Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 511–520

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 511–520

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प्रथमकाण्ड सम्पूर्ण धर्म्मप्रपञ्च वेद के इन चारों भागों में निहित है । अतएव वेद के लिए - ' सर्वज्ञानमयो हि सः । सर्व वेदात् प्रसिर्द्धयति । धर्म्यं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ' इत्यादि कहा जाता * हैं । ऐसे सर्वज्ञानमय वेद के कर्म्मभाग का राष्ट्रभाषा - हिन्दी में निरूपण, उस की भी उपपत्ति, उसपर भी ज्ञानप्रचार का सर्वथा अभाव, कठिनता की यह परम्परा ही हमारे उद्द ेश्य को कंठिन बना रही है । यज्ञविज्ञान के रहस्य को हम तत्रतक बतलाने मे सर्वथा असमर्थ हैं, जबतक कि उससे सम्बन्ध रखने वाले ब्रह्मविज्ञान का प्रतिपादन न कर दिया जाय । यदि उसका प्रतिपादन किया जाता है, तो हमारे पाठक ऊब जाते हैं । ' जिस क्रम से शतपथ का विस्तार होरहा है ' उसके अनुसार तो इसके प्रकाशन में ४०० चार सौ वर्ष लगेंगे ' कहकर कितने हीं महानुभाव हमें विस्तार को रोकने का आदेश करते हैं । परन्तु क्या करें । हम विवश हैं । हम अपने उद्द ेश्य से च्युत नहीं होना चाहते, फिर चाहे कोई अप्रसन्न हो, अथवा प्रसन्न । हाँ हम इतना अवश्य कह देना चाहते हैं, कि, वैदिक पदार्थ गिने चुने हैं । उन को समझलेने मात्र से फिर कोई कठिनता नहीं रहती । अभी ग्रन्थ का आरम्भ है । उचित तो यह था कि, हम स्वतन्त्ररूप से तीन सौ चारलौ पृष्ठों का शतपथ-सम्बन्धी एक भूमिका - प्रकरण अपने पाठकों के समक्ष रखकर अनन्तर ग्रन्थ आरम्भ करते । परन्तु कट्टर सनातनी इसकी उपेक्षा करदेते । उहें ग्रन्थ के आधार बिना कोई बात अच्छी नहीं लगती । इसीलिए हमें एकसाथ दोनों में हस्तक्षेप करना पड़ा । ऋषि, देवता, प्रजापति, छन्द, असुर, पितर, राक्षस, गन्धर्वादि के मौलिक विज्ञान के आधार पर क्योंकि यज्ञविज्ञान प्रतिष्ठित है, अत: इन पदार्थों को प्रारम्भ में ही समझ लेना अधिक उपयोगी सिद्ध होगा । यही समझ कर ग्रन्थ के प्रारम्भ में हमें इतने विस्तृत क्रम का आश्रय लेना पड़ा है | जब पारिभाषिक पदार्थों से पाठक परिचित होजायँगे, तो पुनः आगे उन्हें विस्तार का साम्मुख्य करने की कोई आवश्यकता न रहेगी । यही प्रासङ्गिक निवेदन कर हम अपने पाठकों का ध्यान देवता, राक्षस, असु— रादि प्राणों की ओर आकर्षित हैं । संभव है इनका सूक्ष्मस्वरूप विस्तृत हो । आशा है विषय की गहनता लक्ष्य में रख कर इस गौरव को पाठक महोदय लाघव ही अनुभूत करेंगे । देवता, असुर, राक्षस इन तीनों प्राणों का स्वरूप जबतक नहीं समझ लिया जायगा, तबतक ‘ देवाह वै यज्ञं तन्वाना ते असुररक्षसेभ्य आसङ्गाद् बिभयाञ्चक्र: ' इस पक्ति का अर्थ समझ में नहीं श्रासकेगा ।

* यः कश्चित् कस्यचित् - धर्मो मनुना परिकीर्त्तितः ।

स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥

मनु २ | ७ |

चातुर्वर्ण्यं, त्रयोलोका, श्चत्त्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।

भूतं - भवत्- भविष्यं च ' सर्व ं वेदात् " सिद्ध्यति ॥

अर्थकामेष्वसक्तानां धर्म्मज्ञानं विधीयते । - मनुः १२६७ | धर्म्म ' जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥ २४८ मनुः २ | १३ |

