Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 521–530

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 521–530

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प्रथमकाण्ड ' अपि वा पुरुषविधानामेव सतां कर्म्मात्मान एतेस्युर्यथा यज्ञो यजमानस्य ' -तात्पर्य यही है कि, पुरुषविध देवताओं के जो कर्मात्मा हैं, जिन्हें कि हम ' यज्ञात्मा ' कहेंगे, वे भी एक नवीन याज्ञिक आत्मा उत्पन्न कर लेता है, जिन मनुष्यों ने कर्म्म के द्वारा प्राणदेवताओं को ही कहलाते हैं । इसप्रकार यास्क के मतानुसार तीम एवं एक पुरुषविध है । यह है शास्त्रीय विचार । अत्र इस डालते हैं । आशा है जिज्ञासु महानुभावों के लिए यह विषय एक प्रकार के पुरुषविध देवता ही हैं । जैसे यजमान अपना एवं वह यज्ञात्मा देवमय होने से साक्षात् देवता है, तथैव अपने आत्मा के साथ युक्त कर लिया है, वे भी देवता देवता हो जाते हैं | तीन में दो तो पुरुषविध हैं, विषय पर हम स्वतन्त्ररूप से थोड़ा सा प्रकाश अधिक रुचिकर होगा । वैदिकविज्ञानभवन का निरीक्षण करने से हमें आठ प्रकार के का सौभाग्य प्राप्त होता है । इसी आधार पर हम आठ ही प्रकारे के ताओं का स्वरूप भिन्न भिन्न प्रकार से बतलाया जासकता है । उन प्रकार भी हो सकता है— देवताओं की मूर्तियों के दर्शन करने देवता मान रहे हैं । उन आठों देव-अनेक प्रकारों में से एक निम्नलिखित १ - पुरुषविध चेतन अनित्य मनुष्य देवता - ( प्रत्यक्ष ) २ - पुरुषविध चेतन नित्य चान्द्रदेवता- ( अप्रत्यक्ष ) ३ - अपुरुषविध अचेतन नित्य सौर प्राणदेवता -- (,, ) ४- अपुरुषविध अचेतन भूतमय देवता - ( प्रत्यक्ष ) ५ - अभिमानी देवता - ( अप्रत्यक्ष ) ६ - मन्त्रदेवता- ( प्रत्यक्षाप्रत्यक्षं ) ७ - आत्मदेवता- ( स्वानुभवैकगम्य ) = -कम्मदेवता - ( कर्मसाक्षी ) इस एक विभांग के अतिरिक्त जो अन्य विभाग हैं, यदि उन सबका यहाँ निरूपण किया जाय, तों एक स्वतन्त्र ग्रन्थं त्रन जायगा । अतः प्रकृत में सम्पूर्ण भेदों का निरूपण न कर केवल उपरि निर्दिष्ट विभाग में से भी कुछ एक देवताओं का ही स्वरूप बतलाया जायगा । ' चित्रं देवानामुदगादनीकम् ' - इत्यादि श्रुतियाँ * पुराण काश में प्रतिष्ठित सूर्य्यं को देबघन बतला रहीं हैं । प्राण त्रयम्भू ब्रह्ममण्डल है । आपोमय परमेष्ठी विष्णुमण्डल है । वाङ्मय * हृदयाकाश, शरीराकाश, पुराणाकाश, परमाकाश, भेद से चार प्रकार के श्राकाश होते हैं । इन में से जिस ग्राकाश मे सूर्य्य रहता है, उसे ही ' पुराणकाश ' कहते हैं । स्वयम्भू का आकाश ' परमाकाश ' कहलाता है । पारमेष्ठ्य आकांश को पुराणाकाश कहते हैं । परमेष्ठी के इसी पुराणाकाश के मध्य में सूर्य्यं स्थित है । पुराणों में इसी सौरब्रह्माण्डक का निरूपण है । अतएव पुराणाकाश का निरूपण करने के कारण यह शास्त्र ' पुराण ' नाम मे प्रसिद्ध है । इन सभी विषयों का निरूपण आगे आने वाले सृष्टिब्राह्मणों में किया जायगा । २५८

