Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 471–480
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 471–480
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प्रथमकाण्ड न जानना । इसी अश्रद्धा के कारण वैदिककाल में भी भारतीय मानवों की यज्ञविद्या के प्रति श्रद्धा होगई थी । अन्त में देवताओंोंने ( भुवनस्वर्गवासी देवताओंनें ) आङ्गिरस बृहस्पति को मनुष्यलोक ( भारत ) मेजकर उनकी श्रश्रद्धा दूर करवाई थी । ' तुमलोग यज्ञ क्यों नहीं करते?, बृहस्पति के यह प्रश्न करने पर भौनत्रिलोकी के पृथ्वीलोकस्थानीय ' भारतवर्ष ' नाम से प्रसिद्ध आर्यावर्त्त में निवास करने वाले मनु-योंनें उत्तर में – ‘ जो मनुष्य यज्ञ नहीं करते, वे आनन्द में रहते हैं, एवं जो यज्ञ करते हैं, वे दुखः पाया करते हैं, इसीलिए यज्ञविद्या से हमारा विश्वास हट गया है ' यह कहा था । इस के उत्तर में बृहस्पति ने विज्ञान के द्वारा उनकी अश्रद्धा दूर की थी । आज वैदिककम्पकाण्ड के लिए वही समय पुनः उपस्थित है । इसी श्रद्धा के कारण कितनों ही नें इसका परित्याग कर दिया है, कितने ही छोड़ते जा रहे हैं, एवं कितने हीं करते हैं, परन्तु उन्हें उसके फल पर विश्वास नहीं है । इन यच्चयावत् त्रुटियों का एक– मात्र कारण है - विज्ञान न जानना । यज्ञ करना - विद्युत् यन्त्र के साथ क्रीड़ा करना है । यत् किञ्चित् सी असावधानी से वही ज्योतिर्मय विद्य यन्त्र भूतनाशका कारण बन जाता है, एवमेव थोड़ी सी असावधानी से बही यज्ञ अधोगति का कारण बन जाता है । यज्ञप्रपञ्च छन्दोमर्यादा से एकान्तत: छन्दित ( मर्य्यादित ) है । उसमें अपनी ओर से न राई घटाया जा सकता, न तिल चढ़ाया जा सकता । क्यों नहीं घटाया बढ़ाया जा सकता?, इस प्रश्न का उत्तर प्राकृतिक नित्य आधिदैविक यज्ञ ही है । देशके दुर्भाग्य से ३-४ हजार वर्षों से वैदिक विज्ञान - सम्बन्धी निदान, रहस्य, आदि ग्रन्थों के लुप्तप्राय होजाने से हमलोग वास्तविक तत्त्वज्ञान से बहुत दूर चले गए हैं । अतएव साधारण वैज्ञानिक यथाजात मनुष्योंनें विज्ञानसिद्ध प्राचीन पद्धतियों की उपेक्षाकर यज्ञ को केवल विनोद की सामग्री समझ ली है । आग में २-४ मन घी, खोपरा, कस्तूरी, चन्दन - यदि डालने में हीं यज्ञकी इतिकर्तव्यता मानली गई है । इन्हीं अनर्थों के कारण हमारा प्रतिदिन पतन होता जारहा है । इस पतन को रोकनेका यदि कोई उपाय होसकता है, तो केवल विज्ञान - प्रचार । जत्रतक जनता के सामने कर्मकाण्ड से सम्बन्ध रखने वाली वैज्ञानिक उपपत्ति न रक्खी जायगी, तबतक वैदिक सभ्यता के दूसरे शब्दों में आर्यसभ्यता के पुनरुज्जीवनकी आशा केवल दुराशा ही है । इसी दुराशा को आशारूप में परिणत करने के लिए हमारा यह प्रज्ञा - चापल्य है । अभी ग्रन्थ का प्रारम्भ है । अतएव प्रत्येक विषय पर विस्तार से नहीं, तो सूक्ष्मरूप से विचार करना तो श्रावश्यक हो ही जाता है । ऐसा किए बिना जिस उद्द ेश्य को लेकर हम ' शथपथ ' का भाषानुवाद करने चले हैं, उसकी पूर्ति कदापि सम्भव नहीं है । पूर्व में भी कईबार विस्तार - सम्बन्धिनी विवशता प्रकट कर चुके हैं, एवं अत्र पुनः उसीका आम्र ेडन करते हैं । कृपालु पाठकों को ' ग्रन्थ समाप्ति पर विशेष ध्यान न देकर विषयपर ध्यान देना चाहिए । यदि प्रमादवश कहीं विषय में विरोध हो, तो इसके लिए हमें सूचिन करना चाहिए । यदि वह विरोध विज्ञानसम्मत हुआ, तो अगले संस्करण में उसके सुधार करने की चेष्टा की जायगी । आशा है, प्रेमी पाठक आगे बतलाए जानेवाले विषयपर पूर्ण ध्यान देने की कृपा करेंगे । प्रकृत में १० अक्षरों के विराट् छन्दका स्वरूप बतलाना है, एवं साथ ही ' विराट् यज्ञ है ', यह सिद्ध करना है । पूर्व के प्रकरण में यह कईबार बतलाया जाचुका है कि, यह वैधयज्ञ उस प्राकृतिक नित्य आधिदैविक यज्ञ की प्रतिकृति है । जिस प्राधिदैविक यज्ञ के आधार पर इस वैधयज्ञ का वितान किया जाता २०८
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शतपथब्राह्मण है, उसी आधिदैविक यज्ञ से, दूसरे शब्दों में उन्हीं आदिदैविक प्राणात्मक, अतएव ' देवता ' नामसे प्रसिद्ध पदार्थों से आध्यात्मिक जगत् का निर्माण होता है, एवं उन्हीं से आधिभौतिक जगत् का स्वरूप चेनता है । इसी विज्ञान के आधार पर - ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' यह कहा जाता है । जो पदार्थ आधिदैविक जगत् में हैं, अध्यात्म, और अधिभूत में भी वे ही पदार्थ हैं । इसी आधार पर ` “ यदेवेह तदमुत्र, यदमुत्र, तदन्विह ' ' पूर्णमदः पूर्णमिदम् ' यह कहा जाता है । केवल मात्रा, और सन्निवेशक्रम में भेद है । इसी भेदद्वयी के कारण पदार्थसाम्य होने पर भी तीनों के स्वरूप में सर्वथा वैचित्र्य, एवं वैजात्य होजाता है । इन तीनों में जो