Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 601–610
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 601–610
पृष्ठ 601
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ब्रह्मरन्ध्र मनः O २ कर्णौ २ चक्षुषी ७ — २ नासिके 0110 १ वाक् i * कण्ठः २ हस्तौ २ स्तनौ ७ २ फुफ्फुसे O I १ हृदयम् * हृदयम् २ यकृत प्लीहे - O 0 २ क्लोमानौ -७ -२ वृक्के 01-0 १ नाभिः 22 नाभिः २ श्रोणी – 0 0 २ मूत्ररेतसी — ७ २ आण्डे १ मूलद्वारम् — शतपथब्राह्मण ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' १ शिरोगुहा, विज्ञानात्मा । ( आप: ० ) ४ २ उरोगुहा प्राणात्मा ( द्यौ ० ) ३ ३ उदरगुहा, व्यानात्मा ( अन्त ० ) २ ४ बस्ति गुहा अपानात्मा ( पृ ० ) १ ३३६ सप्त - सप्त - भावात्मकः - गुहास्वरूपपरिलेख: -
पृष्ठ 602
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड ' मानवसृष्टि ' का संक्षिप्त स्वरूप उपरत हुआ । इसमें एक भाग पार्थिव है । तीन भाग सौर है । हम द्विपाद हैं । इसप्रकार सहस्रपाद से प्रारम्भ कर द्विपाद पर्य्यन्त एक सृष्टिधारा समाप्त होती है । स्तम्बादि अचे-तनवर्ग पहिला विभाग है | कृमि - कीट - पशु - पक्षी, यद दूसरा विभाग है । पूर्वकथनानुसार सांख्य ने स्तम्ब, और कृमि - कीटादि को संयुक्त - कर एक विभाग माना है । इस विभाग को उसने तमोविशाल मूल का तिर्य्यक्— सर्गकहा है । रजोविशाल मनुष्यसर्ग उसके मतानुसार मध्यमसर्ग है । इस मध्य के मनुष्यसर्ग में सर्वज्ञ इन्द्र प्रधान है । एवं इन्द्र ही वायु में प्रविष्ट होकर उसका व्याकरण ( एक वस्तु को विविध आकार में परिणत कर देना हीं ' व्याकरण ' कहलाता है ) कर देता है । इन्द्र ज्ञान है, प्रज्ञा भाग है । ज्ञान हीं वायुधरातल खण्ड खण्ड करता | ज्ञान हीं क - च - ट - तप आदि वर्णों का विभाजक | ' वायुः खात् शब्दस्तत् ' इस प्रातिशाख्य सिद्धान्त के अनुसार वायु ही वर्ण बनता हुआ शब्दरूप में परिणत होता है । एवं यह विभाग इसी इन्द्र के द्वारा होता है । इस वर्णवाक् के अधिष्ठाता सर्वज्ञ ज्ञानमय इन्द्र का विकास मनुष्यसृष्टि में ही होता है । अतएव मनुष्यवाक् ही विज्ञानमयी होती है । वर्णरूपा होती है । कृमि, कीट, पशु, पक्षियों की वाक् में इन्द्रभाग अत्यल्पमात्रा में होने से नहीं के समान है, अतएव उनकी वाक् में ध्वनिमात्र है । वर्णविभाग नहीं है । पूर्वोक्त प्रथमसर्ग, और मनुष्यरूप मध्यमसर्ग का भूपृष्ठ से सम्बन्ध है | इसके अनन्तर है आठ प्रकार का देवसर्ग | द्युरस और अधिक आता है । इससे दोनों पैर भी अन्तर्लीन होजाते हैं । यही - तीसरा देवसर्ग है | इस देवसर्ग के भूवायु, चान्द्रमण्डल, सौरमण्डल, भेद से तीन विभाग होजाते हैं । भूपिण्ड के चारों ओर १२ योजन ( ४८ कोस ) पर्य्यन्त ' एमूषवराह ' नाम से प्रसिद्ध ' भूवायु ' श्रभिव्याप्त परिव्याप्त रहता है । इस स्तर में भी जीव रहते हैं । इन जीवों का शरीर वायुमय है । वायुप्रधान है । इनके भी द्युरस के तारतम्य से अवान्तर तीन विभाग होजाते हैं । सबसे नीचे ' पिशाचयोनि ' है । ऊपर ' राक्षस ' है । सबके ऊपर ' यक्ष ' है । तीनों में पिशाच महादुष्ट है । शरीर के वायुंभाग पर ( वायव्यप्राण पर ) पिशाचप्राण का आक्रमण होता है । राक्षस उससे कम दुष्ट है | इन का श्राक्रमण रुधिरभाग़ पर होता है । राक्षसयोनि रुधिर-प्रिया है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है-‘ रक्षसां भागोऽसि ( यजु ० ६ | १६ | ), इति । रक्षसां ह्येष भागो यदसृक् ' | - श ० ३ | ८ | २ | १४ | तीसरी यक्ष योनि है । महाभारत में जिस धर्म्म का यक्षरूप से निरूपण है, वही यह यक्षयोनि है । यह राक्षस की अपेक्षा कम दुष्ट है । ये तीनों हीं वायव्य होने से अन्तरिक्ष में रहते हैं । इसी अभिप्राय से ' अमूलं वा इदं उभयतः परिच्छिन्नं रक्षोऽन्तरिक्षमनुचरति ' ( शत ० ३ | १ | ३ | १३ ) यह कहा जाता है । पुरुष आग्नेय है, स्त्री सोम्या है, जैसाकि पूर्व प्रकरणों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । सोम की घनावस्था पानी है, तरलावम्था वायु है । वायु भी एक प्रकार से सोम है । ' योऽयं वायुः पवते, एष सोमः ( शत ० ७।३।२.१1 ) इस श्रुति से स्पष्ट ही वायु की सोमता सिद्ध होजाती है । भृगु सोम है । एवं ग्रापः, वायु, सोम, तीनों की समष्टि भृगु है । अतएव हम अवश्य ही वायु को सोम कहसकते हैं । इसी सौम्यवायु से स्त्री का आत्मा बनता है, एवं आग्नेय वायु से पुरुष का श्रात्मा बनता है । आप्य, वायव्य, सौम्य, भेद ३४०
पृष्ठ 603
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण से तीन प्रकार की जीवसृष्टि है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जाचुका है । इसमें मनुष्यसृष्टि वायव्या है | स्त्री-सृष्टि सौम्य - वायुरूपा है | पुरुषसृष्टि श्राग्नेय - वायुरूपा है । पुरुष आग्नेय होने से अन्नाद है, भोक्ता है । स्त्री सोम होने से अन्न है, भोग्य है । ' अग्निर्हि / क्षसामपहन्ता ' के अनुसार आग्नेय वायु सौम्यवायुभुक्त आसुरयोनि का विरोधी है । ग्रासुरयोनि वारुणी है । वरुण और इन्द्र में घोर शत्रुता है । एवं आग्नेय वायु में एक चतुर्थांश इन्द्र रहता है । अतएव श्राग्नेय वायु के समीप असुरप्राण का प्रभाव नहीं होने पाता । परन्तु सौम्यभाव तो इनका अपना घर है । अतएव वहाँ पिशाच राक्षस यज्ञादि वायव्य प्राण शीघ्र अपना प्रभाव स्थापित कर लेते हैं । स्त्रियाँ सौम्या हैं । अतएव भूतबाधा का आक्रमण आग्नेय पुरुषों की अपेक्षा सौम्या स्त्रियों पर ही अधिक होता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' इदं ह्याहु: - रक्षांसि योषितमनुसचन्ते'-( शत ० ३।१२।१।२० ) यह कहा जाता है | जबतक पुरुष १६ वर्ष का नहीं होजात्ग, तत्रतक उस में भी सोम की ही प्रधानता रहती है । १६ वर्ष के अनन्तर अग्नि का पूर्ण विकास होता है । यही कारण है कि, ' स्त्रयों की भाँति छोटे बच्चों पर भी राक्षस पिशाच- प्राण का अधिक आक्रमण होता है । इस वायव्यप्राण का उल्वणरूप चतुष्पथ ( चौराहा ) होता है । चतुष्पथ में चारों मार्गों के वायु का केन्द्र में समन्वय होता है । विभिन्न दिक् वाले चारों वायव्य-प्राण एक बिन्दु पर आकर चलिष्ट बन जाते हैं । अतएव और स्थानों के वायु की अपेक्षा चतुष्पथ के वायु में रहने वाला श्रासुर पैशाच प्रारण अधिक प्रबल होनाता है । इन पिशाच, भूत, राक्षसादि वायव्य प्राणों के अधिष्ठाता भगवान् रुद्र हैं । रुद्र के घोर, और शिव, दो भेद हैं । शिववायु पालक है । रुद्रमूर्त्ति यम I यह रुद्रप्राण ' एको रुद्रो द्वितीयाय तस्थुः ' के अनुसार उक्थरूप से एक है । एवं इसके आधार पर रहने वाले वायु असुर राक्षसादि अनन्त प्राण इनके आयुध हैं । इन्हीं के द्वारा ये संसार का नाश किया करते हैं । यह विनाशक रुद्रप्राण पूर्व परिकर को साथ लेकर प्रधानरूप से इसी चतुष्पथ में प्रतिष्ठित रहता है । इसी अभि-प्राय से भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' एतद्ध वा अस्य ( रुद्रस्य ) जान्धितं ( निर्द्धारितं ) प्रज्ञातं ( प्रसिद्ध ) अवसानं - यच्चतुष्पथम् ' - शत ० २२/२/७ इति नहाँ विभिन्न दिशाओं के विजातीय वायुत्रों का संघर्ष होता है, वहाँ का राक्षसादि प्राण प्रचल होजाता है । दिनके १२ बजे, और रात्रि के १२ बजे इस मध्यभाग को काटती हुई एक याम्योत्तररेखा