Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 581–590
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 581–590
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शतपथब्राह्मण प्रतिष्ठित होना दूसरा मार्ग है । एवं यहाँ से भूतल पर आना तीसरा मार्ग है । अतएव यह गङ्गा पुराणों में ' त्रिपथगा ' नाम से प्रसिद्ध है । इसमें पवित्र सोम अत्यधिक मात्रा में रहता है । श्रतएव इस गाङ्गेय में बरसों कीड़े नहीं पड़ते । ब्रह्मकुण्ड से आगे बढ़ती हुई यह ब्रह्मद्रवी काशी आदि तीर्थों में जाती | चन्द्रमा के ऊपर जब पृथिवी की छाया पड़ती है, तो चन्द्रग्रहण होता है । चन्द्रमा गाङ्ग ेय सोममय है । अत: इस ग्रहण का सम्बन्ध गङ्गाजल से होत । है । अतश्व चन्द्रग्रहण में प्रधान रूप से गङ्गास्नान को ही प्रधानता दीजाती है । यद्यपि हरिद्वार गङ्गा का पहिला उद्गम स्थान है, तथापि काशीखण्ड में उपवर्णित विश्वनाथमहात्म्य से ग्रहण में अधिक माहात्म्य काशीगङ्गास्नान का ही माना गया है । जहाँ से गङ्गा निकली है, मूर्त्त रूप से वे साक्षात् गङ्गाधर इसी स्थान पर विद्यमान हैं । इन शिवलिङ्गों का क्या माहात्म्य है?, काशी शिवपुरी क्यों मानी जाती है?, शिव का क्या स्वरूप है?, इत्यादि विषयों का विशद विवेचन गीताविज्ञान के भाषाभाष्य के विषयरहस्यान्तर्गत ' उपा-सनारहस्य ' में देखना चाहिए । यहाँ विस्तारभय से हम इस प्रकरण को नहीं उठाना चाहते । चन्द्रग्रहण में काशी – स्नान का अधिक माहात्म्य क्यों है?, इस प्रश्न का समाधान होचुका । अत्र दूसरे प्रश्न की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । सूर्य्य अग्निमय है 1 । जैसे जल का सम्बन्ध चन्द्रमा से है, एवमेव स्थल का सम्बन्ध सूर्य्य से है । भू: अग्निपिण्ड है । इसका सूर्य्य से सम्बन्ध है । पृथिवी के भी कुरु-क्षेत्रभाग में सौर श्राग्नेय प्राण अधिकमात्रा से व्याप्त है । साथ ही देवताओं के निरन्तर आवास से यह भाग ‘ स तुदीर्घकालादर - नैरन्तर्य्यसत्कारासेवितो दृढ़ भूमि: ' इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार आज पर्य्यन्त देवप्राणमय बना हुआ है । सूर्य्यग्रहण का प्रभाव इसी सजातीय कुरुक्षेत्र पर, विशेषरूप से पामीरप्र-देशस्थ कुरुशेत्र पर पड़ता है । अतएव सूर्य्यग्रहण में इस स्थान को अधिक माहात्म्य दिया जाता है । इन सभी रहस्यों को हमारे सम्मुख रखने वाले वे ही मनुष्यदेवता थे, जो कि असुरों के द्वारा ‘ सोम ( सोमवल्ली ), सूर्य्य ( सूर्य्यसदन नाम से प्रसिद्ध विज्ञानभवन ), यज्ञ, धेनु, इन चार देवबलों के नष्ट होजाने के कारण आज इस भूमण्डल से सर्वथा उच्छिन्न होचुके हैं । उन के उच्छिन्न होते ही यच्चयावत् दिव्यव्यस्थाएँ भी एकप्रकार से उच्छिन्न हीं होचुकीं हैं । महाभारतकाल पर्य्यन्त हमारी यह व्यवस्था सुव्यवस्थित थी । उस समय अन्तिम, ( १४ ह वें ), पुराणों में हरिवाहन, एवं वेदों में ‘ हरिवान् ’ नाम से प्रसिद्ध इन्द्र का आधिपत्य था । महाभारतयुद्ध के मुख्यपात्र स्वयं युधिष्ठिर, और अर्जुन, दोनों हीं तत्कालीन इन्द्र के परमप्रिय पात्र थे । अर्जुन ने भगवान् कृष्ण के आदेश से खाण्डववन दग्ध किया था । इसी खाण्डववन में इन्द्र के अभिन्न मित्र ' तक्षकराज ' रहते थे । यह इन्द्र तक्षक से मिलने के लिए कभी यहाँ आया करते थे । यहीं आकर जिस स्थान पर इन्द्र ठहरा करते थे, वह स्थान आज ' हिण्डौन ' ( इन्द्रवन ) नाम से प्रसिद्ध है | यह स्थान राजपूतानान्तर्गत जयपुरराज्य की सीमा के भीतर है । जयपुरराज्यान्तर्गत सुप्रसिद्ध ' खण्डार ' ही हमारा महाभारतकालीन ' खाण्डवद्वार ' है । इन अप्रासंगिक बातों से हमें केवल यही दिख-लाना है कि इन्द्रादि देवता ऐतिहासिक देवता थे । मनुष्यदेवता थे । ये ही हमारे प्रकरण के दूसरे देवता हैं ॥ इति मनुष्यदेवतास्वरूपदिग्दर्शनम् २ ३१६