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शतपथब्राह्मण ग्रतः प्राकृत होने पर भी सूक्ष्मरूप से तीनों का वैज्ञानिक स्वरूप उपक्रान्त हो रहा है । तीनों में से क्रमप्राप्त पहिले देवता का ही स्वरूप बतलाया जाता है । जिन देवताओं का प्रकृत में स्वरूप बतलाया जायगा, वे ' देव-देवता ' हैं । कोषकार ने यद्यपि ' देव ' और ' देवता ' शब्दों को परस्पर पर्य्याय माना है । किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से यह पर्य्यायसम्बन्ध एकान्ततः अवैज्ञानिक ही है । ' देवता ' शब्द भिन्न अर्थ का वाचक है, एवं ' देव ' शब्द् भिन्न अर्थ को अभिव्यक्त कर रहा है । देवता शब्द व्यापक है, देव शब्द व्याप्य है । देव देवता अव-श्य है, किन्तु देवता देव ही नहीं है । ब्राह्मण और गौड़ ब्राह्मण में जो अन्तर है, देवता, एवं देव शब्द में वही अन्तर है । गौड़, मैथिल, कान्यकुब्ज, महाराष्ट्र, तैलङ्ग सरयूपारी, आदि आदि पञ्चगौड़, और पञ्च-द्राविड़ सभी ब्राह्मण हैं । ' ब्राह्मण ' शब्द से सब का ग्रहण सम्भव है । किन्तु पञ्चगौड़ों में जो एक गौड़शाखा है, वह केवल गौड़ ब्राह्मण से ही सम्बन्ध रखती है । गोब्राह्मण भी ब्राह्मण है । परन्तु ब्राह्मण केवल गौड़ ही है, यह बात नहीं है । इसी व्याप्य - व्यापक - भाव को समझाने के लिए संस्कृत साहित्य में ' ब्राह्मणवसिष्ठ ' नाम का न्याय सुप्रसिद्ध है । अनेक ब्राह्मण पंक्ति में बैठे हुए हैं । उन सब में ' वसिष्ठ ' नाम का ब्राह्मण उन सत्र का मुखिया है | राजा कहता है कि, सब ब्राह्मणों को एक एक * गौ ( सुवर्णमुद्रा ) दक्षिणा में दे दो, एवं बसिष्ठ को १० गौ का दान करो । वसिष्ठ भी यद्यपि ब्राह्मण ही था । अत जो दक्षिणा सत्र को प्राप्त थी, वही इसे भी मिलनी चाहिए थी । परन्तु क्योंकि ' वसिष्ट ' नाम का एक ही ब्राह्मण था । अतः राजा की विशेष आज्ञा का अधिकारी यही हुआ । एवं इसे ही एक गौ न मिलकर १० गौ मिली । बस जो अन्तर वसिष्ठ शब्द, और ब्राह्मण शब्द में है, वही अन्तर देवता, और देव शब्द में है । देवता शब्द - ऋषि, पितर, असुर, गन्धर्व, देव, आदि सभी प्राणों का वाचक है । एवं देव शब्द उन प्राणों में से जो सौर-प्राण नाम का ३३ प्रकार का देवप्रारण है, उसी का वाचक है । जिस स्थान का, एवं जिस कर्म का जो प्राण अधिष्ठाता है, नायक, है, उस स्थान में, एवं उस कर्म्म में वही प्राण देवता है । अपने अने स्थान - कर्म में प्रधानरूप से रहने वाला प्राण ही अपने अपने स्थान, एवं कर्म्म का देवता है । ऋषि अपने कर्म का देवता है । पितर अपने कर्म का देवता है । असुर अपने कर्म्म का देवता है । सभी प्राणों में यही व्यवस्था समझनी चाहिए । देवता शब्द के इसी व्यापक -भाव के आधार पर ‘ ऋषिदैवत्य, पितृदैवत्य, असुरदैवत्य, देवदैवत्य, आदि व्यवहार प्रचलित हैं | तात्पर्य्य कहने का यही है कि ' देवता शब्द आधिकारिक है । एवं देव शब्द प्रातिस्त्रिक है । वैयक्तिक है । एक न्यासन पर कालभेद से सैंकड़ों न्याधीश बैठेते हैं । वे सभी न्यायाधीश कहलाते हैं । परन्तु उनके जो घुवीरसिंह, नाहरसिंह, रुद्रदेव, आदि प्रातिश्विक नाम हैं, वे उन उनमें हीं सीमित हैं । ठीक वही व्यवस्था यहाँ भी समझनी चाहिए | ' देवता अनन्त हैं । देव कुल ३३ ही हैं । पूर्व प्रकरणों में यत्रतत्र सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, ये पाँच यह स्पष्ट कर दिया गया है कि, ईश्वरप्रजापति के स्वयम्भू, परमेष्ठी, अववय हैं । इन पाँचों में स्वयम्भू के प्राण का नाम ऋषि है । पारमेष्ठ्य सौम्यप्रारण ' पितर ' नाम * जैसे आजकल के सोनेचाँदी के सिक्के पर देशाधिपति का चित्र रहता है - एवमेव वैदिककाल में सिक्कों पर गौ का चित्र रहता था । क्योंकि गौपशु सूर्य्यप्राणधन रहने से उन वैज्ञानिकों का श्राराध्य था । वे सिक्के ही ' गो ' नाम से प्रसिद्ध थे । इस विषय का विषद विवेचन हम आगे आने वाले ' दक्षिणा ब्राह्मण ' में करेंगे । २४६