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शतपथब्राह्मण सूर्य्य इन्द्रमण्डल है । अन्न ( सोम ) मय चन्द्रमा सोममण्डल है । एवं अन्नादमयी पृथिवी अग्नि-मण्डल है । इन पाँच मण्डलों में जो सूर्य्य नाम का इन्द्रमण्डल है, वही देवताओं का प्रभवस्थान है । देवताओं से ऊपर भी दो मण्डल ( पर ० स्वयम्भू ) हैं, एवं देवताओं से नीचे भी दो मण्डल ( चन्द्रमा-पृथिवी ) हैं । इसप्रकार देवघन सूर्य की ब्रह्माण्ड के मध्य में सत्ता सिद्ध हो जाती । इसी अभिप्राय से ' बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः ’ बृहत्साम के कारण बृहत् नाम से प्रसिद्ध सूर्य्य भूर्भुवः स्वः श्रादि सातों भुवनों के मध्यम में प्रतिष्ठित होगया - ऐतरेय आरण्यक ) यह कहा जाता है । मध्यस्थित सूर्य्यमण्डल में व्याप्त ' रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श, इन पाँचों से रहित, श्रतएव सर्वथा ' अधामच्छद ' ( स्थान न रोकने वाला ) जो एक नीरूप तत्त्वविशेत्र है, उसी का नाम प्राण है, यही देवता है । इस देवतत्त्व का प्रादुर्भाव इसी सौरमण्डल में होता है । यह स्वज्योतिष्मान् सौरप्राण सर्वथा नित्य है । चित्याग्निमय ( मर्त्याग्निमय ) सूर्य्यपिण्ड इसी अमृताग्निरूप प्रास के आधार पर प्रतिष्ठित है । सूर्य्य इसी प्राण के प्रधान से रोदसी— त्रिलोकीं की प्रजा का अधिपति बन रहा है । अतएव इसके लिए ' प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूय्यः ' यह कहा जाता है | यह सौरप्राण क्योंकि प्राण है, अतएव हम अवश्य ही इसे नित्य मानते हैं । अनित्य विश्व के मुलभूत होने से यह प्राण ' असत् ' नाम से व्यवह हुआ है । जिस वस्तु में प्राण रहता है, वह ' सत् ’ नाम से व्यवहृत होती है । प्राणसत्ता से ही वस्तु ' सत् ' है, अन्यथा सत् है । क्योंकि प्राण के द्वारा ही वस्तु सत् कहलाती है । सत् – स्वरूप - संपादक प्राण ' में ' सामान्ये सामान्यभावः ' इस नियम के अनुसार प्राण नहीं रहता । श्रतएव हम अवश्य ही इस प्राण को ' असत् ' कह सकते हैं । यह असत् प्राण सूर्य्यगत चितिधर्म्म के कारण सूर्य्य ' में आविर्भूत होता है । अतएव हम इसे अभूतपूर्व नहीं कह सकते । जब कुछ न था, तत्र भी यह प्राण था । इस सौर प्राणदेवता का मूल पारमेष्ठ्य पितरप्राण है । इस का भी मूल स्वयम्भू का ऋषिप्राण है । विजातीय ऋषि प्राणों के संयोग से पारमेष्ठ्य पितरप्राण उत्पन्न होता है । एवं विजातीय पित-रप्राणों के योग से देवप्राण उत्पन्न होता है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । कहना इस से हमें यही है कि, यह सौर देवप्राण परस्परा - सम्बन्ध से ऋषिप्राण ही है । दूसरे शब्दों में - ऋषि-प्राण की अवस्थान्तर का ही नाम देवप्राण है । यह देवरूप ऋषिप्राण ' असद् वा इदमग्र आसीत्, तदाहुः किंतदसदासीदिति?, ऋषयो वात्र तदग्रेो ऽसदासीत् । तदाहुः के ते ऋपय इति?, प्रारणा वा ऋषयः’-इत्यादि श्रुति के अनुसार नित्य कहलाने योग्य है । जबकि स्वयम्भू का ऋषिप्राण नित्य है, एवं उसकी अव-स्थान्तर का ही नाम सौर देवप्राण है । अतः ऋषिवत् इस देवप्राण को भी हम अवश्य ही नित्य कह सकते हैं । यह स्वयम्भू का ऋषिप्राण ' परोरजा ' कहलाता है । ' भूः भुवः स्वः, महः, जनत्, तपः सत्यम् ', ये लोक । इन सातों में आदि के ६ लोक रज हैं । क्योंकि ६ श्रीं हीं विचाली हैं । एवं सातवाँ सात स्वयम्भू-सत्य अविचाली है, एवं यही शेष ६ त्रों का प्रभव प्रतिष्ठा परायण है । रज से अतीत इसी सत्य में ' सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ' – के अनुसार ६ यों रन श्राद्ध हैं 1 । ६ त्रों रजों का इसी ' विरजा'सत्य ने अपने में स्तम्भन कर रक्खा है । अर्थात् ६ औं इसी के केन्द्र में बद्ध हैं । अतएव श्रुति कहती है-= अचिकित्वाञ्चिकितुषश्विदत्र कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् । वि यस्ततम्भ पलिमा रजांसि अजस्थ रूपे किमपि स्विदेकम् । —ऋक् सं ०१।१६४।६ । २५६

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प्रथमकाण्ड वह तत्त्व रज से अतीत यही स्वयम्भूसत्य है । क्योंकि यह रज से अतीत है, अतएव हम अवश्य ही इस स्त्रयम्भू - प्राण को ‘ परोरजा ' कह सकते हैं । एवं पारमेष्ठ्य ' आाप्य ' तत्त्व सोम नाम से प्रसिद्ध है | एक पानी की जाति का प्राण है, एवं एक सोम जाति का प्राण है । ग्रागे जाकर हम श्रासुरप्राण - निरूपण में इसी बारमेय्य आप्यप्राण ( वारुणप्राण ) को प्रासुरप्राण का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण बतलाने वाले हैं । परमेष्ठी के नीचे सूर्य्य है । इस के प्राण का नाम ' ऐन्द्रप्राण ' है । चान्द्रप्राण का नाम ' गन्धर्वप्राण ' 1 एवं पार्थिवप्राण श्रसुर, एवं वैश्वानर, भेद से दो भागो में विभक्त है । ये सभी प्राण उस एक ही परो-रज़ाप्राण की अवस्थान्तरमात्र हैं । अतएव प्राणमात्र को हम नित्य कह सकते हैं । सत्र से अवरश्रेणि का प्राण तो पार्थिव वैश्वानरप्राण है । उस की नित्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण लोकव्यवहार है । जब शरीर, और प्राण की हृद्ग्रन्थि टूट जाती है, तो ' प्राण निकल गए ' यही व्यवहार होता है । प्रारण नष्ट होगए, यह कोई नहीं कहता । ' उनका शरीर अब नहीं रहा ' यही व्यवहार होता है । ' उनका प्रारण नहीं रहा ' यह कोई नहीं कहता । नत्रकि सभी प्राण नित्य हैं, एवं सौरदेवप्राण भी प्राण है, तो ऐसी अवस्था में हम अवश्य ही इसे ‘ नित्य ' कह सकते हैं | अतएव देवता ' अजर, अमर ' आदि नामों से व्यवहृत हुए हैं । रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, ये पाँच ही विषय हैं । इन पाँचों का प्रत्यक्ष करने वालीं हमारे अध्यात्म में ( वैदिक मतानुसार ) वाक्, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, ये पाँच ही इन्द्रियाँ हैं । एवं पूर्वकथनानुसार प्राणतत्त्व अधामच्छद होता हुआ इन पाँचों से पृथक् है । अतएव हम अवश्य ही इस प्राणतत्त्व को ' इन्द्रियातीत ', अतएव प्रत्यक्ष का अविषय कहेंगे । जैसे परोरजाप्राण वसिष्ठ, अगस्त्य, मत्स्य, कश्यपादि भेद से १२ प्रकार का है, एवमेव यह देवप्राण वसु, रुद्र, इत्यादि भेद से ३३ प्रकार का होता है । ८ वसु हैं । ११ रुद्र हैं । १ आदित्य हैं । एवं २ अश्विनीकुमार ( नासत्य एव दस ) हैं । इसप्रकार कुल ३३ देवता हो जाते हैं । इन ३३ देवताओं की समष्टि का नाम सूर्य्य है । ३३ सों देवता सूर्य्यसंस्था में सूर्य की प्रकाशमयी रश्मियों में व्याप्त रहते हैं । अतएव इसके लिए ' चित्रं देवनामुद्गात् ' यह कहा गया है । यद्यपि देवप्राण एक ही था । परन्तु पारमेष्ठ्य सोमाहुति के तारतम्य से उस एक ही की घन, तरल, विरल, तीन अवस्थाएँ हो जातीं हैं । ' घनावस्थापन्न भाग को अग्नि कहने लगते हैं । तरलावस्थायुक्त भाग को वायु कहने लगते हैं । एवं विरलावस्थापन्न भाग को आदित्य कहने लगते हैं । इसप्रकार एक के तीन विवर्त्त होजाते हैं । तीनों में दो सन्धिगत प्राण और रहते हैं । इसप्रकार तीन के पाँच हो जाते हैं । इन पाँचों में घनाग्नि के आठ अवयव हो जाते हैं, ये ही आठ वसु हैं । तरलाग्निरूप वायु के ११ विभाग होजाते हैं । ये ही ११ रुद्र हैं । एवं विरलाग्नि के १२ विभाग हो जाते हैं । ये ही १२ आादित्य हैं । इसप्रकार पाँच के ३३ होजाते हैं । इन में से ऋग्वेद का सम्बन्ध वासवाग्नि से है । यजुर्वेद का सम्बन्ध रौद्रवायु से है, एवं सामवेद का सम्बन्ध आदित्य से है । तीनों वेद इन्हीं तीनों देवताओं से श्राविर्भूत होते हैं । वेदत्रयीयुक्त इन तीनों देवताओं के, अथवा ३३ सों के संघ का ही नाम ही सूर्य्य है । अतएव इसके लिए - ' सैषा त्रयी एव विद्या तपतीति ' ( मध्या-काश में सूर्यरूप यह त्रयीविद्या तप रही है श ० १०५/२२ ) यह कहा जाता है । इन ३३ सों देवताओं में से जो विरल I वस्थापन्न १२ आदित्य देवता हैं, वे १ इन्द्र, २ धाता, ३ भग, ४ पूषा, ५ मित्र, २६०

