Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 531–540

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 531–540

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प्रथमकाण्ड

न तत्र सूर्य्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥

- उपनिषत् प्रकृत में हमारा सम्बन्ध केवल भूतज्योति से है । इस भूतज्योति के स्व, पर, रूप, भेद से तीन विभाग होजाते हैं । प्रकृत में भूज्योति स्वरूप इह्नीं तीनों ज्योंतियों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं! यद्यपि भूतज्योतियों में कोई भी ज्योति ऐसी नहीं है, जो कि अपने आप प्रकाशित होती हो । सभी ज्ञान-ज्योति से प्रकाशित हैं । ऐसी अवस्था में भूतज्योति को ' स्वज्योति ' नहीं कहा जासकता । तथापि ज्ञान-ज्योति की अपेक्षा न कर हम यहाँ भूतज्योति के लिए रूप, एवं परज्योति की अपेक्षा से स्वज्योति शब्द का व्यवहार करेंगे । जो ज्योति अपने आप प्रकाशित है, जिसे दूसरे को प्रकाशित करने के लिए किसी अन्य की सहायता नहीं लेनी पड़ती, वह ज्योति स्वज्योति कहलाती है । अन्य ज्योति से ज्योतिष्मयी बन कर दूसरों को प्रकाशित करने वाली ज्योति परज्योति कहलाती है । एवं अपने रूपमात्र से प्रकाशित होने वाली ज्योति रूपज्योति है । इस ज्योतित्रय के भेद से संसार में पदार्थ भी कुल तीन हीं प्रकार के हैं । एक चौथी अज्योति और है | यदि उसे भी इनमें समाविष्ट कर दिया जाता है, तो चार प्रकार के पदार्थ हो जाते हैं । इन चारों में से दृष्टिविषयक होने से तीन ही ज्योतियाँ प्रधान हैं । स्वज्योतिष्मान् जितने भी पदार्थ हैं, उन्हें वैज्ञानिक परिभाषा में ' सूर्य ' कहा जाता है । परज्योतिष्मान् पदार्थों को ' चन्द्रमा ' कहा जाता है, एवं रूपन्योतिष्मान् यच्चयावत् पदार्थों को ' पृथिवी ' कहा जाता है । जिह्न सवसाधारण सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी समझते हैं, केवल वे ही चन्द्रमा सूर्य्य श्रौर पृथिवी नहीं है । अपितु ऐसे ऐसे, इतना ही नहीं अपितु इससे भी अधिक प्रभाव रखने वाले अनन्त सूर्य्यं हैं । अनन्त चन्द्रमा है, एवं अनन्त पृथिवियाँ हैं । स्वज्योति म्य स्त्राती, लुब्धक, बृहस्पति, * अभिजित्, श्रमण, पुष्य, चित्रा, आदि नक्षत्र उसी पूर्वपरिभाषा के अनुसार सूय्य हैं: इसीलिए स्वातीनक्षत्र को वेद में ' सविता ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । ' देवस्य त्त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ( यजुः सं ० ११ अ ० २८ मं ० ) इत्यादि मन्त्र में सविता से स्वातीनक्षत्र ही अभिप्र ेत है, जैसा कि आने वाले ब्राह्मणों में स्पष्ट हो जायगा । जिसे आप ' सूर्य्य ' कहते हैं, वह भी स्वज्योतिर्मय है, अतएव वह भी एक सूर्य्य है । किन्तु सूर्य एकमात्र यही है, ऐसा कदापि नहीं है । हमारे इस सूर्य की क्षणमात्र में वाष्प बना कर उड़ा देने वाले अनेक सूर्य विद्यमान हैं, एवं उहें हम आँखों से देखते हैं । सम्पूर्ण नक्षत्रों के प्राणां से युक्त, अतएव ' पशुपति ' नाम से प्रसिद्ध भगवान् ' लुब्धक ' को कौन नहीं जानता । यह लुब्धक स्वज्योतिर्म्मय है, एवं सूर्य्य से बहुत ऊँचा है, एवं आकार में बहुत बड़ा है । यह नक्षत्र नीलवर्णका है । अतएव एकादश ( ११ ) नाक्षत्रिक रुद्रों में से यह लुब्धक नाम का रुद्र ‘ नीलकण्ठ महादेव ' नाम से प्रसिद्ध है । जिस वस्तु को सूर्य्य २४ घन्टे में पिघलाता है, लुब्धक उसे क्षणमात्र में भस्मसात् करने की शक्ति रखता है । जिस सूर्य पर हम अभिमान करते हैं, वह यदि लुब्धक * यह बृहस्पति लुब्धकबन्धु नाम से प्रसिद्ध है । ग्रहबृहस्पति से यह लुब्धकबन्धु नाम का बृहस्पति भिन्न है । ‘ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ' से यही लुब्धकत्रन्धु अभिप्र ेत है । २६८

