Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 481–490

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 481–490

पृष्ठ 481

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प्रथमकाण्ड ‘ तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ' ( वह सब के गर्भ में है, और सबके बाहिर है - ईशावास्योप-निषत् - मन्त्र ५ ) इत्यादि श्रुतियाँ दोनों में ओतप्रोतभाव - सम्बन्ध बतलाती हैं । जो मनुष्य ' न करणा न प्रजया घनेन त्यागेनैके अमृतत्त्वमानशुः ' इत्यादि श्रुतियों का वास्तविक मर्म न समझ कर शुद्धज्ञान को मुक्ति का कारण मानते हैं, वे भी भूल में हैं । एवं जो मनुष्य ' कुन्नि येह कम्र्माणि जिजीविषेच्छतं 7 समाः ' इत्यादि श्रुतियों का तात्पर्य्यं न समझ कर केवल कर्म को बन्धनमुक्ति का कारण मानते हैं, वे भी भूल में हैं । कोरा ज्ञान, एवं कोरा कर्म, दोनों हीं निरर्थक हैं । ज्ञानयोग ' ' सांख्ययोग ' है, कर्म्मयोग ' कर्म्मयोग ' है । दोनों हीं अनुपादेय हैं । जत्रतक दोनों के सम- समन्वयात्मक बुद्धियोग को नहीं अपना लिया जाता, तत्रतक बन्धनमुक्ति सर्वधा असम्भव है | सम्पूर्ण गीताशास्त्र में इसी बुद्धियोग का उपदेश है । भगवान् न केवल कर्म्म को श्रयःपन्था समझते, न केवल अकर्म्म को ( ज्ञान को ) । श्रपितु उनका कहना है कि—

* " कम्मण्यकर्म्म यः पश्येदकर्म्मणि च कर्म्म यः ।

स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्म्मकृत् ॥

गीता ४।१८ अर्थात् जो ज्ञानमय कर्म्म का, किंवा कर्ममय ज्ञान का, दूसरे शब्दों में बुद्धियोग का ( क्योंकि इसी समन्वित योग को बुद्धियोग कहा जाता है ) आश्रय लेता है, मनुष्यों में वही बुद्धिमान् है, अर्थात् बुद्धियोग का अनुयायी है । वही युक्तयोगी है । समझलो, वह सम्पूर्ण कर्म्म करचुका है । भगवान् को जितना हीं प्रेम अव्यय के ज्ञानमय अमृतभाग से है, उतना हीं प्रेम, किंवा उससे भी अधिक प्रेम अव्यय के कर्म्ममय मृत्युमाग से है । वे अव्यय को सद्रूप अमृत, एवं सद्रूप मृत्युमय समझते हैं, जैसाकि गीता

कहती है-तपाम्यहमहं वर्षं निगृहणाम्युत्सृजामि च ।

अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन! ॥

- गीता ह | १६ | प्रकृत में उक्त प्रपञ्च से हमें केवल यही बतलाना है कि, स्वयम्भू परमेश्र्यादि पाँचों मण्डलों में व्याप्त अव्ययपुरुष मुक्ति से सम्बन्ध ज्ञानकर्म्मम । । इसका ज्ञानभाग आनन्दविज्ञानमनोमय है, इसका है । एवं कर्म्मभाग मनःप्राणवाङमय है, इसका सृष्टि से सम्बन्ध है । पाँचों मण्डल सृष्टिस्वरूप हैं, अतएव इनमें रहने वाले अव्ययात्मा के लिए केवल - " स वा एष आत्मा वाङमयः प्राणमयो मनोमयः ” यह कहा जाता है । पाँचों में तीनों हैं । तीनों में से प्रकृत में हमारा सम्बन्ध केवल वाग्भाग से है । यह वाग-भाग - पाँचों मण्डलों में भिन्न भिन्न स्वरूप धारण कर लेता है । इसी छन्दोभेद के कारण उन पाँचों के नाम-रूप - कर्म्म, तीनों में अन्तर हो जाता हैं । स्वयम्भू की वाक् ' वेदवाकू ' कहलाती है । ' वेदाः सत्यम् ’ ( वेद् सत्य, अर्थात् मौलिक तत्त्व है ) इस श्रुति के अनुसार इसी को ' सत्यावाक् ' कहा जाता है | परमेष्ठीमण्डल की वाक् ‘ सरस्वती ' कहलाती है । सौरीवाक् ' बृहती ' कहलाती है । चन्द्रमण्डल की वाक् २१८

