Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 591–600
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 591–600
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शतपथब्राह्मण ' यदस्य ( षोडशी पुरुस्य ) त्वं ( ब्रह्मसत्यभागः ), यदस्य च देवेषु, अथ नु मीमां-स्यमेव ते मन्ये विदितम् ' । – केनोपनिषत् २ खं ० ं मं ० । इस ब्रह्मसत्यगर्भित देवसत्य का नाम हीं ' ईश्वर ' है । जीव इसीका अंश है । सुतरां जीव में भी तीनों की सत्ता सिद्ध होजाती है । जीव का ब्रह्मसत्यभाग अव्यक्त, महान, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर है । देवसत्य-भाग वही वैश्वानर है | जीव का देवसत्यभाग ईश्वर के देवसत्य पर प्रतिष्ठित है । दूसरे शब्दों में - ईश्वर ही जीव का प्रभव, प्रतिष्ठा, पराया है । जीव का देवसत्यभाग उपनिषदों में ' भोक्तात्मा ' नाम से प्रषिद्ध है,
जैसाकि उपनिषच्छ्रति कहती है-इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचरान् ।
आत्मे - न्द्रिय - मनो- युक्त ' - ' भोक्त ' त्याहुम्मनीषिणः ॥
—केनोपनिषत् १ | ३ | ४ | यही ' कर्मात्मा ' है । ईश्वर का ब्रह्मसत्यभाग ब्रह्मरूप अश्वत्थवृक्ष है । भूपिण्ड और चन्द्रमा इस अश्वत्थ की एक शाखा है । इसी शाखा पर ( पिण्ड पृथिवी और चन्द्रमा के मध्य में ) ईश्वरीय साक्षी देवसत्य, एवं जीवस्वरूप भोक्ता देवसत्य प्रतिष्ठित है । ये ही दोनों पक्षी हैं, सुपर्णं हैं । श्रात्मगति - भोगार्थं लोकान्तर में गमन करने के कारण ही यह जीव सुपर्ण है । ईश्वर इस के केन्द्र में प्रतिष्ठित है । अतः जीव-सुपर्ण के सम्बन्ध से इसे भी सुपर्ण पक्षी मान लिया जाता है । वस्तुतस्तु जीववत् ईश्वर भी सुपर्ण ही है । इस की सुपर्णता ‘ सुपर्णचिति ' पर अवलम्बित है । इस चिति का निरूपण शतपथ के छठे काण्ड में किया नायगा । सुपर्ण ही ' गरुड़ ' है । जो पुराण इस सुपर्ण की गतियों का विवेचन करता है, वही ' गरुड़पुराण ' नाम से प्रसिद्ध है । सनातन धर्मावलम्बी - जगत् मृत्युकाल में द्वादशाह - पर्य्यन्त अपने कुलपुरोहित से इसी का निर्वचन कराया करता है । कहना यही है कि, इन दोनों सुपणों में जीवसुपर्ण ' फलभोक्ता ' है, एवं ईश्वर-सुपर्ण ' ' साक्षी ' है । इन्हीं दोनों सुपर्णों का स्वरूप बतलाती हुई ऋग्वेद ति कहती है-द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्वजाते । तमोरन्यः पिपप्लं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभि चाकशीति ॥ ऋक्सं ० १।१।१६४ | २० | अस्तु, इस औपनिषद तथ्य को हम इस ब्राह्मणग्रन्थ में अधिक स्थान नहीं देना चाहते | यह सम्पूर्ण विषय उपनिषदों में विस्तार के साथ उपवर्णित है । प्रकृत में हम १४ प्रकार का भौतिकसर्ग बतला रहे हैं । * ईश्वर अश्वत्थ क्यों कहलाया?, अश्वत्थ का क्या स्वरूप है?, इस विषय का विस्तृत विवेचन गीता के ‘ अश्वत्थनिरूपण ' प्रकरण में, एवं विशेषरूप से कठोपनिषत् के अश्वत्थनिरूपण में देखना चाहिए | ३२६
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प्रथमकाण्ड इस सर्ग का सम्बन्ध सर्वभूतान्तरात्मा - त्रैलोक्यव्यापक – देवसत्यरूप वैश्वानराग्निमय विराट्पुरुष से है । अत: इसी की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । हम बतला श्राए हैं कि, यह पुरुष भूमि ( चित्यभूपिण्ड ) से सूर्य्य पर्य्यन्त व्याप्त है । इस त्रैलोक्य-व्यापक पुरुष की तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । त्रिवृत्स्तोमरूप पृथिवीलोक में पार्थिव ' अपान ' की सत्ता है । यही व्यापक वैश्वानर का ' वैश्वानरभाग ' है । पञ्चदशस्तोमरूप अन्तरिक्षलोक में ग्रान्तरिक्ष्य ' व्यान ' की सत्ता है, यही व्यापक वैश्वानर का ' हिरण्यगर्भभाग ' है । एकविशस्तोमरूप दिव्यलोक में ' दिव्यप्रारण ' की सत्ता हैं, यही व्यापक वैश्वानर का ' सर्वज्ञभाग ' है । एवं पार्थिवभाग - प्रधान वही वैश्वानर पार्थिव ' अग्नि ' की प्रधानता से ‘ वैश्वानर ' कहलाता है । श्रान्तरिक्ष्यभाग - प्रधान वही वैश्वानर - अान्तरिक्ष्य ' वायु ' की प्रधानता से ‘ हिरण्यगर्भ ' कहलाने लगता है । एव दिव्यलोकप्रधान वही वैश्वानर दिव्य ' आदित्य ' की सत्ता से ‘ सर्वज्ञ ’ कहलाने लगता है । कहने का तात्पर्य्य यही है कि, वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ, तीनों हीं वैश्वानर है | वैश्वानर एक कलात्मक है । सर्वज्ञ भी एक कलात्मक है, किन्तु श्रान्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भ अष्ट ( ८ ) कलात्मक हैं । इसप्रकार एक व्यापक वैश्वानर की १० कलाएँ हो जातीं हैं । १० कलाओं के कारण हीं हमने इसे ‘ विराट्पुरुष ' कहा है । ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, अर्थशक्ति, तीनों का हमने पूर्व के प्रकरणों में क्रमशः मनः, प्राण, वाक् से सम्बन्ध बतलाया है । मन ज्ञानमय है । प्रारण क्रियामय है । वाक् अर्थमयी है । तीनों अविनाभूत हैं । वैश्वानर का ज्ञानभाग ( सर्वज्ञभाग ) सौरलोक में प्रतिष्ठित है । क्रियाभाग ( हिरण्यगर्भभाग ) अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित है । अर्थभाग ( वैश्वानरभाग ) पृथिवीलोक में प्रतिष्ठित है । ज्ञानक्रियार्थमय, वैश्वानर - हिरण्य-गर्भ - सर्वज्ञमय, ( प्राणव्यानापानमय ) इसी विराट्पुरुष का नाम ' सर्वभूतान्तरात्मा ' हे | यही ' ईश्वर ' हे | यही ‘ परमात्मा ’ है | यही साक्षी ' देवसत्य ' है । सम्पूर्ण ' मुण्डकोपनिषत् ' में इसी साक्षी देवसत्य का निरू— पण हुआ है । इसी देवसत्य से सम्पूर्ण जीवसृष्टियाँ होतीं हैं । उस में तीन भाग हैं, अतएव जीवसृष्टि भी कुल तीन ही प्रकार की होती है । वे तीनों जीवसृष्टियाँ क्रमशः धातु, मूल, जीव, इन नामों में प्रसिद्ध हैं । पार्थिव वैश्वानराग्नि ‘ योनि ' है, सर्वज्ञात्मक सौरप्राणप्रजापति ' रेतोधा ' है । यह द्य रूप प्रजापति माता पृथिवी की योनिरूप उपाग्नि में ' रेतः ' सिञ्चन करता है । वह सिक्त रेत सम्वत्सर के अनन्तर ‘ कुमाराग्नि ' में परिणत होता है | उन्मुग्ध कुमाराग्नि उद्बुद्ध होकर आठ प्रकार की ' चित्राग्नियों ' के स्वरूप में परिणत होता है । चित्राग्नि हीं विकृत अवस्था में परिणत होकर क्रमश: पुरुष, अश्व, गो, अवि, अज, इन पाँच ' पाशु-काग्नियों ' का रूप धारण करता है । इस पञ्च पश्वग्नि से प्रजारूपा ' पशुपष्टि ' होती है । प्रजापति पशुपति है । पशु है । सन्तानसूत्र पाश है । पाश, पशु, पशुपति की समष्टि ही ' सर्वम् ' हैं । बत-लाना इससे प्रकृत में हमें यही है कि, रेतोधा ( रेतः सिञ्चन करने वाले ) प्रजापति की रेत की आहुति के तार-तम्य से इस रेत से उत्पन्न होने वाली सृष्टि तीन प्रकार की होजाती है । प्रजापति के वे तीनों विभाग १ - अचेतन-वर्ग, २ - अर्द्धचेतनवर्ग, ३ - चेतनवर्ग, इन नामों से प्रसिद्ध हैं । * ब्रह्मसत्य क्या है?, देवसत्य का कैसा स्वरूप है?, अश्वत्थ किरूप है?, इत्यादि विषयों का हमने केन, और कठ उपनिषत् के भाषाभाष्यों में विस्तार के साथ निरूपण कर दिया है । अतः इस विषय की अधिक जिज्ञासा रखने वालों को वहाँ का तत्सम्बन्धी प्रकरण ही देखना चाहिए । ३३०
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शतपथब्राह्मण यादे ज्ञानप्रधान सौर तेजोमय प्राजापत्यरेत अत्यल्प मात्रा में पृथिवी के वैश्वानराग्नि में आहुत होता है, तो इस सौरतेजोरूप शुक्र, एवं पार्थिवाग्निरूप शोणित के समन्वय से अर्थप्रधाना ' अचेतनसृष्टि ' होती है । इस सृष्टि में दोनों हीं भाग हैं, परन्तु प्रधानता पार्थिवभाग की ही है । इसकी प्रबलता के कारण अल्प-मात्रा में आने वाला सौरतेज अभिभूत होजाता है । इस सृष्टि में जैसे सौरज्ञानभाग अभिभूत है, उसी प्रकार आन्तरिक्ष्य वायव्य भाग भी अभिभूत ही है । इसीलिए इनमें स्वस्वरूप की वृद्धि नहीं है । पूर्वस्वरूप से आगे बढ़ना ‘ व्यापार ’ है | व्यापार ' क्रिया ' है । क्रिया प्रान्तरिक्ष्य वायु का धर्म है । उसका इनमें अभाव है, अतः यह जीववर्ग जैसे का तैसा ही रहता है । काच, अभ्रक ( भोडल ), मुक्ताफल, ( मोती ), वज्रर ( हीरा ), नीलम, माणिक्य ( लाल ), गरुत्मान्, पुष्पराग ( पुखराज ), अय- ( लौहा ), शुल्व ( ताँबा ), रजत ( चाँदी ), हिरण्य ( सोना ), हरताल, गन्धक, शिववीर्य्य ( पारा ) आदि आदि सम्पूर्ण जड़पदार्थ अर्थप्रधान