आध्यात्मिकजगत् है, उसको श्राधिदैविकजगत् के साथ मिला देना हीं यज्ञ है । दूसरे शब्दों में आध्यात्मिक प्राणदेवताओं को आधिदैविक अमृतस्वरूप, अतएव नित्य प्राण-देवताओं से मिला देना हीं यज्ञ है । यदि किसी उपाय से आपने अपने अध्यात्म को अधिदैवत के साथ मिला दिया, तो समझ लीजिए आपने ' यज्ञसम्पत् ' ( यज्ञफल ) प्राप्त करली । इस यज्ञसम्पत् की प्राप्ति का एकमात्र उपाय है - मध्यस्थ आधिभौतिक जगत् का आश्रय लेना । जिसप्रकार आधिभौतिकी पाषाणमयी प्रतिमा को जबतक प्रतीक विधि से मध्यस्थ नहीं बना लिया जाता, तचतक जीवात्माका ईश्वरात्मा के साथ सम्बन्ध होना असम्भव है, एवमेत्र नत्रतक आधिभौतिक घृत, समिध, अग्नि, खुवा, खुचि, कपाल, स्फ्य, शम्या, पुरोडाश, पशु, आदि पदार्थों को मध्यस्थ नहीं बना लिया जायगा, तत्रतक यज्ञका स्वरूप कथमपि सम्पन्न- निष्पन्न नहीं होसकेगा । आधिदैविक प्राणदेवताओं का अध्यात्म के साथ जो यजन ( सङ्गतिकरण ) है, वह विना अधिभूत की सहायता के सर्वथा अनुपपन्न है । कारण इसका यही है कि, प्राणदेवता निराकार हैं । स्वतन्त्र रूप से शुद्धप्राण को किसी भी उपाय से नहीं पकड़ा जासकता । प्राण भूत के द्वारा ही पकड़ में आता है । सुतरां भौतिक पदार्थों का समावेश सिद्ध होजाता है । एक मनुष्य अपने शत्रु को मारना चाहता है, उसका गला काटना चाहता है । इसके लिए उसे खड्ग मध्यस्थ बनाना पड़ता है | बिना इसके वह इस क्रिया में असमर्थ है । निराकार शुद्ध ज्ञानरूप विद्यातत्त्वका प्रज्ञानात्मा के साथ सम्बन्ध करने के लिए पुस्तक को मध्यस्थ बनाना पड़ता है । प्राप्तव्य पुस्तक नहीं है, अपितु विद्या तत्त्व है | परन्तु वह पुस्तक के बिना प्राप्य है । एवमेव हमें केवल आधिदैविक प्राणदेवताओं को लेना है । परन्तु बिना भूतका आश्रय लिए उनका सम्बन्ध सम्भव है । इसप्रकार - ' अध्यात्म ' का अधिदैवत के साथ सम्बन्ध कराने के लिए अधिभूत का आश्रय लेना परम आवश्यक है, यह भलीभांति सिद्ध होजाता है । अत्र केवल प्रश्न यह बच जाता है कि, अधिभूत से अध्यात्मका अधिदैवत के साथ सम्बन्ध कैसे होजाता है?, इस प्रश्न का उत्तर है - ' छन्द ' । छन्द के प्रभाव से अधिभूत अधिदैवत से सम्बन्ध कराने में समर्थ होजाता है । कैसे होजाता है?, इसके लिए निम्नलिखित ' छन्द ' के स्वरूप को ध्यान में रखना आवश्यक होगा । जिन आधिदैविक पदार्थों से अध्यात्म, एवं अधिभूत का निर्माण होता है, वे आधिदैविक पदार्थ छन्द से छन्दित रहते हैं. । छन्द ही उन प्राणदेवताओं का स्वरूप - रक्षक है । यदि छन्दोभेद न होता, तो ... देवतोभेद न होता । आज जो ३३ कोटि देवता सुने जाते हैं, वह इसी ' छन्द ' की महिमा है । प्रारम्भ में एक ही देवता था, एवं वह देवता ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध था । वही एक देवता गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, केवल इन तीनों छन्दों से छन्दित होने के कारण अग्नि, इन्द्र, आदित्य, इन तीन स्वरूपों में परिणत २०६
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प्रथमकाण्ड होगया | उसी छन्द की महिमा से ३ से ३३ अवस्थाओं में परिणत होता हुआ वही अग्नि ३३ कोटि स्वरूपों में परिणत हो रहा है ं । परमार्थत: एक अग्नि ही है, इसी ग्राधारपर ' अग्निः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । परिमाणविशेष का नाम हीं ' छन्द ' है । नाम, रूप, कर्म्म, तीन हीं वस्तुके स्वरूप हैं । इन तीनों को एक नियत परिमाण विशेष से परिच्छिन्न कर अन्य वस्तु के नाम - रूप - कर्म से इसे पृथक् कर देने वाला जो एक ग्रायतन विशेष है, जिसेकि दूसरे शब्दों में ' आकार ' कहा जासकता है, उसीका नाम छन्द है । जिसे आप पदार्थ कहते हैं, वस्तु कहते हैं, वह इसी आयतन - स्वरूप छन्द से छन्दित नामरूपकर्म्म की समष्टिमात्र है | रूप - आकार, वर्ण भेद से दो प्रकार का होता है । इसमें काले, पीले, सफेद, नीले, लाल, सुनहरी आदि रूप वर्णरूप कहलाते हैं । एवं गोल, लम्बा, चौकोर, घटकोटण, त्रिकोण, आदि रूप आकार– रूप कहलाते हैं । वर्ण, और ग्राकार, इन दोनों में से छन्दका आकाररूप से ही सम्बन्ध है । इस आकाररूप में ‘ त्वष्टाप्रारण ' का सम्बन्ध रहता है । वस्तु की काट छाँट कर उसे आकारविशेष प्रदान करने के कारण हीं त्वष्टाप्राण प्राणदेवताओं की मण्डली में ' रथकार ( त्वष्टा ) कहलाए हैं । इसी त्वष्टा के लिए ' त्वष्टा वै रूपाणि विकिरोति ' यह कहा जाता है । इसी त्वष्टाप्राण से जिस मनुष्य का आत्मा बनता है, दूसरे शब्दों में जिस मनुष्य के आत्मा में यह त्वष्टाप्राण अधिक मात्रा से रहता है, वही मनुष्यसम्प्रदाय में ' रथकार ' कहलाता है । दूसरा है वर्णरूप । इस वर्णरूप के अधिष्ठाता दिव्यलोकस्थ ' मघवा ' नाम के अमृतप्राणमय