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प्रथमकाण्ड अत्र क्रमप्राप्त ' पुरुषविध चान्द्रदेवताओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित किया जा रहा है | पुरुषविध अनित्य भौम देवताओं का विचार उपरत हुआ । अत्र पुरुषविध देवताओं का निश्पण किया नाता? है । चान्द्रदेवताओं का स्वरूप बतालावें, इसके पहिले प्रजासृष्टि से सम्बन्ध रखने वाले निम्न लिखित द्यावापृथिवी के विज्ञान पर लक्ष्य देना उचित होगा । ‘ चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' इस अनुगमन ति के अनुसार प्रजासृष्टि १ - पूर्वरूप, २ उत्तररूप, ३ - संधि, ४ – संधान, इन चार भावों पर अवलम्बित है । इन चारों की समष्टि को वैदिक परिभाषा में ' संहिता ' कहा जाता है । संसार की प्रत्येक वस्तु में पूर्वोक्त चारों विभाग रहते हैं । अतएव वस्तुमात्र को हम ' संहिता ' कहसकते हैं । इन संहिताओं का ब्राह्मणग्रन्थों में अनेक प्रकार से स्वरूप - निर्वचन किया गया है । माण्डू-केय, शाकल्य, माहित्थि, आदि आदि भिन्न भिन्न ऋषियोंनें भिन्न भिन्न संहिताओं का निरूपण किया है । उन अनेक प्रकार की संहिताओं में से परिचयार्थ तीन चार संहिताओं का उल्लेख कर देना सामयिक प्रतीत होता है । यहाँ हम केवल उन में से कुछ एक के नाममात्रों का ही उल्लेख करेंगे । इस विषय का वैज्ञानिक विवेचन किसी आगे के प्रकरण में करने की चेष्टा की जायगी । माण्डूकेय महर्षि कहते हैं कि- पृथिवी पूर्वरूप हैं, द्यौ उत्तररूप है, आकाश संहिता है । परन्तु इह्रीं माण्डूकेय के पुत्र का कहना है कि, पृथिवी पूर्वरूप है, द्यौ उत्तररूप है, वायु संहिता है । आकाश, और वायु, दोनों परस्पर अविनाभूत हैं । ऋषि वायु का आकाश में अन्तर्भाव मान कर आकाश को संहिता बतलाते हैं, एवं ऋषिपुत्र प्रकाश का वायु से ग्रहण कर वायु को संहिता बतलाते हैं । इस प्रकार ' न मेऽस्य पुत्रेण समगात् ' ( ऐ ० आरण्यक ३ आ ० | १ अ ० । १ ख ० ) के अनुसार इस द्यावापृथिवीरूप संहिता में परस्पर मतभेद है । शूरवीर महर्षि कहते हैं कि - वाक् पूर्वरूप है । मन उत्तररूप है । प्राण संहिता है । इन के ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं कि, मन पूर्वरूप है, वाक् उत्तररूप है । प्रारण संहिता है । महर्षि शाकल्य कहते कि - पृथिवी पूर्वरूप है । द्यौ उत्तररूप है । वृष्टि संधि है । पर्जन्य संधाता है । चारों की समष्टि एक संहिता है । इन संहिताओं के अतिरिक्त सत्र संहितात्रों में मुख्य एक ' प्रजापतिसंहिता ' है । इस प्रजापति — संहिता में जाया पूर्वरूप है, पति उत्तररूप है । पुत्र संधि है । प्रजनन संधान है । चारों की समड़ि ही प्रजापतिसंहिता है । इसी प्रजापतिसंहिता को ऋषियोंने ' ' अदितिसंहिता ' नाम से भी व्यवहृत किया है । द्यौ पति है । पृथिवी जाया है । द्यात्रा पृथिवी के उदर में रहने वाले प्राणीमात्र प्रजा है । उत्पत्तिसाधनभूता क्रिया प्रजनन है । आज हम चान्द्रदेवताओं का स्वरूप बतलाते हुए इसी अदिति-संहितापरपर्य्यायिका प्रजापतिसंहिता को आपके सम्मुख रखते हैं । पृथिवी, द्यौ, दोनों के मिथुनभाव से प्रजनन-रूप संधान के द्वारा संसार के प्राणीमात्र उत्पन्न होते हैं । पृथिवी हम सबकी माता है । द्य लोक हमारा पिता है । विश्वप्रजा का ‘ प्रभव ' इह्रीं दोनों के मिथुनभाव पर अवलम्बित है । सूर्य आधाता है, पृथिवी गर्भ धारण करने वाली है | जैसे शुक्र शोणित के तारतम्य से एक ही माता पिता के मिथुनभाव से भिन्न भिन्न आकृतियाँ, एवं प्रकतियाँ रखने वाले पुत्रादि उत्पन्न होते हैं, एवमेव मातृस्थानीय पार्थिवप्राण, और पितृ-स्थानीय सौर प्राण, इन दोनों के तारतम्य से इन दोनों के मिथुन से उत्पन्न होने वाली प्राणीसृष्टि में परस्पर ३२०
