Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 71–80
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 71–80
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शतपथ - प्रथमखण्ड प्राकृत तत्त्वात्मक – नित्य - वेद का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उन पांचों प्राकृत - वेदविवत्त में से सर्वान्त के – ‘ यज्ञमात्रिक ' नामक पार्थिव वेदतत्त्व के साथ ही हम पार्थिव - मानबों का विशेष सम्बन्ध है । अतएव मानवीय - शब्दात्मक वेदशास्त्रने प्रमुखरूप से इस यज्ञमात्रिक - पार्थिववेद को आधार बना कर ही तत्त्ववेद की स्वरूप - महिमा का यशोवर्णन किया है । अतएव चान्द्र - सौर - पारमेष्ठ्य - स्वायम्भुव - नामक इतर चारों ' वेदविवत्तों को तटस्थ मानते हुए हम मन्त्रब्राह्मणात्मक - शब्दात्मक - वेदशास्त्र के सम्बन्ध में सर्वान्त के पार्थिव-वेद को ही प्रधानरूपेण उपास्य मानेंगे । ‘ ‘ पार्थिववेद ' का पृथिवी से ही प्रधान सम्बन्ध है । और यह पृथिवी - ' भू: ' - तथा - ' पृथिवी ' रूपेण द्विधा विभक्ता है । पिण्डपृथिवी का नाम ' भू: ' है, एवं मण्डलपृथिवी का नाम - ' पृथिवी ' है । ' भूः ' नाम की ' पृथिवी पर ' हम हैं, एवं ' पृथिवी ' नामकी - ' पृथिवी के गर्भ में ' हम हैं । पृष्ठ हमारा ' आधारात्मक ' श्राधार है, एवं मण्डल हमारा - ' आवपनात्मक ' आधार है । भूपिण्ड को केन्द्र बना कर बड़ी दूर पर्य्यन्त अपने प्राणमण्डल से व्याप्ता पृथिवी ही हमारा सर्वतः - श्राधारात्मक आवपन है । मण्डलात्मिका यह पृथिवी अपनी मण्डलसीमा से सूर्य्यप रथ से भी ऊपर तक व्याप्त है, ( जिसके पोमय पुष्करद्वीप में पुराण ने सूर्य की सत्ता मानी है ), दूसरे शब्दों में पार्थिवमण्डलसाम सूर्य्यात्मक हिरण्मय रथ का भी क्यों कि तरण कर जाता है, अतएव पार्थिव साम - ' रथन्तरसाम ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । उक्ता राथन्तरी मण्डलपृथिवी में ३३ अहर्गण हैं, जिनसे पार्थिव - ' वषट्कार मण्डल ' का स्वरूप-सम्पन्न होता है । इस वसट्कारमण्डल के २१ वें ग्रहणपर्य्यन्त ( जहाँ पर कि सूर्य्य प्रतिष्ठित माने गए हैं X ) तो पार्थिव - प्राणाग्नि का साम्राज्य है, एवं २२ से ३३ वें ग्रहण पर्य्यन्त पार्थिव — प्राप्यसोम का साम्राज्य है, जोकि ग्राम्य - सोमात्मक पार्थिवसमुद्र ' अर्णव समुद्र ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के सम्बन्ध से त्रयस्त्रिंश--त्स्तोमान्ता यह सौम्या - या - पृथिवी - ' सागराम्बरा ' नाम से प्रसिद्ध हुई है, जबकि अग्निप्रधाना एकविंश-स्तोमान्ता वही पृथिवी- ' यज्ञिया- उख्यापृथिवी ' कहलाई है । आग्नेयी उन्यापृथिवी, तथा सौम्या सागराम्बरापृथिवी, दोनों की समष्टि का नाम हीं अग्नीषोमात्मिका - मण्डलात्मिका- ' महिमापृथिवी ' ( मही ) है, जिसके केन्द्र में यह भूपिण्ड प्रतिष्ठित है, जिस पर हम चल फिर रहे हैं । इस पार्थिवसंस्थान को अवधान-पूर्वक लक्ष्य बना कर ही हमें पार्थिववेद के स्वरूप - दर्शन में प्रवृत्त होना चाहिए । भूपिण्ड से संलग्ना पृथिवी ( भूमण्डल ) के २१- ३३ भेद से दो प्रमुख विवर्त्त हैं, जो क्रमशः आग्नेय, और सौम्य हैं । २१ अहर्गणपर्यन्त व्याप्त पार्थिवप्राणाग्नि के है इन तीन स्तोम--संस्थानों के भेद से अग्नि - वायु - आदित्य, ये तीन भेद हो जाते हैं, एवं २१ से ३३ पर्य्यन्त व्याप्त पार्थिव प्राणसोम के उज्ज्ज्ज्ये दो भेद होजाते हैं । इन तीन पार्थिवप्राणाग्नियों के, तथा पार्थिव दो सोमों के अनुबन्ध से से ही पार्थिववेद क्रमशः - ' ऋक् - ' यजुः -- ३ साम- अथर्वाङ्गिरा - घोराङ्गिरा -- इन पाँच वेदभावों में परिणत होरहा है । अथर्वाङ्गिरा, घोराङ्गिरा, दोनों मिल कर एक तत्त्व है, यही चतुर्थ, सोमात्मक ' अथर्ववेद ' * सौ वाऽयादित्य एष रथः ( शत ० ६ | ४ | १ | १५८ ) । X - एकविंशो वा इत आदित्य: ( शत ० ६ ७ ११२ | ) ६७
