Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 621–630

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 621–630

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शतपथब्राह्मण में स्थित ) धू भाग में रहने वाला अग्नि ' धु ' कहलाता है | ( आज यह अब ' धुर्य्य ’ अग्नि के पश्चिम भाग में नीडस्थ हविर्ग्रहण के लिए जाता है ) ऐसी अवस्था में हविर्ग्रहणार्थ उधर जाता हुआ अध्वर्यु ' इस ' धू ' भागस्थ अग्नि का अतिक्रमण ( निरादर ) करने वाला बनता है । मन्त्र बोलकर उस धुर्य अग्नि का स्पर्श करता हुआ अध्वर्यु ) उस अग्नि के लिए हा ' अपह्नव ' ( क्षमा प्रार्थना ) करता है । ऐसा करने से वह अग्नि अतिक्रमण करके जाने वाले इस अध्वर्यु का अनिष्ट नहीं करता है ॥ १० ॥

( ' धूरसि ' इत्यादि मन्त्र बोलते हुए - हविग्रहण करने से अग्नि का अतिक्रमण भी नहीं होता है, एवं साथ ही में शत्रुओं का नाश भी होजाता है, इसी भाव को लक्ष्य में रख कर ) अरुणपुत्र, अतएव आरुणि नाम से प्रसिद्ध याज्ञवल्क्य कहा करते थे कि, गुरु उद्दालक ‘ मैं आधे मास में शत्रुओं का नाश किया करता हूँ । मास में दर्शपूर्णमास भेद से दो इष्ट्रियाँ होतीं हैं । दोनों के लिए हथिर्ब्रहण किया जाता है । अत: मास में दो बार ' धूरसि ' इत्यादि मन्त्र बोला जाता है । सुतरां महीने में दो बार शत्रुओं पर कृत्याप्रयोग का होना सिद्ध होजाता है | ( याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ) इसी पूर्वोक्त शत्रुनाश - सम्बन्धी मन्त्रविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ही तो आणि ' अद्ध'मासश: ' इत्यादि कहा करते थे ॥ ११ ॥

( जिस स्थान पर हवि रक्खा है, वहाँ पहुँच कर वह अध्वर्यु ) कस्तम्भी से पश्चिम भाग में प्रतिष्ठित ' ईषा ' का स्पर्श कर ' देवानामसि ' इत्यादि मन्त्र बोलता है । ' स्तुति के द्वारा उपस्तुत, अतएव उदारमना शकट से हम हविर्ग्रहण करें - इसी प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर ‘ देवानामसि ० ’ इत्यादि रूपसे अध्वर्यु शकट की ही स्तुति ( प्रशंसा ) करता है । ' माते यज्ञपतिर्द्धार्षीत् ' का तात्पर्य्य यही है कि, यजमान हीं इस यज्ञ का पति है । ( इस मन्त्र भाग से ) यज्ञपति यजमान के लिए ही स्वस्तिभाव की ( शकट से ) याचा करता है ॥ २ ॥

इसके श्रनन्तर ‘ विष्णुस्त्वाक्रमताम् ' यह बोलता हुआ अध्वर्यु ' ( हविर्ग्रहणार्थ ) शकट पर चढ़ता है । यज्ञ विष्णु है । उसने देवताओं के लिए यह विक्रान्ति ( विक्रमण ) की है, जोकि इन ( वसु - रुद्र आदित्य नाम से प्रसिद्ध ३३ ) देवताओं की बिक्रान्ति आज हम ( त्रैलोक्य में देख रहे हैं ) उस यज्ञरूप विष्णु ने पृथिवीलोक को पहिले विक्रम से पसारा, व्याप्त किया, आप्त किया । दूसरे से अन्तरिक्ष को, एवं तीसरे से द्युलोक को नापा । आज यज्ञरूप विष्णु का प्रतिनिधि, अतएव विष्णुरूप यह अध्वर्यु ( यजमान के यज्ञ में विग्रहरणार्थ आए हुए देवताओं के लिए ) इसी विक्रान्ति का विक्रमण करता है ॥१३ ॥

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प्रथमकाण्ड ( शकट पर आरोहण करने के अनन्तर ) ' उरु वाताय ' बोलता हुआ अध्वर्यु विशाल अन्तरिक्ष की ओर अपनी दृष्टि डालता है । प्राण का नाम ही ' वात ' है । ' उरु वाताय ' बोलता हुआ इस ब्रह्म से ही ( मन्त्रबल से ही ) प्राणरूप बात के लिए विस्तीर्ण स्थान सम्पन्न करता है || १४ || प्रेक्षणानन्तर – ‘ अपहृतं रक्ष: ' बोलता हुआ हवि में पतित तृणादि को उठाकर बाहिर फैंक देता है । इस हवि में ( हविद्रव्य से अतिरिक्त विजातीय ) तृण आदि रहै, अथवा न रहै, अध्वर्यु ' को पूर्वमन्त्र बोलते हुए स्पशं तो अवश्य ही कर लेना चाहिए । ऐसा करता हुआ अध्वर्यु हत्रि में प्रविष्ट राक्षसों को हवि से मार भगाता है ॥ १५ ॥

