Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 501–510

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 501–510

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प्रथमकाण्ड दशाक्षरयुक्त मर्त्यामृतभावापन्न विराड् अग्नि ] १ आत्मा । १ - अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा, ये चार देवता हैं । २– वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, ये चार गणदेवता हैं । ३ - पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, आप:, ये चार लोक हैं । ४ - ऋग्नेद, यजुर्वेद, सामवेद, ब्रह्मवेद, ये चार वेद हैं । ५- वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, ये चार ऋतु 1 ६ – गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, ये चार छन्द हैं । ७- प्राची, प्रतीची, उदीची, दक्षिणा, ये चार दिशा हैं । २ प्रजा ३ पशु ८ - त्रिवृत् ( ६ ), पच्चदश ( १५ ), सप्तविंश ( २७ ); एकविंश ( २१ ), ये चार स्तोम हैं । ह - वाक, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, ये चार इन्द्रियाँ हैं । ( अन्तर्वित्त ) १० - होता, अध्वर्यु ', उद्गाता, ब्रह्ला, ये चार होत्रा हैं । ( बहिर्वित ) ४ वित्त प्रजापति विराटू आत्मा, प्रजा, पशु, वित्त, भेदभिन्न इस विराट्प्रजापति के लिए श्रवश्यमेव - ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् । सर्वमुं ह्येवेदं प्रजापतिः ' यह कहा जासकता है । इसप्रकार सबके संकलन से ४० संख्या होजाती है | इसी अभिप्राय से ‘ सैषा चत्वारिंशिनी परमा विराट् ' ( गोपथब्राह्मण ) यह कहा जाता है । पूर्व के निरूपण से आपको यह अवश्य ही मान लेना पड़ेगा कि, विराड्यज्ञ के बाहिर कुछ भी नहीं बचता है । ऐसी अवस्था में यदि विराट्सम्पत्ति प्राप्त कर ली जाती है, तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सम्पत्ति का यजमान के आत्मा के साथ सम्बन्ध होजाता है । प्रजा, पशु, वित्त, तीन हीं तो सम्पत्ति है । विराट् से तीनों का संग्रह होजाता है । इससे आत्मा कृत्स्न बन जाता है । इसी प्रतिगहन विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' विराड् वै यज्ञः । तद्विरा-जमेवैतद्यज्ञमभिसम्पादयति ' यह कहा गया है । विराट् की उपपत्ति बतलादी गई । अत्र संक्षेप से द्वन्द्वभाव की उपपत्ति बतला कर प्रथम ब्राह्मण उपरत हो रहा है । १० पात्रों के पाँच युग्म बना कर रक्खे जाते हैं । एक की अपेक्षा युग्म में अधिक वीर्य्य होता है । यही कारण है कि, उस सर्वजगधाधार सच्चिदानन्द जगदीश्वर को भी ' द्विधा कृत्यात्मनो देहमर्द्धेन पुरुषोऽभवत् - अद्धेन नारी ' के अनुसार अपने आपको दो ही स्वरूपों में परिणत करना पड़ता है । ‘ एकाकी " रमते - तद्द्द्वितीयमैच्छत् - पतिश्च पत्नी च ( एकाकी आत्मा रमण नहीं कर सकता । इसीलिए उसने अपने आपको पति और पत्नी दो भागों में परिणत करना चाहा ) श्रादि श्रुतिवचन भी इसी तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं । संसार के मूलप्रभव अग्नि सोम ही पति - पत्नी हैं । इसी आधार पर ' एकाकी तो बृह-स्पति भी कुछ नहीं कर सकते ' यह किंवदन्ती प्रचलित है । क्योंकि जीव का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण भूत २३८

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शतपथब्राह्मण ब्रह्मतत्त्व दो स्वरूपों में परिषत होकर ही संसारचक्र चल रहा है । यही कारण है कि तदंशभूत जीवात्मा भी किमी कार्य्यं को करने के लिए प्रवृत्त होता हुआ दूसरा सहायक चाहता है । इसी विज्ञान के आधार पर हमारा वैवाहिक सम्बन्ध निर्भर है । इतर समुदायों की भाँति हमारा वैवाहिक सम्बन्ध केवल ऐहलौकिक सुख का साधन नहीं है । अपितु दोनों के अभ्युदय, निःश्रेयस् का संसाधक है । दो में वीर्य्य श्राजाता है | हमारा यज्ञ निर्वीर्य्य न हो, इसीलिए युग्मरूप से ही पात्रों को रक्खा जाता है । अनि यज्ञ के द्वारा यजमान को नवीन दिव्यात्मा उत्पन्न करना है । एवं प्रजनन - व्यापार मिथुन ( जोड़े ) से सम्बन्ध रखता है । इसलिए भी द्वन्द्व रूप से ही पात्रों को रखना उचित । इह्रीं दोनों उपपत्तियों को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है--द्वन्द्व ं वै वीर्य्यम् । यदा वै द्वौ संरभेते-मिथुनमेवैतत् प्रजननं क्रियते ॥२२ ॥