इन्द्रदेवता है । आप काले, पीले, नीले, श्वेत आदि जितने भी रूप देखते हैं, वे उन वस्तुओं के रूप नहीं हैं । अपितु उन वस्तुओं पर आक्रान्त होनेवाले इन्द्र के ( सौर रश्मिमय ज्योतिर्म्मय प्राण के ) रूप हैं । सूर्य्य की प्रत्येक. रश्मि सात सात तन्तुनों की हैं । सात रँग के सात डोरे हैं, इन सातों के ओतप्रोत भाव- सम्बन्ध से एक एक. रश्मिका स्वरूप बना हुआ है । सातों रङ्ग यदि एक बिन्दुपर जाते हैं, तो सातों का मिलकर श्वेत रत होजाता है । इसीलिए सात रङ्गों वाली सूर्य्यरश्मि श्वेत दीखा करती है । समक्षेत्र में हीं एक बिन्दु पर ये रङ्ग । उसी अवस्था में इनमें श्वेतता रहती है । यदि क्षेत्र की समता तोड़ कर विषमक्षेत्र पर इन रश्मियों का सम्बन्ध किया जाता है, तो रश्मि के सातों डोरे विशकलित होकर अपने स्वरूप में दिखाई देने लगते हैं । त्रिकोण काच के द्वारा सातों का स्वरूप प्रत्यक्ष दीख आता है । क्योंकि विषमक्षेत्र के कारण सातों रश्मियाँ विशकलित होजातीं हैं । इन सातों रश्मियों की जो एक रश्मि है, उसमें जो रश्मिस्वरूपा-घिष्ठाता एक अमृतप्राण भरा हुआ है, उसीका नाम इन्द्र है । वर्णरूप के अधिष्ठाता ये ही इन्द्र हैं । वर्त्तमान विज्ञान भी हमारे इस वर्ण - सम्बन्धी विज्ञान का ही अनुयायी है । वह भी सूर्य की प्रत्येक रश्मि में सात रङ्ग मानता है । किन्तु साथ ही इन्हीं सातों को जो वर्त्तमान विज्ञान सूर्य के सात घोड़े चतलाता है, वह हमारे विज्ञान के विरुद्ध है । सूर्य के सात घोड़े दूसरे ही हैं । सूर्य के चारों ओर जिस नियत मार्गपर पृथिवी * घूमती है, उसको ' क्रान्तिवृत्त ' कहते हैं । ' त्रिवर्त्तते श्रनी चक्रियेव ' ' सोमः पूषा च चेततुः ' इत्यादि * पृथिवी घूमती है, अथवा सूर्य घूमता है, इस विषय में वर्त्तमान ज्यौतिष, और वैदिक विज्ञान के सिद्धान्तों में मतभेद है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । दृश्यमण्डल को प्रधान मानकर ज्योतिष २१०
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शतपथब्राह्मण श्रुतियाँ पृथिवी का ही परिभ्रमण मानतीं हैं । इस परिभ्रमणवृत्त के ठीक बीचों बीच की एक कल्पित रेखा मानी गई है । इसी कल्पित रेखाको वैदिक परिभाषा में ' बृहतीछन्द ' कहते हैं । ज्योतिष शास्त्र में यही ' त्रिषुत्र ', किंवा ' विष्वदवृत्त ' कहलाया है । इसी को वर्त्तमान विज्ञान में Equator कहते हैं । गोल वस्तु के ठीक बीचका सर्किल पाश्वर्वर्त्ती अन्य सर्किलों की अपेक्षा बड़ा होता है । अतएव इसे ' बृहती ' कहा जाता है । इस बृहतीछन्द ( इक्वेटर लाइन ) के ठीक बीचोंबीच प्राणप्रद भगवान् सहस्रदीधिति सूर्य्यनारायण स्थिररूप से तप रहे । अतएव इनके लिए ' सूर्यो बृहती मध्यूढस्तपति ' यह कहा जाता है । इस श्रुति— वाक्य से भी पृथिवीका परिभ्रमण, और सूर्य्य की स्थिरता सिद्ध होती है । जिस वृत्तपर सूर्य्य है, उससे आधा खगोल दक्षिण में है, एवं आधा खगोल उत्तर में है । आप इस बृहतीछन्द को एक प्रकार से खगोल का विभाजक समझिए | इस बृहती के उत्तर एवं दक्षिण भाग में बृहतीछन्द से क्रमशः १२, ८,४, अँशों के अन्तर पर तीन तीन पूर्वापर ( पूर्व पश्चिम से सम्बन्ध रखने वाले ) वृत्त ( सर्किल ) और होते हैं । १२-८-४, इन तीनों के संकलन से कुल २४ अँश होजाते हैं । २४ अँश ही दक्षिणभाग के, एवं २४ ही उत्तरभाग के हैं । दोनों को मिलाकर कुल ४८ अँश होजाते हैं । सम्पूर्ण ग्रह इसी ४८ अँश के परिसर में घूमा हैं । अश्विन्यादि २७ नक्षत्र भी इसी के गर्भ हैं । जिस क्रान्तिवृत्तका पूर्व में दिग्दर्शन हुआ है, वह ४८ अँशात्मक समझना चाहिए । उसका परिसर ४८ अँश का है । इस क्रान्तिवृत्त को हुए जो ७ पूर्वापरवृत्त बनते हैं, उन्हीं का नाम सात छन्द हैं । सबसे बीचका छन्द ' बृहती ' है । १२ - ८ -४ के अन्तर पर तीन छन्द बृहती से दक्षिण भाग में हैं, एवं इसी क्रमके अनुसार तीन छन्द उत्तर ही सात छन्द सूर्य के रथ के साथ घोड़े हैं । सूर्य्य का हिरण्मय मण्डल हिरण्मय ( सुनहरी ) * रथ है । एवं रथ का क्रान्तिवृत्त नाम का एक पहिया है । एवं सात छन्द ही सात घोड़े हैं । ये सातों छन्द गायत्री, उष्णिकू, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप जगती, इन नामों से प्रद्धि हैं । दक्षिणभाग का सत्र से अन्त का गायत्रीछन्द ज्यौतिषशास्त्र में ' मकरवृत्त ' कहलाता है । इसी के सम्बन्ध से मकरसक्रान्ति होती है । एत्रमेव उत्तरभाग का सत्र से अन्त का जगतीछन्द ‘ कर्कवृत्त ' कहलाता है । यद्यपि प्राकृतिक नित्यव्यवस्था के अनुसार बीच का बृहतीछन्द सबसे बड़ा है, एवं दक्षिणोत्तर के छन्द एक दूसरे के समान हैं, तथापि दृश्यमण्डल के अनुपात से बृहतीछन्द से उत्तर-भाग में रहने वाले प्राचीन वेददृष्टा