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शतरथब्राह्मण वैजात्य होजाता है | किसी में सौर प्रारण अधिक है, पार्थिव भाग अल्पमात्रा में है । किसी में पार्थिव प्राण प्रबल है, सौर प्राण अल्पमात्रा में है । इसप्रकार इन दोनों के तारतम्य के कारण भूपृष्ठ से प्रारम्भ कर द्य लोक पर्य्यन्त कुल १४ प्रकार की भौतिकी सृष्टि होजाती है । दूसरे शब्दों में - केवल इसी सम्बन्ध के तारतम्य से एक ही भूतसृष्टि के १४ श्रवान्तर विभाग होजाते हैं । इह्रीं १४ प्रकार की सृष्टियों के लिए ' चतुद्दशविधो भूतसर्गः - यह कहा जाता है । वे १४ हों भूतसगँ दैत्र, तिर्य्यक्, मानुष भेद से तीन विभागों में विभक्त हैं । १ ब्राह्म, २ प्राजापत्य, ३ ऐन्द्र, ४ पैत्र्य, ५ गान्धर्व, ६ यक्ष, ७ राक्षस, ८ पिशाच, भेद से देवसर्गं आठ प्रकार का है । १ पशु, पक्षी, ३ सर्प, ४ कीट, ५ स्थावर, भेद से पाँच प्रकारका तिर्य्यक्सर्ग है । एवं एक प्रकार का मानुषसर्ग है । महान् नाम से प्रसिद्ध अव्यक्ता प्रकृति ही द्यावापृथिवी को निमित्तं बनाकर सम्पूर्ण प्राणियों का निर्माण करती है । यही वैज्ञानिक परिभाषा में ' परमेष्ठी ' नाम से प्रसिद्ध है । परमेष्ठी के नीचे हमने विज्ञानमय सूर्य बतलाया है । जैसे चन्द्रमा भूपिण्ड के चारों ओर घूमता है, एवं भूपिण्ड चन्द्रमा को साथ लिए हुए सूर्य्यं के चारों ओर घूमता है, एवमेव इन दोनों को अपने बृहत्साम में प्रतिष्ठित रखता हुआ सूर्य्य परमेष्ठी के चारों ओर परिक्रमा लगाया करते हैं । यही परिक्रमा याज्ञिकपरिभाषा में ' दर्शपूर्णमास ' नामसे प्रसिद्ध है । सूर्य्य दर्शपूर्णमास करता है । अर्थात् परमेष्ठी के चारों श्रोर घूमता है । इसके इस दर्शपूर्णमास से उस सोममय ‘ महान् ’ नाम से प्रसिद्ध ' परमेष्ठी ' नाम की ' अव्यक्तप्रकृति ' में त्रिगुणभाव उत्पन्न होजाता है । परमेष्ठी का को भाग सू से प्रकाशित रहता है, वह प्रकाशित भाग ' सत्त्वमहान् ' कहलाने लगता है । विरुद्ध ‘ तमोमहान् ’, एवं सांध्य भाग ' रजोमहान् ' नाम से प्रसिद्ध होजाता है । इसप्रकार देवमय सौर ` ~ प्राण के सम्बन्ध से उसमें सत्त्व, रज, तम, तीन गुण अभिव्यक्त होजाते हैं । सौर प्रारण के सम्बन्ध से जो महान् भाग प्रकाशित होजाता है, उसे ही उपनिषत् - परिभाषा में ' अदिति ' कहा जाता है । इस सत्त्वप्राण-प्रधाना अदिति के विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ही महर्षि कठ कहते हैं—
या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत ॥
— कठोपनिषत् ७ | ४ | बतलाना हमें प्रकृत में यही है कि, सृष्टि की मूलभूता प्रकृति सूर्य्यसम्बन्ध से त्रिगुणभावापन्ना होजाती है । अतएव सृष्टि भी कुल तीन ही प्रकार की होती है । दैवसर्ग सत्त्वप्रधान है । अतएव यह सर्ग सांख्यदर्शन में ‘ सत्त्वविशाल ' नाग से प्रसिद्ध हैं । मानुषसर्ग मध्यपतित होने से रजःप्रधान है । अतएव यह सर्ग ‘ रजोविशाल ' नाम से प्रसिद्ध है । एवं तिर्य्यक्सर्ग सर्वान्त में होने से तमःप्रधान है अतएव यह सर्ग ' तमोविशाल ' कहलाता है । मूल में तमः प्रधाना तिर्य्यगयोनि है । मध्य में रज: प्रधाना मनुष्ययोनि है । सबसे ऊपर सत्त्वप्रधाना अष्टविध देवयोनि है । इन में भी सबके मूल में स्तम्बात्मक पहिला स्थावरसर्ग है, सर्वान्त में ब्राह्मसर्ग है । इसप्रकार स्तम्ब से ब्रह्मपर्यन्त कुल १४ प्रकार के भूतसर्गों की सत्ता सिद्ध होजाती है । ३२१
