Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 491–500
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 491–500
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प्रथमकाण्ड '
य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम् ।
तत्त्वेन भारतश्रेष्ठ! स लोके न प्रणश्यति ॥ ६ ॥
—महाभारते इसप्रकार इन लोकों से - ‘ पशु स्तांश्चक्रे वाय - यानारण्या ग्राम्याश्च ये ' ( यजुः सं ० ३१।६ ) इस श्रुति में कहे हुए १४ संसज्ञ ( चेतन ) प्राणियों को, वृक्ष, लता, गुल्म, वल्ली, त्वक्सार, इन पाँच अन्तःसंज्ञ ( श्रद्ध'चेतन ) प्राणियों को, एवं पृथिवी, जल, तेल, वायु, आकाश, इन पाँच असंज्ञ ( अचेतन ) पदार्थो को मिलाकर २४ की संख्या पूरी कर लोकगायत्री का स्वरूप बतलाया गया है । साबों लोक इन २४ अक्षरों से व्याप्त हैं । इस उदाहरण से अक्षर का दोनों के साथ सम्बन्ध सिद्ध होजाता है । अक्षर से सम्बन्ध रखने वाली शब्दवाक्, और अर्थवाक्, दोनों के परिमाणविशेष का ही नाम छन्द है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जाचुका है । शब्द किसी न किसी विषय से सम्बन्ध रखता है । पद की किसी न किसी पदार्थतावच्छेदकावच्छिन्न में शक्ति रहती है । निरुक्त के - ' अविद्यमाने सामान्येऽप्यक्षरवर्णसाम-न्यान्नित्रयात्, न त्त्वेव न नित्रयात् ' ( यदि शब्द के अर्थ को प्रकट करने वाला सामान्यभाव उस शब्द में, वाक्य में नहीं है, तो उस वाक्य, किंवा शब्द के अक्षर, एवं वर्णगत सामान्यभाव को लेकर उसका निर्वचन कर डालना चाहिए । इस शब्द में सामान्य अर्थ प्रकट नहीं होता, अतएव इसका निर्वचन नहीं होसकता- इस नहीं के रूप में शब्द का निर्वचन नहीं करना चाहिए - यास्कनि ० २।१४ ) इस सिद्धान्त के अनुसार ऐसा कोई भी शब्द नहीं है, जिसका कोई अथ नहो । शब्द किसी वस्तु का वाचक है । उस शब्दार्थ में शब्द सरस्वतीवाक् है, एवं अर्थ आम्भृणीवाक् है । दोनों अभिनाभूत हैं । ०
न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते ॥
वाक्यपदी यह इसी आधार पर कहा जाता है । भगवान् भर्तृहरि कहते हैं कि, ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है, जो शब्द के बिना उत्पन्न होता हो । ज्ञानप्रपञ्च शब्द में श्रोतप्रोत होकर ही प्रतिभासित होता है । बात यथार्थ है । गो — शब्द के सुनते ही तद्विषयक ज्ञान, दूसरे शब्दों में गौ की मूर्ति सामने खड़ी होजाती है । एवमेव गौ को देखते ही - ' गौ ' शब्द प्रज्ञान मन पर खचित होजाता है । इन्हीं सब कारणों से हम दोनों को अभिन्न कहते हैं । इसी शब्दार्थमय आधिदैविक जगत् से प्राधिभौतिक एवं आध्यात्मिक जगत् को उत्पत्ति होती है । अतएव दोनों में भी शब्द, और अर्थ, दोनों की सत्ता सिद्ध होजाती है । इसीलिए आधिदैविक जगत् के साथ अध्यात्म का सम्बन्ध करने के लिए अर्थप्रपञ्च ( आधिभौतिक पदार्थ ), एवं शब्दप्रपञ्च ( मन्त्रवाक् ), दोनों का आश्रय लेना पड़ता है । हमने बतला दिया है कि, छन्दोभेद के कारण ३३ सों देवताओं का स्वरूप एक दूसरे से सर्वथा पृथक् पृथक् है । उदाहरणार्थ - मूलभूत पार्थिव अग्निदेवता को ही लीजिए | इस अग्नि के छन्द का नाम गायत्री है । गायत्रीछन्द आठ अक्षर का है । अर्थप्रपञ्च में आठ अक्षर आठ वस्तु हैं । शब्दप्रपञ्च में आठ अक्षर हैं । गायत्रीछन्द की अष्टावयवता अनेक प्रकार से है । ४ श्रात्मा, २ पक्ष, २२८
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शतपथब्राह्मण १ पुच्छ, १ शिर, ये आठों गायत्र अग्नि के आठ अवयव हैं । आत्मा से यहाँ मूलद्वार से प्रारम्भ कर कण्ठपर्य्यन्त का भाग अभिप्र ेत है । मस्तक, हाथ, पैर, आदि इतर शरीरावयवों की अपेक्षा इस भाग में चौगुना अग्नि रहता है, अतएव इसे ' आत्मा ' कहा जाता है । चायाँ हाथ, एवं बायाँ पैर एक पक्ष है, दहिना हाथ, एवं दहिना पैर एक पक्ष है । एवं मूलग्रन्थि के समीप त्रिकास्थि में रहने वाला प्राण पुच्छ । यही सर्वाङ्ग - शरीर की प्रतिष्ठा है । इस पुच्छ से ' डारविन ' के सिद्धान्त की पुष्टि नहीं समझनी चाहिए । डारविनने वानरों को मनुष्य— जातिका पूर्वज बतलाते हुए इनके प्रारम्भकाल में इन्हें पूँछवाला सिद्ध किया है । परन्तु यह मान्यता हमारे वैदिक विज्ञान के सर्वथा