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प्रथमकाण्ड से प्रसिद्ध है । सौरप्राण को देवता कहते हैं । चान्द्रप्राण ' गन्धर्व ' ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं पार्थि-वप्राण को असुर कहा जाता है, जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । इन पाँचों प्राणों में सौर ज्योति— म्य प्राण, एवं पार्थिव तमोमय प्राण में परस्पर स्वाभाविक शत्रुता है । एक अन्धेरा है, एक उजाला है । दोनों इसी ईश्वरप्रजापति की सन्तान हैं । पार्थिव तमोमय प्राण असुर है, सौर ज्योतिर्मय प्राण देव है । इह्नीं में परस्पर शत्रुता है | अतएव वैदिक एवं पौराणिक आख्यानों में इन दोनों संग्राम को ' देवासुर संग्राम ' कहा जाता है | यदि देवता और देव शब्द पर्य्याय होते, तो कहीं ' देवासुरसंग्राम ' के स्थान में देवातासुर-संग्राम ' का भी उल्लेख होता । अपिच ब्राह्मणग्रन्थों में जहाँ इन दोनों प्राणों का संघर्ष तलाया जाता है, वहाँ सर्वत्र इनके लिए ‘ देवाश्च वा असुराश्च उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे - ( प्रजापति की सन्तान होने से प्राजापत्य नाम से प्रसिद्ध देव, असुर दोनों परस्पर स्पर्द्धा करने लगे - शत • २२५८ ) यही कहा जाता है । यदि देवता और देव शब्द समानार्थक ही होते, तो कहीं ' देवताश्च वा असुराश्च ' यह भी उल्लेख रहता । परन्तु ब्राह्मण-ग्रन्थमात्र में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं मिलता । अतः हम यश्य ही इन दोनों को विभिन्नार्थक मानते हैं । अपिच ईश्वर के अंशभूत हम जीवों में स्ययम्भू के विभिन्न जातीय ' वसिष्ठ, भृगु अङ्गिरा, अत्रि दि १२ ऋषिप्राण हैं | परमेष्ठी के अग्निष्वात्ता, सोमसत् बहिष, त्रादि ७ पितर प्राण हैं । सूर्य्य-मण्डल के वसु, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार आदि: ३ देवप्रारण हैं, चन्द्रमा के द्धारि, बंभारि, आदि २७ गन्वर्वप्राण हैं । पृथिवी के वृत्र, किलात, आकुली, नमुचि, आदि ६६ असुरप्राण हैं । एवं पुरुष ( वैश्वानर ), अश्व, गौं, अत्रि, अवि, अज, ये पाँच प्रवर्ग्य ( अतएव पशु नाम से प्रसिद्ध ) प्राण हैं | द्दन यच्चयायत् प्राणों को लेकर ' मैं ' ( मनुष्य ) खड़ा हुआ हूँ । दूसरे शब्दों में-ईश्वर के शरीर से उद्रिक्त ( अलग छटे हुए ) इन प्राणों की जो राशि ( ढेर ) है - वही मैं हूं । न केवल मैं ( चेतन ) हीं, अपितु उत्पन्न होने वाले चेतनानेचतन जितने भी पदार्थ हैं, सच में ये पदार्थ हैं । हाँ, मात्रा और श्रवयवसन्निवेशक्रम में अवश्य ही अन्तर है । इसीलिए सत्र के उन्हीं प्राणों से उत्पन्न होने पर भी एक दूसरे के स्वरूप में भेद हो जाता है । जो कुछ ईश्वर में है, वह सबकुछ मात्राभेद से हम में भी हैं । वे ही सम्पूर्ण पदार्थ एक तिल में भी है । इसी विज्ञान के आधार पर पूर्व में वाग्विज्ञान बतलाते हुए हमने ‘ सर्वे सर्वार्थत्राचकाः ' यह सिद्धान्त बतलाया है । निम्नलिखित शास्त्रीय वचन भी इसी अर्थ की पुष्टि करते हैं-* १ - ' यदेवेह तदमुत्र यमुत्र तन्विह ' । २ - ‘ योऽहं सोऽसौ, योऽसौ सोऽहम् । ३ – ‘ ईशावास्याभिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । * १ जो कुछ यहाँ, है वही वहाँ है, एवं जो कुछ वहाँ है वही यहाँ है । २ जो मैं हूँ, वही वह है, जो वह है, वही मैं हूँ । ३ इस जगत् में जो कुछ है, सब उस ईश की सत्ता से अक्रान्त है । २५०

पृष्ठ 514

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शतपथब्राह्मणं ४ - ब्रह्म ' वेदं सर्वं नेह नानास्ति 8-किञ्चन ' | ५- ' पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ' । ६ - ' यथाण्डे तथा पिएड़े ' । ७ – ‘ मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय '! ८- ' ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' । इसप्रकार पूर्वोक्त श्रुति स्मृत्ति - वचन से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता किं, ईश्वर के शरीर में जो प्राण हैं, वे सभी प्राण जीव में भी हैं । ईश्वर के शरीर में वे ही ऋषि पितर, असुरादि प्राण हैं । ऐसी अवस्था में हम अवश्य ही इन सभी प्राणों को जीवका प्रारम्भक ( उपादानकारण ) मानते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' - यह कहा जाता है । उत्पन्न होने वाले पदार्थ ( जड़ चेतन उभयविध पदार्थ ) इह्रीं सम्पूर्ण देवताओं से उत्पन्न होते हैं-श्रुति का यही तात्पर्य्य है । इस श्रुति के ' देवताभ्यः ' शब्द की तभी संगति हो सकती है, जबकि देवता शब्द को व्यापक, एवं देवंशब्द को व्याव्य मान लिया जाय । यदि देवता का अर्थ केवल देव ही मान लियां जायगा तो — अंशांशीभाव का प्रतिपादन करने वालीं पूर्वोक्त सभी श्रुतियाँ व्यर्थ प्रमाणित हो जायँगी | अत: ब्राह्मणश्रुति, उपनिषत् - श्रुति, मन्त्रश्रुति, एवं स्मार्त्त, और पौराणिक, इन सभी वचनों के समन्वय के लिए ' देवता ' शब्द को यच्चयावत् प्राणोंका ही वाचक मानना उचित है । जब देवता शब्द को प्राणमात्र का वाचक मान लिया जाता है - तो ' जा ० वै ० जा ० सर्वाभ्यो एताभ्यो ० ए ० दे ० ' - इस श्रुति में, एवं अंश-भाव का प्रतिपादन करने वाले पूर्वोक्त श्रौत - स्मार्त्त - वचनों में कोई विरोध नहीं रहता । अपिच – देवप्राणप्रघान आत्मनिष्ठ आस्तिकवर्ग जैसे देवप्राण की स्तुति, एवं आसुरप्राण की निन्द करता है, एवमेव अर्सुरप्राणप्रधान यवन समुदाय सुरप्राण की स्तुति, एवं देवप्राण की निन्दा करता है । जैसे हम आंसुरप्राण - भावापन्न योनिविशेष के लिए ' अरे यह असुर आया - राक्षस आया ' आदि निन्दा-त्मक वचन बोलां करते हैं, एंवमेव यवन सम्प्रदाय वाले देवभावापन्न योनिविशेष के लिए ' अरे यह देव आया ' आदि निम्दाप्रधान वचनों को व्यवहार में लाया करते हैं । कहना इससे यही है कि, वे देवप्राण की निन्द करते हुए ‘ दे॒व आया ' इसप्रकार देवरांब्द ही बोला करते हैं । उनमें भी ' देव ' शब्द ही व्यवहृत हुआ है । इस परसम्प्रदायसिद्धं व्यवहार को भी ' शक्तिवाहकशिरोमणेर्व्यवहारस्य ' के अनुसार हम हमारी देव, देवताशब्द की विभिन्नता में प्रमाण न माने, इसका कोई कारण नहीं प्रतीत होरहा | · ४ सबकुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है । ब्रह्म से पृथक् करके भिन्न कहने योग्य कोई भी वस्तु नहीं है | ५ वह भी पूर्ण है, यह भी पूर्ण है । उस पूर्ण से यह पूर्ण पृथक् हुआ है । ६ जो स्थिति, जो पदार्थ श्रृण्ड में ( अधिदैवत में ) है, वही इस पिएंड ब्रह्माण्ड ( अध्यात्म ) में है | ७ हे धनंजय! मुझ से ( अव्ययात्मा से - अव्यय नाम से प्रसिद्ध - ईश्वर से ) भिन्न कोई भी वस्तु नहीं है । ८ संसार के जीवमात्र मेरे ही [ ईश्वराव्यय के ही ] अंश हैं । २५१

