Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 61–70

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 61–70

पृष्ठ 61

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 61 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड इस ब्रह्माग्नि का प्राण - महिमात्मक - प्रथम - ब्रह्माग्निवेद ही पहिला ' प्राकृतवेद ' है, जिसे ब्रह्माग्नि के सम्बन्ध से ही - ' ब्रह्मनिःश्वसितवेद ' कहा गया है । [ १ ] आगे चलिए । दूसरा क्रमप्राप्त यद्यपि देवाग्नि है । तदपि ब्रह्माग्नि, और देवाग्नि इन दोनों के मध्य में दोनों सोमों में से ' ब्रह्मणस्पति ' नामक - ' पवमान ' सोम की प्रतिष्ठा है, जो कि ' ऋत ' कहलाया है । ब्रह्माग्नि के अनन्तर ही इस ब्राह्मणस्पत्य - पवमान - सोम का स्थान आ जाता है । इसी से विश्व के द्वितीय ‘ परमेष्ठी ' नामक ऋतपर्व की ( २ ) स्वरूपाभिव्यक्ति हुई है । इस पारमेष्ठ्य ऋतसोम से अनुप्रा-णित ‘ सोमवेद ' ही - ‘ ब्रह्मस्वेदवेद ' [ देखिए गो ० ० [ १ १ १ ] कहलाया है । ओर आगे चलिए । तीसरा स्थान क्रमप्राप्त देवाग्नि का है । इस देवाग्नि से ही विश्व के तृतीय-पर्वात्मक देवघन ( ३ ) भगवान् सूर्य्यनारायण का स्वरूपाविर्भाव हुआ है । प्रतिफलित- सौर देवाग्नितेज का ही नाम - ' गायत्री ' है । अतएव तद्रूप - देवाग्निमय तीसरा यह अग्निवेद - ' गायत्री मात्रिकवेद ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । यही तीसरा प्राकृत वेद है । तदनन्तर देवाग्नि, तथा तीसरे भूताग्नि के मध्य में दूसरे वृत्रसोमात्मक अन्नस्रोम का स्थान ग्राता है । तदनुबन्धी यह द्वितीय वृत्रसोम ही विश्व के चतुर्थ - [ दृष्टि की अपेक्षा से । क्योंकि स्थितिदृष्ट्या तो निधनसामात्मक – भूपिण्डोपग्रहभूत चन्द्रमा का स्थान पाँचवाँ हीं माना गया है ] ' चन्द्रमा ' नामक वृत्रपर्व ( ४ ) का स्वरूप - निर्माण हुआ है । तदनुबन्धी सोमवेद ही चौथा - ' अथर्ववेद ' है, जिसे सोम - साजात्य से– ' सुव्रह्म ' भी कहा गया है, अतएव चान्द्रीवाक्- ' सुब्रण्याकाकू ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । अत्र शेष रह जाता ( १ ) - एवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतत् । ग्रस्यैवैतानि सर्वाणि निःश्वसितानि ॥ ---- बृहदारण्यकोपनिबत्

( २ ) - तमेव परमेष्ठी ऋतं नात्येति किश्चन ।

ऋते समुद्र ग्राहित ऋते भूमिरियं श्रिता ॥

—गोपथब्राह्मणे ( ३ ) - चित्रं देवानामुद्गादनीकं चक्षुम्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः । आ प्राद्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥! ( ४ ) -यथैष एव वृत्रः, यच्चन्द्रमाः । - शत ० १ | ६ | ४ | १३ | – यजुः संहिता १३ | ४६ । ५७

पृष्ठ 62

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 62 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रमनिवेदन है — तीसरा भूताग्नि । इसी से विश्व के पाँचवें भूपिण्डात्मक पर्व का स्वरूप -- निर्माण हुआ है | यही भूताग्नि-पांचवें – अग्निवेद का स्वरूप - संग्राहक बन रहा है, जो कि यह पार्थिव भूताग्निप्रधान वेद विश्व के शेष चारों पर्वों के रसों का यजनाधार - बनता हुआ - ' यज्ञवेद ' नाम से प्रसिद्ध है | अतएव इस पञ्चम वेदविवर्त्त ' को-' यज्ञमात्रिकवेद ' कहा गया है । तदित्थं तीन अग्निवेद, दो- सोमवेद, इन पाँच प्राकृतवेदों से ही क्रमशः शब्द - स्पर्श - रूप - रस - गन्ध - नाम के पञ्चतन्मात्रा - रूप- गुणभूतों के माध्यम से पञ्चपर्वा विश्व -- का स्वरूपावि-र्भाव हुआ है, जैसा कि राजर्षि की विज्ञानपूर्णा इस सूक्ति से स्पष्ट है—