बनती है । इसी को हमने पूर्व के प्रकरणों में ' उर्वशी अप्सरा ' कहा है । इस रेखा से खगोल का विच्छेद होता है । रात्रि का मध्यभाग, दिनका मध्यभाग, इस विच्छेद की एक रेखा में पड़ता है । इन दोनों बिन्दुत्रों में मित्रवायु और वरुण वायु का संघर्ष है । इस संघर्ष से इन टो समयों में विशेषरूप से सुर प्राण प्रबल होजाता हैं । इसी विज्ञान को आधार मानने वाला सनातनधर्मी जगत्, विशेषकर इस जगत् को स्वधर्म में स्थापित रखने वाला भारत का पूज्य स्त्रीवर्ग दुपहर में, आधी रातको चतुष्पथ में जाने के लिए अपने बालकों को मना किया करता है । कहना न होगा कि, उनका यह कथन सर्वथा श्रौतविज्ञानसिद्ध, अतएव परममान्य है । इन्हीं असुर राक्षसों के लिए ब्राह्मणग्रन्थों में बार बार ' नाष्ट्रा रक्षांसि ' कहा जाता है । याज्ञिक-कर्म्म देवप्राणप्रधान है | इन पर नाष्ट्रा राक्षस निरन्तर आक्रमण किया करते हैं । अग्निरूप मन्त्रवाक् का ३४.१
पृष्ठ 604
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड प्रयोग कर, ओर ओर भी कितने हीं कर्म्म कर इनका अवरोध किया जाता है । इस वायुस्तर के ऊपर चन्द्रमा का मण्डल है । जैसे सौर मण्डल ' सम्वत्सर ' कहलाता है, पार्थिव मण्डल ' इला - दम् ' कहलाता है, एवमेव चान्द्रमण्डल ' परिप्लव ' कहलाता है । इस चान्द्रपरि'लव में ऊर्ध्व, अध:, दो भाग हैं । अधोभाग में २७ प्रकार की ' गन्धर्वयोनि ' है । एवं ऊर्ध्व भाग में ७ प्रकार की ' पितरयोनि ' है । इसी अभिप्राय से ‘ विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' यह कहा जाता है । इसके ऊपर चान्द्रगर्मित जितना सौरमण्डल है, ( जोकि चान्द्रगर्भित होने से एक प्रकार से चान्द्रलोक ही है ) ' ऐन्द्र, प्राजापत्य ' नाम की दो देवेयोनियाँ है । भूः पृष्ठ से प्रारम्भ कर यहाँ पर श्राके संचरक्रम ( सृष्टिक्रम ) समाप्त होता है । इस योनिभेद का एकमात्र कारण रसका तारतम्य ही है । इसी तारतम्य के कारण आठों देवयोनियों में ऊत्तरोत्तर की देवयोनियाँ पूर्व-पूर्व - योनियों की अपेक्षा श्रेष्ठ होजातीं 1 वृक्षादि से प्रारम्भ कर देवयोनि पर्य्यन्त उत्तरोत्तर इन्द्रियों का विकास है । वृक्ष में एक त्वगिन्द्रिय थी । कृमि कीटादि में २-३-४ क्रम से इन्द्रियों का विकास हुआ । आगे जाकर मनुष्यसृष्टि में ११ इन्द्रियों का विकास हुआ । एवं ऊपर की ८ देवयोनियों में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्त्व, ईशित्त्व, आठ सिद्धियाँ, एवं ६ तुष्टियाँ ओर विकसित होगई । इससे देवताओं में २८ इन्द्रियों का विकास माना गया | सम्पूर्ण सृष्टियों में से प्रत्यक्ष हमें केवल मनुष्यसृष्टि पर्य्यन्त ही होता है । अष्टविध देवयोनियाँ हम से परोक्ष रहतीं हैं । विदितवेदितव्य प्राप्त महर्षि ही उन्हें देखने में समर्थ होते हैं । उन्होंने हीं हमें इनका ज्ञान कराया है । उन्हीं के आप्तोपदेश के आधार पर न देखते हुए भी उन योनियों की सत्ता पर, एवं उनके तत्तत् कार्यों पर हमें विश्वास करना पड़ता है । जब हम सृष्टि का क्रमिक विकास देख रहे हैं, तो हमारा आत्मा स्वयं हीं यह नही मानसकता कि, मनुष्य पर आके सृष्टिक्रम अवरुद्ध होगया । हमसे ऊपर हमारे से अधिक शक्ति रखने वाले जीव भी हैं । उनका वायुशरीर से कभी कभी हम मनुष्यों में, विशेषकर स्त्रियों में प्रवेश हुआ करता है । काप्य नाम से प्रसिद्ध महर्षि पतञ्जल की स्त्री और कन्या दोनों में आथर्वण कबन्ध नामके गंधर्व का प्रवेश हुआ था! एवं उसने पतञ्जल से, एवं वहीं उपस्थित अरुणपुत्र सुप्रसिद्ध उद्दालका दि महायाज्ञिकों से प्रश्न किया था कि, यदि जानते हो, तो बतलाओ, ' सूत्रात्मा ' किसे कहते हैं?, अन्तर्यामी किसे कहते हैं? । इन सबको इस प्रश्न का उत्तर न सूझा । अन्ततोगत्त्वा शरीर - प्रविष्ट स्वयं गन्धर्वने हीं इनका विस्तार से निरू-पण किया, जैसाकि बृहदारण्यक में, और शतपथ में ( १४।