पृष्ठ 532

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शतपथब्राह्मण के समीप चला जाय, अथवा दुर्दैववश लुब्धक सूर्य के समीप जाय, तो सूर्य्य उसी क्षण वाष्प ( भाप ) बन कर विलीन हो जाय । एक लुब्धक ही क्या, ऐसे ऐसे स्वज्योतिर्म्मय कितने हीं नक्षत्र हैं, एवं वे सत्र सूर्य्य हैं । सूर्य्य किसी दूसरी ज्योति से प्रकाशित नहीं हैं, अपितु अपनी ज्योति से ज्योतिष्मान् बन कर इन इन सूनें स्वप्रकाश से संसार को प्रकाशित कर रक्खा है । अतएव हम अवश्य ही सूर्य को स्वज्योतिर्म्मय कह सकते हैं । स्वज्योतिर्म्मय होने से ही सूर्य्य में अन्धकार को प्रविष्ट होने का अवसर नहीं मिलता । स्वज्योति के कारण सूर्य्यं सर्वावयवव्या - त्या ( सब ओर से ) प्रकाशित रहता है । इस का कोई भी भाग अप्र-काशित नहीं रहता | इसीलिए इस में केवल देवताओं का ही निवास बतलाया जाता है । परस्योतिर्म्मय चन्द्रमा, एवं रूपज्योतिर्म्मयी पृथिवी, इन दोनों में देवता और असुर, दोनों की सत्ता है, जैसा कि आगे बतलाने वाले हैं । परन्तु सूर्य्य में देवताओं के अतिरिक्त असुरों का संस्पर्श भी नहीं है । अतितीव्र सर्वतोविसारि सौर तेन के सामने आसुर प्राण को रहने का अवसर ही नहीं मिलता । जब आसुर प्राण की सत्ता ही नहीं है, तो ऐसी अवस्था में इन्द्रप्रधान सौर प्राणदेवताओं का असुरों के साथ युद्ध होना कैसे सम्भव हो सकता है? । इन्द्र-प्रधान देवताओं में तमोमय आसुर प्रारण का क्योंकि सर्वथा अभाव है । अतएव सौर इन्द्रादि देवताओं के साथ न कभी असुरों का युद्ध हुआ था, न हो रहा है, न होगा । इसी सौर देवप्राणविज्ञान को लक्ष्य में रख-कर वे महर्षि कहते न त्वं युयुत्से कतमच्चनाहर्नतेऽमित्रो मघवन् कश्चनास्ति । मायेत्सा ते यानि युद्धान्याहुनोद्य शत्रु ं न पुरा युयुत्से । - शतपथ ६ | १ | ६ | १० | “ हे इन्द्र आपने आजपर्धन्त किसी के साथ युद्ध करने की इच्छा नहीं की, क्योंकि आपका कोई शत्रु ही नहीं हैं । जो व्यक्ति आपके साथ ' इन्द्र और वृत्रासुर में परस्पर प्रचण्ड युद्ध हुआ था, इत्यादि रूप से युद्ध का लाते हैं, वह केवल मायामात्र है, प्रदर्शनमात्र है । वस्तुतः न आपका कोई शत्रु पहिले था, न आज है । जत्र शत्रु ही नहीं, तो युद्ध कैसा " मन्त्र का यही अक्षरार्थ है । यह मन्त्र उसी सौर इन्द्र को लक्ष्य में रखता है । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण मन्त्रगत ' मघवन् ' शब्द है । मघवा नाम सौर इन्द्र का ही है, यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । निष्कर्ष यही हुआ कि, सूर्य्यं स्वज्योति है, अतएव इस में तमोमय आसुर प्राण का सर्वथा अभाव है । सूर्य्य में केवल देवताओं का ही साम्राज्य है । दूसरी है ‘ परज्योति ' । सूर्य्यज्योति से प्रकाशित होने वाले जो पदार्थ हैं, वे सत्र परज्योतिर्म्मय हैं । अतएव वे सत्र पूर्वोक्त परिभाषानुसार ' चन्द्रमा ' नाम से प्रसिद्ध हैं 1 । पृथिवी के चारों ओर एक चन्द्रमा घूमता है । मङ्गलग्रह में दो चन्द्रमा हैं । बृहस्पति में चार चन्द्रमा हैं, एवं सब से अन्त वाले शनिग्रह में आठ चन्द्रमा । जो जो उपग्रह सूर्य्य से जितने जितने अधिक दूर हैं, उनके अन्धकार को दूर करने के लिए उन उन में उतने हीं अधिक चन्द्रमा हैं, क्योंकि उत्तरोत्तर सूर्य्य का प्रकाश न्यून होता जाता है । अतएव वहाँ अधिक प्रकाश की आवश्यकता होती है । आकाशविहारी चन्द्रमा साक्षात् ' कृष्ण चन्द्र ' है । २६६

पृष्ठ 533

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प्रथमकाण्ड इस मे जो आपको प्रकाश्च प्रतीत हो रहा है, वह सूर्य्य का ही प्रकाश है । सौर प्रकाश से ही चन्द्रमा प्रकाशित हो रहा है * | इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ज्योतिर्वित् भट्ट कमलाकर कहते हैं-तरणिकिरणसङ्गादेषपानीयपिण्डो दिनकरदिशि चञ्चचन्द्रिकाभिश्चकास्ति ।. तदितरदिश नैव सर्वथा शीतभानुर्घट इव निजमूर्तिच्छाययेवातपस्थः ॥ - सिद्धान्ततत्वविवेकं चन्द्रग्रहणाधिकार ४ श्लोक ' जितने भी परज्योतिर्म्मय पदार्थ हैं, उन सब का एक भाग प्रकाशित रहता है, एवं एक भाग अन्धकार से आच्छादित रहता है, पूर्व के वचन से यह भी सिद्ध हो जाता है । एवं साथ ही पग्ज्योतिष्मान् पदार्थों में देवता और असुर, दोनों प्राणों की सत्ता भी सिद्ध हो जाती है । शेष बचती है ‘ रूपज्योति ' । स्वज्योतिर्म्मय सूर्य्य जैसे अन्य पदार्थों को प्रकाशित करता है, एवं परज्योतिर्म्मय चन्द्रमा जैसे रात्रि के अन्धकार को आवृत करने की शक्ति रखता है, वैसा प्रभाव जिस ज्योति में न हो, अपितु दूसरों को प्रकाशित न करती हुई जो ज्योति केवल अपने रूपमात्र को ही प्रकाशित करती रहे, उसी का नाम ' रूपज्योति ' है । पृथिवी का रूपमात्र ही हमें दीखता है । सूर्य्य चन्द्रमा जैसे अन्यों को प्रका-शित करते हैं, वैसे पृथिवी अन्य पदार्थों को प्रकाशित करने में असमर्थ है । अपितु यह अपने रूपमात्र से केवल आप ही प्रकाशित हो रही है । इस का यह रूप प्रकाश भी उसी सूर्य्य. के द्वारा होता है । पृथिवी के चिन्दु बिन्दु पर सौररश्मियों का सम्बन्ध होता है । पृथिवी पर आकर इन रश्मियों का पार्थिवाकाराकारित होकर प्रतिफलन होता है । पृथिवी के आकार से युक्त सौररश्मियाँ हीं हमारे नेत्रपटल पर आकर पृथिवी-रूप के प्रत्यक्ष का कारण बनती हैं । अतएव एकप्रकार से हम इस रूपज्योति का भी परज्योति में ही अन्तर्भाव करसकते हैं । परन्तु चन्द्रमा के समान इस से प्रकाश नहीं निकलता । श्रतएव इसे परज्योति से पृथक् कर - दिया जाता है । जैसे सौरप्राण से सम्बद्ध होने वाला चान्द्रभाग प्रकाशित रहता है, एवं विरुद्ध भाग प्रकाशित रहता है, एवमेव पृथिवी के जिस भाग में सौर प्राण का सम्बन्ध होता है, पृथिवी का वही भाग रूपज्योतिर्म्मय जनता । अर्थात् वही प्रत्यक्ष का विषय बनता है, एवं विरुद्धभाग तम से आक्रान्त रहता है । इसप्रकार चन्द्रमा की भाँति रूपज्योतिर्म्मयी पृथिवी में भी देवता, और असुर, दोनों प्राजापत्यों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । एवं स्वज्योतिर्म्मय सूर्य्य में केवल देवताओं की सत्ता सिद्धा हो जाती है । अतएव जहाँ जहाँ वेद में देवा-सुर संग्राम का निरूपण हो, वहाँ वहां सर्वत्र सौर दिव्य प्राणदेवताओं को पृथक् कर देना चाहिए, एवं वहाँ वहाँ सर्वत्र पार्थिव, तथा चान्द्र ( जैसा प्रकरण हो ) देवासुर का ही ग्रहण समझना चाहिए । इस प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि, सूर्य, चन्द्रमा, पृथिवी, आदि में व्याप्त जो नित्यप्राण है, वह निराकार होने से अप्र-* अत्रा ह गोरमन्वत्र नाम चष्टुरपीच्यम् इत्था चन्द्रमसो गृहे ॥ - ऋक्संहिता १ ९ ८४ १५८ २७०

