिति, वेषाय वामिति, वेवेष्टीव

हि यज्ञम् । ' १ ॥

२०१

पृष्ठ 465

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 465 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड ( अनुवाद ) - ( प्रणीतापात्र रखने के ) श्रनन्तर ( अध्वर्यु, अथवा यजमान, दोनों में से एक याज्ञिक आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, तीनों के समीप चारों ओर ) तृणों से परिस्त-रण करता है, अर्थात् तीनों के समीप नियत स्थान पर दर्भ बिछाता है । ( परिस्तरण के अनन्तर गार्हपत्य के उत्तरभाग में अनुपद में हीं बतलाए जानेवाले क्रम के अनुसार द्वन्द्व ( सम्पत्ति से युक्त ) पात्रों को रखता है । ( उस परिस्तरण पर ) शूर्प अग्निहोत्रहवणी, स्पय कपाल, ५ शम्या E 3 कृष्णाजिन, उलूखल मुसल, दृषत्, उपल, इस क्रम से दो दो पात्रों को रखता है | ( इन पाँच द्वन्द्वों के कुल ) १० पात्र होजाते हैं । विराट्छन्द दश ( १० ) अक्षर का है । विराट् ही यज्ञ है । ऐसी अवस्था में १० पात्र रखता हुआ अध्वर्यु ' विरारूप यज्ञ को ही सम्पन्न करता है | अर्थात् विराट्यज्ञ की सम्पति प्राप्त कर लेता है । ( श्रपिच यहाँ जो ) द्वन्द्व होता है ( उसका एक प्रयोजन ओर भो है ) । द्वन्द्व वीर्य्यस्वरूप है । जब दो मनुष्य ( एक कार्य्य को प्रारम्भ करते हैं, तो वह कार्य्य ) वीर्य्यवान् होता है, सबल होता है । ( हमारा यज्ञकर्म्म वीर्य्ययुक्त हो, पात्रों युग्मरूप से रखने की यही दूसरी उपपत्ति है ) | ( अपिच ) द्वन्द्व ही मिथुन ( होने से ) प्रजनन ( क्रिया का साधक है ) । ( ऐसी अवस्था में ) दो दो पात्र रखता हुआ अध्वर्यु मिथुन ( भाव सम्पन्न करता हुआ उससे ) प्रजनन क्रिया ही करता है ॥ २२ ॥

( वह अध्वर्यु ' ) ‘ कर्म्मणे वां वेषाय वाम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ शूर्प, और अग्नि-होत्रहवणी उठाता है । यज्ञ ही कर्म्म है । यज्ञ के लिए ही ( इन पात्रों को उठाता है ) । अतएव

' कर्म्मणे वाम् ' यह कहता है । इन पाँचों से यज्ञ को वेष्टितवत् करता है ॥ १ ॥

( भाष्य ) - पां प्रणयन, और अपांसादनकर्म्म सम्पन्न हो चुका । अब क्रमप्राप्त पात्रसादनक प्रारम्भ करते हैं । दर्शपूर्णमासेष्टि में जिन पात्रों की आवश्यकता होती है, उन्हें पहिले से ही नियत स्थान पर रख दिया जाता है, जिससे कि समय पर असुविधा न होसके । जिन १० पात्रों का अनुवाद में निद्द ेश किया गया है, वे पात्र यज्ञ के ' आयुध ' कहलाते हैं । यज्ञ से दिव्यात्मा उत्पन्न होता है, एवं उसके बल से असुरों का नाश किया जाता है । असुरों को नष्ट करने वाले यज्ञ के स्वरूपसम्पादक ये ही १० पात्र हैं । अतएव इन्हें अवश्य ही यज्ञायुध ( यज्ञपुरुषरूप सेनापति के शस्त्र ) कहा जासकता है | बिना शस्त्र के जैसे पुरुष अपने शत्रु रहता है, एवमेव बिना इन यज्ञपात्रों के यह यज्ञपुरुष असुरों को के मारने में सर्वथा असमर्थ मारने में, एवं दिव्यात्मा उत्पन्न करने में सर्वथा श्रसमर्थ ही रहता है । क्योंकि यज्ञ का स्वरूप इन्हीं पात्रों के संभार से निष्पन्न होता है । इन १० पात्र को यथास्थान रखने से पहिले गार्हपत्य से ग्राहवनीय पर्य्यन्त अभिव्याप्त यज्ञपुरुष की नग्नता दूर करने के लिए गा ० ग्राह ० दक्षि ० तीनों के समीप दर्भ बिछाए जाते हैं । इस वैधयज्ञ की २०२