तृणादि - निरसनक्रिया के अनन्तर ' गच्छतां पञ्च ' यह बोलता हुआ ( हवि लेने के लिए ) अपने दक्षिण हाथ को इत्रि में डालता है । हमारे हाथ में ये पाँच अंगुलियाँ हैं । यज्ञ पाक्त ( पञ्चावयव ) है । पाँचों अंगुलियों को हवि में डालता हुआ अध्वर्यु पात यज्ञ को ही हवि में प्रतिष्ठित करता है ॥ १६ ॥

हस्तप्रक्षेपानन्तर ‘ देवस्य त्वा सवितुः ' इत्यादि मंन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ं हविर्ग्रहण करता है | ' देवस्य ० ' इत्यादि मन्त्र से हविग्रहण करता हुआ अध्वर्यु सविता - देवता से प्रसूत 1 निर्द्दिषु ) हवि ही प्रहरण करता है । प्रकृतियज्ञ के ' अश्विनी कुमार ' देवता अध्वर्यु हैं । यह अध्वर्यु उन्हीं दिव्य अध्यओं का प्रतिनिधि है । अतएव ' अश्विनोर्बाहुभ्याम् ' कहा है देवताओं में ‘ पूषा ’ नाम से प्रसिद्ध देवता ' भागदुध ' ( हवि को तत्तद्देवताओं के लिए विभक्त करने वाला ) है । हाथ से अशन द्रव्य ( आहुति द्रव्य ) को धारण करने वाला है । हाथ पूषा के ही प्रतिनिधि हैं । अतएव ' पूष्णो हस्ताभ्याम् ' यह कहा है । देवता सत्यधर्म्मा हैं । मनुष्य अनृतधर्म्मा है । इससे भूल हो जाना स्वाभाविक बात है । देवकर्म्म में यत्किचित् भी भूल अनिष्ट कर देती है । अतः मनुष्यभाव को हटाता हुआ अध्वर्यु ' - ' देवस्य ' इत्यादि बोलता हुआ सत्यरूप देवताओं के द्वारा ही हविग्र हण करता है ॥ १७ ॥

इसके अनन्तर ( इष्टि में जिन जिन देवताओं के लिए आहुति दी जाने वाली है ) उन उन देवताओं के लिए पृथक् २ रूप से ( इस ग्रहणकाल में हीं ) हवि निर्दिष्ट करता है । अर्थात् उन उन देवताओं का नाम बोल बोल कर पृथक् पृथक् हविग्रहण करता है । ( मैं देवताओं का यजन करूँगा ) यजमान की इस भावना से देवता हविर्ग्रहण करते हुए अध्वर्यु के समीप ( भावना में ) आजाते हैं, और अपने मन में - ' अब यह मेरा नाम बोलेगा - मेरे नाम ३६०

पृष्ठ 623

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शतपथब्राह्मण से हविर्प्रहण करेगा, –यह कल्पना करने लगते हैं । अर्थात यही सोचते हुए वे यहाँ उपस्थित होते हैं । इस हत्रिर्ग्रहण के लिए नाम बोल २ कर हविग्रहण करता हुआ साथ में आए हुए - ‘ नहीं यह मेरे लिए हवि लेता है- नहीं तुलारे लिए नहीं, मेरे लिए ले रहा है ' इसप्रकार परस्पर में झगड़ते हुए देवताओं के लिए ( नामग्रहण के द्वारा हविर्ग्रहण करता हुआ ) ' असमद ' करता है । झगड़ा मिटाता है । नामग्रहण की यही पहिली उपपत्ति है ॥ १८ ॥

