Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 541–550

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 541–550

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प्रथमकाण्ड यह नियम था कि, जो मनुष्य जिस तत्त्व की परीक्षा करता था, एवं उसका भूमण्डल पर प्रचार करता था, तत्कालीन विद्वान् उस आविष्कर्त्ता की कीर्ति अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उस तात्त्विक नाम से ही उसे विभूषित कर देते थे । इसी मर्य्यादा के अनुसार क्योंकि इस महापुरुष ने संसार को नवीनरूप से ब्रह्म-तत्त्व का पाठ पढ़ाया था, अतएव तत्कालीन विद्वानोंनें इसे ' ब्रह्म ' नाम से विभूषित कर दिया । अपि च संसार को अपने दिव्योपदेशों से उपदिष्ट कर सब पर ' गुरुत्व ' प्राप्त करने के कारण यह ब्रह्म, किवा ब्रह्मा ' जगदगुरु ' नाम से भी व्यवहृत होने लगे । आधिभौतिक मण्डल में सबसे पहिले. ये ही जगदगुरु ब्रह्मा प्रादुर्भूत हुए । ये ही प्रथम ब्रह्मा श्रागे जाकर पुराणों में ' आदिब्रह्मा ' नाम से प्रसिद्ध हुए । इनकी जन्नभूमि कौनसी थी?, इन्होंनें अपने जीवनकाल में क्या क्या काम किया?, इनकी कितनी आयु थी १, इन ऐतिहासिक घटनाओं में क्या प्रमाण है?, इत्यादि विषयों का विशद निरूपण ' पुराणरहस्यादि ' अन्य निबन्धो में हीं द्रष्टव्य है । दो चार शब्दों में यहाँ भी इन की आवासभूमि आदि के विषय में कुछ निवेदन कर देते हैं । इन भगवान् आदिब्रह्मा की जन्मभूमि पुष्कर है । आपको यह सुनकर आश्चर्य्य होगा कि, जिसे आज सर्वसाधारण ने ' पुष्क ' तीर्थ ' समझ रक्खा है, वह वास्तव में पुष्करतीर्थ की प्रतिकृति ( नकल ) है | वास्तविक पुष्करतीर्थ तो भिन्न ही स्थान में है । जो देश आज परसत्ताओं से पूर्णरूप से युक्त होरहा है, जहाँ से भारतीय व्यवस्था एकान्ततः उच्छिन्न हो चुकी है, उसी सुप्रसिद्ध ' ईरान ' देश में हमारे ब्रह्माजी की जन्मभूमि है । ईरानदेशान्तर्गत वह ब्रह्मजन्मभूमि वर्त्तमान में ' बुखारा ' नाम से प्रसिद्ध है । इसका प्राचीन नाम पुष्कर ही था । परन्तु निरुक्तक्रम के अनुसार वही पुष्कर शब्द क्रमशः पुष्कर, पुकर, पुखर, बुखर, इन नामों में परिणत होता हुआ आज ' बुखारा ' नाम से प्रसिद्ध होगया है । ये ब्रह्मा अपनी जन्मभूमि पुष्कर ( बुखारा ) से भारतवर्ष तीन बार आए थे । भारतवर्ष में जिस स्थान पर ब्रह्मा आकर ठहरे थे, वही स्थान आज भारतवर्ष में ' पुष्करतीर्थ ' नाम से प्रसिद्ध सुपुण्यतीर्थ है । ब्रह्माजी की भारतीय श्रावासभूमि यही थी । अतएव भारतवर्ष में इस स्थान के अतिरिक्त और कहीं भी ब्रह्माजी का मन्दिर नहीं हैं । यदि कहीं है भी, तो वे सत्र गौण हैं । जिस पुष्कर में भगवान् ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हुआ था, वह तो श्राज सर्वथा यवनप्राय ही होरहा है । अखिल भूमण्डल पर अपना साम्राज्य प्रतिष्ठित रखने वाले हम कूपमण्डूक भारतीयोंनें श्राज अपनी संकुचित सीमा नाली है । विषय आवश्यकता से अधिक लम्बा होता जारहा है । अत: इसे यहीं समाप्त कर हम पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । ब्रह्माने तुषितों को अपना कर संघशक्ति के आधार पर ब्रह्मसत्ता को तो प्रतिष्ठित कर दिया | परन्तु उन्हें चिन्ता इस बात की हुई कि, कोई ऐसा उपाय करना चाहिए कि, जिससे भवि-ष्य में इस समाज में नास्तिकता का प्रवेश न होसके, एवं युगधर्म्मानुसार चिरकाल पर्य्यन्त यह व्यवस्था अक्षुण्ण ही बनी रहे । उक्त चिन्ता को दूर करने के लिए उहें प्रकृतिदेवी के दर्शन हुए । उन्होंने सोचा कि, मनुष्य असत्य-संहित है, मिथ्याभावाक्रान्त है । अतएव मनुष्यकल्पित - नीतिप्रधान व्यवस्थाएँ चिरकाल पर्य्यन्त कभी स्थिर नहीं रहसकतों । त्रिशेषसत्ता रखने वाला साम्राज्यलोलुप नीतिमात्र का श्रनुयायी समाज अपने से पहिले समाज की व्यवस्थाओं का, आचार - व्यवहारों का घोर शत्रु बन जाता है, एवं उसे प्राणपण से नष्ट - भ्रष्ट करने के लिए उद्यत होजाता है । क्योंकि पहिले की व्यवस्थाएँ मनुष्यकल्पित होतीं हैं । अतएव अधिक शक्तिशाली इस २७८

