Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 611–620
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 611–620
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शतपथब्राह्मण उत्तर देने में समर्थ देखकर स्वयं गन्धर्वने हीं विस्तार से इन दोनों का स्वरूप बतलाया था । अन्त में जनक की सभा में प्रमुख विद्वानों के सम्मुख उद्दालक के प्रश्न करने पर परम वैज्ञानिक भगवान् याज्ञवल्क्यने इन दोनों का विस्तार से निरूपण किया था । इनमें अन्तर्य्यामी का स्वरूप बतलाते हुए याज्ञवल्क्यने कहा था कि, गौतम! ' यः दृथिव्या, अप्सु, अग्नौ, आकाशे, वायौ, आदित्ये, चन्द्रतारके, दिक्षु, विद्युति, स्तनयित्नौ, सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु, वेदेषु सर्वेषु यज्ञेषु सर्वेषु भूतेषु, प्राणे, वाचि, चक्षुषि, श्रोत्रे, मनसि, त्वचि, तेजसि, तमसि, रेतसि, आत्मनि, ( अव्ययात्मनि ), तिष्ठन्, पृथि-व्याः, अद्द्भ्यः, अग्नेः, आकाशात्, वायोः, आदित्यात्, चन्द्रतारकात्, दिग्भ्यः, विद्यतः, स्तनयिनत्नोः, यं पृथिवी ० आर ० न वेद, यस्य पृथिवी शरीरं, आपः शरीरं, ० यः पृथिवी-मन्तरो ॰ यमयति, स ते – अन्तर्य्यामी – अमृतः । ' - शत ० | १४ | ६ | इति । वह सत्रके गर्भ में है । सब का सञ्चालन कर रहा है । वस्तुस्वरूपसत्ता उसी पर निर्भर है । वस्तुस्वरूप-सत्ता का – ‘ अहमस्मि ' ( मै अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हूँ ) इसप्रकार से निर्वचन किया जाता है । यह निर्व— चन उसी अन्तर्य्यामी पर निर्भर है । अतएव भगवान् व्यास ने इस आत्मदेवता को ' अभिमानी ' ( आत्माभि-मानी - ‘ अहमस्मि ' इत्याकारक बोध का अधिष्ठाता ) देवता कहा है । यही हमारे प्रकरण के ५ वें देवता हैं । इत्यभिमानी - देवता - स्वरूपदिग्दर्शनम् ५ षष्ठ देवता हैं - मन्त्र देवता । प्राकृतिक जगत् में भिन्न भिन्न स्वरूप रखने वाले अनन्त प्राणदेवता हैं । ' को हि तद्वेद - यावन्त इमेऽन्तरात्मन् प्राणाः ' ( शत ० ८ | २ | २ | २० ) याज्ञवल्क्य के कथनानुसार केवल श्रध्या-त्मिक जगत् के प्रांणदेवताओं की ही जत्र गणना नहीं की जा सकती, तो फिर ऐसे अनन्त आध्यात्मिक विश्वों को अपने उदर में भुक्त रखने वाले आधिदैविक प्राणदेवताओं के श्रानन्त्य का तो कहना ही क्या है । वास्तव में प्राण-देवता एक है | इसके आनन्त्य का एकमात्र कारण ' छन्द ' का ही विभेद है । इस छन्द का स्वरूप पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया नाचुका है । अतः यहाँ इस विषय में हम अधिक कुछ नहीं कहेंगे । यहाँ हमें केवल यही त्रतलाना है कि, वैज्ञानिककोंनें उन उन प्राणदेवताओं के स्वरूप को उन उन छन्दों के द्वारा पहिचान कर अनु--ष्टुप् ( वर्ण ) बाग्युक्त बृहतीवाक् ( स्वरवाक् ) रूप छन्द के द्वारा उन उन प्राणदेवताओं के स्वरूप को हमारे सम्मुख क्खा | छन्दोमय देवस्वरूपों की समष्टि का नाम हीं - ' मन्त्रसंहिता ' हुआ । प्रत्येक मन्त्र साक्षात्-देवता है । मन्त्र का जो छन्द है, उसी से यह छन्दित है । गायत्रीछन्द से युक्त मन्त्र अग्निदेवमय है | त्रिष्टुप् छन्द से युक्त मन्त्र सात्तात् इन्द्रदेवता है । जगतीछन्द से युक्त मन्त्र साक्षात् आदित्यदेवता ३४६