- अथ तद्वीर्य्यं भवति । द्वन्द्वं वै मिथुनं प्रजननम् । इति प्रथमाध्याये प्रथमं ब्रह्मणं उपरतम् १ अथ द्वितीयाध्यायेद्वितीयं ब्राह्मणम् -यथोक्त विधि के अनुसार परिस्तरण होने के अनन्तर वह अध्वर्यु ' ' कर्म्मणे वां वेषाय वाम् ' यह मन्त्रबोलता हु सबसे पहिले शूर्प, और अग्निहोत्रहवणी, दोनों पात्रों को उस दर्भास्तरण पर रखने के लिए उठाता है । इन पात्रों को यज्ञ के लिए, एवं यज्ञमण्डल को परवेष्टित करने के लिए उठाया जाता है । इसी -लिए ‘ कर्म्मणे वाम्, वेषाय वाम् ' यह कहा गया है । मन्त्र का अर्थ करते हुए भगनान् याज्ञवल्क्य कहते हैं- ' यज्ञो वै कर्म्म । यज्ञाय हि । तस्मादाह कर्म्मणे वामिति । वेषाय वामिति, वेवेष्टी व हि यज्ञम् ' । इन अक्षरों में अद्भुत चमत्कार है । याज्ञवल्क्य यज्ञको कर्म्म मानते हैं । क्या यह मान्यता यर्थार्थ है? | यदि ऐसा है, तब तो खाना, पीना, सोना, चलना, बैठना, आदि संसार के सभी कर्म्म यज्ञ हैं । उधर यज्ञ का ' अग्नि में सोम का आहुत होना ' यह अर्थ किया जाता है । इधर ' कर्म्ममात्र ' को यज्ञ कहा जाता है । विज्ञानरहत्य को न जानने के कारण सचमुच ' यज्ञो वै कर्म्म ' यह कथन एक विचित्र पहेली बन जाती है । परन्तु जब विज्ञानचतु से इस वाक्य के याथातथ्य का विचार किया जाता है, तो सभी सन्देह दूर हो जाते हैं । कर्म्म को यज्ञ कहते हैं, इसके लिए पहिले कर्म का स्वरूप समझ लेना श्रावश्यक होगा । जिस अव्ययात्मा से संसार का निर्माण हुआ है, वह ज्ञानकर्ममय है । उसका ं श्रानन्द - विज्ञान-मनोमय आधाभाग ‘ ज्ञानात्मा ' कहलाता है, एवं मनः प्राण - वाङमय आधा भाग ' कम्र्मात्मा ' कहलाता है । ज्ञानात्मा, और कर्म्मात्मा, दोनों अविनाभूत हैं । अन्तर दोनों में केवल यही है कि, सृष्टिभाग में कर्म्मभाग २३६

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प्रथमकाण्ड प्रधान है, एवं मुक्तिभाग में ज्ञानभाग प्रधान है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बतला दिया गया है । अव्ययपुरुष के ये दोनों भाग श्रालम्बनमात्र हैं । अतएव अव्यय की आनन्दादि पाँचों कलाएँ ' आनन्दमय, विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, वाङ्मय ( अन्नमय ) कोष कहलाती हैं । म्यान को ही ' कोष ' कहते हैं | कोष वस्तु नहीं है | वस्तु कोष में रहती है । अतएव को रूप अव्यय को ससार में रहते हुए भी संसार से पृथक बतलाया जाता है । संसार के यच्चयावत् श्रानन्द अव्यय के श्रानन्दमय कोष में रहते हैं । संसार के सभी विज्ञान, मनः, प्राश, वाक् क्रमशः अव्य के विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, वाङमय, कोष में रहते हैं । इन मांसारिक पाँचों भावों का उदय चाहें कहीं होता हो, किन्तु भूमण्डल में रहने वाले हम पार्थिव-प्राणियों को ये पाँचो भाग सूर्य्य से ही मिलते हैं सूर्य्य आनन्दघन है । इसीलिए इसे स्वर्ग माना बाता है | सूर्य्य विज्ञानघन है, अतएव इसके लिए ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' यह कहा जाता है | सूर्य्यं मनो-मय है, अतएव इसके लिए ' आदित्यं मनः ' यह कहा जाता है । सूर्य्य प्राणमय है, अतएव इसके लिए ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूय्यः ' यह कहा जाता है । त्रयीविद्या को ही वाक् कहते है । वस्तुतस्तु इन पाँचों का स्वरूपतः सूर्य्य में ही आविर्भाव होता है । इसका कारण यही है कि, अव्ययात्मा की क्षराक्षर नाम की परा - रप्रकृति से पहिले स्वयम्भू का प्रादुर्भाव होता है । अनन्तर क्रमश: - परमेष्ठी, सूर्य्य, दृथिवी, चन्द्रमा, का जन्म होता है । ये ही पाँचों पिण्ड वैज्ञानिक परिभाषानुसार ' पञ्चपुण्डीरा प्राजापत्यवल्शा ' नाम से प्रसिद्ध है । इन पाँचों में स्वयम्भू परमेष्ठी ऊपर की वस्तु है, पृथिवी चन्द्रमा नीचे की वस्तु है । सूय्य दोनों के मध्य में है | सूर्य्य से ऊपर का भाग अमृत कहलाता है, एवं नीचे का भाग मर्त्य भाग कहलाता है । अतएव ' यतकिंचार्वाचीनमादित्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् ' ( सूर्य्य के नीचे जो कुछ है, वह मृत्यु से आक्रान्त है-शत ० १० | ५ | १ | ४ ) यह कहा जाता है । अतएव इसे अमृत - मृत्यु का विभाजक बतलाया जाता है ( देखिए यजु: सं ० ३३ अॅ ० ४३ मं ० ) । अमृत मृत्यु के विभाजक सूर्य के ऊपर रहने वाले जो आपोमय परमेष्ठी, और प्राणमय स्वयम्भू है, उन दोनों की समष्टि ' महान् ' नाम से प्रसिद्ध है । स्वयम्भ अव्यक्त है, परमेष्ठी व्यक्त है । अव्यक्त स्वयम्भू की व्यक्तावस्था का नाम हीं ' महान् ' है । अतएव षोडशीपुरुष के आत्मक्षरभाव से उत्पन्न होने वाली स्त्रयम्भू आदि पाँच प्रकृतियों की ४ ही प्रकृतियाँ रह जातीं हैं । अतएव उपनिषदों में स्वयम्भू, और परमेष्ठी, दोनों के लिए प्रायः ' महान् ' शब्द ही प्रयुक्त होता है । यह महान् श्रापोमय है । सबसे पहिले - ज्ञानकर्म्ममय ( विद्या - कर्म्ममय ) उस चिदात्माका ( षोडशीपुरुष का ) इसी महान् से सम्बन्ध होता है । परन्तु ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, इन पाँचों अक्षरों में से महानू - विष्णु - अक्षरमय होने से यज्ञमय है । यद्यपि पाँचों ही प्रकृतियाँ यज्ञमयीं हैं । क्योंकि पञ्चीकृत प्राणादि यज्ञक्षरों से ही इन पाँचों की उत्पत्ति होती है । सर्वहुतयज्ञ ही इन की उत्पत्ति का कारण है । परन्तु स्वयम्भू - यज्ञ प्राणमय होने से असंग है । अतः यज्ञरूप होते हुए भी उसे यज्ञतम्पत्ति के बाहिर माना जाता है । अग्नि में सोम की आहुति होने का नाम यज्ञ है । वह सबसे पहिले परमेष्ठी में ही उत्पन्न होता है । कारण इसका यही है कि, आगतिरूप विष्णु यदि स्थितिरूप ब्रह्मा से मिल जाता है, तो सोम अक्षर का जन्म होता है । वह सोममय विष्णु इस परमेष्ठी का अक्षर है । अतएव क्षरसोम का यहीं उत्पन्न होना न्यायप्राप्त है । परमेष्ठी में सोम है | अतएव ' तृतीयस्यां त्रै इतो दिवि सोम आसीत् ' ( पृथिवी लोक से तीसरे द्यौ में सोम रहता है-२४०