विरुद्ध, अतएव त्याज्य है । पशुत्रों के जैसे पूँछ होती है, एवमेव पुरुषों के भी पूँछ होती हैं । दोनों में सृष्टि के आरम्भकाल से ही पूँछ है । परन्तु दोनों के स्वरूप में बड़ा अन्तर है । पुरुष में भी पूँछ है । परन्तु बहुत छोटी, दूसरे शब्दों में नहीं होने के समान | जिसे हमने ' त्रिकास्थि ' कहा है, वह पूँछ का भाग है | परमेश्वरने जितनी प्राणमात्रा पशु को दी है, उतनी हीं मनुष्य को दी है । केवल संनिवेशक्रम के भेद से स्वरूप में अन्तर है । जितना पुच्छप्राण पशु में है, उतना हीं पुच्छप्रारण एक मनुष्य में है । अन्तर केवल यही है कि पुरुष के पुच्छभाग का अधिक भाग मस्तिष्क के निर्माण में उपयुक्त होजाता है । अर्थात् अधिक भाग ज्ञानमात्रा के निर्माण में काम आ जाता है । पशु में मनुष्य की अपेक्षा ज्ञानमात्रा बहुत ही कम रहती है । क्योंकि यहाँ सम्पूर्ण भाग पुच्छ निर्माण में काम आजाता है । यह पुच्छ-व्यवस्था दोनों में नियत है । जितनी पूँछ पुरुष में आज है, दो लाख वर्ष पहिले भी इतनी ही थी । यज्ञविज्ञान को देखने से पता चलता है कि, पुरुष का स्वरूप जैसा श्राज़ है, सृष्टि के प्रारम्भ में भी ऐसा ही था, जैसाकि आगे आनेवाले यज्ञपुरुषादि ब्राह्मणों में स्पष्ट होजायगा । ऐसी अवस्था में हमारी दृष्टि में डारविन के -सिद्धान्त का कोई मूल्य नहीं है । इस विषय पर प्रकृत में अधिक प्रकाश नहीं डाला जासकता । यहाँ केवल यही समझलेना पर्य्याप्त होगा कि, त्रिकास्थिगत प्राण का नाम हीं पुच्छ प्रतिष्ठा है । उक्त सातों भागों का जो श्री ( रस ) भाग हैं, उससे आठवाँ शिरों भाग बनता है । सात भाग चित्याग्निमय है, आठवां शिरो भाग चितेनिधेय ( अमृत ) अग्निमय है । इसप्रकार अध्यात्म में उस गायत्रीछन्द से छन्दित गायत्र अग्नि के आठ विभाग होजाते हैं । अपि च- ब्रह्मरन्ध्र से पाद पर्य्यन्त दूसरे क्रमसे अग्नि के आठ अवयव विभक्त हैं । एक एक अवयव एक एक प्राण है । ' प्रादेशमित: प्राण: ' इस श्रुति के अनुसार प्रत्येक प्राण का व्याप्तिमण्डल प्रादेशमात्र ( १० || अंगुल ) है | ' स भूमिं सर्वतस्पृत्त्वा-त्यतिष्ठद्दशांगुलम् ' ( वह उस स्थान का चारों ओर से वेष्टन कर १० || अंगुल में बैठ गया ) इस श्रुति के द्वारा भी प्राण की प्रादेशमितता ही सिद्ध होती है । हमारे शरीर में ऐसे आठ प्राण हैं । अपने परिमाण से ( नाप से ) प्रत्येक मनुष्य आठ आठ प्रदेश का है । यदि कम, अथवा अधिक हो, तो उसे वैकारिक समझना चाहिए | ब्रह्मरन्ध से कण्ठपर्य्यन्त एक प्रादेश हैं । कण्ट से हृदय पर्य्यन्त दूसरा प्रादेश है । नाभि से मूलद्वार पर्य्यन्त चौथा प्रादेश है । मूलद्वार से गोड़े की पाली - पर्य्यन्त ५-६ दो प्रादेश हैं । यहाँ से पादाङ्ग ु लिपर्य्यन्त ७-८, ये दो प्रादेश हैं | प्रत्येक १० ॥ अंगुल का है । अत: कुल ८४ अंगुल होजाते हैं । लम्बा हो, अथवा नाटा, अपनी नापसे प्रत्येक मनुष्य ८४ अंगुल का है । क्योंकि गायत्री छन्द से इस का निर्माण है । गायत्री के आठ अक्षर होते हैं । एक एक अक्षर एक एक प्रारण है । प्रत्येक प्राण प्रादेशमित है । यही गायत्री के आठ अवयवों २२६
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प्रथमकाण्ड का दूसरा विभाग है । एवं श्रापः फेनादि ८ व्याहृतियों से सम्बन्ध रखने वाले विभाग का पूर्व में निरूपण किया ही जाचुका है । प्रकृति में भी गायत्र अग्नि प्राणरूप से व्याप्त रहता है । उसी का नाम देवता है । इस प्राणरूप, अतएव ' देवता ' नाम से प्रसिद्ध गायत्र अग्नि को अध्यात्म के साथ युक्त करने का एकमात्र उपाय है आठ ही आधिभौतिक पदार्थों का आश्रय लेकर अष्टाक्षर गायत्रीमन्त्र का प्रयोग करना । यहाँ उभयथा आठ का प्रयोग होते ही अपने आप छन्द की मूर्ति बन जाती है । आपको यह सुन कर आश्चर्य्य होगा कि, हम जो अक्षर मुख से बोलते हैं, शन्याकाश में तत्काल उसका एक चित्र बन जाता है | पुनः पुनः उस की पुनरावृत्ति की जाती है, तो चयन ( चिनाव, किंवा चेजा नाम से प्रसिद्ध व्यापार को ही याज्ञिक परिभाषा में चयन कहते हैं ) के कारण वह अक्षरमूर्ति स्थूलरूप में परिणत होकर सामने खड़ी होजाती है । ' स तु दीर्घकालादर नैरन्तर्यसतकारासेवितो दृढ़भूमि: ( पा ० यो ० दर्शन ) के अनुसार दृढ-भूमि