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शतपथब्राह्मण त्यक्ष है, एवं प्राणरूप होने से नित्य है । आठ प्रकार के देवताओं में से जो तीसरे पुरुषविध नित्यप्राण देवता हैं, उनका यही स्वरूप - दिग्दर्शन है । यद्यपि क्रमानुसार हमें पहिले मनुष्यदेवताओं का ही स्वरूप बतलाना चाहिए था । परन्तु मनुष्य-देवताओं का आधार प्रकृति है, प्राकृतिक सौरप्राण देवताओं के आधार पर ही मनुष्यदेवताओं का देवतात्त्व निर्भर है । अतएव जत्रतक प्राकृतिक नित्यदेवताओं का स्वरूप न समझ लिया जाय, तत्रतक तत् - प्रतिकृतिक मनुष्यदेवताओं का स्वरूप समझ में नहीं आ सकता । इसीलिए क्रम का व्यतिक्रम कर पहिले हमें प्राण-देवताओं का स्वरूप बतलाना पड़ा । अत्र क्रमप्राप्त मनुष्यदेवताओं की ओर हम अपने वेदप्रेमी पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं । आज जिस प्रकरण को हम प्रारम्भ करना चाहते हैं, वह बड़ा ही जटिल हैं । हमारी बातें सुन कर सम्भव है सनातनधम्म - जगत् हम पर आक्रुष्ट होपड़े । परन्तु इस की हमें चिन्ता नहीं है । शास्त्रों के आधार पर जैसा हमने समझा है, वैसा निरूपण करने में हम ' सत्य की ही रक्षा ' समझते हैं | आज जिन मनुष्यदेवताओं का हम स्वरूप बतलाने वाले हैं, उनका वैदिक इतिहास से सम्बन्ध है | क्या आर्य्यसमाजी, एवं क्या सनातनधर्मी, दोनों ही वेद में इतिहास नहीं मानते । उनका कहना है कि, यदि वेद में इतिहास मान लिया जायगा, तो वेद की पौरुषेयता, अथवा वेद ' का ईश्वरकर्तृत्त्व नष्ट हो जायगा । मनुष्य के चरित्र आगामी हैं । वेद में उनका उल्ल ेख तभी सिद्ध हो सकता है, जबकि उन्हें मनुष्यकृत मान लिया जाय । श्रतएव वैदिक शब्दों को ( जो कि इतिहास के भ्रम में डालते हैं ) पदार्थों का वाचक ही मानना चाहिए । इसप्रकार ' बबरप्रावाहरिणकामयत ' आदि आदि दो चार उदाहरणों का घन्टाघोष करते हुए ये महानुभाव, और महाशय वेदों में इतिहास नहीं मान रहे | इसपर हमारा यही कहना है कि, यदि आने वाले मनुष्यचरित्र के वर्णन करने से ही वेद का ईश्वर कतृत्त्व नष्ट हो जाता है, तब तो मनुष्यचरित्र का सम्बन्ध न मानने पर भी आप वेद की अपौरुषेयता सिद्ध नहीं करसकेंगे । क्योंकि अनादि · ईश्वरज्ञान के लिए तो सु, चन्द्रमा, पृथिवी, ग्रह, नक्षत्र, पर्वत, नद, नदी, समुद्र, योषधि, बनस्पति, आदि सभी आगामी हैं । सब ईश्वरज्ञान के अनन्तर उत्पन्न होने वाले हैं । क्या इन भविष्यपदार्थों का निरूपण वेद में नहीं है? | यदि है, तो फिर वेद इन आगामी पदार्थों के निरूपण से अपौरुषेय कैसे रहा? - । यदि इनके निरूपण करने पर भी वेद की पौरुषेयता अक्षुण्ण है, तो फिर मनुष्य-चरित्र से ही अपौरुषेयता में कौनसी बाधा उपस्थित होती है १ । वेदज्ञान सर्वज्ञ है । भूत - भविष्य - वर्त्तमान, तीनों स्थितियों का निरूपण उस में है । अस्तु इस विवादग्रस्त विषय का निर्णय फिर किसी आगे के ब्राह्मण में किया जायगा । यहाँ हमें केवल इतना हीं कहना है कि, वेदों में अवश्य ही इतिहास है । मनुष्य-देवताओं का इतिहास से सम्बन्ध है । अतएव हम सबसे पहिले आपके सम्मुख वैदिक इतिहास का ही यत्किञ्चित् स्वरूप रख रहे हैं । वैदिक – विज्ञानशास्त्र का यह एक ध्रुव सिद्धान्त है कि, जो वस्तुएँ आधिदैविक मण्डल में होतीं हैं, वे की वे ही कुछ स्वरूपान्तर में परिणत होती हुई अध्यात्म, और अधिभूत में भी प्रतिष्ठित रहतीं हैं । जिस वस्तु का अधिदैवत में अभाव है, अध्यात्म, और अधिभूत, दोनों में उसकी सत्ता नहीं मिलसकती । आधि— भौतिक – जगत् का निर्माण अधिदैवत से होता है, एवं अधिभूत तथा अधिदैवत, दोंनों से अध्यात्मजगत् का २७१