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प्रथमकाण्ड एक ही भौतिक सर्ग के तीन भेद होना प्रकृति के सत्त्व, रज, तम, इन तीन गुणों पर निर्भर है । एवं इनका १४ अवान्तर विभागों में परिणत होना द्यावापृथिवी - प्राण के परस्पर के तारतम्य पर निर्भर है । पार्थिव प्राणाग्नि ‘ गायत्र ’ नाम से प्रसिद्ध है । दिव्याग्नि ( सौराग्नि ) ' सावित्र ' नाम से व्यवहृत होता है, एवं आन्तरिक्ष्य अग्नि ‘ वायव्याग्नि ' कहलाता है । पार्थिव प्राणाग्नि की गति ऊपर की ओर है । सावित्राग्नि ऊपर से नीचे की ओर याता है । अान्तरिक्ष्य यायव्याग्नि तिरछा जाता है । तीनों हीं अग्नियाँ प्राणरूप हैं । अर्थात् अमृतमय हैं । अतएव ' रूपरसगन्धस्पर्शशब्दरहितः, अधामच्छदः कश्चित् तत्त्वविशेषः प्राण: ' - इस लक्षण के अनुसार यह प्राणरूपा अग्नित्रयी सर्वथा तापशून्या है | नीरूपा है । रूपरसादि से असंस्पृष्टा है । इन तीनों का विरुद्धगति के कारण तीनों में परस्पर संघर्ष होजाता है । तापधर्म्मा अग्नि का प्रधान उपादान धर्षणकिया ही है । आप अपने दोनों हाथों को परस्पर रगड़िए, उसी समय हाथों में ऊष्मा उत्पन्न होजायगी । दो लकड़ियों को रगड़िए, दो पत्थरों को रगड़िए, उसी समय तापधर्म्मा अग्नि उत्पन्न होजायगा । इसी प्रकार इन तीनों प्राणाग्नियों के घर्षण से एक नवीन, तापधर्म्मा अग्नि उत्पन्न हाजाता है । यह तापधर्म्मा अग्नि पृथिवी, अन्तरिक्ष द्यौ, इन तीन स्तौम्यविश्वों के अग्नि, वायु, इन्द्र, तीन नरों ( नायकों ) से उत्पन्न होता है । अतएव यह अग्नि ' विश्वनरेभ्यः जातः ' इस व्युत्पत्ति से ' वैश्वानर ' कहा जाता है । तीनों प्राणाग्नि प्राणरूप होने से ' अजातवेदा ' थे । उन को हम नहीं पहिचानते थे । परन्तु इस तापधर्म्मा अग्नि का हम प्रत्यक्ष करने लगते हैं । अतएव उपनिषदोंनें वैश्वानर को ' जातवेदा ' नाम से व्यवहृत किया है । यह वैश्वानर अग्नि त्रैलोक्यरूप सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त रहता है । ‘ वैश्वानरो यतते सूर्येण ’ - ‘ आ यो द्यां भ्रात्यापृथिवीम् ' इत्यादि श्रौतसिद्धान्त के अनुसार यह वैश्वानर भूपृष्ठ से सूर्य्य पर्य्यन्त ( द्युलोक पर्य्यन्त ) व्याप्त रहता है । इसीलिए हम इस वैश्वानर को अवश्य ही ' विश्वरूप ' कह सकते हैं । इसी वैश्वानर - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर उपनिषत् - श्रुति कहती है— ‘ स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते ' - ( प्रश्नोपनिषत् १ | १ | ७१ ) इति । यद्यपि पूर्वकथनानुसार वैश्वानर की त्रैलोक्य में व्याप्ति सिद्ध होजाती है । साथ ही ' वैश्वानर अग्नि में पार्थिव, आन्तरिक्ष्य, दिव्य तीनों अग्नि हैं ' यह भी सिद्ध होजाता है | इतना होने पर भी हम इस वैश्वानर को केवल ‘ पार्थिव अग्नि ' ही कहेंगे । कारण इसका यही है कि, जिस भूपिण्ड पर हम बैठे हुए हैं, वह अग्निमय है । यह अग्नि चित्य ( मर्त्य ) चितेनिधैय ( अमृत ), भेद से दो प्रकार का है । भूपिण्ड उत्तरोत्तर के चिति ( चयन - चेजा ) क्रम से चित्य अग्नि से बना है । दूसरे शब्दों में- भूपिण्ड चित्याग्निपिण्ड है । इस चित्य में से एक अमृताग्नि निकलता है । यह पिण्ड से बड़ी दूर पर्य्यन्त ( २१ वें अहर्गण पर स्थित सूर्य्यपिण्ड से भी कुछ आगे पर्य्यन्त ) चारों ओर व्याप्त होता हुआ अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाता है । यही मण्डल वैज्ञानिक परिभाषा में ' महिमामण्डल ' नाम में प्रसिद्ध है । इस महिमामण्डल का नाम हीं ‘ पार्थिव रथन्तरसाम ' है । सूर्य्यरथ का भी यह तरण कर जाता है, सूर्य्य से भी कुछ आगे निकल जाता है, * इस विषय का विस्तृत विवेचन ' प्रश्नोपनिषत् ' के भाषाभाष्य में देखना चाहिए । यह भाष्य अभी मुद्रित है । ३२२