में चिरकालादि का अभ्यास ही प्रधान कारण है । श्रार्षजगत् इसी विज्ञान के आधार पर जप के द्वारा देवता का प्रत्यक्ष होना मानता है । उसके छन्द के अनुसार उदात्त, अनुदात्तादि स्वरयुक्त मन्त्रवाक का प्रयोग किया जाता है, एवं उस देवता के स्वरूप के अनुकूल उसकी पूजा के पदार्थ लिए जाते हैं । इस-प्रकार यथोक्त विधि के अनुसार नियमपूर्वक श्राधिभौतिक एवं आध्यात्मिक वाक्प्रपञ्च पर निरन्तर व्यापार करने से उस देवता का साक्षात्कार हो जाता है । संख्या की समानता के कारण यह छन्द उस ' देवच्छन्द ' को पकड़ लेता है । उसी क्षण छन्द से छन्दित देवता पकड़ में आजाता है । उस देवता का, एवं उसके छन्द का जैसा स्वरूप है, उससे यदि प्रमादवश साधक के छन्द में गड़बड़ हो जाती है, तो अनुरूप सन्बन्ध न होने से जैसे बिजली के दो तार परस्पर संयुक्त होकर विस्फोटन कर डालते हैं, एवमेव वही देवता अध्यात्म का घातक बन जाता है | इन्द्र को मारने के लिए यज्ञ करता हुआ वृत्रासुर ' इन्द्र शत्रुर्वद्ध स्व ' बोलते हुए इसी स्वरदोष से इन्द्र के द्वारा अपना सर्वनाश करा बैठा था । विरुद्ध होते ही छन्द का स्वरूप बिगड़ जाता है । मात्रा, स्वर, वर्ण, आदि किसी में यदि यत् किञ्चित् भी त्रुटि हो जाती है, तो सर्वनाश हो जाता है । इसी का स्मरण कराते हुए भाष्यकार कहते हैं—
दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वात्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोपराधात् ॥
- महाभाष्य १।१।१ इति निदर्शनमात्र है । सभी देवताओं के विषय में यह साधारण नियम समझना चाहिए । यदि आप इन्द्र को पकड़ना चाहेंगे, तो आपको ११ अक्षर वाले त्रिष्टुप्छन्दका प्रयोग करना पड़ेगा । क्योंकि आान्त— रिक्ष्य मरुत्त्वान् इन्द्र त्रिष्टुप्छन्द से ही छन्दित रहते हैं । एवं जैसे अष्टाव्य. अग्निदेवता के लिए ' अष्टाक-पाल पुरोडाश ' होता है, एवमेव यहाँ इस एकादशावयव इन्द्र के लिए ' एकादशकपाल पुरोडाश ' का निर्वाप करना पड़ेगा । इसप्रकार शब्दच्छद ( त्रिष्टुपकुन्द ), और अर्थच्छन्द ( ११ कपाल ) दोनों से वह -प्राकृतिक छन्द पकड़ में आजायगा । एवं उस छन्द के आश्रय से तदवच्छिन्न देवता का आत्मा के साथ सम्बन्ध हो जायगा । यों तो अनेक छन्द हैं, एवं अनेक देवता हैं, परन्तु स्थूलरूप से चार छन्दों में ही २३०
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शतपथब्राह्मण सम्पूर्ण छन्दों का अन्तर्भाव मान लिया जाता है । ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' ( आप जो कुछ देख रहे हैं, सत्र चार है - अर्थात् प्रत्येक में चार चार हैं - को ० ० २ ।१ ) इस अनुगमश्रति के अनुसार ' पृथित्री, अन्तरिक्ष, द्यौं, आपः भेद से चार लोक हैं । इन चारों लोकों के छन्द का स्वरूप बतलावें, इसके पहिले ' निगम, और ' अनुगम ' किसे कहते हैं?, यह जान लेना भी आवश्यक होगा । जिन वेदवचनों के आधार पर ब्राह्मणग्रन्थ चलते हैं, उन वेदवचनों को ' निगम ' और ' अनुगम ' दो भागों में विभक्त मान रक्खा है । नियत विषय का प्रतिपादन करने वाला वेदवचन: ' निगम ' कह-लाता है, एवं अनेक स्थलों में प्रवृत्त होने वाला वेदवचन ' अनुगम ' कहलाता है । दो चार उदाहरणों से निगम अनुगम का भेद भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है । ' देवानां वै विधामनु मनुष्याः ' ( मनुष्य देवताओं के बतलाए हुए मार्ग का अनुकरण करने वाले हैं ( शत ० ६/४/२६ ) । ' त्रिवृद्वा अग्निः, अ ंगारा अर्चि - धूम ' इति ( अग्नि, - अंगार, अर्चि, धूम भेद से त्रिवृत् है ) । लो अंगार है | प्रकाशमण्डल अर्चि है । धूआँ प्रसिद्ध ही है- ( को ० उ ० २८५ । ) । इत्यादि वचन ' निगम ' नाम से व्यहृत होते हैं 1 | क्योंकि पूर्ववाक्य नियत विषय का ही प्रतिपादन करते हैं । एवं ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' ( सब षोडशकलायुक्त हैं - कौ ० प्रा ० ८ | १ ) ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' ( कौ ० ब्रा ० २1१ ) आदि श्रुतिवचन अनुगम नाम से व्यवहृत होते हैं । क्योंकि ऐसे वचन नियत विषय में हीं रूढ़ नहीं हैं । ऐसे वचनों को हम एक प्रकार से यौगिक कह सकते हैं । ' पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल क्षर, परात्पर, मेद से आत्मा घोडशकल है, यह आत्मा सर्वव्यापक है । इसलिए भी ' पोडकलं बा ' इत्यादि कहा जा सकता है । एवं ‘ अन्तर्य्यामी, सूत्रात्मा, वेदात्मा, चिदात्मा, यज्ञात्मा, विज्ञानात्मा, देवान्मा, आकृतिमहान्, प्रकृति-महान्, अहंकृतिमहान्, शरीराला, हंसात्मा, वैश्वानरात्मा, तैजसात्मा, प्राज्ञात्मा, इन १५ खण्ड आत्माओं से युक्त एक वही षोडशीपुरुष सर्वत्र व्याप्त है । प्रत्येक प्राणी में १६ आत्मा हैं । इस अभिप्राय से भी ‘ षोडकलं वा ० इत्यादि कहा जाता है । एवं प्रत्येक में १६, १६ हैं, इसी लिए भी ' षोडशकलं ' यह कहा जाता है । दूसरी है - चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' यह श्रुति । १ परात्पर २ अव्यय ३ अक्षर ४ तर, १ परा-त्पर, २ पुरुष ( अत्र्य, अक्षर, क्षर ) ३ प्रकृति, ( स्वयम्भू आदि ) ४ विकृति ( प्रजा आदि ), १ आत्मा, २ प्राण, ३ ब्रह्मौदन, ४ प्रवर्ग्य, इसप्रकार अनेक प्रकार से इस पूर्वश्रु तिवचन की भी अनुगमता सिद्ध हो जाती है | इसी अनुगम के अनुसार - लोक भी पृथिवी, २ अन्तरिक्ष, ३ द्यौ, ४ आप:, मेद से चार माने जाते हैं । पहिले के तीनों लोक अग्निमय हैं, एवं यह चौथा सोममय है । सोम की घनावस्था का नाम हीं आप: है | अतएव इसे ' आपोलोक ' भी कहा जाता है । त्रैलोक्य तो प्रसिद्ध है ही । किन्तु— ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः ( कौषीतकिब्राह्मण ) इस श्रुतिप्रमाण के अनुसार इस चौथे लोक की भी सत्ता स्वीकार करनी पड़ती है । सोम दिग्- भास्वर भेद से दो प्रकार का बतलाया जाचुका है । दिक्सोम के अभिप्राय से ही ( हे सोम! तुम इस विशाल अन्तरिक्ष में व्याप्त हो गए हो । यह कहा जाता है-( ऋक् १।६१।२२ ) । इसी अभिप्राय से दिक्सोममय इस चौथे लोक को ' दिग्लोक ' भी कहा जाता है । अतएव कहीं श्रुतियों में ' पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौराप: ' यह पाठ रहता है, एवं कहीं ' पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौ-र्दिशः ' यह पाठ रहता है । दोनों में कोई विरोध नहीं है । इन चारों लोकों के ' अग्नि, वायु, आदित्य, २३१
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-प्रथमकाण्ड चन्द्रमा, ये चार लोकाधिपति हैं । चन्द्रम । आपोलोक के अधिपति हैं, अतएव इनके लिए ' चन्द्रमा अ॒प्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि ' ( पक्षीरूप चन्द्रमा द्युलोक में पानी के गर्भ में दौड़ लगाया करता है, यजुः सं ० ३३।६० ) यह कहा जाता है । प्रकृत में कहना यही है कि, लोक कुल चार हैं | अतएव छन्द भी कुल चार ही हैं । पृथिवी के छन्द को ' माछन्द ' कहते हैं । अन्तरिक्ष के छन्द को ' प्रमाछन्द ' कहते हैं, द्यौ के छन्द को ' प्रतिमाछन्द ' कहते हैं, एवं दिग्लोक के छन्द को ' अस्रीविछन्द ' कहते हैं । ‘ अग्नीषोमात्मकं जगत् ’ के अनुसार अग्नि, और सोम, दो ही तो वस्तु हैं । अग्नि - घन, तरल, विरल, भेद से तीन हैं | तीनों ‘ अग्नि, वायु, सूर्य्य ' नाम से प्रसिद्ध हैं । चौथा सोम है । सचमुच इन चार के अतिरिक्त, दूसरे शब्दों में दो के अतिरिक्त कोई तीसरी वस्तु नहीं हैं । ऐसी अवस्था में छन्द भी चार ही हो सकते हैं । अन्य छन्दों का भी इन्हीं चारों में अन्तर्भाव है । इसी अभिप्राय से सूत्रग्रन्थ कहता है-१ - ' माछन्द: ' - तन् पृथिवी, अग्निर्देवता । २ - ‘ प्रमाछन्दः ’ – तदन्तरिक्षम्, वातो देवता । ३ - ‘ प्रतिमाछन्दः ’ – तद्द्यौः, सूय्यों देवता! ४– ' अस्त्री विछन्दः ' - तद्दिशः, सोमो देवता । - आप ० श्र ० सू ० १६।२८ | १ | मा, प्रमा, प्रतिमा, अस्रीवि, ये नाम किसी गुप्तरहस्य से सम्बन्ध रखते हैं, जिसका उद्घाटन किसी आगे के प्रकरण में किया नायगा । विषय आवश्यकता से अधिक लम्बा होगया है, अतएव इसे यहीं समाप्त कर अत्र हम अपने पाठकों को ग्रन्थ के अक्षरार्थ की ओर लिए चलते हैं । पूर्व के निरूपण से पाठकों को यह भलीभांति विदित होगया होगा कि, यदि आधिदैविक प्राणदेवता का अध्यात्म के साथ सम्बन्ध करना हो, तो उस देवता के स्वरूपानुकूल अर्थच्छन्द ( पदार्थ ), एवं शब्द-च्छन्द ( मन्त्र ) की सम्पत्ति प्राप्त करना आवश्यक होगा । इसी ' सम - सम्पत्ति ' से वह देवता पकड़ में आवेगा । आज यह