पृष्ठ 535

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प्रथमकाण्ड निर्माण होता है । इसी आधार पर - ' पूर्णमदः पूर्णमिदम् ' - ' यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ' इत्यादि कहा जाता है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, तीनों विभागों में से प्रकृत में हमारा सम्बन्ध अधिभूत, और अधिदैवत, इन दो विभागों के साथ है | क्योंकि अधि-भूत अधिदैवतजन्य है, अतएव आधिभौतिक प्रपञ्च को जानने के लिए इससे पहिले ( अधिभूत से पहिले ) अधिदैवत का जानना परम आवश्यक हो जाता है । इसीलिए हमने क्रम का उल्लंघन कर पहिले अधिदैवत का स्वरूप त्रतलाया है | अधिभूत में भी सबसे पहिले देवताओं का ही स्वरूप बतलाना अभीष्ट था । अत-एव अधिदैवत के देवताओं का ही स्वरूप बतलाया गया है । देवताओं के अतिरिक्त पितर, असुर, गन्धर्व, आदि का स्वरूप जानना शेष रह जाता है । इन में से असुरों का स्वरूप तो देवताओं के निरूपण के अनन्तर ही बतला दिया जायगा, एवं शेष प्राणों का समय समय पर प्रकरणानुसार स्वरूप बतलाया जायगा । हमारे प्रकृत प्रकरण के देवता, और असुर, दो ही देवता निरूपणीय होंगे । ग्राज जिन आधिभौतिक देवताओं का स्वरूप हम आपके सम्मुख रखना चाहते हैं, वे ' मनुष्यदेवता ' थे । जैसे प्रकृतिमण्डल में प्राण-देवता हैं, एवमेव अधिभूत में भी देवता हैं । ' हैं ' कहना अनुचित होगा । ' देवता थे ' यह समझना उचित होगा । आज अधिभूत ं देवताओं का इस भूमण्डल में सर्वथा अभाव है । कारणविशेषों से, जिनका कि थोड़े अक्षरों में आगे दिग्दर्शन कराया जायगा, सम्पूर्ण ' भौमदेवता ' आज इस भूतल से नष्ट होचुके हैं । जिसे आप पृथिवी कहते हैं, किसी समय केवल इसी पृथिवी में त्रैलोक्य - व्यवस्था थी । पृथिवी ( भृ ), अन्तरिक्ष ( भुवः ), एव द्यौ ( स्वः ), तीनों लोक इसी पृथिवीलोक में थे । जैसे प्रकृति में त्रैलोक्य व्यवस्था है, तदनुसार उसी की प्रतिकृति पर यहाँ भी त्रैलोक्य - व्यवस्था थी । यह व्यवस्था कब से चली?, क्यों चली १, कहाँ चली १, कबतक चली?, कैसे चली?, इस व्यवस्था की प्रामाणिकता क्या है?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान करना प्रकृत से एकान्ततः दूर जाना है । आगे आने वाले आख्यान - उपाख्यानों में समय समय पर हम इन सभी प्रश्नों पर प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे । प्रकरणसङ्गति के लिए भी इस विषय में केवल थोड़े शब्दों में इनका स्वरूप बतलाने की चेष्टा करते हैं । इस विषय को प्रारम्भ करें, इसके पहिले हम अपने वेदप्रेमी पाठकों की सेवा में इतना और निवेदन कर देना चाहते हैं कि, आप इस विषय को आद्योपान्त कर ही इसके सत्यासत्य निर्णय की कृपा करैं । वेदज्ञानप्रचार के विलुप्तप्राय होने से आज सभी भारतीय सम्प्रदाएँ हमारे विचार से दूर हटीं हुई हैं । क्या सनातनधर्मी, क्या आर्यसमाजी, सभी की दृष्टि में वेद अपौरुषेय है । ईश्वरकृत है । नित्य है । अतएव अनादि है । अतएव इनके विचार से वेदों में इतिहास नहीं है । ' बबरप्रात्राहणिरकामयत ' इत्यादि स्थलों में आने वाले प्रवाहण के पुत्र बत्रर को वायुपरक लगा कर ये महानुभाव दूर वेद को ऐतिहासिक मर्यादा से लेगए हैं । हम स्वयं सनातनधर्म के सेवक होने का गर्व रखते हैं । एवं साथ ही आर्यसमाज के हिन्दुत्त्व प्रेम, विधर्मियों के आक्रमणों से समाज की रक्षा करने का, संघठन आदि आदि कितने एक स्तुत्य कार्यों का अभिनन्दन करते हैं । हम भी वेद को अपौरुषेय ही मानते हैं । हम भी वेदों की नित्यता के ही अनुयायी हैं । यह सबकुछ होते हुए भी हम ' वेद में इतिहास नहीं है ' ये अक्षर सुनने के लिए कदापि सन्नद्ध नहीं हैं । हमारा तो यह भी विश्वास है कि, वेदों में इतिहास न २७२ X.