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प्रथमकाण्ड है | जो मनुष्य इस्व प्राणदेव - रहस्य को त्रिना जाने मन्त्र के ' वर्ण ' ' स्वर ' आदि की उपेक्षा कर देते है, वे छन्दःस्वरूप को नष्ट करते हुए देवस्वरूप को ही अभिभूत कर अपना अनिष्ट करा लेते हैं । इसी अभिप्राय से श्राप्तपुरुषोंनें कहा है –
दुष्टः शब्दः - स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥
कहना यही है कि, छन्द से छन्दित मन्त्र साक्षात् देवता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— ‘ यां वै देवतामृगभ्यनूक्ता, यां यजुः, सैव देवता । सा ऋक् । सा उ देवता - तद्यजुः । - शत ० ७ | ५ | १ | ४ हमारे प्रकरण के यही ६ ठे मन्त्रदेवता हैं । इति- मन्त्रदेवता - स्वरूप दिग्दर्शनम् ६ सातवें हैं आत्मदेवता । यद्यपि हमने अभिमानी देवता को भी श्रात्मदेवता ही कहा है । परन्तु इन सातवें देवताओं को उस आत्मदेवता से पृथक् समझना चाहिए | इस आत्मदेवता का ' जीवात्मारूप ' भूतात्मा से सम्बन्ध है । वैश्वानर भी अग्नि है । तैजस भी अग्नि है । एवं प्राज्ञ भी अग्नि है । इस अग्नित्रयी की समष्टि का नाम हीं ' भूतात्मा ' है । वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ, रूप ईश्वरात्मा ' सर्वभूतान्तरात्मा ' कहलाता है । एवं वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञरूप जीवात्मा ' भूतात्मा ' कहलाता है । अग्नित्रयरूप भूतात्मा संसज्ञजीव हैं । वैश्वा-नर, तैजस —- रूप भूतात्मा अन्तः संज्ञ जीव है । एवं वैश्वानरात्मरूप भूतात्मा असंज्ञजीव हैं । इन तीनों का पूर्व के ( १४ प्रकार के भूतसर्ग के निरूपण में ) विस्तार के साथ निरूपण किया जाचुका है । तीनों हीं आत्मा अग्निमय हैं । ' अग्निः सर्वा देवता: ' के अनुसार अग्नि देवरूप है । अतएव इस श्रात्मा को हम आत्म-देवता कह सकते है । यह श्रात्मदेव ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित है । एवं ब्रह्मदेव इसी अभिमानी देव पर प्रतिष्ठित है । इति - आत्मदेवस्वरूप - दिग्दर्शनम् आठवें ‘ कर्म्मदेवता ' हैं । प्रत्येक कर्म्म में भिन्न भिन्न देवता होते हैं । यद्यपि प्रत्येक कर्म्म में अनेक देवता होते हैं । तथापि जिस कर्म्म में जो देवता प्रधान होता है, उस कर्म्म का देवता वही माना जाता है । ३५०
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शतपथब्राह्मण दर्शेष्टि के प्रधान देवता इन्द्राग्नी हैं । पूर्णमासेष्टि के प्रधानदेवता अग्नीषोम हैं । अतः इन कम्मों के कर्म्म-देवताये ही कहलाते हैं । प्रक्रान्त प्रकरण के ये ही आठवें देवता हैं । इति कर्म्मदेवता - दिग्दर्शनम् उपरतञ्च ेदं अष्टविधं - देवनिरूपणम् जिसप्रकार देवता ( केवल सौरदेवता ) ३३ प्रकार के हैं, एवमेव असुर ६६ प्रकार के हैं । अर्थात् देव-ताओं से तिगुने हैं 1 | ये ६६ आसुर प्राण सूर्य को अपने उदर में रखने वाले आपोमय परमेष्ठी के गर्भ से उत्पन्न होते हैं 1 । सृष्टिकाम - प्रजापति ( पोमय परमेष्ठी प्रजापति ) सृष्टिकामना करते हैं । तदनुकूल तप ( प्राण-व्यापार ) करते हैं । तदनुकूल श्रम ( वाक्व्यापार ) करते हैं । इन सृत्र्यनुवन्धी काम, तपः, श्रम - अनुत्रन्धों से प्रजापति का यशोवीय्यं ( प्रारणभाग ) उत्क्रान्त होजाता है । प्राण ही वस्तु को पवित्र बनाए रखता है । जिस वस्तु से प्राण निकल जाता है, वह सड़ने लगती है । प्राणवायु ही आदानविसर्ग के द्वारा उस वस्तु को पवित्र बनाए रखता है । जब मानवशरीर से प्राणवायु निकल जाता है, तो वह शरीर ( शव ) सड़ने लगता है । यही दशा