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शतपथब्राह्मण ' सुब्रह्मण्या ' कहलाती है । एवं पृथिवी की वाक् ' अनुष्टुप ' कहलाती है । स्वयम्भूमण्डल प्राणमय होने सेवेघन है, स्वयम्भू के प्राणमुख से ही वेदसृष्टि होती है, वेद सत्य है, अतएव उसकी वाक् को अवश्य ही सत्यावाक कहा जासकता है । परमेष्ठी से सम्बन्ध रखने वाले क्रन्दसी - त्रिलोकी के समुद्र का नाम क्योंकि सरस्वान् है, अतएव इसके सम्बन्ध से यह वाक् सरस्वती कहलाती है । सूर्य्य बृहतीछन्द पर स्थिर रहता है । अपिच इसका साम पृथिवी - चन्द्रमा - आदि की अपेक्षा बृहत् ( बहुत बड़ा ) है, इसलिए भी इसकी वाक् ‘ बृहती ' कहलाती है । एवं ' ब्रह्मा कृष्णच नोऽवतु, चन्द्रमा वै ब्रह्मा कृष्णः ' ( कृष्णब्रह्मा इस यज्ञ में हमारी रक्षा करें, चन्द्रमा हीं कृष्णवर्ण होने से कृष्णब्रह्मा कहलाता है, ) इस वाजिश्रुति के अनुसार ' गो ' नाम से प्रसिद्ध सूर्य्यरस का पान करने के कारण ' गोपी ' नाम से प्रसिद्ध नक्षत्रों के साथ * रास-क्रीड़ा करते हुए आकाशबिहारी चन्द्रमा को प्राधिदैविक यज्ञ का ब्रह्मा कहा जाता है । चन्द्रमा का प्रकाश अपना प्रकाश नहीं है, अपितु वह सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाशित रहता है । प्रातिस्विकरूप से वह सर्वथा काला है । अतएव उसे ‘ कृष्णब्रह्मा ' कहा जाता है । क्योंकि चन्द्रमा ब्रह्मा कहलाता है, अतएव उसकी वाक् ' सुब्रह्मण्या ' कहलाती है । एवं पृथिवी अग्निमयी है । अग्नि को ही प्रजापति कहते हैं ( देखिए शत्र ० ६ काण्ड ३।६ ) । एवं प्रजापति का अनुष्टुप्कन्द है । अतएव पृथिवी की वाक् को अनुष्टुप् कहा जाता है । उक्त पाँचों वाक्प्रपञ्चों में से हम आपका लक्ष्य केवल पारमेष्ठिनी सरस्वतीवाक् की ओर ही आकर्षित करते । याज्ञिकसृष्टि का मूल यही वाक् है । क्योंकि यज्ञ का प्रथम प्रवर्त्तके यही पोमय परमेष्ठी है, जैसाकि ‘ अपांप्रणयन ' कर्म की उपपत्ति में विस्तार से बतलाया जा चुका है । सृष्टि - शब्द और अर्थ भेद से दो प्रकार की है । दोनों का आधार किंवा प्रभवस्थान यही परमेष्ठी है । इसी वाक् को श्रापोमयी होने से ‘ आम्भृणी ’ वाक् कहा जाता है । ऋग्वेद के ' आम्भृणीसूक्त ' में इसी त्रैलोक्यव्यापिनी आम्भृणी वाक् का वर्णन हुआ है । परमेष्ठी में हमने ' अम्भ ' नाम के गाङ्गेय वायुरूप पवित्रतम पानी की सत्ता बतलाई थी । इसी अम्म के सम्बन्ध से इसे ' आम्भृणीवाक् ' कहा जाता है । वस्तुतस्तु परमेष्ठी की जो वाक् है, वह आपोमयी है । उससे दो धाराएँ निकलतीं हैं । एक धारा का नाम ' सरस्वती ' है, एक धारा का नाम ' आम्भृणी ' है । परमेष्ठी में भृगु, और अंगिरा, दोनों हैं । भृगु ऋत है । इसीलिए परमेष्ठी ‘ परमेष्ठी ' कहालाता है । एवं अ गिरा सत्य है । सत्य और ऋतं क्या पदार्थ हैं?, इसका उत्तर पूर्व में दिया जाचुका है । एक धारा का सम्बन्ध ऋत भृगु से है, एक धारा का सम्बन्ध सत्य अंगिरा से है । दोनों धाराओं में दोनों हैं । केवल प्रधानता अप्रधानता, का भेद है । अङ्गिराधारा में अतिश उद्बुद्ध है, अतएव वह प्रधान है, भृगु अनुद्बुद्ध है, अतएव वह अप्रधान है । एवमेव भृगुधारा में भृगु उबुद्ध है, अतएव वह प्रधान है, अंगिरा अनुद्बुद्ध है, अतएव वह प्रधान है । दूसरे शब्दों में- एक धारा में सौम्यप्राण की प्रधानता है, दूसरी धारा में आग्नेय प्राण की प्रधानता है । आग्नेयप्राणप्रधाना जो उस वाक् की अंगिराधारा है, उसी का नाम सरस्वती है । शब्दप्रपञ्च की अधिष्ठात्री यही सरस्वतीवाक है । * आकाशबिहारी कृष्णचन्द्र ( काले चाँद ) की रासक्रीड़ा का क्या स्वरूप है?, एवं ईश्वरावतार वासुदेव कृष्ण ने ब्रज में गोपियों के साथ रासक्रीड़ा क्यों की?, इत्यादि विषयों का वैज्ञानिक विवेचन गीता-भाष्य के रहस्यकाण्डान्तर्गत ' आचार्य रहस्य ' के ' वैहायस कृष्ण रहस्य ' नाम के प्रकरण में देखना चाहिए । यह ग्रन्थ अभीतक अमुद्रित हैं । २१६

