Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 571–580

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 571–580

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प्रथमकाण्ड तीन वर्तुल वृक्षों की परिधि मिलाकर तीनों के चारों ओर एक रेखा खैंच दीजिए, वही ' दीर्घवृत्त ' बन स्वरूप बनता है, एवं प्रत्येक में स्वतन्त्र केन्द्र है । अतएव समन्वित मानते हैं । हमारा क्रान्तिवृत्त भी ऐसा ही है । भुवनकोश - सम्बन्धी क्रान्तिवृत्त है, एवं भू पण्ड के जायगा । तीन वृत्तों के कारण क्योंकि दीर्घवृत्त का हम वृत्तत्रयोपेत इस दीर्घवृत्त को तीन केन्द्रों से इसप्रकार जिसपर भूपिण्ड परिभ्रमण कर रहा है, वह मध्य का पूर्वापरवृत्त भुवनकोश - सम्बन्धी विष्ववृत्त है । जैसे भूगोल में दो वृत्त हैं, ठीक इन्हीं की सिध में खगोल में भी दोनों की कल्पना की जाती है । भूगोल में भी दोनों है, एव उसीके अनुसार खगोल में भी दोनों हैं । खगोलीय विष्वद्वृत् के ठीक मध्य में भगवान् सूर्य्य प्रतिष्ठित हैं, अतएव इनके लिए ' सूर्यो बृहती मध्ययूढस्तपति ' यह कहा जाता है । एकप्रकार से इन दोनों में दोनों वृत्तों की कल्पना समानरूपा कही जासकती है । दोनों स्थानों के ये दोनों हीं वृत्त घटपटादि की भाँति कोई सत्ता सिद्ध पदार्थ नहीं हैं । अपितु दोनों हीं वृत्त काल्पनिक हैं । पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधर, दो, तीन, चार, पाँच, परत्त्व, अपरत्व इत्यादि भातिसिद्ध पदार्थों की भांति ये भी भातिसिद्ध ही हैं । ग्रह, नक्षत्रादि की विद्या - शिक्षण के लिए, एवं उनके द्वारा फलाफल का विचार करने के लिए ही इन दोनों की कल्पना करली गई है । इन दोनों में से हम पहिले खगोलीय विष्वदवृत्त, एवं क्रान्तिवृत्त की ओर ही श्रापका ध्यान आक-र्षित करना चाहते हैं । चाहे वृत्त छोटे से छोटा हो, अथवा बड़े से बड़ा हो, परिभाषा के अनुसार प्रत्येक में ३६० अंश ( डिग्री ) माने जाते हैं । सुतरां खगोलीय वृत्तद्वय में भी ३६० अंशों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । एवमेव क्रान्तिवृत्त में भी ३६० अंशों की सत्ता सिद्ध होजाती है । इस क्रांतिवृत्त के ठीक मध्य में विष्वद्-वृत्त है । इसी पर सूर्य्यसत्ता बतलाई गई है । विष्वद्वृत्त से उत्तरभाग में क्रान्तिवृत्त के १२ -८-४ क्रमशः इन अंशों के अन्तर से एवं इतने ही अन्तर से विष्वत् से दक्षिणभाग में इस क्रान्तिवृत को काटते हुए ६ पूर्वापर वृत्तं और बन जाते हैं । सातवाँ स्वयं विषुव है । इसप्रकार कुल सात ' पूर्वाप'वृत्त ' हो जाते हैं । इन्हीं को ‘ अहोरात्रवृत्त ' कहते हैं । इन्हीं को सूर्य्य के ' सप्ताश्व ' कहते हैं । ये ही गायत्री, उष्णिगादि सात छन्द हैं । पूर्व में इनका विस्तृत स्वरूप बतलाया जाचुका है । अतः प्रकृत में इस विषय में हम अधिक कुछ नहीं कहना चाहते । जैसे कान्तिवृत्त को काटते हुए ७ पूर्वापरवृत्त बनते हैं, एवमेव उत्तर एवं दक्षिण ध्रुवों को काटते हुए ३६० दक्षिणोत्तर वृत्त बनते हैं । मध्यरेखा का सम्बन्ध इन्हीं दक्षिणोत्तरवृत्तों से है । इह्रीं को ' याम्योत्तर ' वृत्त भी कहा जाता है । क्योंकि ये ३६० वृत्त दोनों ध्रुवों में प्रोत ( पिरोए हुए ) रहते हैं, अतएव इन्हें ' ध्रुवप्रोतवृत्त ' भी कहा जाता है । यह प्रत्येक ध्रुवप्रोतवृत्त भी उसी पूर्वपरिभाषा के अनुसार ३६० अंश का ही है । इनमें रात्रि के बारह बजे, एवं दिन के बारह बजे को काटती हुई जो याम्योत्तररेखा है, वही ' मध्याह्नरेखा कहलाती है । मित्रस्वरूप पूर्वक पाल, एवं वरुणस्वरूप पश्चिमकपाल का विभाग इसीसे होता है । रात्रि के १२ बजे से दिन के १२ बजे पर्य्यन्त का भाग पूर्वकपाल है । इतने समय में सौर प्रारण हमारी ओर रहता है । हम से मेल करता रहता है । अतएव यह भाग मित्रकपाल कहलाता है । एवं दिन के बारह बजे से रात्रि के बारह बजे पर्य्यन्त सौर भाग हम से विरुद्ध जाता रहता है । अतएव यह ' वरुणकपाल ’ कहलाता है । इसीलिए इन्द्र जहाँ पूर्वदिशा के दिक्पाल कहलाए है, वहाँ वरुण पश्चिमदिशा के दिक्पाल कहलाते हैं । इन दोनों का सम्बन्ध उसी मध्याह्नरेखा पर होता | पूर्ण पश्चिम, दोनों कपालों की समष्टि ३०८

