Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 551–560

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 551–560

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प्रथमकाण्ड प्रबन्ध करना, विशेष मानवों को स्वर्ग के लिए ' प्रवेशपत्र ' प्रदान करना, इत्यादि सत्र कार्य्यं इसी अग्नि के ग्राधीन थे । जिस पर इन्द्र की विशेष कृपा होती थी, उसे वे स्वर्ग में बुलाते थे । एवं जिस पर अत्यन्त ही कृपा होती थी, उसे अपनी ‘ सग्धि ' ( सहभोज में समन्वित करते थे । और उसे अपने समकक्ष आसन देते थे । ऋभु, त्रिभ्वा, वाज, ये तीनों अपने शिल्प के द्वारा प्रसिद्ध हो कर इस सग्धि में समाविष्ट किए गए थे । तीनों मनुष्य थे । परन्तु इन्द्र की कृश से ये देवता बना दिए गए थे । इन्द्र दिन में तीन बार भोजन करते थे । तीनों समय सोमरस पान होता था । एवं तीनों में प्रमुख देवगण समाविष्ट होते थे । सोमपान के कारण वे तीनों भोजनवेलाएँ प्रातःसवन, माध्यन्दिनसवन, एवं सायंसवन, इन नामों से प्रसिद्ध थीं । मान्धाता, नहुप, दिलीप, वैवस्वत, दुष्यन्त, आदि भारतीय चक्रवर्ती राजा भी स्वर्ग में जाकर यह प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके थे । पार्थिवप्रजा का वर्णव्यवस्थानुसार जैसा कर्त्तव्य था, वह इन देवेन्द्र के द्वारा ही नियत था । एवं उस के प्रतिदान में उन सब के अन्न - वस्त्रादि का प्रबन्ध स्वर्ग की ओर से ही होता था । ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र ' ब्रोङ्कार ' के निरीक्षण में ' वामदेव ' वसोर्धारादेश में अन्नसम्बन्धी प्रबन्ध करते थे । एवं चिकित्सा के लिए अश्विनीप्रमुख वैद्य नियत थे । इन्हें स्वर्ग से वेतन मिलता था । एवं सर्वत्र इन्हें निःशुल्क चिकित्सा करनी पड़ती थी । ये देवता थे । देवता होकर ये मनुष्यलोक में आकर मनुष्यों से सम्पर्क करते थे, अतएव इन्हें निम्नश्रेणि में प्रतिष्ठित कर तत्कालीन देवताओं ने कितने हीं समय पर्य्यन्त अपनी पङक्ति में बैठा कर इन का सोमपान करना अवरूद्ध कर दिया था । आगे चल कर महर्षि च्यवन की कृपा से ही इन्हें यज्ञभाग उपलब्ध हुआ था! अस्तु, उस समय कैसा प्रबन्ध था?, इस विषय के लिए हम फिर कभी आगे अपने पाठकों को कष्ट देगें । अभी हमें केवल यही बतलाना है कि, पार्थिव प्रजा का भरणपोषण करने के कारण हीं ये अग्निदेवता ' भरत ' नाम से प्रसिद्ध थे । पिच देवताओं के लिए हव्यभरण करने के कारण भी ये ' भरत ' नाम से प्रसिद्ध थे, जैसा कि निम्नलिखित ब्राह्मणश्रुति से स्पष्ट हो जाता है— ' एष हि देवेभ्यो हव्यं भरति, तस्माद्भरतोऽग्नियरित्याहुः । एव उ वा इमाः प्रजाः प्राणो भूत्वा विभर्त्ति तस्माद्ववाह - ' भरतवदिति ' ( शत ० १ कां ० प्र ० २ ब्र ० ८ कं ० इति ) । इसी अग्नि के कारण यह भूलोक ' भारतवर्ष ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । आज दिन पाठ्य– प्रणाली में स्त्रीकृत इतिहास की कृपा से इस देश के विद्वानों ने हिन्दुस्तान, और ' भारतवर्ष ' को पर्य्याय मान रक्खा है । इनके मतानुसार जो हिन्दुस्तान है, वही भारत है । परन्तु वस्तुस्थिति कुछ ओर ही है | जिस सिन्धुनद को भारत की सीमा माना जाता है, वह वास्तव में आधे भारतवर्ष की सीमा है । त्रैलोक्यविभाग करते समय ब्रह्माने मनुष्यों को भारतवर्ष प्रदान किया था । परन्तु आगे जाकर ' जरथुस्त्र ' नाम के ऋज्राश्व ऋषि के दौहित्र के कारण इन में दो वर्ग हो गये । जरथुस्त्र को लक्ष्य बना कर कुछ एक विद्वानोंने इसका पूर्ण विरोध किया । इन्द्र के अनुयायी ऐन्द्रब्राह्मणों का कहना था कि, इन के श्रौत्पत्तिक कारण – विशेष से इङ्ख समाज में स्थान नहीं मिलसकता । इधर असुरों के नायक वरुणदेवता के अनुयायी वारुणब्रा– ह्मणों का कहना था कि, इस में कोई टोप नहीं है । फलतः दोनों को विभक्त होजाना पड़ा । अधिक क्लेश बढ़ता देख कर ब्रह्माने सिन्धु को मध्यस्थ बना कर भारतवर्ष के दो विभाग कर दिए । सिन्धुनद प्राच्य-२८८