हैं । वैश्वानराग्निमय हैं । प्रजापतिविभाग में यही सृष्टि ' शिपिविष्ट ' नाम से प्रसिद्ध है | इस शिपिविष्टसृष्टि का विष्णु - अक्षर से सम्बन्ध है । अक्षरों का स्वरूप व्रतलाते हुए हमने पूर्व में बतला दिया है कि, सोम का सम्बन्ध विष्णु से है । गर्भित विष्णु ह्रीं सोम कहलाते हैं । सोम इस गतिरूप विष्णु अक्षर के सम्बन्ध के कारण हीं सङ्कोच - धर्म्मा है | सोम उत्तरोत्तर संकुचित होता रहता है । जैसे अङ्गिराप्रधान श्राग्नेयप्राण ‘ प्राण ' कह– लाता है, एवमेव भृगुप्रधान सौम्यप्राण ' रयि ' कहलाता है । * रयि सोम है, प्रारण अग्नि है । इसी अग्नीषोमात्मक रयि – प्राण से विश्व का निर्माण हुआ है । इनमें सोमरूप रयि ही उत्तरोत्तर होने वाले सङ्कोच से मूर्च्छित होती हुई ‘ मूत्ति ' ( पिण्ड ) बनती है । मूच्छित सोम ही ' मूर्ति ' है । मूर्त्ति अर्थप्रधाना है, द्रव्यप्रधाना है । इसका सम्बन्ध वैश्वानरगर्भित सोम से है । सोम वैष्णव है । अतएव इस अर्थमयी " शिपिविष्टसृष्टि ' को, दूसरे शब्दों में ' घातुसृष्टि ' को हम ' विष्णु ' देवता सम्बन्धिनी मानते हैं । यही अचेतन-सृष्टि असंज्ञ, एकात्मक, आदि नामों से प्रसिद्ध है । वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, इन तीनों में से इसमें केवल ' वैश्वात्मा ' ही प्रधान रूप से अभिव्यक्त रहता है । दूसरी है – अद्ध चेतनसृष्टि I । सौर तेज और भी कुछ अधिक आया, एवं आन्तरिक्ष्य वायु का भाग भी आया । दोनों के आगमन से कुछ अधिक विकास हुआ । इन दोनों के आगमन से दूसरी अर्द्ध चेतन-सृष्टिं हुई । स्तम्भ ( पुष्करपर्ण - शैवालादि ), कुश, काश, व्रततियाँ ( बेलड़ियाँ ), उलुप ( दूर्वादि छोटे तृण ), शूपक ( बड़े बड़े जङ्गली कूँचे ), केला, सुपारी, नारियल, छुवारा, ता, आदि तृणवर्ग ( बृहत्रण-वर्ग ), एवं इतर वृक्षादि, सब श्रद्ध चेतनसृष्टि में अन्तर्भूत हैं । इन सम्पूर्ण अवान्तर - सृष्टियों का मूलप्रभव ‘ पुष्करपर्ण ' नाम से प्रसिद्ध ' स्तम्ब ' ही है । अतएव सांख्यने इन समस्त श्रद्धचेतनसृष्टियों के लिए केवल ' स्तम्ब ' का ही प्रयोग किया है । इसमें हमने अचेतनसृष्टि की अपेक्षा यद्यपि सौरज्ञान की अधिक सत्ता चत-लाई है । परन्तु अचेतनसृष्टि में आने वाला - सौरतेज जैसे अर्थप्रधान वैश्वानर से अभिभूत होजाता है, एव-मेव इस अद्धचेनसृष्टि में आने वाला सौरभाग अन्तरिक्ष्य वायु से अभिभूत हो जाता है । इसीलिए इन में * रयिप्राण का क्या स्वरूप है?, प्रजाकाम प्रजापति इन दोनों से सृष्टि करने में कैसे समर्थ बनते हैं?, इत्यादि विषयों का निरूपण ' ' प्रश्नोपनिषत् ' - - भाषाभाष्य में देखना चाहिए । ३३१
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प्रथमकाण्ड भी ज्ञानमात्रा का पूर्ण विकास नहीं होने पाता । इनमें क्रियामय वायु है, इसलिए तो ये अभिवृद्ध हो जाते हैं । एवं पार्थिव आकर्षण भी एक प्रकार से पूर्ण मात्रा में हैं, अतएव ये पृथिवी से भी पृथक नहीं होसकते । वहीं बद्ध रहकर उपर बढ़ते हैं । इसप्रकार इनमें वैश्वानर, और तैजस, इन दो ' भूतात्माओं ' की सत्ता सिद्ध हो जाती है । सुप्तावस्था में हमारे में जो ज्ञान है, वही ज्ञान इनमें है । इनमें केवल त्त्वगिन्द्रिय का विकास है । इस एक इन्द्रिय से ही ये अनुभव करते हैं । इसी ' वृक्षचैतन्य ' का निरूपण करते हुए भगवान्
व्यास कहते हैं-ऊष्मतो ग्लायते वर्णं ं त्वक् फलं पुष्पमेव च ।
म्लायते शीर्य्यते चापि स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ॥ १ ॥
वाय्वग्न्यशनिनिर्घोषैः फलं पुष्पं विशीर्य्यते ।
श्रोत्रेण गृह्यते शब्दस्तस्माच्छृण्वन्ति पादपाः ॥२ ॥
चल्ली वेष्टयते वृक्ष ं
सर्वश्चैव गच्छति ।
न ह्यदृष्टश्च मार्गोऽस्ति तस्मात् पश्यन्ति पादन ॥३ ॥