शब्दः - स्पर्शश्च, रूपं च, रसो गन्धश्च पञ्चमः ।

वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्म्मतः ॥

—मनुः १२ | ६८. सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । दश - देभ्य * एवादौ पृथक - संस्थाश्च निर्ममे । -मनुः १।२१ । नाम - रूप - कर्म्मात्मिका - पृथक् - पृथक्- - पाँच - को जन्म देने वाला, क्षरनिबन्धना व्यक्ता-विश्वसंस्थानों बहिरङ्गप्रकृति के सुप्रसिद्ध प्राणः आपः - वाक्- अन्नम् - अन्नादः नांमक पाँच क्षरविवत्तों से समन्वित, विश्वा-तीत - विश्वात्मा - अनन्त - अव्ययपुरुष से भिन्न. सच्चिदानन्दमूर्ति अनन्त पुरुषवेद के आधार पर प्रतिष्ठित, अभिव्यक्त, अग्नित्रयी, तथा सोमद्वयी के भेद से पञ्च महिमाभावों में विभक्त, पञ्चपर्वा विश्व का मूलसर्जक. प्राकृत - विश्ववेद अपने तथोक्त चिरन्तन - इतिवृत्त ही का स्पष्टी करण कर रहा है । प्रकृत में उभयवेदात्मिका एक तालिकामात्र ही उद्धृत कर देते हैं, जिस से अनन्त - पुरुषवेद, तथा प्राकृतवेद, दोनों के स्वरूप - चिन्तकों को एक रूपरेखा – उपलब्ध होसकेगी । # –स्मरण रहे, ‘ वेदशब्देभ्यः ' का अर्थ यहाँ स्पष्ट ही पञ्चतन्मात्राओं की आदिमता वह ' शब्दतन्मात्रा ' ही है, जिसे - ' सत्यावाक् ' कहा गया है, एवं जिस के आधार पर ' वाग्विवृतांश्च वेदाः ' प्रसिद्ध है । मनुं के १२६ लोक से यही तथ्य स्पष्ट होरहा है ।

पृष्ठ 63

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 63 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

* - निष्कलः - अखण्डः - एककलो वा - परात्परः १- श्रानन्दः २ - विज्ञानम् ३- मनः ४- प्राणः ५- वाकू १ - अमृतब्रह्मा २ - अमृत विष्णुः ३- अमृतेन्द्रः ४- श्रभृतसोमः ५- अमृताग्निः १- मर्त्यब्रह्मा २ - मर्त्यविष्णुः ३ - मर्त्येन्द्रः ४- मर्त्यसोमः ५- मर्त्याग्निः - श्रात्मक्षरः : पञ्चकल पुरुषः ३४ प्रथमः - श्रक्षरः पञ्चकलः - पुरुषः : मध्यम अपराप्रकृतिः ( ३ ) --- श्रव्ययः पञ्चकलः पुरुषः उत्तमः पराप्रकृतिः ( २ ) पुरुष: ( १ ) - विश्वेश्वरः - षोडशकलः विश्वात्मा पुरुषात्मकः - पुरुषात्मा त्रिपुरुष – अनन्तः -- अकलः अन्तरङ्गप्रकृतिविशिष्टः अव्ययरूपेण सोऽयमनन्तः पुरुषवेदः सच्चिदानन्दमूर्त्तिः

पृष्ठ 64

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 64 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आत्मनिवेदन सोऽयं पञ्च -- महिमात्मकः प्राकृतः - विश्वेदः - ' सर्व ' वेदात् प्रसिद्धयति ' १ - प्राणः -- प्रकृतिः [ ऋषिप्राणमयी ] — ब्रह्माग्निः – सत्यभावः – प्रथमोऽग्निः २ - श्रापः - प्रकृतिः [ पितृप्राणमयी ] – पवमान सोमः — ऋतभावः - प्रथमः सोमः ३- वाक् प्रकृतिः [ देवप्राणमयी [ – देवाग्निः - सत्यभावः – द्वितीयोऽग्निः ४ – अन्नं - प्रकृतिः [ पशव्यप्राणमयी ] — वृत्रसोमः — ऋतभावः— द्वितीयः सोमः ५- अन्नादः - प्रकृतिः [ भूतप्राणमयी ] भूताग्निः सत्यभावः तृतीयोऽग्निः १ - ब्रह्माग्निः - प्रथमः - तदनुगतः - प्राणमूर्त्तिः - ‘ स्वयम्भूः ' विश्वस्य - प्रथमं पर्व २ - पवमानसोमः - द्वितीयः - तदनुगतः - आपोमूर्त्तिः - ‘ परमेष्ठी ’ - द्वितीयं पर्व ३ – देवाग्निः - तृतीयः - तदनुगतः - वाङ मूर्तिः - ‘ सूर्य्यः’- - तृतीयं पर्व " ४ - वृत्रसोनः - चतुर्थः - तदनुगतः - ग्रन्नमूर्त्तिः - चन्द्रमाः ’ " - चतुर्थ - पर्व ५ - भूताग्निः - पञ्चमः - तदनुगतः - अन्नादमूर्त्तिः - ‘ भूपिण्डः ' ं,, -पञ्चमं पर्व १ – स्वायम्भुवाग्निवेदः-- ब्रह्मनिश्वसितवेदः ऋषिवेदः २ - पारमेष्ठ्य सोमवेदः— ब्रह्मस्वेद वेदः -- पितृवेदः ३ – सौराग्निवेदः ——— गायत्रीमात्रिक वेदः - देववेदः ४ - चान्द्रसोमवेदः —-- सुब्रह्मवेदः ——— अथर्ववेदः ५– पार्थिवाग्निवेदः – यज्ञमात्रिकवेदः — भूतवेदः ६० वेदभावाः – पञ्च पर्वभावाः -पञ्च प्रकृतिभावाः -पञ्च