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शतपथब्राह्मण नवीन समाज को इस निर्बल समाज की व्यवस्थाओं को छिन्न भिन्न करने में अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता । इस आपत्ति को दूर करने का एकमात्र उपाय होसकता है, तो प्रकृति की उपासना करना हीं हो सकता है । प्रकृति का आश्रय लेकर जो व्यवस्था व्यवस्थित की जाती है, वही दृढ़ होसकती है । जैसी व्यवस्था प्रकृतिमण्डल ( आधिदैविकमण्डल ) में है, यदि आधिभौतिक जगत् में भी वैसी ही व्यवस्था कर दी जाती है, तो कितने हीँ अंशों में वह समाज अपनी व्यवस्था को इतर सभ्यताओं के आक्रमणों से बचाने में समर्थ होसकता है । प्रकृतिविज्ञ इस महापुरुषने उक्त प्राकृतिक - सिद्धान्त को सम्मुख रखते हुए निखिल भ्रमण्डल को तदनुरूप व्यवस्था में ही व्यवस्थित करने का संकल्प किया । विचार करने मात्र में विलम्ब था । उसी समय इस सत्यसंकल्प, सत्यकाम ब्रह्माने अपने. विचार को कार्य्यरूप में परिणत कर दिया । जो कुछ प्रकृति में होरहा है, ब्रह्माने यहाँ भी वैसा ही ' केया ' । इस मनुष्यब्रह्मा की नित्य व्यवस्था का कैसा स्वरूप था?, इसके पहिले हम पुनः अपने पाठकों को थोड़ी देर के लिए प्राकृतिक व्यवस्थाओं की ओर लेजाना श्रावश्यक समझते हैं । जिस धरातल पर पशु, पक्षी, मनुष्य, कृमि, कोट, ओषधि, वनस्पति, धातु, उपधातु, रस, उपरस, आदि आदि यच्च-यावत् जडचेतन विवर्त्त प्रतिष्ठित हैं, उसे ' पृथ्वीलोक ' कहते हैं । आकाश के जिस प्रदेश में भगवान् सहस्र-दीधिति ( सूर्य्य ) प्रतिष्ठित हैं, वही ' स्वर्गलोक ' है । इसी को ' द्यौः ' कहते हैं । एवं सूर्य्य, और पृथ्वी, दोनों के मध्य का ' जतना निरावरण स्थान है, उसे ही ' अन्तरिक्षलोक ' कहते हैं । सौरसम्वत्सर प्रजापति की भूः, भुबः, स्वः, ये ही तीन व्याहृतियाँ हैं । इन्हीं तीन शब्दब्रह्मों से वह प्रजापति क्रमशः भूलोक, भुवर्लोक, एवं स्वर्लोक, इन तीनों लोकों को उत्पन्न करता है । एवं इन तीनों को उत्पन्न कर यह सौरप्रजापति ' तत् सष्ट्वा तदेवानु-प्राविशत् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार इन तीनों के केन्द्र में प्रतिष्ठित होजाता है । ( देखिए -ऐतरेय आरण्यडक आ ० २ ० १ खं १ . वही प्रजापति इन तीनों लोकों का अधिष्ठाता बनता हुआ रथन्तरपृथ्वी के पुष्करद्वीप में आज भी प्रतिष्ठित है । ब्रह्मा जत्र रहते हैं, पुष्कर में हीं रहते हैं । हमारे इस मनुष्यब्रह्मा की जन्मभूमि अन्य किसी नाम से व्यवहृत न होकर ‘ पुष्कर ' नाम से ही क्यों प्रसिद्ध हुई? इसका उत्तर यहीं प्रकृति है । क्योंकि प्राकृतिक नित्य ब्रह्मा ' पुष्कर ' में हीं प्रादुर्भूत हुए हैं, एवं मनुष्यब्रह्मा उसीके अवतार थे । अतएव उन की जन्मभूमि भी उसी नाम से प्रसिद्ध हुई । निवेदनीय यही है कि, व्याहृतित्रय से उत्पन्न भूः भुवः, स्व:, इन तीनों लोकों में वह प्रजापति क्रमशः अग्नि, वायु, आदित्य, अपने आपको इन तीन स्वरूपों में विभक्त कर प्रतिष्ठित हुए-( शतपथ ६ काण्ड २ ब्रा ० ) । उसी दिव्यवस्था के अनुसार आज पर्य्यन्त सम्पूर्ण भूमण्डल अग्निदेवता के अधिकार में है, सम्पूर्ण अन्तरिक्ष लोक वायुदेवता की सत्ता से श्राक्रान्त है, एवं सम्पूर्ण द्यु लोक को श्रादित्यदेवता ने अपने अधिकार में कर रक्खा है । ये तीनों देवता इन लोकों के ' अतिष्ठावा ' * देवता कहलाते हैं । ये तीनों ‘ शवसोनपात् ' भी कहलाते हैं । में हम कह आए हैं कि, अन्तरिक्षक में रुद्र के पुत्र ४६ मरुतों का निवास है, एवं मरुद्वायु में एक चतुर्थांश इन्द्र का ( मरुत्त्वान् इन्द्र का ) रहता है । इसप्रकार अन्तरिक्ष में वायु, और मरुत्त्वान् इन्द्र, इन दो देवताओं का आधिपत्य सिद्ध होजाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर सर्वश्री यास्क कहते हैं— * ब्राह्मीभाषा ( संस्कृतभाषा ) के ' अधिष्ठाता ' शब्द के स्थान में ' छन्दोभाषा ' में देवताओं के व्य-वहार में आनेंबाली वेदभाषा में ' प्रतिष्ठात्रा ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । २७६