पृष्ठ 515

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प्रथमकाण्ड अपिच हम अपने व्यवहार में भी इन दोनों सम्पत्तियों के लिए ' दैवी सम्पत्ति ' ' आसुरी सम्पत्ति ' इन नामों को ही प्रधानता देते हैं । हमने कभी भूल से भी दैवीसम्पत्ति के स्थान में ' देवतामयी सम्पत्ति ' नहीं कहा । कहते कैसे, जबकि देवता और देव शब्द विभिन्नार्थक हैं । अपिच देवप्राणप्रधान सूर्य का वर्णन करने वाली मन्त्रश्रुति भी— ' चित्रं देवानामुद्गात् ' ( देवों का का ॐड उदित हुआ - यजुः ७ ४२ ) से देव शब्द को ' ही हमारे सम्मुख रख रही है पिच -' हिरण्मयेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ' – [ यजुः ३३।४३ ] ' अविदाम देवान् स्वज्योंतिः'– [ यजुः सं ० ८५२ ] ' द्वया ह वै देवाः, देवाहवै देवाः ' इत्यादि मन्त्रब्राह्मण तिवचनों से भी उक्त कथन की ही पुष्टि हो रही है | इन्हीं सत्र कारणों को लक्ष्य में रखकर कोष के विरुद्ध हमने ' देवता शब्द दूसरे अर्थ का वाचक है, एवं देवशब्द भिन्न अर्थ को बतलाने वाला है ' यह कहने का साहस किया है, जोकि सर्वथा उचित है । उन ऋषि पितरादि देवताओं में से आज हम अपने पाठकों के सामने देवदेवताओं का ही स्वरूप रखने वाले हैं | ‘ देव भी देवता हैं ' इस सिद्धान्त के अनुसार आगे बतलाये जाने वाले देवस्त्ररूप में यदि हम इन देवों के लिए ' देवता ' शब्द का भी प्रयोग करें, तो इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । शाब्दिक कलह समाप्त हुआ । अत्र लक्ष्य की ओर ही देवदेवता प्रेमियों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । देवताओं का स्वरूप प्राचीनोंनें कैसा समझा है?, उनके मतानुसार देवता कितने प्रकार के हैं?, पहले इस प्राचीन मत का थोड़े शब्दों में निरूपण करने के अनन्तर ही इस विषय में हम अपने स्वतन्त्र विचार प्रकट करेंगे | वैदिक ऋषि, छन्द, देवता, आदि वैदिक पदार्थों के निर्णय के विषय में आजदिन यास्कमुनिप्रणीत ' यास्कनिरुक्त ' का पण्डितसमाज में अधिक आदर है । अत: ओर किसी अन्य प्राचीन मत के संघर्ष में न पड़ कर हम अपने पाठकों का ध्यान निरुक्त में प्रतिपादित देवस्वरूप की ओर ही आकर्षित करना समसामयिक समझते हैं । उसी से अन्य मतों का भी दिग्दर्शन गतार्थ होजायगा । निरुक्त ने १ – पुरुषविध, २ - अपुरुषविध, ३ – उभयविध, ये तीनप्रकार के देवता माने हैं | निरुक्त-भाष्यकार सर्वश्री दुर्गाचार्य्यं ने इन तीनों के निष्कर्ष भूत – १ - पुरुषविध, २ - अपुरुषविध, ३ – सम्मार्थ-उभयत्रिध; ४ - नित्य उभययिध, इसप्रकार से ४ प्रकार के देवता माने हैं । अस्तु, दुर्गाचार्य ने चाहे क्रितने हीं भेद माने हों, प्रकृत में उससे हमारा कोई प्रयोजन नहीं । यहाँ हम केवल मूलग्रन्थ में वर्णित देवतात्रयी का ही स्वरूप बतलावेंगे । जिन तीन देवताओं का पूर्व में उल्लेख किया गया है, उनमें से तीसरे देवता यारकाभिमत हैं, एवं शेष दोनों देवता प्राचीनाभिमत हैं । इन मतवादों के जाने बिना वैज्ञानिकरूप से प्रतिपादित देवविज्ञान के साथ श्रद्धासूत्र का सम्बन्ध नहीं होसकता । अतः अप्राकृत, एवं साथ ही रूक्ष होने पर भी उन प्राचीन मतों के पक्ष - प्रतिपक्षों का दिग्दर्शन करा देना अप्रासङ्गिकं न माना जायगा | यास्कमुनि से पहिले देवताओं के स्वरूप के विषय में दो मत थे । कितने ही विद्वानों का कहना था कि, देवता पुरुषविध हैं । जैसा आकार एक मनुष्य का है, ठीक वैसा ही आकार देवताओं का है, एवं जो २५२