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शतपथब्राह्मण व्रतएव इसे ‘ रथन्तर ’ साम कहा जाता है, जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में अनेक बार कहा जाचुका है । महिमाग्नि पार्थिव अग्नि है ।यही सूर्य्य पर्य्यन्त व्याप्त है । ऐसी अवस्था में सूर्य्य पर्य्यन्त पृथिवीलोक की सत्ता सिद्ध होजाती है । इस पार्थिव अमृताग्नि के ही घन, तरल, विरल भेद से अग्नि, वायु, इन्द्र, ये तीन भेद होजाते हैं । इस पार्थिव अग्नि के त्रिवृत् ( ६ ), पञ्चदश ( १५ ), एकविंश ( २१ ), तीन विभाग होजाते हैं । १. पृथिवी के ये अवान्तर तीन विभाग ही पृथिवीलोक के अवान्तर पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, ये तीन लोक हैं । यही पृथिवीत्रिलोकी स्तोमसम्बन्ध से विज्ञानजगत् में ' स्तौम्यत्रिलोकी ' नाम से प्रसिद्ध है । इस स्तौम्यत्रिलोकी के अधिष्ठाता ( नर ) ये ही पार्थिव अग्नि, वायु, इन्द्र हैं । इह्नीं तीनों के संयोग से हमारा प्रसिद्ध ताप ‘ वैश्वानर ' अग्नि उत्पन्न हुआ है, इसलिए हम अवश्य ही इस वैश्वानर अग्नि को ' पार्थिवाग्नि ' ही कह सकते हैं । पूर्वोक्ता प्रजापतिसंहिता में हमने पृथिवी को पूर्वरूप बतलाया है, एवं द्यौ को उत्तररूप बतलाया है । एवं इह्रीं दोनों के मिथुन से प्राणीमात्र की उत्पत्ति बतलाई है । इस प्रजापतिसंहिता का द्यावापृथिवी इसी पूर्वोक्त अमृतापृथिवी की स्तौम्यत्रिलोकी का भाग है । ऐसा इसलिए मानना पड़ता है कि, प्रजापतिसंहिता का स्वरूप बतलाते हुए आगे जाकर भगवान् ऐतरेयने इस द्यावापृथिव्यात्मिका संहिता को ' अदितिसंहिता ' बतलाया है, जैसाकि निम्नलिखित श्रुति से स्पष्ट होजाता है— ' अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपं परिरुत्तररूपं, पुत्रः संधिः, प्रजननं संधानम् । सैषाऽदितिसंहिता! अदितिहृींदं सर्वम् - यदिदं किंच - पिता च, माता च, पुत्रश्च, प्रजननं च ' । सर्वश्री महीदास का द्यावापृथिव्यात्मिका प्रजापतिसंहिता को अदितिसंहिता बतलाना तभी सम्भव होसकता है, जबकि – अमृता पृथिवी के स्तोमात्मक द्यावापृथिवी का ही प्रजापति - सम्बन्धी द्यावापृथिवी शब्द ग्रहण किया जाय । पृथिवी का श्राधा मण्डल सूर्य्य की ओर रहता है, एवं आधा भाग सूर्य्यं के विरुद्ध भाग मेंरहता । ये ही दोनों भाग दिति, श्रदिति नाम से प्रसिद्ध हैं । पृथिवी का जो भाग सूर्य की ओर रहता है. वही प्रकाश के विच्छिन्न रूप से, अखण्ड रूप से जाने के कारण ' अदिति ' कहलाता है । विरुद्ध भाग में सौरप्राण का विच्छेद होजाता है । श्रतएव वह ' दिति ' कहलाता है । पूर्वप्रतिपादिता रथन्तरसमायुक्ता अमृता पृथिवी का भाग सूर्य से भी कुछ ऊपर पर्य्यन्त, अनुमानत: २२ वें अहर्गण पर्य्यन्त जाता है । यही प्रकाशिता श्रदिति है । इसी अदिति पृथिवी के त्रिवृत् ( E ), पञ्चदश ( १५ ), एकविंश ( २१ ), ये तीन विभाग होते हैं । अदितिपृथिवी के ये ही तीनों भाग ' स्तौम्यत्रिलोकी ' कहलाने लगते हैं । अदिति का त्रिवृत्स्तोम भाग पृथिवी है, यही ' माता है ' । १५ स्तोम अन्तरिक्ष है । इसी का एकविंश स्तोम द्यौ है | यही पिता है । यही अदिति माता है, यही पिता है, यही सबकुछ है । इसी अदिति-विज्ञान को लक्ष्य में रखकर हमने पूर्व के प्रकरणों में ' अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ' इत्यादि कहा है । यह त्रैलोक्यरूपा अदितिपृथिवी हमारे वैश्वानर की जननी है | अतएव त्रैलोक्य व्यापक इस वैश्वानर को हम अवश्य ही पार्थिव कह सकते हैं । इसी वैश्वानर अग्नि को ' विराट् पुरुष ' कहा जाता है । १० अक्षरों के छन्द का ही नाम विराट् है, जैसाकि पूर्व के ‘ विराड् वै यज्ञ: ' इस अनुगम वचन के निरूपण में स्पष्ट कर दिया गया है! पार्थिव अग्नि ३२३