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शतपथब्राह्मण भारत में रहा । क्यों कि‘आर्याण ' ( ईरान ) निवासी वारुणब्राह्मण ' स ' को ' ह ' बोला करते हैं, अतएव यह प्राच्य - भारत ‘ हिन्दुस्तान ' नाम से प्रसिद्ध हो गया । एवं इधर वाले ( सिन्धु के पार वाले ) प्रतीच्य - भारत को -' पारस्थान ' नाम से व्यवहृत करने लग पड़े । आप जितने भी ' पारसी ' देखते हैं, सब वारुणब्राह्मण हैं, एवं वे जरथुस्त्र के अनुयायी हैं । जरथुस्त्र ने तत्र से ही अपना स्वतन्त्र धर्म्म बना लिया था । परन्तु उस का आधार यही वैदिकधर्म्म था । यही कारण है कि, आज भी ये ऐन्द्र ब्राह्मणों की भांति अग्नि की ही उपासना करते हैं । यज्ञोपवीत के स्थान में कटि में सूत्र बाँधते हैं, एवं रजस्वलादि के स्पर्शास्पर्श का जो विचार हमारे में है, उससे भी अधिक कट्टरता के साथ इनमें है | हमारी वेदभाषा ' छन्दोभ्यस्ता ' कहलाती है । इसी की प्रतिकृति पर बना हुआ इनका धर्म्मग्रन्थ ‘ जन्द ì वस्ता ' कहलाया है । प्राच्य भारत जैसे ' आर्यावर्त्त ' कहलाता है, एवमेव वह प्रतीच्य भारत ' यण ' कहलाता है । वही आर्य्यायण निरुक्त क्रमानुसार आज ' ईरान ' नाम से प्रसिद्ध होगया है । इस भारतवर्ष की प्राच्य - सीमा ' पूर्वसमुद्र ' ( चीन का ' यलोसी ' ) है, एवं पश्चिमसीमा ' पश्चिमसमुद्र ' है । इसी को ‘ भूमध्यसागर ' कहते हैं । एवं यही पुराणों में - ' महीसागर ' नाम से प्रसिद्ध है । पाश्चात्यभाषा में यही ' मेडिट्र ' नियेन्सी ' नाम से व्यवहृत हुआ है । सोना, चाँदी, एवं लोहा, इन तीनों की विभिन्न स्थानों में तीन पुरियाँ बनाने के कारण ‘ त्रिपुर ’ नाम से प्रसिद्ध महाबलवान् असुर को रुद्रजटापर्वत पर रहने वाले भगवान् शङ्कर ने इसी स्थान पर मारकर उसके त्रिपुर का विध्वंस कर इसी महीसागर में प्रक्षिप्त किया था । अतएव याज भी पुराणों में यह स्थान परमपवित्र ‘ शर्वतीर्थ ' माना जाता है । यहीं पर ' त्रिपुरी ' स्थान अब भी विद्यमान है । यही त्रिपुरी • आज ' ट्रिपुली ' नाम से प्रसिद्ध है । इस त्रिपुर को नष्ट करने के कारण हीं भगवान् शङ्कर ‘ त्रिपुरारि ' नाम से प्रसिद्ध हुए हैं । यह है हमारे भारतवर्ष की पश्चिम - सीमा, जिसका कि प्रतीच्य - चाकचिक्य से आकर्षित हो जाने के कारण आज हमें स्मरण भी नहीं हैं । इस भारतवर्ष के सम्राट् वैवस्वतमनु थे । मनु के कारण हीं भारतीय प्रजा ' मनुष्य ' कहलाती है । एवं दूसरे स्वयम्भू नाम के आदि मनु अन्यत्र-( एशियामाईनर ) रहते थे । ये कभी भारतवर्ष नहीं आए । यही स्थान ' स्वायम्भुवी - दहरैशिया ' नाम से भी प्रसिद्ध है । भारत में रहने वाली प्रजा जैसे मनुष्य कहलाती थी, एवमेव अन्तरिक्ष में रहने वाली प्रजा मरुत्, एवं स्वर्ग में रहने वाली प्रजा ' देवता ' नाम से प्रसिद्ध थी । हिमालय पर्य्यन्त मनुष्यों की सत्ता थी । यहाँ से ' अलतायी ' पर्वत पर्यन्त मरुतों की सत्ता थी । एवं यहाँ से पामीर पर्य्यन्त देवताओं का राज्य था । दक्षिणसमुद्र से ( निरक्षवृत्त से ) सीधे उत्तर पामीर पर्य्यन्त एक रेखा लेजाइए | एवं ४७ वें अक्षांश पर जाके उस रेखा को काटते हुए दक्षिणोत्तर एक रेखा और कैंच दीजिए । ऐसा करने से - अल-तायीपर्वत से ( जोकि ३६ अक्षांश पर है ) पामीर पर्य्यन्त के स्वर्गप्रदेश के चार खण्ड हो जायँगे । इन चारों में पूर्ण – उत्तर के कोण में ' इन्द्रविष्टपू ' ÷ था । सुवीरों के कारण यह भाग ' सौवीर्य्य ' कहलाता था । यही इन्द्र का राष्ट्र था, एवं इनकी राजधानी ' अमरावती ' नाम से प्रसिद्ध थी । = जिसे लोकभाषा में ' हाता ' - किंवा ' हाता ' कहते हैं, वही पौराणिक परिभाषा में ' विष्टप् ’ कहलाया है । २८६