६।७ ) उद्दालक और याज्ञवल्क्य के परस्पर के सम्वाद में विस्तार से बतलाया गया है । आज भी प्रत्यक्ष ही भूतावेश देखते हैं । जबकि यह तत्त्व श्रतिसिद्ध है, प्रत्यक्ष सिद्ध है, भूतावेश के द्वारा अनुमानसिद्ध हैं, तो ऐसी अवस्था में ' हम नहीं देखते, इसलिए नहीं मानते ' कह कर इसकी उपेक्षा करना बालचापल्यमात्र ही है । पानी के परमाणु, परमाणु में असंख्य कीटाणु व्याप्त रहते हैं । परन्तु हम ध्यान से देखने पर भी उन्हें नहीं देखते । परन्तु उन्हीं को एक वैज्ञानिक सूक्ष्मवीक्षणयन्त्र ( खुर्दबीन ) से देख लेता है । क्या हमारे न देखने मात्र से पानी के कीटाणुओं की सत्ता नष्ट होगई? | क्या उस वैज्ञानिक के अनुभव का हम विरोध करेंगे? । कदापि नहीं । ऋषियोंने तपोबल से देखा है । आप भी तपोत्रल प्राप्त कीजिए, देख लेंगे । जिन भूतबाधाओं की शान्ति के लिए भगवान् चरक ने ' भूतोपशमनीयाध्याय ' नाम .३४२
पृष्ठ 605
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण का एक स्वतन्त्र अध्याय उपनिबद्ध किया है, जिन भूत - देवयोनियों का कपिलमुनिने अपने सांख्यदर्शन में विस्तार से निरूपण किया है, जिन देवयोनियों के आवेशों के वेदग्रन्थ में अनेक स्थानों वर उल्लेख मिलते हैं, जिस भूतावेश का आज भी हम कितने हीं स्थानों पर प्रत्यक्ष करते हैं - ' मूढः परप्रत्य नेयबुद्धिः ' के अनुसार प्रतिनिवेश में पड़कर जो महानुभाव - ' यह भी कुछ नहीं, यह भी मिथ्या है ' यह केवल पोपलीला है, सत्र ढोंग है - वास्तत्र मे इसमें सार कुछ नहीं है ' कहकर अपने हृदयोद्गार हमारे सामने रखते हैं, उनकी सेवामें-' असन्नेष स भवति असद् ब्रह्म ेति वेद चेत् ' इस उपनिषत् - वचन को रखते हुए ' अस्ति ब्रह्मति चेद् वेद सन्तमेनं ततो विदुः ' के उपासक सत्यानुयायी की दृष्टि पुनः प्रकृत की ओर आकर्षित करते हैं । पूर्वोक्त सर्गक्रम को महर्षि कपिल ने १४ भागों में विभक्त माना है, जैसाकि प्रारम्भ में हीं बतलाया जा चुका है 1 । यहाँ हमें एक दो बातें और बतला कर इस ‘ चान्द्रदेवता ’ प्रकरण को उपरत करना है । हमने बतलाया है कि, पार्थिव अग्नि वैश्वानर है । यही विष्णु है । अग्नि हीं त्रिवृत् ( E ), पञ्चदश ( १५ ), एकविंश ( २१ ) इन तीन विक्रमों के कारण ' त्रिविक्रम विष्णु ' कहलाने लगता है । वैश्वानर के अनन्तर हिरण्यगर्भ वायु है । यही ब्रह्मा है । सवज्ञभाग शिव है । अर्थ, क्रिया, ज्ञान, तीन तन्त्र हैं । इन तीनों तन्त्रों के ये ही वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञरूप विष्णु, ब्रह्मा, शिव, तीन तन्त्रायी हैं । बिष्णु को मूलस्थानीय होने से ' मूलात्मा ' कहा जाता है । ये अर्थतन्त्र के अधिष्ठाता हैं । ब्रह्मा को वायुरूप होने से ' हंस ' कहा जाता है । क्योंकि हस वायु का नाम है । ये ही क्रियातन्त्र के अधि-ष्ठाता हैं । तीसरे शिव ज्ञानतन्त्र के अधिष्ठाता है । अतएव इनके लिए ' ज्ञानमिच्छेन् महेश्वरात् ' यह कहा जाता है । नीचे की तालिकाओंों से तक बतलाया हुआ सम्पूर्ण सृष्टिविषय स्पष्ट होजाता है । १ – सांख्यमतानुसार तोन प्रकृतियों में विभक्त १४ प्रकार का भूतसर्ग-१ देवसर्ग १ २ ३ ४ पैत्र्य, > सत्त्वविशालसर्ग ८ ब्राह्म, प्राजापत्य, ऐन्द्र, ५ ६ गन्धव, यक्ष, राक्षस, पिशाच, २ मनुष्यसर्ग ब्रा ० क्ष ० वै ० शूद्रभेद भिन्न — रजोविशालसर्ग १ - रजोविशालसर्ग १ १ २ ३ ४ ५ ] ३ तिर्य्यकसर्ग —–तमोविशालसर्ग ५ स्थावर, कृमि, कीट, पशु, पक्षी | ( सां ० का ० ५६-५४ श्लो ० ) ३४३