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प्रथमकाण्ड ' अग्निः पृथिवीस्थानः, वायुर्वा इन्द्रो वाऽन्तरिक्षस्थानः, सूर्योद्य स्थान इति ' ( या नि ० दे ० का ० ७ ( ५ ) । पृथिवी का पिण्ड अग्निमय है । सम्पूर्ण भूपिण्ड अग्निज्वालाओं से अभिव्याप्त है | भूपिण्ड के केन्द्र से बड़े वेग से अग्निज्वालाएँ निकेल रहीं हैं । ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है । यदि वह लीलाधर इन अग्नि-ज्वालाओं का पाषाणशिलाओं से आच्छादन न करता, तो वे ज्वालाएँ भूमण्डल पर रहने वाले सभी प्राणियों को क्षणमात्र में भस्मसात् ही कर देतीं । हमारी तो कथा ही दूर है, स्वयं भूपिण्ड ही खण्ड खण्ड होकर उस आपोमय ÷ अर्णसमुद्र में विलीन होजाता । केन्द्र से निकलने वाली इन अग्निज्वालाओं को अवरुद्ध करने वाला दूसरा पर्वतस्तर है । सम्पूर्ण अग्नि इन पर्वत गियों से श्रावृत हो रहा है । इन्हीं पर्वतश्रेणियों के कारण अग्नि का वेग अभिभूत होरहा है । श्रतएव भूपिण्ड कालग्रास से बचा हुआ है । अग्नि को अभिभूत कर भूपिण्ड को स्वस्वरूप से धारण करने के कारण हीं इस दूसरे पर्वतस्तर को ' भूधर ', एवं ‘ महीधर ' नामों से व्यवहृत किया जाता है । भूपिण्ड के सबसे अन्त के मिट्टी के स्तर पर जो आप बड़े बड़े, कोसों लम्बे पर्वत देख रहे हैं, वे भूगर्भित उन महा महा पर्वतों की शिखाएँ - ( चोटियाँ ) मात्र हैं । पृथिवी के यत्र तत्र भाग में उन पर्वतों की चोटियाँ हीं निकल रहीं हैं । इसी से श्राप उन भूगर्भित पर्वतों की विशालता का अनुमान लगा सकते हैं । यद्यपि भण्ड के अन्तराल का कोई भी स्थान इन पाषाणचट्टानों से रिक्त नहीं है, तथापि कहीं कहीं इनकी घनता में ( मोटाई में ) न्यूनता है । जहाँ जहाँ पाषाणस्तर निर्बल होता है, वहीं वहीं अग्नि को अपने बलप्रयोग करने का अवसर मिल जाता है । प्रायः ही उसकी भूतोन्नति को एक निमेष में भस्मात् कर देने वाले यमकोटि ( जापान ) के भूकम्पों से कौन ऐतिहासिक अपरिचित है? | जब अग्नि बड़े वेग के साथ पाषाण चट्टानों को फोड़ कर बाहिर निकलता है, उस समय वहाँ के कङ्कर - कङ्कर बनकर उड़ने वाले पाषाण समीपस्थ नगरों को सदा के लिए भूगर्भ में विलीन कर देते हैं । अत्र पाषाणस्तर के आगे चलिए । पाषाणस्तर के ऊपर सलिलधाराएँ बह रहीं हैं । जैसे मिट्टी के धरातल पर बड़े बड़े नद चङक्रमण कर रहे हे, एवमेव भूगर्भ में इससे भी अधिक संख्या में, एवं अधिक वेग से बड़ी बड़ी नदियाँ प्रवाहित हैं । यदि यह जलस्तर न होता, तो सम्भवतः उन पाषाणस्तरों को भी अपनी मोटाई का गर्व छोड़ देना पड़ता । यह अग्नि पाषाणों को सजातीय बनाकर उनको स्वस्वरूप से च्युत करना चाहता है, परन्तु ऊपर बहने वाला पानी पत्थरों को आर्द्र ' रखता हुआ अग्नि का गर्व खर्व करता रहता 1 अन्तरिक्ष की वायुधाराओं, एवं धरातल की नदनदी - धाराओं के समान प्रबल वेग से प्रवाहित रहने वाले ÷ रोदसी, क्रन्दसी, संयती, ये तीन त्रैलोक्य हैं । रोदसी त्रैलोक्य का आपोमय समुद्र ' अर्णव ' समुद्र कहलाता हैं । ‘ ततः समुद्रो अर्णवः ' ( ऋक् ) से यही समुद्र अभिप्रेत है । कन्दसी त्रिलोकी का वायु-मय समुद्र ‘ सरस्वान् ' कहलाता है । सरस्वतीवाक् का इसी सरस्वान् समुद्र से सम्बन्ध है । एवं संयती त्रिलोकी का प्राणमय समुद्र ‘ नभस्वान ' कहलाता है । इन तीनों समुद्रों का विशद स्वरूप आगे अने वाले सृष्टि-ब्राह्मणों में किया जायगा । २८.

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शतपथब्राह्मण भूगर्भ के अनन्त स्रोत ही पार्थिव योषधि - वनस्पतियों के परिपाक में अधिक उपयोगी होते हैं । कूप, सरोवर, आदि का निखनन करते समय यदि उनके नीचे प्रवाहित रहने वाली किसी अविच्छिन्न ( सदा बहने वाली ) धारा से सम्बन्ध हो जाता है, तो उन कूप सरोवरों का पानी कभी नष्ट नहीं होता । यही पानी ' पातालफोड़-पानी ' कहलाता है | कौनसी धारा किस स्थान पर बहती है?, किस धारा का पानी कैसा है?, कितना गहरा है?, इन सत्र तथ्यों का परिचय ' दगार्गल विद्या ' # से प्राप्त किया जासकता है । इस विद्या में प्रधानरूप से वृक्षों की सहायता ली जाती है । पत्तों की आर्द्रता, निग्धता, आयाम, घनता ( लम्बाई, चौड़ाई ) परिसर ( घेरा ), नति ( झुकाव ) आदि से तथ्यान्वेषण किया जाता है । आज यह विद्या विलुप्तप्राय है, तथापि कहीं कहीं इस विद्या के उच्छिष्टभोगी उपलब्ध होजाते हैं | विशेषकर मरुभूमि ( मारवाड़ ) में इसके विशेषज्ञ अब भी प्राप्त होते हैं । ये लोग मिट्टी को सूँघ कर, उस का स्वाद लेकर बतला देते हैं कि, अमुक स्थान में इतना गहरा पानी है, इसका ऐसा स्वाद है | इन लोगों को देशभाषा में - ' सूँघा ' ( सूँघ कर पता लगाने वाले ) कहा जाता है । सम्पूर्ण प्रपञ्चसे नष्कर्ष यही निकला कि, पृथिवी के केन्द्र में अग्नि है । इसके ऊपर पाषाणस्तर हैं । इसके ऊपर पानी का स्तर है । सत्र के ऊपर मिट्टी है । मिट्टी के ऊपर ओषधि - वनस्पतियाँ हैं । ये ही पृथिवीशरीर के केशलोम हैं । इन सत्र में जिस अग्नि को हमने भूपिण्ड का घातक बतलाया था, आज उसे ही. हम रक्षक बतलाते हैं । एक दृष्टिकोण से अग्नि घातक था, आज दूसरे दृष्टिकोण से वही अग्नि इसका रक्षक बन जाता है । केन्द्रशक्ति के आधार पर ही उस वस्तु की सत्ता रहती है । वही केन्द्र वस्तु का ग्रहण कर, दूसरे शब्दों में पकड़ कर उसे स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रखता है । अतएव उसे ' गर्भ ' कहा जाता है । ' गृहाति पदार्थम् ' व्युत्पत्ति से ‘ गर्हः ' बनता है । ‘ हृप्रहोर्भश्छन्दसि ' ( पा ० सू ० वा ० ) से छन्द में ' हृ ' को ' भ ' हो जाता है । अतः ' वेद में ' गर्ह ' के स्थान में ' गर्भ ' बोला जाता है । यह केन्द्रशक्ति उसी अग्नि की शक्ति है । उसी के आधार पर क्योंकि भूपिण्ड प्रतिष्ठित है, अतएव हम अवश्य ही इस केन्द्रशक्तिरूप अग्नि को भूपिण्ड का रक्षक मान लेते हैं । केन्द्रस्थित यह अग्नि ( पार्थिव रहकर यही उन पदार्थों की रक्षा करती प्रजापति कहलाता है । यह शक्ति केन्द्र में रहती है । केन्द्र में ) | स्वयं प्राणरूप होने से नित्य, अतएव अजन्मा होकर भी इतर यच्चयावत् पदार्थों को उत्पन्न करती है । अतएव वेदपुरुष कहते हैं—