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प्रथमकाण्ड यही देश आज ‘ एशियाईरूस ' कहलाता है । श्रान जो प्रदेश ' न्यूसाइबीरिया ' नाम से प्रसिद्ध है, उसके, और साइजीरिया के मध्य में यह अमरावती थी । जिस अमरावती में किसी समय संसार की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता का राज्य था, आज वही प्रदेश ध्रुव की कृपा से हिमाच्छन्न हो गया है । एवं आज यहाँ घोर असभ्यों की सत्ता हो रही है । इन्द्र की जो सभा थी, उसका नाम ' सुधर्मा ' था । इन्द्र को प्रतिदिन इसमें, आना पड़ता था । प्रधान प्रधान देवता इनके सदस्य थे । अत्र चलिए वायव्यकोण की ओर । इसमें विष्णु रहते थे । यहाँ पर भद्रगिरि, और चन्द्रगिरि, नाम के दो पर्वत हैं । इन दोनों की सन्धि में हीं विष्णु - भगवान् रहते थे । यही दूसरा ' विष्णुविष्टपू था । एवं नैऋतकोण में ' ब्रह्मविष्टप ' था । ये ही तीनों देवस्वर्ग ' त्रिविष्टपू ' नाम से प्रसिद्ध थे । एवं शेष बचा हुआ जो चौथा अग्निकोण हैं, वहाँ पितर रहते थे । यही ' पितृस्वर्ग ' कहलाता था । जिसे आज ‘ मंगोलिया ' कहा जाता है, वही हमारा पितृस्वर्ग था । यह भूमि जँगल, पानी, बस्ती भेद से तीन भागों में विभक्त थी । जो वीरान जंगल प्रदेश था, वह ' पीलुमती ' कहलाती थी । श्रापोमय प्रदेश – ‘ उदन्वती ’ कहलाती थी । एवं जहाँ पितर रहते थे, वह प्रदेश ' प्रद्यौ ' कहलाता था । प्रकृति में भी ऐसा ही है, अतएव यहाँ भी वैसी ही रचना की गई थी । इन तीनों प्रदेशों का स्वरूप बतलाते हुए वेदमहर्षि कहते हैं—

उदन्वती द्यौरवमा पीलुमती तु मध्यमा ।

तृतीया ह प्रद्यौरिति यस्यां पितर आसते ॥

- श्रथर्व १८२४८ इति पूर्वोक्त तीनों देवस्वर्गों का थोड़ा २ प्रदेश लेकर तीनों की सीमा में एक चौथा साधारण ‘ विष्टप् ’ बनाया गया था । वही ' ब्रध्नस्यविष्टप ' कहलाता था । इसमें सम्पूर्ण देवताओं का समान अधिकार था । यहीं पर एक ' स्वर्गघरुण ' था, जिनका विशद स्वरूप ६ कां ० २ प्र ० २ ब्रा ० में विस्तार के साथ त्रतलाया जायगा | यहाँ पर केवल पामीर की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करना है । जिस हिरण्यशृंगपर्वत का पूर्व में उल्ल ेख किया गया है, उसका धरातल ४०-५० कोस चौड़ा है । एवं यह स्थान सबसे ऊँचा है । अतएव पामीर का यह पश्चिम देश तारतर ( अत्युच्च ) कहलाता है । इसे ही वर्त्तमान में ' टारटरी ' कहते हैं । इसी पर भगवान् ब्रह्मा का * ' प्राग्ज्योतिष ' नगर था । एवं ब्रह्मा की विचारसभा ' कान्तिमती ' नाम से प्रसिद्ध थी । इस कान्तिमती का अधिवेशन मास में एक बार होता था । देवेन्द्र की सुधर्म्मा सभा में केवल देवता ही आते थे । परन्तु इस क्रान्तिमती में असुर, और देवता, दोनों आते थे । क्योंकि देवता, और असुर, दोनों हीं प्रजापति को अपना पिता मानते थे । दोनों हीं इनकी आज्ञा के आधीन रहते थे । जिस पर्वत पर ये भगवान् ब्रह्मा रहते थे, उस हिरण्यशृङ्ग में चारों दिशाओं से चार नदियाँ निकलतीं हैं । इन चारों में —– उत्तर भाग में जाने वाली नदी ' भद्रसोमा ' कहलाती है । इसे पुराणों में - कहीं भद्रा, कहीं * - पूर्ण में पूर्णिया नाम का नगर है । महाभारत में इसको ' प्राग्ज्योतिष ' कहा है । परन्तु इसे पामीरस्थ प्रागज्योतिष से भिन्न समझना चाहिए । इस प्राग्ज्योतिष में ( पूर्णिया में ) सुप्रसिद्ध ‘ नरकासुर ' का आधिपत्य था । २६०