पृष्ठ 65

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 65 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड शब्दात्मक – पौरुषेय - वेदशास्त्र में उक्त ' तत्त्वात्मक अपौरुषेयवेद ' का ही स्वरूपोपबृ ंहण हुआ है । शब्दात्मक वेदग्रन्थ को ही ईश्वर का निःश्वासभूत - पौरुषेय वेद मानने वाले - मनवाने वाले विद्वानों से क्या प्रणतभाव से यह सम्प्रश्न नहीं किया जासकता कि क्या वेद की इन पुस्तकों से प्रजापति - ईश्वर ने शब्द - रूप - रस - गन्धादि पञ्चतन्मात्राएँ उत्पन्न कीं हैं?, क्या वेदग्रन्थों से पञ्चपर्वा विश्व के संस्थाविभागों का पृथक् - पृथक् स्वरूप – निर्माण हुआ है? । अत्यन्त आश्चर्य है हमें विद्वत्प्रज्ञा पर, जो वेदशास्त्र में स्पष्ट—-तमरूपेण - उपबर्णित तात्त्विक - वेद के स्वरूप के समन्वय से विगत अनेक शताब्दियों से कैसे, और क्यों तटस्थ ही बनती रही है, जिसकी इस तटस्थता से ही वेदतत्त्व से समन्वित भारतराष्ट्र जैसे कृष्णमृगाग्निदेश में भी वेदविरुद्ध अनेक वैसे मतवाद विभूत - तिरोभूत होते रहे विगत तीन सहस्र - वर्षों में, जिन मतवादों से वेद-तत्त्वमूला - आचारात्मिका कर्त्तव्यकर्म्मनिष्ठा सर्वथैव अभिभूत होगई, जिस इस अभिभूति ने ही भारतराष्ट्र को तीन सहस्र वर्षों से आत्मदास, डेढ सहस्रवर्षों से बुद्धिदास, एवं अनुमानत: १३ सौ वर्षों से मनः - शरीर - दास-त्त्वेन -- सर्वदास ही बनाए रक्खा है, जिस इत्थंभूता सर्वदासता से आज के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भारतराष्ट्रने भी. मुक्तिलाभ नहीं किया है अपनी मूलसंस्कृति, आत्मसाम्य, प्रकृतिभेदभिन्न- सनातन - - धर्म - के प्रति मतवाद-भ्रान्ति से निरपेक्ष ही बन जाने के कारण । “ भले ही शास्त्रवचनों का अंशतः भी पारिभाषिक - समन्वय हम न कर सकें । किन्तु हमें - ' शब्द-प्रमाण ' अवश्य ही अपेक्षित है ", यह सहज मनोवृत्ति केवल शब्दभक्त, किन्तु तच्चिरन्तन - ज्ञान विज्ञानात्मक-पारिभाषिक – समन्वय - से एकान्ततः तटस्थ हमारे राष्ट्र के शास्त्रभक्त विद्वानों की । अतएव सत्र कुछ हृदयङ्गम कर लेने पर भी, यथार्थता से सर्वात्मना अपने अन्तर्जगत् में ( सम्भवतः - अनुमानतः ) सम-न्वित होजाने पर भी अपने अन्तर्जगत् में ( सम्भवतः - अनुमानतः ) समन्वित होजाने पर भी अपने पाण्डि-त्यातिमान के संरक्षण के लिए प्राय: -- ' क्या प्रमाण? ' इस हेतुक - प्रश्न की ही अर्गला लगा देने में अपना प्रज्ञा - पौरुष परिसमाप्त कर लेते हैं । अतएव हम नहीं चाहते कि, ज्ञान - विज्ञानात्मक - अर्थ - समन्वय से पराङमुख, ऐसी सर्वथा शून्या प्रमाणभक्ति का हम अत्र समावेश करें । क्योंकि प्रमाण उनके लिए ही प्रमाण बना करते हैं, जो तत्त्वसमन्वय के प्रति आस्था - श्रद्धापूर्णा सम्प्रश्नात्मिका ( प्रश्नात्मिका नहीं ) जिज्ञासा * रखते हैं । वैसे श्रद्धालु जिज्ञासुवर्ग की जिज्ञासा की उपशान्ति के लिए हम अत्र कुछ एक वैसे प्रमाणवचन मूलरूपेणैव उद्धृत कर देते हैं, जिनके माध्यम से प्रज्ञाशील तत्त्वचिन्तक पाठक अवश्य ही पूर्वनिर्द्दिष्ट तत्त्ववेद के प्रति आकर्षित होसकेंगे — ( १ ) - सप्तपुरुषपुरुषात्मकः स्वायम्भुव - ऋषिप्राणमूर्त्तिः - ब्रह्मनिःश्वसित-वेदः - प्रतिष्ठा सर्वेषाम् -सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत -- भूयान्त्स्यां प्रजायेय - इति । सोऽश्राम्यत्, स तपोऽतप्यत । स श्रान्तस्तेपानो ' ब्रह्म ' एव प्रथममसृजत - ' त्रयीमेव विद्याम् ' । सैवास्मै

* - यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।

यो देवानां नामधा एक एव तं ' सम्प्रश्नं ' भुवना यन्त्यन्या ॥

—ऋक्सं ० १० ८२ | ३ | ६१

पृष्ठ 66

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 66 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रात्मनिवेदन प्रतिष्ठाऽभवत् । तस्मादाहु: - ' ब्रह्म ' ( त्रयीविद्या ) अस्य सर्वस्य ( विश्वस्य ) प्रतिष्ठा । प्रतिष्ठा ह्य ेषा, यद् - ब्रह्म ( ब्रह्माग्निमयः - स्वायम्भुवो वेद: ) । - शत ० ब्रा ० ६ | ४ | ११ | ( २ ) -मृग्वङ्गिरोमयः - वेदत्रयीगर्मितःपारमेष्ठ्य- पितृप्राणमूर्त्तिः - ब्रह्मस्वे-दवेद: -—

आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वांङ्गरोमयम् ।

अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥

— गोपथब्राह्मणे तस्यां प्रतिष्ठायां ( ब्रह्माग्निवेदप्रतिष्ठायां ) प्रतिष्ठितोऽतप्यत ( स्वयम्भूः ) । सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोत्, यदिदं किञ्च । यदाप्नोत् तस्मादापः । यदवृणोत् तस्माद्वाः । सोऽनया त्रय्या विद्यया ( ब्रह्म । ग्निवेदेन ) सह - अपः प्राविशत् । तत आण्डं समवत्तत I - शत ० त्रा ० ६ । १.१६,१०१ ( ३ ) -सावित्र गायत्रतेजोमयः - सौर - गायत्रीमात्रिकवेद: -- देवाग्निरूपः-प्रथमजः तत् - अभ्यमृशत् । ततः – ‘ त्रह्म ' एव प्रथममसृज्यत - ' त्रयी - एव विद्या ' । तस्मादाहुः-‘ ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रथमजम्’- इति । अपि ह तस्मात् पुरुषात् ( प्रतिष्ठात्मक ब्रह्माग्निवेदमय-स्वयम्भुप्रजापतेः ) ब्रह्म ैव ं ( देवाग्निवेद एव ) पूर्वमसृज्यत । शत ० ब्रा ० ६।१।१।१०,११, ( ४ ) -- वृत्रसाममयः- भास्वरः- सुब्रह्मात्मकः चान्द्रवेद: - ( अथर्व:) -कालेऽयमथर्वा देवः ( अथर्वसं ० कालसूक्त ) | अथर्वणां चन्द्रमा दैवतम् । तदेव ज्योतिः । सर्वाणि छन्दांसि - आपः स्थानम् । —गोपथब्रा ० पू ० ११२६ । ( ५ ) - भूताग्निमयः पार्थिवः यज्ञमात्रिकवेदः -अद्भ्यः पृथिवी ( उपनिषत् ) । तद्यत् - श्रपां - शर - आसीत्, तत्पृथिव्यभवत् । तस्यां ( पार्थिवप्रजापतिः ) श्राम्यत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजोरसो ( प्राणरसो ) ६२