पृष्ठ 466

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 466 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण आकृति पुरुष ( मनुष्य ) के समान है, जैसाकि आगे आनेवाले ' यज्ञपुरुषब्राह्मरण ' में विस्तार से बतलाया जायगा । पुरुष के शरीर पर केवल त्वचा है । गाय, भैंस, बकरी, त्र्यादि के शरीर पर त्वचा, और चर्म्म, दोनों हैं | इस चर्म्म के कारण हीं ये पशु शीत, वर्षा, गर्मी आदि सहने में समर्थ होते हैं । प्रजापतिने इन पशुओं में ज्ञान की मात्रा अव्यक्त रक्खी है । अतएव ये मनुष्यवत् कपास की खेती करने में, और शरीर ....... को सर्दी गर्मी से बचाने के लिए उस कपास को वस्त्ररूप में परिणत करने में समर्थ हैं । इसलिए प्रजापतिने हम मनुष्यों की अपेक्षा इनमें चर्म्म अधिक प्रदान किया । इधर मनुष्य में पशुओं की अपेक्षा ज्ञानमात्रा अधिक है । ये अपने ज्ञानबल से वस्त्र बनाकर अपने शरीर को सर्दी गर्मी से बचा सकते हैं । इसीलिए प्रजा-पतिने इनमें चर्म्म का प्रभाव रक्खा है । अतएव वैदिक परिभाषानुसार इन्हें ' निकृत्यचर्म्मा ' कहा जाता है । मनुष्यों में केवल त्वचा है, और पशुओंों में चर्म्म, तथा त्वचा दोनों हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, वधिक जब बकरे के उपर से चर्म्म खचता है, तो उससे पहिले रुधिर नहीं निकलता । अपितु चर्म्म के भीतर पहिले एक पतलीसी लाल गुलाबी झिल्ली दिखाई देती है । यह उस मांसपिण्ड का पहिला आवरण है । जब इसमें क्षुरिका - प्रहार कियाजाता है, तब रुधिर निकलता है । इसप्रकार पशुओं में दो आवरणों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । परन्तु मनुष्यों में यह बात नहीं है । पहिले आवरण को हटाने मात्र से ही इन से रुधिर निकल पड़ता है । आप मनुष्य के शरीर पर जो आवरण देखरहे हैं, वह वही लाल झिल्ली है । बाहिर के रुद्रवायु के आघात से उसकी लाली अभिभूत होगई है । क्योंकि पुरुषों में चर्म्म का अभाव है, अतएव ये गर्मी सर्दी सहनें में असमर्थ हैं | अतएव प्रजापति इन्हें पशुओं की अपेक्षा अधिक ज्ञानमात्रा देता हुषा इन्हें आज्ञा देता है कि, ' तुम गर्मी सर्दी से बचने के लिए वस्त्र पहिनो । बिना वस्त्र के तुम नँगे हो ' । यही कारण है कि, मनुष्यों में वस्त्र पहिनने की स्वाभाविक प्रवृत्ति है । जो जँगली मनुष्य वस्त्र नहीं पहिनते, उन्हें त्रिना सींग पूँछ के साक्षात् पशु ही समझना चाहिए । कहना इससे हमें यही है कि, बिना वस्त्र के पुरुष नग्न है, अधूरा है । अतएव उसके लिए वस्त्र पहिनना श्रावश्यक होजाता है । इसी पुरुष की प्रतिकृति पर इस वैध यज्ञपुरुष का वितान किया गया है । बिना वस्त्र के ( श्रावरण के ) यह यज्ञपुरुष नग्न है, अतएव प्रकृतिवत् इसकी नग्नता दूर करने के लिए इस पर दर्भ का परिस्तरण करना आवश्यक है । यह पुरुष सामान्य पुरुष नहीं है, अपितु यज्ञपुरुष है । अतएव यह सामान्य वस्त्र नहीं पहन सकता । अपितु इस की नग्नता यज्ञिय वस्त्र से ही दूर की जा सकती । ऐसा वस्त्र है दर्भ । दर्भ यज्ञिय पदार्थ है, इसका विवेचन इसी काण्ड के तीसरे ब्राह्मण में किया जायगा ( शत ० १ | १ | ३ | ) | इसीलिए ( सत्र से पहिले यज्ञपुरुष की नग्नता दूर करने के लिए ) इस पर दर्भ का परिस्तरण किया जाता है । यद्यपि श्रुति में सामा– न्यतः ‘ तृणैः परिस्तृणाति ' यही कहा गया है, परन्तु ' यज्ञिया वै दर्भा: ' ( यज्ञियतृण दर्भ है ) इस अन्य श्र तिप्रमाण से प्रकृत में तृण शब्द से दर्भ का ही ग्रहण किया जाना उचित है । आह ० गाई ० दक्षि ०, इन तीनों कुण्डों के चारों ओर परिस्तरण किया जाता है । इन तीनों में मस्तक - स्थानीय होने से ग्राहवनीय • १ इस विषय का विस्तृत विवेचन तीसरे काण्ड के दूसरे ' दीक्षान्रारणह्म में ' किया जायगा ( शत ० ३।१।२ ) । २०३

