Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 561–570
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 561–570
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प्रथमकाण्ड ' प्रकृतिं पुरुषं चैत्र विद्धयनादी उभावपि ' ( ईश्वरतत्त्व पुरुष, और प्रकृति, इन दो भागों में विभक्त है ) इस गीता - सिद्धान्त के अनुसार दोनों हीं तत्त्व नित्य हैं । इनमें प्रकृतिभाग ही मृत्यु, और अमृत भेद से दो भागों में परिणत होजाता है 1 । प्रकृति का अमृतभाग अक्षर ' ' नाम से व्यवहृत होने लगता है, एवं मर्त्यभाग ' तर ' नाम से व्यवहृत होने लगता है । अमृतमय अक्षर सृष्टि का निमित्तकारण बन जाता है, एवं मर्त्यक्षर उपादानकारण बन जाता है, शेष बचा हुया श्रव्ययपुरुष इस व्यक्ताव्यक्त प्रपञ्च का ' पर ' ( अन्तिम ), एवं ' श्रेष्ठ ' ( विकारशून्य ) आलम्बन बन जाता है । प्रकृति का अमृतभाग, एवं मर्त्यभाग, दोनों समान विभाग से विभक्त होते हैं । तत्र जैसे अमृतमय अक्षर की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, ये पाँच कलाएँ होतीं हैं, एवमेव वे ही पाचों कलाएँ क्षरप्रकृति की होजातीं हैं । वे ही क्षरकलाएँ प्रारण, आप:, वाकू, अन्नाद्, अन्न, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों में चौथी, और पाचवीं कला अग्नीषोमात्मक यज्ञ के सम्बन्धसे-। तद्यदा - उभगं समागच्छति, सवाख्यायते, नाद्यम् ” “ द्वयं वां इदमत्ता चैवाद्य ं च ( श ० १० का ० ६ | ३ | ) इस सिद्धान्त के अनुसार एक स्वरूप में परिणत होजातीं हैं । ऐसी अवस्था में पाँच के स्थान में चार ही कलाएँ शेष रह जातीं हैं । इन चारों कलाओं के स्वरूप में परिणत होकर ही वह अव्यक्ततत्त्व सृष्टि की ओर अपनी दृष्टि करता है, श्रतएव ये चारों कलाएँ इस अक्षरब्रह्मा के चार मुख कहलाते हैं, जैसाकि पूर्व के प्रकरण - विशेषों में स्पष्ट किया जाचुका है । चतुम्मुख ब्रह्मा कौन से हैं? इस प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है । ये चतुर्मुख ब्रह्मा क्षीरसमुद्र में शेषशय्या पर सोनेवाले विष्णु के नाभिकमल पर विराजमान होकर वेदों के द्वारा सृष्टिनिर्माण करते रहते हैं । सृष्टिनिर्माण तबतक सर्वथा असम्भव है, जबतक कि वेदों का श्राश्रय न ले लिया जाय । वेद ही सृष्टि का पहिला, एवं प्रधान आलम्बन है । संसार में जितने भी पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उन सत्र में सब से पहिले वेद की ही अभिव्यक्ति होती है । इसी अभिप्राय से राजर्षि ने कहा है-सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक संस्थाश्च निम्मे ॥
शब्दः, स्पर्शश्च, रूपश्ञ्च, रसो, गन्धश्च, पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुण - कर्म्मतः ॥
- मनुः १२६८ | ' वेद ' शब्द के अनेक अर्थ हैं । विद्यते, वेत्ति, विन्दते - तीन प्रकार से वेद शब्द का विर्वचन किया जाता है । विद्यते का अर्थ - ' वर्त्तमान ' है । अस्तित्त्व के लिए ( ' है ' के लिए ) ' विद्यते ' का प्रयोग होता है । ज्ञानतत्त्व के लिए ( ' जानता है ' इसके लिए ) ' वेत्ति ' शब्द का प्रयोग होता है । एवं ' प्राप्त करता है ' इस अर्थ में ‘ विन्दते ’ प्रयोग होता है । है, जानता है, प्राप्त करता है, इन तीनों अर्थों के लिए वेद शब्द प्रयुक्त हुआ है । अस्ति भी वेद है । ज्ञान भी वेद है । उपलब्धि भी वेद है । संसार में ऐसा कोई भी २६८
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शतपथब्राह्मण भौतिक पदार्थ नहीं है, जिसमें ' सत्ता ' न हो । मनुष्य है, पशु है, पक्षी है, इसप्रकार मनुष्य - पशु - पक्षी-आदि सभी भौतिक प्रपञ्चों के साथ ' अस्ति ' विद्यमान है । अस्ति के उदर में भूत ( विषय ) प्रतिष्ठित है । मनः, प्राण, वाक्, तीन तत्त्वों की समष्टि ही ‘ अस्ति ' है । मन ज्ञानप्रधान है । प्रारण क्रियाप्रधान है । एवं वाक् अर्थप्रधाना है । मन प्रारणमात्रा है, प्राण प्राणमात्रा है, एवं वाक् भूतमात्रा है । तीनों का समुच्चय ही ' अस्ति ' है । इस मनःप्राणवाङमय अस्तितत्त्व के अमृत और