यजमान यज्ञ करना चाहता है । श्राधिदैविक प्राण देवताओं को अध्यात्म के साथ मिलाना चाहता है | जिस यज्ञदेवता का यह यजमान अपने आत्मा के साथ सम्बन्ध करना चाहता है, वह यज्ञदेवता १० अक्षर के विराट् छन्द से छन्दित होने के कारण दशावयव है । अतः पूर्वप्रतिपादित विज्ञान के अनुसार दशावयत्र विराड्यज्ञ को आत्मसात् करने के लिए यहाँ १० आधिभौतिक पदार्थों का सन्निवेश परम आवश्यक होजाता है । यज्ञदेवता विराट् छन्द से छन्दित कैसे है? इस प्रश्न का एक समाधान कर हम इस प्रकरण को उपरत करते हैं । विराट्छन्द से छन्दित, अतएव दशावयव यज्ञदेवता का स्वरूप समझने के लिए पाठकों को आरम्भ में बतलाए हुए वेदमूर्त्ति ब्रह्मा के स्वरूप को ध्यान में रखना आवश्यक होगा । वहाँ पर षोडशीपुरुष का स्वरूप बतलाते हुए हमने कहा था कि, आनन्द - विज्ञान - मनः - प्राण - वागात्मक पञ्चकल अव्ययपुरुष की जो परा-प्रकृति है, उसे ही अक्षर कहते हैं । इस अक्षर की पाँच कलाओं में से जो पहिली कला है, उसे ' ब्रह्मा ' कहते २३२
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शतपथब्राह्मण हैं । इस अक्षररूप ब्रह्मा से संश्लिष्ट नो आत्मक्षर की ( जिसे कि अपरा प्रकृति कहते हैं ) पहिली कला है, उसे भी ' ब्रह्मा ' ही कहते हैं । अक्षर का ब्रह्मा अमृत है । अतएव वह अक्षर ( अविनाशी ) है । एवं आत्मत्तरभाग का ब्रह्मा मर्त्य है, अतएव वह ' क्षर ' ( विपरिणामी ) है । ' श्रद्ध ह वै प्रजापते-रात्मनो मर्त्यमासीदर्द्ध ममृतम् ' के अनुसार उस एक ही ' प्रकृतिब्रह्म ' के अमृत, और मर्त्य, दो भाग हैं | ये ही दोनों अक्षर, और क्षर हैं । दोनों अविनाभूत हैं । इस क्षरविशिष्ट अक्षरब्रह्मा से जो: विकार उत्पन्न होता है, उसी को ‘ प्राण ' कहते हैं । अक्षर, और आत्मक्षर - विशिष्ट ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र, अग्नि, सोम, इन पाँच कलाओं से क्रमशः प्रारण, आपः, वाक्, श्रन्नाद, अन्न, इन पाँच विकारक्षरों का जन्म होता है । इस वैकारिक जगत् के ये ही पाँच विकार मूलस्तम्भ हैं । इन पाँचों में भी शेष चारों का प्रतिष्ठारूप, एवं प्रथमज प्राण ही है । इसी प्राणमुख से सबसे पहिले वेदसृष्टि होती है । संसार में सब से पहिले संसार के मूलतत्त्व वेद का ही प्रादुर्भाव होता है । इस वेद से ' वेदशब्देभ्य एत्रादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ' इस मनुवचन के अनुसार आगे की सम्पूर्ण सृष्टियाँ होती हैं । वाक्, और शब्द, आजदिन दोनों पर्य्याय समझे जाते हैं । परन्तु विज्ञानदृष्टिं से दोनों सर्वथा विभिन्न पदार्थ हैं । वाक् व्यापक है । शान्त है, एक है । शब्द व्याप्य है, अशान्त है, नानाभावोपेत है । वाक् से शब्द उत्पन्न होता है । शब्द की उत्पत्ति का प्रधान कारण वाक् की लहर है । एक वाक् नाम का व्यापक तत्त्व सर्वत्र भरा हुआ है । ' चीमा विश्वा भुवनान्यपिता ' के अनुसार कोई भी स्थान उससे रिक्त नहीं हैं | यह वाक् अमृतमयी है 1 | इसमें जब श्राघात लगता है, तो वीचि उत्पन्न होती है । वही वीचि आते आते हमारी कर्ण-शष्कुली. ( कर्ण विवर ) पर धक्का मारती है । उसी क्षण ' संयोगविभागशब्देभ्यः शब्दोत्पत्तिः ' इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार शब्द प्रकट होजाता है । ' शपं ( आकोशं ) ददाति ' शब्द की यही व्युत्पत्ति है । शब्द धक्का देता है । वाक् शान्त है । उसमें यत् किञ्चित् भी आक्रोशभाव नहीं है । शब्द मरणधर्म्मा है, वाक् नित्या है । इस अमृतवाक को ' इन्द्र ' कहा जाता है, एवं मर्त्या शब्दमयी वाक् को ' इन्द्रपत्नी ' कहा बाता है | साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि, ' नामृतं मृत्युभिर्विना ' ( अमृत मृत्युओं के बिना कभी नहीं रह सकता ) इस वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार शब्द बिना वाक् के रह भी नहीं सकता । यही कारण है कि, जहाँ श्राप्तमहर्षि अमृतवाक् के लिए ' अथो वागेवेदं सर्वम् ', यह कहते हैं, वहाँ शब्दरूप इन्द्रपत्नी के लिए भी — वाचीमा विश्वा भुवनान्यपिता ' यह कहते हुए संकोच नहीं करते 1 | सृष्टि का कारण यद्यपि अमृतवाग्विशिष्टा मर्त्यावाक् ( शब्द ) ही है, तथापि संसार में प्रधानता मर्त्यभाग की ही है । अतएव