पृष्ठ 606
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अचेतनसृष्टि नीलम वैश्वानराग्निमयी १ पारद प्रथमकाण्ड २- वैदिक विज्ञानानुसार तीन प्रकार की जीवसृष्टि संज्ञ अन्तः संज्ञ ससंज्ञ १ धातुजीव २ मूलजीव ३ जीवजीव काच स्तम्ब कृमि अभ्रक कुश कीट मोती हीरा पन्ना पुखराज काश चेतनसृष्टि तृण श्रद्ध मयी तै ०वै १२ वल्ली उलुप सृष्टि चेतन प्राज्ञमयी ० तै ० ३ वै पार्थिवजीव पशु पक्षी मनुष्य आन्तरिक्ष्यजीव देवता चान्द्रजीव गन्धक शुपक त्र्यात्मक वृक्षादि दूधात्मक आदि २ ऐकात्मक ३ - मूल - हंस - शिवात्मक विष्णु - ब्रह्मा - इन्द्र -- भेद से तीन विभाग — १ - मूलात्मा विष्णुः २ - हंसात्मा ब्रह्मा ३ - इन्द्रात्मा शिवः पार्थिवसृष्टि अर्थप्रधाना पान १ अमिः विराट् ( अधिदैवत ) वैश्वानर ( अध्यात्म ) पार्थिव ६ स्तोम धातु १ अर्थशक्ति श्रान्तरिक्ष्यसृष्टि क्रियाप्रधाना २ मूल वायुः हिरण्यगर्भ ( अधिदैवत ) तैजस ( अध्यात्म ) अन्तरिक्ष्य १५ स्तोम व्यान २ क्रियाशक्ति दिव्यसृष्टि ज्ञानप्रधाना प्राण ३ इन्द्रः सर्वज्ञ ( अधिदैवत ) प्राज्ञ ( अध्यात्म ) दिव्य २१ स्तोम जीव ३ ज्ञानशक्ति ३४४
पृष्ठ 607
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण यह है वैश्वानर - हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञात्मक ईश्वरप्रजापति की सृष्टि का संक्षिप्त स्वरूप । वह ' परम-प्रजापति ' इन्हीं सृष्टियों के कारण अति, महा, क्षुद्र, जन्तु, भ्रूण, भेद से पाँच रूपों में परिणत होरहा है । ईश्वरप्रजापति यज्ञप्रजापति है । ' पाङ्तो वै यज्ञः ' ( यज्ञ पञ्चावय होता है ) इस अनुगमश्रुति के अनुसार उसके पाँच अवयव हैं । पाँचों अवयव ' विराट् ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों विराट्पुरुषों का स्वरूप गीताविज्ञानभाष्य के विराट्पुरुष निरूपण में देखना चाहिए । यहाँ हम केवल उनके नाममात्र बतला देते हैं— १ अतिविराट् परमेश्वर परात्पर २ महाविराट् महेश्वर महान् ३ क्षुद्र विराट् ईश्वर पर ४ जन्तुविराट्जीव परावर ५ भ्रूण विराट् जीवाणु अवर अवरब्रह्म परमब्रह्म परब्रह्म १ विश्वजगत् - भूमा में २ अण्डजगत् - समुद्र में ३ पृथिवीजगत्- ग्रण्ड में ४ जीव जगत् - पृथिवी में ५ भ्रूण जगत् - शरीर में इन पाँचों विराट्पुरुषों से प्रकृत में हमने क्षुद्रत्रिराट्, जन्तुविराट् नाम से प्रसिद्ध ईश्वर, एवं जीब-विराट् का ही स्वरूप बतलाया है । ' एषा ब्राह्मी स्थितिः ' । यह है ब्राह्मीस्थिति, प्रकृतिमण्डल का स्वरूप । इस स्वरूप को देखने से विज्ञ पाठकों को यह भलीभाँति ज्ञात होगया होगा कि, पार्थिव स्तौम्य - त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित १४ प्रकार के भूतसर्गों में भूपिण्ड के ऊपर, एवं सूर्य्य से नीचे चन्द्रलोक में आठ प्रकार का देवसर्ग है । इनमें भी देवता प्रधानरूप से ' ऐन्द्र ' ही हैं | यही हमारे प्रकरण के तीसरे चान्द्रदेवता हैं । ये विग्रहवान् हैं । प्रजनन, भोजन, शयन, आदि जो व्यवस्थाएँ, जो धर्म मनुष्यों में हैं, वे सब व्यवस्थाएँ, एवं धर्म्म इनमें भी विद्यमान हैं । इति चान्द्रदेव स्वरूप दिग्दर्शनम् ३ आठ प्रकार के देवताओं में से पुरुषविध नित्य सौर प्रारणदेवता, पुरुषविध अनित्य मनुष्य-देवता, एवं पुरुषविध नित्य चान्द्रदेवता, इन तीन देवताओं का निरूपण उपरत हुआ । अत्र क्रमप्राप्त शेष ' ५ प्रकार के देवताओं का दो चार शब्दों में निरूपण कर इस देवप्रकरण को समाप्तिपथानुगामी बनाया जारहा है | चतुर्थ देवता हैं- अपुरुषविध अचेनन भूतदेवता । ' देवेभ्यश्च जगत् सर्वम् ' । मनुः ) के अनुसार विश्व के उपादान देवता हैं । आप संसार में जितने भी भौतिक पदार्थ देख रहे हैं, विश्वास कीजिए, ३४५