मर्त्य, ये दो विभाग हैं । अमृतभाग को ही मन:, प्राण, वाक्, कहते हैं । एवं मर्त्यभाग नाम, रूप, कर्म्म नाम से प्रसिद्ध हैं । मन का मर्त्य भाग रूप है | मन हीं घटपटादि के रूप में परिणित होता है । सम्पूर्ण रूपों का उक्थ ( प्रभव ) मन ही है । प्राण ही घट-पटादि के कर्म्म में परिणत होता है । एवं नामों का वाक् से सम्बन्ध है | नाम - रूप कर्म की समष्टि ही वस्तु है । घड़े का ' घड़ा ' यह नाम है, रक्तादि रूप है । एवं उस में एक व्यापार भी निरन्तर होता रहता है । नाम-रूप - कर्म्मात्मक घटविषय सत्ताब्रह्म के अस्तिरूप अमृतभाग में हीं प्रतिष्ठित रहता है । दूसरे शब्दों में - वेद के उदर में भूत प्रतिष्ठित है । वाङ्मूत्ति निर्माण करती है । यही ऋग्वेद है । प्राण बस्तुगति ( वस्तु व्यापार ) का अधिष्ठाता है । यही यजुर्वेद है । एवं मन रूप का कारण बनता हुआ उस पिण्डवस्तु का बड़ी दूर पर्य्यन्त त्रितान कर देता है । एक तेजोमण्डल बना देता है । वही सामवेद है | सुतरां चेद का सर्वोपादानत्त्व सिद्ध हो जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेदभगवान् कहते हैं—
ऋभ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः, सर्वागतिर्याजुपी हैव शश्वत् ।
सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् सर्वं हीदं ब्रह्मणा ( वेदेन ) हैव सृष्टम् ॥
- तै ० ना ० ३।१२।६ ) इति । मैव वाचा न मनसा प्राप्तु ं
शक्यो न चक्षुषा ।
' अस्ती ' - तिनवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥
' अस्ती ' –—त्येवोपलब्धव्यस्तत्वभावेन चोभयोः ।
' अम्ती ' - त्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥
— कठोपनिषत् ६।१२,१ ’,। सुतरां ‘ वेत्ति ’ का भी वेदत्त्व सिद्ध होजाता है । तीसरा है ' त्रिन्दते ' | ज्ञान के द्वारा जो वस्तु प्राप्त होती है, वह भी पूर्वकथनुसार वेद ही है । अस्तुः इस विषय को हमें अधिक नहीं बढ़ाना चाहिए । वेद में यदि कोई कठिन पदार्थ है, तो वह वेद ही है । ' छन्दोवेद ' रसवेद, वित्तानवेद, भेद से वेद तीन प्रकार का ' है । ऋक् छन्दोवेद है, यजुः रसवेद है, एवं साम वित्तानवेद है । पुनः प्रत्येक में तीन तीन हैं । इन सम्पूर्णं विषयों का निरूपण आगे आने वाले वेदसम्बन्धी ' प्रकरणों में किया जायगा । यहाँ केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि, संसार का मूल उपादन वेद है । पहिले वेद अभिव्यक्त होता है, अनन्तर वस्तुस्वरूप प्रकट होता है । भूत त्रयीवेद के गर्भ में हीं रहता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेदमहर्षि कहते हैं— २६६
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प्रथमकाण्ड “ स त्रय्यामेव विद्यायां सर्वाणि भूतान्यपश्यत् । एतद् वा अस्ति । एतद्धि- अमृतम् । यद्ध्यमृतं तदस्ति । एतदु तद् यन्मर्त्यम् 1 । वय्यां वाव विद्यायां सर्वाणि भूतानि " - शत ० १० । ३१ । २१ । इति । ' प्रजापतिने त्रयीविद्या में ही सम्पूर्ण भूतों के दर्शन किये । ( वह त्रयीविद्या ) वही यह अस्ति है । यही अमृत है । जो अमृत है, वही है । एवं यही वह है, जोकि मर्त्य ( भूत ) है । तात्पर्य यही है कि, ' अस्ति ' अमृतभाग है, नामरूपकर्मात्मक ' विषय ' मत्य है । यह मर्त्यभाग भी उसी मनः – प्राण - वाङमय अस्तितत्त्व पर प्रतिष्ठित है । इस सर्वमूलभूत वेदतत्त्व का प्रादुर्भाव पूर्वप्रतिपादित चतुर्मुख ब्रह्मा के प्रथम ‘ प्राणमुख ' से ही होता है । प्राण स्वयम्भू की वस्तु है । वहाँ यह ब्रह्मनि: श्वसित त्रयीवेद प्रकट होता है । चार प्रकार की सृष्टियों में से पहिली यही सृष्टि है । यह वेद ' ब्रह्माग्निरूप ' है । इसमें हमने ऋक्, साम, यजुः, ये तीन भाग बतलाए हैं । तीनोंमें ऋक् साग वयोनाध ( छन्द आयतन - ) हैं, एवं यजु ‘ वय ’ ( छन्द से छन्दित वस्तु ) है । इस यजु में यत्, जू, ये दो भाग हैं | ‘ यत् ’ भाग गतिरूप प्राण है, जू भाग स्थितिरूप वाक् है । प्राण वायु है । जू आकाश है । केवल अग्निवेद सृष्टि करने में असमर्थ है | अतएव प्रजापति की इच्छा से यजुर्ब्रह्म के यद्रूप प्राणभाग