पृष्ठ 516

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शतपथब्राह्मण व्यवस्थाएँ मनुष्यों में हैं, प्राय: वैसी ही व्यवस्थाएँ उनमें हैं । अर्थात् उन का भी मनुष्यों के समान विवाह होता है । पुत्रादि होते हैं । उनमें और मनुष्यों में अन्तर केवल यही है कि, मनुष्यों में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ? मन, इसप्रकार ११ ही इन्द्रियाँ हैं । एवं उनमें मनुष्यों से अधिक ६ तुष्टियाँ, एवं अणिमा महिमादि ८ सिद्धियाँ, ये १६ भाग ओर हैं । इसप्रकार उनमें २८ इन्द्रियाँ होजातीं हैं । इन सिद्धियों का स्वरूप आगे जाकर बतलाया जायगा । उधर कई एक विद्वानों का कहना था कि, देवता पुरुषविध हैं । देवता कभी मनुष्यों के समान आकार वाले नहीं होसकते । इसप्रकार दोनों मतों में परस्पर संघर्ष था । दोनों हीं मतवादी अपनी अपनी पुष्टि के लिए वेदवचन सामने रखते थे । इस संघर्ष को अन्त में यास्क ने - ' अपि वा उभयविधाः स्युः ' कह कर समाप्त किया | इस निर्णय से पहिले होने वाले संघर्ष का क्या स्वरूप था?, दोनों अपने मत की दृढ़ता के लिए किन वचनों का आश्रय लेते थे?, संक्षेपत: हम पहिले पाठकों को अनुरञ्जनार्थ अनुवादरूप से उस प्राचीन प्रपश्च का दिग्दर्शन करा देते हैं । कितने हीं प्राचीन विद्वान् निम्नलिखित पाँच कारण बतलाते हुए ' पुरुषविधाः स्युः ' यह सिद्धान्त स्थापित करते हैं— १ – चेतनायुक्त पुरुषों के समान कितने ही वेदमन्त्र इन देवताओं की स्तुति करते हैं । २ — जैसे चेतनायुक्त मनुष्यों में परस्पर संवाद होता है, एवमेव कितने ही वेदमन्त्र इन देवताओं के पारस्परिक संवाद का निरूपण करते हैं । ३– कितने हीं वेदमन्त्रों से देवताओ के हाथ पैर होना सिद्ध होता है । क्योंकि वे उसी रूप से उनकी स्तुति करते हैं । ४ – पुरुष के उपयोग में आने वाले अश्व रथादि द्रव्यों का देवताओं के साथ संयोग बतलाया जाता है । ५ – पुरुष के समान देवताओं के भोजनादि कर्म्म बतलाए गएहैं 1 वेदमन्त्रों में पूर्वोक्त पाँचों भाव मिलते हैं । इसी आधार पर इन प्राचीनोंने देवताओं को ‘ पुरुष– विध ' बतलाया है । परन्तु दूसरे प्राचार्य्य इसमें सहमत नहीं हैं । उनका कहना है कि, देवता किसी भी प्रकार से ' पुरुषबिध ' नहीं होसकते । इस दूसरे मत के मानने वाले श्राचाय्यनें - पुरुषविध मानने वाले श्राचाय्यों की पाँचों युक्तियों का खण्डन कर अपनी पुष्टि के लिए एक प्रबल युक्ति बतला कर अन्त में ‘ अपुरुषविधाः स्युः ' यही सिद्धान्त स्थापित किया है । इन दोनों मतों के पक्ष - प्रतिपक्षों का स्वरूप निम्न– लिखित है-२५३