पृष्ठ 608
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड वे सब ' देवग्राम ' हैं | देव, और देवता शब्द का अर्थ बतलाते हुए हमने बतला दिया है कि, ' देवता ' शब्द ऋषि, पितर, असुर, गन्धर्व, देव, आदि प्राणमात्र का वाचक है, एवं ' देव ' शब्द केवल ३३ सौरदेवों का ही वाचक है । ' भौतिक पदार्थ देवग्राम नहीं है, अपितु देवताग्राम है । ऋषि पितरादि सभी प्राणों की समष्टि है । इसी अभिप्राय से ' ज यमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' यह कहा ' जाता है । इन देवताओं में से हमें यहाँ केवल ' देव ' प्राण का निरूपण करना है । यह देवप्राण सौरप्राण है, जैसा कि सौर देवों का निरूपण करते समय बतलाया जाचुका है । जितने भी भूत हैं, वाङमय हैं । वाक् श्राकाश का नाम । भूतों में पहिला भूत यही है । आकाश ( मर्त्याकाश ) ग्रन्थिबन्धन - सम्बन्ध के कारण वायु बनता है । वायु तेज बनता है । तेज पानी बनता है । पानी मिट्टी के रूप में परिणत होता | इसप्रकार वहीं वाक्प्रपञ्च भूतरूप में परिणत होजाता है । हम जो कुछ प्राँख से देखते हैं, सब वाङमय है । अर्थात् पञ्चभूतमय है । इसी अभिप्राय से ' अथो वागेवेदं सर्वम् ' ( ऐ ० आरण्यक ३ । १६ ) ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' ( तै ० ब्रा ० शा ० ) इत्यादि कहा जाता है । वाकूपिण्ड कहो, अथवा तो भूतपिण्ड कहो, एक ही बात है । इस भूतपिण्ड में प्राणतत्त्व व्याप्त रहता है । प्राणतत्त्व ने हीं भूत को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित कर रक्खा है । जिस वस्तु में से प्राण निकल जाता है, वह वस्तु ( भूत ) नष्ट होजाती है । प्रत्येक वस्तु में प्राण है, दम है । इस प्राण ने हीं चारों ओर से भौतिक परमाणुत्रों को आबद्ध कर रक्खा है । अतएव इसके लिए - ‘ प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि युज्यन्ते ' ( शत ० १४/८/१४/२ यह कहा जाता है । भूत का हम प्रत्यक्ष कर सकते हैं, परन्तु प्राण का नहीं । प्राण ' नीरूप ' है । इस प्राण को पानी से पकड़ा जासकता है । कारण इसका यही है कि, प्राकृतिक नित्य प्राण आपोमय परमेष्ठी - मण्डल में हीं प्रतिष्टित है | सौर प्राणमण्डल पानी के मध्य में हीं है । वही सौर प्राण प्रवर्ग्य बन कर ( पृथक होकर ) पदार्थों में प्रविष्ट हुआ है । कागज में सर्वत्र प्राण भरा है I । यदि कागज को फाड़ दिया जाता है, तो ग्रन्थिबन्धन टूट जाने से उतन दूर का प्राण निकल जाता है । अब गोंद में पानी मिला कर यदि कागज को जोड़ दिया जाता है, तो वहाँ पानी के द्वारा पुनः प्राण प्रविष्ट होजाता है, जैसा कि अपांप्रणयनकर्म में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है | सौरप्राण देव है | उस प्रारण ने अपने प्रवर्ग्यभाग से वस्तुमात्र को श्राद्ध कर रक्खा है I । जो सौरप्राण इन भूतों के विधरण में उपयुक्त होगया है, वही भूतमय देवता है । त्रैलोक्य में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है, जो सौर प्राण से विष्टब्ध नहो । इसी भूतमय प्राणविज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि पिप्पलाद कहते हैं—
विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।
सहस्ररश्मिः शतधा वर्त्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्य्यः ॥