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प्रथमकाण्ड सौम्यप्राणप्रधाना जो उस वाक् की भृगुधारा है, उसी का नाम -'आम्भृणी ' है । अर्थप्रपञ्च की अधि-ष्ठात्री यही आम्भृणीवाक् है । शब्दबाकू के परारा, पश्यन्तो, मध्यमा, वैखरी, ये चार भेद हैं । इनमें जो मध्यमा है, उसे ही ध्वन्यात्मिका वाक् कहते हैं, एवं क - च - ट - त- पात्मिका वर्णवाक् को वैखरीवाक् कहते हैं, जैसाकि पूर्व -प्रकरण में बतलाया जाचुका है । कचटतप श्रादि वर्णविभाग इन्द्र के द्वारा होता है । सौर अमृतप्राण का नाम हीं ‘ इन्द्र ' है । यह सूर्य्य परमेष्ठीमण्डल के अनन्तर उत्पन्न होता है, अतएव परमेष्ठी में उत्पन्न होनेवाली सरस्वतीवाक् में वर्णविभाग नहीं रहता, उसमें केवल ध्वनि की ही प्रमुखता है । ध्वन्यात्मिका वाक् का नाम हीं सरस्वती है । इसी वाक - विज्ञान को बतलाने के लिए महर्षियोंनें सरस्वती को ' वीणावादिनी ' ( वीणा बजाने वाली ) कहा है । वीणा से सुमधुरा ध्वन्यात्मिका वाक् ही अभिप्र ेत है । मुरलीमनोहर भगवान् कृष्ण ने ओर किसी बाद्य को न अपना कर केवल बाँसुरी ही क्यों बजाई?, उन्हें वंशी से ही इतना प्रेम क्यों था?, इम प्रश्न का उत्तर भी इसी से सम्बन्ध रखता है । * भगवान् कृष्ण इसी परमेष्ठी विष्णु के अवतार थे । परमेष्ठी घोर काला है । क्यों कि परमेष्ठी के अनन्तर उत्पन्न होनेवाले सूर्य की भूतज्योति का वहाँ सर्वथा अभाव अतएव तदंशभूत वासुदेवकृष्ण ' कृष्ण ' कहलाए । एवं वहाँ की वाक्- ध्वन्यात्मिका थी, अतएव उन्होंनें ध्वनिप्रधाना वंशी को ही अपना वाद्य बनाया । कहना यही है कि, परमेष्ठी के अङ्गिराभाग से सम्बन्ध रखने वाली जो सरस्वतीवाक है, वह ध्वन्यात्मिका है । वर्णात्मिका वाक् का यही वाक् आधार है । वास्तविक शब्द ( प्राथमिक शब्द ) यही ध्वनि है । इसीलिए - ' तस्माद्ध्वनिः शब्द ' यह कहा जाता हैं | अङ्गिरा की घनावस्था का नाम ही अग्नि है । यही शब्दप्रपञ्च का मूल है । अतएव - –'अग्निर्वाग् भूत्त्वा मुखं प्राविशत् ' ( अग्नि क - च - ट - त - आदि वर्णवाकूरूप में परिणत होकर मुख में प्रविष्ट होगया - ऐतरेय आरण्यक ) यह कहा जाता है । यह केवल कहना हीं कहना नहीं है, अपितु वस्तुस्थिति ही ऐसी है । कायाग्नि ( शरीराग्नि ) हीं शब्द का प्रभव है । मन की इच्छा से शरीराग्नि पर ' धक्का लगता है । ं धक्के से क्षुब्ध होकर वह अग्नि वायु पर प्रेरणाबल का प्रयोग करता है । वही वायु अग्नि से प्रेरित होकर उर: - स्थल में आता हुआ मन्दस्वर का जनक बनता है । एवं वह वायु यदि कण्ठ– पर्य्यन्त पहुँच जाता है, तो मध्यम स्वर का जनक बन जाता है, एवं वही यदि मस्तक से टकरा कर मुख से निकलता है, तो तार ( अत्युच्य ) स्वर उत्पन्न कर देता है । यदि अग्रि का साधारण धक्का है, तत्र तो वह वायु उरःस्थल से टकराकर ही बाहिर निकल जाता है । यदि अग्नि का अधिक वेग होता है, तो कण्ठ से टकराकर निकलता है । यदि ओर भी प्रबल आक्रमण होता है, तो माथे से टकराकर निकलता है । इन तीन प्रक्रमों के कारण वाक् के. – मन्द, मध्य, तार, ये तीन अभिक्रम होजाते हैं । इन तीनों का-गायत्री, त्रिष्टुप जगती, इन तीनों छन्दों से क्रमिक सम्बन्ध है । गायत्री का उरःस्थानीय मन्दस्वर से सम्बन्ध रहता है, त्रिष्टुप् का कण्ठस्थानीय मध्यस्वर से सम्बन्ध है, एवं जगती का शिरः स्थानीय तारस्वर से सम्बन्ध है । प्रात: काल से सायङ्काल पर्य्यन्त तीन भाग कर डालिए । प्रातःकाल में गायत्र अग्नि रहता है । मध्याह्न में त्रैष्टुप सावित्र ऐन्द्र अग्नि रहता है । एवं * वासुदेव कृष्ण परमेष्ठी के अवतार कैसे हैं?, इन्होंनें वंशी क्यों बजाई?, गौए ं क्यो चराई १, आदि विषयों का वैज्ञानिक दिवेचन गीतारहस्य के ' परमेष्ठीकृष्ण रहस्य ' में देखना चाहिए । २२.