पृष्ठ 536

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शतपथब्राह्मण मानने के कारण हीं श्रान भारतवर्ष अपने वास्तविक गौरव से सदा के लिए पराः परावत बन गया है । अतएव भारत की विलुप्तप्राया सभ्यता के पुनरुज्जीवन के लिए वेदोदधि में अनन्तकाल से निमग्न इतिहास-रत्न का पुनराविर्भाव करना हीं होगा । उसके आधार पर संसार को भारतवर्ष के महिमाशाली अतीत गौरव का स्मरण कराना हीं होगा, एवं तंद्वारा एकबार भारतवर्ष में पुन: इस जगदगुरु का साम्राज्य स्थापित करना - हीं होगा | ऐसा करने में ही भारत का अभ्युदय है । ' हमारे सिद्धान्त के अनुसार वेदों में इतिहास नहीं है ' इस अभिनिवेशमूलक कल्पित सिद्धान्त के दुराग्रह में पड़कर किसी विचार को सुनने के लिए भी सन्नद्ध न होना सत्योपासक के लिए लज्जा की बात है । हम मनुष्य हैं । ' ' असत्यसंहित हम मनुष्यों के सिद्धान्त मिथ्या भी होसकते हैं ', इसी एक सुसिद्धान्त को सामने रखते हुए हमें सबके विचार सुनने चाहिएँ, एवं उन्हें शास्त्र की कसौटी पर कसना चाहिए । अनन्तर जो सिद्धान्त इस कसौटी पर खरा उतरे, उसे अपना लेना चाहिए । जैसे विशेष परिस्थितियों के लिए हमारे शास्त्रों का ' तर्काप्रतिष्ठानात् ' ( शास्त्रीय विचारों में कुत्सित, एवं अप्रासंगिक तर्कोंका कोई मूल्य नहीं है ) - यह सिद्धान्त है, वैसे ही शास्त्रीय आदेशों के विषय में हमारे ही

शास्त्रों का -' आर्षं धर्मोपदेशंच वेदशास्त्राऽविरोधिना ।

यस्तर्केणानुसंधते स धर्म्म ं वेद नेतरः ' ॥

- मनुः १२।१० इति । यह भी तो घन्टाघोष है । ' जिस धर्म्मवचन को तर्क की कसौटी पर कस लिया जाता है, वही 1 धर्म्म धर्म्म है । अन्धविश्वास से माना गया धर्म्म अधर्म है ' यह सिद्धान्त भी तो हमारा ही है । फिर क्यों न हम उसके अनुसार चलने के लिए सन्नद्ध हों । इसी सिद्धान्त को सामने रखते हुए हम आपके • सामने यह ऐतिहासिक प्रकरण रखने की धृष्टता कर रहे हैं । जिन का मत तास्सुत्र ( हठधर्मी ) की बुनियाद पर खड़ा है, वे जैसे दलील करने वाले इन्सान को काफिर ( नास्तिक ) बतला कर ' कुफ ' का फ़तवा नास्तिक की उपाधि ) दे देते हैं, पूर्वोक्त मनु - सिद्धान्त को अपनाने वाले हमारा मार्ग ' कुफ्रमार्ग ' का अनुगम करने वाला तो नहीं होना चाहिए । हम जो कुछ कहेंगे, प्रमाणपुरःसर कहेंगे । युक्तिसंगत कहेंगे । यदि हमारे बतलाए हुए प्रमाण, एवं युक्तियाँ आपको निस्सार प्रतीत हों, तो आप हमें भविष्य के लिए उद्बुद्ध करैं । हम इस चेतावनी के लिए आप के आभारी होंगे । अन्यथा ' शेषं कोपेन पूरयेत् ' मात्र से हमने जन्म से ही डरना नहीं सीखा । ऐसी अवस्था में तो हम केवल कविश्रेष्ठ की— ' ये नाम केचिदिह नः प्रथमन्त्यवज्ञां जानन्तु ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः । उत्पत्स्यतेऽस्ति मम कोऽपि समानधर्मा कालोऽह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथिवी ' इस सूक्ति को ही आपके सम्मुख समर्पित करते हुए अपने कर्तव्य पर और भी अधिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने की चेष्टा करेगे । अतिपुरातनकाल में, जबकि यह भूमण्डल धन - धान्य से पूर्ण था, जिस सुसमय में विश्वहितैषी • राजनीतिज्ञों का आधिपत्य था, उस समय इस धरातल पर प्रधानरूप से विज्ञानप्रघाना ' साध्य ' जाति का २७३