- प्रश्नोपनिषत् १८ इति । सूर्य्य बृहतीछन्द पर प्रतिष्ठित है । ग्रतएव सौरसाम ' बृहत्साम ' नाम से प्रसिद्ध है । ग्रतएव च सौरप्राण ‘ बृहतीप्राण ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । नड़चेतनात्मक सम्पूर्ण भौतिक प्रपञ्च इसी बृहती-प्राण से विष्टब्ध है | इसी प्राणमय भूतदेव - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऐतरेय कहते हैं— ३४६
पृष्ठ 609
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण " सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः । तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः, एव सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन वृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात् " । - ऐ ० ० २ १६ । इति । इन भूतमय देवताओं का हम भूतरूप से प्रत्यक्ष कर रहे है । यही इस प्रकरण के चौथे देवता हैं । इति - भूतदेवता – स्वरूपदिग्दर्शनम् ४ पाँचवें हैं ' अभिमानी देवता ' । इन देवताओं के विषय में हम अधिक कुछ नहीं कहना चाहते । क्योंकि शारीरकादि दर्शन में इनका बड़े विस्तार से निरूपण हुआ है । अभिमानी देवताओं का स्वरूप बतलाते हुए भगवान् व्यास कहते हैं कि, ' अभिमानि व्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ' । इह्रीं अभिमानी देवताओं को ' आत्मदेवता ' भी कहा जासकता है । इस प्रकरण में निरूपित सात देवताओं में इस अभिमानी देवता की व्याप्ति है | इस की व्याप्ति के कारण हीं हम पदार्थमात्र को ' चेतन ' मानते हैं । गङ्गाजल पानी है । उस में अभिमानी देवता है । वही हमारा आराध्य है । पृथिवी, सूर्य्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, नदी, पर्वत, ओषधि, वनस्पति, आदि आदि यच्चयावत् पदार्थों में यह अभिमानी देवता विद्यमान है । उपासना से इसी देवता का साक्षात्कार किया जाता है । एक ही सौररश्मि आयतन के भेद से जैसे अनेक रूप धारण कर लेती है, उसी प्रकार एक ही अभिमानी देवता भिन्न भिन्न पदार्थों में व्याप्त होकर भिन्न भिन्न रूप धारण कर लेता है । ‘ एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' के अनुसार वह एक ही अनन्तरूप में परिणत होरहा है | विज्ञानकाण्डापेक्षया इस अभिमानी देवता को हम ' अक्षर ' कह सकते हैं । षोडशी प्रजापति का स्वरूप बतलाते हुए पूर्व में हम यह ऋतलाचुके हैं कि, वह षोडशी - प्रजापति परात्पर, अव्यय, अक्षर, आत्म क्षर, इन चार महिमाविवत्तों से युक्त है । इनमें परात्पर अर्द्ध मात्रा है । अव्यय ' अ ' है । अक्षर ' उ ' है । आत्मक्षर ' म् ' है । चारों की समष्टि ' ओम् ' है । यही आत्मा का स्वरूप है । इसी के लिए ' तस्य वाचकः प्रणवः ’ – ‘ ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् ' ( मुण्डकोपनिषत् ) यह कहा जाता है । इस आत्मा का अव्ययभाग ज्ञानमय हैं | क्षरभाग अर्थमय है । मध्यस्थ अक्षरभाग क्रियामय है । दूसरे शब्दों में अव्यय कुर्वाण है, आलम्बन है । अक्षर कुर्बाण है, निमित्तकारण है । तर उपादानकारण है । इन में मध्यस्थ कुर्वाण अक्षर की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, ये पाँच कलाएँ हैं । इन पाँचों में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, तीनों का नाम ' अन्तर्यामी ' है । अग्नि - सोम का नाम ' सूत्रात्मा ' है । अग्नि - सोम– सूत्र से वैकारिक अग्नि - सोम के द्वारा सारा संसार बना कर वह अन्तर्य्यामी ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' के अनुसार सके केन्द्र में प्रतिष्ठित होरहा है । प्रत्येक पदार्थ में स्थिति है । ठहराव है । सत्ता है । यही ब्रह्माक्षर है । प्रत्येक पदार्थ निरन्तर कुछ लेता रहता है । जिस शक्ति से वह लेता है, वही विष्णु है । एवं साथ ही उस पदार्थ में से निरन्तर कुछ ३४७
पृष्ठ 610