के तप से ( क्रियारूप व्यापार से उस जू रूप वाग् भाग से सोमवेद ( अथर्ववेद ) अभिव्यक्त होता है । वाक ही आपः बनती है । भृगु और अंगिरा की समष्टि का नाम ही आप: है । यही अथर्ववेद है । इन्हीं दोनों वेदों की उत्पत्ति त्रतलाते हुए वेद महर्षि कहते हैं— ' सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत - भूयान्त्स्यां प्रजाययेति । सोऽश्राम्यत् । स तपोऽतप्यत । स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मच प्रथममसृज्यत - त्रयीमेव विद्याम् । सैवास्मै प्रतिष्ठा -ऽभवत् । तस्मादाहुन्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठेति । प्रतिष्ठा पायद् ब्रह्म । तस्यां प्रति– ष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोसृजत वाच एव लोकात् । वागेवास्य सासृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोत् – यदिदं किंच । यदाप्नोत् तस्यादापः । यदवृणोत् – तस्माद्वाः ' । जब संसार न था, तत्र केवल सत् प्राण ही था । ऋषिप्राण ही असत् कहलाता है । ये प्राण कुल सात जाति के हैं । एवं सातों का सृष्टि के लिए समुच्चय रहता है । इन सातों की समष्टि ही ' सप्तपुरुष-पुरुषात्मक ' एक ‘ प्रजापति ' है | यही ब्रह्मा है । इन्होंनें ' मैं बहुत बनूँ, प्रजा उत्पन्न करूँ ’ इस इच्छा से तप, एवं श्रम किया । इस तप:, श्रम के द्वारा उन्होंनें त्रयीविद्या उत्पन्न की । उत्पन्न कर वे इसी त्रयी— प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होगए । तभी से ' ब्रह्मा हीं ( वेदमय ब्रह्मा हीं ) सबकी प्रतिष्ठा है ' यह आभाणक प्रसिद्ध होगया । उस प्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित होकर प्रजापति ने पुनः तप किया । इस तप के द्वारा उन्होंनें अपने दाग्लोक से ( यजुर्वेद के जृ भाग से ) आपः तत्त्व उत्पन्न किया । ( वाक् से विजातीय कोई आपः उत्पन्न नहीं किया, अपितु ) वह वाक् ही पोरूप में परिणत होगई । इस श्रापः के द्वारा यह ब्रह्मा प्रजापति सर्वत्र ' आ'त ' होगए । सत्रको ' प्राप्त ' कर लिया । अतएव वाक् से उत्पन्न होने वाले इस तत्त्व का नाम ‘ आप: ’ ३००
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शतपथब्राह्मण होगया । एवं इसीके द्वारा प्रजापति ने सबका संवरण कर लिया । अतएव इसका नाम ' वारि ' होगया -( शत ० ६ कां । १ ब्रा ० | १ प्रपा ० | १ अध्या ० । ८-६ कं ० ) । हम कह आए हैं कि, त्रयीवेद में ऋक्साम केवल आयतनमात्र हैं । सृष्टि का उपादान केवल ' यजुव्रह्म ' ही है । इस यजुर्ब्रह्म में क्योंकि यत्, और जू, ये दो भाग हैं । अतएव हम इसे ' द्विब्रह्म ' कहते हैं । अत्र चलिए आपोरूप अथर्ववेद की ओर । भृगु, और अंगिरा का नाम आप: है । भृगु के घन तरल,, विरल, अवस्था भेद से आपः, वायु, सोम, ये तीन भेद हो जाते हैं । एवं इन्हीं तीन अवस्थाओं के कारण अंगिरा के अग्नि, यम, आदित्य, ये तीन विभाग हैं । क्योंकि ग्रापोरूप अथर्व ब्रह्म के ६ विभाग होजाते हैं, अतएब इसे हम ‘ पड्ब्रह्म ' कहते है । द्विब्रह्म अग्नि है । पड्ब्रह्म सोम है । प्रसङ्गागत एक बात और समझ लेनी चाहिए । बिना इच्छा के प्राण व्यापार नहीं होता, एवं बिना प्राण-व्यापार के त्राग् – व्यापार नहीं होता । मनः, प्राण, वाक्, इन तीनों के व्यापार के अनन्तर ही नवीन वस्तु की उत्पत्ति होती है | हम जब पुस्तक लिखने बैठते हैं, तो लिखने से पहिले तदनुकुला ' इच्छा ' होती है । इच्छा के अनन्तर प्राणव्यापार ( कोशिश - चेष्टा रूप अन्तरङ्गव्यापार ) होता है । अनन्तर श्रम ( हस्त व्यापार ) होता है । श्रम के अनन्तर पुस्तक सम्पन्न होती है । इसी साधारण सृष्टिविज्ञान को बतलाने के लिए ' सोऽकामयत ' - ' स तपोऽतप्यत ' ' सोऽश्राम्यत् ' यह कहा जाता है । ' कामना ' मन का व्यापार है । तप प्रारण का व्यापार है । एवं वाग्व्यापार को ही श्रम कहते हैं । इच्छा कामना है | यत्न, चेष्टा तप है । भूतव्यापार ( शरीरव्यापार ) श्रम है । ये ही तीनों ( काम - तप: -श्रम ) सृष्टि के सामान्य ( साधारण ) अनुबन्ध हैं । भाव, गुण, विकार, मिथुन, श्रादि