पृष्ठ 517

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प्रथमकाण्ड १ – पुरुषविध मानने वाले प्राचीन पहिला कारण बतलाते हुए कहते हैं कि - ' चेतनावद्वद्धि स्तुतयो भवन्ति ' | चेतनायुक्तं पुरुषों की भाँति देवताओं के स्तुतिपरक मन्त्र हैं । अतएव हम देवताओं को पुरुषाकार मानते हैं | ‘ हिरण्मयेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् । सुनहरी रथ पर आरूढ होकर सविता देवता सम्पूर्ण विश्व को देखता हुआ आता है, उदित होता है – यजुः सं ० मन्त्र ४३ | अ ० ३३ | ' अग्निमील पुरोहितम् ' मैं पुरोहित अग्नि की स्तुति करता हूँ - ( ऋक्संहिता ) आदि श्रुति वचन स्पष्ट ही देवताओं की चेतनायुक्त पुरुष के समान स्तुति करते हुए इनकी विग्रहवत्ता सिद्ध कर रहे हैं । १ - इधर पुरुषविध मानने वाले प्राचीन इस प्रथमा युक्ति का खण्डन करते हुए कहते हैं— ' यथो एतच्च तनावद्वद्धि स्तुतयो भवन्ति - इति, अचेतनान्यप्येवं स्तूयन्ते यथात्तंप्रभृतीन्योष-विपर्य्यन्तानि ' ( या ० नि ० ) । इसका तात्पर्य यही है कि - यद्यपि कितने हीं वेदमन्त्र चेतनायुक्त पुरुषों के समान हीं देवताओं की स्तुति करते हैं, किन्तु इसीलिए इन्हें पुरुषविध मान लेना उचित नहीं । यदि चेतनायुक्त स्तुति ही पुरुषाकारता में कारण हो, तत्र तो ‘ ओषधे त्रायस्व ' ( हे ओषधियो! आप यजमान की रक्षा करो, ‘ स्वधिते मैनं हिंसी: ' - ( हे क्षुरिके! तू इसे मत मार ) आदि श्रुतियों के द्वारा सम्बोधित लोहमयी क्षुरिका, और ओषधियाँ भी पुरुषाकार ही मानीं जानीं चाहिएँ? | क्या आप इन स्तुतियों के आधार पर श्रोषध्यादि को पुरुषविध मानने का साहस करसकते हैं? | कदापि नहीं? | अतः देवता पुरुषविध ही हैं । २- पुरुषविध मानने वाले दूसरा कारण बतलाते हुए - ' तथाभिधानानि ' ( या ० नि ० ) यह सूत्र सामने रखते हैं । इसका तात्पर्य्य यही है कि, वेद में कितने हीं सूक्कों में परस्पर देवताओं का संवाद है | एक देवता दूसरे देवता को सम्बोधन करके कह रहा है । ऐसे सूक ' संवादसूक्त ' नाम से प्रसिद्ध हैं | क्योंकि बेद देवताओं का परस्पर संवाद होना बटलाता है । एवं यह संवाद अपुरुषविध मानने पर नहीं बन सकता | इसलिए भी हम देवताओं को पुरुपविध मानते हैं । २ - इस संवाद - सम्बन्धी हेतु को भी हेत्वाभास बनाया जासकता है । संवाद के आधार पर ही यद्वि देवताओं को पुरुषविध मान लिया जाय, तब तो दो पिप्पलों को भी पुरुषविध मानना पड़ेगा । जैसाकि

अथर्व श्रुति कहती है -पिप्पल्यः संमवदन्तायतीर्जीवनादधि ।

यं जीवमश्नवाम है न स रिष्याति पूरुषः ॥

अथर्वसं ० ६।१०६ | २ | पिप्पल दो प्रकार की होती है । छोटी पीपल क्षुद्र पीपल है । बड़ी पीपल प्रायती है । इसी को ' गजपीपल ' कहते हैं । ऐसी दो गजपीपल परस्पर एक दूसरी से कहती है कि, जिस समय शिशु उत्पन्न होता है, उसी समय सबसे पहिले हमारे में से किसी एक को घिस कर माता के स्तन पर लगा कर पहिली- जन्म-घुटी यदि हमारी दे दी जाय, तो १०० वर्ष पर्य्यन्त वह कभी रुग्ण नहीं हो सकता । पूर्वमन्त्र का यही तात्पर्य्य है । यहाँ पर इससे हमें केवल यही कहना है कि, यह श्रुति दो पीपलियों का परस्पर संवाद बतला रही है । २५४

पृष्ठ 518

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 518 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण क्या इस संवादभाषा से इन पीपलियों को कोई बुद्धिमान् पुरुषविध मान सकता है?, कदापि नहीं । अतः देवताओं को पुरुषविध ही समझना चाहिए । ३ - ' पुरुषविधाः स्युः ' कहने वाले प्राचीन तीसरा हेतु बतलाते हुए कहते हैं— -' अथापि पौरुषविधिकैरङ्ग: संस्तूयन्ते ' – ( या ० नि ० ) इति । निम्नलिखित श्रुतिवचन पुरुषों के समान देवताओं के भी हाथ पैरों का होना बतलाता है । ' ऋष्यात इन्द्र स्थविरस्थ बाहू ' ( ऋकू ० सं ० ४ | ७ | ३१ | ३ ) यह मन्त्र इन्द्रदेवता को हस्तयुक्त बतलाता है । यह तभी संभव है, जबकि - देवताओं को पुरुषाकार मान लिया जाय । ३- इस तीसरे तर्क को काटते हुए पुरुषविध मानने वाले प्राचीन कहते हैं कि, निम्नलिखित मन्त्र के द्वारा आपका यह तीसरा हेतु भी कट जाता है । वह मन्त्र यह है—