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श्रात्मनिवेदन है, जिसका अन्नादरूपा अग्नित्रयी - लक्षणा वेदत्रयी में अन्तर्भाव मान लिया गया है | अन्नात्मक सोम जत्र अन्नादात्मक अग्नि से समन्वित होजाता है, तो अन्नादरूप ' अत्ता ' का व्यवहार ही शेष रह जाता है * । अतएव चार वेदों के स्थान में - ' त्रयीवेद ' ही प्रसिद्ध होगया है । श्रग्नीषोमात्मक इस पार्थिव - यज्ञमात्रिकवेद का ही हमारे शब्दात्मक वेदग्रन्थ में स्वरूप - विश्लेषण हुआ है । पार्थिव अग्निवेद ही ऋग्वेद है । ऋग्वेदग्रन्थ इसी के आधार पर सृष्टिविद्या का निरूपण कर रहा है । अन्तरिक्ष्य वायुवेद ही यजुर्वेद है । यजुर्वेदग्रन्थ ' इसी के आधार पर सृष्टि की स्वरूप - व्याख्या कर रहा है | दिव्य आदित्यवेद ही सामवेद है । सामवेदग्रन्थ इसी के आधार पर विश्वमहिमा का यशोगान कर रहा है । एवं चतुर्थलोकीय चान्द्रवेद ही अथर्ववेद है । अथर्ववेदग्रन्थ इसी के आधार पर सृष्टि की क्रमव्याख्या कर रहा है । यों चारों वेदग्रन्थ प्रकृतिसिद्ध - नित्य- चारों तत्त्ववेदों को क्रमशः उपक्रमभूमि बनाते हुए सृष्टिमूलक विज्ञान का शुद्धविज्ञानभाषा में, स्तुतिपरक - विज्ञानभाषा में, एवं इतिहासपरक - विज्ञानभाषा में निरूपण कर रहे हैं । त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्न ‘ अग्नि ' रूप पार्थिव ( पार्थिव ) अग्नि भूपृष्ठनिवासी हम भौम - प्राणियों के सन्निकट है, सम्मुखवत् ही अवस्थित है, अतएव मानो यह ' पुरो - हित ' ही है । ऋग्वेदग्रन्थ इसी को सृष्टिविज्ञान में प्रमुखता दे रहा है | अतएव उसका ' अग्निमीले पुरोहितम् ' से ही उपक्रम हुआ है । पञ्चदशस्तोमावच्छिन्न ‘ वायु ' रूप पार्थिव ( आन्तरिक्ष्य ) अग्नि अपनी क्रियाशक्ति से हम पार्थिव प्राणियों के व्रतात्मक – कर्म्म का संरक्षक - प्रवर्त्तक है । अतएव इस आन्तरिक्ष्य - - वायव्य - यजुर्वेद को - ' व्रतपति ' कहा गया है । तद्वेदप्रतिपादक शब्दात्मक यजुर्वेद का उपक्रम - अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि ' से ही हुआ ÷ । एकविंशस्तोमावच्छिन्न ' आदित्य ' रूप पार्थिव ( दिव्य ) अग्नि हम भौम प्राणियों की अपेक्षा कहीं विदूर है | अतएव उसका हमें अत्र भूलोके प्रयासपूर्वक आह्वान ही करना पड़ता है । सामवेदग्रन्थ विदूरस्थ इसी आदित्याग्नि ' को क्योंकि प्रमुख मानता है, अतएव तद्ग्रन्थ का उपक्रम - ' अग्न आयाहि वीतये ' इस ' आयाहि ' पद से ही हुआ है । चौथा सौम्य अथर्वतत्त्व त्रिः सन्तकात्मक है । अतएव तत्प्रतिपादक अथर्ववेद ग्रन्थ का उपक्रम -'ये त्रिषप्ताः ० ' इत्यादि मन्त्र से हुआ है । प्रकृतिसिद्ध नित्य ऋगग्नि एकविंश पर्वात्मक है । यजुर्वायु एकशत पर्वात्मक है, सामादित्य सहस्र पर्वात्मक है, एवं सोम पर्व नवपर्वात्मक है । अतएव तत्तद्ग्रन्थों की शब्दात्मिका वेदशाखाएँ भी क्रमशः * तद्यदा - उभयं समागच्छति, तवाख्यायते, नाद्यम् । स वै यः अग्निरेव सः । - शत ० ब्रा ० १० | ६ | २ | ४ | स अत्ता, ÷ ' इषे त्वोर्जेत्त्वा ० ' इत्यादि सुप्रसिद्ध मन्त्र सान्नाय्यपरक ही माना गया है । वस्तुतः यजुर्वेद का उप-क्रम - ' अग्ने व्रतपते ' इसी मन्त्र से हुआ है । अतएव तद्व्याख्याभूत प्रस्तुत ' शतपथब्राह्मण ग्रन्थ ' का उपक्रम व्रतोपायनकर्म्मसाधक - ' अग्ने व्रतपते ० ' इत्यादि मन्त्र से ही हुआ है । ६८
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शतपथ - प्रथमखण्ड २१-१०१-१०००–६ इन विवर्त्त भावों में हीं ऋषिप्रज्ञा के द्वारा उपनिबद्ध हुई हैं -- ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या ' सिद्धान्तानुसार *, जिस इस संख्यासम्पदनुगत रहस्य का अत्र स्पष्टीकरण सम्भव नहीं है । तदर्थं तो उपनित्रद्ध ( एवं प्रकाशित ) उपनिषद्भूमिकाग्रन्थ ही द्रष्टव्य है । अग्नित्रयी, और सोम, इन चारों अग्नि - सोम - विवर्त्तो में उक्थ - अर्क - अशीति - निबन्धन - आत्म प्राण - पशु - भाव समन्वित आत्मा - पदं - पुनः पदम् रूप तीन तीन विवर्त्त होजाते हैं । इन तीनों में उक्था-त्मक आत्मविवर्त्त ' ' मूलविवर्त्त ' कहलाया है, एवं अर्कात्मक - प्राणविवर्त्त ', तथा अशीतिरूप पशुविवर्त्त ', इन दोनों की समष्टि - ‘ तूल विवत्त " कहलाई है । मूलवित्र ' ' शक्तिमान् ' है, एवं तुलविवर्त्त इस शक्तिमान् का शक्तिप्रसार विवर्त्त ' है, किंवा शक्तिविवर्त्त है । ६-१५-२१-३३- इन चारों स्तोमों से अनुप्राणित पार्थिव-विवर्त्तानुगत पृथिवी अन्तरिक्ष - द्यौ -- आपः ( दिशः ) इन चार लोकों में मूलरूपेण प्रतिष्ठित ऋङ्मय-अग्नि, यजुर्म्मय वायु, साममय आदित्य, अथर्वमय सोम, ये ‘ वेदात्मा ' प्रतिष्ठित हैं । ये ही चारों पार्थिव-देवसत्यात्मक मूलरूप क्रमशः विराट् - हिरण्यगर्भ - सर्बज्ञ - महद्ब्रह्म - इन नामों से प्रसिद्ध हैं । इन चारों की तूलात्मिका शक्तियाँ स्व - स्व - स्तोमलोकों से अर्करूपेण निकल कर सम्पूर्ण पार्थिवब्रह्माण्ड में पारस्परिक तातूनप्त्रभाव से परिव्याप्त हैं ।. मूल वेदचतुष्टयी को शक्तिप्रसाररूपा यह तूलवेदचतुष्टयी क्रमशः विराडनुगत कर्म्मशक्तिवेद, हिरण्यगर्भानुगत कर्म्मज्ञानसमन्वित शक्तिवेद, सर्वज्ञानुगत ज्ञानशक्तिवेद, महद्ब्रह्मा-नुगत – उमाहैमवती शक्तिरूप - चिच्छक्तिवेद, इन नामों से उपस्तुत हैं । मूलवेदचतुष्टयी के पूर्वोक्त - शाखा-' भेदानुपात से ही इस शक्तिवेदचतुष्टयीरूपा तूलवेदचतुष्टयी के शक्तिशाखा - भेदविवर्त्त हैं । मूल वेदचतुष्टयी-ब्रह्मवेद है, एवं तूलवेदचतुष्टयी ब्राह्मणबेद है । मूल का विस्तार ही तूलवेद है । शक्तिमान् का विस्तार ही शक्ति है | शक्तिमान् - वेद का विस्ताररूप शक्तिवेद मानो उस मूल की महिमा - विस्तारात्मिका व्याख्या ही है । मूलब्रह्मवेद ही ऋषिप्राणात्मक मन्त्रवेद है, एवं तुलब्राह्मणवेद ही ब्राह्मणवेद है, और यही नित्यसिद्ध - ' अपौरु-षेय - तत्त्वात्मक - मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेद है, जिस इस नित्य - अपौरुषेय - मन्त्रब्राह्मणात्मक वेद के मूल - तूल -संहिता – शाखादि - नित्य- प्राकृतिक - विवत्तों के आधार पर ही, ठीक तदनुपात से ही ' शब्दात्मक मन्त्रत्राह्मणण-त्मक - पौरुषेयवेद ' उपनिबद्ध हुआ है । सचमुच शब्दात्मक मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र ही सम्पूर्ण विश्व में एक वैसा शास्त्र है जिसका मूलतत्त्व के आधार पर उसी अनुपात से संकलन हुआ है । ऐसी अनुरूपता और किसी भी शब्दात्मक - लौकिक - प्रन्थ में नहीं है । अतएव शब्दात्मक वेदशास्त्र पौरुषेय बनता हुआ भी अपौ-रुषेयकोटि में हीं आगया है, जिस इस तथ्य का तत्त्वात्मक अर्थ, तथा तदभिन्न शब्द के रहस्यपूर्ण उस औत्पत्तिक – सम्बन्ध से ही समन्वय है, जिसका अत्र आत्मनिवेदन में स्पष्टीकरण सम्भव नहीं है । प्रकृत में तालिकामात्र के माध्यम से मूलतूल वेदात्मक - मन्त्रब्राह्मणात्मक - तत्त्वात्मक - नित्य - कूटस्थ - अपौरुषेय - वेद का संस्म-रणमात्र ही कर लिया जाता है । * -एकविंशतिधा वाहवृच्यम् । एकशतमध्वर्यु शाखा । सहस्रवर्त्मा सामवेदः । नवथाथर्व्वणो वेदः । - महाभाष्ये ६६
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मन्त्रब्राह्मणात्मकः नित्यः-अपौरुषेयवेदः श्रात्मनिवेदन १ — त्रयस्त्रिंशस्तोमः ( ३३ ) — श्रापः - दिशः - सोमः - महद्ब्रह्म - अथर्ववेदात्मा २ – एकविंशस्तोमः ( २१ ) — द्यौः आदित्यः - सर्वज्ञः सामवेदात्मा ३ – पञ्चदशस्तोमः ( १५ ) — अन्तरिक्षम् -- वायुः - हिरण्यगर्भः - यजुर्वेदात्मा ४ त्रिवृत्स्तोमः ( ६ ) —पृथित्री —— अग्निः - विराट् --ऋग्वेदात्मा भूपिण्ड: १ - अथर्वः - मूल वेदः महद्ब्रह्मात्मा – ६ शाखाविभक्तः २ – साम: - मूल वेदः - सर्वज्ञात्मा - १००० शाखाविभक्तः ३ – यजुः - मूलवेदः - हिरण्यगर्भात्मा – १०१ शाखाविभक्तः - ऋष - मूलवेदः - विराडात्मा - २१ शाखाविभक्तः ** मूलवेष्ट १ - चिच्छक्तिवेदः - आत्मवेदमहिमा –६ विभक्तः प्राप्यः ( ३३ ) २ — ज्ञानशक्तिवेदः - सामवेदमहिमा - १००० विभक्त: -दिव्य: ' ( २१ ) ३ — उभयशक्तिवेदः - यजुर्वेदमहिमा – १०१ विभक्तः श्रान्तरिक्ष्यः ( १५ ) -४ - कर्म्मशक्ति वेद ऋग्वेदमहिमा - २१ विभक्तः पार्थिवः “ मन्त्र - ब्राह्माणयोर्वेदनामधेयम् - इत्याहुराचार्य्याः ” ( ह ) ७० " ब्रह्मवेद: " तूलवेदचतुष्टय " ब्राह्मण वेद: "
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शतपथ - प्रथमखण्ड “ औत्पत्तिकस्तु · शब्दस्यार्थेन सन्बन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यक्तिरेकश्चार्थेऽनुपलब्धे तत्प्र-माणं बादरायस्यानपेक्षत्वात् ' ( पूर्वमीमांसासूत्र १५ 1 ) सिद्धान्तानुसार अर्थ ( तत्त्व ), और शब्द का औत्पत्तिक – सम्बन्ध है, सहजसम्बन्ध है, नित्य सम्बन्ध है । इसी आधार पर व्याकरणशास्त्र का ' शब्दनित्य-त्त्वसिद्धान्त ' सुव्यवस्थित बना है । ' तत्त्वानुगतशब्द ' ही ' वेदशास्त्र ' है, जो तत्त्व से अभिन्न है । लोक-व्यत्रहारानुगत शब्द केवल ' साङ्केतिक - शब्द ' हैं, जिह्न - ' यदृच्छाशब्द ' कहा गया है । उदाहरण के लिए वैदिक ' हृदय ' शब्द, तथा