-महाभारते जो व्यापार हम चेतन मनुष्यों में देखते हैं, वे ही वृक्षों में उपलब्ध हैं । अतएव हम कह सकते हैं कि, वृक्षों में स्पर्शज्ञान है । वे सुनते हैं । देखते हैं । सूँघते हैं । स्वाद लेते हैं । पीते हैं । यही तात्पर्य है । अन्त में स्पष्टरूप से इनके चैतन्य का निरूपण करते हुए पुराणपुरुष कहते हैं-सुखदुःखयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात् । जीवं पश्यामि वृक्षाणामचैतन्यं न विद्यते ॥ —महाभारत – शान्तिपर्व मो ० ० १८४ ० जिस वृक्ष चैतन्यबाद को आज २० वीं शताब्दी का आविष्कार बतलाया जाता है, वह आज से ५ हजारवर्ष पहिले विनिर्मित महाभारत में विस्तार से निरूपित है । कहना न होगा कि, अपने घर की सम्पत्ति की उपेक्षा कर दूसरों के दिए हुए उच्छिष्ट करपट्टिकाखण्डों ( झूठे रोटी के टुकड़ों ) पर ही रीझ कर आज हम किस प्रकार अपमानित, और लाञ्छित किए जाते हुए असभ्य, विज्ञानशून्य, जंगली, आदि विविध उपाधियों से विभूषित किए जारहे हैं । अस्तु, प्रकृत में हमें केवल बतलाना यही है कि, महाभारत में यद्यपि वृक्षादि में चैतन्य बतलाया गया है, एवं उनमें सम्पूर्ण इन्द्रियों का भी व्यापार बतलाया है । परन्तु उनमें विज्ञानदृष्ट्या केवल त्त्वगिन्द्रिय ही समझनी चाहिए । इसी के द्वारा उन्हें अन्य इन्द्रियों का अनुभव होता है । इनमें ‘ अर्द्ध चैतन्य ' ही समझना चाहिए । यदि ऐसा न न कहते । वे कहते हैं— होता, तो भगवान् मनु इन्हें ' अन्तसंज्ञ ' कभी ३३२
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शतपथत्राह्मण
गुच्छगुल्मं तु विविधं तथैव तृणजातयः ।
बीजकाण्डरुहाण्येव प्रताना वल्लय एव च ॥
तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्म्महेतुना ।
अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुख - दुःख - समन्विता ॥
- मनु ० १ ० ४८ ४६ श्लोक । ‘ अन्तसंज्ञ ' शब्द का स्पष्टीकरण करते हुए कुल्लूभट्ट् कहते हैं कि- ' यद्यपि सर्वे चान्तरेव चेतयन्ते, तथापि बहिर्व्यापारादिकार्य्यविरहात्तथा व्यपदिश्यन्ते ' । वास्तव में बात यथार्थ है । हम प्रत्यक्ष में भी ऐसा ही देखते हैं । इसी आधार पर हम इनमें एकमात्र त्त्वगिद्रिय का ही विकास मानते हैं 1 । यही हमारे प्रकरण की दूसरी ‘ अद्धचेतनसृष्टि ' है । इनमें वैश्वानर, और तैजस, ये दो आत्मा हैं । अतएव इन्हें अन्तः-संज्ञ, द्वयात्मक, आदि नामों से व्यहृत किया जाता है । तीसरी चेतनसृष्टि का स्वरूप बतलावें, इसके पहिले यह और समझ लेना चाहिए कि, ईश्वरीय देवसत्य के जो वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्गज्ञ, नाम के तीन स्वरूप हैं, वे इस अध्यात्मजगत् में क्रमशः वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, इन नामों से व्यवहृत होजाते हैं । वैश्वानर अर्धप्रधान श्रग्नि है । तैजस क्रियाप्रधान वायु है । एवं प्राज्ञ ज्ञानप्रधान इन्द्र है । केनोनिषित् के अग्नि, वायु, इन्द्र, ये ही तीनों हमारे. वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ हैं । इन तीनों में अनुस्यूत उस ब्रह्मसत्य, एवं षोडशीब्रह्म की महिमा को न जानने वाले संसार पें इन्हीं तीनों देवताओं का विजय समझते हैं । उन्हें ' ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वम् ' का बोध ही नहीं हैं । हैमवती उमा ( माया ) ही उसका स्वरूप अभिव्यक्त करने में समर्थ है । कहना यही है कि, इस जीवसृष्टि - प्रकरण में हम समय समय पर वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ के स्थान में प्रायः वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, इन शब्दों का ही प्रयोग करेंगे । दो सृष्टियों का स्वरूप बतला दिया गया । तीसरी है क्रमप्राप्ता चेतनसृष्टि । कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य, राक्षस, पिशाच, यक्ष, गन्धर्वादि का इसी तीसरी सृष्टि में अन्तर्भाव है । इसमें सौर ' सर्वज्ञभाग ' का विकास है । इस सृष्टि में वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, तीनों भाग हैं । दूसरे शब्दों में, इनमें ज्ञान, क्रिया अर्थ, तीनों विकसित हैं । ज्ञानमय प्रज्ञाभाग के आते ही चैतन्य उल्वण हो जाता है । इसके उल्बण होते ही इन्द्रियों का विकास होजाता है । सुप्तावस्था दूर होजाती है । यही जीवसृष्टि ससंज्ञ, त्र्यात्मक आदि नामों से प्रसिद्ध है | पहिली सृष्टि धातुसृष्टि है । दूसरी मध्य की सृष्टि मूलसृष्टि है | एवं यह तीसरी सृष्टि जीवसृष्टि है । इन तीनों सृष्टियों में से थोड़ी देर के लिए असंज्ञरूपा धातुसृष्टि को छोड़ दीजिए, एवं मूल, और जीव, सृष्टि की ओर ही ध्यान दीजिए । हमने बतला दिया है कि, वृक्षादि - स्वरूपा मूलसृष्टि के पैर नहीं हैं । वे स्वयं पादरूप ' हैं | पाद ही उनके पालक हैं । उसी के द्वारा पार्थिवरस का पान कर वे अपनी स्वरूपसत्ता रखते हुए ' पादप ' नाम से प्रसिद्ध हो रहे हैं । इस मूल सृष्टिने भूपिण्ड को नहीं छोड़ा है । अतएव हम इस द्वितीया सृष्टि को ‘ अपाद-सृष्टि ' कहते हैं । यहाँ से ऊपर ( कृमि से प्रारम्भ कर मनुष्य पर्यन्त ) की सृष्टि भूमूल से पृथक् होजाती ३३३