" प्रजापतिश्चरति गर्भे " अन्तरजायमानो बहुधा विजायत ।

तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥

-यजुः सं ० ३१ | १६ | जो जिस वस्तु का केन्द्र पहिचान जाता है, उसके लिए वह वस्तु ( उठाने की क्रिया में ) सर्वथा निर्भार ( हल्की ) होनाती है । यह केन्द्रस्थ अग्नि बड़े वेग से निकला हुआ भूपिण्ड से बड़ी दूर पर्य्यन्त व्याप्त * यह ' दगार्गलविद्या ' देशमेद से अनूपकाण्ड, मरुकाण्ड, एवं जाङ्गलकाण्ड, इन तीन काण्डों में विभक्त है । तीनों देशों के लिए तीन व्यवस्थाएँ हैं । इस विद्या का वेदों में, विशेष कर वेद के ब्राह्मणभाग में सूत्ररूप से उल्लेख है, एवं श्रार्य्य सर्वस्व में ( पुराण में ) विस्तार के साथ निरूपण है । परन्तु दुःख के साथ कहना पड़ता है कि, आज उन पुराणरत्नों की ओर किसी भी विद्वान् का ध्यान नहीं है । २८१

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प्रथमकाण्ड रहता है । नहाँतक अग्निमण्डल व्याप्त रहता है, वहीं तक इस भूपिण्ड का प्रत्यक्ष हो सकता है । इस मण्डल के बाहिर निकल के अनन्तर वह भूपिण्ड दृश्य होजाता है । भू.पेण्ड को पदार्थमात्र का उपलक्षण समझना चाहिए | जितने भी पदार्थ हैं, वे सत्र ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार अग्नि, एवं सोममय हैं । इनमें २१ वें * अहर्गण पन्त अग्नि व्याप्त रहता है, एवं ३३ वें अहर्गणपर्य्यन्त सोम व्याप्त रहता है । वस्तु छोटी हो, अथवा बड़ी हो, सब में ये ३३ विभाग हैं । ये ३३ सों विभाग एक वाक्तत्त्व के ( जिसका कि स्वरूप प्रकृत में बतलाना प्राकृत होगा ) हैं । इन ३३ वाग्विभागों के ६१, १५२, १७३, २१४, २७—, ३३६, ये ६ स्थूल विभाग होते हैं । ये ६ नों विभाग ' म्तोम ' कहलाते हैं । उस एक ही वाक् के ये ६ विभाग हैं, अतएव ये ३३ सों अहर्गणों का वाङ मण्डल ' वौषट्कार ' ÷ कहलाता है । ' केन्द्र, पणफर, किंस्तुध्न, आदि शब्द मयासुर के द्वारा आविष्कृत आसुरभाषा के शब्द हैं । बराहमिहिरने ईरान में जाकर इस मयवंश से ही ज्यौतिष की शिक्षा प्राप्त की है । अतएव प्रचलित ज्यौतिष में ( जो कि आसुर है ) गर्भ के लिए ' केन्द्र ' शब्द प्रयुक्त हो रहा है । किन्तु वेदाङ्ग ( वैदिक ) ज्यौतिष में केन्द्र के लिए विशेषकर ‘ गर्भ ' शब्द, एवं कहीं कहीं हृदय, तथा ' सान्तर ' शब्द आया करता है । यही वौषट्कार ‘ वषट्कार ' ' वौषट् ' आदि नामों से प्रसिद्ध है । इस से बतलाना हमें यही है कि, प्रत्येक क्स्तु के २१ वें अहर्गण पर्य्यन्त अग्नि रहता है, अतएव प्रत्यक्ष उस वस्तु का तत्सीमापर्य्यन्त ही होसकता है । प्रत्यक्ष का एकमात्र कारण अग्नि ही है, न कि सोम । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर यास्क कहते हैं— ' यच्च किंचिद्दाष्टिविषयकमग्निकम्मैव तत् सर्वम् - ( या. नि. दै. काः ७ श्र. ८ ख. ३ इति ) अन्य पदार्थों के विषय में हमें यहाँ कुछ नहीं कहना । यहाँ केवल पार्थिवाग्नि की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करना है | यह पार्थिवाग्नि २४ अंश के व्यासार्द्ध से वृत्त बनाकर केन्द्र से निकलता है । इसका १, * अहर्गण क्या वस्तु है?, इनकी संख्या कितनी हैं रथन्तरसाम का क्या स्वरूप है १, इस प्राजा-पत्याग्नि के क्या धर्म्म हैं?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान ' वषट्कार ' विज्ञान पर ही निर्भर है । जब इन्द्र के लिए आहुति दी जाती है, उस समय उच्चस्वर से ' इन्द्राय वौषट् ' यह बोला जाता है । पूर्वोक्त प्रश्नों के उत्तर इसी वौषट् में निहित हैं । देवता इसी वषट्कार के आधार पर रहते हैं, अतएव इसे ‘ देवपात्र ' भी कहा जाता है । ÷ वाक्तत्त्व स्थूल है । इसके गर्भ में प्राण रहता है । प्राण के भी गर्भ में मन रहता है । तीनों अविनाभूत हैं । साँकेतिक भाषा में मन को ' अ ' कहा जाता है, प्राण को ' उ ' कहा जाता है, एवं वाक् को ' म् ' कहा जाता है । क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर किसी आगे के प्रकरण में दिया जायगा । अ - उ के संयोग से ' ओ ' हो जाता है । इस ' ओ ' को वाक् के गर्भ में डाल दिया जाता है । इससे वही वाक् वृद्धि के द्वारा ' वौक़ ' बन जाती है । केवल वाक् के ६ विभाग नहीं है । अपितु मनःप्राणगर्भिता वाक् के ६ विभाग हैं | इसी रहस्य को बतलाने के लिए इसे ' वाक्पटुकार ' न कह कर ' वौषट्कार ' कहा जाता है । चौक् का ‘ मनःप्राणगर्भिता वाक् ’ यही अर्थ है । २८२