भगवान् मनुने ‘ वेदषाग्भ्यः ' न कह कर ' वेदशब्देभ्यः ' यही कहा है । शब्दतन्मात्रा ही सृष्टि का मूल है । यह मर्त्यामृतभावापन्न वेद मौलिक तत्त्व है । इससे सबसे पहिले ' विराट् ' पुरुष का ही जन्म होता है । दूसरे शब्दों में आप वेद को ही विराट् समझिए । जिस वेद से विराट्पुरुष व्यक्त होता है, ब्रह्माग्निमय उस वेद के ऋक्, यजुः, साम, ये तीन भेद हैं । इन तीनों में ऋक्साम आयतन है, छन्द हैं । एवं यजु पुरुष है 1 ऋक् साम का इन्द्र से सम्बन्ध है, यजुः का विष्णु से सम्बन्ध है । तीनों की समष्टि का, दूसरे शब्दों में आगतिरूप विष्णु, एवं गतिरूप इन्द्र की समष्टि का नाम हीं ‘ ब्रह्मा ' है । इस ब्रह्ममय वेद के यजुर्भाग में जो यत् भाग है, वह वायु है, जू भाग आकाश है, यह पूर्व के प्रकरण में श्रनेक बार बतलाया जाचुका हैं । इस जूरूप आकाश में यद्रूप वायु के संचार से सबसे पहिले २३३
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प्रथमकाण्ड पानी ही उत्पन्न होता है । इस आपोमय मण्डल में ' अथर्वा ' नाम का चौथा वेद प्रकट होता है । इस अथर्वा के भृगु और अङ्गिरा, दो भाग हैं । दोनों की समष्टि का नाम हीं ' अथर्वा ' है । भृगु भी घनादि अवस्थाविशेष से आपः, वायु, सोम, तीन प्रकार का होजाता है, एवं अमिरा भी इन्हीं तीन अवस्थाओं के कारण अग्नि, यम, आदित्य, तीन रूप धारण कर लेता है । इसप्रकार आपोमय, अतएव ऋतरूप अथर्वा के ६.स्वरूप होजाते हैं । अतएव ६ औं को ' आपः ' कहा जाता है, जैसाकि श्रुति कहती है—
श्राप भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् ।
अन्तरैते त्रयोवेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥
गोप इस विषय का विषद विवेचन पूर्व में किया जाचुका है । अतएव हम यहाँ अधिक कुछ नहीं कहना चाहते । यहाँ केबल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि, उस यजुः से ' ग्राप: ' नाम का अथर्वा उत्पन्न होता है, एवं उसके ६ विवर्त्त हैं । ऋक्, ' साम, ३ यत्, 3 जू, आप:, ' वायु,. सोम, ७ अग्नि, यम, ९ आदित्य, ' १० इसप्रकार चार वेदों के १० अवयव हो जाते हैं । इन १० सों की समष्टि का नाम हीं विराट्-पुरुष है । इस विराट्पुरुष का जन्म त्रयीवेदस्वरूप पुरुष, और आप रूप स्त्री के सम्बन्ध से ही होता है । यजुर्वेद अग्निमयं होने से पुरुष है । एवं श्रपः नाम का अथर्ववेद सौम्य होने से स्त्री है । यह आप: ‘ षड्ब्रह्म ' है, यजुः ‘ द्विब्रह्म ' है । इस द्विब्रझ में इस षब्रह्म की श्राहुति होती है । परमेश्वर की लीला बड़ी विचित्र है । होता है कुछ ओर एवं वह लीलाधर दिखलाता है कुछ और । अग्नि पुरुष का स्वरूप है, परन्तु वह स्त्री के रुधिर में रहता है । सोम स्त्री का स्वरूप है, किन्तु वह पुरुष के शुक्र. में रहता है । प्रत्यक्ष में पुरुष स्त्री के साथ संयोग कर रहा है । परन्तु वस्तुतः प्राणदृष्ट्या अग्निप्राणमय पुरुष में सौम्य प्राणमयी स्त्री संयुक्त हो रही हैं । पुरुष स्त्री है, स्त्री पुरुष है । स्त्री का प्रातिश्विक सोम ( रेत ) भाग पुरुष की वस्तु कहलाती है, एवं ं पुरुष का प्रातिस्विक अग्नि ( रजो ) भाग स्त्री की वस्तु कहलाती है । यजुःरूप अग्नि आधार बनता है, आपोरूप सोम आधेय बनता है । स्थितिगत्यात्मक, अतएव ' चलाचल ' यजुः रूपा योनि में ' मातरिश्वा ' वायु द्वारा इसी तोरूप षडब्रह्म की आहुति होती है । इस आहुति से जो एक नवीन स्वरूप बनाता है, उसी का नाम दार्शनिक परिभाषा में ' महान ' है । एवं इसी को याज्ञिक परिभाषा में. ‘ विराट् ’ कहते हैं । वेदत्रयी, एवं अथर्वा की समष्टि ही महान् है । इन दोनों की पूर्व कथनानुसार १० कलाएँ होजातीं हैं । अतएव हम अवश्य ही इसे विराट कह सकते हैं । इसी विराट से आगे की सम्पूर्ण सृष्टियाँ होतीं हैं । अव्यक्त ब्रह्मा का व्यक्तीभाव यही ' महान् ' है । अव्यक्ततत्त्व की व्यक्तावस्था का नाम हीं महान् है । अतएव दोनों को समानधर्म्मा बतलाया जाता है । यजुरग्नि पुरुष है, अथर्वा सोम स्त्री है । दोनों के समन्वय से विराट् उत्पन्न होता है । अतएव राजर्षि मनु कहते हैं—
द्विधा कृत्वात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत् ।
न तस्यां स विराजमसृजत् प्रभुः ॥
२३४ - मनुः १।३२.