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प्रथमकाण्ड है । यह सृष्टि गतिधर्म्मोपेता पादशक्ति से युक्त है, अतएव इस सृष्टि को हम ' सपाद ' सृष्टि कहते हैं । मनुष्यों के ऊपर अष्टविध देवसर्ग है । वह भूतल से पृथक् है । इसलिए चेतनसृष्टि के इस देवविभाग को हम ‘ अपाद ' कहसकते हैं । उपक्रम में अपाद है, उपसंहार में अपाद है । मध्य में सपाद है | वृक्षादि सृष्टि का मूल भूमि में आबद्ध रहता हैं । अतएव वह सृष्टि ' मूल ' कहलाती है । परन्तु यह मध्य की सृष्टे बन्धन से पृथक् है । अतएव यह मूलसृष्टि है । इसी अभिप्राय से ब्राह्मणश्रुति कहती है । ' अयं पुरुष: - अमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनुचरति ' । - शत ० २,१,१३ | अमूलरूप सपादसर्ग, एवं अमूलरूप अष्टविध पाद देवसर्ग, इन दोनों में सौर दिव्यरस के ग्राग-मन का तारतम्य समझना चाहिए । इसी तारतम्य के कारण इन दोनों के अवान्तर अनेक विभाग होजाते हैं । इन सम्पूर्ण ग्रवान्तर विभागों का प्रकृत में निरूपण नहीं किया जासकता | आगे आने वाले सृष्टिविषयक तत्तद् ब्राह्मणों में समय समय पर तत्तद् सर्गों के विभागों का स्पष्टीकरण होता रहेगा । यहाँ प्रकरणसंगति के लिए उनमें से कुछ एक के नाममात्र जान लेना हीं पर्याप्त होगा । धातुसृष्टि के अनन्तर मूलरूप वृक्षादि की सृष्टि है । इसे छोड़िए । इसके अनन्तर मूलरूप कृमि कीटादि की तीसरी सृष्टि है । जैसे मूलसृष्टि की प्रथमावस्था स्तम्ब है, एवमेव इस सृष्टि की प्रथमावस्था कृमि है । यहीं से उस सर्वज्ञ की चेतना के विकास का प्रारम्भ है । सौरतेज अधिक आया । उसके आते ही अन्तः-संज्ञ नीव भूपिण्ड – बन्धन से पृथक् होगए | आकर्षण से पृथक् हो चलने लगे । हिलने लगे | कल्पना कर लीजिए कि १०० भागों में से १० भाग सौर प्राण का श्राया, ६० भाग पार्थिव रहे । वृक्षादि में १० भाग सौर तेज के हैं, तो ६० भाग पार्थिवप्राण है । अत्र १० भाग सौर तेज का अधिक आगया । पृथिवी का अल पहिले की अपेक्षा कम होगया । यही ससंज्ञों में पहिली ' कृमिसृष्टि ' है । सर्वज्ञ इन्द्र ' प्रजामय ' ( ज्ञानमय ) है । अव्ययपुरुष का विकास इसी सूर्य्य में होता है । सूर्यं विज्ञानघन है । यही मघवा इन्द्र है । इसी स्थान पर उस ज्ञानमय पुरुष का विकास है । अतएव यह सौर इन्द्र ' प्रज्ञात्मक ' कहलाता है । इसी अभिप्राय से इसके लिए ' प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा ' कहा जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर केनोपनिषत् में कहा गया है कि, अग्नि के सामने यक्ष ने तृण रक्खा, परन्तु अग्नि उसे न जला सके । वायु उड़ा नहीं सके । जब इन्द्र आए, तो तृण और यक्ष दोनों अन्तर्लीन होगए । इसका तात्पर्य्य यही है कि वह तृण ज्ञानमय था, यक्ष स्वयं ज्ञानब्रह्म था । अर्थप्रधान अग्नि, क्रियाप्रधान वायु, दोनों की अपेक्षा यह ज्ञान विजातीय था, अतः इन दोनों का उसमें लय नहीं हुया | परन्तु इन्द्र ज्ञानमय थे । अतएव सजातीयता के कारण यह ज्ञानकला उस महाज्ञानसमुद्र में विलीन होगई । कहना यही है कि, सौर प्राज्ञ इन्द्र अव्ययपुरुष के ज्ञान से युक्त है । इस इन्द्र को आधार बना कर ही अव्ययात्मा जीवरूप में परिणत होता है । अतएव सूर्य्यं को ही स्थावर - जंगम का आत्मा बतलाया जाता है | यह इन्द्रमय अव्ययात्मा एक प्रकार का सूर्य्य है । इसका प्रतिविम्ब केवल आपः, वायु, सोम, तीन पर ही समन्वित – खचित होता है । ' वायुरापश्चन्द्रमा इत्येते भृगवः ' – [ गो ० पू ० २८ | ६ ] के अनुसार प:, वायु, सोम, तीनों की समष्टि ही भृगु है । यही परमेष्ठी है । ईश्वरशरीर का यही परमेष्ठी ' महान ' ३३४