महर्षियोंनें गायत्री को सबसे छोटा छन्द बतलाया है, एवं जगती को सबसे बड़ा बतलाया है । गायत्री ६ अक्षर का ( ६ अक्षर का एक पाद - इसप्रकार ४ पाद के २४ अक्षर होजाते हैं । यही व्यवस्था आगे के छन्दों में समझनी चाहिए ) है । आगे ६ ओं छन्द क्रमशः ७, ८, ६, पृथिवी को स्थिर, एवं सूर्य को चल मानता है । एव प्राकृतिक नित्यस्थिति को लक्ष्य में रखकर वैदिक विज्ञान पृथिवी को चल, और सूर्य को स्थिर मानता है । इस विषय का विशद विवेचन श्रीगुरुप्रणीत ' अहोरात्र वाद ' के ‘ स्थिरचिरविमर्श ' नाम के प्रकरण में देखना चाहिए । यह ग्रन्थ ' मधुसूदनग्रन्थमालाकार्यालय जयपुर, विद्याधर का रास्ता ' इस पते से प्राप्त होसकता है । * अग्नि का रङ्ग सुवर्ण जैसा है । अतएव उसे ' हिरण्यरेता ' कहा जाता है । सौरमण्डल में यही हिरण्यरेता अग्नि भरा हुआ है । अतएव सौरमण्डल ' हिरण्मय ' कहलाता 1 २११
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प्रथमकाण्ड १०, ११, १२, अक्षरों के हैं । इन अक्षरों का अर्थवाक्, एवं शब्दवाक् दोनों वाग्भागों से सम्बन्ध है, जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । क्योंकि छन्द का प्रकरण चल रहा है, अतएव प्रसंगागत छन्दोरूप सूर्य्य के रथ के घोड़ों का स्वरूप बतलाना पड़ा । अब पाठकों का ध्यान पुनः प्रकृत की ओर आकर्षित करते हैं । हम बतला रहे थे कि, ग्राकाररूप, एवं वर्णरूप दोनों में से त्वष्टा आकाररूप के अधिष्ठाता हैं, एवं इन्द्र वर्णरूप के अधिष्ठाता हैं । इन दोनों में से इन्द्र से सम्बन्ध रखने वाले वर्णरूप का तो वय ( वस्तु ) स्वरूप नाम, रूप, कर्म्म, इन तीनों के मध्यस्थ रूप में ही अन्तर्भाव होजाता है । शेष बचता है आकाररूप । हमारे छन्द का इसी आकाररूप से सम्बन्ध है । जिन पदार्थों को हम आँखों से देख रहे हैं, उनमें से कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं, जिसका कोई आकार न हो । स्थूलदृष्टि से हम इसी आकार को ' छन्द ' कहने के लिए सन्नद्ध हैं । यदि आकार न होता तो - ' यह मनुष्य हैं ' ' यह गाय है ' ' यह कृमि है ' ' यह वृक्ष है ' ' यह मकान है ' आदि व्यवहार ही नहीं होता । दूसरे शब्दों में आकार के बिना वस्तुस्वरूप ही नहीं बनता । वस्तु का स्वरूप बना कर उसे वस्तुरूप से दिखला देने का काम केवल ' छन्द ' के ही आधीन है । इसी छन्द को वैदिक सांकेतिक भाषा में ' वयोनाघ ' कहा जाता है । छन्द से छन्दित नामरूपकर्म की समष्टिरूप जो वस्तु है, उसी को ‘ वय ' कहते हैं । साधारणतः भाष्यकारोंनें वय का अर्थ ' अन्न ' किया है । अन्न का भी नाम वय होसकता है, किन्तु वय अन्न को ही कहते हैं, यह समझना प्रमाद है । आप जिसे ' पदार्थ ' कहते हैं, उसी का नाम ‘ त्रय ' है । एवं छन्द को वयोनाध कहते हैं । ' इस वयोनाध, और वय ( छन्द - और छन्द से छन्दित नामरूपकर्म्मात्मक वस्तु ) दोनों की समष्टि को ' वयुन ' कहते हैं । श्रुति में बार बार वय, वयुन, वयोनाथ, ये तीन शब्द आया करते हैं । संसार के यच्चयावत् पदार्थ वयुन हैं । प्रत्येक वयुन में वय, और यवोनाध, दो दो भाग हैं । जबकि पदार्थमात्र छन्द से छन्दित हैं, तो ऐसी अवस्था में आधिदैविक पदार्थो का ( प्राण-देवताओंों का ) भी छन्द से छन्दित होना सुतरां सिद्ध होजाता है । यदि एक ही देवता होता, तत्र तो उसका छन्द भी एक ही होता, परन्तु देवता अनेक हैं । अतएव छन्द भी अनेक ही होजाते हैं । अथवा इसे उलटा समझिए । यदि एक ही छन्द होता, तो देवता एक ही होता । परन्तु छन्द अनेक हैं, अतएव देवता भी अनेक होजाते हैं । अनेक देवता सुने जाते हैं, एवं प्रत्येक के नामरूपादि भिन्न भिन्न हैं । इस विभिन्नता का एक-मात्र कारण छन्दोभेद ही है । इसीलिए प्रत्येक देवता का भिन्न भिन्न छन्द मानना पड़ता है । छन्द के भेद से एक ही देवता अनेक रूप कैसे धारण कर लेते हैं?, इसके लिए हम आपका ध्यान पानी की ओर आकर्षित करते हैं । कुए का पानी भी पानी है, बावड़ी का पानी भी पानी है, समुद्रका पानी भी पानी है, घड़ेका पानी भी पानी है, सरोवर का पानी भी पानी है । परन्तु सत्र पानी गुण से, रूप से सर्वथा भिन्न हैं । इन पूर्वोक्त सम्पूर्ण पानियोंका नामरूप ( आकार ) एवं कर्म्म ( गुण ) भिन्न भिन्न है | समुद्रका पानी भिन्न ही प्रकृति रखता है । कुएके पानीकी प्रकृति ओर ही कुछ है । इस भेदका एकमात्र कारण वही आयतन है । जिस १ वय और वयोनाध का विशद स्वरूप श्रीगुरुप्रणीत १० वाद ग्रन्थों में से ' अमृतमृत्युवाद ' नाम के आठवें ' वादग्रन्थ ' में देखना चाहिए । २१२