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प्रथमकाण्ड गायत्राग्नि है | इसी को याज्ञिक परिभाषा में ' गार्हपत्याग्नि ' कहा जाता है | सौर अग्नि ' सावित्राग्नि ' है । यही याज्ञिक परिभाषा में ' आहवनीयाग्नि ' कहलाता है । मध्य का श्रान्तरिक्ष्य अग्नि ' नाक्षत्रिकाग्नि ' है । इसके अवान्तर आठ विभाग होजाते हैं । याज्ञिक परिभाषा में ये ही आठ आन्तरिक्ष्य अग्नि- ' धिष्ण्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इसप्रकार स्तौम्यत्रिलोकी का यह अग्नि १० कल होजाता है । श्रतएव हम अवश्य ही वैश्वानर को ‘ विराट् ’ कहसकते हैं । प्रसंगागत एक बात और समझ लेनी चाहिए । दृष्टिकोण - भेद से एक ही वस्तु का स्वरूप भिन्न भिन्न दिखलाई देने लगता है । विज्ञानचक्षु त्रैलोक्य अग्नि को गायत्र, सावित्र, नाक्षत्रिक, रूप से देखता है । यज्ञात्मक कर्म्मकाण्ड इन्हें गार्हपत्य, आहवनीय, धिष्ण्य, नाम से व्यवहृन करता है । एवं उपासनाकाण्ड में ये ही रुद्र भगवान् हैं । रुद्र ११ माने जाते हैं । हविर्यज्ञ का ग्राहनीय सोमयज्ञ का गार्हपत्य बन जाता है । यही ' नूतनगार्हपत्य ' कहलाता है । एवं हविर्वेदि का गार्हपत्य ‘ ' पुराणगार्हपत्य ' कहलाता है । इसप्रकार रुद्रसम्बन्ध गार्हपत्य दो होजाते हैं | ये ही ११ रुद्र अधिभूत, अधियज्ञ, अध्या-त्म, अधिदैवत, अध्यन्तरिक्ष, भेद से पुनः ११-११ होजाते । यदि इनके भी अत्रान्तर भेद किए जाते हैं, तो सहस्रों रुद्र होजाते हैं । रुद्रप्राण का वैज्ञानिक रहस्य किसी आगे के प्रकरण में बतलाया जायगा । यहाँ हम परिचयार्थ उन के नामों का उल्लेखमात्र कर देते हैं । इससे विज्ञान समझने में पूरी सुविधा होगी— १ - अधिभूतप्रपञ्च के ११ रुद्र - आठ शिव तीन घोर । १ पृथिवी २ जल ३ तेज पवमान ' ४ वायु १० पावक आठ शिवात्मक रुद्र. तीन घोरात्मक रुद्र ५ आकाश ११ शुचि ६ सूर्य्य ७ चन्द्र ८ विद्युत् २ – अधियज्ञप्रपञ्ञ्च के ११ रुद्र । १ आहवनीय, आठ विष्ण्य, २ गार्हपत्य । १ श्राहवनीय २ आग्नीधीय ३ च्छात्राकीय सम्राट कृशानु विभु अवस्यु प्रवाहण दुवस्वान् ३२४.
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शतपथब्राह्मण ४ नेष्ट्रीय अङ ङवा ५ पोत्रीय उशिकू कवि ६ ब्राह्मणच्छंसीय तुथ विश्ववेदा ७ होत्रीय वह्नि हव्यवाहन प्रशास्त्रीय श्वात्र प्रचेता ६ मार्जालीय शुन्ध्य मार्जालीय १० नूतन गार्हपत्य जएकपात् जएकपात् ११ पुराणगार्गपत्य ३. - अध्यात्मप्रपञ्च के ११ रुद्र -१ दक्षिण श्रोत्रप्राण प्रकारान्तर से आध्यात्मिक ११. रुद्र श्रोत्र २ वाम श्रोत्रप्राण ३ दक्षिण नासाप्राण ४ वाम नासाप्राण ५ दक्षिण चक्षुप्रारण ६ वाम चक्षुप्राण ७ वाकू शिश्न ६ गुदा १० नाभि ११ श्रात्मा ( सर्वव्यापक अङ्गीमाण प्राण १ वाक् ६ श्रोत्र चतु -५ कर्मेन्द्रियवर्ग २ पाणी ३ पाद ४ पायु ५ उपस्थ -५ ज्ञानेन्द्रियवर्ग ७ त्वक् ८ चतु १० प्राण ३२५ श्रात्मा ११
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प्रथमकाण्ड ४ – अधिदैवत प्रपञ्च के ११ रुद्र ( नाक्षत्रिक रुद्र ), अवान्तर नाम - सहित -१ विरूपाक्ष, २ रैवत त्वष्टा, भैरव, अयोनिज गर्भ कपर्दी, वीरभद्र ३ हर, नकुलीश पिङ्गल, स्थाणु ४ बहुरूप, सेनानी, गिरिश ५ त्र्यम्बक, भुवनेश्वर, विश्वेश्वर, सुरेश्वर ६ सावित्र, भूतेश, कपाली ७ जयन्त, ८ पिनाकी, वृषाकपि, शम्भु, सन्ध्य ' मृगव्याध, नीलकण्ठ, शर्व पराजित, महातेजा, १० एकपात् ११ अहिर्बुध्न्य ५ — अध्यन्तरिक्ष - प्रपञ्च के ११ रुद्र १ अभ्राजमान ६ पुरुष २ व्यवदात २ वासुकि ४ वैद्य * ५ रजत ७ श्याम कपिल ६ तिलोहित १० ऊर्ध्व ११ वपतन १ - यही मृगव्याध ' लुब्धक ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रजापति भृग ( हरिण ) बन कर हरिणी बनी हुई अपनी कन्या के पीछे बुरी वासना से दौड़े । अन्त में देवताओं की प्रार्थना से पशुपतिने बाण मारकर प्रजा-पति का माथा काट दिया । इत्यादि पौराणिक आख्यान का इसी लुब्धक से सम्बन्ध है | लुब्धक, रोहिणी, मृगशीर्ष, त्रिकाण्ड, इत्यादि नक्षत्रों का वैज्ञानिक रहस्य सुगमता से समझाने के लिए ही यह प्राख्यान बनाया गया है, जैसाकि आगे आने वाले ब्राह्मण में ( शतपथब्राह्मण १।७ | ३ | ) स्पष्ट कर दिया जायगा । जैसे संसार की सम्पूर्ण ओषधियों का भाग उदुम्बर ( गूलर ) में है, एवमेत्र इस लुब्धक में सम्पूर्ण नक्षत्रों का रस विद्यमान है । अतएव इसे ' पशुपति ' कहा जाता है । यह नक्षत्र नीला है । अति तेजस्वी है । रोहिणी नक्षत्र से-पूर्व कुछ दक्षिण इसकी स्थिति है । * आन्तरिक्ष्य रुद्रप्राण के भाग से ' चाँदी ' बनती है । चाँदी रुद्र के सूत्रों से बनी हुई है, जिसकी कि उपपत्ति किसी आगे के प्रकरण में बतलाई नायगी । ३२६