पृष्ठ 484

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शतरथब्राह्मण सायङ्काल में जागत श्रादित्याग्नि रहता है । प्रातः काल का गायत्राग्नि श्रष्टावयव है । इसे ' गायत्री ' कहते हैं । मध्याह्न का सावित्र ऐन्द्रप्राण एकादशावयव है । अतएव इसके छन्द को त्रिष्टुप् कहते हैं । एवं सायङ्काल का आदित्य ( इसी को सरस्वती के सम्बन्ध से सारस्वत अग्नि भी कहा जासकता है ) द्वादशावयव । अतएव इसके ; छन्द को जगतीछन्द कहा जाता है । प्रातःकाल प्रातःसवन है, मध्याह्न माध्यन्दिन सवन | एवं सायङ्काल सायंसवन है । प्रात: काल में गायत्र अग्नि की सत्ता है, अतएव इस समय ' गायत्री ' की उपासना की जाती । मध्याह्न में सावित्र इन्द्र की सत्ता है, अतएव मध्याह्न में ' सावित्री ' की उपासना कीजाती है । एवं सायङ्काल में सारस्वत श्रादित्य की सत्ता रहती है, अतएव सायङ्काल में ' सरस्वती ' की उपासना की जाती है । इसीलिए प्रातःसवन गायत्र कहलाता है, माध्यन्दिनसवन त्रैष्ट म कहलाता है, एवं सायंसवन जागत कह लाता है | गायत्री से ( प्रात: काल के गायत्रीछन्द से छन्दित वर्द्धिष्णु शान्त, किन्तु वीर्य्ययुक्त ब्रह्माग्नि से ) ब्राह्मण का आत्मा बनता है । त्रिष्टुप् से L। मध्याह्न के त्रिष्टुप् छन्द से छन्दित प्रज्ज्वलित - शान्त गायत्रवीर्य्य के आधार पर प्रतिष्ठित ऐन्द्र अग्नि से ] क्षत्रिय का श्रात्मा बनता है । नगती से [ सायङ्काल के जगतीछन्द से छन्दित क्षयिष्णु - गायत्र और सावित्र तेज से सुरक्षित सारस्वत आदित्य अग्नि से ] वैश्य का आत्मा बनता है | एवं रात्रि में रहने वाले तम से अभिभूत प्राण से शूद्र का आत्मा बनता है | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इन तीनों का आत्मा छन्द से छन्दित है । अतएव तं नों मर्य्यादा से बद्ध हैं । एवं शूद्र किसी भी छन्द से छन्दित न होने के कारण स्वच्छन्द है, स्वतन्त्र है । वह यथाकाम है, यथाचार है । इसी विज्ञान को में रखकर श्रुति ने कहा है-“ गायत्र्या ब्राह्मणं निरखत यत्, त्रिष्टुमा राजन्यं जगत्या वैश्यं, न केनचिच्छ-न्दसा शूद्रं निरवर्त्तयत् ' । ब्राह्मण प्रात: काल का सूर्य्य है । अतएव उसे सदा शान्तं, किन्तु वर्धिष्णु रहना चाहिए । क्षत्रिय, और वैश्य उसके सामने माथा झुकाते हैं, न कि ब्राह्मण उसके सामने अपना मस्तक झुकाता है । मध्याह्न का सूर्य्यं क्षत्रिय है | वह प्रबल है । अतएव क्षत्रिय को हाथ में सदा राजदण्ड रखना चाहिए । सायङ्काल.का सूर्य्य वैश्य है । अतएव वैश्य को दोनों से अनुगत रहना चाहिए । दूसरे शब्दों में यह क्षयिष्णु है । अतएव इसे ब्राह्मण क्षत्रिय, दोनों के सामने विनयपूर्वक ही रहना चाहिए । गायत्रप्राण की सत्ता उरः स्थल पर्य्यन्त है । वही ब्राह्मण का स्वरूप है । अतएव उसे इस मात्रा से श्राचमन करना चाहिए, जिससे कि वह जल उरःस्थल - पर्य्यन्त जा पहुँचे । तभी उसकी शुद्धि होती है । त्रैष्टुभप्राण की सत्ता कण्ठपन्त है । अतएव क्षत्रिय को कण्ठस्पर्शपर्य्यन्त श्राचमन करना चाहिए । तभी उसकी शुद्धि है । एवं जागत प्राण की सत्ता मस्तक के द्वारा मुखपर्य्यन्त है । अतएव वैश्य को अपना मुखमात्र आर्द्र करना चाहिए, एवं शूद्र को केवल ओष्ठमात्र से जलका स्पर्श करना चाहिए, जैसाकि भगवान् मनु कहते हैं— .

‘ हृद्गाभिः पूयते विप्रः, कण्ठगाभिस्तु भूमिपः ।

वैश्योऽद्भिः प्राशिताभिस्तु, शूद्रः स्पृष्टाभिरन्ततः ' ॥

— मनुः २ ० ६२. श्लो ० २२१

पृष्ठ 485

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प्रथमकाण्ड क्या कहैं । कितने हीं विद्वान् हमें कहते हैं कि, तुम्हे साम्प्रदायिक झगड़ों में न पड़कर अक्षर के सीधे अर्थ पर ही ध्यान रखना चाहिए । खैंचातानी से वास्तविक अर्थ लुप्त होजाता है । परन्तु हम सत्य के उपासक हैं । सत्य बात कहने में हमें यत् कञ्चित् भी संकोच नहीं है । हमारा सत्यकथन चाहे सनातनधर्मियों को बुरा लगे, अथवा तो आर्य्यसमाजियों को बुरा लगे, हमें इसकी चिन्ता नहीं है । स्वामी दयानन्द ने जोकि श्रार्य्यसामानिक जनता के ' ऋषि ' कहलाते हैं-- ' आचमन ' का फल ' कफशुद्धि ' बतलाया है । स्वामी जी महाराज अपने सुविख्यात सत्यार्थ प्रकाश नाम के महाग्रन्थ में अपने भक्त शिष्यों को उपदेश देते हैं किं— “ सन्ध्योपासन, जिसको ब्रह्मकर्म भी कहते हैं । ' आचमन ' उतने जलको हथेली में लेके उसके मूल और मध्यदेश में श्रेष्ठ लगा के करे कि वह जल कण्ठ के नीचे हृदय पर्य्यन्त पहुँचे, न उससे अधिक न न्यून । उससे कण्ठस्थ कफ और पित्त की निवृत्ति थोड़ी सी होती है । पश्चात् ' मार्जन ' अर्थात् मध्यमा और अनामिका अंगुली के प्रभाग से नेत्रादि अङ्गों पर जल छिड़के । उससे आलस्य * दूर होता है । जो आलस्य और जल प्राप्त न होतो न करै ' I असंख्य महर्षियों के द्वारा विज्ञान की निकषा ( कसौटी ) पर परीक्षित आचमनविज्ञान झूठा है । जिन भगवान् मनु की ' मनुर्वै यत् किंचिदवत्तद्भेषजं भेषजतायाः ' ( छान्दोग्यब्राह्मण ) इत्यादि श्रुति-वचन मुक्तकण्ठ से प्रामाणिकता स्वीकार करते हैं, जिस मनुस्मृति को स्वयं स्वामीजी महाराज भी प्रमाण मानते हैं, उस मनुस्मृति का ' कण्ठगाभिस्तु भूमिपः ' आदि कहना झूठा है । एवं स्वामीजी महाराज की पूर्व पंक्तियाँ सच्ची हैं | क्यों नहीं, जबकि उन्होंने पहिले से ही अपने भक्तों को ' प्रक्षिप्त ' शब्द की शिक्षा प्रदान कर दी है | आप यदि उनके सामने उनके कपोलकल्पित मत के विरुद्ध श्रुति स्मृति का वचन रक्खेंगे, तो वे उसी क्षण उसे प्रक्षिप्त बतला कर अपना परित्राणाभास कर लेंगे । इसप्रकार शास्त्रविज्ञान से अपरिचित अन्ध-विश्वासी विक्षिप्त जन प्रक्षिप्त का आश्रय लेकर आज भारतवर्ष में वेदशास्त्र के प्रति कल्पित अभिनयों का प्रदर्शन करते जारहे हैं । ऐसे ही महाशयों की कृपा से सनातनधर्म्म के गहन - गंभीर वैज्ञानिक सिद्धान्तों का उपहास करते रहना हीं वर्त्तमानकाल के नवयुवकों का नित्यकर्म बन गया है । फलत: दूसरों की विज्ञानराशि का आश्रय लेकर अपना स्वत्त्व खोया जारहा जिसको कि रोकने के लिए सत्यविज्ञान के प्रचार की परम आवश्यकता है । हम पुन: अपने पाठकों का ध्यान प्रकृत की ओर ले जाना चाहते हैं । हम बतला रहे थे कि, प्रातः-सर्वनस्थानीय गायत्र अग्नि का उरःस्थान से सम्बन्ध है, अतएव मनुष्य को चाहिए कि, वह प्रातः काल इसी मन्दस्वर से बोले | यदि वह उच्चघोष से बोलेगा, तो उसका वक्षस्थल क्षतविक्षत हो जायगा, एवं उसके मुख से रुधिर आने लगेगा | कारण इसका यही है कि, रात्रिपर्य्यन्त सोते रहने के कारण अग्नि मन्द रहता है, शिथिल रहता है । प्रातःकाल होते ही उसमें पूरा बल नहीं आता । ज्यों ज्यों दिन बढ़ता है, सौर अग्नि के प्रवेश से त्यों त्यों इसके शरीराग्नि की वृद्धि होती है । ऐसी अवस्था में प्रात: काल उच्चस्वर से बोलने में हानि होगी । देखिए सत्यार्थप्रकाश - तृतीय समुल्लास - सन्ध्योपदेश प्रकरण । २१ वें संस्करण के १४ वें पृष्ठ की २-३-३-४-५-६ पक्तियाँ, अजमेर वैदिक यन्त्रालय में मुद्रित । २२२