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शतपथब्राह्मण है | इसी पर उस चेतनामय सर्वज्ञ का प्रतिबिम्ब संलग्न होता है । महान् ही उसे अपने गर्भ में धारण करता है | अतएव इसके लिए ' मम योनिर्महदब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् ' [ गीता ] इत्यादि कहा जाता है । महान् उसकी योनि है । वह योनि आपः, वायु, सोम, भेद से तीन प्रकार की है । अतएव तीन स्थानों पर ही चेतना क ' प्रतिविम्व खचित हो सकता है । यही कारण है कि, चैतन्यसृष्टि सम्पूर्ण विश्व में आया, वायव्या सौम्या, भेद से तीन ही प्रकार की होती हैं । जल में रहने वाले मस्त्य [ मछली ], मकर ( मगर ), कर्कट ( कैंकड़ा ), तिमिङ, तिमिङ्गिल, तिमिङ्गिलगिल आदि यच्चयावत् जलजन्तु प्राप्यजीव हैं । पानी हीं इनका आत्मा है । बिना पानी के इनका चैतन्य कभी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य ये पाँचों जीव ' वायव्य ' हैं । वायु ही इनका श्रात्मा है । चन्द्रमा में रहने वाले आठ प्रकार के देवता सौम्य हैं । ये ही जीव हमारे इस प्रकरण के मुख्यपात्र हैं । प्रसङ्गागत जीवों के तीन भेद बतला दिए हैं । अब हम पुन: आपको प्रकृत स्थल की ओर लिए चनते हैं । विंशतिभाग सौरतेज के आजाने से ' कृमिसृष्टि ' होगई । इस कृमि में सौरतेज है अवश्य । परन्तु अभी प्रधानता पार्थिव भाग की ही है । अतः यह कृमि चलते तो हैं, परन्तु पृथिवी पर ही । इसे छोड़ने में ये असमर्थ हैं | भूतल से संलग्न रह कर ही ये चलने में समर्थ होते हैं । छोटी छोटी लटें भूतल पर अधर नहीं रह सकतीं । उनका सर्वाङ्गशरीर भूस्तर से संस्पृष्ट ही रहता है । लीजिए, सौर तेज १० मात्रा से ओर अधिक आगया । इससे दूसरी कीटसृष्टि होगई । सर्पादि का इसी ' कीटसृष्टि ' में अन्तर्भाव है । इस सृष्टि में भीतर की ओर पाँव रहते हैं । उंल्वण नहीं | अनुवण हैं । इन्हीं के आश्रय से ये सर्पण करते हुए [ रेंगते हुए ] चलते हैं । परन्तु इनमें कृमि की अपेक्षा अधिक बल है । अतएव इनकी गति भी प्रचल है । सौरतेज अधिक आया । इसमें ' सहस्रपात् ' जीव की सृष्टि हुई । अनुभव रसिक जानते हैं कि, कितने ही कीट ऐसे होते हैं, जिनका सर्वाङ्गशरीर अथ से इति पर्य्यन्त पैंरों से टँका रहता है । मुग्ल से पुच्छ पर्य्यन्त सर्वत्र काँटे रहते हैं । वह कीट इन्हीं पैरों के आश्रय से अपने शरीर को भूपृष्ठ से धर रखने में समर्थ होता है । - सौरतेज और अधिक आता है । ६०० पाँव हट जाते हैं । १०० ही रह जाते हैं । यही ' शतपाद ' नाम की अवान्तर कीटसृष्टि है । सौरतेज की ओर भी क्रमिक वृद्धि होने से क्रमशः ७२-१६-८ पैर वाले कीट उत्पन्न होजाते हैं । ऊर्णनाभि ( मकड़ी ) में आठ पैर हैं । सौरतेज और अधिक आता है । ८ में से दो पैर भूतल छोड़ देते हैं । ६ का भूतल से सम्बन्ध रहता है । दो आकाश में उड़ने के काम आते हैं । मक्षिका - भ्रमर आदि के आठ पैर होते हैं । दो पैरों से ये कीट उड़ते हैं । ६ से भूमि पर चलते हैं । आगे जाकर दो पैर भी विलीन होजाते हैं । मन्कुण, पिपीलिका, ( चींटी ) आदि के ६ पैर होते हैं । दो पैर मध्य में ( धड़ से संलग्न ) हैं, दो पुच्छभाग की ओर हैं । दो मुख भाग में प्रतिष्ठित हैं । आगे जाकर मध्य के दोनों पैर भी विलीन होजाते हैं । कीट ( कीड़ा ) में ४ पाँव हैं | मध्य का स्थान प्रतिष्ठाशून्य है । ग्रतएव वह नत होजाता है | आगे पीछे का भाग - पैरों के कारण उन्नत हो जाता है । इसमें पिपीलिका आदि षट्पाद कीटों की अपेक्षा अधिक बल है । यह विभाग एक प्रकार की कीटसृष्टि के हैं | इसके अनन्तर है पशुसृष्टि । पशुसृष्टि में ५० भाग सौर प्रारण के हैं, ५० ही पार्थिवप्राण के हैं । दोनों समान हैं । अतएव इनमें कीटसृष्टि की अपेक्षा अधिक बल है । अतएव इनमें साम्य है । ये समरूप ३३५