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शतपथब्राह्मण शतपथब्राह्मण ) यह कहा जाता है । इस्त्री सोमाहुति के कारण हम इस परमेष्ठी - विष्णु को ‘ यज्ञमूर्त्ति ’ कहते हैं । अतएव ब्राह्मणग्रन्थों में विष्णु को यज्ञ, एवं यज्ञ को विष्णु बतलाया जाता है ।. कहना इससे यही है कि, यज्ञवृत्ति के कारण परमेष्ठी में जो कुछ आता है, सोमवत् वह सम्पूर्ण प्रपञ्च लीन हो जाता है । जैसे सोम आहुत होकर तन्मय बन जाता है, प्रातिस्त्रिकरूप से उद्बुद्ध नहीं रहत, एवमेव ऊपर से आने वाला विद्याकर्ममय चिदश भी इस यज्ञसमुद्र में विलीन होजाता है । यहाँ उसकी चिति नहीं होती, अपितु विलयन होता है । अतएव चिदात्मा के रहने पर भी उससे कोई सम्बन्ध नहीं होने पाता । परमेष्ठी के नीचे सूर्य्य है । सूर्य्य अग्निमय है । अतएव इसके सम्बन्ध से होने वाला यज्ञ * ' चयन ' यज्ञ कहलाता है । अग्नि के ऊपर अग्नि के चिनाव से इसका स्वरूप बना हुआ है । क्योंकि सूर्य में गत वस्तु को अपने ऊपर आरूढ करने की वृत्ति है । अतएव परमेष्ठी के द्वारा आया हुआ चिदात्मा यहाँ परमेष्ठी की भाँति विलीन नहीं होता । अपितु इस पर प्रतिष्ठित हो स्वस्वरूप से अभिव्यक्त हो पड़ता है । इसीलिए सूर्य्य ही मनःप्राणवाङमय कहलाता है । सृष्टिभाग में अव्यक्त के कर्म्ममय मनःप्राण-वाङ्मय भाग की ही प्रधानता रहती है, श्रानन्दविज्ञान अन्तर्निगूढ रहते हैं । अतएव मन: प्राण वाक् का ही व्यवहार होता है । सूर्य्य के द्वारा ही चन्द्रमा से निम्मित आध्यात्मिक प्रज्ञानरूप आदर्श पर उस चिदात्मा का प्रतित्रिम्ब पड़ता है । प्रतिबिम्ब को वैदिकपरिभाषा में ' आभास ' कहा जाता है । सूर्य्यद्वार से प्रज्ञान में आया हुआ जो चिदाभास है, उसीका नाम ' जीवात्मा ' है । आत्मभाग षोडशीपुरुष है । परन्तु क्योंकि उसका आगमन सुर्य्य के द्वारा होता है, अतएव रोदसी त्रिलोकी में रहने वाले पार्थिव जीवप्रजापति, एवं शिपि-विष्ट प्रजापतियों का आत्मा इसी सूर्य को बतलाया जाता है ( देखिए यजुः सं ० १३ ० ४६ मं ० ) । सूर्य्य में आकर वह चिदात्मा सूर्य्यगत विद्या - श्रविद्या भाग से युक्त होजाता है । सूर्य्य विज्ञानघन है, एवं क्रियाघन है । विज्ञान विद्या है । क्रियाभाग आवरक होने से अविद्या है । सूर्य्य के इस विद्या, और अविद्या, दोनों का नाम ' बुद्धि ' है । सौरभाग ही हमारी बुद्धि बनता है । अतएव इसके लिए ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' यह कहा जाता है । विद्याबुद्धि - धर्म्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य्य, भेद से चार प्रकार की है, अविद्याबुद्धि – अघर्म्म, अज्ञान, आसक्ति, अनैश्वर्य्य, भेद से चार प्रकार की है । योगशास्त्र इन्हीं को ' अविद्या " अस्मिता, राग, 3 द्वेष, अभिनिवेष, " ये पाँच क्लेश बतलाता है । अविद्या अज्ञान है । अस्मिता अनैश्वर्य्य है | रागद्वेष आसक्ति है | अभिनिवेश धर्म्म है । सांख्यशास्त्र की ये ही आठ बुद्धियाँ हैं । धर्म्म ज्ञानादि चारों से अव्ययात्मा के विद्याभाग का उपकार होता है । दूसरे शब्दों में इन चारों से अव्यय का विद्याभाग ( ज्ञानभाग ) स्वच्छ होता है, अतएव विद्योपकार होने से इन चारों को ' विद्याबुद्धि ' कहते हैं, एवं शेष चारों को अविद्यारूप कर्म्मभाग के उपकारक होने से ' अविद्याबुद्धि ' कहते हैं । विद्याभाग ज्ञान है, अविद्याभाग कर्म्म है | सूर्य्य दोनों से युक्त है । विद्याभाग अन्तर्निगूढ है, अविद्यारूप कर्म्मभाग बहिर्मुख है । अतएव सौरत्रिलोकी के सम्पूर्ण पदार्थ ज्ञानगर्भित कम्ममय हैं । पार्थिव यज्ञों की प्रतिष्ठा सूर्य्य है । सूर्य्य में * सौर सम्वत्सररूपप्रजापति यजुष्मती, और लोकम्पूणा नाम की चितियों से चीयमान हो रहे हैं । इसी चितियज्ञ को चयनयज्ञ कहते हैं । ६-७-८-६ शतपथ के इन चार काण्डों में इसी प्राकृतिक नित्य, एवं वैध, उभयविध अग्निचयन का सोपपत्तिक निरूपण हुआ है । २४१