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शतपथब्राह्मण का नाम हीं ' खगोल ' है । इस खगोलरूप विशाल अन्तरिक्ष में ' सोम ' भरा हुआ है । इसी सोम को ' दिक् - सोम ' कहा जाता है । इससे कोई भी स्थान रिक्त नहीं है । प्रतएव इसके लिए श्र श्रुति कहती है-' त्वमातन्थोर्णन्तरिक्षम् ' ( आप इस विशाल अन्तरिक्ष में व्याप्त हो रहे हो - ऋक् १।६१।२२ ) । खगोल द्रोणकलश है । इस में यही दिक्सोम भरा हुआ है । सूर्य्यप्रजापति यजमान हैं । अग्नि, वायु, आदित्य, ( सूर्यान्तर्गत इन्द्रप्राण ), चन्द्रमा, इनके ऋत्विक् हैं । इन ऋत्विजों के द्वारा सूर्य्यभगवान् सोम की आहुति दे कर यज्ञ कर रहे हैं । एवं यज्ञ के द्वारा प्रजाएँ उत्पन्न कर रहे हैं । इस कलश का मुख मध्याह्नरेखा के समीप है । यहीं मित्र और वरुण की सत्ता है । इस मध्याह्नरेखा का ही नाम ' उर्वशी ' अप्सरा है । मध्या-ह्ररेखा दिगुपा है । दिक् को ही अप्सरा कहते हैं, जैसा कि श्रुति कहती है । ' विश्वाची च घृताचीचाप्सरसौ । दिक्चोपदिश्चेति ह स्माह माहित्थिः ' । - श ० ८ | ६ | १ | १६ । इति । यह उर्वशी अप्सरा प्रजापति के यज्ञ में उपस्थित है । वहीं मित्रावरुण का उर्वशी को देख कर रेत स्खलित होता है । वह इसी स्थान पर द्रोणकलश में गिरता है । कुछ भाग बाहिर जा गिरता है, कुछ भीतर जा गिरता है । जो भाग दक्षिण में जा कर गिरता है, उस से ' अगस्त्य ' की उत्पत्ति होती है । मो भाग उत्तर में गिरता है, उससे ' वसिष्ठ ' उत्पन्न होते हैं । एवं जो भाग घड़े के मध्य में गिरता है, उस से ‘ मत्स्य ' का जन्म होता है । तीनों मित्रावरुण से उत्पन्न होते हैं । श्रतएव ' मैत्रावरुण ' कहलाते हैं । तीनों की ही उत्पति का आधार उर्वशीरूपा मध्याह्नरेखा है, अतएव पुराण, एवं वेद इन्हें ' वेश्यापुत्र ' कहता है । अस्तु इस कथा का वैज्ञानिक रहस्य किसी आगे के प्रकरण में बतलाया जायगा । यहाँ हमें मध्याह्नरेखा का परि-चयमात्र कराना है | उक्ता मध्याह्नरेखा के ठीक मध्य में खगोलीय विष्वद्वृत्त है । उत्तर ध्रुव से दक्षिणध्रुव १८० अंश पर है | यह आधा मध्याह्नत है । ऐसी अवस्था में खगोलीय विष्ववृत्त से ६० अंश उत्तर ध्रुव की सत्ता सिद्ध हो जाती है । मध्य में विष्वत् है । उत्तर ध्रुव से दक्षिण ध्रुव पर्यन्त १८० अंशात्मक इसी खगोलस्थान में ' आत्मगति ' से सम्बन्ध रखने वाले त्रैलोक्य का त्रिभाग होता है । हम बतला आए हैं कि, विष्वत् से १२-८-४ उत्तर, एवं १२८ ४ दक्षिण भाग में ६ वृत्त बनते हैं । पूर्वापरवृत्त सम्बन्धी इन सम्पूर्ण अंशों का संकलन कर लिया जाता है, तो कुल ' ४८ ' अंश हो जाते हैं । इस ४८ अंशात्मक भाग की अन्तिम सीमा को प्रावृत करता हुआ जो दीर्घवृत्त बनता है, उसे ही ' क्रान्तिवृत्त ' कहते हैं । अश्विन्यादि २८ नक्षत्र, बृह-स्पति आदि ग्रह, राशि आदि सब इसी परिसर के गर्भ में समाविष्ट हैं । मध्याकाश का ४८ अंशात्मक, नक्षत्र, ग्रह, राशि, श्रादि से समन्वित यह भाग ही श्रात्मगति से सम्बन्ध रखने वाला ' पृथिवीलोक ' है । अत्र चलिए अन्तरिक्ष की ओर । विष्वत् के दक्षिण भाग को थोड़ी ३०६