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड निकला भी करता है | जिस शक्ति से वह आगत वस्तुनों को निकालता रहता है, वही इन्द्राक्षर है । तीनों ग्रक्षर वस्तु के केन्द्र में रहते हैं । केन्द्र में रहकर अन्तर्भाग में प्रतिष्ठित होकर इस अक्षरत्रयीने उस वस्तु का नियमन कर रक्खा है । अतएव ' अन्तस्तिष्ठन् नियमयति ' इस व्युत्पत्ति से उसे ‘ अन्तर्य्यामी ' कहा जाता है । वस्तु पिण्ड अग्नि - सोममय है । यह पिण्ड उसी अन्तमी पर प्रतिष्ठित है । इसी लिए तो- ` ' तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ' यह कहा जाता है । यह अन्तर्य्यामी चेतनामय है | जड़ - चेतन सत्रके केन्द्र में प्रतिष्ठित है । अतएव बहिर्मुख जीव इसे नहीं पहिचानता । ' पराश्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भू-स्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ' * के अनुसार अपने केन्द्र में प्रतिष्ठित इसे तत्तत् पदार्थ जानने में असमर्थ हैं | इसी अक्षररूप अन्तर्य्यामी को ' हृदय ' कहा जाता है । यह ' सत्यप्रजापति ' है । इसी ने सत्रको नियत मार्गं पर आरूढ कर रक्खा है, अतएव इसे ' नियतिः सत्य ' कहा जाता है । इस नियति की चर्य्या ( श्राचरण - व्यापार ) से ही सम्पूर्ण पदार्थ ' नियतिचर ' बन रहे हैं । सूर्य्य, चन्द्रमा, पृथिवी, पशु, पक्षी, कृमि, कीट, आदि सभी नियतभावों पर आरूढ हैं । इस नियतिर्ब्रह्म की मर्य्यादा का यदि कोई उल्लंघन करता है, तो वह मनुष्य ही है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' नैव देवा अतिक्रामन्ति, न पितरः, न पशवः । ममुष्या एवैके अतिक्रामन्ति । - शत ० २ का ० ४ | २ | ५ | इति । इसीलिए मनुष्यों के लिए ' श्रनृतसंहिता वै मनुष्याः ' यह कहा जाता है | मनुष्य क्यों इसका उल्लं-घन करने में समर्थ होते हैं? इस प्रश्न का समाधान उसी ब्राह्मण में किया जायगा । यहाँ केवल हमें यही बतलाना है कि, चाहे व्यावहारिक दृष्टि के अनुसार वह वस्तु जड़ हो, अथवा चेतन हो, सत्र के केन्द्र में स्थिति, एवं आदान, विसर्गात्मक अक्षररूप अन्तर्यामी प्रतिष्ठित रहता है । यद्यपि अक्षर से क्षर उत्पन्न होता है | क्षर की प्राणकला से स्वयम्मू का प्रादुभाव होता है । श्रापः कला से परमेष्ठी उत्पन्न होता है । अपोमय परमेष्ठी के उदर में सूर्य्य उत्पन्न होता है । एवं सूर्य में देवताओं का विकास होता है । ऐसी अवस्था में देवताओं के अतिबृद्धप्रपितामह अक्षर को ' देवता ' नहीं बतलाया नासकता । तथापि अव्ययपुरुष की अपेक्षा हम अक्षर को देवता कह सकते । उक्थ आत्मा है । अर्क देवता है । आत्मा, और देवता शब्द की यही सामान्य परिभाषा है । अव्यय उक्थ है । अक्षर उसके अर्क हैं । अक्षर पुरुष उक्थ है, तरपुरुष अर्क है । सूर्य्य उक्थ है, रश्मियाँ अर्क हैं । अव्यपुरुष उक्थ होने से आत्मा है । अक्षरप्रकृति अर्करूप होने से देवता है । अक्षर आत्मा का भाग है । परन्तु अर्करूप होने से देवता है । इसीलिए तो हमने इसे ' आत्मदेव ' कहा है | यह अक्षररूप आत्मदेव - अन्तर्यामी, और सूत्रात्मा इन दो स्वरूपों में परिणत होकर सर्वत्र व्याप्त हो रहा है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, ये तीन भाग अन्तर्य्यामी बन कर केन्द्र में प्रतिष्ठित हैं: एवं अग्नि, सोम - भाग सूत्ररूप में परिणत होकर क्षरग्निीसोममय पिण्ड में प्रतिष्ठित हैं । काप्य ऋषि की पत्नी के शरीर में प्रविष्ट कबन्ध आथर्वणने उद्दालकादि वैज्ञानिकों से इसी अन्तर्य्यामी, सूत्रात्मा का स्वरूप पूँछा था । अन्त में उनको * पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैचदावृत्य चक्षुरमृतच्चमिच्छन् । —उपनिषत् ३४८