पृष्ठ 537

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 537 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड आधिपत्य था । जैसे आज इस भारतवर्ष में सामाजिक व्यवस्था का आधारस्तम्भ ज्ञान, क्रिया, अर्थादि, मेदमूलक जन्म – कर्म्म, दोनों का आश्रय लेकर अपनी स्वरूप - सत्ता प्रतिष्ठित रखने वाला ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भेदभिन्न चातुर्वर्ण्य - विभाग व्यवस्थित है, वैसे ही उस पुरातनयुग में भी समाज — व्यवस्थापकोंनें मनुष्यसमुदाय को चार जातियों में विभक्त कर रक्खा था । दूसरे शब्दों में- प्रचलित वर्णव्यवस्था ही कुछ परिवर्तन के साथ उस समय भी प्रचलित थी । जिस ज्ञान - क्रियादि प्राकृतिक प्रपञ्च को आधार मान कर आज की व्यवस्थाएँ प्रचलित हैं, उस समय की व्यवस्था का मूलस्तम्भ भी वही था । वे चारों जातियाँ उस युग ं ( साध्ययुग ) में १ साध्य, २ महाराजिक, ३ आभास्वर एवं ४ तुषित, इन नामों से प्रसिद्ध थीं । मस्तिष्क से सम्बन्ध रखने वाली, ज्ञानज्योति की प्रधानरूप से उपासना कर संसार में ज्ञान विज्ञान का प्रसार करने वाली ' साध्यजाति ' थी. शस्त्रास्त्रों के द्वारा समाज की रक्षा करने वाली बाहुबलप्रधाना ‘ महाराजिकजाति ' थी | कृषि, गोपालन, एवं वाणिज्य से देश की अर्थव्यवस्था करने वाली उदरप्रधाना ' श्राभास्त्ररजाति ' थी । एवं सेवाधर्म्म की अनुयायिनी पादप्रधाना ' तुषितजाति ' थी । दूसरे शब्दों में विज्ञानप्रधान साध्य उसयुग के ब्राह्मण थे । क्रियाप्रधान महाराजिक क्षत्रिय थे । अर्थप्रधान आभास्वर वैश्य थे । एवं सेवाधर्म्मप्रधान तुषित शूद्र थे । इन व्यवस्थाओं के कारण - जिनका कि समाज का सुचारुरूप से संचालन करने के लिए होना आवश्यक है - उस समय सर्वत्र समृद्धानन्द का पूर्ण साम्राज्य था । इसप्रकार ऐहलो-किक सुख के लिए जो कुछ अपेक्षित होता है, उस युग में वह सबकुछ विद्यमान था । परन्तु उत्तमोत्तम भोज्यपदार्थों के रहने पर भी जैसे बिना रस के ( नमक के ) सभी भोज्य पदार्थ नीरस रहते हैं, एवमेव त्रिना ब्रह्मसत्ता के तत्त्कालीन समाज वास्तविक आनन्द से ( शान्तानन्द से ) दूर होने के कारण बाह्य विभूतियों सेसुखमय होता हुआ भी परमार्थतः दुःखमय ही था । एक ब्रह्मसता के अभाव से ही उस युग में केवल स्वध्यजाति ही १० विभागों में विभक्त थी, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । ' असन्नेव स भवति असद् ब्रह्म ति वेद चेत् ' ( तै ० उपनिषत् २ व ० ६ अ ० ) ' जो ब्रह्मसत्ता को नहीं मानता, ' अस्ति ' ( ' है ' ) तत्त्व की उपासना नहीं करता, वह स्वयं असत् ही है । अर्थात् ब्रह्मको न मान कर केवल ' नास्ति ' मूलक असवाद का अनुगमन करने वाला स्वयं ' नास्ति ' है | वह स्वयं कुछ नहीं है ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार जिसके बिना कुछ नहीं, उस ब्रह्मसत्ता से विदूर रहने के कारण वह समुदाय सबकुछ रखता हुआ भी कुछ न था । अर्थ, एवं क्रिया सदा ज्ञानशक्ति के आधार पर ही प्रतिष्ठित रहती है । उस युग में ज्ञानप्रधाना साध्यजाति क्योंकि क्षणिक जगत् को अपने ऊपर प्रतिष्ठित रखने वाले अखण्ड नित्य व्यापक सच्चिदानन्दघन ब्रह्मतत्त्व की सत्ता स्वीकार नहीं करती थी । यही कारण था कि, इस साध्यजाति के सङ्केत पर चलने वाली शेत्र तीनों जातियाँ भी पूर्णरूप से उस ' नास्ति ' तत्त्व की ही अनुयायिनीं बन रहीं थीं । उस साध्यजाति ने अपने बुद्धिबल से नवीन नवीन अद्भुत आविष्कार कर उस समाज को दिखला दिया था कि, विज्ञान एक ऐसी वस्तु है, जिससे मनुष्य * समृद्धानन्द, शान्तानन्द, भेद से आनन्द दो प्रकार का होता है । सांसारिक आनन्द ( विषया— नन्द ) को समृद्धानन्द कहते हैं, एवं आत्मानन्द को शान्तानन्द कहते हैं । ब्रह्मसत्ता के अज्ञान के कारण उस समय केवल समृद्धानन्द की ही सत्ता थी । २७४