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प्रथमकाण्ड सेखड़े हैं | हृदय से ऊपर मस्तक पर्य्यन्त सौर प्राण रहता है । मूलद्वार से हृदय पर्य्यन्त पार्थिव अपानप्राण रहता है | यहाँ दोनों समानमात्रा में हैं । अतएव पशुओं का मूलद्वार, मुख, एक रेखा से युक्त रहते हैं ' पुच्छ की सिध में हीं मुख है । पशु के अनन्तर सौरतेज के अधिक आने से पक्षीसृष्टि होती है । सौरतेज के और अधिक मात्रा से आने के कारण आगे के दोनों अधर हो जाते हैं । वे ही दो पैर पक्ष बन जाते हैं । इसी सौरप्राण की अधिकता के कारण पशुओं की अपेक्षा पक्षियों का मुख पुच्छ से ऊँचा उठ जाता है । क्योंकि उसका आगमन ब्रह्मरन्ध्र से ही होता है । बैठी हुई चिड़िया में श्राप पुच्छ नीचे देखेंगे, एवं मस्तक ऊपर देखेंगे । यह तिर्य्यगुरूपा सृष्टि ही पत्नी सृष्टि है । अन्त्र सौरतेज और अधिक आता है । उसी समय जो मस्तक भाग पक्षीसृष्ट में कुछ ऊँचा था, वही अत्र सर्वथा ऋजुभावात्मक तानभाव में परिणत हो जाता है, सीधा हो जाता है । वही हम ( मनुष्यसृष्टि ) हैं | हमारे दोनों हाथ पैर ही हैं । इसीलिए तो ' यो वै पादः स हस्त: ' ( श ०८ कां ७ | २ | १७ | ) यह कहा जाता है | हमारा मस्तक सौरतेज के आधिक्य से सीधा खड़ा हुआ है । इस मनुष्यसृष्टि के मध्य में एक ' अर्द्ध मनुष्य ' सृष्टि ओर होती है । वही सृष्टि - ' वानर ' ( बन्दर ) नाम से प्रसिद्ध है । इस में दोनों के धर्म्म हैं । मनुष्य हाथों से खाता है, श्रोणि भाग से बैठता है । पशु मुख से खाता है । पैरों से चलता है । वानर में दोनों धर्म्म हैं । आप अपने हाथ में चने रत्र कर बन्दर के सामने खड़े हो जाइए | बन्दर मनुष्यों की भाँति हाथ से उठा कर चने खाजायगा । एवं मनुष्यों की भाँति श्रोणिभाग से बैठता है । साथ ही पशुओं की भाँति दांतों से तोड़ कर बिना हाथ के भी वह खाता है । एवं पशुओं की भाँति चारों हाथ पैरों से चलता है । इसीलिए तो इसे ‘ वानर ' ( विकल्प से नर - अधा मनुष्य, आधा पशु ) कहा जाता है । बानर के अनन्तर मनुष्यसृष्टि का विकास है । द्यावापृथिवी के रसद्वय के तारतम्य से होने वाली इस भूतसृष्टि के वास्तविक रहस्य को न समझ कर कल्पनारसिक मिस्टर डारविन कहते हैं कि, बन्दरों में कितने हीं गुण मनुष्य के मिलते हैं । अतएव विज्ञानदृष्टि हमें कहती है कि, हम बन्दरों को मनुष्यों का पूर्वज माने ' । हमारे शास्त्रों की चर्चा जाने दीजिए । स्वयं पाश्चात्य विद्वानोंने हीं डारविन के इस काल्पनिक सिद्धान्त का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया है । प्रोफेसर ‘ हेनरी फेयर फील्ड ओसबर्न ' का कहना है कि, मनुष्यों के पूर्वज चन्दर नहीं थे I अपितु जावाद्वीपादि में प्राप्त कङ्कालो से यह अनुमान किया जा सकता है कि, तत्कालीन ' एपमैन ' नाम के मनुष्य ही हम मनुष्यों के पूर्वज थे । अस्तु पराधिकार चर्चा करना अनधिकारचेष्टा है | परन्तु साथ ही ‘ डार-विनथ्योरी ' के अनुयायियों को हम बतला देना चाहते हैं कि, मनुष्यों का विकास वानरों के द्वारा मानना उनकी निरी कल्पना ही है । हम भी विकासवाद मानते हैं । ' एकं चा इदं विबभूत्र सर्वम् ' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व उस एक ही का विकास है । परन्तु यह विकास मर्य्यादित है । हम बन्दरों को मनुष्यों का पूर्वज तो, क्या, ईश्वर का पूर्वज मान लेंगे । परन्तु जो विकास को अमर्य्यादित मानते हैं, उन्हें तो कुत्ता, बिल्ली, गाय, भैंस सत्र को ही * मानवसृष्टि में नालच्छेद हैं, जब कि वानरसृष्टि नालच्छेद से संस्पृष्ट है । यह भी दोनों में महान् मौलिक - भेद है । ३३६
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शतपथब्राह्मण मनुष्यजाति का पूर्वज मानना पड़ेगा । शास्त्र के आधार पर हम कह सकते हैं कि, सत्र की योनियाँ भिन्न भिन्न हैं | सत्र का स्रोत भिन्न भिन्न रूपेणैव प्रक्रान्त है । इस प्राणी सृष्टि को हमारे शास्त्रोंने ८४ लाख योनियों में विभक्त माना है । सब स्वतन्त्र हैं । सब का विकास स्वतन्त्र है । कली अविकसित है । विकासभाव को प्राप्त होकर वही कली ' पुष्प ' रूप में परिणत हो जाती है । अत्र कहीं उस कलि की स्वरूपसता नहीं है । यदि हम चन्दरों के विकास हैं, तत्र तो संसार में चन्दरों का अस्तित्व ही नहीं रहना चाहिए था । क्योकि बन्दर तो मनुष्य बन गए । इन्हीं सत्र कारणों से उक्त सिद्धान्त्र