पृष्ठ 467

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 467 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड प्रधान है । अतः सत्र से पहिले इसी के समीप परिस्तरण किया जाता है । मस्तक में भी आगे रहने से मुख-भाग प्रधान है | शरीरगत प्राणदेवताओं के लिए इसी में अन्नरूप सोम की आहुति दी जाती है । अतएव आहवनीय की चारों दिश, ओं में से मुखरूप होने के कारण पहिले पूर्वभाग में ही परिस्तरण किया जाता है । यहाँ पर उन दर्भतृणों को उत्तराग्रक्रर्म से बिछाते हैं । अर्थात् दर्भ का अग्रभाग ( सूक्ष्मभाग ) उत्तर की ओर रहता है, और मूलभाग दक्षिण की ओर रहता है । इसके अनन्तर आहवनीय के दक्षिणभाग में पूर्वाग्रक्रम से पश्चिम में उत्तराग्रक्रम से, एवं उत्तर में पूर्वाग्रक्रम से परिस्तरण किया जाता । तात्पर्य यही है कि, पूर्व और पश्चिम भाग में जो दर्भ बिछाए जाते हैं, उनका श्रग्रमाग उत्तर में रहना चाहिए, और मूलभाग दक्षिण में रहना चाहिए | एवं दक्षिणोत्तर भाग में जो दर्भ त्रिछाए जाते हैं, उनका अग्रभाग पूर्वदिशा की ओर रहना चाहिए, तथा मूलभाग पश्चिम की ओर रहना चाहिए । ऐसा क्यों किया जाता है?, इसकी उपपत्ति अग्निहोत्रप्रकरण में बतलाई जायगी । विस्तारभय से यहाँ इसे छोड़ते हैं । जिस क्रम से आहवनीय के चारों ओर परिस्तरण होता है, उसी क्रम से गार्हपत्य के चारों ओर परिस्तरण करना चाहिए, एवं उसी क्रम से दक्षिणाग्नि के चारों ओर परिस्तरण करना चाहिए । परिस्तरणानन्तर गार्हपत्य के उत्तरभाग में उस दर्भपरिस्तरण पर दो दो पात्रों का युग्म बना कर पूर्वोक्त १० सों यज्ञायुध रख दिए जाते हैं । इसी अभिप्राय से कात्यायन कहते हैं— " तृणै- ( दर्भतृणै ) -ग्नीन् ( गार्हपत्याहवनीयद क्षिणाग्नीन् ) परिस्तीर्य प्रथमं द्विशः पात्राणि संसादयति " ( का: श्रौ ० सू ० २।