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शतपथब्राह्मण श्रायतनको पूर्व में हमने छन्द कहा है, उसी छन्दोरूप श्रायतनके भेदसे एक ही पानी नानास्वरूप में परिणत हो जाता है । छन्द एक प्रकारका ' परिमाण ' है । ' मापदण्ड ' है । केवल परिमाणके तारतम्यसे एक ही वस्तु नानास्वरूपों में परिणत होजाती है । अन्न के परिपाक करनेवाले अग्निका कुछ परिमाण है । यदि उस नियत परिमाण के साथ अग्निका सम्बन्ध कराया जाता है, तो उस नियत परिमाणयुक्त अग्नि से परिपक्व अन्नमें मिठास होता है । यदि इस परिमाण को बल दिया है, दूसरे शब्दों में अग्नि मात्रासे अधिक बढ़ा दिया जाता है, तो वही अन्न मधुररस के स्थान में कटुरस से युक्त होजाता है । यदि और भी अधिक मात्रा होती है, तो वही अन्न ' भस्म ' स्वरूप धारण कर लेता है । इन्हीं सत्र लौकिक भावों के आधारपर हम कह सकते हैं कि, वस्तुके भेदका एकमात्र कारण छन्दोभेद ही है । देवता भी पदार्थ हैं । अतएव इन प्राणदेवताओं के भेद का मूल भी इसी छन्दोभेद को कहा जा सकता है । क्योंकि श्राधिदैविक प्राणदेवता छन्द से छन्दित हैं, अतएव सिद्ध हो जाता है, कि, जबतक उन्हीं छन्दों से छन्दित प्राणदेवताओं से उत्पन्न हुए, अतएव - छन्द से छन्दित अधिभौतिक पदार्थों का श्राश्रय नहीं लिया जायगा, तबतक अध्यात्म का अधिदैवत के साथ कदापि सम्बन्ध नहीं होसकेगा । इसीलिए भिन्न भिन्न यज्ञों में भिन्न भिन्न छन्दों से छन्दित मध्यस्थ आधि-भौतिक पदार्थों के द्वारा छन्दों की सम्पत्ति प्राप्त कर लेना आवश्यक हो जाता है । हमने परिणामविशेष का नाम छन्द बतलाया है, एवं साथ ही छन्द से छन्दित पदार्थों को ' नाम-रूपकर्म्म ' की समष्टि कहा है । इन तीनों का ( नाम रूप - कर्म्म - का ) सृष्टिकर्त्ता मनः, प्राण, वाक्, रूप अव्यय के सृष्टिसाक्षी कर्मात्मा से सम्बन्ध है । तीनों में रूप का मन से सम्बन्ध हैं । रूप ही वस्तु का स्वरूप है । हमें जो पदार्थों का रूप दिखलाई पड़ता है, वह मनोरूप आदर्श पर ( काचपर ) उस वस्तु की प्रतिबिम्बित मूर्त्ति ही है । ज्ञानमय मन हीं वस्तु के आकार में परिणत रहता है । घोड़े के रूप को देखते ही मन घोड़े के रूप में परिणत हो जाता है । हाथी को देखते ही हाथी के रूप में परिणत हो जाता है । श्रुतएत्र रूप को हम अवश्य ही मनका विवर्त ( परिणाम ) कहने के लिए सन्नद्ध हैं । कर्म्मभाग क्रिया-प्रधान होने से क्रियामय प्राणभाग से सम्बन्ध रखता है । एवं नामभाग का वाक् से सम्बन्ध है । संसार के सम्पूर्ण रूप मनोमय हैं । सम्पूर्ण कर्म्म प्राणमय हैं । सम्पूर्ण नाम वाङ्मय हैं । तीन के अतिरिक्त कोई चौथी वस्तु नहीं है । एवं ‘ स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' इत्यादि श्रुतिप्रमाण के अनुसार मनः - प्राण - वाक् की समष्टि का नाम हीं आत्मा है । इसी विज्ञान के आधार पर ‘ आत्मैवेदं सर्वम् ’ यह कहा जाता है । मन, प्राण, वाक्, तीनों में सब से ऊपर वाक् का स्तर है । वाक् के गर्भ में प्राण है, एवं प्राण के गर्भ में मन है । मन सूक्ष्मतर है । प्राण सूक्ष्म है । बाकू स्थूल है । तीनों श्रविनाभूत हैं । श्रतएव तीनों से तीनों का ग्रहण होजाता है । सर्वसाधारण मनुष्य केवल ' वाकू ' नाम के स्थूल तत्त्व को ही देखते हैं । दार्शनिक परिभाषा में इसी वाक् को ' आकाश ' कहा जाता है । इस वाक् - भाग का प्रादुर्भाव मनः- प्राण - रूप आत्मा से ही होता है । सबसे पहिले आत्मभाग से ( मन: प्राण से ) आकाश ( वाक् ) का प्रादुर्भाव होता है । ( अनन्तर इसी वाग्भाग से पानी उत्पन्न होता है, जैसाकि श्रुति कहती है- ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् ' ( उस प्रजापति ने अपने वागू भाग से पानी उत्पन्न किया श. ६ | ११६ ) | यह पानी वायुरूप है, अतएव इसे २१३
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प्रथमकाण्ड वायु कहा जाता है । इस वायु से अग्नि उत्पन्न होता है । अग्नि से पानी की उत्पति होती है । पानी से पृथिवी का निर्माण होता है । इसप्रकार सृष्टिक्रम में मन की इच्छा से होनेवाले प्राणव्यापार से वही वाक् क्रमशः पञ्चभूतों में परिणत होजाती है । क्योंकि पञ्चभूत वाङमय हैं, अतएव पञ्चभूत - समुच्चय को हम ' वाक् ' नाम से व्यवहृत सकते हैं । प्रत्येक वस्तु पञ्चभूत की समष्टिमात्र है, अतएव हम वस्तुमात्र को ' वाक् ही कहेंगे । " " इसप्रकार प्रत्यक्ष यद्यपि स्थूलवाक्प्रपञ्च का ही होता है - परन्तु आपको विश्वास करना चाहिए कि, इस वाक् के गर्भ में निराकार प्राणतत्त्व है । एवं प्राण के गर्भ में मन है । इसी मन को लक्ष्य में रखकर वेदमहर्षि-सर्वसाधारण की दृष्टि में सर्वथा जड़ पाषाणांदि की ' शृणोतु ग्रावाणः ' ( हे पाषाणो! आप हमारी प्रार्थना सुनिए - इस प्रकार स्तुति किया करते हैं । कारण इसका यही है कि, यह हम सत्र में समान रूप से रहता है । वाक् स्थूल है | इसलिए, एवं वाक् प्राणु मन तीनों श्रविनाभूत हैं, इसलिए मनःप्राणवाङमय