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शतपथब्राह्मण व्यास ४८ अंशात्मक समझना चाहिये । ऐसा बृहद् व्यास रखता हुआ यह अग्नि केन्द्र से परिधि - मण्डल-पर्यन्त अभिव्याप्त । इस अग्नि की जो उत्तरसीमा है, उसे ही ' सुमेरु ' कहते हैं, एवं दक्षिणसीमा ' कुमेरु ’ नाम से प्रसिद्ध है । सुमेरु का उत्तरध्र व से सम्बन्ध हैं, एवं कुमेरु का दक्षिणध्रुव से सम्बन्ध है । सम्पूर्ण भौम अग्नि इन्हीं दोनों ध्रुवों से आबद्ध है । उत्तर - दक्षिण - ध्रुवों से आबद्ध जो यह प्राजापत्याग्नि है, उसे ही ' अक्ष ' ( धुरा ) कहा जाता है । ध्रुवद्वय से आबद्ध भूपिण्ड इसी प्राजापत्याग्नि के चारों ओर परिक्रमा लगा रहा है, अतएव इस अग्नि को ' क्ष ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । भूपिण्ड की ' स्व ', और ' पर ' भेद से दो गतियाँ होतीं हैं । जैसे कुमार के चक्र में अवयवगति ही है, माथे पर रख कर लेजाते हुए उसी चक्र की समुदायगति ही है, एवमेव अपनी धुरी पर परिक्रममाण क्रान्तिवृत्त की परिक्रमा लगाता हुआ यह भूपिण्ड ‘ उभयगति ' के अन्तर्भूत होजाता है । क्रान्तिवृत्त सूर्य्य की वस्तु है, इधर यह प्राजापत्याग्निरूप ‘ अक्ष ’ भूपिण्ड का अपना भाग है, अतएव इस अक्षर्गात को ' स्वाक्षपरिभ्रमरण ' कहा जाता है । यह भूपिण्ड २४ होरा ( घन्टों ) में अपने इस अक्ष की एक परिक्रमा लगा लेता है । क्योंकि अहोरात्र का स्वरूप इसी गति से सम्पन्न होता है, अतएव इस गति को ' दैनंदिन गति ' भी कहा जाता है । इसप्रकार इस अपने ऋक्ष पर परिभ्रमण करता हुआ, इसी परिभ्रमण अहोरात्र का स्वरूप सम्पा— दित करता हुआ यह भूपिण्ड ' ज्योतिष्चक्र ' के बृहतीछन्द ( विष्वद्वृत्त ) के मध्य में प्रतिष्ठित सूर्य्य को केन्द्र बनाता हुआ २४ अंश के व्यासार्द्ध ' पर बने हुए ( कल्पित ) क्रान्तिवृत्त के चारों चोर परिक्रमा लगा रहा है | इस की इस परिक्रमा से ही सम्वत्सर का स्वरूप सम्पन्न होता है, जैसाकि आगे आने वाले इसी काण्ड के अग्रिम ब्राह्मण में स्पष्ट किया जायगा । हमने बतलाया था कि, जिन ध्रुवों से प्राजापत्याग्नि आबद्ध है, वह स्थिर है । पार्थिव सुमेरु, और कुमेरु का इन्हीं ध्रुवों से सम्बन्ध है । अतएव इन्हें ' अचल ' कहा जाता है । वास्तिविक तथ्य को न जानने ' के कारण आज कितने हीं वैदिक, एवं पौराणिक विषयों में अनेक भ्रान्तियां व्याप्त हो रहीं हैं ।: प्रज्ञान के कारण, सर्वोपरि परिभाषाज्ञान के प्रभाव से अन्यथा ही समझ लिया जाता है । एवं उस अपने दोष को मढ़ा जाता है शास्त्रों के मत्थे । यही बात हमारे इस सुमेरु आदि के विषय में है । सुमेरु को भी एक ‘ पहाड़ ' समझा जारहा है, एवं उसे निरा पत्थर का पहाड़ ही नहीं, अपितु सुवर्ण का पहाड़ माना जारहा है | परन्तु वस्तुस्थिति है कुछ ओर ही, जैसाकि पाठकों को निम्नलिखित निदर्शन से विदित होगा । ध्रुव को हमने स्थिर बतलाया है । एक बात और है । ध्रुव किसी नक्षत्र का नाम नहीं है । अपितु प्राण-त्रिन्दु ( जो कि निराकार है ) को ही ध्रुव कहते हैं । वही विधर्त्ता स्थिर प्राण इस भूपिण्ड को आकर्षित किए हुए है । इसी प्राण को ‘ ध्रौवविद्युत् ' कहते हैं । ऐन्द्र, सौम्य, धौव, तीन प्रकार की विद्युत् मानीं गई ं हैं | सूर्य्य से निकलने वाली विद्युत् ' ऐन्द्रविद्युत् ' कहलाती है । जिसका हम प्रत्यक्ष कर रहे हैं, वह यही ' सौर-विद्युत् ' है । विद्युत् साक्षात् इन्द्र है - ( देखिए केनोपनिषत् ४ सं ० ४ मं ० ) । काशिराज प्रतद्दनमहाराज ने उपासना से इन्द्र को प्रसन्न किया था । एवं प्रतर्द्दनने वरदान में इन्द्र से - ' मैं आपको ( इन्द्र ) ही पहिचा-नना चाहता हूँ ' यही वर माँगा था । इसके उत्तर में अपनी शक्ति का निदर्शन करते हुए इन्द्र ने कहा था कि-२८३