प्रतीच्यभाषा के - ' सेन्टर ' शब्द को ही लक्ष्य बनाइए । वस्तु के केन्द्र में रहने वाला अन्तर्य्यामी सत्यतत्त्व स्वयं ' हृदय ' मूर्त्ति है । ब्रह्माक्षरानुगत स्थितितत्त्व, विष्णवक्षगनुगत आगतितत्त्व, एव इन्द्राक्षरानुगत गतितत्त्व, इन तीनों तत्त्वों की समन्वितावस्था का ही नाम ही हृदयरूप अन्तर्यामी ' है । विष्णु से अनुप्राणिता श्रादानशक्ति से ही वस्तुस्वरूप रक्षा के लिए अन्य पदार्थों के प्रवर्ग्य का आहरण-( श्रानयन - श्रागमन ) होता है । अतएव हरणार्थक ' हृञ् ' धातु के ' ह ' अक्षर को आदानशक्तिरूप विष्णु का वाचक मान लिया गया है । विष्णु के द्वारा श्रागत वस्तु के भोगानन्तर प्रवर्ग्य बने हुए वस्तुगत भाग को खण्ड - खण्ड - रूप में परिणत करते रहने वाली विसर्गशक्ति का ही नाम - ' इन्द्र ' है । अतएव श्रवखण्डना-रमक - - ' दो ' धातु के ' द ' कार अक्षर को ' इन्द्र ' का वाचक मान लिया गया है । आादान - विसर्ग - रूपा श्रागति-गति - रूपा विष्णु - इन्द्र - नाम की शक्तियी का जिस स्थितिभावात्मक - प्रतिष्ठात्मक - ब्रह्मतत्त्व ( ब्रह्माक्षर ) से नियमन - व्यवस्थापन होता रहता है, उसी नियमन - शक्ति के लिए ' यम् ' शब्द उपात्त हुआ है । इसप्रकार आगति ( विष्णु ) -गति - ( इन्द्र ) -स्थिति ( ब्रह्मा ), इन तीनों की समष्टिरूप अन्तर्य्यामी सत्य की इन तीन शक्तियों का ही क्रमशः ' हृ - द - यम् ' इन तीन शब्दाक्षरों से अनुरूपभाव से संग्रह होरहा है । हृदया-स्मक - अन्तर्य्यामी सत्यतत्त्व का वाचक स्वत: ही - ' हृदयम् ' शब्द बन रहा है । कदापि यह शब्द मानव की लोकबुद्धि से कुछ भी तो सम्पर्क नहीं रख रहा । अपितु जैसे हृदयात्मक - सत्य अन्तर्यामी स्वतः सिद्ध तत्त्व है, तथैव तवाचक परावाङ मय - ' हृदयम् ' शब्द भी स्वतः सिद्ध- नित्य- शब्द ही है । इसी आधार पर ' सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे ' यह सिद्धान्त व्यवस्थित हुआ है । जिस हृदयशक्ति, किंवा केन्द्रशक्ति के लिए प्रतीच्यभाषा में - ' सेन्टर ' ( Center ) शब्द सङ्क— तित है, क्या इस साङ्केतिक शब्द की, एवं तदक्षरों की केन्द्रतत्त्व के साथ कोई अनुरूपता है? । नहीं । क्यों? । इसलिए कि ये लौकिक- वैखरी - शब्द यदृच्छात्मक काल्पनिक - सङ्कतमात्र हैं । निश्चित है कि, यदि केन्द्र-शक्ति से साथ - ‘ वाटर ' ( Water ) शब्द का सङ्केत कर दिया जाता, एवं- अप्तत्त्व के साथ ‘ सेन्टर ’ ( Center ) शब्द का संकेत कर दिया जाता, तो व्यवहार ऐसा ही होने लग पड़ता । किन्तु सुरभारती के मौलिक, अतएव – ' संस्कृत ' ( सुसंस्कृत ) शब्दों में, तथा - ' छन्दोभ्यस्ता ' नाम से प्रसिद्धा वेदभाषा के मौलिक छन्दः शब्दों में कदापि मानवीय काल्पनिक संकेतों का प्रवेश सम्भव ही नहीं है । " यदाप्नोत् तस्मात् -श्रपः - यवृणोत् - तस्मात् - त्राः ( वारिं ) - यदद्भिः तस्मादग्निः - यदै - ध - तस्मात् इन्द्रः ” -इत्यादिरूपेण इस दिव्या-भाषा के यच्चयावत् शब्द तत्तत् -- तत्त्वों के अनुरूप - स्वत: ही अभिव्यक्त हुए हैं । अतएव इन सुसस्कृत--तत्त्वानुरूप शब्दों का मानवीय कल्पना से कोई सम्बन्ध नहीं माना जासकता । यही अर्थ, और शब्द की नित्यता है । यही दोनों का औत्पत्तिक - सम्बन्ध है, जबकि व्यावहारिकी लोकभाषाओं के लौकिक शब्द ' उत्पन्न - सृष्ट ' ही माने गए हैं । अर्थ को सामने देखकर अपनी कल्पना से व्यवहारमात्र के लिए उनका कैसे भी वर्णाक्षर ७१
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आत्मनिवेदन से कुछ भी नामकारण कर लेना हीं - यदृच्छात्मक काल्पनिक - लौकिक - शब्दों का स्वरूपेतिवृत्त है, जिन इन लोकिक – शब्दों का तत्त्वार्थों की अनुरूपता से यत् किञ्चित् भी सम्बन्ध नहीं है । यह सर्वात्मना संस्मरणीय, अतएव अविस्मरणीय ही है कि - छन्दोभ्यस्ता ( वेदभाषा ) के समतुलन में तो हम सुरभारती नाम की - ' संस्कृतभाषा ' को भी ' लौकिक भाषा ' ही कहेंगे । क्योंकि पारस्परिक -- यदृच्छा-त्मक — सङ्क ेतभावात्मक -- काल्पनिक - पर्य्याय सम्बन्धों के अनुबन्ध से संस्कृतभाषा भी यदृच्छात्मिका चनती हुई तत्त्वार्थ- समन्वय की अनुरूपता से विगत तीन सहस्र वर्षों से अपने मौलिक अनुरूप भावों से परा: परावता ही बन गई है | अवश्य ही त्रिसहस्रवर्षावधि में उत्पन्न होने वाले अद्वितीय बुद्धिनिष्ठ आचार्य पाणिनि के द्वारा संस्कृतभाषा का धातु - प्रकृति - प्रत्यय - उपसर्ग - निपातादि की मर्य्यादात्रों के माध्यम से अद्भुत संकलन हुआ है, जो कि पाणिनीयशास्त्र ' व्याकरणशास्त्र ' नाम से प्रसिद्ध है । किन्तु इस शब्दसंग्रह में उस तत्त्वनिर्वचन प्रणाली का सन्निवेश नहीं होसका है आचार्य पाणिनि के द्वारा, जिस तत्त्वसिद्ध - निर्वचन से ही अर्थ से साथ शब्द का अनुरूप सम्बन्ध समन्वित हुआ करता है । यह पुरुषार्थ हुआ है निरुक्तशास्त्र के द्वारा, जिसने व्याकरणशास्त्र के निबंचनशैली से पराःपरावतः बने रह जाने के कारण ही सम्भवत: -- व्याकरणस्य -- अकात्र्म्यं मन्यामहे ’ यह घोषणा कर दी है । निरुक्तशास्त्र में महाभाग शाकटायन का ही प्रमुख स्थान माना जायगा, जिह्नोंनें अपने सुप्रसिद्ध-' बृहद्द बताग्रन्थ ' में विशुद्धा श्रार्षनिर्वचनशैली को ही प्रमुख माना है । वेदार्थजिज्ञासुओं से हम आग्रह करेंगे कि वेदार्थसमन्वय में प्रवृत्त होने से पूर्व वे एकबार ' बृहद्देवताग्रन्थ ' को अवश्य ही अपना उपास्य बनालें, जिसका एरिष्कृत -- प्रकाशन हुआ है विदेशों में हीं, जिस इस घटना से वेदभक्त - विद्वानों को लज्जा से अवनत-शिरस्क ही बन जाना चाहिए । रही बात या स्कनिरुक्त की, सो तत्सम्बन्ध में विस्तारभिया श्रत्र कुछ भी निवे-दन नहीं किया जासकता । हमारी धारणा है कि, ' यास्क ' के नाम किसी अर्वाचीन संस्कृतज्ञ - विद्वान्नें हीं इस ग्रन्थ का निर्माण कर दिया होगा, जैसा कि नाम -- समन्वयप्रकार तीन सहस्र वर्षों के सांस्कृतिक -- अधःपतन काल में पर्याप्तरूपेण प्रक्रान्त रहा है । यह तो ' यास्क ' मुनि के नाम समावेश की ही बात है । अकाण्ड-ताण्डव करने वाले काल्पनिक विद्वानोंनें तो ' कलिसन्तरणोपनिषत् ' ' रामतापनीयोपनिपत् ' - ' अल्लोपनिषत्'-. दे नवीन उपनिषत् तक बना डालें हैं । तथैव च ब्रह्मा शिव दुर्गा आदि- - प्राणदेवताओं के नामच्छल से अनेक काल्पनिक शब्दभार उपनिबद्ध कर दिए हैं । प्रचलित उस ' यास्कनिरुक्त ' का अनुरञ्चन से अधिक कुछ भी महत्त्व नहीं है, जिसके -- ‘ अपि वा उभयविधाः स्युः ' इत्यादि मूलक संदिग्ध निर्णय कदापि वैदिक - तत्त्वार्थसम-न्वय में उपयुक्त नहीं माने जासकते । तदर्थं तो स्वयं -- ब्राह्मणग्रन्थों की निर्वचनशैली ही प्रमुखरूपेण शरणी-करणीया है | वेदार्थरहस्य- समन्वय के अनुगामी गाथा - कुम्ब्या - नाराशंसी - निगद्- निगम रहस्य- आदि ग्रन्थ दुर्भाग्यवश आज हमारी उपेक्षा से अन्तर्गर्भित होचुके हैं । अतएव पारिशेष्यात् स्वयं वेदशास्त्र ही वेदार्थ-समन्वयोपासना में शेष रह जाता है । कदापि व्याकरणानुत्रन्धी - प्रकृति - प्रत्यय - धातु - उपसर्गादि के बल पर वैदिक-तत्त्वों का समन्वय सम्भत्र नहीं है । विगत तीन महस्र वर्षों की अवधि में सर्वश्री सायणाचार्य्यादि जितने भी वैदभाष्यकार हुए हैं, सत्रका आधार व्याकरणशास्त्र ही रहा है, जिसके अनुबन्ध से वेद का ज्ञानविज्ञानात्मक तात्त्विक समन्वय सर्वथा ही अन्तम्मुख बना रह गया है, जिस इस अन्तमुखात के विश्लेषण का अत्र अव--सर नहीं है । * -- देखिए - ईशभाष्यादि स्वतन्त्र निबन्धों का निर्वचय - प्रकरण ७२
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शतपथ - प्रथमखण्ड निवेदन जिया जारहा था कि, पर्य्याय - सम्बन्धानुग्रह से संस्कृत भाषा भी लोकभाषा - रूप में परिणत होती हुई यदृच्छामिका- साङ्केतिकी - प्राकृत भाषा ही बनी रह गई है । अतएव इस भाषा को - ' मन्त्र ' उपाधि का सम्मान नहीं मिलसका है । यह सम्मान तो एकमात्र छन्दोभ्यस्ताभाषात्मक - मन्त्रब्राह्मरणात्मक वेदशास्त्र को हैं ' ही प्राप्त है । ' मन्त्र ' का पारिभाषिक अर्थ है- ' ऋषि वेदमन्त्रः ' । ' ऋषि का ही नाम वेदमन्त्र है ' । छन्द-देवता - ऋषि - मन्त्र- निवित् - निगद -वाकोवाक्य आदि सभी शब्द पारिभाषिक हैं, जिनका स्वरूप परिभाषाओं की अभिभूति से सर्वात्मना अभिभूत ही होगया है । जिस प्रकार ' वेद ' शब्द का पर्य्यवसान आज केवल शब्दा-त्मक, वेदग्रन्थों पर ही होगया है, तथैव ' ऋषि ' शब्द भी मनुष्यविध अमुक- वसिष्ठांदि ऋषियों पर ही विश्रान्त है । वस्तुस्थिति अत्रापि वेद से ही समतुलित है । जिसप्रकार ' वेद ' शब्द का प्रमुख वाच्यार्थ तत्त्वा-त्मक - नित्यवेद है, तथैव ' ऋषि ' शब्द का प्रमुख वाच्यार्थ भी तत्त्वविशेष