विश्व-प्रपञ्च के लिए केवल ‘ अथो वागेवेदं सर्वम् ' ( यह सब वाक् ही वाक् है, ऐ ० आरण्यक ३ | १ | ६ ) ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता ' ( इसी वाक् में सम्पूर्ण भुवन गुथे हुए हैं - तै ० ब्रा ० | २ ८ | ८ | ) यह कहा जाता है । श्रुति में पढ़े हुए इस वाक् शब्द को मन और प्राण का भी उपलक्षण समझना चाहिए | क्योंकि यह वाक् प्राण, एवं मन के बिना कभी नहीं रहती । हमने बतलाया था कि, नामरूपकर्म्म को परिच्छिन्न करने वाले श्रायतन का नाम हीं छन्द है । नाम-रूपकर्म्म हीं मनःप्राणवाक हैं । ऐसी अवस्था में ' वाक्परिणामं छन्दः ' यह छन्दोलक्षण तभी समन्वित होसकता है, जबकि वाक् से तीनों का ग्रहण किया जाय । ' वाक्परिमाणं छन्द: ' इस लक्षण का ' वाक् का-मनः प्राणगर्भित वाक् का - दूसरे शब्दो में नामरूप कर्म्म का जो परिणाम है, वयोनाध है, उसी का नाम छन्द है ' यह अर्थ है । जब कि सम्पूर्ण पदार्थों की वाङमयता पूर्व के निरूपण से सिद्ध होजाती है, तो विवश होकर देवताओं की भी वाङमयता मान लेनी पड़ती है । आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधि-दैविक, तीनों ही प्रपञ्च वाङमय हैं । सातों लोक वाङमय हैं । देवता, मनुष्य, पशु, गन्धर्व, आदि सत्रका स्वरूप इसी वाक् के आधार पर प्रतिष्ठित है । इसी वाग्विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेदमहर्षि ´ कहते हैं—
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः पशवो मनुष्याः ।
वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हवं जुषतामिन्द्रपत्नी ॥
-– तै ०० ना ० २८८४ इति । जिस वाक् का माहात्म्य ‘ वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' इन शब्दों से प्रकट किया जारहा है, वह सर्वप्रपञ्चमूलभूता, सर्वत्र व्याप्त रहने वाली वाक् शब्द, और अर्थ भेद से दो प्रकार की है । एक ही वाक् के – शब्दप्रपञ्च, और अर्थप्रपञ्च, ये दो भेद हैं । शब्दवाक्, एवं अर्थवाक्, दो से अतिरिक्त तीसरी वाक की सर्वथा अनुपत्ति हो समझनी चाहिए । शब्दवाक् ' शब्द ' नाम से प्रसिद्ध हैं, एवं अर्थवाक् ' अर्थ ' नाम से प्रसिद्ध है | शब्द और अर्थ, दोनों पार्वती और परमेश्वर ( शिव ) की भाँति अभिन्न हैं! आप संसार में जितने भी पदार्थ देख रहे हैं, वे सत्र शब्दमय हैं । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, पाँच के अतिरिक्त कोई छठा पदार्थ ही नहीं हैं । इन पाँचों में शब्द प्रतिष्ठित है । पाषाण, ढेला, पुस्तक, टेबिल आदि किसी २१४
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शतपथब्राह्मण भी पार्थिव पिण्ड पर आप हाथ मारिए, उसी समय शब्द प्रादुर्भूत होगा । ' संयोग - विभाग- शब्देभ्यः-शब्दोत्पत्तिः ' ( वैशेषिकदर्शन २ २ ३१ ) इस वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार शब्द की उत्पत्ति के वस्तु के संयोग, विभाग, और शब्द, ये तीन हीं कारण हैं । एक वस्तु पर जत्र दूसरी वस्तु का, किंवा हस्तादि का '. ' आयातयुक्त संयोग ' होता है, तो उसी समय शब्द होपड़ता है । एवमेव बाँस को जब बीच में से चीरा नाता है, तो वहाँ भी शब्द होता है । यह शब्द विभागजन्य है, एवं जत्र वीणादि का शब्द होता है, तों वही शब्द वाराक्रम ' से वीचीतरङ्गन्याय से उत्तरोत्तर नवीन नवीन शब्द प्रगट कर हमारी श्रोत्रन्द्रिय के समीप पहुँचा देता है | इस धाराक्रम से श्रोत्रेन्द्रिय पर आया हुआ जो शब्द है, वह शब्दजन्य है । साथ ही इतनी बात और समझ लेनी चाहिए कि, इस शब्द को उत्पत्ति का प्रधान कारण वायु है । चाहे “ संयोगज शब्द हो, विभागज शब्द हो, अथवा तो शब्दज शब्द हो, बिना वायु के तीनों हीं अनुपपन्न हैं । वायु ही शब्द में परिणत होता है । शून्यप्रदेश में यह वायु भरा रहता है । इस वायु पर जब अन्य वायु का आघात होता है, तभी शब्द होता है । एक मेज आपके सामने रक्खी हुई है । आपको पूर्वप्रतिपादित अन् - वायु-सोमात्मक ऋतविज्ञान के अनुसार मानना पड़ेगा कि, मेज ' के चारों ओर वायु भरा हुआ है । आप वायुस्तर से घिरी हुई मेज पर बड़े वेग से हाथ का प्रहार करते हैं, उसी समय ' खट ' शब्द होपड़ता है । इसका कारण यही है कि, आप के हाथ के आक्रमण से वह वायु भागना चाहता है, उस स्थान से हटना चाहता है । परन्तु प्राप इतनी शीघ्रता से अपने हाथ का प्रहार करते हैं कि, जिससे उस वायु को भागने का अवसर ही नहीं मिलता । आक्रमण से जितना स्थान वायु के निकल जाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए, उतना स्थान उसे नहीं मिलने पाता । वायु रहता है अधिक, स्थान रहता है थोड़ा । इसी कारण वायु में संघर्ष होपड़ता है । उसी क्षण शब्द उत्पन्न होजाता है । यदि आप मेज पर शनैः शनैः अपना हाथ रक्खेंगे, तो वह वायु