एते वदन्ति शतवत् सहस्रवदभिक्रन्दन्ति हरितेमिरासभिः ।

विष्वी ग्रावाणः सुकृतः सुकृत्यया होतुश्चित् पूर्वे हविरद्य माशत ॥

- ऋक् ० सं ० ८ | ४ | ०६२ इति ॥

इष्टि, पशु, सोम, भेद से यज्ञ तीन प्रकार के होते हैं । इन तीनों में जो तीसरा सोमयज्ञ है, उसी को ज्योतिष्टोम कहते हैं । इस यज्ञ में प्रधानरूप से ' सोमरस ' की आहुति होती है । अतएव इसे सोमयज्ञ केहा जाता है | जैसे इष्टिवेदि हविर्वेदि नाम से व्यवहृत होती है, एवमेव यह सोमवेदि महावेदि कहलाती है । हविर्वेदि का आहवनीयकुण्ड इस महावेदि का गार्हपत्य बन जाता है । इसके आगे ' सदोमण्डप ' होता. है । इसमें ६ धिष्ण्य अग्नि रहते हैं । एवं मार्जालीय नाम का ७ वीं धिष्ण्य दक्षिण भाग में रहता है, एवं आग्नीध्रीय नाम का ८ वां धिष्ण्य उत्तरभाग में प्रतिष्ठित रहता है । इसके अनन्तर है हविर्द्धानमण्डप | इस मण्डप में पूर्वाभिमुख दो शकट रक्खे जाते हैं । यज्ञार्थ आई हुई सोमवल्ली इह्रीं शकटों पर रक्खी रहती है । हविर्द्धान के आगे ( पूर्व में ) उत्तरावेदि है । उसके मध्य में आहवनीय है । आहवनीय के आगे २१ पर यूप है । हविर्वेदि के गार्हपत्य से प्रारम्भ कर इस ग्रूप पर्य्यन्त महावेदि का स्वरूप वितत हो रहा है | इस महावेदि के भीतर सदोमण्डप से पूर्वभाग में स्थित जो हविर्द्धानमण्डप है, उसमें दो छकड़ों की स्थिति बतलाई है । इनमें से दक्षिण शकट के दक्षिणभाग में चार ग ( खड्ड े ) होते हैं । इन चारों को वैदिकपरिभाषा में ‘ उपरव ' कहा जाता है । इन चारों पर ' उपांशुसवन ' नाम से प्रसिद्ध पत्थर की विशाल शिला रक्खी जाती है । एवं उस पर ग्रावाओं से ( पाषाणमयी लोढियों से ) सोमवल्ली को कूट कर उसका इस निकाला जाता है । एवं निकाल निकाल कर समीप में ही रक्खे हुए द्रोणकलश में उसे भर दिया जाता है । कहना इस प्रपञ्च से प्रकृत में यही है कि, जिस समय ऋत्विग्गण सोमरम कूटने लगते हैं, उस समय उन पत्थरों की ऐसी ं गूंज होती है, जैसेकि सैंकड़ों हजारों आदमी एकसाथ मिलकर किसी का आह्वान कर रहे हों । इस गूँज का प्रधान कारण वे ही चार उपरव ( खड्ड े ) हैं, जिन पर कि शिला रक्खी हुई है । खोमरस हरित होता है । अतः सम्पूर्ण पत्थर हरित होजाता है । आहुति से भी पहिले इस हरित सोमरस २५५

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 519 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड का सम्बन्ध इन पाषाओं से ही होता है । पूर्व मन्त्र में इसी स्थिति का वर्णन हुआ हैं । मन्त्र का तात्पर्य्यार्थ यही है कि, जैसे सौ २ हजार २ मनुष्य एक साथ मिलकर किसी का आह्वान करते हैं, एवमेव अपने हरितमुग्वों से ये ग्रावागण सोमपान करने वाले देवताओं को ' हे देवताओ! आप इस यज्ञ में पधारिए! एवं सोमपान कीजिए '! इस रूप से बुला रहे हैं । एवं ये ग्रावागरण साधुकर्म्म करने वाले होता ( अग्नि ) से भी पहिले ही सोमरूप हवि को खा रहे हैं । इसप्रकार वदन्ति, अभिक्रन्दन्ति, रात ( अश्नन्ति ), इत्यादि क्रियापद पाषाणों के भी इन्द्रियों की सत्ता बतला रहे हैं । एवं शृणोतु ग्रावाण: ' ( हे ग्रावागणों आप हमारी भी सुनिए ) से स्पष्ट ही इन्हें श्रोत्रेन्द्रिययुक्त बतलाया जा रहा है । ऐसी अवस्था में -वर्णनपरक वेदमन्त्रों के द्वारा देवताओं की पुरुषाकारता कथमपि सिद्ध नहीं की जासकती । ४- पुरुषविध मानने वाले चौथा हेतु साथ पुरुत्रों के काम में आने वाले द्रव्यों का डालिए । बतलाते हुए कहते हैं कि, कितने ही वेदमन्त्र देवताओं के संयोग बतलाते हैं । उदाहरणार्थ नीचे लिखे मन्त्र पर दृष्टि

द्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र याह्या चतुभिराषभिहूयमानः ।