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प्रथमकाण्ड 3 ज्योति, गौ, आयु, तीन भाग हैं । तीनों के कारणभूत सौरयज्ञ ज्योतिष्टोम, गोष्टोम, आयुष्ट्रोम, भेद से त्रिधा विभक्त होजाता है । ज्योतिष्टोमयज्ञ - अग्निोम, ' अत्यग्निष्टोम, उक्थ्यस्तोम, ३ षोडशीस्तोम, ४ अतिरात्रस्तोम, व जपेयस्तोम, ' आप्तोर्यामस्तोम, भेद से सप्तसंस्थ है, जैसाकि पूर्व प्रकरण में बतलाया जाचुका है । दर्शपूर्णमास, अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, पशुबन्ध, आदि आदि सभी इष्टि, सोम, पशु ग्रादि यज्ञों का सप्तसंस्थ ज्योतिष्टोम में अन्तर्भाव है । यही नहीं, अपितु ' अतियज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध ' चयनयज्ञ ' का भी ज्योतिर्म्मय सूर्य्यं से ही सम्बन्ध है । इन्हीं सम्पूर्ण यज्ञों के कारण सूर्य्य ' यज्ञमूर्त्ति ' है । सम्पूर्ण संसार में जो कर्म्मशक्ति है, उसके प्रदाता प्राणघन यज्ञमय सूर्य्य ही हैं । यज्ञमूर्त्ति सूर्य्यं कर्म्ममय दें । संसार के सम्पूर्ण पदार्थ, सम्पूर्ण प्रजा यज्ञमूर्त्ति कर्म्ममय सूर्य से उत्पन्न होतीं हैं, अतएव हम सत्रको यज्ञमय कर्म्मभाव से युक्त कह सकते हैं । सभी पदार्थ यज्ञ हैं । सभी कर्ममय हैं । अतएव जैसे विष्णु को यज्ञ, एवं यज्ञ को विष्णु कहा जाता है, एवमेव कर्म्म को यज्ञ, एवं यज्ञ को कर्म्म कहा जा सकता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ‘ यज्ञो वै कर्म्म ' यह कहा गया है । कर्म - आदान, विसर्ग भेद से दो ही प्रकार का है । यज्ञ में ये ही दोनों व्यापार होते हैं, इसलिए भी हम यज्ञ को कर्म्म कह सकते हैं । इस विज्ञान के अनुसार संसार के सभी कम्मों की यज्ञता, एवं कर्म्मता . सिद्ध हो जाती है । भोजन करना सचमुच यज्ञ है । चलना गतियज्ञ है । हँसना हास्ययज्ञ है । सभी यज्ञ हैं । यज्ञ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । सम्पूर्ण पदार्थं यज्ञपुरुषस्वरूप हैं । अग्नि ही यज्ञ है । उस अग्नि के वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ ये तीन विवर्त्त हैं । तीन अग्नियों के कारण असंज्ञ, अन्तःसंज्ञ, ससंज्ञ, भेद से तीन हीं प्रकार के जीव हैं । सभी जब अग्निमय हैं, तो सभी यज्ञ हैं । सभी में आदानविसर्ग ( अपने पदार्थों को देना, बाहिर की वस्तुओं को लेना ) होता रहता है । अतएव सभी कम्ममय हैं । सभी कम्म यज्ञरूप हैं । प्रत्येक पदार्थ ( वह जड़ हो, अथवा चेतन हो, किंवा श्रद्ध ' चेतन हो ) प्रतिक्षण कुछ खाता रहता है, एवं अपने में से निकालता रहता है । अतएव सभी कर्माक्रान्त कहने योग्य हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर-' यज्ञो वै कर्म्म । तस्मादाह कर्म्मणे वामिति ' यह कहा है । पात्र, समिध, कुशा आदि आदि यज्ञिय. पदार्थ ही यज्ञपुरुष का स्वरूप - सम्पादन करते हैं । चिना वस्त्र के जैसे पुरुष अधूरा रहता है, एवमेव बिना इन पात्रादि के यह यज्ञपुरुष अधूरा रहता है । इनसे इसका वेष्टन किया जाता । यज्ञ के वेष्टन करने के लिए ही इन पाँचों का स्थापन होता है । अतएव ' कर्म्मणे वाम्, वेषाय वाम् ' यह कहा है । इसप्रकार यह मन्त्र चोलता हुआ अध्वर्यु १० पात्रों के साथ साथ ही ओर ओर जिन जिन पात्रों का उपयोग होता है, उन सत्र को उपयोगक्रमानुसार अपणाग्नि के पश्चिमभाग में, अथवा उत्तरभाग में, दोनों में से किसी एक भाग में रख देता है || १ || इति परिस्तरणं पात्रासादनं च ४ २४२