३।६ । ) इति । पुरस्तात् सूत्र में पढ़े हुए ' पात्राणि ' को — पात्री ' पवित्रच्छेद नाम से प्रसिद्ध तीन नए दर्भ, दो पवित्र ', और उपवेश ' ( धृष्टि ), आाज्यस्थाली ', उपसर्जनी - पात्र २, वेद ' ( कुशमुष्टि ), अन्वाहार्य्यपात्र २, वेदितृ अभ्रि ', योक्त्र ' स्रुव े, जुहू ' उपभृत्रे, ध्रुवा ' सन्नहन ' - श्रवच्छादन, तीन ' परिधि, दो विधृति २, आाज्य ' – पुरोडाशपात्री २, होतृषदन ' शृतावदान े, ओषधि ' ( व्रीहि अथवा यव ), प्राशित्रहरण २, अन्वा-हार्य्यतण्डुल, अन्तर्धानशकट २, पूर्णपात्र ', दो समित् े, इत्यादि युग्मों का उपलक्षण समझना चाहिए । इसी अभिप्राय से - ‘ शूर्पाग्निहोत्रहवरिण अर्थवञ्च ' ( का ० श्रौ ० सू ० २३८ ) इस सूत्र में ' अर्थवत् ’ पद दिया गया है । दर्शपूर्णमासेष्टि में शूर्पादि १० यज्ञायुधों के अतिरिक्त जिन इतर द्रव्यों की, और पात्रों की आवश्यकता होती है, उनका भी इन १० के साथ ही युग्मक्रम से संभरण कर लेना चाहिए, सूत्रनुगत ' अर्थवत् ' शब्द का यही तात्पर्य्य है । इन सम्पूर्ण यज्ञपात्रों में से प्रकृत में हम केवल मूल में कहे हुए १० पात्रों का ही स्वरूप कहलावेंगे । इतर पात्रों का स्वरूप आगे के भिन्न भिन्न प्रकरणों से गतार्थ होजायगा । १ - शूर्पा-१० आयुधों में सत्र से पहिला शूर्प है । लोकभाषा में जिसे ' छाजला ' कहते हैं, वेदभाषा में वही ' शूर्प ' नाम से प्रसिद्ध । यह शूर्प बाँस की फरचटों का, अथवा नडों का होता है । यह चौकोर होता है, एवं चारों भाग अरत्निमात्र ( एक हाथ लम्बे चौड़े ) होते हैं । यह चर्म्म से वेष्टित रहता है । ब्रीहि, यव, आदि के तुष निकालने के लिए यज्ञ में इसका ग्रहण किया जाता है । २०४