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शतपथब्राह्मण ' सोमा ' एवं कहीं ' भद्रसोमा ' इन तीनों नामों से व्यवहृत किया गया । यही भद्रसोमा आजकल ' वी ' नाम से प्रसिद्ध है । दक्षिण में आने वाली नदी ' अलकनन्दा ' कहलाती है । पूर्व में जाने वाली को ' सीता ' कहते हैं | यही ह्वांगहू ' कहलाती है । एवं पश्चिम में जाने वाली ' यतु ' कहलाती है । इन चारों गङ्गाओं की समष्टि ही — ' चतुर्गङ्गम् ' कहलाती है । इनमें दक्षिणभाग में आने वाली जो अलकनन्दा है, उसमें ' भागीरथी ' मिलती है । गङ्गा का जो माहात्म्य है, वह इसी भागीरथी का माहात्म्य है । निरक्षवृत्त से ३७ - १४ अक्षांशा पर, एवं ७४–१६ द्राघिमांशा पर ( देशान्तर पर ) समुद्रपृष्ठ से १३००० अंश ऊँचा जो ' विष्णुसरोवर ' है, जिसके कि दक्षिण भाग में ही ' जह्न ' महर्षि का आश्रम है - यह भागीरथी निकली है । यही विष्णुसरो-वर ‘ बिन्दुसरोवर ' नाम से भी प्रसिद्ध है । यहीं अलकनन्दा समन्वित होती है । इस अलकनन्दा की आगे जाकर ७ शास्त्राएँ हो जातीं हैं । इन्हीं सातों शाखाओं को ' सप्तगङ्गम् ' कहा जाता है । पूर्वोक्त ‘ चतुर्गङ्गम् ' में हमने एक ' यतु ' नाम की गङ्गा बतलाई है । इस यतु को ' चक्षु ' कहते हैं । एवं ' जम्बु ' भी इसे ही कहते हैं । ' यतु ' इसका वैदिक नाम है, एवं ' चक्षु ' और ' जम्बु ' पौराणिक नाम 1 पाश्चात्यभाषा में यही ‘ यक्षु ' निरुक्त क्रम के अनुसार ' एक्सस् ' नाम में परिणत हो गई है । यही नदी यवनभाषा में ' अमू ' कहलाती है । ' अमू ' शब्द ' जम्बू ' का ही अपभ्रंश है । इस नदी की बालुका. सुवर्ण की कणिकाएँ रहतीं हैं । जल - प्रवाह के साथ साथ ये सुवर्णकणिकाएँ प्रवाहित होकर आगे तक जाया करतीं हैं । क्योंकि यह सुवर्ण जम्बुनद से निकलता है, अतएव इसे ' जाम्बूनद ' कहा जाता है । इसी ´ सुवर्ण के सम्बन्ध से यह पर्वत ' हिरण - - श्रृंग ' नाम से प्रसिद्ध है । इस हिरशृंग पर्वत पर ही उस समय प्राकृतिक प्राजापत्याग्निरूपा सुमेरुबिन्दु थी, एवं यहीं पर मनुष्यब्रह्मा रहते थे, जैसा कि पूर्व में बतलाया नाचुका है । इस विषय के वास्तविक तथ्य को न समझने के कारण हीं भ्रमवश वैदिक ज्ञानविज्ञान अभाव के कारण पौराणिक रहस्य से अपरिचित कितने ही कहा करते हैं कि, ब्रह्माजी सुमेरु पर्वत पर रहते हैं, एवं वह पर्वत सोने का है । ब्रह्मा अवश्य ही सुमेरु पर हैं । परन्तु वह कोई सोने का पर्वत नहीं है । वह तो ' हिर— एयरेत ' अग्नि का स्तूप है । एवं स्थिर रहने के कारण उसे ' अचल ' कह दिया जाता है । पर्वत भी स्थिर होने से ‘ अचल ' कहलाते हैं । अतः पति शब्द अर्थसमता के कारण इस प्रचलबिन्दु से समन्वित हो गया है । उदयाचल का भी यही रहस्य है । ऐसे कोई दो पर्वत नहीं हैं, जिन के पीछे से सूर्योदय होता हो, एवं जिस के पीछे सूर्य्यास्त होता हो । अपितु देशभेद के अनुसार पूर्वक्षितिज की उदयस्थानीया जो अचलत्रिन्दु है, उसी का नाम ' उदयाचल ' है । एवं पश्चिमक्षितिज के समीप की स्थिर अस्तविन्दु ही अस्ताचल है । देशभेद के अनुसार सभी स्थानों में उदयाचल, अस्ताचल की सत्ता सिद्ध हो जाती है । सम्पूर्ण प्रपञ्च से प्रकृत में हमें यही बतलाना है कि, * ' मणिजाजाति ' में ब्रह्मसत्ता स्थापित करने वाले मनुष्युब्रह्मा पुष्कर * जिन ज्ञानकल्प साध्य, चलप्रधान महाराजिक, अर्थप्रधान आभास्वर एवं शिल्पप्रधान तुषित, इन चारों जातियों का पूर्व में संक्षिप्त निरूपण किया जाचुका है, वे ही चारों जातियाँ ' मणिजा ' नाम से प्रसिद्ध थीं । यह इन चारों का साधारण ( व्यापक ) नाम था । प्रसङ्गागत यह भी समझ लेना उचित होगा कि-मणिजात्रों में जो साध्यजाति थी, उसके १२ विभाग थे | महाराजिकों के २२० भेद थे । श्राभास्वरों के ६४ भेद थे । एवं तुषितों के ३६ विभाग थे । इतनी श्रेणियों में विभक्त ये चारों समुदाय ' मणिजा ' कहलाते थे, जैसा कि आगे आने वाले आख्यानोपाख्यानों में प्रसङ्गानुसार समय समय पर स्पष्ट होता रहेगा । २६१