पृष्ठ 524

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शतपथब्राह्मण-६ बरुण, ७ अय्र्य्यमा, ८ अंशु, ६ विवस्वान्, १० त्वष्टा, ११ सविता, १२ विष्णु, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । घनावस्थापन्न ८ वसुदेवता - १ ध्रुव, २ धर, ३ सोम, ४, ५ वायु, ६ अग्नि, प्रत्यूष , ८ प्रभास, इन नामों से व्यवहृत होते हैं । एवं तरलावस्थापन्न ११ रुद्रदेवता, १ अज एकपात्, २ अहिर्बु-ध्न्य, ३ विरूपाक्ष, ४ त्वष्टा, ५ रैवत ', ६ हर २, ७ बहुरूप, ८ त्र्यम्बक, ६ सावित्र ं, १० जयन्त ं, ११ पिनाकी ", इन नामों से व्यवहृत होते हैं । ये ११ हों रुद्र वैज्ञानिक दृष्टिकोण के भेद से १ गार्ह-पत्याग्नि, २ आहवनीयाग्नि, ३ विभु, ४ वह्नि, ५ प्रचेता, ६ बिश्ववेदा, ७ कत्रि, ८ बम्भारि, ६ दुवस्वान्, १० शुन्ध्यु, १२ नैऋत्याग्नि, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । विभु - वह्नि आदि आठळ ं रुद्र ' धिष्ण्याग्नि ' ( नाक्षत्रिकाग्नि ) कहलाते है । ये ही आठों धिष्ण्य, १ प्रवाहणं, २ हव्यवाहन, ३ श्त्रात्र, ४ तुथ, ५ उशिक्, ६ अङ्घारि ७ अवस्यु, ८ शुन्ध्यु, इन नामों से भी प्रसिद्ध हैं । इन्हीं आठों को याज्ञिक परिभाषा में १ श्राग्नीध्रीय, २ होत्रीय, ३ मैत्रावरुण, ४ ब्राह्मणाच्छंसी, ५ पोत्रीय, ६ नेष्ट्रीय, ७ अच्छावाकीय, = मार्जालीय, इन नामों से व्यवहृत किया जाता है । इसप्रकार ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, तीनों के संकलन से कुल ३१ देवता हो जाते हैं । इन ३१ सों के उपक्रम में पृथिवी है, उपसंहार में द्यौ है । इसप्रकार पृथिवीदेवता, द्य देवता, इन दोनों के सम्बन्ध से ३३ देवता होजाते हैं । इन दो देवताओं के विषय में कई एक विकल्प हैं । कितने ही वैज्ञानिक नासत्य, दुस्र, इन दो अश्विनीकुमारों से ३३ की पूर्ति करते हैं I । ये ही दोनों देवता सांध्य हैं । वसु और रुद्र के मध्य में एक देवता हैं । रुद्र और आदित्य के मध्य में एक देवता है । संधिभाग में रहकर शेष ३१ सों को परस्पर संहित रखना इन्हीं दोनों सांध्य प्राणों का काम है । यदि ये दोनों प्राण न होते, तो वसु, रुद्र, दिव्य इनका स्वरूप स्व-प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित कभी न रहता । ये ही दोनों देवता इन्हें यथास्थिति में प्रतिष्ठित रखते हैं । अतएव इन्हें देव--ताओं का वैद्य कहा जाता है । साथ ही इतनी बात और समझ लेनी चाहिए कि, वैदिक आख्यान प्रायः अध्या-त्म, अधिभूत, अधिदैवत्, तीनों से युक्त रहते हैं । प्रकृति में प्राण देवताओं के प्राणरूप अश्वनीकुमार जैसे वैद्य हैं, एवमेव उन्हीं प्राणों को आत्मसात् करने वाले मनुष्यदेवताओं के, अश्विनी प्राणप्रधान मनुष्य अश्विनीकुमार वैद्य थे । पतिपरायणा सुकन्या के पति च्यवन महर्षि को च्यवनप्राश के द्वारा इन्हीं मनुष्य अश्विनीकुमारों नें युवावस्था प्रदान की थी । यह कथा * चौथे काण्ड में विस्तार के साथ बतलाई गई है | १- भैरव, कपर्दी, वीरभद्र, आदि नामों से प्रसिद्ध । २ — नकुलीश, पिङ्गल, स्थाणु आदि नामों से प्रसिद्ध । ३ – सेनानी, गिरिश यादि नामों से प्रसिद्ध । ४ - भुवनेश्वर, विश्वेश्वर, सुरेश्वर, आदि नामों से प्रसिद्ध । ५- भूतेश, कपाली, आदि नामों से प्रसिद्ध । ६ - वृष ( कपि, शम्भु, सन्ध्य आदि नामों से प्रसिद्ध । ७ — मृगव्याध, लुब्धक, शर्व, अपराजित, महातेना, पशुपति, श्रादि नामों से प्रसिद्ध । * वेदों में इतिहास नहीं है, यह कहने वालों को इस ग्राख्यान से अपनी मोहनिद्रा का परित्याग कर देना चाहिए | २६१