पृष्ठ 486

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शतपथब्राह्मण क्योंकि जितना त्रलं उच्चस्वर से बोलने में चाहिए, उतना बल अभी अग्नि में नहीं है । एवं मध्याह्न में मध्यस्वर कठस्थान में बोलना चाहिए | क्योंकि इस समय इसमें इतना बल आ जाता है । तथा सायङ्काल उच्चस्वर से बोलना चाहिए । प्रातः काल शार्दूल X पशु के स्वर के समान बोलना चाहिए । मध्याह्न में - चक्रवाकं ( चकंवा ) नाम के पक्षी के समान बोलना चाहिए । क्योंकि इसका स्वर कण्ठ से सम्बन्ध रखता है । एवं. सायङ्काल मयूर, हंसादि के समान बोलना चाहिए । क्योंकि इनका स्वर मस्तक से सम्बन्ध रखता है T । इससे सङ्गीत की भी शिक्षा मिलती है । प्रातः काल मन्दस्वर से गाना चाहिए । भैरवी, कालिङ्गडा, प्रभावी आदि का इसी स्वर से सम्बन्ध है । मध्याह्न मध्यस्वर से गाना चाहिए । एवं सायङ्काल पञ्चमस्वर से गाना चाहिए । सम्पूर्ण कथन प्रकृत में हमें केवल यही बतलाया है कि, वाक् का मूल अगिराग्नि ही है I । इसे ही सरस्वतीवाक् कहते हैं । इसी वाग्विज्ञान को लक्ष्य में रखकर शिक्षाशास्त्र कहता है—

आत्मा बुध्या समेत्यर्थानुमनो युङ्क्ते विवक्षया ।

मनः कायाग्निमाहन्ति स प्र ेरयति मारुतम् ॥ १ ॥

मारुतस्तूरसि चरन्मन्द्रं जनयति स्वरम् ।

प्रातःसवनयोगं तं छन्दो गायत्रमाश्रितम् ॥ २ ॥

कण्ठे माध्यन्दिनयुगं मध्यमं त्रैष्टुभानुगम् ।

तारं तार्त्तीयसवनं शीर्षण्यं जागतानुगम् ॥३ ॥

सोदीर्णो * मूर्त्यभिहितो वक्त्रमापद्यमारुतः । वर्णाञ्जनयते I 11811

प्रातःपठेन्नित्यमुरस्थितेन स्वरेण शार्दूलरुतोपमेन ।

मध्यंदिने कण्ठगतेन चैव चक्राह्नसंकूजित - सन्निभेन ॥ ५ ॥

तारं तु विद्यात् सवनं तृतीय शिरोगतं तच्च सदा प्रयोज्यम् ।

मयूर - हंसान्यभृतस्वराणां तुल्येन नादेन शिरः स्थितेन ॥६ ॥

÷ पाणिनीयाशिक्षा > ' शार्दूल द्विपिनौ व्याघ्रे ' ( अमर ० २।५।१ ) इस कोषप्रमाण के अनुसार हिंस्रक व्याघ्रजातीय पशुविशेष का नाम शार्दूल है । इसकी ध्वनि नादात्मिका ( गूँजती हुई ) होती है । क्योंकि इसकी वाणी उरःस्थल से सम्बन्ध रखने वाले वायु से सम्बन्ध रखती है । * अग्नि से प्रेरित वायु अग्नि के तारतम्य से उरः स्थल, कण्ठ, शिर, इन तीन स्थानों से टकराता है । इन तीनों में हीं यदि उरःस्थल से टकरा कर मुख में आता है, तो ' मन्दस्वर ' होता है । कण्ठस्थान से कराने से ' मध्यस्वर ' होता है । यदि बीच के दोनों स्थान छोड़ कर सीधा मस्तक से टकराकर मुख से निक-लता है, तो ' तारस्वर ' होता है । ÷ श्लोकार्थं पूर्वविवेचन से स्पष्ट है । २२३