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शतपथब्राह्मण अग्नि में सोम की आहुति होने का नाम हीं यज्ञ है । ये यज्ञ अनेक प्रकार के हैं । परन्तु उन सत्र में आदिभूत यही विराड्यज्ञ है । सत्र से पहिले यहीं यज्ञ होता है 1 । अतएव ओर ओर तालात्रों के होते हुए भी जैसे प्रधानता के कारण भूपालताल को ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है, एवमेव सर्वयज्ञमूलभूत होने से इस / विराड्यज्ञ के लिए ही ' विराड् वै यज्ञः ' यह कहा है । इसी से आगे की सम्पूर्ण प्रजाएँ उत्पन्न होतीं हैं । > आज इस यजमान को अपना नवीन आत्मा उत्पन्न करना है । उत्पन्न करना विराट् का काम है । विराट् दशावयव है । श्रुतएय छन्दोविज्ञान के अनुसार इस यज्ञ में १० पात्रों का ही लेना आवश्यक है । यदि १० पात्र ले लिए जाते हैं, तो विराट्छन्द पकड़ में आजाता है । इससे प्रकृतिवत् प्रजोत्पत्ति का साधन उपस्थित हो जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य ' रग्वकर श्रुति ने कहा है— ' दशाक्षरा वै विराट् । विराड् वै यज्ञः । तद् विराजमेवैतद्यज्ञमभि सम्पादयति ' । ' ' विराड वै यज्ञः ' यह श्रुतिवचन ' अनुगम ' भावापन्न है, अतएव पूर्वपरिभाषा के अनुसार इसके अनेक अर्थ होते हैं | परन्तु विस्तारभय से उन सबका यहाँ निरूपण नहीं किया जासकता । केवल एक अर्थ ओर बतला कर इस प्रकरण को उपरत करते हैं । पूर्व के अर्थ में ' विराड् वै यज्ञः ' को हमने प्रातिस्विक नियत यज्ञपरक लगाया था । परन्तु अब हम इसे सर्वत्र समानरूप से सभी यज्ञों के साथ सम्बद्ध बतलाषेंगे । ' अग्नि में सोम की आहुति देने की जो एक प्रक्रिया है, उसे ही यज्ञ कहते हैं ' यज्ञ शब्द का यह सामान्य, एवं व्यापक अर्थ है | इस परिभाषा के अनुसार ऐसा कोई भी यज्ञ नहीं, जिसमें अग्नि न हो | ऐसी अवस्था में यज्ञमात्र का विराट्पना सिद्ध हो जाता है । कारण इसका यही है कि, अग्नि सम्पूर्ण त्रैलोक्य में १० अवयवों में परिणत होकर ही व्याप्त रहता है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, तीन ही लोक हैं । इन तीनों लोकों में अग्नि भरा हुआ है । इनमें पार्थिव अङ्गिराग्नि, एवं सौर दिव्य सावित्राग्नि, ये दोनों अग्नि तो सत्य हैं, एवं आन्तरिक्ष्य अग्नि ऋत है । पृथिवी का पिण्ड अग्निमय है । अतएव ‘ अग्निर्भूस्थानः ’ यह कहा जाता है । एवं सूर्य्यं श्रग्निमय है, इसमें तो प्रमाण बतलाने की आवश्यकता ही नहीं है । ये दो अग्नि तो स्थूल हैं । तीसरा है इन दोनों के बीच में रहने वाला श्रान्तरिक्ष्य अग्नि । यह अग्नि आठ जाति का है । इसप्रकार कुल १० अग्नि हो जाते हैं । ये ही तीनों दार्शनिक परिभाषा में अपान, व्यान, प्रारण, कहलाते हैं, विज्ञानपरिभाषा में आङ्गिरस, नाक्षत्रिक, सावित्र नाम से प्रसिद्ध हैं । एवं यज्ञपरिभाषा में गार्हपत्य, धिष्ण्य, आहवनीय, नामों से समन्वित है । गार्हपत्य एक है, धिष्ण्य आठ हैं, आहवनीय एक है । इसप्रकार लोकभेद से एक ही अग्नि दशकल हो जाता है । अतएव हम अग्नि को अवश्यमेव विराट् कह सकते हैं | बिना अग्नि के कोई यज्ञ नहीं । अतएव सभी यज्ञों के विषय में - ' विराड् वै यज्ञः ' यह कहा जाता है । जितने भी पार्थिव पदार्थ हैं, सत्र में अग्नि भरा हुआ है । ` अतएव सब ऊष्मा से युक्त रहते हैं | जिस पदार्थ का स्पर्श किया जाता है, वही तापयुक्त मिलता है । जिन पदार्थों का शीतस्पर्श है, वहाँ भी अग्नि विद्यमान है । केवल मात्रा का तारतम्य है । आपके हाथ की गर्मी की अपेक्षा उसमें गर्मी कम है, अतएव आप उसे ठण्ढा पाते हैं । शीसस्पर्श वाले पदार्थों को छोड़िए । केवल पानी और हिम ( बर्फ ) को ही लीजिए । इन दोनों से अतिरिक्त तो सम्भवतः ओर किसी में अधिक ठण्ढापन न होगा । इन दोनों के लिए ही हमारा विज्ञानशास्त्र कहता है कि, पानी की जो तरलता है, एवं पानी का जो घनीभाव है, दोनों हीं अग्नि २३५
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प्रथमकाण्ड से सम्बन्ध रखते हैं । अग्नि की नियतमात्रा पानी को पानी बनाये रखती है, अर्थात् उसे तरलभाव में परिणत रखती है, एवं अग्नि की ही एक नियतमात्रा उसे बर्फ बना डालती है | बद्दल पानी है । परन्तु इसी अग्नि की महिमा से आज वह घनभाव में परिणत हो रहा है । घनतासम्पादक श्रासुरप्राणविशेष के साथ संयुक्त होकर वही अग्नि घनता का कारण बन जाता है । इसी सुरप्राण को ' नमुचि ' कहते हैं । अपने घन-भाव के कारण पानी का मुञ्चन न करने के कारण हीं यह प्रारण नमुचि कहलाता है । इन्द्रप्राण इसका विरोधी है । इसके साथ मिलकर वही न घनता का शत्रु हो जाता है । इसी अग्निवज्र के द्वारा आन्तरिक्ष्य मरुत्त्वात् इन्द्र नमुचि असुर को मार डालता है । उसी समय पानी तरलभाव में परिणत होता हुआ भूतल पर गिर पड़ता है । कहना यही है कि, ' अपां संघांतो विलयनं च तेजः संयोगात् ' ( पानियों का संघात और विलियन दोनों अग्निसंयोग से होते हैं - वैशेषिक दर्शन ५२ ) के अनुसार शीतस्पर्श-प्रधान पानी, और बर्फ में