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प्रथमकाण्ड ( बुखार ) में उत्पन्न हुए, एवं इह्नोंने अपना निवासस्थान पामीरप्रदेश में हिरण्यशृङ्गपर्वत पर बनाया । यहाँ रहकर इह्नोंनें इस भूमण्डल पर प्रकृतिवत् सम्पूर्ण व्यवस्थाएँ व्यवस्थित कीं । एकप्रकार से त्रैलो ÷ य – व्यवस्था बतलादी गई । अब दूसरे प्रकार से त्रैलोक्य का स्वरूप बतलाते हैं । आजकल जिसे ' भूगोल ' कहा जाता है, वही हमारे शास्त्र में ' भुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध है । विकासवाद के अनुसार हमारे शास्त्रों में तीन प्रकार के भुवनकोशों का निरूपण मिलता है । वे तीनों भुवन-कोश १ – यज्ञभुवनकोश, २ – पाद्मभुवनकोश, एवं ३ - वर्षभुवनकोश, इन नामों से प्रसिद्ध हैं | विज्ञान-मूलिका यज्ञविद्या में निष्णात साध्यजाति ने जिस क्रन से त्रैलोक्य - व्यवस्था की थी, वह ' यज्ञभुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध हुई, जिसका कि अन्यत्र निरूपण किया जायगा । एवं ब्रह्माने जो व्यवस्था की, वह ' पाद्मभुवनकोश ' कहलाई । अन्त में तीसरी ‘ वर्षभुवनकोश ' नाम की व्यवस्था हुई । प्रकृत में इह्रीं दोनों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । हमने बतलाया है कि, उत्तरध्रुव भी विषुव से ६० अंश पर है, एवं दक्षिणध्रुव भी ६० अंश पर है । दोनों के समन्वय से १८० अंश हो जाते हैं । पूर्व की व्यवस्था में हमने विषुत्र को मध्य में मान कर उत्तर व पर्य्यन्त त्रैलोक्य बतलाया था । परन्तु अब इस दूसरी व्यवस्था में विषुव को क्षितिज मान कर त्रैलोक्य का स्वरूप बतलाया जाता है । दूसरे पाद्मभुवनकोश का इसी दूसरी व्यवस्था के साथ सम्बन्ध है । प्राकृतिक मण्डल का स्वरूप कुछ और है, एवं दृश्यमण्डल का स्वरूप कुछ ओर है 1 । पहिली व्यवस्था दृश्यमण्ड से सम्बन्ध रखती है, एवं यह दूसरी व्यवस्था प्राकृतिक मण्डल मे सम्बन्ध रखती है । भूपिण्ड बृहतीछन्द ( विषुव ) के मध्य में प्रतिष्ठित सूर्य्य को मध्य में रख कर उसके चारों ओर ४८ अंश के परिसरवाले क्रान्तिवृत्त पर घूमता है, यह बतलाया जाचुका है । इस परिभ्रमण में दृश्यमण्डल के अनुसार भूपिण्ड हमें ( तिय्यंक तिरछा घूमता हुआ प्रतीत हो रहा है । अतएव हमें उत्तर एवं दक्षिण ध्रुव खस्वस्तिक, एव अधः स्वस्तिक ( ठीक उर्ध्वभाग, एवं टीक अधोभाग ) में प्रतीत न होकर तिरछे प्रतीत हो रहे हैं । ऐसी अवस्था में विष्वद्वृत हमारे त्रैलोक्य का क्षितिज नहीं बनता । ऐसे विष्वत् से सम्बन्ध रखने वाली, दूसरे शब्दों में दृश्यमण्डल के विष्वद्वृत्त से सम्बन्ध रखने वाली जो त्रैलोक्य व्यवस्था है, पूर्व में उसी का निरूपण किया गया है । अत्र चलिए प्राकृतिक मण्डल की ओर । प्रकृति के अनुसार भूपिण्ड तिर्य्यक् नहीं घूमता । श्रपितु वह सर्वथा सीधा ही घूमता है । ऐसी अवस्था में उत्तर ध्रुव उसके ठीक स्वस्वस्तिक पर आजाता है, एवं दक्षिणध्रु व अधःस्वस्तिक में आजाता है । ' ऊँचा ' और ' नीचा ', ये दोनों भाव इन दोनों ध्रुवों से सम्बन्ध रखते हैं । यदि हम से कोई पूँछता है कि, बतलाओ ऊँचा स्थान कौनसा है?, तो हम अपनी आँखों को शून्य आकाश की ओर करके उस की ओर अंगुलि करके कहते हैं कि, यह भाग ऊँचा हैं, एवं नीचे की ओर सङ्क ेत करके कहते हैं कि, यह नीचा है । सचमुच दृश्यमण्डल के अनुसार ( जिस का कि व्यावहारिक--दृष्टि से सम्बन्ध है ) अंगुलि- निर्दिष्ट प्रदेश ही ऊँचा और नीचा है । परन्तु यथार्थ में ऐसा नहीं है । प्राकृ-तिक मण्डल के अनुसार ( जिसका कि पारमार्थिक दृष्टि से सम्बन्ध है ) उत्तरध्र व प्रदेश ठीक ऊँचा है, एवं दक्षिण ध्रुवचिन्दु ठीक हम से नीचे है । ऐसी अवस्था में भूपिण्ड का विष्वत् हमारे इस दूसरे त्रैलोक्य का विष्वत् जन जाता है । एक गोलवृत्त बना लीजिए | उसे भूपिण्ड समझिए | इस भूपिण्ड की जो ऊपर की बिन्दु है, उसे सुमेरु समझिए, एवं सुमेरु के खस्वस्तिकभाग में उत्तर व समझिए । एवमेव नीचे की २६२

पृष्ठ 556

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शतपथब्राह्मण अन्तिम बिन्दु को कुमेरु समझिए, कुमेरु के अधः स्वस्तिकभाग में दक्षिण ध्रुव समझिए । इस व्यवस्था के अनुसार सुमेरु ठोक केन्द्र में होगा । एवं दक्षिण ध्रुव इस से १८० अंश पर होगा | क्योंकि सुमेरु की सिध में ' उत्तरध्रुव है, एवं दक्षिणध्रुव सदा उत्तरध्रुव से १८० पर ही रहता है । साथ ही इस प्राकृतिक व्यवस्था मेंभूमण्डल के दृश्य, और अदृश्य, दो विभाग होजाते हैं । सुमेरु को केन्द्र मान कर उस भूगोल के चित्र के चारों ओर एक वृत्त बना लीजिए | इस वृत्त के ऊपर का भाग दृश्यमण्डल होगा, एवं नीचे का भाग ग्रह-श्यमण्डल होगा । पौराणिक परिभाषा के अनुसार इस दृश्य पिण्ड का नाम त्रैलोक्य है, एवं अदृश्य भूपिण्ड का नाम पाताल * है । कोई समय था कि, पाताल में निवास करने वाले सुप्रसिद्ध शुम्भ - निशुम्भ नाम के प्रचण्ड असुरोनें त्रैलोक्य के ' माहिष्मती ' नाम के नगर में अपनी राजधानी बना कर देवताओं की इस त्रिलोकी पर भी अपना अधिकार कर लिया था । अन्त में महाकालीने—