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शतपथब्राह्मण रुद्र का निरूपण अप्राकृत था । तथापि अग्नि के सम्बन्ध से उसका यहाँ उल्लेख कर दिया है । अब पुनः हम आप का ध्यान उसी वैश्वानर की ओर आकर्षित करते हैं । वैश्वानर १० कल होने से विराट्पुरुष है । सम्पूर्ण पुरुषसूक्त केवल इसी वैश्वानरात्मक विराट पुरुष का निरूपण करता है, यह पूर्व में बतलाया जाचुका है । इसी वैश्वानर की त्रैलोक्य - व्यापकता बतलाते हुए वेदमहर्षि कहते हैं—
सहस्रशीर्षः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
स भूमिं सर्वतः स्पृत्त्वा श्रत्यतिष्ठद्दशाङ गुलम् ॥
- यजुः सं ० ० ३१।१ “ इस पुरुष के हजार मस्तक हैं, हजार आँख हैं, हजार पैर हैं । यह भूमि का सब ओर से स्पर्श कर ( अध्यात्म में ) दशाङ गुल का अतिक्रमण कर ( १० || अंगुलात्मक प्रादेशमात्र स्थान में ) प्रतिष्ठित होगया है ” –श्रुति का यही अक्षरार्थ है । पूर्वोक्त वैश्वानर के पार्थिव, आन्तरिक्ष्य, दिव्य, स्थानीय तीनों प्राणा-ग्नियाँ क्रमशः ( अध्यात्म में ) अपान, व्यान, प्राण, इन नामों से व्यवहृत होते हैं । प्राण स्थानीय होने से वैश्वानरपुरुष का मस्तक है । व्यान - अन्तरिक्ष - स्थानीय होने से चक्षु है । चतु से यहाँ हृदयस्थित प्रज्ञान-मन ही अभिप्रेत है । जिसे साधारण मनुष्य ' नेत्र ' समझते हैं, वह नेत्र नहीं हैं । अपितु विज्ञानचक्षु से परिष्वक्त प्रज्ञानमन ही वास्तविक चतु है । इसी अभिप्राय से श्रुति ने कहा है— “ यत्किंचेदं प्राणि, जङ्गमं च पतत्रि च " । यच्च स्थावरं च, सर्व तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं, प्रज्ञानेत्रो लोकः, प्रज्ञा प्रतिष्ठा-ऐतरेय आरण्यक २।६१ । यह चक्षुःस्थानीय प्रज्ञानमन ' हृत्प्रतिष्ठ ' यदजिरं जविष्ठ तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' ( यजु– र्वेदसंहिता ) इत्यादि के अनुसार हृदय में प्रतिष्ठित है । हृदय में ही आन्तरिक्ष्य व्यानवायु प्रादेशमात्र में परिणत हो कर प्रतिष्ठित हो रहा है, अतः हम अवश्य ही व्यान को चक्षुः - स्थानीय कह सकते हैं । पा-नभाग त्रिवृद्रूपा अमृता पृथिवी का भाग है । इस के नीचे पिण्ड ( चित्या ) पृथिवी है । यही भूमि है । यह भूमि प्रतिष्ठारूप है, जैसा कि वाजसनेयश्रुति कहती है- ' अभूद्रा इवं प्रतिष्ठा - इति, तद् भूमिरभवत् ' ( शत ० ६ | १ | १ | १५ ) इति । इस भूमि पर सत्र से पहिले उस पुरुष के पैर ( अपान ) प्रतिष्ठित है | पैरों के ऊपर मध्य ( धड़ ) स्थानीय व्यान है । इस के ऊपर शिरःस्थानीय प्राण है । इसप्रकार वह पुरुष भूमि पर प्रतिष्ठित होकर सम्पूर्ण त्रैलोक्य में खड़ा हुआ है । गीताशास्त्र का * विराटपुरुष यही वैश्वानर-पुरुष है | ‘ सहस्र ' शब्द का अर्थ ' हजार ' नहीं है, अपितु पूर्ण है । इसीलिए सहस्र शब्द का अर्थ करते हुए ऋषि-' सर्व तत्, यत् - सहस्रम् ( कौ ० ११७ ), भूमा वै सहस्रम् ( का ० ३१३ ), परमं वै सहस्रम् ( तां०-१६।६।२ । ), पूर्णं वै सहस्रम् ' इत्यादि कहा करते हैं । ' सर्व ' ' परम ' ' भूमा ' ' पूर्ण ' इत्यादि के लिए वेद में ' सहस्र ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । विराट्पुरुष का मस्तक - स्थानीय पहिला ' प्राणबिम्ब ' है । इस में से प्राणरश्मियाँ निकल कर चारों ओर व्याप्त हो रहीं है, * इस विषय का विवेचन गीताभाषाभाष्य के ' ईश्वरनिरूपण ' में देखना चाहिए । ३२७