भी अग्निसत्ता सिद्ध हो जाती है । अनुभव क्यों नहीं होता?, इसका उत्तर मात्रा का तारतम्य है | उक्त निदर्शन से, एवं सूत्रप्रमाण से यह भी सिद्ध हो जाता है कि, द्रवत्त्व पानी का ' सांसिद्धिक-धर्म्म ( स्वाभाविक धर्म्म ) ' नहीं है, अपितु नैमित्तिक ही है । ऐसी अवस्था में जो महानुभाव द्रवत्त्व को पानी का स्वाभाविक धर्म्म मानते है, वे'- अग्निर्देवेभ्य उदक्रामत् सोऽपः प्राविशत् ' ( अग्नि देवताओं से-सौरमण्डल से - पृथक् होकर पानी में प्रविष्ट होगया - ) इस श्रौत प्रमाण के अनुसार, एवं सूत्रग्रन्थ के अनुसार सर्वथा प्रौढिवादग्रस्त ही हैं । हमें कहना यही है कि, गम्मीं सभी पदार्थों में हैं । यह गर्मी त्रैलोक्याग्निमय वैश्वानर का धर्म है । अग्नि अन्नाद है | बिना अन्न के इसकी स्थिति ही नहीं होसकती । अतएव सभी को अन्नाहुति से युक्त मानना पड़ता है । इसी प्रक्रिया का नाम यज्ञ है । अतएव हम सभी को यज्ञमय होने से— ' विराड्यज्ञ ' कह सकते हैं । क्योंकि अग्नि १० कल होने से विराट् है । इसी पूर्वोक्त विराड्यज्ञसम्पत्ति प्राप्त करने के लिए इस वैध यज्ञ में भी १० पात्रों का समावेश करना उचित है । यह विराट दशिनी, धिंशिनि, त्रिंशिनी, चत्वारिंशिनी, भेद से चार प्रकार की है । वास्तव मे विराट् तो ' दशिनी ' ही है । १० अक्षर के छन्द का नाम ही विराट् है | परन्तु केवल दर्शिनी - विराट् को ' एकपदा विराट् ' कहते हैं । उसमें एक विरःट् और मिलादी जाती है, तो वही विंशिनीविराट् कहलाने लगती है । इसी को ' द्विपदाविराट् ' कहते हैं । यही नियम त्रिंशिनी, चत्वारिंशिनी, नामकी त्रिपदा - चतुष्पदा विराट् में समझना चाहिए | चतुष्पदा से अधिक सख्या विराट् की नहीं होती, अतएव इसे ' परमाविराट् कहते हैं । प्रसंगागत इस परमाविराट् का स्वरूप बतला देना भी अनुचित न होगा । अग्नि का ( ब्रह्माग्नि का ) नाम हीं प्रजापति है । वह ' अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासी-दर्द्धममृतम् ' के अनुसार अमृत मर्त्यमय है । इसी मर्त्यामृत ( चियचितेनिधेयात्मक ) अग्नि को आत्मा कहते हैं । ‘ चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगमश्रुति के अनुसार यह श्रात्मा - आत्मा प्रजा, पशु, वित्त, भेद से चार स्वरूप धारण करके ही प्रतिष्ठित रहता है । प्रजा, पशु, वित्त, तीनों की समष्टि को ही ' आत्म-बन्धु ' कहते हैं । इन तीनों आत्मबन्धुओं से युक्त जो श्रग्निमय आत्मा है उसी का नाम ' परमाविराट् ’ २३६
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शतपथब्राह्मण है । तीनों बन्धुत्रों के चिना आत्मा अपूर्ण रहता है । नत्र तीनों समन्वित हो जाते हैं, तत्र यह आत्मा अपने आप को ‘ कृत्स्न ' समझने लगता है । इसी अभिप्राय से बृहदारण्यकश्रुति कहती है-आत्मैवेदमग्र आसीत् - एक एव । सोऽकामयत - जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय, अथ वित्त ं मे स्यात्, अथ कर्म्म कुर्वीय । एतावान्वै कामः । नेच्छंश्च नातो भूयो विन्देत् । तस्मादप्येत्तर्हि – एकाकी – कामयते जाया मे स्यात्, अथ प्रजायेय, अथ वित्तं मे स्यात्, अथ कर्म्म कुर्वीयेति । स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्रोति, अकृत्स्न एव तावन्मन्यते | तस्य उ कृत्स्नत । ' । मेरे ' स्त्री ' हो ' पुत्र ' हो ' सम्पत्ति ' हो, एवं इन सब कामनाओं को प्राप्त कर संसार में पर्याप्त कर्म्म करूँ, ऐच्छिक ‘ यश ' अज्जित करूँ, ये ही क्रमिक चार स्वाभाविक कामनाएँ होतीं हैं । आत्मा - इन चार कामनाओं को ही पूरी कर सकता है । इन चार से अधिक इच्छा करके भी वह प्राप्त नहीं कर सकता । साथ ही चारों में से जबतक एक भी श्रात्मबन्धु प्राप्त नहीं होता, तत्रतक यह अपने आपको अपूर्ण समझता है । एवं चारों को प्राप्त करने के अनन्तर अपने आपको धन्य समझने लगता है ( १४ | ४ | ३ | ३० ) । प्रजा, पशु, वित्त, इन तीनों में वित्त अन्तरङ्ग - बहिरङ्ग - भेद भेद से दो प्रकार का हो जाता है । इन्द्रियाँ अन्त-र्वित्त है, ' होत्रका ' बहिर्वित्त हैं । देवता, गणदेवता, लोक, वेद, भेद से चार प्रकार की प्रजा है । ऋतु, छन्द, दिशा, स्तोम, भेद से चार पशु हैं । ६ वीं इन्द्रियाँ हैं, १० वें ' ' होत्रका ' हैं । इसप्रकार ४ प्रजा, ४ पशु, १ अन्तर्वित्त, १ बहिवित्त, भेद से ३ के १० ' आत्मबन्धु हो जाते हैं । यही विराट् है | इन. १० ग्रात्मबन्धुओं के कारण वह आत्मा ' विराडात्मा ' कहलाने लगता है । यह १० ही आत्मबन्धु - भर्ग:, महः, यशः, सर्वम्, भेद से ४ - चार चार भागों में विभक्त हो जाते हैं । ' पार्थिव तेज ' भर्ग ' है । आन्तरिक्ष्य तेज ' मह ' है । दिव्यतेज ( द्युलोकीय सौर तेज ) ' यश ' है । एवं चौथे लौक का वारुण तेज ' सर्व ' है । ' आपो वै सर्वे देवा: ' इस चयनश्रुति के अनुसार इस चौथे लोक के तेज को अवश्य ही ' सर्व ' कहाजा-सकता है । इसप्रकार इन चारों के कारण वही दर्शिनी - विराट् निम्नलिखित क्रमानुसार परमात्रिराट् रूप में परिणत हो जाती है । २३७