उस प्रजापति की हुई । प्राण के निकल जाने से वहाँ केवल पानी हीं रह गया । वह प्रजा-पति प्राण के निकल जाने से सूज गया, और सड़ गया । उसी सडान से श्रासुर प्राण उत्पन्न हुआ * । पानी वरुण दैवत्य है । जहाँ प्राणवायु प्रवेश नहीं करता, वहाँ ' यद्वै वातो नाभिवाति, तत् सर्वं वरुणदैवत्यम् ' के अनुसार वरुणदेवता की सत्ता होजाती है । वरुण की शक्ति ' पाश ' है । यह उससे उस • वस्तु का वेष्टन कर लेता । उसी समय उस में सड़ान उत्पन्न होजाती है । अवरुद्ध पानी आसुर है, वारुण है | इसी अभिप्राय से ' वरुण्या वा एता आपो याः स्यन्दमानानां न स्यन्दन्ते ' ( पानियों में वह पानी वरुण्या है, जो कि पानियों में नहीं बहते हैं- शत ० ५। ३४ । १२ ) यह कहा जाता है । अतएव वह पेय है । बहता पानी वायव्य होने से ऐन्द्र है । क्योंकि वायु मे एक चतुर्थांश इन्द्र ( विद्युत् ) रहता है | अतः यही पेय है । कहना यहीं है कि, पारमेष्ट्य पानी का जो भाग प्राणवायु से शून्य है, वह वारुणदैवत्य हो कर असुरसृष्टि का जनक ' बनता है । आासुर प्राण सूर्य्य से पहिले उत्पन्न होता है । एव देवप्राण से तिगुनी संख्या में उत्पन्न होता है । * स - प्रजापतिः, तबा वाचा, तेनात्मना - इदं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च । सोऽश्रा-म्यत्, स तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशोवीर्य्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्य्यम् । तत् प्राणेषु - उत्क्रान्तेषु शरीरं श्वयितुमधियत । ( इत्यादि ) । —बृहदारण्यकोपनिषत् १ । २ । ६ । ३५१
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प्रथमकाण्ड परमेष्ठ्यी में भृगु, और अंगिरा, दो तत्त्वों की सत्ता बतलाई जाती है । एक तीसरा ' त्रिप्राण ' ओर है । धामच्छद वाक्तत्त्व का नाम ही ' अ ' है । यह पारदर्शकता का प्रतिबन्धक है । ग्रा हुए सौर प्राण को पुनरावर्त्तित कर देना इसी त्रिप्राण का काम है । भृगु और अङ्गिगवत् यह तीन नहीं है, अतएव इसे ' न त्रि: ' इस व्युत्पत्ति से ' अत्रि ' कहा जाता है । रजस्वलास्त्री में सौरप्राणविरोधी इसी विप्राण की सत्तारहती है । अतएव रजस्वला को ‘ आत्रेयी ' कहा जाता है । ब्रह्म, तत्र, विट्, तीनों वीर्य्यं सौर - गायत्र, सावित्र, सारस्वत, प्राणों से उत्पन्न होते हैं । अत्रि तीनों का विरोधी है । अतएव आत्रेयी का स्पर्श नहीं करना चाहिए । अस्तु इस अप्राकृत विषय का विवेचन ऋषि स्वयं आगे आने वाले ब्राह्मण में ( ४/५/१३ ) करने वाले हैं | अतः यहाँ इस के लिए अधिक कुछ न कह कर भृगु, और अंगिरा की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । भृगु की आपः, वायु, सोम, ये तीन अवस्था हैं । इन में आप्य वारुण प्राण असुर है । वाय-व्यप्रारण गन्धर्त्र है | सौम्य प्रारण पितर है । पितर, गन्धर्व, असुर, तीनों सृष्टियाँ परमेष्ठी में हीं होतीं हैं | सौम्यप्राण पर ग्रासुर आन्यप्राण निरन्तर आक्रमण किया करता है । परन्तु मध्यस्थ वायुरूप गन्धर्व-प्राण उस आक्रमण से सोम को बचाया करता है । अतएव गन्धवों को ' सोमरक्षक ' बतलाया जाता है । दूसरा है अङ्गिरा इस अङ्गिरा का आदित्य, वायु, अग्नि, तीन रूप से विकास होता है । आदित्य सूर्य्य है । वायु अन्तरिक्ष है | अग्नि पार्थिव है । यह अंगिरा ' प्राण ' है । भृगु ' रयि ' है | प्रश्नोपनिषत् ने भृगु, अंगिरा के लिए रयि, प्राण कहा है । यह प्राणभाग ही उस प्रजापति का उत्क्रान्त यशोवीर्य्य है । इस से देवसृष्टि होती है | रयिभाग से ( रयिरूप भृगु के आापो भाग से ) आसुरी सृष्टि होती है । दोनों प्रजापति की सन्तान हैं । असुर - उत्पत्ति और संख्या, दोनों में देवताओं से बड़े हैं । आसुरप्राण बलवान् है । देवप्राणज्ञान-की प्रधानता से निर्बल है । शरीर का बलवान् होना श्रसुरप्राण का धम्मं है । विद्याबल देववल है | जो बलवान् ( पहलवान ) होते हैं, वे मूर्ख होते हैं । जो विद्वान् होते हैं, वे शरीरबल से शिथिल होते हैं । इसी देवासुर - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर निम्नलिखित निगम वचन हमारे सम्मुख समु-पस्थित हैं-C * १ - देवाश्च वा असुराश्च प्रजापतेद्वयाः पुत्रा श्रासन् । ( ताण्ड्य ना ० १८ । १।२ ) इति । २- तेऽसुरा भूयांसो बलीयांस आसन् । ( ताण्ड्य ब्रा ० १८ । १ । २ ) इति । ३- कनीयस्विन इव वै तर्हि देवा आसन्, भूयस्विनोऽसुराः ( ताण्ड्य ब्रा ० १२।१३ ।३१ ) । * १ - देवता और असुर, परमेष्ठी प्रजापति के ये दो ( जाति के ) पुत्र थे । २- उन दोनों में असुर देवताओं की अपेक्षा बलवान् थे, और संख्या में भी अधिक थे । ३ – देवता संख्या में नगण्य थे, असुर बहुत थे । ३५२
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शतपथब्राह्मण ‘ नवतीर्नत्रविध ’ – ( ६६ प्रकार के ) आमुरप्राण सौर इन्द्रप्राण पर निरन्तर आक्रमण किया करते हैं । परन्तु यह इन्द्रप्राण अपने प्राणदपानत् व्यापार से उन ६६ असुरों को निर्बल करता रहता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रति कहती है-इन्द्रो दधीचो स्थिभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ( ६६ ) । ऋ ० १/८५ १३. मं ० ) ज्ञति । जैसे देवविभाग में मनुष्यदेवता थे, एवमेव असुरविभाग में भी मनुष्य असुर थे । दोनों हीं ऐशियामाइनर में रहने वाले स्वयम्भू मनु की आज्ञा में चलते थे । जैसे देवताओं को त्रेलोक्य मिला था, तथैव इन्हें भी त्रैलोक्या मिला था । क्योंकि ये संख्या में ( प्रकृतिवत् ) देवताओं से अधिक थे, अतएव ब्रह्माने इन्हें अधिक स्थान दिया था । अफ्रीका, अमेरीका, यूरोप, यह त्रैलोक्य आसुरत्रैलोक्य था । असुर म्वभाव से ही महादुष्ट होते थे । अपनी सम्पत्ति के अतिरिक्त देवसम्पत्ति पर भी इन की दृष्टि लगी रहती थी । एशि-यामाइनर में रहने वाले पिता प्रजापति से मिलने के निमित्त ये लोग अफ्रीका के दरों में हो कर देवत्रिलोकी में आया करते थे । अन्त में इसी स्थान के समीप ' जूडिया ' नाम से प्रसिद्ध स्थान में देवता और असुरों में घोर-संग्राम हुत्र था । यों तो ये संग्राम असंख्य थे । परन्तु १२ संग्राम अत्यन्त भयङ्कर हुए थे । वे १२ हों संग्राम ऋग्वेद में ' महासंग्राम ' नाम से प्रसिद्ध हैं । अस्तु, इस विषय का निरूपण किसी आगे के प्रकरण में किया जायगा । अभी केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, परमेष्ठी में सुरप्राण उत्पन्न होता है । उत्पन्न होकर वह हमारे रोदसी - त्रैलोक्य में व्याप्त हो जाता है । वायु में ( पारमेष्ठ्य आपोरूप वायु में ) वह प्राण भरा रहता है । दिव्यभाव को दूषित करना इसका प्रधान धर्म्म है । यह आँखों से नहीं दीखता । ये - नाष्ट्राराक्षस प्राण अन्तरिक्ष में अप्रत्यक्षरूप से वायु में भरे रहते हैं । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है— ‘ तिर इवैतद्यद्रक्षांसि ( ऐ ० २७ | ) । ' अमूलं वा इदमुमयतः परिच्छिन्नं रक्षोऽ-न्तरिक्षमनुचरति ( शत ० ३ । १ । ३ । १३ ) । आज यह यजमान यज्ञ करना चाहता है । यज्ञपात्रों में वही श्रासुरप्राण वायु के द्वारा प्रविष्ट हो रहा है | यह प्राण देवमय यज्ञात्मा का विरोधी है । यदि यह अत्र ( पात्रों में ) रह जायगा, तो यज्ञात्मा का स्वरूप विकृत हो जायगा । अतः इसे निकालना परम आवश्यक है । उसे निकालने का एकमात्र उपाय है - प्रतप-नक्रिया । अग्निर्वै रक्षसामपहन्ता ' ' अग्निर्वै ज्योतिरक्षोहा ' के अनुसार आग्नेय प्राण उस आाप्यवायु-प्रधान आसुर प्राण का नाशक है | सड़ो वस्तु श्रासुर प्राणमय है, उसे आप धूप में रख दीजिए । उसी समय श्रासुर प्राण भाग जायँगे । उन्हीं को कष्ट करने के लिए ' पात्रप्रतपनकम ' किया जाता है । इसी देवासुर-विज्ञान को सामने रखते हुए ' प्रतपनकम ' की उपपत्ति बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' देवा ह वै यज्ञ ं तन्वानाः- तेऽसुररक्षसेभ्य आसङ्गाद् विभयाञ्चकुः । तद्यज्ञमुखा-देवैतन्नाष्ट्रारक्षांस्यतोऽयन्ति ॥३ ॥
प्रकृति में यज्ञ हो रहा है । सौर देवताओं के अग्नीषोमात्मक यज्ञ पर पारमेष्ठ्य त्रासुरप्राण का आक्र-मण हो रहा है । परन्तु सौराग्नि अपने ताप से उनको नष्ट कर यज्ञ को आसुरभावशून्य बना रहा है । उसी ३५३
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प्रथमकाण्ड प्राकृतिक नित्य यज्ञ की प्रतिकृति ( नकल ) यह वैधयज्ञ हैं । यजमान ऋत्विजादि इस यज्ञ के देवता हैं । इन को भय हो रहा है कि, कहीं वायव्य नाष्ट्राप्राण हमारे यज्ञपात्रों में अन्तर्य्याम - सम्बन्ध से प्रविष्ट न हो जायँ । इम भय कोदूरकरने के लिए हो यज्ञोपक्रन में हीं प्रतपनक्रिया के द्वारा उन का निष्काशन कर देते हैं । श्रुति शिक्षा - देती है कि, यदि तुम्हारा शत्रु तुम्हारे ऊपर आक्रमण करे, तो उस की उपेक्षा मत करो । आते ही उसे मार भगाओ । यदि उपेक्षा करोगे, तो वह प्रतिष्ठित हो जायगा । फिर उसे निकालना कठिन हो जायगा । - इति पात्रप्रतपनोपपत्तिः-इति पात्रप्रतपनम् । ६ ७ – अनसो हविगू हणं, गार्हपत्यस्य, आहवनीयस्य वा पश्चात् तत्सादनञ्च अथ प्रति- ' उर्वन्तरिक्षमन्वेमि ' ( १ ० ७ मं ० ) इति । अन्तरिक्षं वा अनु रक्ष-श्वरत्यमूलमुभयतः परिच्छिन्न - यथाऽयं पुरुषोऽमूल उभयतः परिच्छिन्नोऽन्तरिक्षमनु चरति । तद् ब्रह्मणैवैतदन्तरिक्षमभयमनाष्ट्रं कुरुते ॥ ४ ॥
: स वा अनस एव गृह्णीयात् । अनो हवा अग्रे, पश्चेव वा इदं यच्छालं, स यदेवाग्रे-तत् करवाणीति, तस्मादनस एव गृह्णीयात् || ५ ||
भूमा वा अनः । भूमा हि वा अनस्तस्माद् यदा बहु भवति, अनोबाह्यमभू दत्याहुः ।
तद् भूमानमेवैतदुपैति । तस्मादनस एव गृह्णीयात् ॥ ६ ॥
यज्ञो वा अनः । यज्ञो हिं वा अनस्तस्माद् - अनस एव यजूंषि सन्ति, न कौष्ठस्य, न कुम्भ्यै 1 । भस्त्रायै ह स्मर्षयो गृह्णन्ति । तद्वृषीन् प्रति भस्त्रा यजूं प्यासुः । तान्येतांह प्राकृतानि - यज्ञाद्यज्ञ निर्मिमा इति, तस्मादनस एव गृह्णीयात् ॥ ७ ॥
उतो पात्र्यै गृह्णन्ति । अनन्तरायमु तर्हि यजूंषि जपेत् । स्फ्यमु तर्ह्यधस्तादुपोह्य गृह्णीयात् यतो युनजाम ततो विमुञ्चामेति । यतो ह्येव युञ्जन्ति ततो विमुञ्चन्ति || ८ || तस्य वा एतस्यानसोऽग्निरेव धूः । अग्निर्हि वै धूः । अथ य एनदु वहन्ति - अग्नि-दग्धमिवॆषां वहं भवति । अथ यज्जघनेन कस्तम्भी, प्रउगं - वेदिरेवास्य सा । नीड एव हविर्द्धानम् ॥६ ॥