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 538 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण ‘ कर्त्तुं मकतु ' मन्यथाकर्त्तुं समर्थ ' होसकता है । इस जाति का कहना था कि, जब हम अपने विज्ञानत्रल से नवीन भूमण्डल उत्पन्न कर सकते हैं, नवीन सूर्य्य बना सकते हैं, नवीन आकाश बना सकते हैं, कहाँ तक हैं । जो कुछ हम प्रकृतिमण्डल में देख रहे हैं, विज्ञान के द्वारा वह सब कुछ हम भी बना सकते हैं, तो फिर ऐसी अवस्था में ग्रसत् से भिन्न एक सत् नित्य तत्त्व को मानने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । इसप्रकार जैसे बीसवीं सदी का पाश्चात्यजगत् अपने विज्ञान के गर्व में ग्राकर ( जिनका कि विज्ञान उस समय की विज्ञानराशि का प्रत्यंश भी नहीं है ), ब्रह्मतत्त्व से पराङमुख है, ठीक वही दशा तथोक्ता साध्यजाति की थी । उस एक तत्त्व को न मानने के कारण हीं उस जाति में नाना मत प्रचलित होगये थे । आपः से, आकाश से, असत् से, आवरण से, रज से, अमृतमृत्यु से, अहोरात्र से, आदि आदि से सृष्टि होती है, यह उन का सिद्धान्त था । इन सबमें परस्पर मतभेद था । वे ही मत ऋग्वेद में अम्भोवाद, व्योमवाद, असद्वाद, सदसद्वाद, आवरणवाद, रजोवाद, अमृत मृत्युवाद, अहोरात्रवाद, आदि नामों से प्रसिद्ध हैं | ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में ( मं ० १० सू ० १२६ ) इन सभी मतों का उल्लेख है । १० सों ही मत इतने दृढ़ धरातल पर प्रतिष्ठित थे कि, उहें कदापि अपनी प्रतिष्ठा से च्युत नहीं किया जासकता था । सभी में पर्य्याप्त प्रमाण उपलब्ध होते हैं । सभी अनुकूल युक्तियों पर प्रतिष्ठित हैं । इसीलिए उस समय १० सों ही पूर्णरूप से प्रचलित थे । यह है उस समय की साध्यजाति का संक्षिप्त इतिहास | ' तेन देवा अयजन्त साध्याः ' ' यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ' - यजुः सं ० ३१ | ६ | १६ । इत्यादि मन्त्रों में जिस साध्यजाति का उल्लेख है, वही साध्यनाति इन १० सों वादों की प्रवर्त्तिका थी, जैसाकि ऊपर बतलाया नाचुका है । इसप्रकार विज्ञानवादी इन साध्योंनें उस युग पर अपनी पूरी छाप लगा रक्खी थी | परन्तु जिस ब्रह्मसत्ता की प्रेरणा से यह विश्वचक्र परिभ्रममाण है, उसे यह कब स्वीकृत था कि, उससे उत्पन्न होने वाला मानवसमाज उससे अपरिचित रहे । इसीलिए उस ब्रह्मतत्त्वने सर्वत्र व्याप्त नास्तिकवाद का आमूलचूड़ उन्मूलन करने के लिए-' यदा यदा हि धर्म्मस्य ग्लानिर्भवति भारत! । अभ्युत्थानमधर्म्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ' ॥ - गीता * यद्यपि निरन्तर वेदों का अभ्यास करने के कारण कितने हीं पाश्चात्य विद्वान् क्षणिक से भिन्न एक नित्य तत्त्व को ( ईश्वर को ) मानने लगे हैं, परन्तु अधिकांश में वे लोग इस तत्त्व से नगत् अभी भी पराङमुख ही हैं । २७५

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प्रथमकाण्ड स्मार्त्ती उपनिषत् के उक्त सिद्धान्त के अनुसार अपने अंश से ' ब्रह्म ' ने उसी साध्यजाति में अवतार लिया, जिसके कि अवतार में अवतार सिद्धान्त को मानने वाले किसी भी आत्मनिष्ठ आस्तिक भारतीय को तो किसी भी प्रकार की. आशङ्का करने का अवसर नहीं मिलसकता । साध्यजाति में उत्पन्न होने वाले ब्रह्मावतार इस महापुरुष ने अपने सम्मुख विकट परिस्थिति देखी । उसने देखा कि, इस समय भूमण्डल पर एक भी ऐसा मनुष्य नहीं है, जोकि ब्रह्मसप्ता को मानता हो । चिन्तन किया हिथाते का । अवधानपूर्वक उसने इस वातावरण का साम्मुख्य करना प्रारम्भ किया । साम्मुख्य करने में विलम्ब था । जैसे अन्धविश्वास में निमग्न वर्त्तमान समाज किसी भी सत्यसिद्धान्त को सम्मुख आया देखकर सीमा से बाहिर होजाता है, एवं प्राणपण से उसके विरोध में अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा देता है, एवमेव अपने चिरकाल के अन्धविश्वास के त्रिग़ध में ब्रह्मसत्ता का आक्रमण होता देखकर उस समाजने भी पूर्णरूप से इस महाशक्ति का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया । इस विरोध में अग्रणी वही साध्यजाति थी । साध्यों की प्रबलता के कारण शेष समुदायोंनें भी उसी का अनुसरण किया । इसप्रकार सब ओर से इनका घोर विरोध होने लगा । जब अधिक विरोध बढ़ने लगा, तो ये महापुरुष अधिक चिन्तित हुए । अन्त में उन्होंनें इस ग्रान्दोलन को समाप्त करने के लिए एक दूसरा ही मार्ग निकाला । सेवाधर्म्म में लीन ' तुषितजाति ' की ओर इन्होंनें अपनी दृष्टि डाली । वही जाति उस समय विशेषरूप से सुसंघठित थी । अतएव उसको लक्ष्य बनाकर इन्होंनें अपना काम निकालना चाहा । इनका यह अभिलषित उद्योग पूर्णरूप से सफल हुआ । कृत, द्वापर, त्रेता, इन तीनों युगों के उपलक्षणभूत ‘ संघे शक्तिः कलौ युगे ' इस न्याय के अनुसार इस संघशक्ति के सामने साध्यजाति को अपना मस्तक झुका देना पड़ा । क्षणिकवादी साध्यों के सम्पूर्ण तर्कजाल इस शक्ति के सम्मुख छिन्नभिन्न होगए । “ तुह्मारे दसों मत सर्वथा मिथ्या हैं । यदि एक नित्यतत्त्व को स्त्रीकार कर लिया जाता है, तो १० सों मत सत्य हैं । विश्व क्षणिक कियामय हैं - यह सर्वथा सत्य है । परन्तु एतावता ही प्रत्यक्षानुभूत नित्यतत्त्व का उच्छेद् नहीं किया जासकता । हम अपने विज्ञानत्रल से नया भूमण्डल बना सकते हैं, ' ब्रह्मविद्यया ह वै सर्व मविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते ' ( शत ० १४ | ४ | २ | ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य अपनी विद्या के बल से सत्र कुछ करने में समर्थ है । यह सबकुछ सम्भव है । परन्तु एतावता ही ब्रह्म नहीं है, यह कथन सर्वथा भ्रान्तिमूलक है । जो मनुष्य अपने विज्ञान के सम्मुख सत्रको तुच्छ समझने का साहस करता है, हम उससे प्रश्न करते हैं कि, तुमने कभी अपने स्वरूप की भी परीक्षा की है । क्या तुम बतला सकते हो कि, ' तुम ' क्या हो?, कहाँ से उत्पन्न हुए हो?, पाञ्चभौतिक शरीर के नष्ट होजाने पर तुम कहाँ जाते हो?, सोचो, कुछ उत्तर नहीं मिल सकता । अन्त में तुम्हें ' नेति नेति ' की ही शरण में आना पड़ेगा | तुम स्वयं को जत्र नहीं पहिचानते, तत्र और क्या कर सकते हो । ' मैं यह करता हूँ ' - मैं ऐसा हूँ, लम्बा हूँ, -चौड़ा हूँ-शास्त्रज्ञ हूँ, इसप्रकार जिस स्वानुभवैकगम्य ' मैं ' ' मैं ' की तुम अहोरात्र बड़ी सतर्कता के साथ अपने आपको सज्जीभूत समझते हुए माला जपा करते हो, परन्तु इतने सन्निकट के तत्त्व को भी नत्र तुम —