पृष्ठ 67

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 67 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड निरवचताग्निः । स त्रेधात्मानं ( अग्नि ) व्यकुरुत - आदित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् । स एष प्राण: [ पार्थिवप्राणाग्निः ] त्रेधा विहितः । स ' भाग ' [ वाग्निः ] अभवत् । स तया वाचा सर्वमसृजत यदिदं सामानि । सोऽकामयत - ' भूयसा यज्ञेन भूयो यजेय ' इति । - शत ० १०/३ ५ ब्राह्मण । अन्यदपि शत ० वा ० ११।५ ८ । ब्राह्मण द्रष्टव्य श्रकरोत् । सैव वाक् किश्च ऋचः, -यजूंषि, प्रमाणजिज्ञासा के पूरक उक्त पञ्च -प्रमाण प्राकृत वेदपञ्चक का ही स्वरूप - विश्लेषण कर रहे हैं । पाँचवें पार्थिव - यज्ञमात्रिक — भूताग्नि- प्रधान वेद के पार्थिव त्रिवृत्स्तोमानुगत अग्नि -- सहचारी ऋग्वेद्, पार्थिव पञ्चदशस्तोमानुगत -- वायुसहचारी यजुर्वेद, एवं पार्थिव - एकविंश स्तोमानुगत आदित्यसहचारी सामवेद, इन तीनों वेदों का ही यज्ञानुगतत्त्व राजर्षि के निम्न लिखित वचन से भी समन्वय होरहा है-अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम् । दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम् ॥ -मनुः श्रन्यच्च - हमारा पुराणशास्त्र भगवान् सूर्य्यनारायण की - त्रयीमयाय ' त्रिगुणात्मने नमः ' रूप से स्तुति कर रहा है । क्या वेदग्रन्थों का नाम त्रयीवेदमूर्ति सूर्य्य है? | इसी सौर - गायत्रीमात्रिक - तत्त्ववेद का उक्थ - व्रत - पुरुष - नाम की अत्यन्त रहस्यपूर्णा परिभाषाओं के माध्यम से स्वयं श्रु तिने भी विस्पष्ट शब्दों में सूर्य्य का वेदत्त्व अभिव्यक्त किया है । लक्ष्य बनाइए निम्नलिखित श्रुतिवचन को, एवं तदाधाररेण व अपनी ग्रन्थात्मिका वेदधारणा का, एवं तदनुगता सर्वथा भ्रान्तिपूर्णा वेदापौरुषेयता का निराकरण कर लीजिए! यदेतन्मण्डल ं तपति, तन्महदुक्थं, ता ऋचः । स ऋचां लोकः । अथ यदे-तदचिर्दीप्यते तन्महाव्रतम् । तानि सामानि । स साम्नां लोकः । अथ य एष एतस्मिन् -मण्डले पुरुषः, सो अग्निः । तानि यजूपिं । स यजुषां लोकः । सैषा त्रय्येव विद्या त-पति । तद्धैतत् - अपि - श्रविद्वांस आहु: - ' त्रयी वा एषा विद्या तपति ' इति । - शत ० ब्रा ० १०१५ ६ १,२ श्रुति का - ' तद्धैौ तत् ० ' इत्यादि उपसंहारवाक्य हमारी आज की तत्त्वशून्या, ज्ञानविज्ञानवञ्चिता दुरवस्था का नग्नचित्र ही उपस्थित कर रहा है । भूतानुवन्धिनी ऐतिहासिक - कालमर्यादा का समादर करते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि, शतपथब्राह्मण का सम्पादन भगवान् याज्ञवल्क्य के मेधावी शिष्य मधुश्रवा के द्वारा आज से न्यूनतम पाँच सहस्र वर्ष पूर्व होगया था, जोकि महाभारतयुग माना गया है । उस युग में ६३