त्रैलोक्यमिन्द्रो लभतां देवाः सन्तु हविर्भुजः ।

यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छत ॥

. कहते हुए उनका विध्वंस किया था, एवं उन दोनों महा असुरों के मारे जाने पर शेष असुर—

दैत्याच देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ।

जगद्द्द्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे ॥

निशुंभे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययौ । के अनुसार उसी अपने पाताललोक में चले गये थे । यह पाताल भूमिका वही नीचे का भाग है । कहना यही है कि, मनुष्यब्रह्माने भूपिण्ड को पद्म माना, जोकि प्रकृति के अनुसार वास्तव में पद्म ही है, जैसाकि श्रागे जाकर स्पष्ट होजायगा । एवं मध्य की सुमेरुबिन्दु को पद्मकर्णिका ( कमलगट्टा ) मान कर वहाँ से उस दृश्यमण्डल के चार विभाग किए । यही देवताओं का त्रैलोक्य कहलाया । एवं नीचे के कुमेरु को केन्द्र मानकर आसुरी त्रिलोकी का विभाग कर उसमें असुरों को प्रतिष्ठित किया । क्यों कि यह व्यवस्था पृथिवी को पद्म मान कर हुई, अतएव यह भूगोलव्यवस्था ' पाद्मभुवनकोश ' नाम से. पुराणों में प्रसिद्ध हुई | सुमेरु को केन्द्रं मानने से विष्वत् भूपिण्ड का क्षितिज बन जाता है, यह पूर्व में बतलाया बाचुका है । प्रत्येक वृत्त ३६० अंश का होता है, यह नियमित सिद्धान्त है । इस सिद्धान्त के अनुसार ३६० अंश वाले उस विष्वत् - प्रदेश के सुमेरु को मध्य में रखकर चार विभाग कर दिए गए । ये चारों विभाग ६०–६० अंश के हुए । इन चारों में दक्षिणभाग ' भारतलोक ' कहलाया, पूर्वभाग ' भद्राश्वलोक ' कहलाया । उत्तर-भाग ‘ कुरुलोक ' कहलाया, एवं पश्चिमभाग ' केतुमाल लोक ' कहलाया । तीसरे वर्षभुत्रनकोश के अनुसार ये ही चारों लोक क्रमशः भारतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, कुरुग्रर्ष, केतुमालवर्ष, नाम से प्रसिद्ध हुए, जैसा कि अनु-पद में ही बतलाने वाले हैं । जैसे युरोप की मध्यरेखा ' ग्रीनवीच ' है, एवमेव हमारे भारतवर्ष की मध्यरेखा ' उज्जैन ' है, जैसा कि अभियुक्त कहते हैं— * सप्तलोक, सप्तद्वीप, सप्तसमुद्र, सप्तपातालादि की व्यवस्था में जो पाताल है, उस का स्वरूप इस पाताल से भिन्न समझना चाहिए । २६३