पृष्ठ 525

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प्रथमकाण्ड अस्तु प्रकृत में हमें केवल यही कहना है कि, किलने हीं आचार्य इन दोनों से ३३ की संख्या पूरी करते हैं । एवं कितने हीं वैज्ञानिक प्रजापति, वषट्कार, इन दोनों को मिलाकर ३३ देवता मानते हैं । कितनो हीं के मतानुसार इन्द्र - वषट्कार ही ३३ के पूरक हैं । इसप्रकार इन दोनों के विषय में १ द्यावापृथिवी, २ नासत्यदस्र, ३ प्रजापतिवषट्कार, ४ इन्द्रवषट्कार, आदि अनेक विकल्प होजाते हैं । इनं विकल्पों का क्या आधार है?, इस प्रश्न का उत्तर किसी अग्रिम प्रकरण में दिया जायगा । प्रसङ्गागत एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए । जदिन ३३ करोड़ देवता सुने जाते हैं । वस्तु-तस्तु देवताओं की संख्या करना ही असम्भव है । यदि ३३ करोड़ के स्थान में ३३ अर्बुद भी मान लिए जॉय, तत्र भी कोई आपत्ति न होगी । वसु रुद्र, आदित्यों में से केवल रुद्र के लिए ही - ' असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्रा अधिभूम्याम् ' ( जो असंख्यात रुद्र पृथिवी में हैं - यजुः संहिता ) जब यह कहा जाता है, तो फिर इन देवताओं की संख्यातता में कोई सन्देह नहीं रह जाता । इस भाव को लक्ष्य में रख कर तो हम - ' देवता ३३ करोड़ हैं ' यह कहने के अधिकारी अवश्य हैं । इस भाव को सामने रखकर, तो हम ययेच्छ संख्या व्यवहार में लासकते हैं । परन्तु वैज्ञानिकभाव को आगे रखकर यदि हम ' देवता ३३ करोड़ हैं ' यह कहते हैं, तो हमारी भूल है । देवता ३३ ' कोटि ' शब्द के अधिकारी अवश्य हैं । परन्तु '३३ करोड़ हैं ' इन शब्दों के अधिकारी नहीं है । शास्त्रार्थ ( वादविवाद ) तत्त्व को जानने वाले विद्वान् जानते होंगे कि, शास्त्रार्थ करते समय वादी प्रतिवादी की अनेक कोटियाँ होतीं हैं । अनेक कोटियों में जाकर शास्त्रार्थ सम्पन्न होता है । कोटि शब्द का जो अर्थ वहाँ है, वही अर्थ देवताओं की कोटि का है । देवताओं की पूर्वोक्त क्रमके अनुसार ३३ कोटियाँ है । ३३ विभाग हैं । ३३ श्रेणियाँ हैं । ३३ जातियाँ हैं । इसका मन समझ कर अवैज्ञानिक लोग '३३ कोटि देवता हैं ' का अर्थ '३३ करोड़ देवता हैं ' यह समझ बैठते हैं, जोकि वैज्ञानिकी सीमा के बहिर्भूत होने से सर्वथा उपेक्षणीय हीं है । देवता अनन्त हैं । ३३ हैं । ३ है | १ || है । एक ही है । परमार्थ में तो एक ही देवता रह जाता है । उस एक ही की तीन अवस्थाओं का नाम अग्नि, वायु, आदित्य, है । इन तीनों की अवस्था - विशेषों का ही नाम वसु, रुद्र, आदित्यादि है । इसी देवसंख्या - विभाग को लक्ष्य में रखकर वेदमहर्षि कहते हैं— " अथैन विदग्धः शाकल्यः पप्रच्छ - कति देवा याज्ञवल्क्येति?, त्रयस्त्रिंशदित्यो मिति होवाच । पडित्योमिति होवाच । त्रय इत्योमिति होवाच । द्वावित्योमिति होवाच । श्रध्यर्द्ध इत्योमिति होवाच । एक इत्योमिति होवाच । कतमे ते त्रयश्च त्रीच शता, त्रयश्च त्रीच सहस्रति १, स होवाच महिमान एवैषामेते - त्रयस्त्रिंशच्वेव देवा इति । कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसवः, एकादश रुद्राः, द्वादशादित्याः, त एकत्रिंशत् । इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयांस्त्रशाविति " – ( श ० १४ का ० ६८ १–२–३ क ० इति ) । भारतवर्ष में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक कौनसा है?, इसका निर्णय करने के लिए औपनिषद ज्ञान के आचार्य जनक ने एकबार सम्पूर्ण विद्वानों को समवेत किया । एवं वहाँ एक विशिष्ट दक्षिणाद्रव्य रखकर विद्वानों को सम्बोधित कर उह्नोंनें उद्घोषित किया कि, जो आप सत्र में सर्वश्रेष्ठ हो, वह इस दक्षिणा को अपने २६२