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शतपथब्राह्मण सधुरमभिमृशति - ' धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति तं धूर्व--यं वयं धूर्वामः ' ( १ ० ८ मं ) इति । अग्निर्वा एष धुर्यः, तमेतदत्येष्यन् भवति-हविग्रहीष्यन् । तस्मा एवैतत् निह्नुते । तथो हैतमेषोऽतियन्तमग्निधुर्यो न हिनस्ति । १० ॥ तद्धस्मैतदारुणिराह – ‘ अर्द्ध'मासशी वा अहं सपत्नान् धूर्वामि? - इति । एतद्धस्म स तदभ्याह ॥ ११ ॥
अथ जघनेन कस्तम्भीमीषामभिमृश्य जपति - ' देवानामसि वह्नितमं सस्नतमं पतिमं जुष्टतमं देवहूतमम् ॥ ( १०८ मं ० ) अह्रुतमसि हविर्द्धान, हस्व, मा ह्वाः ' ( १ अ ० ६ मं ० ) इति । अन एवैतदुपस्तौति - ' उपस्तुताद्रातमनसो हविगृह्णानि'-इति । ‘ मा ते यज्ञपतिर्द्वार्षीत् ' ( १० मं ० ) इति । यजमानो वै यज्ञपतिः । तद्य-जमानायैवैतदह्वलामाशास्ते ॥१२ ॥
यथाक्रमते - ' विष्णुस्त्वाक्रमताम् ' ( १ श्र ० ६ मं ० ) इति 1 । यज्ञो वै विष्णुः । स देवेभ्य इमां विक्रान्ति विचक्रमे, यैषामियं विक्रान्तिः । इदमेव प्रथमेन पदेन पस्पार, यथेदमन्तरिक्षं द्वितीयेन, दिवमुत्तमेन । एतामु एवैष एतस्मै विष्णुर्गज्ञो विक्रान्ति विक्रमते ॥१३ ॥
अथ प्र ेक्षते - ' उरु वाताय ' ( १ ० ६ मं ० ) इति । प्राणौ वै वातः, तद् ब्रह्मणै-वैतत्प्राणाय वातायोरुगायं कुरुते ॥ १४ ॥
थापास्यति - ' अपहतं रक्षः ' ( १ श्र ० ६ मं ० ) इति । यद्यत्र किञ्चिदापन्नौं भवति, यद्य नाभ्येव मृशेत्, तन्नाष्ट्रा एवैतद्रक्षांस्यतोऽपहन्ति ॥१५ ॥
श्रथाभिपद्यते — ' यच्छन्तां पञ्च ' ( १ ० ६ मं ० ) इति । पञ्च वा इमा अङ गु-लयः, पाङ ्मक्तो वै यज्ञः । तद्यज्ञमेवैतदत्र दधाति ॥१६ ॥
अथ गृह्णाति – ' देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्या-मग्नये जुष्टं गृह्णामि ' ( १ ० १ मं ० ) इति । सविता वै देवानां प्रसविता । तत्सवि-तृप्रसूत एवैतद् गृह्णाति । अश्विनोर्बाहुभ्यामिति । अश्विनावध्वर्यू । पूष्णो हस्ताभ्या-मिति । पूषा भागदुघः, अशनं पाणिभ्यामुपनिधाता । सत्यं देवाः, अमृतं मनुष्याः, तत्सत्येनैनैतद्गृह्णाति ॥१७ ॥
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प्रथमकाण्ड अथ देवताया आदिशति 1 । सर्वा ह वै देवता अध्वर्यु ं हविर्ग्रहीष्यन्तमुपतिष्ठन्ते-" मम नाम ग्रहीष्यति, मम नाम ग्रहीष्यति ' - इति । ताभ्य एवैतत् सह सतीभ्योऽसमदं करोति || १८ || यद्व व देवताया आदिशति । यावतीभ्यो ह वै देवताभ्यो हवींषि गृह्यन्ते, ऋणम् हैत्र तास्तेन मन्यन्ते - यदस्मै तं कामं समद्ध यैयुः, यत्काम्या गृह्णाति । तस्माद्वै देवताया आदिशति । एवमेव यथापूर्व C. हवींषि गृहात्वा ॥ १६ ॥
अथाभिमृशति – ‘ भूताय त्वा नारातये ' ( १११ मं ० ) इति । तद्यत एव गृह्णाति, तदेवैतत् पुनराप्यायति ॥ २० ॥
अथ प्राङ ्म प्र ेक्षते - ' स्वरभिविख्येषम् ' ( १ ० ११ मं ० ) इति । परिवृतमित्र वा एतदनो भवति । तदस्यैतच्चचुः पाप्मगृहीतमित्र भवति । यज्ञो वै स्वरहर्देवाः सूर्य्यः । तत्स्वरेवैतदतोऽभिविपश्यति ॥ २१ । अथावरोहति — ' हँहन्तां दुर्याः पृथिव्याम् ' ( १ ० ११ मं ० ) इति । गृहा वै दुर्या: । ते हैत ईश्वरो गृहा यजमानस्य - योऽस्यैषोऽध्वर्यु ज्ञेन चरति - तं प्रयन्तमनु प्रच्योतोः, तस्येश्वरः कुलं वित्तोब्धोः । तानेवैतदस्यां पृथिव्यां दृहन्ति । तथा नानुप्रच्य-वन्ते, तथा न विक्षोभन्ते । तस्मादाह दृहन्तां दुर्याः पृथिव्यामिति । अथ प्रैति-' उर्वन्तरिक्षमन्बेमि ' - ( १ ० ११ मं ० ) इति । सोऽसावेव वन्धुः || २२ ॥ स यस्य गार्हपत्ये हवींषि श्रपयन्ति, गार्हपत्ये तस्य पात्राणि संसादयन्ति । जघनेनो तर्हि गार्हपत्यं सादयेत् । यस्याहवनीये हवींषि श्रपयन्ति, ग्राहवनीये तस्य पात्राणि संसाद-यन्ति । जघनेनो तर्ह्याहवनीयं सादयेत् - " पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयामि " ( १०११ मं ० ) इति । मध्यं वै नाभिर्मध्यमभयं तस्मादाह- पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयामीति । “ अदित्याऽ-उपस्थे ” - ( १ अ ० ११ मं ० ) इति । उपस्थे इवैनदभार्षु रिति वा दुर्गं सुगुप्तं गोपायन्ति, तस्मादाह- अदित्या उपस्थ इति । “ अग्ने हव्यं रक्ष " - ( १ ० १४ मं ० ) इति । तदन चैवैतद्धविः परिददाति गुप्त्या अस्यै च पृथिव्यै; तस्मादाह- अग्न हव्यं रक्षति || २३ || इति - प्रथमकाण्डे - प्रथमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणम् ( १।१।२ ) इति- प्रथमकाण्डे – प्रथमपाठके द्वितीयं ब्राह्मणम् ( १।१।२ ) । २ ३५६
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शतपथब्राह्मण ७- शकट से हविद्रव्य का परिग्रहण, एवं गार्हपत्य के, किंवा आहवनीय के पश्चिम भाग में उस हविद्रव्य का स्थापन— ( अनुवाद ) -पात्र - प्रतपनकर्म्म के अनन्तर वह अध्वर्यु ' ' उर्वन्तरिक्षमन्वे मि ' यह मन्त्र बोलता हुआ ( हविग्रहण के लिए शकट के समीप ) जाता है । जिसप्रकार अमूल, एवं दोनों ओर से परिच्छिन्न पुरुष अन्तरिक्ष की ओर विचरण करता है, एवमेव अमूल, एवं दोनों ओर से परि-च्छिन्न राक्षस अन्तरिक्ष को लक्ष्य बना कर ( अन्तरिक्ष में ) विचरते रहते हैं । इसलिए मन्त्र से ही वह अध्वय्यु उस अन्तरिक्ष को भय से रहित, एवं निरुपद्रव करता है ॥ ४ ॥
वह अध्वर्युळे शकट से हविग्रहण करें । शकट ( धान्य में ) पहिले है । अर्थात् खेत से काटा हुआ अन्न सबसे पहिले शकट में हीं प्रतिष्ठित होता है । अनन्तर वह अन्नशाला ( घर ) में आता है । ‘ जो अग्रभाग में है, वहीं करें ' इसी लिए वह अध्वर्यु ' शकट से ही हविर्ग्रहण करै ॥५ ॥
शकट भूमा - ( बहुत्व ) रूप है । शकट अवश्य ही भूमा है । अतएव जब अन्न अधिक होता है, तब ' यह अन्न व शकट से ही लेजाने योग्य है ' यह कहा करते हैं । ( ऐसे शकट से हविर्ग्रहण करता हुआ अध्वर्यु ) भूमाभाव की ओर ही जाता है । इस ( भूमाप्राप्ति के लिए ) शकट से ही हविर्ग्रहण करना चाहिए ॥ ६ ॥
यह शकट यज्ञ ( स्वरूप ) है । शकट अवश्य ही यज्ञ है । इसीलिए ( यज्ञप्रतिपादक ) यजु-र्मन्त्र शकट - सम्बन्धी ही हैं । कोटगत ' धानसम्बन्धी, कुम्भीगत र धानसम्बन्धी यजुर्मन्त्र नहीं हैं । कितने ही याज्ञिक भस्त्रा से हविग्रण करते हैं । उन याज्ञिकों के प्रति भस्त्रा से हविर्ग्रहण १ - हजारों मन अन्न भरने के लिए कृषकगण अपने घरों में मिट्टी का अथवा तृणविशेष का स्थान बनाया करते हैं । उसमें अन्नं भरकर उस स्थान का ऊपर से मुख अवरुद्ध कर दिया जाता है । इसमें रक्खा हुआ अन्न वर्षो नहीं बिगड़ता । इसी को ग्राम्यभाषा में ' खलियान ' कहा जाता है । इसीको वैदिकपरिभाषा में- ' कौष्ठ ' ( कोठा ) कहा जाता है । २ - गृहस्थी एक वर्ष के लिए अन्नसंग्रह ( क्रयद्वारा ) कर लेते हैं । एवं उसमें रक्षा ( राख - भस्म ) मिला मिट्टी के पात्रों में भरकर रख देते हैं । वे पात्र ' झाल - मटकी - पातली ' आदि विविध प्रकार के हैं । इन्हीं पात्रों के लिए यहाँ ' कुम्भी ' शब्द प्रयुक्त हुआ 1 ३ - जो बडा गृहस्थी होता है, उसे अधिक अन्न संगृहीत रखना पड़ता है । वह अपने घरों में नियत स्थान पर मिट्टी का एक स्थिर स्थान बनाता है । उसमें अन्न भर देता है । वही स्थान लोकभाषा में ' बुखारी ' नाम से प्रसिद्ध है । उसीके लिए यहां ' भस्त्रा ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ३५७