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प्रथमकाण्ड यही पहिली ‘ प्राणसाहस्री ' है । ये ही उस के ' हजार मस्तक ' हैं । इसी अभिप्राय से ‘ सहस्रशीर्षः पुरुषः ’ • कहा है | मध्य में ' व्यानविम्ब ' है । इस से व्यानरश्मियाँ निकल कर चारों और व्याप्त हो रहीं हैं । यही दूसरी ‘ व्यानसाहसी ' है । ये ही उस के ' हजार नेत्र ' हैं । इसी अभिप्राय से ' सहस्राक्षः ' कहा है । अन्त में ' अपानविम्ब ' है । इसी के लिए ' सहस्रपात् ' कहा है । इस त्रिपुरुषात्मक पुरुष ने ( अपान – व्यान - प्राणा– त्मक वैश्वानर हिरण्यगर्भ सर्वज्ञरूप त्रिपुरुषपुरुष ने ) उस भूमि ( चित्य - मर्त्य - भूपिण्ड ) को चारों ओर से पकड़ रक्खा है । पूर्वोक्त यजुःश्रुति इसी अर्थ का निरूपण कर रही है । इसी पुरुष को उपनिषदोंने ' सर्वभूता-न्तरात्मा ' ' साक्षी ' ' चेता ' आदि नामों से व्यवहृत किया है * । इस प्रकरण से पाठकों को यह भलीभांति ज्ञात हो गया होगा कि, साक्षीरूप ' सर्वभूतान्तरात्मा ' नाम से प्रसिद्ध, अग्नित्रयरूप वैश्वानरात्मा के स्तौम्यत्रिलोकी में व्याप्त यह विराट्पुरुष षोडशीपुरुष की ' स्वयम्भू-परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा - भूपिण्ड, इन पाँच प्राकृतात्माओं से सर्वथा भिन्न वस्तु है । इन पाँचों पुण्डीरों में से जो भूपिण्ड है, उस के चितेनिधेयरूप अमृतभाग से ( जिसे कि हमने महिमामण्डल, अदितिपृथिवी, स्त्रोम्यत्रिलोकी, उख्यत्रृथिवी, प्राणपृथिवी, यादि नामों से व्यवहृत किया है ) इस विराट्पुरुष का सम्बन्ध है । यह वैश्वानर अग्नि, वायु, आदित्यात्मक है । ये तीनों देवता है । अतएव इन तीनों की समष्टि को हम ‘ देवसत्य ' कहते हैं । यद्यपि ' ‘ एतद्वै देवसत्यं यच्चन्द्रमाः ' इत्यादि रूप से चन्द्रमा को देवसत्य बतलाया गया है । तथापि हम वैश्वानर को ही देवसत्य कहेंगे । इसका कारण यहाँ बतलाने में हम असमर्थ हैं । इस का उत्तर कठोपनिषत् के भाषाभाष्य में हीं देखना चाहिए । यहाँ हमें केवल यही बतला देना है कि, विराट्पुरुष देवसत्य है । एवं स्वयम्भू - परमेष्ठी श्रादि पाँचों प्राकृतात्माओं की समष्टि ‘ ब्रह्म सत्य ' है । हमारा यह देवसत्य पञ्चावयवात्मक ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित रहता है । देवसत्य यज्ञात्मक है, ब्रह्मसत्य सत्यात्मक है । ब्रह्मसत्य सत्यात्मा है, देवसत्य यज्ञात्मा है । ब्रह्मसत्य मूलब्रह्म हैं, यज्ञसत्य तूलब्रह्म है । ' सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम् ' के अनुसार सर्वरूप सर्वभूतान्तरात्मा ( विराट्-पुरुष ) उसी सत्यात्मक ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित है । इन दोनों से अतिरिक्त वही हमारा सुपरिचित ‘ षोडशी-पुरुष ' है । वही षोडशीपुरुष ब्रह्मसत्य में मूलप्रतिष्ठारूप से प्रतिष्ठित है, एवं वही षोडशीपुरुष ' अहं वैश्वा-नरो भूत्त्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ' के अनुसार वैश्वानरात्मक देवसत्य में प्रतिष्ठित है । ब्रह्म ( ब्रह्मसत्य ) में भी वही है, देवों में ( श्रग्नि वायु चन्द्रात्मक देवसत्य में ) भी वही है । देवसत्यगर्भित ब्रह्मसत्य में प्रतिष्ठित रहने वाला वह षोडशीपुरुष सोपाधिक है । सगुण है । इन दोनों में उसे देखना सोपाधिक आत्म-तत्त्व को ही देखना है | शुद्ध तत्त्व तो इन दोनों से पृथक् ही है । वही वास्तविक तत्त्व है । जो मनुष्य इन दोनों में रहने वाले उस को समझता है, समझ लो, उस की यह समझ अभी अधूरी है । ब्रह्म, और देव, दोनों से पृथक् सर्वव्यापक उस अव्यय को जिस दिन यह देखेगा, उसी दिन इस का देखना मींमांसारहित होगा । इसी विज्ञान को लक्ष्य रख कर केनश्रुति कहती है—
* –एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी ' सर्वभूतान्तरात्मा ' ।
कर्म्माध्यक्षः सर्वभृताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥
--श्वेता ० उप ६।११ । ३२८