से ही · अनुप्राणित है | जिस पञ्चपर्वा प्राकृत वेदतत्त्व का पूर्व में दिग्दर्शन कराया गया है, उस प्राकृत्व - वेदात्मक - पञ्चपर्वा - प्राकृत विश्व का सर्वादिभूत - वृत्तौजाः * सर्वलोकपितामह, ऋक्संहिता की भाषा में ' विश्वकर्मा भौवन ' नाम से -प्रसिद्ध, आकाशात्मक प्रथम पर्व ही ' स्वयम्भू: ' नाम से प्रसिद्ध है अधिदैवत में, एवं ' अव्यक्तात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है अध्यात्म में । अव्यक्त स्वयम्भू का विश्वमूलक यजुः प्रारण ही मौलिक ऋषितत्त्व है । यह ऋषि-प्राण वस्तुस्वरूप - सत्ता का सम्पादक बनता हुआ सद्रूप - सद्घन है, अतएव - ' सामान्ये सामान्याभावः ' नियम से सद्रूप यह ऋषिप्राण ' असत् ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । सद्रूप, अतएव सदात्मक यह मौलिक ऋकामावच्छिन्न यजुःप्राण ही अपने यद्रूप गतिभाव से काम - तपः श्रम- पूर्वक क्योंकि सृष्टिस्वरूप निर्माण के लिए अग्रगामी — गतिशील बनता है, अतएव - ' यत् - अरिपत् ' ( गतियुक्तोऽभवत् ) निर्वचन से इस स्वायम्भुव – वेदप्राण को तद्द्द्रष्टा ऋषिमानव ने तदनुरूप नित्य - ' ऋषि ' शब्द से व्यवहृत कर दिया है | वेदा-त्मक ऋषिप्राण के इसी तात्त्विक चिरन्तन- इतिवृत्त को लक्ष्य बना कर भगवान् याज्ञवक्य कहते हैं— ' असत् ' -वा- इदमग्रे - श्रासीत् । तदाहुः - किं तत्- ' असत् ' आसीत् '?, ' इति । ' ऋषयों वा तदग्रे - असदासीत् ' । तदाहु: - ' के ते ऋषयः '?, इति । ' प्राणा वा ऋषय: ' । ते यत् पुरा -- अस्मात् - सर्वस्मात् - इदं ( विश्व ) इच्छन्तः श्रमेण तपसा - यरि-षन्, तस्मात् ऋषयः ' । - शत ० ० ६ | १ | १ | १,२, । * - श्रासीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । प्रतर्क्यमनिर्देश्यं प्रसुप्तमिव सर्गतः तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः महाभृतादिवृत्तौजाः प्रादुरासीत्तमोनुदः । ७३ - मनुः
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आत्मनिवेदन आप वसिष्ठ, -- भारद्वाज - अङ्गिरा --भृगु - अत्रि - कश्यप - मरीचि - पुलस्त्य - पुलह - यदि आदि जितने भी ऋषि नाम सुनते हैं, ये वस्तुतः तत्त्वात्मक प्राण हैं, विश्व की मौलिक शक्तियाँ हैं । जिस तपस्वी मानवश्रेष्ठ ने जिस ऋषिप्राण का सर्वप्रथम साक्षात्कार किया, वह ऋषिप्राण नाम तद्युग की सम्मानदान-प्रणाली के अनुसार उस मानव के साथ ही समन्वित होगया । अतएव तत्तत्प्राण के प्रथमद्रष्टा विद्वान्, एवं तत्प्राणोपासक - परीक्षक - तद्वंशज उसी ' प्राणर्षि ' नाम से प्रसिद्ध होगए । यही नहीं, वेदतत्त्वोपॣ हक इतिहास - पुराणशास्त्रने तो उन उन ऋषिप्राणों के तात्त्विक - चरित्रों का वर्णन भी तद्द्रष्टा मानव - ऋषियों के नाम - माध्यम से ही कर दिया, जिस इस तथ्य से अपरिचित रह जाने के कारण हीं अर्वाचीन वेद नाममात्र भक्त महाशयों को वे पौराणिक आख्यान काल्पनिक ही प्रतीत होने लग पड़े । उदाहरण के लिए - अगस्त्यप्राण वायव्यप्राणरूपेण, तथा नाक्षत्रिक - अगस्त्यप्राणरूपेण पार्थिव - अर्णवसमुद्र के अप्तत्त्व का शोषक माना गया है । इस प्राण के द्रष्टा भी ' अगस्त्य ' नाम से ही प्रसिद्ध होगए, एवं पुराण ने इसी नाम माध्यम से समुद्रशोषणात्मक धर्म्म का भी समन्वय कर दिया; जो कि सर्वथा अनुरूप था । प्रकृत में वक्तव्य यही है कि, स्वायम्भुव - त्रयीवेदमूर्त्ति मौलिक - श्रसत् - प्राण ही ' ऋषि ' तत्त्व है । इसी तथ्य को लक्ष्य बना कर - ' ऋषिर्वेदमन्त्रः ' कहा गया है । स्वयं - ऋषि ' ' शब्द भी इसी तथ्य का ' अरि-षन् ' रूपेण समर्थन कर रहा है । इसीप्रकार यच्चयावत् वैदिक - शब्द प्राकृतिक - नित्यतत्त्व के सर्वथा अनुरूप स्वतः ही ऋषिप्रज्ञा से अभिव्यक्त हुए हैं । अतएव वेदशास्त्र का बुद्धिपूर्वक - कृतकत्त्व होने पर भी इस तत्त्वानुरूपा - शब्दनित्यता, एवं तन्मूला सिद्धशब्दता के अनुबन्ध से वेदशास्त्र भी तत्त्ववेदवत् नित्य - सनातन-शास्त्र ही कहलाने लगा है, जिस कथन में शब्दरहस्यवेत्ता किसी भी प्रज्ञाशील को तो अणुमात्र भी सन्देह नहीं रह सकता । यही वेदशब्दों का ' मन्त्रत्त्व ' है, जिस का प्रत्येक वर्ण - स्वर - पद - वाक्य - आदि स्वार्थक है, तत्त्वानुरूप है, एक प्रकार से सर्वात्मना उस नित्य - वेदतत्त्वात्मक - मन्त्र का प्रतिरूप है । अतएव शब्दात्मक— मन्त्रोच्चारण में होने वाला साधारणसा स्वरदोष भी तत्सम्बद्ध अर्थ में विषमता उत्पन्न करता हुआ दृष्ट के स्थान में अनिष्ट का ही जनक बन जाता है, जैसा कि प्रसिद्ध है—