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( मूल ) -इति ॥२ ॥

शतपथब्राह्मण ५ अथ वाक् – संयमनम् - अथ वाचं यच्छति । वाग्वै यज्ञः । अविक्षुब्धो यज्ञ तनवा ( तनवै ) 1 ( अनुवाद ) - ( परिस्तरण, और पात्रासादन के ) अनन्तर ( वह अध्वर्यु ' ) वाक्संयम करता है । वाक् ही यज्ञ है । हम क्षोभ रहित होकर यज्ञ का वितान करैं ( इस प्रयोजन के लिए ही वाक्संयम करता है ) ॥ २ ॥

( भाष्य ) —इसप्रकार ‘ कर्म्मणे वामिति शूष्पग्निहोत्रहवण्यादाय वाचं यच्छति ' ( का ० श्र ० सू ० २ श्र ० ५५ सू ० ) के अनुसार पात्रग्रहणानन्तर अध्वर्यु मौन धारण करता है । आगे जाकर एक ' हविष्कृदाह्वान ' नाम का कम होने वाला है । यहाँ से प्रारम्भ कर ' हविष्कृदाह्वान ' कम्म ' पर्य्यन्त मन्त्र-वाक् के अतिरिक्त और कुछ नहीं बोल सकता । जिस कम्म में अध्वर्यु को मन्त्र बोलना पड़ेगा, उसी समय अपनी वाक् विसर्जित करेगा । शेष समय में सर्वथा मौन रहेगा । यदि कहीं भूल से अध्वर्यु ' बोल देगा, तो उसे उसी समय वैष्णव मन्त्र बोल कर प्रायश्चित्त करना पड़ेगा । यद्यपि यहाँ ' वाचं यच्छति ' इसप्रकार सामान्यरूप से ही वाक्संयमन का आदेश किया है, परन्तु आगे जाकर ' अथ प्रत्युष्ट रक्षाः प्रत्युष्टमरातयः ' यह कहा है । एव आगे जाकर स्पष्ट ही ' सं यदिदं पुरा मानुषीं वाचं व्याहरेत् - तत्रो वैष्णवीमृचं वा यजुर्वा जपेत् ' ( १।४।६ ) से मानुषी वाङ मात्र के संयमन का सम्बन्ध सिद्ध होजाता है । मानुषी वाक् का संयमन क्यों करना चाहिए?, इसकी उपपत्ति बतलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं - ' वाक् ' ही यज्ञ है 1 । ऐसी अवस्था में वाकप्रयोग करना यज्ञ को क्षुब्ध करना है । यज्ञक्षोभ से यज्ञ से उत्पन्न होने वाले आत्मा में विकृति की सम्भावना है । अतएव वाक्संयमन करना परमावश्यक है । कहीं विराट् को यज्ञ बतलाया जाता है, कहीं विष्णु को यज्ञ बतलाया जाता है, यहाँ वाक् ही को यज्ञ बतलाया जारहा है 1 । इसमें विरोघ नहीं समझना चाहिए । स्थान, एवं अधिकाग्भेद से जैसे एक ही मनुष्य - पिता, पुत्र, मातुल, श्वशुर, आदि नामों से व्यवहृत किया जासकता है, वही जैसे अपने पुत्र का पिता, पिता का पुत्र, भानजे का मामा, जामाता का श्वशुर, कहलाता है, एवमेव एक ही यज्ञ स्थानभेद से ' विराट्, वाक्, विष्णु, पुरुष, आदि नामों से व्यवहृत होता है | पूर्व के प्रकरणो से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, हमारा आत्मा वैश्वानर - तेजस, प्राज्ञ - रूप प्राणाग्निमय होने से यज्ञरूप है । अग्नि में सोम की आहुति होने का नाम ही यज्ञ है, यह अनेक बार बतलाया जाचुका है । शरीर को जहाँ से छूते हैं, वहीं से गरम पाते हैं । यही अनुभूत अग्नि वैश्वानर है । इस अग्नि की सत्ता अन्नाहुति पर ही निर्भर है । अन्न साक्षात् सोम है । यह सोम जबतक आहुत होता रहता है, तत्रतक शरीराग्नि प्रवृद्ध रहता है । यह यज्ञ सदा होता रहता है । जब आहुति अवरुद्ध हो जाती है, तो यज्ञ भी विलीन हो जाता है | यज्ञ के साथ साथ ही प्रजा विलीन होजाता है । प्रजा यज्ञ के साथ है । जबतक यज्ञ है, तभी तक वाक्शक्ति है । पूर्व में यह विस्तार के साथ बतला दिया गया है कि, शरीर का अग्नि हीं वायु के आघात से आहत होकर क – च — ट – त - आदि वणों का जनक बनता है । शरीर का यज्ञरूप अग्नि हीं वाक बनता है । इसी आधार २४३