पृष्ठ 487

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प्रथमकाण्ड अंगिराभाग ही शब्दप्रपञ्च का जनक है, यह पूर्वप्रकरण से भलीभाँति सिद्ध होजाता है । अग्नि हीं शब्दवाक है, इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, यदि आप दो घण्टे निरन्तर बोलते रहते हैं, तो आप अशक्त होजाते हैं । इस अशक्ति का कारण एकमात्र अग्नि की न्यूनता ही है । शरीर में जो बल है, वह अग्नि ही है जिसके शरीर में अग्नि की मात्रा जितनी अधिक होती है, वह उतना ही अधिक बलवान् होता है, एवं अग्नि की मात्रा जितनी ही कम होती हैं, वह उतना हीं अधिक निर्बल होता है | अधिक बोलने से निर्बलता अनुभूत होती है | अतएव मानना पड़ता है कि, अग्नि हीं शब्दरूप में परिणत होकर मुख से निकलता है । अतएव अधिक बोलने वाले का मुख श्राग्नेय संघर्ष से शुष्क होजाता है । यह तो हुई राप्रधाना सरस्त्रतीवाक् की कथा | अब चलिए भृगुप्रधाना आम्भृणीवाक् की ओर । इसी से सम्पूर्ण अर्थ उत्पन्न होते हैं । आायप्रधान आम्भृणी से ही सम्पूर्ण लोक बनते हैं । इसीसे भूत उत्पन्न होते हैं । पानी हीं पुरुष अर्थ की उत्पत्ति का कारण है । पानी हीं सब कुछ है, इसी अभिप्राय से चयनश्रुति कहती है— ' सर्वाणि हवेव भूतानि, सर्वे देवा ऐषोऽग्निश्चितः I । आपो वै सर्वे देवाः, भूतानि । ता हैता आप एव एषोऽग्निश्चितः ' । - शतपथ ० १० काण्ड ६ | ५ | १४ | सर्वाणि प्रथम अग्नि के लिए ‘ सर्वाणि देवाः ० ' इत्यादि कहकर अनन्तर ' आपो वै सर्वे देवा: ० ' इत्यादि कहते हुए ' ता हैता आप एव एषोऽग्निश्चित: ' पर उपसंहार किया गया है । कारण इसका यही है कि, आपः ऋत हैं. एवं अग्नि सत्य है । सत्य अग्नि सदा ऋत से आवृत रहता है । दोनों अविनाभूत हैं । अर्थप्रपञ्च में भी दोनों हैं, एवं शब्दप्रपञ्च में भी दोनों हैं । शब्दप्रपञ्च में भृगुगर्भित अङ्गिरा है, एवं अर्थप्रपञ्च में अङ्गि-रागर्भित भृगु है वाक् है । दोनों । पारमेष्ठिनी से ये ही दो वाक धाराएँ निकलतीं हैं । दोनों का प्रभव एक अविनाभूत हैं । अतएव शब्दप्रपञ्च और अर्थप्रपञ्च श्रविनाभूत हैं । इसी विज्ञान के आधार पर मीमांसादर्शन कहता है— ' औत्पत्तिकस्तु शब्दस्यार्थेन सम्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशो ऽव्यतिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् ' । - पूर्वमीमांसा १५ इसप्रकार शब्द और अर्थ की अभिन्नता सर्वात्मना सिद्ध होजाती है । शब्द और अर्थ, दोनों अभिन्न हैं । इसलिए दोनों के प्रतिपादक शास्त्रों की परिभाषाओं के परिज्ञान से परब्रह्म का ज्ञान गतार्थ है । प्रसङ्गागत दोनों की समानता का भी सूक्ष्मरूप से निदर्शन करादेना अनुचित न होगा | शब्दप्रपञ्च में— ‘ अकारो वै सर्वा वाक् । सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना वह्नी नाना रूपा भवति ' ( अकार ही सम्पूर्ण वाक्प्रपञ्च है । यह वाक् ही स्पर्श, और ऊष्मा से व्यक्त होती हुई नानारूप में परिणत होजाती हैं, ऐ ० श्रारण्यक २।३।७ ) -२२४