अपिच जिसलिए कि नामग्रहण किया जाता है, उसकी दूसरी उपपत्ति बतलाते हैं । इस इष्टि में जिन ( नियत ) देवताओं के लिए ऋत्विक हविग्रहण करते हैं, वे देवता उस हविर्भाग से ( अन्नग्रह से गृहीत होने के कारण ) अपने आपको यजमान का “ जिस कामना के लिए यह हमारे लिए हविः प्रदान करता है - अपना कर्त्तव्य है कि, हवि के प्रति-दान में अपन उस की उन अभिलषित कामनाओं को समृद्ध करें -- पूरी करें " यह सोच हुए ऋणी समझने लगते हैं । ( ऐसी अवस्था में यदि श्रादेश नहीं किया जायगा तो– “ विदित नहीं हममें से किसके लिए हविग्रहण हो रहा है " यह सोचते हुए देवगण यज-मान कामना को पूरी करने की ओर से उपेक्षाभाव धारण कर लेते हैं । ऐसा न हो – अपितु – देवता अभी से यजमान के ऋणी बन जाँय, अतएव देवता के लिए नामनिर्देश किया जाता है । इसप्रकार यथापर्व ( जिस देवता को जिस क्रम से आहुति दीजाय, उसी क्रम से उस २ देवता का नाम लेकर ) हवि करता है । इसप्रकार यथानामनिर्देश हविर्भ हरण कर – ॥१६ ॥

वह अध्वर्यु - ' भूताय त्वा नारातये ' वह बोलता हुआ ( पुन: एकबार गृहीत ) हविर्द्र व्य का स्पर्श करता है । जिस शकट से हवि का ग्रहण करता है, ( इस ग्रहण से जो गृहीत हवि संघ से पृथक् होकर आप्ति से पृथक् हो जाता है ) मन्त्र के द्वारा उसे पुनः आध्यायित करता है || २० || हविंग्र हणानन्तर ‘ स्वरभित्रिख्येषम् ' यह बोलता हुआ अध्वर्यु पूर्व की ओर देखता है । यह शकट परिच्छिन्न होता है । ( इस परिच्छिन्न शकट से हविग्रहण करते हुए अध्वय्यु'का चक्षु ( शकटसम्बन्धी परिच्छिन्न भाव के कारण ) पाप्मा ( आसुरभाव ) से गृहीत होजाता है । स्वर्ग, अहः, देवता, सूर्य्य, सब यज्ञ हैं । यहाँ से ( शकट पर खड़े खड़े ) पूर्व की ओर देखता हुआ अध्वर्यु ' व्यापक स्वर्गरूप यज्ञ की ओर ही दृष्टिपात करता है । ऐसा करने से इसका शकट-सम्बन्धी पाप्मा - नात्र नष्ट हो जाता है - ( जैसाकि भाष्य में स्पष्ट होजायगा ) ॥२१ ॥

प्र क्षणानन्तर - ‘ दृ ंहन्तां दुर्य्याः पृथिवीव्याम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ' शकट से नीचे उतरता है । घर ' दुय्य ' नाम से प्रसिद्ध है । इस यजमान का जो यह ( हविप्रहण करने वाला ) अध्वर्यु ' ( यजमानप्रतिनिधिरूप से ) यज्ञ के द्वारा आचरण करता है, यज्ञेतिकर्त्तव्यता का संपादन करता है,, शकटस्थान से उतरते हुए ऐसे अध्वर्यु को लक्ष्य बना कर यजमान के ' दुर्य्य ' ३६१

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प्रथमकाण्ड नाम से प्रसिद्ध वे प्रतिष्ठारूप घर प्रच्युत होने के लिए समर्थ हैं । एवं स्त्रयं प्रच्युत होते हुए यज-मग्न के ( ये घर ) यजमान के वंश को क्षुब्ध करने में भी समर्थ हैं । ऐसा न हो - इसलिए मन्त्र-बल के द्वारा ( अध्वर्यु ' ) यजमान के घरों को ही पृथिवी पर प्रतिष्ठित करता है । दृढ़ करता है । ऐसा करने से यजमान के घर और कुल च्युति, एवं क्षोभ को प्राप्त नहीं होते । तात्पर्य्य यही है कि, शकट से उतरते समय यदि असावधानी से अध्वर्यु का पैर इधर उधर स्खलित होजाता है, तो इसका प्रभाव यजमान घर, और वंश पर पड़ता है । भविष्य में होने वाली इस आपत्ति को मन्त्रबल से पहिले से ही अवरुद्ध कर दिया जाता है । शकटावरोहणानन्तर — ' उर्वन्तरिक्ष-मन्वेमि ' यह बोलता हुआ अध्वयुं यज्ञशाला की ओर जाता है । इस मन्त्र का त्रही पूर्वोक्त ' अन्तरिक्षं वा अनुरक्षश्वरति ' इत्यादि तात्पय्यं है ॥ २२ ॥