न वि जानामि यदि वेदमस्मि निण्यः सन्नद्धो मनसा चरामि ।

यदा मागन्प्रथमजा ऋतस्यादिद्वाचो अश्नुवे भागमस्याः ॥

— ऋग्वेद मं ० १। सू ० १६४। ऋ ३७– २७६

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शतपथब्राह्मण इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार नहीं जानते, तो ऐसी अवस्था में केवल अभिनिवेश में आकर संसारनिर्माण का उद्घोष कर ब्रह्मतत्त्व का विरोध करना क्या प्रौढिवाद नहीं कहा जा सकता? । अपिच क्रिया क्रिया है । नास्ति, अस्ति, नास्ति, भेट से त्रिक्षणा है । मध्य का अस्तिक्षण ' नास्ति ' ही है | सम्पूर्ण विश्व ' क्षाणक क्रियामय है । क्रियामय विश्व का आधार क्रिया नहीं होसकती । सक्रिय वस्तु की उपपत्ति तभी समन्वित हो सकती है, जबकि उनके लिए कोई निष्क्रिय सत्तारूप नित्य धरातल मान लिया जाय । जलप्रवाह क्रिया है । परन्तु यह तत्रतकः अनुपपन्न है, जबतक कि उस के लिए आधारभूत स्थिर धरातल न मान लिया जाय । वृक्ष का पत्ता विकम्पित हुआ । किसने विकम्पित किया? | उत्तर दोगे - वायु ने । वायु स्वयं भौतिक जड़ पदार्थ है । उसे किसने विकम्पित किया?, बुध और शनि ने । ये दोनों ग्रह भी तो जड़ ही हैं । इनमें वायु कम्पित करने का धर्म कहाँ से आया? । परम्परा का अवलम्बन करते जाइए । अन्ततोगत्त्वा आपको श्रवश्यमेव एक ज्ञानघन, सत्ताघन, आनन्दघन नित्यतत्त्व की सत्ता स्वीकार करनी हीं पड़ेगी । मनुष्य, पशु, पक्षी, कृमि, कीट, वनस्पति, देवता, पितर, असुर, गन्धर्व, जलचर, आदि आदि जितने भी प्राणी हैं, सबका ज्ञान भिन्न हैं । सबके ज्ञान में परस्पर अन्तर है । सब को अनुभूत होने वाले श्रानन्द का स्वरूप सर्वथा पृथक् पृथक् है । अतएव जो वस्तु एक के लिए आनन्दप्रद है, वही दूसरे के लिए दुःखप्रद है । एवमेव अस्तितत्त्व भी सत्रका पृथक् पृथक् है । इस ज्ञान, आनन्द, सत्ता - वैचित्र्य से हमें यह अवश्य ही मान लेना पड़ता है, कि अवश्य ही इन नाना ज्ञान, नाना आनन्द, नाना सत्ताओं का मूलस्रोत कोई न कोई सर्वज्ञानघन, सर्वानन्दघन, सर्वसत्ताधन तत्त्व है । उसी सच्चिदानन्दघन ( सत्चित् - ज्ञान - श्रानन्दघन ) ब्रह्मस्रोत की अत्यल्प — मात्राओं को लेकर ही सम्पूर्ण प्राणी अपने अपने स्वरूपों में प्रतिष्ठित हैं । ऐसी अवस्था में ब्रह्मसत्ता को मानने में किसी को कुछ भी आपत्ति नहीं रह जाती । श्रत: हमारा ( ब्रह्मा का ) आपसे ( साध्यजाति से ) यही कहना है कि, जबकि युक्ति, एवं प्रमाणादि से ब्रह्मसत्ता अधिक दृढ़ होती है, तो ऐसी अवस्था में आपको अवश्यमेव इसकी सत्ता स्वीकार कर लेनी चाहिए ” । इसप्रकार इस महापुरुषने युक्तियों, एवं प्रमाणों के द्वारा संघशक्ति को आगे कर तत्कालीन समाज में पूर्णरूप से ब्रह्मसत्ता स्थापित करदी । १० सों मतों के विषय में अन्त में इस दिव्यविभूति ने जो कुछ निर्णय किया, वह ऋग्वेद के निम्नलिखित मन्त्रों से स्पष्ट होजाता है—

नासदासीनो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमापरो यत् ।

किमावरीवः कुह कस्य शर्म्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१ ॥

न मृत्यरासीदमृतं न तर्हि न राज्या अह्न आसीत्प्रकेतः ।

आनीदवातं स्वधया तदेकं ' तस्माद्धान्यन्न परः किंचनास ॥ २ ॥

तम आसीत्तमसा गूल्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् ।

तुच्छेनाभ्वपिहितं यदासी ' तपसस्तन्महिना जायतैकम् ' ॥३ ॥

— ऋग्वेद मं ० १० अ ० ११ सू ० १२६ मं ० १ २ ३ इत्यादि इन मन्त्रों का अर्थ प्रकृत में नहीं किया जासकता । इसके लिए तो सृष्टिविज्ञान का चिरन्तन स्वाध्याय ही अपेक्षित है । अतएव इसे आगे के सृष्टिब्राह्मणों के लिए छोड़ कर प्रकृतानुसरण करते हैं । प्राचीम समय में २७७