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प्रथमकाण्ड ' एतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये, यन्मां विजानीयात् । तं मामायुरमृतमित्युप ( स्व । प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ( कौ ० उपनिषत् ३० अ ० १ मं ० ) । ' मैं मनुष्य के लिए यही हिततम समझता हूँ कि, वह मुझे पहिचान जाय । सो हे प्रतद्द'न! तुम मेरी आयु, एवं अमृतरूप से उपासना करो । मैं हीं प्रज्ञात्मक प्राण हूँ ' श्रुति का यही अक्षरार्थं है । इस श्रुति में जिस इन्द्र का वर्णन है, वह ' सौम्यविद्युत् ' है । आत्मा का इसी से सम्बन्ध है । आँख, कान, मुख, हाथ, इत्यादि शरीर के श्रृङ्गों में जो एकप्रकार की स्फुर्ति प्रतीत होती है, वह इसी सौम्यविद्य त् की महिमा है । जत्र तक यह है, तभीतक आयु है । यह विद्युत् सूर्य्य से ऊपर की वस्तु है । अहर्गणविभाग के अनुसार यह सौम्य-विद्युत् २५ वें अहर्गण पर स्थित है । इस अहर्गण को ' विवाक्यमहः ' कहा जाता है । इसी को ‘ महाव्रत ’ कहते हैं । एवं जो आकाश में प्रदीप्त होने वाली विद्युत् है, वह सौरविद्युत् है । भौतिक पदार्थों में जो विद्युत् उपलब्ध होती है, वह यही सौरविद्युत् है । तीसरी ' ध्रौवविद्युत् ' है । लौहचुम्बक जिस विद्युत् के आकर्षण से अन्य साधारण लौहखण्डों को आकर्षित कर आत्मसात् कर लेता है, वही धौवविद्युत् है । सौरविद्युत् की अपेक्षा इस में अधिक शक्ति है । इसी विदयुत्ने इतने बड़े भूपिण्ड को अपने आकर्षणसूत्र में श्राद्ध कर रक्खा है । इन्द्र १४ प्रकार का होता है । इन में एक इन्द्र ' विद्युत् ' कहलाता है । पूर्वोक्त तीनों विद्युत् विद्युत् हैं, अतएव हम तीनों को ' इन्द्र ' कह सकते है । शक्तित्रयोपेत इस इन्द्र को जो पहिचान जाता है, सचमुच उसके लिए किसीकी कमी नहीं रहसकती । आज तो तीनों में से एक विद्युत् को पहिचान लेने पर ही पाश्चात्यजगत्ने सम्पूर्ण संसार पर अपना प्रभुत्त्व स्थापित कर लिया है । कोई समय था, जबकि हमारे वेज्ञा-निक महर्षि तीनों विद्युतों को पहिचानते थे, एवं उनसे काम लेते थे । परन्तु उह्नीं की सन्तान आज विद्युत् को ‘ अभ्त्र ' ( हौआ ) समझ कर उससे कोसों दूर भागती है । आज उसे इस तथ्य का यत् किञ्चित् भी बोध नहीं है कि, ये सभी विद्याएँ उसके ग्रन्थों में बड़े विस्तार से प्रतिपादित हैं । क्या हम भी कभी अपने अतीत का अनुसरण करेंगे? । अपनी इत्थंभृता पतनदशा पर अश्रुपात करते हुए हम पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । ' ध्रुव ने इस भूपिण्ड को आबद्ध कर रक्खा है ' पूर्वनिदर्शन से हमें केवल यही बतलाना है । इस ध्रुवचिन्दु के समीप जो स्थूल तेजस्वी नक्षत्र होता है, ( ध्रुवबिन्दु के परिचयार्थ । उस समीपस्थ नक्षत्र को ही ' ध्रुव ' कह दिया जाता है । इस ध्रुवचिन्दु की स्थिरता के कारण ही भौम प्राजापत्याग्नि को ‘ अचल ' कह दिया जाता है । जैसे हमारे मेरुदण्ड ( रीड की हड्डी ) पर सर्वाङ्गिशरीर प्रतिष्ठित है, एवमेव इसी प्राजापत्याग्नि के आधार पर सम्पूर्णं भूपिण्ड प्रतिष्ठित है । अतएव इसे भी मेरुदण्ड - स्थानीय होने के कारण ' मेरु ' कहा जाता है । उत्तर की ओर स्वर्ग है, अतः उत्तर सीमास्थित मेरु को ' सुमेरु ' कहा जाता है, एवं दक्षिण की ओर यमपथ है, अतः उसे ' कुमेरु ' कहा जाता है । हमारे मनुष्यब्रह्मा का सुमेरु से ही सम्बन्ध है । अतएव यज्ञप्रकरण में हम उसी का स्वरूप बतलाएँगे । यह सुमेरु अग्निमय है । अग्नि को ' हिरण्यरेता ' कहते हैं ' परमाणु को ' रेत ' कहते हैं । आग्नेय परमाणु हिरण्य ( सुवर्ण ) सदृश होते हैं । अतएव अग्नि को ' हिरण्यरेता ’ कहा जाता है | ऐसी अवस्था में हम इस ' सुमेरु ' नामके ' अचल ' को अवश्य ही ' सुवर्णाचल ' कहसकते हैं । यही भूताग्निरूप ‘ सुवर्णाचल ( अग्निस्कम्भ ) ' प्राणाग्निरूप ब्रह्मा की श्रावासभूमि है । २८४

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शतपथब्राह्मण हमने ध्रुव को स्थिर बतलाया है । परन्तु ध्रुव की यह स्थिरता आपेक्षिक ही समझनी चाहिऐ । वस्ततस्तु ध्रुव भी परिभ्रममाण ही है । उत्तर ध्रुव से ठीक २४ अंश के व्यासार्द्ध से एक वृत्त बनाइए । इसी वृत्तपर ध्रुव घूमता है । इस ध्रुवपरिणभ्रमणवृत्त के ठीक मध्य में ' कदम्बबिन्दु ' है । इसी को ' नाक ' कहते हैं । यही स्थान ' विष्णुपद ' कहलाता है । ध्रुव इसी को केन्द्र बना कर इसी के चारों ओर परिक्रमा लगाया करते हैं । सूर्य्यं के ऊपर हमने परमेष्ठी बतलाया है । यह परमेष्ठी साक्षात् विष्णु है । यह कहाँ है?, इनको हम आकाश के किस भाग में उपलब्ध करें?, इस के लिए पूर्वोक्त कदम्बबिन्दु ही आधार मानी गई है । जिसे ‘ कदम्ब ' कहते हैं, ठीक उसी के साम्मुख्य में भगवान् परमेष्ठी हैं । उस स्थान पर दृष्टिनिग्रह कर विष्णुप्राण की आराधना की जासकती हैं । कदम्ब कोई नक्षत्र नहीं है । अपितु एन कल्पित बिन्दु है । इस की पहिचान ध्रुव ही है । ध्रुव जिस स्थान पर है, उस से पूर्वोक्त वृत्त बनता है । इस के केन्द्र में ( जहाँ वासुकिसर्प का फण है ) उसके मध्य में इसकी सत्ता माननी चाहिए । हमारे वैज्ञानिक महर्षि विष्णुप्राण को आत्मसात् करने के लिए निरन्तर आकाश में इस कदम्ब की ओर आँख फाड़ २ कर देखा करते थे, जैसा कि ऋग्वेद के