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प्रथमकाण्ड देर के लिए छोड़ दीजिए, एवं उत्तर भाग की ओर दृष्टि डालिए । उत्तर भाग में - विषुव से ६० व अश पर हमने उत्तरध्रुव की सत्ता बतलाई है । इन ६० अंशों में से १२ -८-४ के अन्तर के कारण २४ अंश तो क्रान्तिवृत्त के भीतर ही आजाते हैं । दूसरे शब्दों में- इतने अंश तो पृथिवीलोक में हीं ग्रन्तर्भूत हो जाते हैं । शेष - ६६ श्रंश चचते हैं । इन में से ४२ अंशात्मक जो खगोल का भाग है, वही श्रात्मगति से सम्बन्ध रखने वाला ' अन्तरिक्षलोक ' है । २५ वें अंश से ६६ वें अश पर्य्यन्त अन्तरिक्षलोक है । इस के अनन्तर २४ अंश शेष रह जाते हैं | २४ वें अंश पर ( जो कि ६० वाँ पड़ता है ) उत्तरध्रुव है । इतने प्रदेश का नाम हीं आत्मगति सम्बन्धी ' दिव्य ', किंवा ' स्वर्गलोक ' है । इसप्रकार २४,४२,४८, इन अंशों के अनुपात से क्रमशः खगोल में स्वर्ग, अन्तरिक्ष, पृथिवी, ये तीन लोक होजाते हैं । अत्र चलिए दक्षिण भाग की ओर । दक्षिण भाग में भी विष्वत् से दक्षिणध्रुव पय्र्य्यन्त ६० अंश हैं । इन में २४ तो पृथिवीलोक में हीं चले जाते हैं । शेष ६६ बचते हैं । दक्षिण के २४ वें से आगे पर्य्यन्त ४२ अंशात्मक खगोल का भाग ' पितृलोक ' कहलाता है । इसे ही ' पितृस्वर्ग ' भी कहते हैं । इसके श्रनन्तर २४ अंश बच जाते हैं । २४ वें पर दक्षिण ध्रुव प्रतिष्ठित है । यही भाग ' अधोलोक ' है । इसे ही ' नरक ' कहते हैं । इसप्रकार उत्तर ध्रुव से दक्षिण ध्रुव पर्य्यन्त के १८० अंशात्मक प्रदेश में आत्मगति से सम्बन्ध रखने वाले २४, ४२, ४८, ४२, २४, इस क्रम से क्रमशः स्वर्गलोक, अन्तरिक्षलोक, पितृलोक, नरकलोक, ये चार-लोक हो जाते हैं! सत्र का संकलन कर दिया जाता है, तो १८० अंश हो जाते हैं । श्रात्मा जब कभी शरीर का परित्याग करता है, तत्र इह्नीं चारों में से किसी एक लोक की ओर उसे अपनी गति करनी पड़ती है । जीवात्मा इन चारों लोकों में से किस लोक में जाता है?, इस का निर्णय सदसत् - कम्मों पर ही निर्भर है । जो मनुष्य विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिरूप यज्ञ, तप, दान, कर्म्म करते हैं, वे अन्तरिक्ष में होते हुए स्वर्ग में जाते हैं । विद्या के उपासक ही इस मार्ग में जा सकते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-' विद्यया तदारोहन्ति यत्र कामाः पराहताः । न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः ॥ —उपनिषत् जो इष्ट, आपूर्त ', दत्त - रूप विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिकर्म्म करते हैं, वे पितृलोक में जाते हैं । जो विद्या-निरपेक्ष शास्त्रनिषिद्ध कर्म करते हैं, वे नरलोक में जाते हैं । तीनों को इधर उधर ही जाना पड़ता है । पृथिवीरूप ४ = अंशात्मक मध्याकाश में जाना सामान्य आत्माओं को काम नहीं है । कारण इसका यही है कि, इस भाग के मध्य में सूर्य्य प्रचण्ड ताप से तप रहे हैं । यहाँ से बड़े वेग से सौर तेज भूपिण्ड पर आक्रमण कर रहा हैं | साथ ही नक्षत्रादि भी इसी स्थान है । अतः सौर तेज के साथ साथ ही इनका तेज भी वेग से हमारे भूमण्डल पर आक्रमण कर रहा है । इस आक्रमण को आत्मा नहीं सह सकता । अतएव उसे उसके इधर उधर होकर ही जाना पड़ता है । इधर उधर सौर, नक्षत्रादि तेज सीधा नहीं जाता अतः उसका सन्तरण करने में यह समर्थ होजाता है । प्र ेतगति के मार्ग दो ही हैं । अन्तरिक्ष के द्वारा म्वर्ग में जाना पहिला मार्ग है | यही ' देवयान ' है । इसी को ' शुक्लमार्ग ' कहते हैं । इधर की ओर ४२ अंशा-त्मक वही पूर्वोक्त ‘ पितृस्वर्ग ' है । इसे ही ' पितृयाण ' कहते हैं । यही ' कृष्णमार्ग ' है । इन्हीं दोनों मार्गों का निरूपण करते हुए वेदभगवान् कहते हैं— ३१०

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शतपथब्राह्मण द्व े

सती श्रृणवं पितृणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् ।

ताभ्यामिदं विश्वमेजत् समेति यदन्तरा पितरं मातरं च ॥

— ऋक्संहिता १०/८/१५२ इसी श्रौत का अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए स्मार्त्ताचार्य कहते हैं— * शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वती मते । एकया यात्यनावृत्तिमन्ययाऽऽवर्त्तते पुन: -- गीता २६ । इति । परन्तु जो विद्यासमुच्चित निवृत्तिकर्म के द्वारा अपनी बुद्धि का महदक्षर के साथ योग करता हुआ ' बुद्धियोगी ' बन जाता है, उसका आत्मा निर्धूतपाप्मा होता हुआ स्वच्छ एवं बलवान् हो जाता है । इसमे उस आघात को सहने की शक्ति आ जाती है । ऐसा योगी ही अपने ब्रह्माण्ड का ( कपाल का ) भेद -न करता हुआ उन दोनों मार्गों के मोह में न पड़, उनकी उपेक्षा करता हुआ सीधा चला जाता है । सूर्य्य पर्य्यन्त ही जाकर नहीं रह जाता, अपितु सूर्य का भी भेदन कर उपर वाले ' अपुनर्भार ' नाम के पारमेष्ट्य लोक में चला जाता है । इसी को ' सूर्य्यभेदी ' कहते हैं । इसी के लिए ' न स पुनरावर्त्तते न, स पुन-रावर्त्तते ' ( वहाँ जाने के अनन्तर वह वहाँ से नहीं लौटता ) यह कहा जाता है । यह गति नहीं है । अपितु मुक्ति है । एकप्रकार का अपरकक्षा का ' समवलय ' है । अतएव गीतादि में दो ही गतियाँ बतलाई गई हैं । योगी की इसी तीसरा गति की विलक्षणता बतलाए हुए आगे जाकर भगवान् कहते हैं—

नैते सृती पार्थ! जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।

तस्मात् सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भर्वाजुन! ॥

-गीता

वेदुषु यज्ञेषु तपःसु चैत्र, दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।

अत्येति तत् सर्वमिदं विदित्त्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥

- गी०८२७-२८ । इति । बहुत हुआ । एक बात और बतला कर इस प्रकरण को उपरत करते हैं । मध्य के ४८ अंशात्मक खगोलीय पृथिवीलोक में सौर अग्नि की सत्ता है, यह अग्नि ही इस पृथिवीलोक का अधिष्ठाता | अन्त-रिक्ष में वायु की सत्ता है । इस लोक में इसी का राज्य है । एवं स्वर्ग में ध्रुव का राज्य है । इस ध्रुव में एक विद्युत् रहती है । सूर्य्य से भी एक विद्युत् निकलती है । इसका भौतिक पदार्थों से सम्बन्ध है । सूर्य्य के ऊपर अवित्राक्यमहः, एवं महाव्रत नाम से प्रसिद्ध २५ वें अहर्गण से भी एक विद्युत् निकलती है । * आत्मगतिविद्या का विस्तृत वैज्ञानिक विवेचन गीता के वैज्ञानिक भाषाभाष्य में देखना चाहिए । यह ग्रन्थ अभीतक मुद्रित है । ३११