पृष्ठ 468

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 468 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण २ - श्रग्निहोत्रहवणी-दूसरा आयुध अग्निहोत्रहवणी है । यह विकङ्कत की लकड़ी की होती है । इसकी लम्बाई के विषय में - प्रादेशमात्री ( १० अंगुल का एक प्रादेश होता है ), अरत्निमात्री, बाहुमात्री, ये तीन पक्ष हैं । इसी को ' अग्निहोत्रहवणी म्रुक् ' कहते हैं । अग्रभाग गोल होता है । उसमें बिल रहता है । इसमें घृत भर कर आहुति दी जाती है । अग्निहोत्र में इसीसे आहुति दी जाती है । ३ – स्फ्य— तीसरा आयुध - ‘ स्फ्य ' है । खड्ग की आकृति जैसा, अरत्नि ( अरत्निस्तु निष्कनिष्ठेन मुष्टिना ( को ६ का ० मनु ० वर्ग ८६ श्लो ० ) इस को प्रमाण के अनुसार- कनिष्ठ अंगुलि ( चिट्ठी अंगुलि को बाहिर निकाले के अनन्तर मुट्ठी बँधा हुआ जो बाहु है, उसे ही अरत्नि कहते हैं ) मात्र लम्बा, चार अँगुल चौड़ा, किन्तु अग्रभाग से तीक्ष्ण ( नोकदार ) खदिर ( खैर ) अथवा विकङ्कत ( कँटाई ), दोनों में से किसी एक की लकड़ी का बना हुआ जो आयुध है, उसे ही ' स्वयं ' कहते हैं । इसी को वज्र भी कहते हैं । स्फ्य से प्रहारादि कर्म्म होता है । पलाश ( छीला ), खदिर ( खेर ), प्लक्ष ( पाखर ), बंट, अश्वत्थ ( पीपल ), उदुम्बर ( गूलर का वृक्ष ), कृमुक ( सुपारी का वृक्ष ), वरण ( बरना ', बिल्व, शमी, विकङ्कत ( कँटाई ), काष्ममर्थ्य ( श्रीपर्णी ), सरल, साल ( साँखु ), देवदारु, चन्दन, इतने वृक्ष यज्ञिय वृक्ष कहलाते हैं । यज्ञ में जो पात्र बनाए जाते हैं, इन्हीं लकड़ियों के बनाए जाते हैं । इन यज्ञिय वृक्षों में से जहाँ जिसकी आवश्यकता होती है, वहाँ उसीका ग्रहण होता है । इन यज्ञिय वृक्षों में से खैर, और विकङ्कत की अत्यन्त वीर्य्यवती लकड़ी होती है । स्पय से प्रहारादि कर्म्म होता है । अतएव उसका निर्माण सुदृढ खैर, अथवा विकङ्कत, दोनों में से किसी एक के काष्ठ से होना चाहिए । इन दोनों में खैर तो प्रसिद्ध ही है । दूसरा है विकङ्कत । यह विकङ्कत मधुपर्णी, पिंडार, गोपवोण्टा, किंकरी, पूतकिंकिणी, हिमक, आदि नामों से प्रसिद्ध है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में इन दोनों की बहुत ही प्रशंसा है । गायत्री ने ( ४ आत्मा, ३ पक्षपुच्छ, १ शिर, इन आठ भागों में विभक्त, अतएव ' अष्टाक्षरा ' नाम से प्रसिद्ध पार्थिव छन्दोमय प्राणाग्नि ने ) देव-ताओं की प्राणरूप श्राग्नेय पार्थिव देवताओं की ) आज्ञा से तीसरे द्यलोक से ( ' नभोऽन्तरिक्षं गगनमनन्तं सुरबर्त्म खम् ' इस कोशप्रमाण से पृथिवी और सूर्य के मध्य का अन्तरिक्ष पहिला स्वर्ग है, सूर्य्यस्थान दूसरा स्वर्ग है । सूर्य के ऊपर का सोममय पारमेष्ठ्य मण्डल तीसरा स्वर्ग है. इसी में सोम रहता है इसी तीसरे लोक से ) सुपर्ण ( बाज ) बनकर सोमापहरण किया था । जिस समय गायत्री ने पक्षी बनकर झपाटे के साथ सोम पर आक्रमण किया था, उस समय उसने इस खैर को ही आक्रमण का साधन बनाया था । इसी खदिर की सहायता से गायत्री सोमापहरण करने में समर्थ * सोमापहरण करने वाली गायत्री कौनसी है?, इसने सोमापहरण कैसे किया?, आदि विषयों का वैज्ञानिक विवेचन तृतीय काण्ड के ' धिष्ण्य - ब्राह्मण ' में ( शत ० ३।६।२ ) किया जायगा । सर्पों की माता विनता, और गरुड़ की माता कद्र की परस्पर की प्रतिस्पर्द्धा से सम्बन्ध रखने वाले सुप्रसिद्ध पौराणिक व्याख्यान की वैज्ञानिक उपपत्तिका भी इसी सौपर्णाख्यान से सम्बन्ध है । २०३