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शतपथब्राह्मण उक्त श्रुतिवचन के अनुसार जैसे एक ही अकार से वैदिकवर्णमातृका के २८८ वर्ण प्रादुर्भूत हो जाते हैं, उसीप्रकार अर्थप्रपञ्च में केवल एक ही ब्रह्मा से ( प्रतिष्ठारूप वेदघन तत्त्वविशेत्र से ) सम्पूर्ण संसार बना है । ससार का उपादान यही वेदमूर्त्ति ब्रह्मा है । ऋग्यजुः साम - भेद से एक ही वेद के तीन विभाग होजाते हैं । इन तीनों में ऋक्, और साम, दोनों छन्द हैं, एवं यजुः वय ( छन्द से छन्दित रहने वाला वास्तविक का नाम पदार्थ ) है । इस यजुः यत् और जू, दो भाग हैं | स्थितितत्त्व का नाम जू है, गतितत्त्व ‘ यत् ’ है । ये ही दोनों आकाश वायु हैं । आकाश स्थिर है, वायु चल है । दोनों की समष्टि ‘ यज्जू ' है । परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि, जिसे साधारण मनुष्य वायु कहते हैं, वह वायु यजुः का वायु नहीं है । वह वायु तो मूलभूत मौलिक वायु है । उसी से आगे की भूतभौतिक सृष्टि होने वाली है । इसी यज्जू को परोक्षप्रियदेवता ‘ यजू’कहते हैं । यही यजुर्वेद वास्तविक ब्रह्म, किंवा ब्रह्मा है । इसी ब्रह्मा से सम्पूर्णं सृष्टियाँ होतीं हैं । इसका जो यत् ( गति ) भाग है, वह आगति - गति - भेद से दो प्रकार का हो जाता है । केन्द्र से परिधि की ओर जो गति होती है, उसीका नाम गति है । एवं प्रधि से केन्द्र की ओर जो गति है, उसीका नाम आगति है । इसप्रकार एक ही ब्रह्मा के — स्थिति, आगति, गति, तीन भेद होजाते हैं । स्थिति का नाम ब्रह्मा है, आगति का नाम विष्णु है, गति का नाम इन्द्र है । वेद का ' इन्द्र ' ही पुराण का ' महेश ' है । मूलभूत होने से स्थितितत्त्व ( ब्रह्मतत्त्व ) संसार का ' प्रभव ' कहलाता है । बाहिर से वस्तु लाकर क्स्तु की स्वरूपसत्ता रखने के कारण आगतिरूप विष्णुतत्त्व ' पालक ' कहलाता है । एवं केन्द्र से बाहिर ` की ओर वस्तुगत पदार्थों को अपनी विक्षेपण शक्ति के द्वारा बाहिर फैंकने वाला गतिरूप इन्द्रतत्त्व ( पुराण-परिभाषानुसार रुद्रतत्त्व ) ' संहारकर्त्ता ' कहा जाता है । इन तीनों में जबतक गति, और गति स्वतन्त्र रहती है, तत्रतक तो दोनों इन्द्र और विष्णु ही कहलाते हैं । परन्तु जब दोनों का उस स्थितितत्त्व के साथ समन्वय होजाता है, तो ये ही दोनों अग्नि, और सोम कहलाने लगते हैं । गति विकासरूप है । इसका जत्र उस स्थिति के साथ सम्बन्ध हो जाता है, तो वही स्थिति अग्नि कहलाने लगती है । एवं संकोचरूप आगति से मिलकर वही ब्रह्मा सोम कहलाने लगता है । इसप्रकार केवल अवस्था विशेष के कारण एक ही ब्रह्मतत्त्व-ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, ये पाँच स्वरूप धारण कर लेता है । इन पाँचों में तीन एक श्रेणि में हैं, इन्हीं की समष्टि का नाम ' हृदय ' है, जैसाकि पूर्व में विस्तार मे बतलाया माचुका है । एवं अन्त के दोनों एक श्रेणि में हैं । इन्हीं दोनों के ( अग्नीषोम के ) समन्वय के तारतम्य से विविध - भावापन्न संसार उत्पन्न होता है । यही स्थिति शब्दब्रह्म में है । यहाँ भी एक ही प्रकार तालुस्थान से बुलकर ' इ ' के रूप में परिणत हो जाता है । उसी प्रकार को जब आप कण्ठस्थान से न बोलकर तालुस्थान से बोलेंगे, तो वह ' अ ' न बुल-कर ‘ इ ’ बुल जायगा । उसीको जब श्रोष्ठस्थान से बोला जाता है, तो वह ' उ ' के स्वरूप में परिणत होजाता * –अयं वावं यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्न वेदं सर्वं जनयति, एतं यन्तमिदमनु-प्रजायते । तस्माद् वायुरेव यजुः । श्रयमेवाकाशो जूः, यदिदमन्तरितम् । एतं ह्याकाश-मनुजवते । तदेतद्यजुर्वायुश्चान्तरिक्षंच, यच्च जूश्च । तस्मात् – यजुः । २२५ - शतपथ १० | ३ | ५ | १,२, ।

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प्रथमकाण्ड है । मूर्द्धास्थान से बोले जाने पर वही ' ऋ ' म जाता है । दन्तस्थान से बुलकर ' लू ' बन जाता है । इस— प्रकार अवस्थाविशेष के कारण एक ही अकार - अ, इ, उ, ऋ, लृ, इन पाँच स्वरूपों में परिणत होजाता है । इन पाँचों अक्षरों में — अ, इ, उ, एक श्रेणि में हैं, एवं ऋ, लृ, एक श्रेणि में हैं | ये ही पाँचों अक्षर शब्दसृष्टि के —– ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम हैं । तीनों शुद्ध हैं, एवं दोनों वैकारिक है । इसी विद्या को बतलाने के लिए ऋ - ल में अभक्ति के बीच में र्, लृ, समाविष्ट हैं । उधर सम्पूर्ण शब्दसृष्टि - अ, इ, उ, ऋ, लृ, इन पाँच अक्षरों से होती है, इधर सम्पूर्ण अर्थसृष्टि - ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, इन पाँच से होती है । स्पर्श संकोच से सम्बन्ध रखता है, ऊष्मा विकास से सम्बन्ध रखती है । स्पर्श साक्षात् सोम है, उष्मा अग्नि है । इन्हीं दोनों के तारतम्य से ( अग्नीषोम के तारतम्य से ) सम्पूर्ण वर्णसृष्टि होती है, एवं इन्हीं दोनों के तारतम्य से अर्थसृष्टि होती है । शब्दसृष्टि में स्फोट, स्वर, वर्ण, ये तीन तत्त्व हैं, इधर अर्थसृष्टि में भी अव्यय, अक्षर, क्षर, ये तीन तत्त्व हैं । स्फोट अर्थसृष्टि का अव्यय है, स्वर अक्षर है । अतएव ' स्वरोऽक्षरं सहाद्यैव्यं जनैः पूर्वैश्वावसितेः ' ( का ० प्रा ० ) यह कहा जाता है । एवं वर्ण क्षर है । उधर अव्यय - स्थानीय स्फोटधरातल .पर ( श्रालम्बनतत्त्व पर ) प्रतिष्ठित होकर अक्षरस्थानीय स्वर क्षारस्थानीय वर्ण से सम्पूर्ण शब्दसृष्टि का निर्माण किया करता है, तो इधर अव्ययालम्बन पर प्रतिष्ठित होकर अक्षर क्षर से सम्पूर्ण अर्थसृष्टि का निर्माण किया करता है । इस विषय को अप्राकृत होने के कारण हम अधिक नहीं बढ़ाना चाहते । सम्पूर्ण प्रपंच से प्रकृत में हमें केवल यही बतलाना है कि, शब्द और अर्थ ( अर्थब्रह्म को ही परब्रह्म भी कहा जाता है ) दोनों अभिन्न हैं । एवं दो ही जानने की वस्तु हैं । इन दोनों के अतिरिक्त वास्तव में कोई तीसरी वस्तु नहीं है । दोनों अभिन्न हैं, अतएव दोनों के समान नियम हैं । दोनों में शब्दब्रह्म की अपेक्षा परब्रह्म को जानना कठिन है, इसीलिए शब्द ब्रह्म के द्वारा परब्रह्मज्ञान की सुलभता बतलाते हुए वेद-महर्षि कहते हैं— द्वं वा ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म परं च यत् । शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति । - उपनिषत् इसी आधार पर वैय्याकरणधुरीण भगवान् भर्तृहरि—