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प्रथमकाण्ड सूर्य्य से ऊपर सोममय परमेष्ठी है । वहीं से यह विद्युत् निकलती है, अतएव इसे ‘ सौम्यत्रिद्य त ’ कहा आता है | आत्मा में यही विद्युत् आती है । इसी प्रकार ध्रुव से भी विद्युत् निकलती है । इसी विद्युत् के आकर्षणसूत्र में यह महाभूमण्डल कन्दुकवत् ( गेंद के समान ) आबद्ध होरहा है । लौहचुम्बक में जो श्राकर्षणशक्ति देखी जाती है, वह भी इसी ध्रुवविद्य तू का प्रभाव है । विद्युत् साक्षात् इन्द्र है । स्वर्गस्थान में यही प्रतिष्ठित है । स्वर्ग का अधिष्टाता यही ध्रुवात्मक विद्युत् इन्द्र है । अत्र चलिए दक्षिण की ओर । शनि का नाम हीं * यमराज है । ग्रहों में सबसे अन्त में शनि है । इसका आधा भाग तौ ( जोकि सूर्य की ओर रहता है ) प्रकाशित रहता है, एवं आधा भाग अप्रकाशित रहता है | प्रकाशित भाग का नाम ' धर्म्मराज ' है, एवं अप्रकाशित भाग का नाम ' यमराज ' है । पितृ-स्वर्ग में धर्म्मरूप दक्षिणस्थ शनि की सत्ता है । नरक में प्रकाशित यमरूप शनि की सत्ता है । अतएव यमराज को दक्षिण दिशा का दिक्शल बतलाया जाता है । यमराज का पशु महिष है । यह इसी पर आरूढ हो पाश के द्वारा पितृस्वर्ग और नरक में आनेवाले प्राणियों को चाँधा करते हैं । इसप्रकार क्रमश: चारों लोकों के इन्द्र, वायु, अग्नि, यम, ये चार अधिपति हो जाते हैं । हम जानते हैं कि, अप्रस्तुत विषय को सामने देखकर पाठक प्राक्रुष्ट होरहे होंगे | परन्तु हम विवश हैं । भुवनस्वर्ग - सम्बन्धिनी यह व्यवस्था ही ऐसी जटिल है कि, बिना प्रकृतिमण्डल के पूर्णज्ञान के इसका स्वरूप समझ में नहीं आ सकता । इसीलिए दो चार पंक्तियाँ ओर भी हमें आपके सामने रखनी पड़ रहीं हैं । ' खगोल के मध्य में ४८ अंशात्मक पृथिवीलोक है ' पूर्व के निरूपण से पाठकों को यह भलीभाँति विदित होगया होगा । इसी में हमने २८ नक्षत्र बतलाए थे । इनमें ' अभिजित् ' नक्षत्र संधिभाग में पड़ जाता है, अतएव कुल २७ ही नक्षत्र माने जाते हैं । यह नक्षत्र उत्तरभाग में स्थूल है । मध्य में मध्यम है । दक्षिणं में छोटे हैं । इस नक्षत्रविद्या को समझाने के लिए ही महर्षियेंनें इस ४८ अशात्मक मार्ग के तीन मार्ग चना ड'ले हैं । वे तीनों मार्ग ऐरावत, जरद्गव, एवं वैश्वानर नाम से प्रसिद्ध है । ये बड़े मार्ग है | इनमें तीन, तीन नक्षत्रों के अनुपात ६ छोटे मार्ग किए गए हैं । इन्हें ' वीथी ' ( गली ) कहा जाता है । यही ज्योतिषशास्त्र के सुप्रसिद्ध ६ नाड़ीवृत हैं । जैसे सूर्य्यरथ का सम्बन्ध छन्दोरूप सात अहोरात्रवृत्तों से है, एवमेव चन्द्रमा के रथ का सम्बन्ध इन ६ नाड़ीवृत्तों से है । कैसे है?, इसका उत्तर फिर कभी दिया जायगा । अभी केवल इतना हीं समझलेना पर्याप्त होगा कि, वे वीथियाँ क्रमशः - उत्तर भाग की ओर से प्रारम्भ कर - १ - नागवीथी, २ - गजवीथी. ३- ऐरावतीवीथी, ४ - आर्षभीबीथी, ५ – गोवीथी, ६ - जारद्गवीवीथी, ७ - अजवीथी, ८ - मार्गीवीथी, ६ - वैश्वानरीवीथी, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । वायुपुराण में इन सत्र का विस्तृत निरूपण किया गया हैं | इन ε ओं में उत्तरभाग में सबसे अन्त में ' नागवीथी ' है । इधर सबसे अन्त में ' वैश्वानरीवीथी ' है । क्रान्तिवृत्त की उत्तरीय अन्तिम सीमा नागवीथी है । क्रान्तिवृत्त के दक्षिण भाग की अन्तिम सीमा वैश्वानरी-y-* यमराज का क्या स्वरूप है?, क्या वह मनुष्याकार है?, क्या सुप्रसिद्ध भैंसा उनका वाहन है?, उनके पाश क्या क्या स्वरूप है?, इत्यादि विषयों का विस्तृत विवेचन कठोपनिषत् भाषा भाष्यान्तर्गत नचिकेता, और यम के सम्वाद में देखना चाहिए । यह ग्रन्थ अभीतक मुद्रित है । ३१२

पृष्ठ 576

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शतपथब्राह्मण वीथी है | इस क्रान्तिवृत्त के उत्तरभाग पें हमने ४२ अंश का अन्तरिक्ष बतलाया है । एवं इसी को ' देव-यानमार्ग ' कहा है । इसके आगे ही सप्तर्षि है । ध्रुव से २४ अंश के अन्तर पर सप्तर्षि घूमते हैं । सुतरां यहाँ तक देवयान की सत्ता सिद्ध हो जाती है । अत्र चलिए दक्षिण भाग की ओर । वैश्वानरीवीथी क्रान्ति-वृत्त की अन्तिम सीमा है । इसके आगे ४२ अंशात्मक पितृयाणमार्ग बतलाया गया है । दक्षिण ध्रुव से २४ अंश उत्तर अगस्त्य है । सुतरां अगस्त्य से उत्तर, एवं वैश्वानर से दक्षिण पितृयाण की सत्ता सिद्ध हो जाती हैं । इसी मार्गरहस्य को लक्ष्य में रख कर मगवान् व्यास कहते हैं—

“ उत्तरं यदगस्त्यम्य, अजवीथ्याश्च दक्षिणम् ।

पिठ्याणः स वै पन्था वैश्वानरपथाद्वहिः ॥१ ॥

नागयुत्तरं यच्च, सप्तर्षिभ्यश्च दक्षिणम् ।

उत्तर: सवितुः पन्था देवयान इति स्मृतः ॥ २ ॥ इति ॥

—वायुपुराणे यह है - आत्मगति से सम्बन्ध रखने वाली, नित्य ब्रह्मा के द्वारा निर्मिता नित्या त्रैलोक्य - व्यवस्था का सूक्ष्म निदर्शन । इसी लोक, लोकाधिपति, प्रजा आदि व्यवस्था के अनुसार मनुष्यब्रह्माने इस पृथिवीलोक में चतु'लोक व्यवस्था की थी, जैसाकि अग्रिम प्रकरण से स्पष्ट हो जायगा । भूतल के विष्वत् ( निरक्षवृत्त ) से सुमेरु ६० अंश पर है । यही सुप्रसिद्ध प्राग्मेरु ( पामीर ) है । प्रकृति में पृथिवीलोक का सम्बन्ध विष्वत् से । अतएव भौमब्रह्मा ने भूपिण्ड पर इस पिण्ड के पूर्वोक्त विष्वत् से ही क्रमशः पृ ० अ ० द्यौ, इन तीनों लोकों को व्यवस्थित किया । प्रकृति में ६० अंशपर स्वर्गप्रदेश है । उसी प्रकार ब्रह्मा ने उसी ६० अंश वाले पामीर को स्वर्गस्थान माना । प्रकृति में पृ ० द्यौ, दोनों के मध्य में अन्त-रिक्ष है, अतएव यहाँ भी पार्थिवविष्वत् के मध्य में अन्तरिक्ष लोक माना । प्रकृति में तीनो लोकों के अग्नि, चायु, इन्द्र, क्रमशः ये तीन देवता अध्यक्ष हैं, तदनुसार ही इस भौमत्रिलोकों में भी क्रमशः तीनों लोकों मे अग्नि, वायु, इन्द्र, इन तीन देवताओं को प्रतिष्ठित किया । अग्नि को पृथिवी का अधिपति बनाया, यही पृथि-वीलोक इस ‘ भरत ’ अग्नि के कारण ' भारतवर्ष ' कहलाया, एवं यहाँ की प्रजा ' मनु ' के आधिपत्य के कारण ‘ मनुष्य ' कहलाई । अन्तरिक्ष में वायु की सत्ता प्रतिष्ठित की, यहाँ की प्रजा ' तिय्यग्योनि ' ( विद्याधर, अप्सर, गंधर्व आदि ) नाम से प्रसिद्ध हुई । एवं द्युलोक का शासन इन्द्र के अधिकार में दिया गया, यहाँ की प्रजा ‘ देवता ' कहलाई । इस व्यवस्था से पहिले देवता और मनुष्य, दोनों इसी भारतवर्ष में रहते थे । असुरोंनें सम्पूर्ण भूमण्डल पर अपना आधिपत्य प्रतिष्ठित कर रखा था । ब्रह्मा की कृपा से आगे जाकर ये स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हुए । एवं स्वर्ग जाते हुए इन देवताओंनें अग्नि को इस भूमण्डल का अध्यक्ष बनाया, जैसा कि निम्नलिखित श्रुति से स्पष्ट होजाता है- -‘ अस्मिन् ह वै लोके – उभये देव - मनुष्या आसुः । ते देवा स्वर्गं लोकं यन्तोऽग्नि-मूचुः -त्वं नो अस्य लोकस्याध्यक्ष एधीति ' । कौ ०० प्रा ० १ | १ | इति । ३१३

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प्रथमकाण्ड जो महानुभाव हमारे इतिहास से सर्वथा अपरिचित रहते हुए हम भारतीयों को बाहिर से आने वाले बतलाते हैं, उत्तर भागस्थ पामीर से भारत में ग्रायों का आगमन बतलाते हुए हमारा स्वत्व ( मौसी हक ) इम देश से हटा कर अपने समान हमें भी श्रागन्तुक बतला कर राजनैतिक चक्र में डाल कर हमें धोका देना चाहते हैं, उहाॅ पूर्व के निरूपण अपना भ्रम छोड़ देना चाहिए । पामीर से हम यहाँ नहीं आए हैं, अपितु " हमारे में रहने वाले देवता उलटे पामीर में जाकर बसे हैं । अस्तु यह विषय प्राकृत है । यहाँ हमें यही बत-लाना है कि, पूर्वकथानानुसार तीनों लोकों में क्रमशः तीन मनुष्यदेवता प्रतिष्ठित हुए, एवं प्रकृति के अनुसार ही ब्रह्मा सुमेरु पर प्रतिष्ठित हुए । हम कह आए हैं कि, भारतीय प्रजा मनु के शासन के कारण ' मनुष्य ' कहलाती है । स्वर्ग में रहने वाले देवता भी कभी - हमारे लोक में आया करते थे । इनके निवास का स्थान इस लोक में नियत था | स्वयं ब्रह्माने भी इस देश पर दो तीन बार कृपा की है । सब से पहिले वे पुष्कर में ठहरे हैं, अनन्तर प्रयाग में, अनन्तर कुरुक्षेत्र में ठहरे हैं । इन तीनों में तीसरा कुरुक्षेत्र ही इन देवताओं के ठहरने का प्रधान स्थान था । जैसे राजपूतानान्तर्गत अजमेरस्थ पुष्कर वास्तविक पुष्कर नहीं है, इसी प्रकार इन्द्रप्रस्थ के समीप वाला हमारा पहिचाना हुआ कुरुक्षेत्र भी वास्तविक कुरुक्षेत्र नहीं है । कुरुक्षेत्र तीन हैं, पुष्कर भी तीन हैं । एक कुरुक्षेत्र, एक पुष्कर का सम्बन्ध तो प्रकृति से हैं । एवं शेष दोनों हमारे भूमण्डल में ही हैं । सम्पूर्ण भूपिण्ड पुष्करपर्ण से निर्मित होने से वास्तव में पुष्कर है । इसमें नित्य आग्नेय पार्थिव ब्रह्मा प्रतिष्ठित हैं | पूर्व के प्रकरण में हम बतला आए हैं कि, ब्रह्मा जब भी रहते हैं, पुष्कर में हीं रहते हैं । इस परिभाषा के अनुसार पाँचों नित्य ब्रह्माओं को पुष्कर में ही प्रतिष्ठित मानना पड़ता है । पार्थिव ब्रह्मा का पुष्कर भूपिण्ड है । सौर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का पुष्कर अमृता पृधिवी का ' पुष्करद्वीप ' है । अमृता पृथि॒वी के आग्नेयभाग में २१ अहर्गण हैं । इनमें सात लोक, सातसमुद्र सातद्वीप माने गए हैं, जिनका स्वरूप विस्तारभय से प्रकृत में नहीं व्रत-लाया जासकता । इन सातों द्वीपों में २१ वें अहर्गण पर ७ वाँ पुष्करद्वीप है । इसी पर सूर्य्य प्रतिष्ठित है । अतएव इसके लिए ‘ एकविंशो वा इतः स्वर्गोलोकः ' यह कहा जाता है । सूर्य्यस्थान ही स्वर्गलोक कहा जाता है, इसीलिए आगे जाकर ‘ असौ वा आदित्य एकत्रिंशः ' ( तै ० ब्रा ० ११५/१०/६ ) यह कहा गया है | इस नित्य पुष्कर के अनुसार भूमण्डल में पुष्कर बताया गया था । वही पुष्कर आज ' बुखारा ' नाम से प्रसिद्ध है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बताया जाचुका है । एवं तीसरा पुष्कर वह है, जिसे अपने इतिहास को भूलजाने वाले हम भारतीयोंनें ' पुष्कर ' समझ रखा है । इसीप्रकार कुरुक्षेत्र भी तीन ही हैं । प्रकाशमय सौरमण्डल पहिला कुरुक्षेत्र है । सौर प्राणनित्य अपुरु-षविध देवता हैं । वे प्राणदेवता इसी कुरुक्षेत्र में प्रतिष्ठित हैं । सम्पूर्ण प्राणदेवता यहाँ प्रतिष्ठित रह कर सोमाहुति के द्वारा यज्ञ कर रहे हैं, अतएव इनका यह स्थान ' देवयजन ' कहलाता है । इत्ती अभिप्रायसे— ' कुरुक्षेत्रं वै देवानां देवयजनमास ' ( श ० १४ | १ | ११५ ) यह कहा जाता है | सम्पूर्ण स्तोम्यत्रिलोकी उन सौर प्राणदेवताओं की वेदि है । स्तोम्यत्रिलोकी अमृताग्निरूपा पृथिवी है । अमृता पृथिवी के ६, १५, २१ ये तीन स्तोम हीं क्रमश: पृ ० अ ० द्यौ, ये तीन लोक हैं । अतएव वेदिरूप इन तीनों स्तोम्यलोकों को हम ' पृथिवी ’ ( अमृता- उख्यापृथिवी ) कह सकते हैं । पार्थिव आग्नेय प्राणदेवताओं के द्वारा होने वाले हर्विर्यज्ञ की वेदि ' पिण्डपृथिवी ' ( भूपिण्ड • है, एवं सौर प्राणदेवताओं के द्वारा होने वाले सोमयज्ञ ( ज्योतिष्टोमयज्ञ ) की ३१४