चाहे कोई सी ही सृष्टि हो, त्रिना इन तीनों अनुबन्धों के वह कथमपि सम्भव नहीं है । इन्हीं तीनों अनुबन्धों से प्रजापति ने षड्ब्रह्म, एवं द्विब्रह्म उत्पन्न किया । द्विब्रह्मगर्भित ब्रह्माग्निरूप अग्निवेद, एवं श्रपःरूप षड्ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध सोमवेद से ही आगे की सम्पूर्ण सृष्टियाँ होतीं हैं । द्विब्रह्मरूप को आग्नेय होने से ' वेद ' कहा जाता है । एवं प्रजापति के ' स्वेद ' ( पसीना ) रूप षड्ब्रह्म को सोममय, अतएव शान्त होने से ' सुवेद ' कहा जाता है । त्रयीब्रह्म सुब्रह्म है । अथर्व -वेद इस ब्रह्म का पसीना है । अतएव इसे ' सुवेद ' कहते हैं । सुवेद ही परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षता के कारण ‘ स्वेदवेद ' कहा जाता है, जैसाकि निम्नलिखित गोपथ ति से स्पष्ट है । ' ब्रह्म वा इदमग्र एक आसीत् 1 । हन्ताहं मदेव मन्मात्रं द्वितीय देवं निर्ममे इति । तदभ्यश्राम्यत् । अभ्यतपत् । समतपत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यद।द्रर्य माजायत – तेनानन्दत् । तमब्रवीत - महद्वय सुवेदमविदाम है - इति । तद्यदब्रवीत् सुवेदमविदाम है- इति, तस्मात् सुवेदोऽभवत् । तं वा एतं सुगेदं सन्तं ' स्वेद ' इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्षद्विषः— —गोपथब्राह्मण पू ० १११ । ३०१
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प्रथमकाण्ड अग्निरूप द्विब्रह्म में प्रजापति सुत्रह्मरूप सोमवेद की उसी के मातारिश्वावायु के द्वारा ब्रह्म सोम की द्वित्रह्माग्नि में आहुति होती है । इससे एक नवीन स्वरूप सम्पन्न हो जाता है । इस नवीन तत्त्व को ही उपनिषदोंनें ' शुक ' नाम से व्यवहृत किया है । दार्शनिक परिभाषा में यही शुक्र ' महान ' नाम से प्रसिद्ध है । यही ' महान् ', किंवा ' महद्ब्रह्म ' विश्व का मूल ( उपादानकारण ) है । महद्ब्रह्मात्मक, षड्ब्रह्म -लक्षण इसी ‘ शुक्र ’ तत्त्व का स्वरूप - विश्लेषण करती हुई उपनिषच्छ ु ति कहती है—
' स पर्य्यगाच्छुक्रमकाय मत्रण मस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ् तोर्थान् व्यवदधाच्छाश्वतीभ्यः - समाभ्यः ' ॥
इस मन्त्र का वैज्ञानिक अर्थ ईशोपनिषत् के भाषाभाष्य में देखना चाहिए । प्रकृत में केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, वेदसंघातरूप यही ' शुक्रतत्त्व ' किंवा ' महद्ब्रह्म ' आगे की सम्पूर्ण सृष्टियों का उपादान है । अतएव इसे ' शुक्र ' कहा जाता है । प्रजा के उपादानकारण को ही शुक्र कहते हैं । ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदु नात्येति किञ्चन ' के अनुसार यही ब्रह्म संसार का स्वरूप है । इससे बाहिर कुछ भी नहीं है । विश्व की अन्तिम सीमा यही है । ' ते शुक्रमेतदतिवर्त्तन्ति धीराः ' ( मुण्डकोपनिषत् ४ | १ ) के अनुसार शुक्र से बहिर्भूत पुरुषात्मा का साक्षात् करने वाले धीर विद्वान् हीं इस शुक्र का अतिक्रमण करने में समर्थ होसकते हैं । शुक्ररूप आपः ही ब्रह्म का दूसरा मुख है । प्राण पहिल: मुख था । उससे वेद ( त्रयीवेद ) प्रादुर्भूत हुआ था, आप: दूसरा मुख है । इससे सुवेद उत्पन्न होता है । यही है ब्रह्मा की प्रथमा वेदसृष्टि । वेद के अनन्तर है ‘ लोक ' । इसी पूर्वोक्त शुक्ररूप पोमुख से ' लोकसृष्टि होती है | भूः, भुवः, स्व:, आदि सातों लोकों का उपादान अपतत्त्व ही है । लोक इसी आपोमुख पर प्रतिष्ठित हैं, जैसाकि श्रुति कहती है - ' आपो वै सर्वाणि भूतानि ' ( श ० १० कां | ५ | ४ | १४ ) । इसी श्रौत विज्ञान को लक्ष्य में रखकर आप की व्यापकता बतलाते हुए भगवान् व्यास कहते हैं—
अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्यप्सु प्रतिष्ठिताः ।
आपोमयाः सर्वरसाः ‘ सर्वमापोमयं जगत् ' ॥
-महाभारते आपः के अनन्तर तीसरा है ' वाङ्मुख ' । इससे ' प्रजासृष्टि ' होती है । देवता, गन्धर्व, मनुष्य, ' पशु, पक्षी आदि यच्चयावत् प्रजाओं का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण, यही वाक्तत्त्व है । प्राणमुख स्वयम्भू है । श्रपोमुख परमेष्ठी है । एवं वाङ्मुख सूर्य्य है ।