पृष्ठ 526

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शतपथब्राह्मण अधिकार में करले । उसी समय जनक के पुरोहित शतपथ के द्रष्टा महर्षि याज्ञवल्क्य उठ खड़े हुए, एवं उह्नोंनें उस दक्षिणा को अपने शिष्य मधुश्रवा के द्वारा अपने अधिकार में कर लिया । इस पर उस सभा में बैठेहु जरत्कारु के पुत्र आर्त्तभाग, जनकमहाराज के होता आश्वल, भुज्यु, कौषीतकि के पुत्र कहोड़, चक्रायण के पुत्र उषस्त, अरुण के पुत्र उद्दालक, वाचक्नवी, आदि विद्वान् और विदुषियोंनें याज्ञवल्क्य की श्रेष्ठता की परीक्षा के लिए इनसे अनेक एक प्रश्न किए । एवं याज्ञवल्क्यने उस सबका यथोचित समाधान किया । वहीं पर विदग्धने याज्ञवल्क्य से देवता - विषयक प्रश्न किया था । एवं याज्ञवल्क्यने पूर्वोक्त समाधान किया था । कहना सम्पूर्ण प्रपञ्च से प्रकृत में यही है कि, देवता ३३ हैं, न कि ३३ करोड़ | ये ३३ सों देवता पृथिवी में भी हैं । अन्तरिक्ष में भी हैं । द्युलोक में भी हैं । पृविथी में ८ वसुओं की प्रधानता है । अन्तरिक्ष में ११ रुद्रों की प्रधानता है । एवं द्यलोक में १२ श्रादित्यों की प्रधानता है । वस्तुतः हैं सत्र सर्वत्र । इसी -लिए तो रुद्रों को त्रैलोक्य में व्यापक बतलाना - चरितार्थ होता है ( देखिए यजुः सं ० १६० ६४,६५, ६६ मं ० ) । जिस पर आप बैठे हैं, वह पृथिवी है । इस में भी ३३ देवता है । आकाश में जो सूर्य्यं है, वहभी ३३ देवताओं . की समष्टि है । अन्तरिक्ष में ३३ देवता हैं । पृथिवी अग्निप्रधाना है, उसमें ३३ देवता है, अतएव ' अग्नि: सर्वा देवताः ', यह कहा जाता है । अन्तरिक्ष वायुप्रधान है, अतएव ' वायुः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । एवं द्युलोक इन्द्रप्रधान है । अतएव ' इन्द्रः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । इन सभी देवताओं का सोम अन्न है । सोम की आहुति से इन ३३ सों का स्वरूप बना हुआ है, अतएव ' सोमः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । यह सम्पूर्ण देवमण्डल अग्नि - सोम के सम्बन्ध से यज्ञ कहलाता है । ३३ सों देवता यज्ञमय हैं, एवं यज्ञ को ही विष्णु कहते हैं, अतएव ' त्रिष्णुः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । अग्नि, वायु, इन्द्र, सोम, विष्णु, ये पाँच ' सार्वदैवत्य ' हैं । इसका तात्पर्य्य यही है कि, आप पाँचों में से किसी एक प्राणदेवता को पकड़ लीजिए, ३३ सों प्राणदेवता आपकी पकड़ में आजायँगे । इन पाँचों सर्वदेवताओं में से सबसे पहिले हम आपका ध्यान - स्थानीय इन्द्रदेवता की ओर ही आकर्षित करते हैं । द्युलोकस्थानोय जो प्रधान १२ आदित्य हैं, उनमें से एक ग्रन्यतम प्रधान प्राण का नाम हीं इन्द्र है । सूर्य्य चित्यपिण्ड है । इन्द्र चितेनिधेय ( अमृत ) प्राण है । जैसे पृथिवी अग्निगर्भा है, एवमेव द्युलोक इन्द्र से गर्भित है, जैसाकि श्रुति कहती है-' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी ' – ( यजुः संहिता ) । सूर्य्य से निकल कर यह इन्द्रप्राण सर्वत्र व्याप्त होजाता है । पृथिवी की अपेक्षा सूर्व्य अनेक सहस्रगुणित बड़ा है, यह पूर्व में बतलाया जाचुका है । सूर्य्यं की अपेक्षा कहीं स्वल्पकाया इस पृथिवी का साममण्डल ( अमृताग्निमण्डल ) सूर्य्य से भी कुछ ऊपर जाता है । ऐसी अवस्था में पृथिवी से कहीं विस्तृत सूर्य्य के साम के विस्तार का हो कहना ही क्या है । अतएव सूर्य्यं के साम को ' बृहत् ' कहा जाता है । महिमम्युक्त पृथिवीलोक, अन्तरिक्षलोक, द्युलोक, रोदसीत्रिलोकी के ये लोक सूर्य्य के इस बृहत्साम के उदर में भुक्त रहते हैं । इस वृहत्-साममण्डल में सर्वत्र वह इन्द्रप्राण भरा हुआ । बृहत्साम का कोई भी भाग ऐसा नहीं है, जहाँ यह इन्द्र-प्राण न हो । सुतरां पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, रूप त्रैलोक्य में इन्द्र की सत्ता सिद्ध जोजाती है । इसी आधार पर ' नेन्द्राद्ऋते पवते धाम किञ्चन ' ( ऋक् ०६ / ६६ / ७ ) यह कहा जाता है । तीनों लोकों में व्याप्त होने २६३