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प्रथमकाण्ड पर- ' अग्निर्वाग् भूत्त्वा मुखं प्राविशत् ' यह कहा जाता है । जो जितना अधिक बोलता है, उसका मन उतना हीं अधिक निर्बल होता है । क्योंकि वाक् बिना प्राण के नहीं रहती, एवं प्राण बिना मन के नहीं रहता । जो मितभाषी हैं, वे अधिक मनस्वी, एवं विचारशील होते हैं । स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए मितभाषी बनना भी एक प्रधान औषधि है । जो इस वृत्ति को अपना लेते हैं, अर्थात् जो मौनवृत्ति धारण कर लेते हैं, उन्हें ‘ मुनि ' कहा जाता है । मौन से वाक् का व्यय नहीं होता । वह प्रवृद्धा वाक् मन की वृद्धि का कारण बनती है । मन पर ही विज्ञान - ( बुद्धि ) - सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है । मन जितना सबल होता है, उस पर रहने वाली बुद्धि भी उतनी हीं दृढ़ हो जाती है । बुद्धि का चाञ्चल्य जाता रहता है । एक पात्र सामने रख लीजिए | उस पात्र पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ रहा । अभी वह प्रतिविम्ब सर्वथा शान्त है, अतएव उसका स्वरूप स्वच्छ है | स्थिर है । इसकी स्थिरता का एकमात्र कारण उस प्रतिबिम्बाधार पानी की शान्ति है । आप उस पानी को हाथ से विकम्पित कर दीजिए । उसी समय पानी में वीचियाँ उत्पन्न हो जाँयगी, एवं उसी क्षण उस प्रतित्रिम्बत सूर्य के खण्ड - खण्ड हो जायँगे, एवं प्रतिबिम्ब का स्वरूप ही विकृत हो जायगा । ठीक यही स्थिति यहाँ समझिए । मनोमय छन्द ' जलपात्र ' है, तत्र व्यन्त सोमरसमय मन ' जल ' है! बुद्धि प्रतिबिम्बित सूर्य्य है । यदि मन दृढ है, शान्त है, तो बुद्धि भो शान्त है, एवं एकाकारान्विता है । शान्त मन के उपर प्रतिष्ठित शान्त, अतएव निश्चल बुद्धि का ही नाम ' व्यवसायात्मिका बुद्धि ' है । ' इद-मित्थमेव नान्यथा ' ( यह ऐसा ही है - विपरीत नहीं, ) इसप्रकार का जो निश्चयज्ञान है, उसी का नाम ‘ व्यवसाय ' है । व्यवसाय में विसाय- ये तीन विभाग हैं । ' त्रि ' का अर्थ है ' विशेष ' | ' अव ' का अर्थ है ' नीचेकी ओर ' | ' साय ' का अर्थ है ' समाप्ति ' । ' षोऽन्तकर्म्मणि ' धातु से तद्धित प्रत्यय के द्वारा ' साय ' बना है | बुद्धि उस विषय के अन्तस्तल पर प्रतिष्ठित होजाय, वहीं समाप्त होजाय, अर्थात् तन्मय होजाय, ' व्यवसाय ' शब्द ऐसी अवस्था को ही सूचित करता है । निश्चयज्ञानापरपर्य्यायिका इस व्यवसायसम्पत्ति से युक्त जो बुद्धि है, उसी का नाम ' व्यवसायात्मिका बुद्धि है । यह बुद्धि एकभावापन्ना है । इसमें इदं वा - इदं वा यह नानावृत्ति नहीं होती । इसमें तो निश्चयज्ञान हीं होता है । परन्तु इसकी उत्पत्ति अचल मन से ही सम्बन्ध रखती है । व्यवसायात्मिका बुद्धि को प्राप्त करने के लिए पहिले तदाधाराभूत मन का चाञ्चल्य दूर करने की आवश्यकता है । मन के चाञ्चल्य को दूर करने के लिए वाक्संयम करना आवश्यक है | क्योंकि जो वस्तु निर्बल होती है, वही शीघ्र विकम्पित हो पड़ती है । शाखाएँ वायु के श्राघात से कम्ति हो पड़तीं हैं । परन्तु मूनस्तम्भ सर्वथा अविकम्पित ही, स्थाणु ही बना रहता है । इसी नियम के अनुसार जितना वाक्सयम किया जाता है, मन उतना हीं अधिक दृढ़ होता है । अग्नि वाक् है । हम प्रतिदिन अन्न खाते हैं, अतएव प्रतिदिन अग्नि बढ़ता रहता है । अग्निवृद्धि से मनो-वृद्धि होती रहती है | वही अन्न रस, असृक्, मांसादि के क्रमिक विशकलन से मन बनता है । अतएव यदि आप मन म्थिर कर व्यवसाय बुद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको वाक्संयम करना पड़ेगा । जत्र अभ्यासयोग से मन की चञ्चलता दूर होजायगी, तो मन शान्त होजायगा । उसी समय विज्ञान भी शान्त होजायगा । शान्त विज्ञान से चित् के स्वरूप ( आत्मस्वरूप ) का साक्षात्कार होजायगा । जो धीर, एवंनिश्चल विज्ञानवान् हैं, वे ही ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' के अनुसार उस अक्षय श्रानन्द को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं । परमार्थदृष्टि से ही विज्ञान की व्यवसायात्मिकता श्रेष्ठ हो, यह बात नहीं है । २४४

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शतपथब्राह्मण सांसारिक अर्थों का भी वही यथावत् सञ्चालन करसकता है, जो कि बुद्धिमान् होता है । जिस की विज्ञानशक्ति प्रबल रहती है, वही कार्य्य सुचारुरूप से करने में समर्थ बनता है । विज्ञानशक्ति को प्रबल रखने का एकमात्र उपाय है - मन को शान्त रखना । मन को शान्त रखने का एकमात्र उपाय है - कम बोलना | अधिक बोलने से मन निर्बल होजाता है । उसी समय वह चञ्चल होपड़ता है । उस के चञ्चल होते ही एक बुद्धि के अनन्त खण्ड होजाते हैं । उसी समय उसमें ' अय्यवसायधर्म्म ' समाविष्ट हो पड़ता है, जोकि ऐहलौकिक परलौकिक, दोनों अर्थोका विघातक है । अतएव उसका विरोध, एवं व्यवसायधर्म्म का आदेश करते हुए भगवान् कहते हैं—

व्यवसामात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन! ।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥