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शतपथब्राह्मण वेद यही लोकत्रयात्मिका अमृतरूपा महा पृथिवी है । इन्हीं दोनों वेदियों का सामान्यरूप से निरूपण करते हुए ' यावती वै वेदस्तावती पृथिवी ' यह कहा जाता । चान्द्रसोम ग्राहुतिद्रव्य है । वेदि का १७ वाँ स्तोम आहनीयकुण्ड है । इसमें रहने वाला सप्तदशात्मक प्राजापत्याग्नि आहवनीय । इसी अग्नि में उस / चान्द्र सोम की आहुति देकर प्राणदेवता यज्ञ किया करते हैं । ' सौरमण्डल कुरुक्षेत्र है ' सम्पूर्ण प्रपञ्च से यही बतलाना है । यही पहिला नित्य कुरुक्षेत्र है । इस नित्य कुरुक्षेत्र की प्रतिकृति पर भौमब्रह्मा ने इसी भौम स्वर्गप्रदेश में देवताओं के वैध यज्ञ करने के लिए जो स्थान नियत किया था, वह यहाँ का कुरुक्षेत्र कहलाया । तीन प्रकार की सरस्वती नाम की नदियों में यवनभावा में ' बालकश ' नाम से प्रसिद्ध सुप्रसिद्ध ' प्राचीसरस्वती ' इसी कुरुक्षेत्र के अन्तर्गत है । देवगण इसी प्राचीसर— स्वती में अवभृथस्नान ( यज्ञान्तस्नान ) किया करते थे । यही दूसरा भौम स्वर्गीय कुरुक्षेत्र है, जिसे आज हम सर्वथा भूल गए हैं । ये देवता समय समय पर ' पृथिवीलोक ' नाम से प्रसिद्ध हमारे ' भारतवर्ष ' में भी श्राया करते थे । इन देवताओं का मारतवर्ष में ठहरने का जो स्थान नियत था, वही हमारा पहिचाना हुआ तीसरा कुरुक्षेत्र है । इसमें देवताओं के अतिरिक्त भारतवर्ष के किसी भी राजा की सत्ता न थी । इसमें न कोई खेती कर सकता था, न कोई मनुष्य रह सकता था । अतएव महाभारतादि में यह ' धर्म्मक्षेत्र ' नाम से व्यवहृत हुआ है । प्रसंगागत एक बात और बतला देते हैं । पुराणों में सूर्य्यग्रहण पर कुरुक्षेत्र स्नान का अधिक माहा-त्म्य दिया है, एवं ' ग्रहणेषु काशी ' आदि के अनुसार चन्द्रग्रहण पर वाराणसी गङ्गास्नान को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया है । ऐसा क्यों?, उत्तर स्पष्ट है । चन्द्रमा सोमपिण्ड है । सूर्य्य अग्निपिण्ड है । चन्द्रमा को महादेव कहा जाता है, जैसा कि `... कहती है - ‘ प्रजापतिर्वै चन्द्रमाः । प्रजापतिर्वै महान् देव: ' ( शत ० ६ | १ | ३ | १६ ) इति । अग्निमय सूर्य्य साक्षात् रुद्र है । सूर्य्यपिण्ड एकरुद्र है, इसी अभिप्राय से ' एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ' यह कहा जाता है | एवं सूर्य्य के सहस्ररश्मिप्राण उस एकरुद्र की अनन्त विभूतियाँ हैं, अतएव ' ये चैनं रुद्रा अभितो दिक्षु श्रिताः ' ( यजुः संहिता १६ ० | ६ म ० ) यह कहा जाता है । चन्द्रमा शिव है । इस शिवात्मक महादेव का ( चन्द्रमा का ) केशपुञ्ज यही श्राकाश है । अतएव इन्हें ' व्योमकेश ' भी कहा जाता है । यद्यपि अग्नि भी महादेव है । ऐसी अवस्था में हम अग्निमय सूर्य्य को भी ' महादेव ' कह सकते हैं । तथापि गङ्गा को अपने जटाजूट में रखने वाले महादेव तो केवल ' चन्द्रमा ' नाम के महादेव ही हैं । अतः गङ्गा के सम्बन्ध में हमने चन्द्रमा को ही महादेव कहा है । सोम शान्त है । दूसरे शब्दों में सौम्याग्नि शान्त है । अतएव यह शिव है । वही अग्नि सोम सम्बन्ध से शिव है । शुद्धरूप से रुद्र है । इसी अभिप्राय से ' अग्निर्वै रुद्रः, तस्यैते द्वे तन्वौ, घोरान्या च शिवान्या च ' यह कहा जाता है । गङ्गा को अपने व्योमरूप जटाजूट में धारण करने वाले शिवरूप चन्द्रमा हैं, न कि रुद्ररूप सूर्य्यं । सूर्य्य के ऊपर उक्थ ( पिण्ड ) रूप से प्रतिष्ठित रहने वाले ऋतप्रधान भगवान् परमेष्ठी हैं । जैसे स्वयम्भू ' ब्रह्मलोक ' कहलाता है, सूर्य्यं ' इन्द्रलोक ' कहलाता है, इसी प्रकार आपोमय परमेष्ठी ‘ विष्णुलोक ' कहलाता है । ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम आसीत् श्रुति के अनुसार इसी पारमेष्ठ्यलोक में भार्गव सोम की सत्ता है । यही पारमेष्ठ्य सोम ' ब्रह्मणस्पति ' नाम से प्रसिद्ध है । दूषित परमाणुओं को नष्ट कर पदार्थों को स्वच्छ बना डालना इस सोम का पहिला काम है । यही सोम ‘ अम्भः ' कहलाया है । इसी परम पवित्र ब्राह्मणस्पत्य सोम का स्वरूप बतलाते हुए महर्षि कहते हैं— ३१५