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प्रथमकाण्ड के कारण हीं इस सर्वव्यापक इन्द्र के वासव, मरुत्वान्, मचत्रा, ये तीन नाम होजाते हैं । जो इन्द्रप्राण पृथिवी में रहकर पार्थिव वसुदेवताओं से संश्लिष्ट रहता है, वह ' वासव ' कहलाता है । पृथिवी के अनन्तर दूसरा अन्तरिक्षलोक है । इसमें रुद्रदेवता की प्रधानता है । ' मरुतो रुद्रपुत्रासः ' के अनुसार रुद्र को मरुत् का जनक माना जाता है । रश्मिरूप वज्र के आधार पर वह इन्द्र ही रुद्र के द्वारा इन मरुतों का जनक चनता है । पहिले उन रुद्रों से सात प्रकार का मरुत् ( वायुविशेष ) उत्पन्न होता है । इन सातों में से प्रत्येक के ७-७ अवान्तर भेद होजाते हैं । इसप्रकार कुल ४६ मरुत् होजाते हैं । इन ४६ सों में जो पहिला मरुत् है, उसी को विघ्नविनायक गणपति कहते हैं । एवं ४६ वाँ मरुत् महावीर ( हनूमान् ) जो हैं । रामसेवक हनूमान् इस ४६ वें महावीर के ही अवतार थे । इस महावीर से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ को ही ' प्रवर्ग्ययाग ', ' छिन्नशीर्षयज्ञ, ' ' महात्रीरोपासना ' आदि नामों से व्यवहृत किया जाता है । ४६ मरुतों का गण है । इन सत्र के अधिष्ठाता पहिले मरुत् हैं, अतएव इह्न ' गणपति ' कहा जाता है । ' मूषक ' इनका वाहन कैसे हे १, इन्हें विघ्नविनायक क्यों कहा जाता है?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान करना अप्राकृत होगा । अतः इसको यहीं छोड़कर हम आपको पुनः मरुत् की ओर ले चलते हैं । रुद्र अन्तरिक्ष के देवता हैं, यह अनुपद् में ही बतलाया जाचुका है । रुद्र से उत्पन्न होने वाले ४६ प्रकार के मरुत् भी यहीं रहते हैं । इस मरूद्वायु में एक चौथाई इन्द्र का भाग रहता है | आप यन्त्र के द्वारा १०० अंशात्मक परिमाण से मरुतु नाम के वायु को पकड़ लीजिए, एवं उसका विशकलन कीजिए । इसमें आपको ८० अंश तो वायु मिलेगा, एवं २० अंश इन्द्र मिलेगा । ' इसप्रकार प्रत्येक मरुत् में आपको तीन भाग वायु के मिलेंगे, एवं एक भाग इन्द्र का मिलेगा । इसी विज्ञान को समझाने के लिए वेद-महर्षि कहते हैं - ' इन्द्रतुरीया ग्रहा गृह्यन्ते ' - ( इन्द्र है थौथा जिनमें, ऐसे ग्रहों का ग्रहण किया जाता है, श्रुति का यही अर्थ है ) । पूर्व के प्रकरणों में बतलाया जाचुका है कि १ राजा, २ वाज, ३ ग्रह, ४ हवि, भेद से सोम चार प्रकार का होता है । इह्रीं चारों के भेद से यज्ञ भी चार प्रकार के होजाते हैं । वे ही चारों यज्ञ -१ राजसूय, २ वाजपेय, ३ ग्रह, ४ हवि, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन चारों में ग्रहसोम से सन्बन्ध रखने वाला जो वार्षिक ब्रहयज्ञ है, उसे ही ' ज्योतिलोम ' कहा जाता है । चौथे काण्ड में बड़े विस्तार के साथ इसी ग्रहयज्ञ का सोपपत्तिक निरूपण हुआ है । ग्रह एक प्रकार का वायु है । स्थूल - वायु नहीं, अपितु सूक्ष्म वायु है | यह ग्रहवायु ४० प्रकार का है । पृथिवीपृष्ठ से सूर्य पर्यन्त ये ४० ग्रह अभिव्याप्त हैं । अध्यात्म, अधिदैवत, अधिभूत, तीनों का निर्माण इह्रीं ४० ग्रहों से होता है । वे ४० ग्रह उपांशु, अन्तर्याम, उपांशु-सवन, ध्रुव, दक्ष, क्रतु, माहेन्द्र, आश्विन, शुक्रामन्यी, आग्रायण, आदि नामों से प्रसिद्ध हैं । संसार में ऐसा कोई भी कार्य नहीं है, जो इन ग्रहों से न होसकता हो । अध्यात्मादि तीनों प्रपञ्चों का आधारभूत यह ग्रहसोम ही पूर्वोक्त इन्द्र का अन्न है त्रैलोक्य-व्यापक इन्द्र जहाँ कहीं भी सोम उपलब्ध करता है, उसका उसी समय पान कर जाता है । कर्पूर, स्प्रीट ईथर, आदि को यदि अधिक समय पय्यन्त निरावरण स्थान में रख दिया जाता हैं, तो इन्द्र इहें आत्मसात् कर लेता है | उसी समय बायु में युक्त होते हुए यह सोममय पदार्थ वायु में बैठे हुए इन्द्र के उदर में चले जाते हैं । गरम दूध को आप हवा में रख दीजिए, थोड़ी देर के अनन्तर दूध का सारभाग ( सोमभाग ) निकल जायगा । अतएव दूध को कभी अधिक समय पर्य्यन्त खुले में नहीं रखना चाहिए । इन्द्र के द्वारा निर्धोतरस यह दुग्ध २६४

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शतपथब्राह्मण वैसे ही निस्तत्त्व होजाता है, जैसेकि पितृप्राणप्रधान गया में घन्टे दो घन्टे रक्खा हुआ अन्न गतसार, एवं निस्तत्त्व होजाता है । यह सब क्रीडन उसी इन्द्र के द्वारा होते हैं । सोमपान करना इन्द्र की प्रथम, और प्रधान जीविका है । सच पूछो, तो इसी सोमाहुति के कारण सूर्य्यगत इन्द्रभाग प्रकाश का अधिष्ठाता बना हुआ है, जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । पूर्वोक्त ३३ सों देवताओं में इन्द्रदेवता ही प्रधान है, अतएव इन्हें ' यज्ञपति ' कहा जाता है । ये ३३ सों देवता सूय्य में भी हैं । पृथिवी में भी हैं । चन्द्रमा में भी हैं । अन्तरिक्ष में भी हैं । इनना ही नहीं, अपितु आप जितने भी पदार्थ देख रहे हैं, उन सत्र में ( चाहे वह छोटा हो, किंवा बड़ा हो ) प्रत्येक में ३३ सों देवता हैं । परन्तु इन सत्रका प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण - स्थान सूर्य्य ही है । अतएव ' चित्रं देवानामुद्गात् ' इत्यादि मन्त्र तियाँ सूर्य को ही ' देवधन ' बतलातीं हैं । परन्तु ‘ नेन्द्राद् ऋते पवने धाम किञ्चन ' आदि मन्त्र श्रतियाँ इन्द्र को व्यापक बतलातीं हैं । एवं ‘ इन्द्रः सर्वा-देवताः ' यह ब्राह्मणश्रुति इन्द्र के साथ यच्चयावत् देवताओं का सम्बन्ध बतलती है । ऐसी अवस्था में हम अवश्य ही सर्वत्र सभी देवताओं की अभिव्याप्ति मान सकते हैं । सूर्य्य में प्रकट होनेवाले ३३ सों प्राणदेवता ' आजानदेवता ' भी कहलाते हैं । येही ' ईडेन्य ' भी कहलाते हैं । इन सौर देवताओं की पृथिवी में, एवं चन्द्रमा में भी सत्ता है, यह कहा जाचुका है । पृथिवी का जो भाग सूर्य्य की ओर रहता है, उतने भाग में सौर प्राण की सत्ता रहती है । यही भाग ग्रहः ( दिन ) कहलाता है । यह पार्थिव भाग देवप्राणमय है । इस भाग में आया हुआ जो सौरप्राण है, वह पृथिवी का प्रातिस्तिक ( अपना निजका ) भाग बन जाता है । अतएव पृथिवी में आए हुए ये सौरदेवता पृथिवी के देवता कहलाने लगते हैं । तमोमय प्राण को असुर कहते हैं, एवं प्रकाशमय प्राण को देवता कहते हैं । पृथिवी का जो भाग सूर्य्य से विरुद्ध भाग में है, वह पार्थिव भाग तमोमय होने से आासुरभावापन्न कहलाता है । इसप्रकार सूर्य्य-साम्मुख्य, एवं सूर्य्यवैमुख्य, भेद से एक ही पृथिवी में दो प्राणों की सत्ता सिद्ध होजाती है । पृथिवी का जो भाग सूर्य्य की ओर रहता है, उस ओर अविच्छिन्न रूप से सौर प्राण का पृथिवी के साथ सम्बन्ध रहता है, उतनी दूर में बीच में कहीं भी प्राणविच्छेद नहीं होता । अतएव पृथिवी का यह प्रका-शित भाग ' अदिति ' कहलाता है । ' खण्डनार्थक ' ' दो ' धातु से ' दिति ' बनता है । दिति की अभावात्मिका स्थिति का नाम हीं ‘ अदिति ' है । एवं जिस भाग में सौरप्राण कट जाता है, वही तमोमय रात्रिरूप पार्थिव-भाग प्राणविच्छेद के कारण ' दिति ' कहलता है । इसप्रकार उस एक ही पृथिवी के प्रारणभावाभाव के कारण दिति, और अदिति, ये दो भाग होजाते हैं । इसीलिए इसके लिए ' इयं वै पृथिवी अदिति: ' - ' इयं वै पृथिवी दिति: ' यह कहा जाता है । पृथिवी का जो श्रदितिरूप प्रकाशित भाग है, उसी में सूर्य्यं से आने वाले प्राण— देवता प्रतिष्ठित होते हैं | दूसरे शब्दों में इसी अदिति में वे गर्भधारण करते हैं अतएव अदिति को देवताओं की माता बतलाया जाता है, जैसाकि प्राप्तपुरुष कहते हैं-' दित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिदंग! आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप ॥ इति ॥ २६५ - वाल्मीमिकिरामायणे