गीता अर्थ स्पष्ट है । इसप्रकार सम्पूर्ण प्रपञ्च से यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है कि, वाक् साक्षात् यज्ञ है । अग्निरूप आध्यात्मिक यज्ञ ही वागूरूप में परिणत हो बाहिर निकलता है । अतएव हम अवश्य ही वाक् को यज्ञ कहसकते हैं । नित्रज्ञ मनुष्य क्षुब्ध रहता है । क्षोभ बुद्धि का विनाशक है । आज यह अध्वर्यु यज्ञ जैसा प्राणात्मक सूक्ष्म, अतएव दुस्तरकर्म्म करने वाला है । अतएव इसे अवश्य ही मौन धारण करना चाहिए | ‘ वाग्वै यज्ञः ' यह अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत तीनों से सम्बन्ध रखता है । सम्पूर्ण विवर्त्त मनःप्राणवाङ ्ममय है । प्रत्येक वस्तु यज्ञमय है । यज्ञ मन: प्राणवाङमय है । वाक् स्थूल है 1 । उसे ही हम देखते हैं । वही वाकपिण्ड यज्ञमूर्ति का परिचायक है । अतएव हम अवश्य ही ' वाग् वै यज्ञः ' यह कह सकते हैं । अपिच - त्रिना मन्त्रवाक् के वैव मनुष्ययज्ञ कथमपि नहीं होसकता । इसलिए | हम ‘ वाग् वै यज्ञः ’ यह कह्सकते हैं । ‘ स्वस्थे चित्ते बुद्धयः प्रस्फुरन्ति ' के अनुसार शान्त चित्त में हीं विज्ञान प्रस्फुटित होता है | इसी विज्ञानसम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए, एवं तद्द्वारा शान्तभाव से यज्ञकर्म्म करने के लिए ही वाक्संयम किया जाता है । इस से श्रुति शिक्षा देती है कि, यदि तुम किसी कार्य्यं की सफलता चाहते हो, तो उसके करने से पहिले अपने वाग्व्यापार को अवरुद्ध करलो । इस से तुझ े बल मिलेगा । ऐसा करने से तुम उस कार्य्यं को करने में समर्थ बन सकोगे । इसी वाग्विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है—

‘ वाग्वै यज्ञः । श्रविक्षुब्धो यज्ञं तननै- इति ' ॥

इति वाक्संयमनम् ५ २४५

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प्रथमकाण्ड ६ – अथ - पात्रप्रतपनम् ( मूल ) - श्रथ - प्रतपति - प्रत्युष्ट रक्षः प्रत्युष्टा अरातयः, निष्टप्तं रक्षो निष्टप्ता अरातयः ' ( १ अ ० ७ मं ० ) इति वा । देवा ह वै यज्ञं तन्वानाः । तेऽसुरक्षसेभ्य आस-ङ्गाद् बिभयाञ्चक्रुः । तद्यज्ञमुखा देवैतन्नाष्ट्रा स्त्रांस्यतोऽपहन्ति || २ | ३ || ( अनुवाद ) - ( वाक्संयम के ) अनन्तर ( वह अध्वर्यु ) पात्रों को ( श्रपणाग्नि में ) तपाता है | ‘ प्रतपनं प्रत्युष्ट ं निष्टप्तमिति वा ' ( का ० श्रो ० सू ० २१५६ ) इसके अनुसार ' प्रत्युष्ट ' रक्षः प्रत्युष्टा अरातयः ' ( राक्षसजाति दग्ध हो गई, उसके सभी व्यक्ति दग्ध हो गए ' इस मन्त्रभाग से, अथवा ' निष्टप्तं रक्षो निष्टप्ता अरातय: ', ( राक्षस दग्ध होगया, अराति ` दग्ध होगए ) इस मन्त्रभाग से पात्रों की तपाता है || २ || यज्ञवितान करते हुए देवगण असुर और राक्षसों के आक्रमण से भपत्रस्त होगए । उस भय से आत्मत्राण करने के लिए यज्ञ के प्रारम्भ से ही ( उह्नोंनें इस प्रतपनक्रिया से ) असुर - राक्षसों को मार भगाया । ( अतएव आज यह अर्ध्वयु भी ) यज्ञमुख से ही नाष्ट्रा, और राक्षसों को ( इस प्रतपनक्रिया से ) मार भगाता है || ३ || ( भाष्य ) – वाक्संयमन के अनन्तर वह अध्वर्यु उन १० पात्रों को पूर्वोक्त मन्त्र बोलते हुए उसी युग्मक्रमके अनुसार तपाता है । इसी कर्म्म को ' पात्रप्रपतन ' कर्म्म कहते हैं । बिना अग्नि - सम्बन्ध के ऋषि– गण उस वस्तु को असुर और राक्षसों से आक्रान्त समझते हैं । उन की दृष्टि में अतत वस्तु सुरभावयुक्त है, अतः अपवित्र है, अतएव च ( यज्ञिय होने से ) यज्ञ में अग्राह्य है । इसी अग्राह्यभाव को दूर करने के किए मन्त्र बोलते हुए पात्रों को तपाया जाता है । इस से सचमुच उन पात्रों के असुर निकल जाते हैं, एवं वे पात्र पवित्र होते हुए यज्ञिय बन जाते हैं । विना तपाए वस्तु श्रासुरभाव से कैसे आक्रान्त रहती है?, तपाने से आसुरभाव का विनाश कैसे होजाता है?, क्षस, असुर, अराति, आदि शब्द एकार्थक ही हैं, अथवा भिन्न भिन्नार्थक १, वे देवता कौनसे हैं, जिह्नोंनें इस प्रतपनक के द्वारा पात्रों के आसुरभाव का विनाश किया?, आदि प्रश्नों का उत्तर ' ब्रह्मविज्ञान ' से ही उपलब्ध होसकता है । आत्मा, ब्रह्म, यज्ञ, भेद से उस सर्वेश्वर प्रजापति के तीन विवर्त्त है । आत्मविज्ञान, ब्रह्मविज्ञान, यज्ञविज्ञान, इन तीन विभागों में विज्ञानशास्त्र विभक्त हैं । इन तीनों विज्ञानविवर्त्ती में आत्मविज्ञान सर्वाधार है । विश्वातीत शुद्ध तत्त्व ही आत्मा है । इसी आत्मतत्त्व को ' औपनिषदपुरुष ' कहते हैं । उपनिषदों में प्रधानरूप से इसी पुरुषविज्ञान का निरूपण है । इस आत्मतत्त्व के आधार पर ' ब्रह्म ', और ' यज्ञ ' दोनों प्रतिष्ठित रह्ते हैं | ‘ मौलिकतत्त्व ' का नाम हीं ब्रह्म है । यही उस आत्मा का प्रथम, तथा मुख्य विवर्त्त ' एवं ' यौगिकतत्त्व ' का ही नाम यज्ञ है । यह उस औपनिषद - पुरुष का दूसरा विवर्त्त है । इन तीनों में से आत्मतत्त्व शुद्धरूप से कभी उपलब्ध नहीं हो सकता । उसे हम यदि प्राप्त कर सकते हैं, तो ब्रह्म, एवं यज्ञ के ही द्वारा ही प्राप्त करसकते हैं । शुद्धतत्त्व तो सर्वथा अविज्ञेय ही है । अतएव उपनिषदोंनें २४६