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शतपथब्राह्मण साधारण सी बात भी हमारी समझ में नहीं आती । हम कुछ का कुछ समझ बैठते हैं । अस्तु गंगाजल का माहात्म्य श्रोषधियों से है, अथवा श्रोषधियों की उत्कृष्टता गंगाजल से है?, इस विषय के निर्णय का भार हम अपने विवेकी पाठकों हीं पर छोड़ते हुए पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । हम कह रहे थे कि, इस पवित्र सोम का प्रभवस्थान सूर्य्य से ऊपर का पारमेष्ठ्य विष्णुलोक है । इस विषय में हमें एक पौराणिक उपाख्यान यहीं से पुण्यसलिला भगवती भागीरथी का अवतार होता है । स्मृत हो पड़ा है । प्राकृत समझ कर दो शब्दों में हम उसका भी उल्लेख कर देते हैं । एकबार ब्रह्मा, विष्णु, महेश ये तीनों देवता एक साथ मिलकर गोलोकनाथ शेषशायी गोविन्द के दर्शन करने गोलोक पहुँचे । द्वारपाल ने भीतर जाकर इन तीनों के आने की सूचना दी । वहाँ भगवान् विष्णु शेषशय्या पर शयन कर रहे थे । एवं लक्ष्मीजी चरणसेवा में थे । नारद अपने तुम्बुरु की नाद-ध्वनि में विभोर थे । द्वारपालके ' भगवान् के दर्शनार्थ त्रिमूर्ति आई है ' निवेदन करने पर लक्ष्मीजी ने कहा कि, जाकर पूछो कि, आप किस ब्रह्माण्ड से आए हैं?, आप तीनों किस ब्रह्माण्ड के नायक हैं? । श्राज्ञानु-सार द्वारपाल ने उनसे यही प्रश्न किया । उत्तर मिला कि, हम तीनों ' रोदसीब्रह्माण्ड ' के निवासी हैं । परिचयानन्तर तीनों को भीतर आने की आज्ञा मिली । तीनों अभिलषित स्थान पर पहुँचे । तीनोंनें साष्टाङ्ग प्रणाम किया, एवं गोलोकनाथ के द्वारा निर्दिष्ट आसनों पर बैठ गए । इम तीनों में हमारे भोले बाबा अपने ब्रह्मवाद्य ( एकतारे ) के नाद में तल्लीन थे । विष की ऊष्मा से आँखे तनीं हुई थीं । चारों ओर भुजङ्गमालाएँ सुशोभित होरहीं थीं । कँधे पर एकतारा रक्खा हुआ था । उस एकतारे के तार पर इनकी श्रृङ्गुलि उपांशुरूप से थिरक रही थी । इस अद्भुत दृश्य ने लक्ष्मीजी का ध्यान इनकी ओर विशेष-रूप से आकर्षित किया । उसी क्षण चञ्चलादेवी बोल उठीं कि, भोले बाबा! अनन्तकाल के अनन्तर आपने यहाँ पधारने की कृपा की है । आप सङ्गीत के प्रथमाचार्य्यं हैं, अतः हम जान आप से संगीत सुनना चाहतीं हैं । भोलेत्राचा ने बहुत आनाकानी की । सिटपिटाए । बहानेबानी की । परन्तु शक्ति के सम्खमु इस शिव को हार माननी ही पड़ी । बाध्य होकर भोलेबाबा को एकतारे के साथ सङ्गीत प्रारम्भ करना पड़ा । प्रारम्भ करने में विलम्ब था । जिस समय भगवान् शङ्कर का सङ्गीत प्रारम्भ हुआ, उस समय गोलोक में रहने वाले देवता, अप्सराएँ, लक्ष्मी, नारद आदि आदि तन्मय होगए | सबके नेत्रपटल नीचे गिर गए । सत्र अपनी सुध बुध भूल गए । थोड़ी देर के अनन्तर भगवान् शङ्कर का सङ्गीत उपरत हुआ । सबने आँखे खोली । परन्तु यह क्या । जिस शेषशय्यास्तर पर गोविन्द सो रहे थे, उस स्थान पर - देवताओं ने बहता हुआ पानी देखा । उसी समय सर्वत्र त्राहि त्राहि मच गई | सत्र भगवान् शङ्कर के सङ्गीत को भला बुरा कहने लगे । इसप्रकार विष्णु के विलीन हो जाने से, एवं उस स्थान पर पानी के आजाने से सबको व्याकुल होते देखकर उसी समय आकाशवाणी हुई कि, हे देवताओ? मत घबड़ाओ । मैं भगवान् शङ्कर के संगीत के प्रभाव से द्रुत होगया हूँ । पानी बन गया हूँ । यही मेरा द्रव भाग ब्रह्माण्ड का भेदन करता हुआ भगीरथ के प्रयास से भूलोक में जाकर ' भागीरथी ' नाम धारण करता हुआ सगरपुत्रों का उद्धार करेगा ' । क्योंकि यह पानी उसी ब्रह्म का द्रवभाग है, अतएव यह भागीरथी पुराणों में ' ब्रह्मद्रवी ' नाम से प्रसिद्ध हुई | ३१७