निकल जायगा, एवं ऐसी अवस्था में शब्द, नहीं होगा । आपके हाथ में जितना अधिक वेग होगा, शब्द उतना हीं अधिक होगा, एवं जितना वेग कम होगा, शब्द में उतना ही शैथिल्य रहेगा । यदि वेग का सर्वथा अभाव होग्गा, तो शब्द न होगा । इसीलिए सूत्र में पठित संयोग का हमने ' आघातयुक्त संयोग ' अर्थ किया है । अन्यथा संयोग तो वेग के अभाव में रहता ही है । परन्तु ऐसे वेगशून्य संयोग से शब्द नहीं होता । इसी — प्रकार बाँस को जब चीरा जाता है, तो बाँस के चारों ओर रहने वाला वायु भागना चाहता है । परन्तु वह चीरने की क्रिया इतनी शीघ्र होती है कि, उस वायु को निकलने के लिए पर्य्याप्त स्थान नहीं मिलता । उसी समय शब्द होषड़ता है | यदि यहाँ भी चीरने की क्रिया से वेग निकाल दिया जायगा, तो इस शिथिलता से वायु को निकल जाने के लिए पर्याप्त स्थान मिलजाने से शब्द न होगा । यही प्रकार शब्दज शब्द में भी समझना चाहिए । अपिच त्रिना वायु के शब्द उत्पन्न नहीं होता, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, आप पानी के गर्भ में अपने दोनों हाथ डाल दीजिए, और हाथों से ताली बनाते रहिए । वहाँ कभी शब्द नहीं होगा । क्योंकि वहाँ वायु का अभाव है । साथ ही में एक बात और समझलेनी चाहिए कि, पूर्व में संयोगज, विभा-गज, शब्दज, तीनों शब्दों के जो उदाहरण बतलाए हैं, वे केवल ' ध्वनिस्वरूप ' हैं । उनमें ' ध्वनिमात्र ' है । जो शब्द हम ( मनुष्य ) अपने मुख से बोलते हैं, उसमें - क, च, ट, प, इस रूप से वर्णविभाग हैं, किन्तु ध्वनि में यह बात नहीं है । परन्तु ध्वनि ही वास्तविक शब्द है । इसीलिए तो ' तस्माद् ध्वनिः शब्दः ' २१५
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प्रथमकाण्ड ( महाभाष्य १ । १ । १ ) यह कहा जाता है । ध्वनिबाकू में केवल वायु ही वायु है । वर्णविभाग करना इन्द्र का काम है । इन्द्र वायु में प्रविष्ट होकर उसके खण्ड खण्ड कर उन खण्डों को परिच्छिन्न बनाकर वर्णरूप में परिणत कर देता है | यह इन्द्रभाग केवल मनुष्यों में ही रहता है । इसीलिए ' तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ' ( परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी इन वाकू के चार भागों में से जो वाक् का चौथा भाग है, मनुष्य उसे ही बोलते हैं * ) यह कहा जाता है । प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि, शब्द की उत्पत्ति के तीन कारण हैं । एवं तीनों में वायु प्रधान है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' वायुः खात् शब्दस्तत् ' ( आकाश से निकला हुआ वायु शब्दरूप में परिणत होजाता है - यजुर्वेदीय कात्या ० प्रा ० ) यह कहा जाता है । पूर्व के निदर्शन से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, पृथिवीरूप अर्थवाक् में अवश्य ही शब्दवाक् है । इसीप्रकार जल में भी शब्द है । बहते हुए जल के कल - कल नादको कौन नहीं जानता? । वायु के सन्सनाहट से कौन अपरिचित है? | तेज ( अग्नि ) का धक् धक् शब्द किससे छिपा हुआ है? | एवं आकाश शब्दमय है, इस प्रत्यक्ष सिद्धान्त में आजतक किसने प्रमाण मांगा है? | इसप्रकार पांचों महाभूतों में शब्द की सत्ता सिद्ध होजाती है । पाँचों हीं महाभूत ‘ अर्थप्रपञ्च ' हैं । एवं यह अर्थप्रपञ्च शब्दमय है, इसीलिए हम अवश्य ही - ' पार्वतीपरमे-श्वराविव वागर्थौ संपृक्तौ ' ( शिव पार्वती की भाँति वाक् और अर्थ दोनों अभिन्न हैं - एक दूसरे में प्रोत हैं ) यह कह सकते हैं । शब्द और अर्थ अभिन्न हैं, इसमें एक अनुभूत प्रमाण और भी है । १० मनुष्य एक कमरे में सोरहे हैं । उनमें किसी का नाम देवदत्त है, किसी का नाम यज्ञदत्त है, किसी का नाम रामलाल है । एक मनुष्य उन दसों में से केवल रामलाल का आह्वान करता है । आपको यह सुन कर आश्चर्य्य होगा कि, उस आह्वान से केवल गमलाल की ही आँख खुलती है । शेष ६ श्र ज्यों के त्यों मोते रहते हैं । इसका एकमात्र कारण है शब्दार्थ की अभिन्नता । ‘ औत्पत्तिकस्तु शब्दस्थार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशः ० ' इत्यादि सूत्र भी इसी विषय की पुष्टि करता है | भगवान् जैमिनि कहते हैं कि, शब्द का अर्थ के साथ औत्पत्तिक सम्बन्ध है । जिस समय अर्थ उत्पन्न होता है, वह सम्पूर्ण नामों को अपने साथ लिए हुए ही उत्पन्न होता है । ' अर्थोत्पत्ति के अनन्तर उसके साथ शब्द का सम्बन्ध हो, ' यह बात नहीं है । अर्थात् शब्दार्थ का ' उत्पन्नसृष्ट ' सम्बन्ध नहीं है, अपितु ‘ उत्पत्तिसृषु ' सम्बन्ध है । इसी आधार पर - ' सर्वे सर्वार्थवाचका दाक्षीपुत्रस्य पाणिनेः ' ( दाक्षीपुत्र पाणिनि के मतानुसार सम्पूर्ण शब्द सम्पूर्ण अर्थों के वाचक हैं । संसार में जितने भी शब्द हैं, वे सब अर्थों को कहने वाले हैं ) यह कहा जाता है । उस नित्य सम्बन्ध का हमें ज्ञान कैसे होता है? इसका उत्तर देते हुए अन्त में ' तस्य ज्ञानमुपदेश ': यह कहा है । जब सभी शब्द सत्र के वाचक हैं, तो फिर किस शब्द से किस का ग्रहण किया जाय?, यह विप्रतिपत्ति उपस्थित होती है । ऐसी अवस्था में तो घोड़े के लिए गंधे का प्रयोग होसकता है, एवं हाथी के लिए घोड़े १ परा पश्यन्ती आदि का क्या स्वरूप है?, ध्वनिवाक में केवल वायु ही कैसे रहता है?, इन्द्र - यु में प्रविष्ट होकर वायु को खण्डरूप में कैसे परिणत कर देते हैं?, यह इन्द्र क्या पदार्थ है? आदि विषयों का विस्तृत विवेचन श्रीगुरुप्रणीत ' पथ्यास्वस्ति ' नाम के वैदिक - वर्णमात्रिका ग्रन्थ में देखना चाहिए | २१६ च
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शतपथब्राह्मण का प्रयोग हो सकता है । इस अव्यवस्था को दूर करने के लिए महर्षि उपदेश देते हैं कि, ' जिसका आकार ऐसा देखो, उसे अन्यान्य शब्दों से न बोलकर ' हाथी ' शब्द से ही व्यवहृत करो । अमुक को अमुक नाम से ही बोला करो | इसी सम्बन्ध को न्यायशास्त्र - ' संकेतसम्बन्ध ' कहा करता है । परन्तु उसका संकेत यहाँ अभिप्र ेत f • नहीं है । वह तो शब्द को ग्रागन्तुक मानता है । यहाँ शब्द को अर्थ के साथ ही प्रादुर्भूत होने वाला माना जाता है । यहाँ के संकेत का केवल ' यद्यपि सर्वेसर्वार्थवाचका: ' इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक अर्थ सभी नामों से व्यहृत किया जासकता है । परन्तु इसे और किसी नाम से न बोलकर इस एक नियत नाम से ही व्यवहृत करो, यही अर्थ है । किस को किस नाम से व्यवहृत करें?, इसका ज्ञान वृद्धोपदेश पर निर्भर है । पिता वृक्ष पर बैठे हुए पक्षियों की ओर सङ्केत करके अपने अल्पवयस्क बच्चे से कहता कि, बच्चे! यह चिड़िया है, यह तोता है, यह मोर है, यह चील है । उन नामों की अभ्यास - परम्परा से उस बच्चे के हृदय में छाप पड़जाती है । परिणाम इसका यही होता है कि, इतर नामों से उसकी प्रज्ञा हटकर इन नियत नामों पर ही प्रतिष्ठित हो जाती है । यदि आप बचपन से उसे चिड़िया की ओर सङ्क ेत करके कहदेंगे कि, यह घोड़ा है, एवं घोड़े की ओर सङ्केत करके कहदेंगे कि, यह चिड़िया है, तो विश्वास कीजिए, वह घोड़े को चिड़िया ही कहने लगेगा, एवं चिड़िया को घोड़ा ही कहने लग जायगा । एक ही वस्तु के राइस, चाँवल, तन्दुल आदि अनेक नाम हैं । किसी देश के वृद्धोंनें उसके लिए ' राइस ' नाम नियत कर रक्खा है, किसी ने ' चाँवल ' शब्द नियत कर रक्खा है, किसी ने ' तन्दुल ' शब्द नियत कर रक्खा है । कोई ' अक्षत ' को ही प्रधान मानता है । ये सम्पूर्ण नाम तत्रतक सर्वथा अनुपपन्न हैं, जबतक कि शब्दार्थ का नित्यसम्बन्ध मानते हुए ' सर्वे सर्वार्थ- - ' वाचकाः ' यह सिद्धान्त न मान लिया जाय । इस सिद्धान्त का मौलिक विज्ञान यही है कि, शब्द और अर्थ, दोनों एक ही स्थान से, एक ही वस्तु से उत्पन्न होते हैं । सूर्य्य से ऊपर आपोमय परमेष्ठी - मण्डल है, यह पूर्व प्रकरणों में बतलाया जाचुका है । प्राणमय स्वयम्भू, आपोमय परमेष्ठी, वाङ्मय सूर्य्य, अन्नमय चन्द्रमा, अन्नादमयी पृथित्री, पाँचों प्राकृतात्मा मनः प्राणवाङमय हैं अव्यय सब का आलम्बन है । इस अव्यय की आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाक्, ये पाँच कलाएँ हैं । पाँचों में आनन्द विज्ञान विश्वातीत । प्राणवाक् विश्व है । मन दोनों ओर है | विश्व में अव्यय का मनः प्राणवाक् - भाग ( जोकि भाग सृष्टिसाक्षी होने से ' कर्मात्मा ' कहलाता हैं ) उद्बुद्ध रहता है | छानन्दविज्ञान ' सहकारी रहते हैं । एवं मुक्ति में आनन्दविज्ञान भाग ( जोकि भाग मुक्तिसाक्षी होने से ' ज्ञानात्मा ' कहलाता है ) उद्बुद्ध रहता है । मनःप्राणवाङमय कर्म्मभाग सहकारी रहता है | सृष्टि में जैसे ज्ञानभाग की अपेक्षा है, एवमेव मुक्ति में कर्म्मभाग की अपेक्षा है | बिना ज्ञान के सृष्टि नहीं होसकती | ज्ञानभाग सर्वथा निष्क्रिय है, शान्त है, प्रकाशस्वरूप है । अतएव इसे ' अकर्म्म ' कहा जाता है । कर्म्मभाग कर्म्म कहलता है । ज्ञानघन ' अकर्म्मब्रह्म ' में क्रियाघन ' कर्म्मब्रह्म ' व्याप्त है । एवं कर्म्मब्रह्म में अकर्म्मब्रह्म व्याप्त है । कर्म्म अमृत है, कर्म्म मृत्यु है । ' अन्तरं मृत्योरमृतं मृत्यात्रमृत-माहितम् ' ( मृत्यु के गर्भ में अमृत है, एवं मृत्यु के बाहिर अमृत है - शतपथ १०/५० २/४ ) १ सृष्टि में श्रानन्द विज्ञान की अपेक्षा क्यों होती है?, इसके लिए श्रीगुरुप्रणीत १२ वादग्रन्थों में ' संशयतदुच्छेदवाद ' नाम के ११ वें वादग्रन्थ का ' सच्चिदानन्दखण्ड ' देखना चाहिए । यह ग्रन्थ मुद्रित होचुका है — एवं ‘ श्रीमधुसूदनकार्यालय जयपुर ' से प्राप्त हो सकता है । २१७