को हम काल्पनिक समझते हैं । हमारे शास्त्रकारोंने विज्ञानप्रधान मनुष्यों में विकास माना है । मनुष्य शरीर में ब्रह्मरन्ध्र से मूलद्वारा पर्य्यन्त चार संस्थाएँ हैं । ब्रह्मरन्ध्र से पर्यन्त एक संस्था है । कण्ठ से हृदय पर्य्यन्त दूसरी संस्था हैं | हृदय से नाभि पर्य्यन्त तोमरी संस्था है । नाभि से मूलद्वार पर्य्यन्त चौथी संस्था है । चारों संस्थाओं में चार गुहा ( रिक्त स्थान ) हैं । वे चारों गुहास्थान क्रमशः शिरोगुहा, उरोगुहा, उदरगुहा, बस्तिगुहा, नामों से प्रसिद्ध हैं । ‘ आत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ' के अनुसार आत्मा इन्हीं चार गुहाओं में प्रतिष्ठित रहता है । शिरोगुहा में विज्ञानात्मा प्रतिष्ठित रहता है । उरोगुहा में प्राणात्मा प्रतिष्ठित रहता है । उदरगुहा में ( हृदय स्थान पर ) व्यानात्मा प्रतिष्ठित रहता हैं । एवं बस्तिगुहा में ' अपानात्मा ' प्रतिष्ठित रहता है । इन चारों गुहात्रों के चार आत्मा उक्थ ( विम्ब ) रूप हैं । उक्थ से अकं ( रश्मियाँ ) निकलते हैं । चारों उक्थों में से ( प्रत्येक में से ) सात सात अर्क निकलते । सातों का एक तन्त्र है । इस तन्त्र का तत्तद् गुहानित आत्मा तन्त्रायी है । पहिले शिरोगुहा को ही लीजिए । दो श्रोत्रप्राण, दो चक्षुःप्राण, दो नासाप्राण, एवं एक मुखप्राण, ये सात प्रारण पहिला तन्त्र है | इन्हीं के लिए ' सप्तशीर्षण्यः प्राणाः ' यह कहा जाता है । ' अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्व बुध्नस्त— स्यासत ऋषयः सप्ततीरे * इत्यादि मन्त्र इह्रीं सात मुख्य ( मुखस्थानीय - शिरोभाग में रहने वाले ) प्राणों का निरूपण करता है । दूसरी गुहा में दो हस्तप्राण, दो स्तनप्राण, दो फुफ्फुसप्राण, एक हृदयप्राण है । तीसरी गुहा में दो - यकृत् - प्लीहा - प्रारण, दो वृक्कप्रारण, दो क्लोमप्राण, एक नाभि-प्राण, ये सात प्राण हैं! चौथी गुहा में दो श्रोणिप्राण, दो आण्डप्राण, एक मूत्रनलिकाप्राण, एक रेतनलिकाप्राण, एक मूलद्वार - प्राण, ये सात प्राण हैं । इसप्रकार चार स्थानों में सात प्राण हो जाते हैं । ऊपर का पहिला सप्तक ही नीचे आकर तीन सप्तकों में परिणत हो रहा है । इन्हीं चारों सप्तकों का निरूपण करती हुई उपनिषत् - श्रुति कहती है-'
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिपः समिधः सप्तहोमाः ।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥
* अर्वाग्विलश्चमस ऊर्ध्वबुघ्नस्तस्मिन् यशो निहितं विश्वरूपम् ।
तस्यासत ऋषयः सप्त तीरे वागष्टमी ब्रह्मणा संविदाना ॥
- शतपथे × इस मन्त्र का विशद निरूपण मूण्डकोपनिषत् के भाषाभाष्य में देखना चाहिए । ३३७
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प्रथमकाण्ड सप्त प्राण ७ सप्तार्चि ७ सप्त होम ७ सप्तलोक ७ 11 १ श्रोत्र प्राण २ श्र ३ चतु ४ चतु 37 27 मनोजवा काली पाकयज्ञ सत्यम् कराली अग्निहोत्र तपः दर्शपूर्णमास जनत् सुलोहिता । चातुर्मास्य महः ५ नासा सुधूम्रवर्णा • सोमयज्ञ स्वः 11 ६ नासा स्फुलिंगिनी -महायज्ञ भुवः 19 ७ मुख विश्वरूप! प्रतियज्ञ भूः ० ८ मन्त्र । इति । - मुण्डकोपनिषत् २ मु ० १ ब्रह्मरन्ध्र से प्रविष्ट विज्ञानात्मक सौरप्राण के ही सात भाग हैं । ये नीचे जाकर पार्थिव भाग की प्रत्रलता के कारण तिरोहित होगए हैं । धीरे धीरे सौरप्राण बढ़ रहा है । एक दिन समय आवेगा, जबकि चक्षुः-स्थानीय स्तन चक्षुः स्वरूप में परिणत होजायँगे । चक्षु में शुक्लपटल, कृष्णपटल, कनीनिका, तीन भाग हैं | अतएव चक्षु को ' त्रिवृत् ' कहा जाता है । स्तन में कृष्णपटल है, चूचुकस्थानीया कृष्णकनीनिका विकास ब्रह्मदिन के १२ बजे पर्य्यन्त होगा । है । बीच में छिद्र है । केवल शुक्लपटल का अभाव है । यह अभी ब्रह्मा का द्वितीय प्रहराद्ध ' है । अनुमानतः ११ || बजे हैं । १२ बजे पश्चात् हास होगा । पहिले सावर्णि—: मनु ( ८ वें मनु ) इस ह्रासवाद के उपक्रम बनेंगे । इस ह्रास - विकास की चर्चा को त्र तूलरूप देना अप्रासङ्गिक ही होगा । केवल पूर्व के सातों प्राणों की तालिका बतलाकर ही इस विषय को यहीं उपरत कर प्रकृत का अनु-सरण करते हैं । ३३८