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शतपथब्राह्मण उस तत्त्व का मौलिक ब्रह्म को लक्ष्य बना कर तद्द्वारा ही प्रतिपादन किया है । एवं ब्राह्मणग्रन्थ प्रधानरूप से यज्ञ के द्वारा, एवं गौणरूप से मौलिक ब्रह्म के द्वारा उस शुद्ध की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है | ' दृसप्रकार वह शुद्ध आत्मतत्त्व ब्रह्म, श्री यज्ञ के अन्तर्भूत कर लिया जाता है । अतएव विश्वविज्ञान की दृष्टि से ब्रह्म, और यज्ञ, दो ही विभाग रह जाते हैं । ' संहिताभाग ' प्रधानरूप से इसी ब्रह्म का विज्ञान बतलाता है । एवं ‘ ब्राह्मणग्रन्थ ' प्रधानरूप से यज्ञविज्ञान का ही प्रतिपादन करता है । मौलिकतत्त्व से यौगिकतत्त्व उत्पन्न होता है । रासायनिक प्रक्रिया से जब दो मौलिकतत्त्व परस्पर मिला दिए जाते हैं, तो उन दोनों के रासायनिक सम्मिश्रण से तीसरा अभूतपूर्व यौगिकतत्त्वं उत्पन्न होता है । दो, किंवा अनेक मौलिक तत्त्वों के रासायनिक सम्मिश्रण से उत्पन्न होने के कारण हीं इसे ' यौगिक ' कहा जाता है । कहना इस से यही तत्त्व है । अतएव यौगिक वस्तु के विज्ञान को है कि, यौगिक वस्तु का प्रभव- प्रतिष्ठा परायण वही मौलिक जानने से पहिले मौलिक तत्त्व के विज्ञान की आवश्यकता सिद्ध होजाती है । उदाहरणार्थ - बारूद को ही लीजिए । सोरा, और कोयला, इन दोनों के योग से ' बारूद ' बनी है । अतएव त्रारूद को हम यौगिक द्रव्य कहेंगे । एवं इसके मूलभूत सोरा, और कोयला ये दो पदार्थ हैं । अत-एव इन्हें हम बारूद का मौलिक तत्त्व कहेंगे । जबतक आप इन दोनों मौलिक तत्त्वों का विज्ञान नहीं जान लेंगे, तबतक बारूद के विज्ञान का जानना कठिन हीं नहीं, अपितु असंभव होगा । शतपथब्राह्मण यज्ञ-विज्ञान का प्रतिपादक है । यज्ञ का मूल तत्त्व ब्रह्म है । अतएव हम कह सकते हैं कि, यज्ञविज्ञान की ग्रन्थियाँ तत्रतकं कथमपि नहीं सुलझ सकतीं, जबतक कि तत्सम्बन्धी ब्रह्मविज्ञान न समझ लिया जाय । ब्रह्म मूल है, यज्ञ तूल है । यज्ञविद्या ब्रह्मविद्या के आधार से ही प्रतिष्ठित है । मूलतत्त्व के सम्बन्ध से ही यौगिक तत्त्व का जन्म होता है । अतः हम अवश्य ही ब्रह्मविज्ञान को यज्ञविज्ञान का आधार मान सकते हैं । ऐसी अवस्था में यज्ञरहस्य को जानने से प्रथम ब्रह्मविज्ञान का जान लेना आवश्यक होजाता है । बिना ब्रह्म-विज्ञान के जाने यज्ञविज्ञान समझना कठिन हीं नहीं, अपितु असम्भव है । हमारे इस अनुवाद में यदि कोई कठिनता है, तो यही है । हम चाहते हैं कि, विलुप्त यज्ञविज्ञान का पुनः प्रचार हो । एवं तद्द्वारा धर्म्म पर प्रबल वेग से बढ़ती हुईं श्रद्धा का विनाश हो । परन्तु ब्रह्मविज्ञान के बिना हमारे इस उद्देश्य में बड़ी कठि-नता उपस्थित हो रही है । पहिले तो यज्ञ का प्रतिपादन करने वाला वेद ही अत्यन्त विस्तृतं है । पुनः इस के मूलभूत ब्रह्म के प्रतिपादन करने वाले वेदभाग के विस्तार का तो ठिकाना हीं नहीं है । संहिताभाग ब्रह्मभाग है । इसमें भी प्रधानरूप से ब्रह्म का विज्ञान बतलाने वाली ऋक्संहिता है । संहिता के मन्त्र - विज्ञान, स्तुति, इतिहास, इन तीन भागों में विभक्त हैं । एक मन्त्रविभाग ब्रह्मविज्ञान बतलाता है । एक विभाग देवतादि की स्तुतिमात्र करता है । एवं एक भाग इतिहास बतलाता है । इसप्रकार सहिता में तीन विषयों का निरूपण है । एवं ब्राह्मणग्रन्थ यज्ञापरपर्य्यायक कर्म्मकाण्ड का प्रतिपादन करता है । आरण्यक उपासना तत्त्व का निरूपण करता है । उपनिषत् ज्ञान का बखान करते हैं । यदि संसार में विषय होसकते हैं, ना १ विज्ञान २ स्तुति, ३ इतिहास, ४ कर्म्म, ५ उपासना, ६ ज्ञान ' ये ६ ही । इनं ६ ओं का संहिता ब्राह्मण, श्रारण्यक, उपनिषत्, इन चारों में पूर्वक्रमानुसार प्रतिपादन है । २४७