निम्नलिखित मन्त्र से स्पष्ट है-तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।

दिवीव चक्षुराततम् ॥

—ऋ ० मं ० १ सू २२ ऋक् २० इति हमारा ध्रुव इस विष्णुपद की २५ सहस्र वर्षों में एक परिक्रमा लगा लेता है । यह ध्रुवपरिभ्रमणकाल हम शतायु मनुष्यों की अपेक्षा बहुत लम्बा है, अतएव हमारे लिए यह ध्रुवपरिक्रमा स्थितिभाव से कम माहात्म्य नहीं रखती । हम इसे अपनी १०० वर्ष की आयु में स्थिर ही देखते हैं । परन्तु प्राकृतिक विज्ञान के आधार पर आपको यह विश्वास करना चाहिए कि, ध्रुव वस्तुतः विचाली ही है । इस विषय में युक्तियाँ, और प्रमाण अनेक हैं | परन्तु उन सब का यहाँ उल्लेख नहीं किया जासकता । केवल एक ही प्रधान युक्ति बतला कर हम इसका परिभ्रमण सिद्ध करते हैं । वह अकाट्य युक्ति है ' अयनपरिवर्त्तत ' । यदि ध्रुव सर्वा स्थिर होता, तो अयनपरिवर्तन कदापि सम्भव नहीं था । भूपिण्ड का विष्वद्वृत्त घूमता यह कदापि । स्थिर नहीं रहता | विषुवपरिवर्तन को ही अयनपरिवर्तन कहते हैं । इस यन की परिक्रमा २५ हजार वर्षों में होती है । यह भौम त्रिषुव ( अयन ) ध्रुव से श्राद्ध है, यह पूर्व में कहा जाचुका है । ऐसी छावस्था में जबतक ध्रुव का परिभ्रमण नहीं होता, तबतक इस अयन का परिभ्रमण कदापि सम्भव नहीं है । अयन परिवर्तनशील है, इसमें प्रमाण बतलाने की आवश्यकता ही नहीं है । ब्राह्मणग्रन्थों में उल्लिखित भिन्न २ सम्पात ही इसके परिभ्रमण में दृढ प्रमाण हैं । कौषीतकिश्रुति में रोहिणी नक्षत्र पर वसन्तसम्पात बतलाया गया है । स्वयं शतपथने कृत्तिकानक्षत्र पर वसन्तसम्पात माना हैं । हम उत्तरभाद्रपद पर सम्पात देखते * कृत्तिकास्वग्नीऽयादधीत । एता वा श्रग्निनक्षत्रं, यत् कृत्तिकाः 1 । सर्वाणि हऽग्रन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यै दिशश्च्यवन्ते । एता ह वै - कृत्तिकाः - प्राच्यै दिशो न च्यवन्ते1 - शतपथ २२११२ / १,२,३, । २८५

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प्रथमकाण्ड हैं । इस अनुष्पात से यह विषुवत् श्राज कृत्तिका से ५ नक्षत्र हटा हुआ है । प्रत्येक नक्षत्र के १३ अंश २० कला ( तेरह अंश बीस कला ) होतीं हैं । एवं प्रत्येक अंश का उपभोग करने में विध्रुव को ७५ वर्ष लगते हैं | इस गणनक्रम से शतपथ को बने अनुमानतः ५ हजार वर्ष होजाते हैं । इन सम्पातभेदों से ही ब्राह्मणादि वेदग्रन्थों के कालका निर्णय होता है । किसी समय मृगशिरा पर वसन्तसम्पात था । उस समय वहीं से वर्षारम्भ माना जाता था । उसी स्थिति को लक्ष्य में रखकर ' मासानां मार्गशीर्षोऽस्मि ' यह कहा जाता है । इन भिन्न भिन्न वसन्तसम्पातों से हमें बाध्य होकर अयन का परिभ्रमण मान लेना पड़ता है । यह तभी सम्भव है, जब कि ध्रुव को विचाली मान लिया जाय । ऋषि - किसी समय अभिजित् -नक्षत्र ही ध्रुव माना जाता था । हम बतला आए हैं कि, निराकार प्राणांचन्दु का नाम ही ध्रुव है । वह जहाँ रहती है, परिचयार्थ उसके समीप के स्थूल तेजस्वी नक्षत्र का वह नाम रख दिया जाता है | जिस समय अभिजित् पर ध्रुव था, उस समय हमारे देश में वेदविद्या का पूर्ण श्रभ्युदय था । अभ्युदय का सम्बन्ध ध्रुव से है । जहाँ ध्रुव रहता है, वही देश सुसमृद्ध रहता है । क्योंकि पार्थिवसम्पत्ति ध्रुव केही आधीन है, जैसाकि ऋग्वेद के निम्नलिखित मन्त्र से स्पष्ट है—