पृष्ठ 557

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प्रथमकाण्ड

यल्लंकोज्जयिनी पुरोपरि कुरुक्षेत्रादि देशान् स्पृशत् ।

सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदितं सा मध्यरेखा भुवः ॥

इस मध्यरेखा से ४५ अंश पूर्व, एवं ४५ अंश पश्चिम का जो ६० अंश का प्रदेश है, वही हमारा ' भारतवर्ष ' है । एवं पूर्वभाग के ६० अंश के आगे से प्रारम्भ कर ६० अंश आगे का भाग ' भद्राश्ववर्ष ' है । उससे आगे के ६० अंश ' कुरुवर्षं ' है । उससे आगे के पश्चिमभाग के ६० अंश ' केतुमालवर्ष ' है । उस भूपद्म के यही चार खण्ड चार ' पत्र ' हैं । सुमेरुविन्दु के समीप का पामीरप्रदेशस्थ अत्युच्च आदर्शवत् समतल लम्बा चौड़ा हिरण्यगपर्वत इस पद्म के मध्य का भाग ' कर्णिका ' ( कमलगट्टा ) है । इस स्वर्ग-प्रदेश के चार खण्ड हैं । इन चारों खण्डों में तीन खण्ड ' देवस्वर्ग ' नाम से प्रसिद्ध थे, एवं एक खण्ड ‘ पितृस्वर्ग ' नाम से प्रसिद्ध था । यही दूसरा ' पाद्मभुवनाकाश ' है । तीसरा है ' वर्षभुवनकोश ' । वर्षविभाग में पृथिवी के ६ खण्ड किए गए हैं । पामीर से दक्षिण में तीन खण्ड हैं । उत्तर में तीन खण्ड हैं । पूर्व पश्चिम में एक एक खण्ड है । स्वयं पामीर नवाँ खण्ड है । इन खण्डों को विभक्त करने वाली स्तूप, प्रत्यन्त, कुल, शाखा आदि नामों से प्रसिद्ध पर्वत शियाँ हीं हैं । पहिले भारतवर्ष को ही लीजिये । भारतवर्ष के आगे उत्तर भाग में ' किंपुरुषवर्ष ' है । इन दोनों के मध्य में ' हिमालय ' है । उत्तर - दक्षिण, भेद से हिमालय दो श्रेणियों में विभक्त है । इन दोनों के मध्य के स्थान ' द्रोणि ' कहलाते हैं । यही द्रोणि ' दर्रा ' नम से प्रसिद्ध है । यही सुप्रसिद्ध अन्तरिक्ष लोक है । उत्तर हिमालय का जो एक स्तूपपर्वत है, वही ' कैलास ' है । एवं दक्षिण हिमालय के स्तूपों में ' गौरीशंकर ' नाम का पर्वत है । इसे ही ' धवलगिरि ' किंवा ' धौलागिरि ', कहते हैं । यही धवलगिरि ' एवरेस्ट ' नाम से प्रसिद्ध है । इस उभयविध हिमालयने हीं भारतवर्ष को ' किंपुरुषवर्ष ' से विभक्त कर रक्खा । किंपुरुषवर्ष के आगे ' हरिवर्ष ' है | इन दोनों की विभाजिका मध्य की ' हेमकूट ' नाम की पर्वतश्रेणि है । हरिवर्ष के आगे ' इलावृतवर्ष ' है । इन दोनों के मध्य में पामीर है । यह तो हुआ दक्षिण प्रदेश का विभाग । अब चलिए उत्तर की ओर । ' इलावृतवर्ष ' के समाप्त होते ही उरत्तभाग में पहिले ' हिरण्मयवर्ष ' है । अनन्तर ' रम्यकवर्ष ' है । दोनों के मध्य में पर्वतश्रेणि है । रम्यक के आगे ' कुरुवर्ष ' है । दोनों के मध्य में पर्वतश्रेणि है । इसप्रकार उत्तर, दक्षिण, मध्य को मिला कर ७ वर्ष होजाते हैं । पूर्व - पश्चिम के दो वर्षों के योग से ६ वर्ष हो जाते हैं, जैसा कि परिलेख से स्पष्ट होजाता है । III

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पूर्ववृत ६० शतपथब्राह्मण वर्षभुवनकोशानुगतः परिलेखः— भद्राश्ववर्ष व हिरण्मय वर्ष पर्वतश्रेणि रम्यकवर्ष पर्वतश्रेणि ६० पश्चिमवृत्त केतुमालव B निषेध हरिवर्ष हेमकूट हिमालय भारतवर्ष ६० दक्षिण वि परिलेत्र के मध्य का जो सुमेरुस्थान है, वही ब्रह्मा की आवास - भूमि थी । यही वास्तविक स्वर्गप्रदेश था । इस स्वर्ग की कीर्त्ति प्रकाशित करने के लिए उस हिरण्यशृङ्गपर्वत के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, भाग के चारों कोणों पर बड़े बड़े क्रमश: पीपल, जामून, आम ग्रादि के चार वृक्ष लगा रक्खे थे | एवं इन चारों पर बड़ी बड़ी ध्वजाएँ थीं । दूसरी यही त्रैलोक्य - व्यवस्था थी । इस व्यवस्था में क्या प्रमाण है?, इसके उत्तर में ' महाभारत शान्तिपर्व के मोक्षधर्म्म ' नाम के प्रकरण की ओर ही हम पाठकों का ध्यान आकर्षित करैंगे । वहाँ विस्तार के साथ इस ' भौमस्वर्ग ' का निरूपण किया गया है । विषय आवश्यकता से अधिक विस्तृत होगया है, अतः प्रमाणवाद के ऊहापोह में न पड़कर केवल तत्सम्बन्धी २-४ श्लोकों को उद्धृत कर इस प्रकरण को उपरत करते हैं । स्वर्ग किस स्थानपर है?, उसका कैसा स्वरूप है?, भूपिण्ड को पद्म कहते हैं, इसमें क्या प्रमाण है?, सुमेरु पर ब्रह्मा रहते हैं — यह किस आधार पर कहा गया?, इन सभी प्रश्नों का समाधान महाभारत के निम्नलिखित श्लोकों से होनाता है । २६५

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प्रथमकाण्ड

भृगुरुवाच- - - ततः पुष्करतः सृष्टः सर्वज्ञो मूर्त्तिमान् प्रभुः ।

ब्रह्मा धर्म्ममयः पूर्वः प्रजापतिरनुत्तमः ॥ १ ॥

भरद्वाज उवाच - पुष्कराद्यदि सम्भृतो ज्येष्ठं भवति पुष्करम् ।

• ब्रह्माणं पूर्वजं चाह भवान् सन्देह एव मे ॥ २ ॥

भृगुरुवाच —-- मानसस्येह या मूर्त्तित्र त्वं समुपागता ।

तस्यासनविधानार्थं पृथिवी पद्ममुच्यते ॥३ ॥

कर्णिकान्तस्य पद्मस्य मेरुर्गगनमुच्छ्रितः ।

तस्य मध्ये स्थितो लोकान् सृजते जगतः प्रभुः ॥ ४ ॥

भारद्वाज उवाच - प्रजाविसर्गं विविधं कथं स सृजते प्रभुः ।

मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा तदभूद्विजसत्तम! ॥ ५ ॥

भृगुरुवाच —— प्रजापसर्गञ्च विविधं इत्यादि ।

भरद्वाज उवाच अस्माल्लोकात् परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते ।

तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥६ ॥

भृगुरुवाच — -- उत्तरे हिमवत् पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते ।

पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥ ७ ॥

तत्र ह्यपापकर्माणः शुचयोऽत्यन्तनिर्म्मलाः ।

लोभ - मोह - परित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥ ८ ॥

स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः ।

काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ ६ ॥

न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः ।

नान्योऽन्यं बध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ॥ १० ॥

इह प्रजापतिः पूर्व देवाः सर्षिगणास्तथा ।

इष्ट् ेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमुपाश्रिताः ॥ ११ ॥

उत्तरः पृथिवी भागः सर्वपुण्यतमः शुभः ।

इहस्थास्तत्र जायन्ते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥ १२ ॥

श्रसत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्य्यग्योनिषु चापरे क्षीणायुषस्तथा चान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥१३ ॥

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पृष्ठ 560

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शतपथब्राह्मण अन्योऽन्यभक्षणासक्ता लोभ - मोह - समन्विता । इहैव परिवर्त्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ॥ १४ ॥ इत्यादि ।

- महाभारत शान्तिपर्व - मोक्षधम्मं १६२ अध्याय इसप्रकार अबदक के प्रकरण से ' प्राकृत ब्रह्मा कहाँ रहते हैं?, एवं ब्रह्मा का निवास - स्थान कौनसा था?, इन दो प्रश्नों का समाधान होगया । अत्र क्रमप्रान्त इनका, एवं इनके द्वारा व्यवस्थित की गई व्यवस्थाओं का स्वरूप ं बतलाया जाता है । आशा है प्रेमी पाठक थोड़े अवधान के साथ आगे के विषय का अवलोकन करेँगे | “ ब्रह्मा के चार मुख हैं | यह चतुर्मुख ब्रह्मा क्षीरसमुद्र में शेष शय्या पर प्रगाढ ( गहरी ) निद्रा में निमग्न विष्णु की नाभि से निकले हुए कमल पर बैठ कर वेदों के द्वारा विश्व का निर्माण करते रहते हैं " इस सुप्रसिद्ध पौराणिक आख्यान से भारत का बच्चा बच्चा परिचित है । इस कथा का गुहानिहित रहस्य इस छोटे से ग्रन्थसम्बन्धी प्रकरण में नहीं बतलाया जासकता । समुद्र, शेष, विष्णु, कमल, इन सब पर से हम आपका ध्यान हटाते हैं, एवं केवल ' चतुर्मुख ब्रह्मा ', एवं उनसे होने वाली ' सृष्टि ', इन दो तथ्यों की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्जकल क्षर, एवं परात्पर, इन चारों की समष्टि का ही नाम ‘ षोडशीपुरुष ' है । यह षोडशी आत्मा अणु से अणु एवं महान् से महान् सर्वथा विभक्त पदार्थों में अवि-भक्तरूप से ( समानरूप से ) विद्यमान है ( गी ० १३ श्लो १६ ) | सोलहकलात्मक इस त्रिपुरुषात्मक पुरुष से कोई भी स्थान रिक्त नहीं है, इसी विज्ञान के आधार पर ' पोडशकलं वा इदं सर्वम् ' ( कौ ० ब्रा ० १० ८ ) यह कहा जाता है । इस षोडशीपुरुष का पञ्चकलात्मकं ' पराप्रकृति ' एवं ' अव्यक्त ' नाम से प्रसिद्ध सेतुरूप जो अक्षरपुरुष है, वे ही हमारे प्रपञ्च के आधारभूत भगवान् ब्रह्मा हैं । यही अव्यक्ततत्व सृष्टि में सबसे पहिले व्यक्त होने के कारण ‘ प्रथमज ' कहलाता है । एवं विश्वाधार होने से इसीको ' प्रतिष्ठा ' कहा जाता है । ( देखिए-श ० ६ कां ० १ ब्र ० ८ क ० ) ।: इसी अक्षरब्रह्मा से ग्रहः काल में दर के द्वारा संसार उत्पन्न होता रहता है । यह स्थितिरूप ब्रह्म-तत्त्व ही अवस्थाविशेषों में परिणत होता हुआ क्रमशः इन्द्र, विष्णु, अग्नि, एवं सोम, इन चार स्वरूपों में परिणत होजाता है । पाँचों अक्षर एक ब्रह्मा है पाँचों एक वस्तु है । उस एक ही तत्त्व का पहिला भाग ( जोकि शेष चारों का मूलाधार होने में ' ब्रह्मा ' नाम से व्यवहृत होता है ) सम्पूर्ण विश्व का आधार है उसका दूसरा विष्णुब्रह्मभाग संसार का पालन करता है । तीसरा इन्द्रब्रह्मभाग विश्व का संहार करता है, एवं उसके अग्निब्रह्म, और सोमब्रह्म, ये दोनों भाग विश्वरूप में परिणत होते हैं । वही संसार है । वही पालक है । वही संहारक है । वही आधार है । प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण - तीनों वही है । इन सम्पूर्ण विषयों का पूर्व में यत्र तत्र विस्तार के साथ निरूपण किया जाचुका है । अतः प्रकृत में इस विषय में अधिक कुछ न कह कर अत्र केवल यही बतला देना चाहते हैं कि, अक्षरपुरुष ही ' ब्रह्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । हमने अनुपद में ही बतला दिया है कि, वह अक्षर पुरुष क्षरपुरुष से सम्पूर्ण विश्व बनाया करता है । अक्षर, एवं क्षर भिन्न होते हुए भी अभिन्न हैं । इस अभिन्नता का परिचय प्रकृति के स्वरूप से भलीभाँति समन्वित हो जाता है । २६७