' नूनं जनाः सूर्येण प्रसूता यन्नर्थः कृण्वन्नपांसि ।
प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ' ॥
इत्यादि श्रुतिवचन वाङमय सूर्य को ही प्रजा का उपादान बतलाते हैं । प्रजासृष्टि वाक़ से ही होती है, इसका निम्नलिखित तैत्तिरीय - श्रुति से ओर भी स्पष्टीकरण हो जाता है । तित्तिरि भगवान् कहते हैं— ३०२
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शतपथब्राह्मण
वाचं देवा उपजीवन्ति विश्वे, वाचं गन्धर्वाः, पशवो, मनुष्याः ।
वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता सा नो हां जुषता मिन्द्रपत्नी ॥
-तैः प्रा ० २६४ | ५ ) इति । अन्नगर्भित अग्निरूप चौथे अन्नादमुख से ' धर्म्मसृष्टि ' होती है । ब्रह्मा के चार ही मुख हैं, एवं उनसे ४ प्रकार की ही सृष्टियाँ होतीं हैं । महाभारतादि में इन चारों सृष्टियों का बड़े विस्तार से ं निरूपण किया गया है । विशेष जिज्ञासा रखने वालों को महाभारत का यत्रतत्रस्थ सृष्टिप्रकरण ही देखना चाहिए । जिन सृष्टियों का विकास आरम्भ में हुआ था, उन में वही क्रम चला रहा है । इसप्रकार प्राण, आपः, वाक्, अन्नान्नाद, भेदभिन्न इन चारों मुखों से ' चतुर्मुख ' नाम से प्रसिद्ध आदि ब्रह्मा पहिले वेद उत्पन्न कर उस के द्वारा विश्व में रहने वाली प्रजा, एवं उनके धर्मों का ( स्वरूपधर्मो का ) निर्माण किया करते हैं । ब्रह्माक्षर स्वयं पञ्चकल है । पाँचों पिण्ड़ों के केन्द्र में वह ब्रह्माक्षर प्रतिष्ठित है । वेद, और सुवेद से ब्रह्मा इन पाँच पुरों को उत्पन्न कर ' तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार इन पाँचों के केन्द्र में प्रतिष्ठित होजाते हैं । इन पाँचों पुरों की समष्टि ही एक ' अण्ड ' हैं । यह अण्ड ब्रह्मा के वेद सुवेद से उत्पन्न होता है, अतएव इसे ‘ ब्रह्माण्ड ' कहा जाता है, जैसाकि निम्नलिखित वाजसनेय - श्रुति से स्पष्ट होजाता है— “ सोऽकामयत - आस्योऽद्द्भ्योऽधि प्रजायेयेति । सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । व्रत आण्डं समवत्तते " - इत्यादि । - शत ० ६ | १ | १० इस पञ्चावय ब्रह्माण्ड के गर्भ में ब्रह्माण्ड के नायक पञ्चकुलोपेत भगवान् ब्रह्मा कमलासन पर विराज़-मान होकर इसका सञ्चालन कर रहे हैं । अक्षरब्रह्मा बिना क्षुर के रह नहीं सकते, सुतरां -स्वयम्भू आदि पाँचों में प्रत्येक में पाँचों अक्षरों, एवं पाँचों क्षरों की सत्ता सिद्ध होजाती है । इसप्रकार यद्यपि स्वयम्भू आदि पाँचों में ही पाँचों हैं । इसीलिए ये पाँचों ' पञ्चजन ' कहलाते हैं । तथापि प्रधानता क्रमशः पाँचों में ब्रह्मअक्षर-प्रारणक्षर, विष्णुअक्षर आपः तर, इन्द्र अक्षर वाक्क्षर, सोमअक्षर - अन्नक्षर, एवं अग्निअक्षर - अन्नाद्-क्षर की ही है । अक्षर - ब्रह्मा क्षरप्राणमय है । इस की प्रधानता स्वयम्भूमण्डल में है । अतः ' वैशेष्यात्तु तद्वादस्तदूवादः ' ( जो जिसमें प्रधान रहता है, वहाँ वही परिगृहीत होता है ) इस शारीरिक सिद्धान्त के अनुसार स्वयम्भु ' ब्रह्ममण्डल ' कहलाता । श्रक्षरविष्णु क्षरश्रापोमय है । इसकी प्रधानता परमेष्ठी में है । अतएव परमेष्ठी ‘ विष्णुलोक ' कहलाता है | अक्षरइन्द्र दरवाङमय है । इसकी प्रधानता सूर्य्य में है । अत-एव सूर्य्य ' इन्द्रलोक ' कहलाता है । अक्षरसोम क्षरन्नमय है । इसकी प्रधानता चन्द्रमा में है । अतएव -चन्द्रमा ‘ सोमलोक ' कहलाता है । अक्षरअग्नि क्षरन्नादमय है । इसकी प्रधानता पृथिवी में है । अतः ‘ अग्निर्भूस्थान ' इस निरुक्त सिद्धान्त के अनुसार पृथिवी ' अग्निलोक ' कहलाता है । वस्तुतः पाँचों पाँचों हीं लोक हैं । क्योंकि पाँचों में पाँचों अक्षर, एवं पाँचों क्षर विद्यमान हैं । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, पाँचों हीं ब्रह्मा हैं । ब्रह्मा की अवस्थाविशेषों को ही विष्णु आदि कहते हैं । इसप्रकार पाँचों ब्रह्माण्डों में, अथवा ब्रह्माण्ड के पाँचों अवयवों में ब्रह्मा की सत्ता सिद्ध होजाती है । अन्तर केवल यही है कि, स्वयम्भू का ब्रह्मा ‘ प्राणप्रधान ' है । इसे ही स्वयम्भू में प्रतिष्ठित रहने के कारण ' स्वयम्भू ' कहते हैं । परमेष्ठी का ३०३