( १ ) -जज्ञानं सप्तमातरो वेधामशासत श्रिये ।

ध्रुवो रयीणां चिकेत यत् ॥

—ऋक्सं ० ६ | १० | २ | ४ | ( २ ) - जज्ञानः सप्तमातृभिर्मेधामाशासत श्रिये! अयं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा ॥ - सामसंहिता पू ० २ | १ | सुप्रसिद्ध ‘ सप्तर्षि ’ को ही ‘ सप्तमाता ' कहते हैं । यही ध्रुव को पहिचानने का सरल उपाय है । सप्तर्षि आकाश के जिस ( उत्तर ) प्रदेश में है, उससे ठीक २४ वें अंश पर जो तेजस्वी नक्षत्र है, वही ध्रुव है । सप्तर्षि घूमते हैं । इनके परिभ्रमणमण्डल के केन्द्र में ( श्राज का ) ध्रुव है । लक्ष्मी, और मेवा, दोनों इस ध्रुव ( दर्शन ) से बढ़ती हैं । क्योंकि यही ध्रुव सम्पूर्ण सम्पत्तियों का प्रेरक है । इस का प्रत्यक्ष प्रमाण इतिहास है । जब ध्रुव अभिजित् पर था, तब भारतवर्ष समुन्नत था । जब रूमदेश पर था, तत्र वह समुन्नत था । मिश्र का सुप्रसिद्ध ' पिरामिड ' इसी प्रवकाल में बना था । यहां से हटकर ध्रुव पाश्यात्य ( यूरोपादि ) देशों पर गया । जाने में विलम्ब था । वे देश चमक पड़े, एवं पिछले देश वैभवशून्य होगए | आज यह ध्रुव १२ || हजार वर्ष समाप्त कर आधी परिक्रमा समाप्त कर चुका है | एवं ईश्वरानुग्रह से पाश्चात्य देशों से उसके हटने का समय आ गया है, जैसाकि वर्त्तमान परिस्थितियों से स्पष्ट है । जिसदिन १२ || हजार वर्ष समाप्त कर ध्रुव पुनः अभिजित् पर आ जायगा, उसी समय पुनः भारतवर्ष में वेदविद्या ममुत्पन्न हो पड़ेगी । इसी को युगपरिवर्तन कहते हैं । इसी युगपरिवर्तन को लक्ष्य में रखकर कहा जाता है कि-२८६

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शतपथब्राह्मण

' युगान्तेऽन्तर्हितान् वेदान् सेतिहासान् महर्षयः ।

लेभिरे तपसापूर्वमनुज्ञाता स्वयम्भुवा ॥

– पुराणे इन्हीं पूर्वोक्त कारणों से हम ध्रुव को त्रिचाली मानते हैं । इस ध्रुवपरिवर्तन के कारण ह्रीं ध्रुव से आबद्ध प्राजापत्याग्निरूप भौम सुमेरु भी परिवर्त्तनशील है । यही कारण है कि, जो सुमेरु पुराणनिर्माण– काल में हिरण्यशृङ्ग पर्वत के समीपस्थ ' प्राग्मेरु ' ( पामीर ) पर था, वह आज वहाँ से हटकर पानी में ( समुद्र में ) आगया है । जिस समय मनुष्यब्रह्मा प्रकृति के अनुसार इस भूपण्डल पर नवीन व्यवस्थाएँ व्यवस्थित कर रहे थे, उस समय इन्होंनें अपने निवास के लिए इसी पामीर को अभीप्सित माना था । पामीर के हिरण्यशृङ्ग पर्वत पर ही ब्रह्मा की राजधानी थी । कारण इसका यही था कि, सुमेरुरूप ब्रह्मा उस समय उसी स्थान पर थे । दूसरे शब्दों में उसी हिरण्यशृङ्गपर्वत पर उस समय सुमेरुबिन्दुः थी । अतएव प्राकृतिक नित्य व्यवस्थाओं के प्रेमी ब्रह्मा ने उसी हिरण्यशृङ्गपर्वत पर अपना निवासस्थान बनाना उचित समझा । जिस हिरण्यशृङ्गपर्वत का हम दिग्दर्शन करा रहे हैं, वह निरक्षवृत्त से ६० अंश पर है । निरक्षवृत्त लङ्का * पर है । विष्ववृत्त से अक्षांशों का विभाग होता है । अतएव इसे ' निरक्ष ' माना जाता है । इस निरक्ष से ध्रुवप्रदेश ६० अंश पर है । इधर दक्षिणध्रुव भी ६० अंश पर ही है । निरक्ष से उत्तर ६० अंश पर्य्यन्त हमारी ' भौम त्रिलोकी ' है । निरक्ष से पामीरपर्य्यन्त ( जोकि ६० अंश पर है ) पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, तीन लोक हैं । ' हैं ' क्या, उस समय थे । ग्रागे जाकर जिस दिव्यत्रिलोकी का हम स्वरूप बतलाने वाले हैं, इस भौमत्रिलोकी का स्वरूप उसी के अनुसार बनाया गया था, जैसा कि वहीं स्पष्ट हो जायगा । विष्वद्वृत्त से ‘ शय णावत ' पर्य्यन्त पृथिवीलोक था । सुप्रसिद्ध ' रावी ' नदी इसी शर्य्यणावत पर्वत से निकलती है । यही नदी हमारे शास्त्र में ' इरावती ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं यहाँ से ' निषधपर्वत ' पर्य्यन्त अन्तरिक्षलोक था । एवं इस निषधपर्वत से पामीर पर्य्यन्त स्वर्गप्रदेश था । इस त्रिलोकी के पृथिवी के अधिपति अग्निदेवता थे, अन्तरिक्ष के वायु थे, एवं द्युलोक के आदित्य थे । अग्नि हीं पृथिवी का भरणपोषण करते हैं । प्रकृति में पृथिवी श्रग्निदेवता के आधीन हैं । अतएव यहाँ भी आग्नेय, वायव्य, ऐन्द्र, इन में से अग्निजाति के अग्निदेवता को ही यहाँ का अध्यक्ष बनाया गया था । यह पृथिवीलोक, एवं अन्तररिक्षलोक, दोनों स्वर्गाधिपति इन्द्र के प्राधीन थे । इन्द्र ने अपनी ओर से पृथिवीलोक में अग्नि को प्रति-निधि ( वायसराय ) बनाया था । भूलोक से कर ग्रहण कर स्वर्ग में पहुँचाना, पार्थिव प्रजा के अन्नादि का * श्राज इस लङ्का के विषय में भी बड़ा विवाद है । आजकल कितने हीं विद्वान् ' सीलोन ' को ही लङ्का मान रहे हैं ' । परन्तु हम इस में सहमत नहीं हैं । हमारे अनुमान से सीलोन ' सिंहलद्वीप ' है । एवं लङ्का हमारे शास्त्र में निरक्षस्थान पर मानी गई है । उधर सिंहल ७ = ४० अक्षांशो पर उपलब्ध होता है । एवं हमारे शास्त्रोंनें द्वीपगणना में लङ्का, और सिंहल दोनों की पृथक् पृथक् गणना की है । ऐसे ऐसे अनेक प्रमाण हैं, जिन के आधार पर हम सिंहल को लङ्का मानने का प्रतिवाद करसकते हैं । हमारे अनुमान से तो आज लङ्का समुद्रगर्भ में हीं विलीन है । २८७