दुष्टः शब्दः स्वरतो - वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ॥
- प्रसिद्धा सूक्ति सर्वश्री सायणाचार्य्यं जैसे सुप्रसिद्ध वेदभाष्यकारों को भी ( वेद के तत्त्वभूत मौलिक स्वरूप से तटस्थ बने रह जाने के कारण ) ‘ मन्त्रकृत् ' जैसे शब्दों का भी काल्पनिक अर्थ करने में प्रवृत्त होना पड़ रहा है | जो अर्थ मन्त्रद्रष्टा का है, वही अथ ' मन्त्रकर्त्ता ' का है । वेदशास्त्र का एक नाम है ' श्रुति ' । द्रष्टा की दृष्टि ही श्रोता * – “ कीदृशेभ्यः – मन्त्रकृद्भ्यः । मन्त्रं कुर्वन्तीति मन्त्रकृद्भ्यः । यद्यपि अपौरुषेय-वदे कर्त्तारो न सन्ति । तथापि कल्पादौ - ईश्वरानुग्रहेण - मन्त्राणां लब्धारो -- ‘ मन्त्रकृत ’ इत्युच्यन्ते ' ' ( तैत्तिरीय आरण्यक १ प्र ०, १ अनु ० के वचन का सायणभाष्य ) ७४
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के लिए - ‘ श्रुति ' कहलाई है । तदृष्टा अपनी शतपथ - प्रथमखण्ड दृष्टि से जिस तत्त्व का साक्षात् रूपेण दर्शन कर लेता द्वारा वही दृष्टतत्त्व अभिव्यक्त होता है । वह शब्द द्रष्टा और अर्थ के औत्पत्तिक - सम्बन्ध के कारण | अतएव इस दृष्टिरूपा श्रुति को है, उस के आत्मनिष्ठ- तत्त्वानुरूप - सिद्ध - शब्द के की दृष्टि से अभिन्न है - शब्द, हम स्वतःप्रमाण ही मान लेते हैं । इसी आधार पर श्रुति, और स्मृति, शब्दों के ' द्रष्टुर्वाक्यं श्रुतिः ’, एवं ‘ स्मत्तु ' र्वाक्यं स्मृतिः’ये लक्षण मान लिए जाते हैं । द्रष्टा का वाक्य द्रष्टा के लिए दृष्टिरूप प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । अतएव श्रोता के लिए - ' श्रुति ' बना हुआ वह दृष्टिप्रमाण अपने आप में स्वयं हीं प्रमाण रहता है, इसी तथ्य को सूचित करने के लिए वेद को - ' श्रुति ' कहा गया है, जिस का समन्वय करने में असमर्था आाज की नवीनप्रज्ञा ' श्रति ' शब्द के आधार पर ऐसी भ्रान्त कल्पना करने लग पड़ी है कि, " वेद के ऋषियों को लिखना - पढ़ना नहीं आता था । वे सुन सुना कर ही काम चलाते थे । अतएव उन का वेदशास्त्र ‘ श्रुति ' ही कहलाया ", इति नु अब्रह्मण्यमेव? यदि ऐसा है, तो फिर ये कल्पनारसिक - स्मृति ' का क्या अर्थ करैंगे?, यह उह्नीं से " इत्यालप्यालमेव । नवीनप्रज्ञा को उपालम्भ देना व्यर्थ है, जब कि हमारे प्राचीन - भाष्यकार ही वेदतत्त्वसमन्वय में अनेक भ्रान्त कल्पनाओं के अनुगामी बने हुए हैं 1 वस्तुतत्त्व वैसे रहस्यपूर्ण तथ्य से ही अनुप्राणित है, जिस का मानव कदापि अपने बौद्धिक - प्रातिभ-चल पर समन्वय नहीं कर सकता । मानव की बुद्धि दिग्देशकालभावों से सतत आक्रान्त रहती है | दिग्देश-कालात्मिका मानव की लोकबुद्धि लौकिक - शब्दों का ही गुम्फन कर सकती है । कदापि अलौकिक - सिद्ध - सहज शब्दों का न तो लोकबुद्धि समन्वय ही कर सकती, न वैसे सहज शब्द इस के आत्मक्षेत्र में श्रविभूत ही होसकते । मानव दिग्देशकालानुबन्धी अपने बुद्धि - मनः - शरीर तन्त्रों से जहाँ प्राकृत है, वहाँ आत्म-पुरुषानुबन्ध से वही अप्राकृत है, जैसा कि पूर्व में यत्र तत्र स्पष्ट किया जाचुका है | शब्दात्मक वेदशास्त्र मानव के आत्मभाव से ही अनुप्राणित है । श्रात्मनिष्ठ मानव ही गीतापरिभाषा में बुद्धियोगनिष्ठ - युक्त - योगी कहलाया है, जिस के लिए- ' योगयुक्तो विशुद्धात्मा ' प्रसिद्ध है । यही मानव ' ऋषिमानव ' कहलाया है, जो— दिग्देशकालात्मक - शारीरिक - मानसिक तथा बौद्धिक मानवव्यक्ति के व्यक्तित्त्व से सर्वथा परे की वस्तु है । इस लोकानुत्रन्धी व्यक्तित्त्व की दृष्टि से तो इस ऋषिमानव के - ' कवीन् पृच्छामि विद्मने न विद्वान् ( ऋक सं०-१।