पृष्ठ 68

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 68 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आत्मनिवेदन सम्पादित शतपथ कहता है कि, तद्य ुग के अपठित यथाजात सामान्य ग्रामीण जन भी यह भलीभाँति जानते थे कि, भगवान् सूर्य्यनारायण तीनों वेदों के समूह हैं " ( अविद्वांस प्याहुः ) | और ग्राज के विद्वान् भी इस तथ्यदृष्टि से पराङ सुख बनते हुए शब्दग्रन्थ पर ही अपनी वेदभक्ति परिसमाप्त कर रहे हैं, इससे अधिक हमारी राष्ट्रीय - तत्त्वप्रज्ञा का सांस्कृतिक - अधःपतन और क्या होगा? । अब इस सम्बन्ध में एक दो वचनों का संस्मरण कर इस प्रमाणभक्ति का संचरण किया जारहा है । ‘ हविर्यज्ञ ' नामक ‘ दर्शपूर्णमासयज्ञ ' ( ' इष्टि ' ) के लिए अपेक्षित ' पुरोडाश ' नामक आहुतिद्रव्य - सम्पत्ति के लिए शकट से हविः ( अन्न ) का ग्रहण होता है, उसे उलूखल ( ऊखल ) में डालकर मुसल से कूटा जाता है । यही ‘ हविःपेषणकर्म्म ' कहलाया है । इस कर्म में उलूखल से नीचे ' कृष्णमृगचर्म्म ' ( काले हरिण का चमड़ा ' ) बिछाना अनिवार्य्यं माना गया है । हवि यज्ञिय द्रव्य है । बिना चर्मास्तरण के यदि हवि कूटा जाता है, तो उसका भूमिस्थ अंश अयज्ञिय बन जाता है । कृष्णमृगचर्म्म क्योंकि त्रयीवेदस्वरूप है, अतएव यह यज्ञात्मक है । इस पर उछट कर गिरा हुआ यज्ञिय हवि यज्ञप्रतिष्ठारूप वेदात्मक कृष्णमृगचर्म्म के कारण अय-ज्ञिय नहीं होता । इसी तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है कि, “ कृष्णमृर्गचर्म्म साक्षात् वेदात्मक होने से यज्ञरूप है । इसके कृष्णलोम साक्षात् ऋग्वेद है, शुक्ललोभ सामवेद है, बभ्रुवर्णात्मक लोम यजुर्वेद है " । क्या यह श्रालङ्कारिक वर्णनमात्र है? | नहीं । वस्तुस्थिति ही ऐसी है, जैसाकि पाठक प्रस्तुत प्रथमखण्ड के तत्प्रकरण के भाष्य में विस्तार से प्रतिपादित देखेंगे । क्या कृष्णमृगचर्म्म वेदग्रन्थ है, जिससे श्रु ति ने इसे - ‘ वेदात्मक ' एवं ' यज्ञात्मक ' कह दिया?, समस्या को सम्मुख रखिए, और निम्नलिखित वचन का स्वप्रज्ञा से ही समन्वयानुग्रह कीजिए-“ अथ कृष्णाजिनमादत्ते - यज्ञस्यैव सर्ववाय । यज्ञो ह देवेभ्यो ऽपचक्राम । स कृष्णो भूवा चचार । तस्य देवा अनुविद्य त्वचमेवात्रच्छायाजह: । तस्य यानि कृष्णानि लोमानि, तान्यृचाम्- ( रूपम् ) । यानि शुक्लानि लोमानि तानि साम्नां रूपम् । यान्येव ब्रभ्रूणीव हरीण लोमानि, तानि यजुषां रूपम् 1 । सैषा त्रयी विद्या यज्ञः ' ॥ - शत ० ब्रा ० ११४ । १,२,३, । जिसे सर्वसाधारण ' यजुर्वेद ' नाम से जानते हैं, वह शब्द तत्त्वदृष्ट्या वस्तुतः ' यजुर्वेद ' है । ' यज्जूः ' ही देवताओं की परोक्षभाषा में ' यजु: ' नाम से प्रसिद्ध है । क्या - ' इषे त्वोर्जे त्त्वा वायवस्थ देवः ' इत्यादि से उपक्रान्त, एवं - ‘ ओं खं ब्रह्म ' पर विश्रान्त वाक्य - संग्रहात्मक ग्रन्थविशेष ' का नाम हीं ' यज्जू: ', किंवा ‘ यजुर्वेद ’ है? | कदापि नहीं | ' अपितु स्थितितत्त्व से नित्य समन्वित गतितत्त्व का नाम हीं यजुर्वेद है ' । स्थितितत्त्व ही याङमय ' आकाश ' है, इसी की एक संज्ञा है - ' जू: ' * | स्थितितत्त्वात्मक वाङमय इस आकाशरूप ‘ जू: ' तत्त्व के आधार पर प्रतिष्ठित गतितत्त्वात्मक प्राणमय वायुतत्त्व ही - ' यत् ' है ( इण गतौ ) । एवं इस ‘ यत् ' और ‘ जूः ’ की, किंवा ' प्राण ', और ' बाकू ' की, किंवा ' वायु ' और ' आकाश ' की, किंवा * ज्रराकाशे सरस्वत्यां पिशाच्यां यवने स्त्रियाम् ( हैमः ) ६४

पृष्ठ 69

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 69 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