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प्रथमकाण्ड ब्रह्मा आपःप्रधान है । इसे ' परमेष्ठी ' कहते हैं । सौर ब्रह्मा वाक् प्रधान है । एवं हिरण्यरेता अग्निमय सौर मण्डल के केन्द्र में रहने के कारण इसी सौरब्रह्मा को ' हिरण्यगर्भ ' कहा जाता है । हमारी रोदसी त्रिलोकी में सबसे पहिले उत्पन्न होने वाला, रोदसी की द्यावापृथिवी को प्रतिष्ठित रखने वाला—
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
सदाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
इत्यादि रूप से उपवर्णित यही सौर ' हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ' है । चान्द्रब्रह्मा सोमप्रधान है । एवं यही ' निधन ' नाम से प्रसिद्ध है । चन्द्रमा पर सृष्टिक्रम समाप्त हो जाता है, अतएव इसके ब्रह्मा को ' निधन ' कहा जाता है । एवं पृथिवी के ब्रह्मा - अग्निप्रधान हैं । यहाँ के ब्रह्मा ' पद्मभूः ', ' कमलोद्भव ' इत्यादि नामों से व्यवहृत होते हैं । यद्यपि कोषकार ने स्वयम्भू परमेष्ठी, हिरण्यगर्भ, निधन, पद्मभू, आदि शब्दों को परस्पर एक दूसरे का पर्य्याय बतलाया है | परन्तु जैसे वैज्ञानिकदृष्टि के अनुसार ' देव ', एवं ' देवता ' शब्द परस्पर एक दूसरे के पर्य्याय नहीं होसकते । एवमेव कोषकार का बतलाया हुआ स्वयम्भू, परमेष्ठी आदि का परस्पर का पर्य्याय — सम्बन्ध भी वैज्ञानिकदृष्टि से उचित नहीं माना जासकता । स्रष्टा, प्रजापति, चतुरानन, लोकेश, विश्वसृट्, विधि, धाता, इत्यादि नाम सत्रके साधारण हैं । परन्तु स्वयम्भू - परमेष्ठी, कमलासन, आदि नाम सर्वथा नियत हैं, जैसाकि पूर्व के निरूपण से पाठकों को भलीभाँति विदित हो गया होगा । उक्त पाँचों ब्रह्माओं में से केवल ' पार्थिव कमलोद्भव ब्रह्मा ' की ओर ही आपका ध्यान विशेष... रूप से आकर्षित किया जाता है । क्योंकि ऐतिहासिक पार्थिव मनुष्यब्रह्मा के, एवं चतुःसृष्टि के प्रभव - प्रतिष्ठा— परायण ये ही प्राकृतिक नित्य सुमेरु पर्वतबिन्दुस्थ नित्यब्रह्मा हैं । ' अद्भ्यः पृथिवी ' ( पानी से पृथिवी उत्पन्न होती है ) इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार पृथिवी का उपादान पानी है । रुद्रवायु के प्रवेश से बुबुद् उत्पन्न हो जाता है । i उस पर यदि पुनः पुनः पानी का आक्रमण होता है, तो बुद्बुदावच्छिन्न पानी, और वायु, दोनों प्रतिमूच्छित होजाते हैं । इसी को ' फेन ' कहते हैं 1 । इसी क्रम से वह पानी रुद्रवायु के प्रवेश से, दिन की ऊष्मा से, तथा रात्रि के शैत्य से क्रमश: आप:, फेन, उषा खार ), सिकता ( चिकनी मिट्टी ), शर्करा ( बालू मिट्टी ) आदि आठ अवस्थाओं में परि-णित होता हुआ ‘ भूपिण्ड ' स्वरूप में परिणित हो जाता है । * पानी को ही पुष्कर कहते हैं । वास्तव में पानी का नाम पुष्कर नहीं है । अपितु पानी के ऊपर जो एक हरी - हरी ' काई ' घनीभूत हो जाती है, जिसमें किं सूक्ष्म दो पत्ते, और एक वृन्त होता है, इसीका नाम ' पुष्करपर्ण ' है । यह पानी को आवृत कर लेता है । यही बृहद्रूप धारण कर के शैवालादिरूप में परिणित हो जाता है । आगे जाकर उस के बड़े २ गुच्छे हो जाते हैं । - आपो वै पुष्करपर्णम् । - शत ० ६ | ४ | २२ | ३०४
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शतपथब्राह्मण इसप्रकार इस पुष्करपर्ण की अनन्त जातियाँ हो जातीं हैं । ये ही अन्त में रुद्रवायु से रूक्ष होकर मिट्टी के स्वरूप में परिणित हो जाते हैं । अतएव हम अवश्य ही श्रापोरूप पुष्कर को, किंवा पुष्करपर्ण को भूपिण्ड का उपादान मानते हैं । भूपिण्डं इन्हीं पुष्करों की समष्टि है । अतएव ब्राह्मणग्रन्थों, एवं पद्मपुराणादि में पृथिवी को ‘ पद्म ' नाम से व्यवहृत किया गया है । इस पद्मरूप भूपिण्ड में वे आग्नेय ब्रह्मा विराजमान हैं । ब्रह्मा अग्निमय है । भूपिण्ड श्रापोमय है । पद्मरूप है । एवं जैसे कमल का पत्ता पानी पर सन्तरण करता रहता है, एवमेव यह भूपिण्ड अपने चारों ओर व्याप्त