अष्टाभिर्दशभिः सोमपेयमयं सुतः सुमखमामृथम्कः ॥

—ऋक् सं ० २ / ६२१।४ इति । हे इन्द्र! आप इस सोमपानकर्म्म के प्रति, अर्थात् सोमपान करने के लिए दो घोड़ों के, चार घोड़ों के, ६ घोड़ों के, आठ घोड़ों के, दश घोड़ों के रथ पर सवार होकर बुलाए हुए अतिशीघ्र इस यज्ञ में पधा-रिए | हे सुमख इन्द्र! यह सुत सोम आपकी प्रतीक्षा कर रहा है । अतः बिना किसी विलम्ब के शीघ्र ही पधार आइए । अन्य भी सैंकड़ों मन्त्र ऐसे हैं, जिन से स्पष्ट ही देवताओं के साथ पुरुषोपयोगी द्रव्यों का संयोग सिद्ध होता है | यह तभी संभव हो सकता है, जब कि देवताओं को पुरुषविध मानलिया जाय । पुरुषविध मानने वाले प्राचीन कहते तब तो - सिन्धुनद आदि नद नदियों ही -४- इस चौथे हेतुवाद का भी आमूलचूड़ खण्डन करते हुए हैं कि, यदि केवल द्रव्यसंयोग ही देवताओं की पुरुषाकारता में कारण है, को भी आपको ( पुरुषविधवादियों को ) पुरुषाकार मानना पड़ेगा । ऋग्वेद में ' सुखं रथं युयुजे सिन्धुरश्विनम् ' – ( ऋक् सं ० ८ | ३ | ८ | ४ ) ( यह सिन्धुनद पानी के रथ पर आरुढ हो चारों ओर दौड़ लगाता हुआ अन्न उत्पन्न करता है ) इत्यादि मन्त्र सिन्धुनद के साथ रथ का सम्बन्ध बतलाते हैं । क्या इस तादृश द्रव्यसंयोगमात्र से ही इस नद को कोई विद्वान् पुरुषकार मान सकता है? कदापि नहीं । अतः यह चौथा कारण भी अकारण ही बन जाता है । एवं अन्त में हमारा ' अपुरुषत्रिधाः स्युः ' यही सिद्धान्त स्थिर हो जाता है । ५- अन्तिम हेतु बतलाते हुए पुरुषविधवादी ' अथापि पौरुषविधिकैः कम्मभिः ' इसी सूत्र को हमारे सामने रखते हैं । उनका कहना है कि-" अद्धीन्द्र पिब च प्रस्थितस्य श्रुत् कर्णश्र ुधी हव ' २५६

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शतपथब्राह्मण ( हे इन्द्र! आप हवि भक्षण कीजिए, सोमपान कीजिए - ऋ ० ८।६।२१।२ ) । इत्यादि मन्त्र देव– तात्रों को कर्म्मयुक्त बतलाते हैं । इन मन्त्रों का श्रद्धि, पित्र, इत्यादि कथन तभी चरितार्थ होसकता है, जबकि देवताओं को पुरुषविध मान लिया जाय । ५- परन्तु पुरुषविधवादी-' यथोएतत् पौरुषविधिकैः कर्म्मभिरित्येतदपि तादृशमेव ' कहते हुए उस पाँचवें तर्क को भी निस्सार प्रमाणित कर देते हैं । ' एते वदन्ति शतत्रत् सहस्रवत्'-इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्र के – ‘ होतुश्चित् पूर्वे हविरद्यमाशत ' इस अंशका स्मरण कराते हुए यह पुरुषविधवादी कहते हैं कि ऋद्धि, पिच, आदि क्रियाओं को देख कर ही यदि देवताओं को पुरुषविध माना जाता है, तत्र तो ग्रावाओं को भी पुरुषविध मानना चाहिए | परन्तु ग्रावाओं को पुरुषकर्म से युक्त होने पर भी कोई पुरुषविध नही मानता । ऐसी अवस्था में ऐसे ऐसे हेत्वाभासों के द्वारा पुरुषविध मानने का साहस कदापि सफल नहीं हो सकता । इसप्रकार पुरुषविध मानने वालों के पांचों हेतुवाद पुरुषविध मानने वाले प्राचीनों के द्वारा काट दिए जाते हैं । इन हेतुवादों को काट कर अन्त में प्रत्यक्ष दृष्ट स्थिति को सामने रखते हुए पुरुषविध-वादी कहते हैं— अपितु यद् - दृश्यतेऽपुरुषविधं तद्यथाग्निर्वायुरादित्यः पृथ्वी चन्द्रमा इति -या ० नि ० । इस कथन का तात्पर्य्यं यही है कि, जबकि आपके ( पुरुषविध मानने वालों के ) बतलाए हुए पाँचों हेतु कट जाते हैं, तो ऐसी अवस्था में देवतओं को पुरुषविध कथमपि नहीं माना जासकता । क्योंकि पृथिवी, चन्द्रमा, सूर्य्य, अग्नि, वायु आदि देवता हैं । एवं प्रत्यक्षदृष्ट इन देवताओं को हम पुरुषविध ही पाते हैं । क्या पृथिवी, चन्द्रमा, सूर्य्य, अग्नि, आदि का हमारे जैसा आकार है? । जबकि इन प्रत्यक्षदृष्ट देव– तात्रों को हम अपुरुषविध देखते हैं, एवं पुरुषविध - सम्बन्धी वेदवचनों का अन्यथा समन्वय हो जाता है, तो ऐसी अवस्था में कदापि देवताओं को पुरुषविध नहीं माना जासकता । इसप्रकार यास्कमुनि से पहिले ये ही पूर्वोक्त दो मत प्रचलित थे । इन दोनों के विषय में अपना मत प्रकट करते हुए यास्कने- ' अपि वा उभयविधाः स्युः ' यह सिद्धान्त्र स्थापित किया है । यास्कमुनि का अभिप्राय यही विदित होता है कि, जबकि दोनों मतों के ही अनुकूल वेदवचन मिलते हैं, तो ऐसी अवस्था में दोनों में से किसी एक विभाग को प्रधान मान लेना, एवं अन्य को गौण मान लेना उचित प्रतीत नहीं होता । दोनों हीं वचन प्रामाणिक हैं । ऐसी अवस्था में देवता पुरुषविध भी हैं, अपुरुषविध भी हैं, यही सिद्धान्त निकलता है । कितने हीं देवता तो सचमुच पुरुषविध ही हैं । एवं कितने ही देवता अपुरुषविध ही हैं — जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा । यास्कमुनि इन दो विभागों पर ही संतुष्ट नहीं होते । अतएव वे आगे जाकर कहते हैं— २५७