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प्रथमकाण्ड पूर्वकथा का वैज्ञानिक रहस्य क्या हैं? इस प्रश्न का समाधान करना अप्राकृत होता । सम्बन्धमात्र के लिए इस विषय में दो चार बातें बतला देना ही पर्य्याप्त होगा । रोदसी ब्रह्माण्ड में पृ ० अ ० द्यौ ( सूर्य्य-रूपा द्यौ ) तीन लोक हैं | तीनों के क्रमशः अग्नि, वायु, इन्द्र, तीन अधिपति हैं । अग्नि हीं २१ पर्य्यन्त वितत होकर विष्णु कहलाते हैं । मध्य का वायु हिरण्यगर्भ है । सोम, अग्नि - गर्भित सौर इन्द्र शिव हैं । सूर्य्य से ऊपर परमेष्ठी - मण्डल है । यह श्रापोमय है । इसमें रहने वाले विष्णु गोलोकनाथ हैं । नार ( पानी ) को उत्पन्न करने वाला ‘ नारद ' नाम से प्रसिद्ध ऋषिप्राण भी यहीं है । सौर तेज लक्ष्मी है, श्री है । सूर्य्य स्वरवाक् को उत्पन्न करने के कारण ' स्वरः ' है । यही ' श्री ' है । अतएव इसके लिए ' श्रीर्वै स्वरः ' ( शत--११ | ४ | १० ) यह कहा जाता है । यह उसी वारुण पारमेठ्य विष्णु की अन्तिम सीमा में प्रतिष्ठित है । इसीलिए इसके लिए ‘ श्रीर्वै— वरुणः ' ( कौ ० ब्रा ० १८।६ । ) यह कहा जाता है | परमेष्ठी के ऊपर स्वयम्भूब्रह्म है । यह वागूरूप है । यही परमेष्ठी में आकर विष्णुस्वरूप में परिणत होकर ' पानी ' बनती है । अतएव इसके लिए ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव सासृज्यत ' ( शत ० ६ | १ | १८ ) इत्यादि कहा जाता है । वाग्ब्रह्म ही शङ्कर के सङ्गीत से द्रुत होकर पानी बनता है । अतएव गङ्गा को हम ' ब्रह्मद्रबी ' कहते हैं । शिव सोमप्रधान हैं । यही पवमान है । पारमेठ्य वायु श्राम्भ: है । पवमान शिवसोम के सम्बन्ध से ही विष्णु का आधाररूप वायु पानी बन जाता है । अम्भः, और पवमान के रासायनिक सम्मिश्रण से ही पानी की उत्पत्ति हुई है, जैसाकि अपांप्रणयन-कर्म में विस्तार के साथ बतलाया बाचुका है । इसी विज्ञान को -सुलभ रीति से समझाने के लिए पुराण ने इस तथ्य को कथारूप में परिणत कर दिया है । इस प्रपञ्च से बतलाना हमें केवल यही कि, गङ्गा का सम्बन्ध पारमेय सोम से है । यह सोम पहिले सूर्य्य में श्राता है । सूर्य्यब्रह्माण्ड का भेदन कर सीधा भूलोक की ओर आने के लिए सौर रश्मियों में प्रतिष्ठित होता है । सूर्य्यं श्राग्नेय है, अम्भः सौम्य है । इस विजातीयता के कारण ऊपर से सीधे आने वाले इस अम्भः को ' सूर्य्य ' अपनी रश्मियों से धक्का देकर फैंक देता है । दक्षिण में यमाग्नि है । उत्तर में सोममय चन्द्रमा है । अतएव चन्द्रमा को उत्तरदिशा का लोकपाल बतलाया जाता है । इस सजातीय प्राक-र्षण से सूर्य्यरश्मियों से फैंका हुआ वह अम्भः उत्तरदिशा में आकर महादेव ( चन्द्रमा ) के जटाजूट ( चन्द्र-मण्डल ) में प्रतिष्ठित होजाता है । यह उस अम्भः का तिर्य्यगुरूप दूसरा गमन है । यहाँ से यह अम्भः चान्द्र रश्मियों से द्रुत होकर चिन्दुसरोवर में आता है । इसी के समीप जह्नु ऋषि का आश्रम है । यहाँ से भगीरथ के प्रवास से पहाड़ों को काटती हुई यह गङ्गा सबसे पहिले मायापुरी, हरद्वार, आदि विविध नामों से प्रसिद्ध सुप्रसिद्ध हरिद्वारतीर्थ के ब्रह्मकुण्ड पर आके भूतल से सम्बन्ध करती है । यही हमारी पतितपावनी कलिमल-विध्वंसिनी पुण्यसलिला भगवती भागीरथी का तीसरा गमन है । पामीर से चारों ओर हमने चार गङ्गाओं का निर्गमन बतलाया है । इन चारों में दक्षिणभाग की ओर आने वाली गङ्गा ही ‘ अलकनन्दा ' कहलाती है । इसी अलकनन्दा में भागीरथी का सम्बन्ध होता है । इसी सम्बन्ध से इस अलकनन्दा का अधिक माहात्म्य बतलाया जाता है । यह गङ्गा पहिले शिव के जटाजूट में रहती है, अतएव महादेव को ' गङ्गाधर ' कहा जाता है । गङ्गा का सम्बन्ध गङ्गाधर से । सूर्य्य में गङ्गा का ना पहिला मार्ग है । वहाँ से उत्तरदिशा की ओर प्रक्षिप्त होकर गङ्गाधर के जटाजूट ( चान्द्रमण्डल ) में ३१८