१६४ । अस्यवामीयसूक्त ) ये ही उद्गार हैं । सृष्टित्तत्त्व के परपारदर्शी महर्षि दीर्घतमा जैसे ग्रात्मनिष्ठ ऋषि की ही ऐसी वाणी होसकती है । ऐसे ऋषिमानवों की निर्भ्रान्ता योग जदृष्टि से दृष्ट तत्त्व ही इन के सहज - बुद्धि योगनिष्ठ - सिद्ध - ‘ वेद ’ से समन्वित होकर ' वेदशास्त्र ' रूप में परिणत हुए हैं । सिद्ध शब्दत्त्वेन ये ही मन्त्र के ‘ द्रष्टा ' हैं, अपने दिग्देशकालातीत अनन्त - सच्चिदानन्दाव्ययपुरुषाभेद से ये ही मन्त्र के ' पति ' हैं | और आत्मयोगानुन्विता सत्त्वबुद्धि से अनुप्राणित सहज शब्दों के तत्त्वानुरूप गुम्फन से ये ही मन्त्र - ' कर्त्ता ' हैं । द्रष्टृत्त्व, और पतित्त्व में शब्दवेद गौण है, तत्त्वेद प्रमुख है । एवं ' कर्ता ' त्त्व ' में तत्त्ववेद गौण है, शब्द-गुम्फनात्मक ग्रन्थवेद प्रमुख है । द्रष्टृत्त्व, पतित्त्व से अनुप्राणित तात्त्विक वेद अपौरुषेय है, एवं कर्तृत्त्व से अनुप्राणित शब्दवेद पौरुषेय है । किन्तु पुनः पुनः यह संस्मरणीय है कि, यह शब्दवेदात्मक पौरुषेय-वेद ऋषिमानव के दिग्देशकालानुबन्धी लौकिक - व्यक्तित्त्व से कोई सम्बन्ध नहीं रखता । अपितु इस के गुम्फ-नात्मक शब्द सहजभावापन्न बनते हुए उस तत्त्व से अभिन्न ही बने रहते हैं । अतएव तत्त्ववेददृष्ट्या पौरु-षेय कोटिं में आता हुआ भी शब्दात्मक वेदशास्त्र वैवरीवाङ्मय - लौकिक - यह - च्छात्मक - साङ्को तिक - शब्दों के समतुलन में तो अपौरुषेय ही माना आयगा । और इस व्यवच्छेदात्मक - समन्वय के द्वारा पौरुषेय- अपौरु-षेय - सम्बन्धी सभी विवादों का निर्विरोध समन्वय होजायगा । ७५
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आत्मनिवेदन विद्वज्जगत् में – ‘ ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात्कृतधर्माण ।: ऋषयो - बभूवुः ' इत्यादि वाक्य-सन्दर्भ सुप्रसिद्ध है । प्रमुखरूपेण इनका अपौरुषेयत्त्वात्भिनिवेश - ‘ मृन्त्रद्रष्टारः ऋषय: ' इस वाक्यांश पर ही परिसमाप्त है । अवश्य ही मानवमहर्षि तत्त्वात्मक ऋषिप्राणमूर्त्ति त्रयीमन्त्र के द्रष्टामात्र हैं, कर्त्ता नहीं । कर्तृत्त्व का सम्बन्ध है तत्त्वानुगत शब्दात्मक वेदशास्त्र के साथ, जिस का यह कर्तृत्त्व भी लोकानुत्रन्धी कर्तृत्त्व से सर्वथा विलक्षण ही है । इसी कर्तृत्त्व की दृष्टि से क्या मानवऋषि को - ' मन्त्रकर्त्तारः ' भी नहीं कहा जासकता? । अवश्य ही कह देना चाहिए । प्रमाणभक्त कहेंगे, कह देना चाहिए, वह तो आवेश-मात्र है, कहा नहीं गया, यही वस्तुस्थिति है । ' मन्त्र -द्रष्टारः - ऋपयः - बभूवुः ' यह् प्रसिद्ध कथन ही वास्त-विक- वस्तुस्थिति मानी जायगी । और बस । अधिक वागविजम्भृण व्यर्थ है । वेद का जो तात्त्विक - स्वरूप पूर्व में सङ्केतित है, वही पर्य्याप्त है इस विजृम्भण की उपशान्ति के लिए । इस पर भी यदि बिना प्रमाण के विद्वत्प्रज्ञा अपना अभिनिवेश नहीं हीं छोड़ना चाहती, तो हम विवश हैं । क्यों कि ' प्रमाण ' भी तो सहजबुद्धि से ही अपना प्रामाण्य सुरक्षित रखते हैं । अभिनिवेशात्मक दुराग्रह से प्रमाण भी प्राण बन जाते हैं, एवं प्रमाण भी प्रमाण मान लिए जाते हैं । स्वयं वेदशास्त्र मन्त्रद्रष्टा, मन्त्रकर्त्ता- दोनों का पार्थक्य स्पष्ट कर रहा है, वह तो बन गया अप्रमाण, और श्रीसायण का ' मन्त्रकृद्भ्यः ' का भी ' मन्त्रद्रष्टृभ्यः ' अर्थ कर देना बन गया विद्वानों के लिए प्रमाण?, इत्यहो तत्त्ववेदविस्मृतिजनितस्य सांस्कृतिक अधःपतनस्य विडम्बनेति-अत्रैव विरम्यते । इस प्रमाणनिष्ठा के साथ कि, स्वयं वेदशास्त्र में तत्त्ववेदानुगत मन्त्रद्रष्टृत्त्व, तथा शब्द-वेदानुगत मन्त्रकृतत्त्व के सम्बन्ध में असंख्य प्रमाण हैं, जिन में से १-२ प्रमाणों को ही अत्र मूलरूपेण उद्धृत मात्र ही कर दिया जाता है - प्रमाणभक्तों के अनुरञ्जनमात्र के लिए ।
[ १ ] - यामृषयो मन्त्रकृतो मनीषिण अन्वैच्छन् देवास्तपसा श्रमेण ।
तां देवीं वाचं हविषा यजामहे सा नो दधातु सुकृतस्य लोके ॥
[ २ ] - -नमा ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्द्भ्यो मन्त्रपतिभ्यः ।
मा मा ऋषयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहुर्दैवीं वाचम् ॥
[ ३ ] - ऋषे मन्त्रकृतां स्तोमैः कश्यपोद्वर्धयन् गिरः ।
सोमं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिम् ॥
- ऋक् सं ० ६ २१४ | २ | [ ४ ] -शिशुर्वा श्राङ्गिरसो मन्त्रकृतां मन्त्रकृदासीत् । स पितृ न् – ' पुत्रका ' इत्यामन्त्र– यत । एष वाव पिता - यो मन्त्रकृत् । — ताण्ड्य महाब्राह्मण १३।३ [ ५ ] - नमा ऋषिभ्वो मन्त्रकृद्द्भ्यो मन्त्रपतिभ्यः । - शाङ्खायनारण्यक ७ । १ । [ ६ ] -- नमा ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यः । मा मामृषयो मन्त्रकृतो मन्त्रपतयः । —तैत्तिरीय - आरण्यक -४।१ । ७६