शतपथ - प्रथमखण्ड ‘ गति ' और ‘ स्थिति ' की समन्वितावस्था का नाम हीं है - ' यज्जू: ', और यही है ' बयो ' रूप ( सत्तासिद्ध वस्तुतत्त्वरूप ) वह – ‘ यजु: ', जो भातिसिद्ध - वयोनाधात्मक छन्दोलक्षण ऋक्साम में अपीत रहता हुआ स्विर - चर - भावात्मक ( चलाचलधर्म्मा द्विनियतिरूप - स्थितिगत्यात्मक ) विश्व का मौलिक उपादानद्रव्य बना हुआ है । लक्ष्य बनाइए निम्नलिखित श्रुतिवचन को, और तदाधारेणैव अपने अन्तर्जगत् में हीं मुकुलित-नयन बनकर इस तथ्य का समन्वय - प्रयास कीजिए कि - ' क्या वेदग्रन्थ ' का ही नाम अपौरुषेयवेद है?, अथवा तो अपौरुषेय - नित्य - वेदतत्व कोई तत्त्वात्मक पदार्थ है? -“ अयं वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्नेवेदं सर्वं जनयति । एतं यन्तमिदमनु प्रजायते । तस्माद्वायुरेव यजुः । श्रयमेवाको ज्रः । एतं ह्याकाशमनु जबते । तदेतत्-यजुर्वायुश्च - अन्तरिक्षञ्च यच्च - जूश्च । तस्मात् - यजुः । एष एव यत् । एष हि - एति । तदेतत् - यजुः - ऋक्सामयोः प्रतिष्ठितम् । ऋक् सामे वहतः ” । - शतः ना ० १०/६/३ ब्राह्मण अत्र सन्त में भगवान् तित्तिरि का एक वचन और उद्धृत कर हम इस प्रमाणनिष्ठा को उपरत कर रहे हैं । सम्पूर्णं विश्व का तत्त्ववाद ध्रुव - धर्त्र - धरुण, इन तीन अवस्थाओं से ही समन्वित माना गया है । घनावस्था के लिए ही ' ध्रुव ' शब्द, तरलावस्था के लिए ही ' धर्त्र ' शब्द, एवं विरलावस्थात्मिका बाष्पात्रस्था के लिए ही ' घरुण ' शब्द नियत है - ' ध्रुवोऽसि धर्त्रमसि - धरुणमसि ' ( यजुःसंहिता ) इत्यादिरूपेण । घनावस्थापन्न वही अग्नि ' अग्नि ' है, तदनुप्राणित तत्त्ववेद ही ' ऋ ' है । तरलास्थापन्न वही ग्रग्नि ‘ वायु ’ है, तदनुप्राणित तत्त्ववेद ही ' यजुः ' है । एवं विरलावस्थापन्न वही अग्नि- ' आदित्य ' है, और तदनुप्राणित तत्त्ववेद ही - ‘ साम ' हैं | घनावस्थापन अग्निप्रधान ऋग्वेद से ही पदार्थों के ' मूर्त्ति ' रूप वन-पिण्डभाव अभिव्यक्त होते हैं । तरलावस्थापन्न वायुप्रधान यजुर्वेद से ही पदार्थों के - ' गतिरूप ' तरल - क्रिया-भाव अभिव्यक्त होते हैं ( कम्पनात्मिका - वीचियाँ हीं तरलता है, जोकि गत्यात्मिका क्रिया का मौलिक स्वरूप माना गया है ) । एवं बाष्पावस्थापन्न श्रादित्यप्रधान सामवेद से ही पदार्थों के बहिर्म्मण्डलात्मक - ‘ प्राण-मण्डल ' रूप ' महिमाभाव ' सम्पन्न होते हैं । किसी भी भौतिक पिंण्ड को दृष्टि के सम्मुख रख लीजिए, इसमें आपको मूर्त्ति ( पिण्ड ), गति ( क्रिया ), मण्डल, ये तीनों भाव उपलब्ध होजायँगे । वस्तुपिण्ड, जिसका श्राप स्पर्शमात्र कर सकते हैं, किन्तु जिस वस्तुपिण्ड को आप कदापि देख नहीं सकते, इसी का नाम ' वस्तुमूर्त्ति ' है । साक्षात्कार होता है इस पिण्डमूर्त्ति के मण्डलों का ही । वस्तुपिण्ड को केन्द्र बना कर वस्तुपिड का गतिशील प्राण बड़ी दूर पर्य्यन्त अपने सहस्र मण्डल बनाता है ( सहस्रवर्मा - सामवेद: ) । इन छोटे - बड़े - सहस्र मण्डलों के अनुपात से ही वस्त्वाकार वस्तु से उत्तरोत्तर दूर हटने पर छोटे, एवं वस्तु के उत्तरोत्तर सन्निकट होने से बड़े प्रतीत होने लगते हैं | आश्चर्य्य है कि - उत्तरोत्तर के बड़े मण्डल वस्तु के आकार को जहाँ उत्तरोत्तर छोटे दिखलाते हैं, वहाँ पूर्व - पूर्व के छोटे मण्डल वस्तु के आकार को तदनुपात से बड़ा दिखलाते हैं, जिस इस साममहिमा के आश्चर्य्य - समन्वय के लिए तो वेद का तात्त्विक - स्वरूप - समन्वय ही शरणीकरणीय है । प्रकृत में निवेदनीय ६५

पृष्ठ 70

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 70 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