इयं सा मोक्षमाणानामजिह्मा राजपद्धतिः ।

अत्रातीत विपर्यासः केवलामनुपश्यति ॥

यह कहकर शब्दप्रपञ्च को मुक्ति का द्वार बतलाते हैं । इसी आधार पर ' एकः शब्दः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके कामधुग् भवति ' ( म ० भा ० १ १ १ प्रदीप ) इत्यादि रूप से शब्दब्रह्म को स्वर्गप्राप्ति का साधनबतलाते हैं । वास्तव में बात यथार्थ | प्राप्तव्य स्थान के दोनों मार्ग हैं । दोनों भिन्न होते हुए भी अभिनाभूत हैं । इसीलिए तो शब्दवाक् के प्रयोग से ( मन्त्रप्रयोग से ) अर्थरूप सर्पादि का विष शान्त हो जाता है । इसी आधार पर तो ' जपात्त्सिद्धिः ' यह कहा जाता है । क्योंकि दोनों अविनाभूत हैं । दोनों २२६

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शतपथब्राह्मण वाक् हैं । इस शब्दवाक्, और अर्थवाक् के भेद से छन्द भी शब्द, और अर्थ के भेद से दो प्रकार का हो जाता । शब्दच्छन्द का शब्दप्रपञ्च से सम्बन्ध है, अर्थच्छन्द का अर्थप्रपञ्च से सम्बन्ध है । ' अदर ' शब्द का दोनों के साथ सम्बन्ध है । अक्षर से केवल छन्द से अवच्छिन्न प्राण के अवयव अभिप्रेत हैं । ' पृथिवी का पदार्थ अग्नि है । उसका छन्द गायत्री है । उसके आठ अक्षर हैं । इसका तात्पर्य्यं यही है कि, वह छन्द अष्टावयव है । इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि, पृथिवी का अग्नि * अष्टावयव है | यहाँ पर पदार्थ के आठ अवयव ही आठ अक्षर हैं । एवं जब हम अपने मुख से गायत्रीछन्द बोलते हैं, तो उसमें भी आठ अवयव होते हैं । इन आठ अवयवों का शब्दाक्षर से सम्बन्ध हैं । दोनों के अवयवों के लिए ' अक्षर ' शब्द प्रयुक्त होता है, यही कहना है । हम आगे के प्रकरणों में दोनों के लिए ' अक्षर ' शब्द का प्रयोग करेंगे । उससे पाठकों को भ्रम न हो नाय, इसलिए अक्षर शब्द का सांकेतिक अर्थ बतला दिया गया है । विज्ञान न जानने के कारण श्राजदिन छन्द का केवल शब्दप्रपञ्च से ही सम्बन्ध समझा जाता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है । ÷ छन्द का दोनों प्रपंचों से ही सम्बन्ध है, जैसाकि पूर्व के निरूपण से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है. । इसीलिए महाभारत में लोकगायत्री के २४ अक्षर गिनाते हुए २४ पदार्थों की गणना हुई है, जैसाकि आगे के श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है— सिंहा व्याघ्रा वराहाश्व महिषा वारणास्तथा ॥ ऋक्षाश्च वानराचैवं सप्तारण्याः स्मृता नृप! ॥१ ॥

गौरजाविमनुष्याच अश्वाश्वतरगर्दभाः ।

एते ग्राम्याः समाख्याताः पशवः सप्त साधुभिः ॥२ ॥

एते 1 वै पशवो राजन् ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश ।

वेदोक्ताः पृथिवीपाल! येषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥३ ॥

उद्भिजाः स्थावराः प्रोक्तास्तेषां पञ्चैव जातयः । वृक्षगुल्मलतावल्ल्यस्त्वक्सारास्तृणजातयः 11811 तेषां विंशतिरेकोना महाभूतेषु पञ्चसु 1 चतुर्विंशतिरुद्दिष्टा गायत्री लोकसम्मता ॥ ५ ॥

* —१ आपः, २ फेन, ३ मृत्, ४ सिकता, ५ शर्करा ६ अश्मा, ७ अय, ८ हिरण्य, अग्नि के ये ही आठ अवयव हैं । एक ही अग्नि इन आठ स्वरूपों में परिणत रहता है । इस विषय का विस्तृत विवेचन ‘ चयनविद्या ' में ( श ० ६ । ३ । ६ ) देखना चाहिए । ÷ छन्द क्या पदार्थ है?, छन्द के अवान्तर भेद कितने हैं?, आदि विषयों का श्रीगुरुप्रणीत छन्दो-विषयक ‘ छन्दःसमीक्षा ' नाम के सुविस्तृत ग्रन्थ में देखना चाहिए । इस महाग्रन्थ का ' छन्दशास्त्र की भूमिका ' नाम का उपपत्ति प्रकरण ' पिङ्गलसूत्र ' के साथ छप चुका है । यह ग्रन्थ निर्णयसागरप्र ेस बम्बई से प्राप्त हो सकता है । २२७