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प्रथमकाण्ड पूर्वप्रकरणों में यत्रतत्र हम बतला आए हैं कि, पृथिवी में चित्य, और चितेनिधेय, दो प्रकार का अग्नि है । भूपिण्ड चित्य. ( मर्त्य ) अग्निमय हैं, एवं चितेनिधेय ( अमृत ) अग्नि भूपिण्ड से निकल कर एक मण्डल बनाता है । यही अमृताग्निमय पार्थिवमण्डल पृथिवी का ' रथन्तरसाम ' कहलाता है । सूर्य्य से भी कुछ ऊपर पर्य्यन्त इस पार्थिव रथन्तरसाम की व्याप्ति है । क्रान्तिवृत्तरूप पहिए वाले गायत्री, उष्णिक् आदि नामों से ं प्रसिद्ध सात अहोरात्र वृत्त ( छन्दापरपर्य्यायक पूर्वापरवृत्त - नाड़ीवृत्त ) रूप सात घोड़ों से युक्त हिरण्मय ( अग्निपरमाणुमय ) रथ से भी पृथिवी का साम श्रागे निकल जाता है, दूसरे शब्दों में सूय्य-रथ * का तरण कर जाता है । अतएव यह साम ' रथन्तर ' नाम से व्यवहृत होता है । इस सामपर्य्यन्त, अर्थात् सूर्य्य से भी ऊपर पर्य्यन्त पार्थिवप्राण की सत्ता है । इतनी दूर पर्य्यन्त पृथिवी का अदितिमय प्रकाशित प्राण ( देवप्राण ) अभिव्याप्त रहता है । पृथिवी से निकल कर सूर्य्यस्थान पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाले इस पार्थिव अमृताग्नि के घन, तरल, विरल, तीन भाग होजाते हैं । त्रिवृत्स्तोमपर्य्यन्त घन अग्नि रहता है, यही स्तोम्य-त्रिलोकी का पृथिवीलोक है । पञ्चदश पर्यन्त वायुरूप तरल अग्नि रहता है, यही ( पञ्चदश स्थान ) स्तो ० त्रि ० का अन्तरिक्षलोक है, एवं एकविंश पर्य्यन्त दिव्यरूप विरल अग्नि रहता है, यही स्तो ॰ त्रि ० का द्युलोक है | इसप्रकार केवल पृथिवीलोक में हीं ( भूपिण्ड से भिन्न जो अमृता पृथिवी है उसी में ) त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविंश, भेद से नवीन त्रैलोक्य और निष्पन्न होजाता है । यही त्रिलोकी - ' स्तोम्यत्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध है | याज्ञिक परिभाषा में इसे ही ' उख्यत्रिलोकी ' कहा जाता है । एवं पिण्डपृथिवी को ' अपाढा ' पृथिवी कहते हैं । श्रुति में ( शत ० ६ कांड ५ ( २ ) ' अषाढा ' शब्द पिण्डपृथिवी के लिए प्रयुक्त हुआ है, एवं ‘ उख्य ' शब्द पृथिवी के भृतभाग के लिएं प्रयुक्त हुआ है । एवं वहीं इस अमृतमयी अदिति पृथिवी को लोकत्रयोपेता बतलाया गया है । कहना यही है कि, पृथिवी के अदितिभाग में तीनों लोक, ३३ सों देवता सम्पूर्ण भूत, एवं सम्पूर्ण प्राणी समाविष्ट हो रहे हैं । इसी अदितिविज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेदमहर्षि कहते हैं—

अदितिधरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।

विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितर्जनित्वम् ॥

- ऋग्वेद ० १ ० १४०८० सू ० १ ९ इस परम वैज्ञानिक मन्त्र का विशद अर्थ आगे आने वाले त्रैलोक्यस्वरूपप्रतिपादक ब्राह्मणों में किया जायगा | यहाँ केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा किं, पृथिवी में दिति, और अदिति, दो भाग हैं । जैसे अदिति से आदित्य उत्पन्न होते हैं, एवमेव दिति से दैत्य उत्पन्न होते हैं । अर्थात् अदितिभाग में ज्योतिर्म्मय देवप्राण प्रतिष्ठित हैं, एवं दितिभाग में तमोमय सुरप्राण प्रतिष्ठित हैं । सौरसम्वत्सर का स्वरूप ठीक कछुए जैसा है । निरावरण प्रान्त में ( खुली जगह में ) खड़े होकर यदि आप खगोलरूप सम्वत्सरचक्र के दर्शन करेंगे, तो चारों ओर का श्राकाश पृथिवी के ÷ क्षितिज से मिला हुआ पायेंगे । ऊपर सर्वथा गुम्मज * आदित्यो वे ( सूर्यो वै ) देवरथः । ( श्रुतिः ) । ÷ दिशा को हरित् कहते हैं । क्षितिन की उपपत्ति का दिशा से ही सम्बन्ध है । अतएव वेद में इसे ' हरिजन ' कहा जाता है । क्षितिज वराह मिहिरने मयासुर से सीखा है । अतएव हम इसे आसुरभाषा का शब्द मानते हैं । श्राज हमारे वेद का वही हरिजन निरुक्त क्रमानुसार बिगड़ते बिगड़ते पाश्चात्यभाषा में ' होराईजन ' नाम से प्रसिद्ध होगया है । -२६६

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शतपथब्राह्मण मिलेगा, नीचे सपाट भूमि मिलेगी । यह दृश्य ठीक कूर्म्म ( कछुआ ) जैसा होगा । इसी को ' कश्यपप्रजापनि ' कहते हैं । सम्वत्सररूप कश्यपप्रजापति इसी रूप में परिणत होकर संसार का निर्माण किया करते हैं । सम्वत्सर के १२ महीने हैं । १२ महीने हीं इस प्रजापति की दिति, अदिति, कद्र, विनता, काला, दनू, आदि १२ स्त्रियाँ हैं । अस्तु, इस विषय का अधिक विवेचन करना प्रकृत से दूर जाना है । अतएवं पाठकों का शतपथ के ७ वें काण्ड के कूर्म्मचिति-ते - ब्राह्मण की ( ७: 1१ ) ओर ध्यान आकर्षित करते हुए हम प्रकृत का चानुसरण करते हैं । हम कह रहे थे कि, पृथिवी के एक भाग में देवता हैं, दूसरे भाग में असुर हैं । एक ओर प्रकाश है, एक ओर अंधेरा है । १२ घण्टे प्रकाश का राज्य है, १२ घण्टे अन्धकार का राज्य है । अन्धकार निरन्तर प्रकाश पर श्राक्रमण करता रहता है, एवं प्रकाश अन्धकार पर निरन्तर आक्रमण करता रहता है । पृथिवी के ये दोनों भाग सम्वत्सर प्रजापति की सन्तान हैं । सौर सम्वत्सरप्रजापति से ही पृथिवी उत्पन्न हुई है, एवं उसी से तमोमय श्रासुरप्राण, एवं ज्योतिर्म्मय दिव्याण की सत्ता प्रतिष्ठित है । दोनों एक ही पिता के सहोदर भ्रांता हैं । इसप्रकार एक ही पिता से उत्पन्न होने वाले ये दोनों भाई परस्पर सदा शत्रुता किया करते हैं । दोनों का सहज वैर है । परन्तु सम्वत्सरमण्डल देवताओं के ही अधिकारों में रहता है, अतएव अन्त में विजय देवताओं की ही बतलाई जाती हैं । इसप्रकार इस पूर्व के प्रकरण से ' पृथिवी में देवता और असुर दोनों की सत्ता है ' यह भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । इन दो के अतिरिक्त इस लोक में पशुप्राण ( पुरुष - अश्व - गो - अवि-. अज ) की सत्ता और समझनी चाहिए । चलिए चन्द्रमा की ओर । चन्द्रमा में भी इन दोनों प्राणों की सत्ता माननी पड़ती है । पृथिवी की भाँति चन्द्रमा के साथ भी सौर दिव्य ज्योतिर्मय प्राण का सम्बन्ध होता है, जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट हो जायगा | चन्द्रमा का जो ज्योतिर्मय भाग है, वह देवतामय है, एवं अप्रकाशित भाग सुरभावापन्न है । इसीलिए चन्द्रमा को वृत्रासुर कहा जाता है । ज्योतिर्म्मय प्राण को हमने देवता कहा है । ज्योति संसार भें तीन हीं प्रकार की है । वे तीनों ज्योतियाँ १ स्वज्योति, २ परज्योति, एवं ३ रूपज्योति नामों से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों के अतिरिक्त एक ज्योति ओर है । चह ज्योति इन ज्योतियों की भी ज्योति है । पूर्वोक्त तीनों ज्योतियाँ भूतज्योतियाँ हैं, एवं इस भूतज्योति की प्रतिष्ठारूप चौथी, ज्योतियों की ज्योति ' ज्ञानज्योति ' है । रूपज्योति को छोड़कर पर, एवं स्वज्योति के पाँच भेद हो जाते हैं । दूसरों को अपने प्रकाश से प्रकाशित करने वाली भूतज्योतियाँ सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विद्युत्, नक्षत्र, भेद से कुल पाँच हैं । इनमें सूर्य्य, विद्युत्, एवं स्वाती, चित्रा, लुब्धक, अभिजित्, आदि कितने हीं नक्षत्रों का तो स्वज्योति में अन्तर्भाव है, एवं चन्द्रमा, अग्नि तथा सूर्य्य प्रकाश से प्रकाशित होने वाले यच्चयावत् नक्षत्रों का परज्योति में अन्त-भव है । ये रूपज्योतियाँ उसी एक ज्ञानज्योति से प्रकाशित हैं । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा अध्यात्म है । जबतक ज्ञानघन आत्मा की सत्ता रहती है, तभी तक सूर्य्यादि प्रकाशित हैं । ज्ञानज्योति के अन्त मुख होते ही सर्वत्र घोर अन्धकार है | इन्हीं उभयविध ( भूतज्योति - ज्ञानज्योति ) ज्योतियों का निरूपण करता हुआ वेदान्त * कहता है— * संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक उपनिषत् वेद के इन चार विभागों में उपनिषत् अन्त में पड़ता है । अतएव वेदान्तदर्शनादि में उपनिषदों को ' वेदान्त ' शब्द से व्यवहृत किया गया है । २६७