श्रात्मनिवेदन यही अंश है किं, स्पृश्य वस्तुपिण्ड मूर्त्ति है, और यह ऋग्वेदमय है । दृश्य वस्तुमण्डल ‘ मण्डल ' है, और यह मामवेदमय है | एवं स्पृश्यकेन्द्र से दृश्य की अन्तिम - ' उहच ' साम नाम की परिधि - पर्य्यन्त आसमन्तात् परिव्याप्त प्राणात्मक ' गति ' तत्त्व ही यजु है । क्या अब भी भारत की विद्वत्प्रज्ञा यह स्वीकार नहीं कर लेगी कि, सचमुच ' वेद ' ग्रन्थविशेष का नाम कदापि नहीं है । अपितु सृष्टि के मौलिक, मूलोपादन -तत्त्व का ही नाम ' वेद ' है ं । जिसने वेदशास्त्र के इस वेदतत्त्व के स्वरूप को नहीं पहिचाना, नही जाना, अपितु जो वेदतत्त्व– प्रतिपादक वेदशब्दों के पारायणात्मक अध्ययन में हीं परिसमाप्त होगया, न स वेद, न स वेद | प्रस्तुत ' आत्मनिवेदन ' के उपक्रम में ही उद्घोषित आदेशसूत्र के पारायणपाठात्मक – ‘ वेदोऽध्येयः ’ का तत्रतक कुछ भी अर्थ नहीं हैं, जबतक कि इस अधीतवेद के माध्यम से वेद का तात्त्विक स्वरूप नहीं जान लिया जाता । तभी - आदेशसूत्र का - ' ज्ञेयश्च ' पद सार्थक नता है । शब्दवेद ( ग्रन्थवेद ) तत्रतक केवल ‘ भारवहन ’ के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं है, जबतक कि शब्द वेद के माध्यम से तत्त्ववेदात्मक ' अर्थवेद ' को हृदयङ्गम नहीं कर लिया जाता । इसी तथ्य का निम्न लिखित आर्ष सूक्ति से स्पष्टरूपेण उद्घोष

हुआ है-स्थाणुरयं भारहारः किज्ञाभूदधीत्य वेदं, न विजानाति योऽर्थम् ।

योऽर्थज्ञइत् सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाच्मा ॥

शब्दवेद ' साध्यवेद ' है, जबकि तत्त्वात्मक अर्थवेद ही ' सिद्धवेद ' माना गया है । सत्पुरुषों के साध्य तभी सिद्ध हुआ करते हैं, जबकि वे साध्य के द्वारा सिद्ध वस्तुतत्त्व को उपलब्ध कर लेते हैं, जिस उप-लब्धि से भारतराष्ट्र केवल पारायणभक्ति में आवेशाविष्ट बना रहता हुआ ' सिद्धि ' पथ से सर्वात्मना स्खलित हो सभी प्रकार की सिद्धियों से पराङमुख ही प्रमाणित होता आ रहा हैं विगत तीन सहस्र वर्षों से । महर्षि तित्तिरि के सिद्धवेदात्मकं उसी मौलिक मूर्त्ति - गति - मण्डल - रूप त्रयीवेद का उह्रीं की सत्यावाणी से संस्मरण करते हुए हम प्रक्रान्त प्रमाणनिष्ठा - सन्दर्भ को उपरत कर रहे हैं इस आस्था के साथ कि, हमारे राष्ट्र के सांस्कृ-तिक विद्वान्, विशेषतः वेदभक्त विद्वान् शब्दाडम्बरानुनत - अपने पारायणमात्र - व्यामोहन से आत्मपरित्राण करते हुए पौरुषेय - अपौरुषेय - जैसे ब्यर्थ के वाक्कलह से उन्मुक्त होते हुए ज्ञान विज्ञानात्मक– सर्वमूलभूत उस वेदतत्त्व की आराधना में ही अविलम्ब ही प्रवृत्त हो जायँगे, जिस वेदतत्त्व के प्रति विश्व के किसी भी प्रज्ञाशील को तो अवनतशिरस्क बन जाने में अणुमात्र भी आपत्ति नहीं हो सकती-ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्तिमाहुः-सर्ग गतिर्याजुषी हैव शश्वत् I सर्व तेजः सामरूपं ह शश्वत्-सर्व हीदं ब्रह्मणा व सृष्टम् ॥ — तैत्तिरीयब्राह्मणे सच्चिदानन्दमय अनन्त– पुरुषवेद के आधार पर प्रतिष्ठित, पञ्चपर्वा विश्व के मूलभूत ब्रह्मनिःश्व-सितवेद, ब्रह्मस्वेदवेद, गायत्रीमात्रिकवेद, सुब्रह्मवेद, यज्ञमात्रिकवेद - रूपेण पञ्चधा विभक्त जिस ६६