रोदसी के ' अव समुद्र ' में पत्ते की भाँति सन्तरण ही कर रहा है । इस की योनि वही ' ब्रह्माग्नि ' है । इसी पार्थिव आग्नेय ब्रह्मसम्बन्धी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेदभगवान् कहते हैं— " आपो वै पुष्करपर्णम् । यथा वा इदं पुष्करपर्णमप्स्वध्याहितम् - एवमियमप्स्वध्या-हिता । सेयं योनिरग्नेः । इयं ह्यग्निः - समुद्रो हीमामभितः पिन्वति । " - शत ० ७ | ४ | १ | ८ | इति ० । इसी पद्मासन पर पद्मासन लगा कर भगवान् ब्रह्मा विराजमान हैं । पाँचों लोकों के ब्रह्माओं को वेद, लोक, प्रजा, धर्म्म, ये चारों सृष्टियाँ करनी पड़तीं हैं । परन्तु इतना अवश्य है कि - स्थान, काल, ब्रह्मा, एवं उपादानमात्रा, आदि के भेद से पाँचों मण्डलों की चारों सृष्टियों का स्वरूप भिन्न भिन्न होजाता है । पहिले स्वयम्भू को ही लीजिए | यहाँ का वेद ' ब्रह्मनिःश्वसित ' है । लोक ' सत्य ' है । प्रजा ‘ ऋषि ' है | धर्म- ज्ञानमात्रा का प्रसार करना है । परमेष्ठी का वेद ' ब्रह्मस्वेद ' है । लोक ' जनत् ' है । प्रजा-पितर असुर है । इसका धर्म्म सन्तान सूत्र का तनन करना है । सूर्य्यवेद गायत्रीमात्रिक है । इसी को पौरुषेयवेद कहते हैं | स्वयम्भू का ब्रह्मनिःश्वसितवेद अपौरुषेय था, यह सौरवेद पौरुषेय है । लोक स्वः है । प्रजा देव है । धर्म्म आत्मज्योति का प्रसार करना है । चन्द्रमा का वेद अथर्वा है । लोक भुवः है ॥ प्रजा गन्धर्व है । धर्म सोम का प्रसार, एवं गन्धर्वप्राण के द्वारा उस की रक्षा करना है | भूपिण्ड का वेद यज्ञमात्रिक है । लोक भूः है । प्रजा - पशु, ओषधिं, वनस्पति, पक्षी, मनुष्यादि हैं । धर्म्म - वैश्वानराग्नि का प्रसार, एवं अन्नादि का परिपाक करना है । स्वयम्भू, और परमेष्ठी के मध्य में एक ' सूत्रवायु ' है । उसी स्थान का नाम ' तपोलोक ' है । सूर्य्य के मध्यम मे ‘ वायु ' है । इसी को ' महर्लोक ' कहते हैं । एवं सूर्य्य, तथा भूपिण्ड के मध्य में ' रुद्रवायु ' है, अतएव इसे ‘ भुवर्लोक कहते हैं । चन्द्रमा भी यहीं रहता है । अतएव भुवर्लोक चन्द्रमा का लोक भी कहलाता है । इसप्रकार इन सन्धिभागों से ४ के सात लोक हो जाते हैं । आगे लिखी तालिका से ऊपर का सम्पूर्ण विषय स्पष्ट जाता है । ३०५
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संयती ब्रन्दसी रोदसी ब्रह्मा स्वयम्भ सूत्रात्मा वेद परमेष्ठी शिवात्मा हिरण्यगर्भ × निधन = रुद्रात्मा = कमलोद्भव = प्रथमकाण्ड लोक ब्रह्मनिःश्वसित सत्यलोक तपोलोक ब्रह्मस्वेद जनल्लोक महर्लोक गायत्रीमात्रिक स्वर्लोक अथर्व X भुवर्लोक यज्ञन्ात्रिक प्रजा ऋषि १२ प्राणात्मक वायु पितर ७ सुर ६६ शिवबायु देवता ३३ गन्धर्व २७ रुद्रवायु धर्म ज्ञानप्रसार प्रवासभूमि स्वय॑ X अन्तरिक्ष सन्तान सूत्र का तनन परमेष्ठी अन्तरिक्ष आत्मज्योति को प्रसार सू सोम का प्रसार - सोमरक्षा X चन्द्रमा मनुष्यादि वैश्वानर प्रसार, अन्नादि का परिपाक भूपिण्ड यह है प्राकृतिक नित्थ ब्रह्मा का संक्षिप्त स्वरूप, एंव उनके काय्यों का सूक्ष्म निदर्शन | इस नित्य ब्रह्मा के अवतारभूत मनुष्यब्रह्माने भी प्रकृति के ब्रह्मा की भाँति इस भूमण्डल में ही चार प्रकार की सृष्टियाँ व्यवस्थित कीं । श्राज जो वेदग्रन्थ श्राप को उपलब्ध हो रहे हैं, वे इन्हीं मनुष्यब्रह्मा की कृपा है । प्रकृतिवत् सबसे पहिले इन्होंनें वेदसृष्टि की । ' क्योंकि वेदज्ञान पर ही आगे का सम्पूर्ण प्राकृतज्ञान अवलम्बित है | वेद् के अनंन्तर उन्होंने प्रकृतिवत् लोकसंस्थाएँ बनाई । एवं लोकानुसार ही यज्ञविद्या के द्वारा, एवं प्रकृति से सिद्ध - तत्तत्प्राणदेवताओं को तत्तत् मनुष्य समाजों में विभक्त कर तत्तल्लोकों में उन उन समाजों को अधिकारानुसार प्रतिष्ठित किया । यह प्रजाविभाग ही उनकी तीसरी ' प्रजासृष्टि ' थी । प्रजासृष्टि के अतिरिक्त— वर्णसृष्टि, एवं गोत्रसृष्टि, भेद से दो प्रकार की सृष्टियाँ ओर व्यवस्थित कीं । प्रकृतिमण्डल में देवताओं में चारों वर्ण हैं । जिस वर्णं के देवता की जिस आत्मा में प्रधानता रहती है, जन्मना वह उसी वर्ण का कहलाता है । तत्तद्द वताओं से निर्मित तत्तन्मनुष्यों को समष्टिरूप से विभक्त करना हीं तीसरी ‘ वर्णसृष्टि ' है । एवं स्वयम्भू के भिन्न २ ऋषियों का भी जीवात्मा के साथ सम्बन्ध होता है । जिसमें जिस ऋषि की प्रधानता होती है, वह उसी वंश, एवं उसी नाम से व्यवहृत होता है । तत्तत् ऋषियों से निर्मित तत्तन्मनुष्यों को तत्तत् ऋषियों के विभाग से विभक्त करना हीं ' गोत्रसृष्टि ' है । इन दोनों ३०६