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प्रथमकाण्ड करने के लिए मन्त्र होंगे, परन्तु आज तो वे प्राकृत होगए हैं । अर्थात् आज भस्त्रा - सम्बन्धी मन्त्र अनुपलब्ध हैं | ' हम यज्ञ का निर्माण करें ' अतः अनस से ही हबिग्रहण करना चाहिए । ( क्योंकि यज्ञरूप मन्त्रपूत शकट वास्तव में यज्ञरूप है ) ॥ ७ ॥
कहाँ से हबि लेना चाहिए १, इसका निर्णय हो चुका । अत्र किससे लेना चाहिए?, इसका निर्णय करते हैं - याज्ञिक पात्री ' के द्वारा शकट से हविग्रहण करते हैं ॥ जिस समय अध्वर्यु पात्री से हविर्ग्रहण करै, उसके ) अव्यहितोत्तरकाल में हीं वह अध्य्युं यजुम्र्म्मन्त्र बोले, ( हविर्य-हण करते समय वह अध्वर्यु ) ' स्फ्य ' को पात्री के नीचे लगा कर ही ' यतो युनजाम ततो-विमुञ्चाम ' यह मन्त्र बोलता हुआ हविग्रहण करै, जिसलिए कि ऋत्विक् हवि का योग करते ’ हैं, इसीलिए इस हवि को शकट से छुड़वाते हैं ॥ ८ ॥
इस शकटरूप यज्ञ का अग्नि ही ' धू ' है । ' ' धू ' है । जो ( वृषभ ) इसका बहन करते हैं, ( उनका वह वहनस्थान ) अग्नि से जले हुए के समान होजाता है । " कस्तम्भी के पश्चिम भाग जो ( पीछे की ओर से चौड़ा आगे की ओर से सकड़ा ' ' प्रउग ' भाग है, वह इस यज्ञ-रूप शकट को वेदि है | एवं ( अन्न का प्रतिष्ठा रूप ) ' ' नीड ' भाग हो हविर्द्धा है । ( अनस वास्तव में यज्ञरूप है, - - इस निरूपण से यहो बतलाया गया है ॥६ ॥
६. ५ ( हविग्रहरण के लिए शकट के समीप जाता हुआ वह अध्वर्यु सबसे पहिले ) ‘ धूरसि ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ उस ' धू ' भाग का स्पर्श करता है । ( शकट के अग्र प्रदेश १ - अन्न ग्रहण करने के लिए एक हस्ताकृति का काष्ठपात्र होता है । इसे ही ' पात्री ' कहा है । २ — खांडे की आकृति का एक काष्ठपात्र होता है, इसे ही ' स्पय ' कहा जाता है । पात्री में लिया हुआ अन्न भूमि पर न गिरे, इसके लिए पात्री के नीचे इसे लगाकर तब पात्री से हविग्रहण किया जाता है | ३ – शकट — वहन करने वाले वृषभों के कँधे जल जाते हैं । इनके कंधों पर जूड़ा रक्खा जाता है 1 इस जूड़े के लिए ही यहाँ ' धू ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ४- शकट से जब बैल पृथक कर दिए जाते हैं, शकट के अग्रभाग में लगे हुए दो काष्ठदण्डों के आधार पर उस शकट को भूमिपर खड़ा कर दिया जाता है । उनके श्राश्रय से वह शकट भूमि से अधर रहता है । यदि उसको हटा दिया जाता है, तो शकट का अग्रभाग भूमि पर संलग्न हो जाता है, इन दोनों को ही वैदिक परिभाषा में ' कस्तम्भी कहा जाता है । ५-६ - कस्तम्भी से पश्चिम भाग का सम्पूर्ण शकट प्रदेश ' प्रउग ' है । यह ' प्रउग ' आगे से सकड़ा होता है, पीछे से चौड़ा होता । इसके आगे के संकुचित भाग पर शकट चलाने वाला बैठता है । पीछे अन्न भरा रहता है । प्रउग के जिस स्थान पर अन्न भरा रहता है, उसे ही ' नीड़ ' कहा जाता है | ३५८