पृष्ठ 469

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 469 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रथमकाण्ड हुई थी । ‘ स्वत् – इरा यस्य ' खदिर शब्द की यही व्युत्पत्ति है । रस को इरा कहते हैं । जिसका रस आघात करने वाला है, वही ' खदिर ' कहलाता है । पृथिवी का गायत्र अग्नि खदिरयुक्त है । अर्थात् इसमें आघात करने वाला घनप्राण रहता है । गायत्रतेज इसी घनप्राण के कारण वस्तु को विदीर्ण कर देता है | आप जिसे खैर का वृक्ष कहते हैं, यह उसी खादेरप्राण की महिमा है । इस कठिनता का कारण एकमात्र सोम ही है । सम्पूर्ण प्रपंच से यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि, खैर की लकड़ी अत्यन्त ही दृढावयवा है । स्फ्य से आघात किया जाता । अतएव इसे खैर की लकड़ी का ही बनाना उचित है । ४- कपाल--चौथा आयुध कपाल है । घोड़े के खुर के आकार के पुरोडाश - परिपाक के लिए लौकिकाग्नि में परिपक्व जो मिट्टी के पात्रविशेष हैं, उन्हीं को ' कपाल ' कहा जाता है । देवता के भेद से इनकी संख्या में भेद होजाता है । अग्नि के लिए आठ कपाल होते हैं । क्योंकि अग्नि अष्टाक्षरा ( अष्टावयव ) है । आठों कपाल जुड़े हुए रहते हैं । इनमे अग्नि के लिए पुरोडाश परिपक्क किया जाता है । अतएव ' इसे ' आग्नेय अकपाल पुरोडाश ' कहा जाता है । इन्द्र का त्रिष्टच्छन्द है । त्रिष्टुप् एकादशा-क्षरा है | अतएव इन्द्र के लिए ११ कपाल बनाए जाते हैं । एवं उस में परिपक्व पुरोडाश ' ऐन्द्र एकादश कपालपुरोडाश ' कहलाता है । आदित्य १२ । इनका छन्द द्वादशाक्षरा नगती है । श्रुतएव आदित्यों के लिए १२ कपाल होते हैं । इसीलिए यह पुरोडाश ' आदित्य द्वादश कपाल पुरो-डा ' कहलाता है । अग्नि अष्टावयव है । विष्णु - त्रिवृत्, पंचदश, एकविंश, भेद से तीन विक्रम बोले हैं । अग्नि के आठ अक्षरों में विष्णु के नत्र तीन अक्षर मिला दिए जाते हैं, तो ११ अक्षर होजाते हैं । अतएव ‘ आग्नावैष्णव पुरोडाश ' ११ कपालों में परिपक्व होता है । इसीलिए यह पुरोडाश ' आग्नावैष्णव एकादश कपाल पुरोडाश ' कहलाता है । वक्तव्य यही हैं कि, कपाल – संख्या भिन्न भिन्न देवताओं के स्वरूप के अनुसार नियत है । इन कपालों को कुंझार नहीं बनाता, अपितु स्वयं अध्वर्युं को ही इनका निर्माण करना पड़ता है । ५- शम्या -पाँचवाँ श्रायुध ‘ शम्या ' ’ है । यह आयुध खदिर, वरण, विकङ्कत, इन तीनों में से किसी एकका बनता है | इसकी लम्बाई के विषय में प्रादेशमात्र, ३२ अंगुल, ३६ अंगुल, ये तीन विकल्प हैं । जिस समय दृषत् पर तण्डुल पीसे जाते हैं, उस समय इस आयुध को दृषत् के नीचे रक्खा जाता है । ६ – कृष्णाजिन— छठा श्रायुध कृष्णाजिन है । काले हरिण के चर्म्म का नाम हीं कृष्णाजिन है । इस चर्म में चारों पैर और ग्रीवायक्त शिरोभाग होना चाहिये । अर्थात् पूरा मृगचर्म्म होना चाहिए । कितनों हीं के मतानुसार ग्रीवा — रहित का भी ग्रहण होता है । ऊखलं में मुसल से ब्रीहि कूटे जाते हैं, तो उस समय मुसल के आघात से बाहिर उछटे हुए हवि की रक्षा के लिए इस कृष्णाजिन को ऊखल के नीचे विछाया जाता है । यह ' १ कृष्णाजिन त्रयीवेदस्वरूप कैसे है? इसका वैज्ञानिक विवेचन इसी काण्ड के चौथे ब्राह्मण में किया जायगा । २०६