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शतपथब्राह्मण की व्यवस्था भी इन्होंने हीं की । इन दोनों सृष्टियों का ' प्रजासृष्टि ' में ही अन्तर्भाव होजाता है । क्योंकि इन दोनों का मनुष्यप्रजाओं से ही सम्बन्ध है । देवताओं में चातुर्वर्ण्य कैसे है?, गोत्रप्रवर्तक ऋषि कौन से हैं?, इत्यादि प्रश्नों का समाधान इस छोटे से प्रकरण में नहीं किया जासकता । हम इस प्रकरण में केवल देवताओं के स्वरूप का विचार कर रहे हैं । जब ऋषियों का, एवं वर्णव्यवस्थादि का स्वतन्त्र प्रकरण आवेगा, तत्र इन विषयों पर पूर्ण प्रकाश डाला जायगा । अभी इतने पर ही पाठकों को संतोष करलेना चाहिए । तीसरी. सृष्टि का स्वरूप बतला दिया गया । इसके अनन्तर है ‘ धर्म्मसृष्टि । भिन्न २ वर्णों में विभक्त प्रजाओं के लिए भगवान् ब्रह्माने प्रकृति-सिद्ध चातुर्वण्र्यादि धर्म्मो को प्रकट किया । यही चौथी ' धर्म्मसृष्टि ' कहलाई । इसप्रकार इस सम्पूर्ण प्रपञ्च की इस भूमण्डल पर व्यवस्था करने के कारण हीं सुमेरुपर्वत पर रहने वाले आदिब्रह्मा चतुमुख, सृष्टिकर्त्ता, पद्मयोनिं आदि नामों से प्रसिद्ध होगए । मनुष्यब्रह्मा के द्वारा निर्मित पूर्वोक्त चारों सृष्टियों में से प्रकृत में हम वेद, धर्म्म इन दो सृष्टियों को छोड़ते हैं । यहाँ केवल मध्य की ' लोकसृष्टि ' एवं ' प्रजासृष्टि ' की ओर ही अपने वेदप्रेमी पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । भमण्डल - सम्बन्धी लोक - प्रजासृष्टि का स्वरूप बतलाने से पहिले थोड़ी देर के लिए हम आपको ' आत्मगृति ' से सम्बन्ध रखने वाले ज्योतिष्च-क्रानुगत ( खगोलीय ) त्रैलोक्यविभाग की ओर ले चलते हैं । श्रष्टादश ( १८ ) संख्या में विभक्त हमारा ' पुराणशास्त्र ' * कुल अठारह विषयों का ही प्रतिपादन करता है | ज्योतिष्चक्र, एवं भुवनकोश का भी इन १८ विषयों में हीं अन्तर्भाव है । भूगोलतत्त्व का प्रति— पादन करने वाली विद्या ही पुराणों में ' भुवनकोश ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं खगोल को ही पौराणिक परि-' भाषा में ' ज्योतिष्चक्र ' कहते हैं । आत्मगति से सम्बन्ध रखने वाले त्रैलोक्य का इन्हीं दोनों से सम्बन्ध है । पूर्व के प्रकरणों में यह बतलाया जाचुका है कि, भूपिण्ड के ठीक मध्य का जो अहोरात्रंवृत्त नाम से प्रसिद्ध ' पूर्वापरवृत्त ' है, वही वेद में ' बृहतीछन्द ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं आधुनिक ज्योतिष में यही ‘ विष्वद्-वृत्त', किंवा ' विषुववृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है | यह भूपिण्ड सूर्य्य को केन्द्र बना कर जिस वृत्त के चारों ओर परिक्रमा लगता है, वही वृत्त ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है । यह क्रान्तिवृत्त तीन केन्द्रों के कारण ‘ दीर्घवृत्त ’ कहलाता । अण्डाकार वृत्त को ही दीर्घवृत्त कहते हैं । * पुराणशास्त्र के वे १८ विषय पुराणों में— १ संचर ( सर्ग - सृष्टि ), २ प्रतिसंचर ( प्रतिसर्ग - प्रतिसृष्टि - प्रलय ), ३ वंश, ४ वंशानुचरित, ५ मनवन्तर, ( सृष्टिप्रलय के काल का विचार ), ६ सिद्धान्त, ७ संहिता, ८ डामर, ६ जामल, १० तन्त्र, ११ वेद ( वेद की शाखाओं का आविर्भावकों का विचार ) १२ पुराण ( पुराणादि की संख्याओं, एवं विषयों का विचार ), १३ आख्यान, १४ उपाख्यान, १५ गाथा, १६ कल्पशुद्धि, १७ ज्योतिष्चक्र ( खगोल विद्या ), १८ भुवनकोष ( भूगोलविद्या ) इन नामों से प्रसिद्ध हैं । पुराण भी १८ ही हैं । प्रत्येक पुराण में १८ ही विषयों का होना परम आवश्यक है । जिस पुराण में ये विषय नहीं, वह पुराण ही नहीं । ३०७