पृष्ठ 470

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 470 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथब्राह्मण कृष्णाजिन वेदत्रयीरूप होने से यज्ञस्वरूप है । ब्रीहि यज्ञिय द्रव्य है । यज्ञिय द्रव्य का प्रयविज्ञ स्थान में पतन न हो, इसीलिए ऊखल के नीचे यज्ञरूप कृष्णम्णचर्म्म को बिछाना आवश्यक हो जाता है । इस पर उछट के गिरा हुआ हविर्द्रव्य यज्ञ पर ही प्रतिष्ठित रहता है । ७ - उलूखल सातवाँ आयुध उलूखल है । पलाश, वरण, खदिर, अथवा कार्य्यादि किसी भी सशक्ता लकड़ी का उलूखल बनाया जाता है । इसके नीचे का अधोभाग ठोस होता है, ऊपर का भाग बिलयुक्त होता है 1 | इसका ' बुध्न ' ( पैंदा ) पसरा हुआ होता है । मुख चौड़ा होता है । मध्यभाग में रास्ना होती है | अरत्नि— मात्र इसकी लम्बाई होती है । पुरोडाश - सम्बन्धी ब्रीहि आदि को कूटने के लिए ही यज्ञ ' में इसका ग्रहण किया जाता है । ८ मुसल -श्राठवाँ आयुध मुसल है । खदिर, वरण, कार्ष्मर्थ्य, आदि किसी में से एक की लकड़ी का मुसल ’ बनाया जाता है । हि इसी से कूटा जाता है । इसकी लम्बाई में कामचार है । ह - हपत्– नवाँ आयुध दृषत् है 1 लोकभाषा में जिसे ' सिल्ला ' कहते हैं, वेदभाषा में उसेही ' दृषत् ' कहते हैं । इसी पर हंविको पीसा जाता है । यह पत्थर की होती है । १०- उपल-दसवाँ आयुध उपल है । लोकभाषा में जिसे ' लोढ़ी ' कहते हैं, उसे हो वेदभाषा में ' उपल ' कहते हैं । इसीसे दृषत् पर हवि पीसा जाता है । इसकी लम्बाई ६ अंगुल की होती है । कितनों हीं के मतानुसार ‘ उपलो वत्तु‘लः प्रोक्तो वितम्तिः परिमाणकः ' के अनुसार यह उपल गोल होता है, और वितस्तिमात्र लम्बा होता इस प्रकार कुल १० आयुधपात्र हो जाते हैं । १० ही पात्रों का सर्वप्रथम ग्रहण क्यों होता है?, इस में कुछ अन्तरङ्ग रहस्य है, जिसका कि विशदरूप से नहीं, तो सूक्ष्मरूप से प्रतिपादन कर बेना अनुचित न होगा । १० पात्र क्यों रक्खे जाते हैं?, इसकी उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है - विराट्छन्द १० अक्षर का होता है, विराट् ही यज्ञ है । इस दशावयव यज्ञसम्पत्ति की प्राप्ति के लिए ही १० पात्रों का ग्रहण किया जाता है । साधा-रण मनुष्य श्रुति के ' दशाक्षरा वै विराट् ० ' इत्यादि अक्षरों से संतुष्ट नहीं हो सकते । जबतक उहें विस्प-ष्टरूप से इसका स्वरूप न बतला दिया जाय, तबतक उनकी श्रुति के इन पूर्व अक्षरों पर जाड्यश्रद्धा के अतिरिक्त सच्ची श्रद्धा नहीं हो सकती, एवं बिना श्रद्धा के कर्म्म करना व्यर्थ है । इसी अश्रद्धा के प्रभाव से आज सबकुछ होते हुए भी सम्पूर्ण कर्म्मकलाप व्यर्थ है । बड़े बड़े कर्म्मकाण्डी बड़े कौशल से कर्म्म करते, और कराते हैं स्त्विष्टकामधुक् इन शब्दों का अधिकारी यज्ञकाण्ड अपने गीता के ! परन्तु सत्र व्यर्थ । ' एष वोऽ-अनुयायियों को आज़ ‘ योगक्षेम ’ जैसी सामान्य चिन्ता से भी चिन्तित किए हुए है । इसका कारण वही अश्रद्धा, अश्रद्धा का कारण विज्ञान २०७