इस यज्ञकर्त्ता यजमान के ( यज्ञ में ) गार्हपत्याग्नि में ऋत्विग्गण ही हविः का परिपाक करते हैं की है ) उसके यज्ञ में ऋत्त्विग् ( अर्थात् जिन की मर्यादा गार्हपत्य में हविःपरिपाक करने - गण गार्हपत्य के समीप ही यज्ञपात्र रखते हैं, परन्तु उसमें इतना नियम अवश्य है कि ) वह अध्वर्यु गार्हपत्य के पश्चिम भाग में उन पात्रों को रक्खे । एवं जिसके आहवनीय में परिपाक करते हैं-( उसके यज्ञ में ) आहवनीय के समीप ही पात्र रखते हैं । इस व्यवस्था में आहवनीय के पश्चिम भाग में पात्र रखने चाहिएँ । ' पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयामि ' पात्रासादन का यही मन्त्र है ) । मध्यस्थान ही नाभि कहलाता है । मध्यस्थान ( इधर उधर के प्रान्तों की अपेक्षा ) कम्परहित होता है | इसीलिए ‘ पृथिव्या ' इत्यादि कहा है । ' अदित्या उपस्थे ' यह मन्त्र का शेष है । जो व्यक्ति किसी वस्तु को बड़ी सावधानी से सुगुप्त बना कर सुरक्षित रखते हैं, लोक में उनके लिए ‘ अजी उन्होंनें तो उसे अपनी गोद ( उपस्थ ) में ले लिया है, अब उसके लिए कोई भय नहीं है ' यह कहा जाता है । ( माता अदिति की रक्षा में हमारा हविः उसी प्रकार सुरक्षित रहे ) इसीलिए ' अदित्या उपस्थे ' यह कहा है । इसके अनन्तर ( गार्हपत्य अग्नि को लक्ष्य बना कर अ हवि को अग्नि की रक्षा में सुरक्षित करने के अभिप्राय से ' अग्ने! हृव्यं रक्ष ' यह बोलता हैं. 1 ' अदित्या उपस्थे, अग्ने हृव्यं रक्ष ' यह बोलता हुआ अध्वर्यु - - इस हवि का पृथिवी, और अग्नि के लिए हवि रक्षार्थ प्रदान करता है । इसीलिए - ' अग्ने ' अदित्यादि कहा है || २३ || इति - हविर्ग्रहणं, इति - हविग्र हणं, तत्सादनञ्च ७

प्रथमकाण्डान्तर्गत- प्रथमाध्याय का द्वितीय ब्राह्मण उपरत ।

प्रथमकाण्डान्तर्गत - प्रथमप्रपाठक का द्वितीय ब्राह्मण उपरत ॥

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पृष्ठ 625

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शतपथब्राह्मण ( भाष्य ) ~~~~ अतिगंभीरार्थं जिस श्रुति के ' देवा ह वै यज्ञं तन्वानास्तेऽसुरक्षसेभ्य आसङ्गाद् त्रिभयाञ्चकुः ’ - इस बाक्य के अर्थनिरूपण में नहाँ हमें तथाविध विस्तार का अनुगामी बन जाना पड़ा, तो वहाँ ऐसी अवस्था में यदि पूर्व प्रतिपादित पूरे ब्राह्मण के लिए हमें कितने विस्तार का अनुगमन करना पड़े, सचमुच वेदतत्त्वार्थ के सम्बन्ध में यह एक महती समस्या ही मानी जायगी । हम स्वयं विचार करते हैं किं, यह विस्तारक्रम ग्रन्थसमाप्ति का प्रतिबन्धक ही है । इसलिए आगे से इतना विस्तार नहीं करना चाहिए । परन्तु जत्र श्रुति के अक्षर सम्मुख आते हैं, तो श्रात्मा चञ्चल हो पड़ता है । बिना कुछ लिखे यह चाञ्चल्य शान्त हीं नहीं होता | हमारा विश्वास ही नहीं, अपितु दृढ़ प्रत्यय है कि, यदि विस्तारक्रम से शतपथ का एक भी काण्ड हम पाठकों के सम्मुख रख सके, तो सहस्रों वर्षों से विलुप्तप्राया वैदिक सभ्यता भूमण्डल में अपना साम्राज्य पुन: प्रतिष्ठित कर लेगी । इसलिए ' मूलग्रन्थ बहुत कम निकलता है ' - इस वाक्य को पुनः पुनः न दोहरा कर हमारे प्रेमी पाठकों का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि, वे हमें वैदिक पदार्थों के अधिकाधिक विश्लेषण के लिए ही प्रोत्साहित करें । भूपिण्ड, एवं सूर्य के मध्य का जितना प्रदेश है, वह - ' उरु अन्तरिक्ष ' कहलाता है । इस अन्तरिक्ष में वायु भरा रहता है | वायु में एकप्रकार का नाशक असुरप्राण व्याप्त रहता है, जैसा कि पूर्व के आसुरप्राण निरूपण में संक्षेप से बतलाया जाचुका है । रौद्रवायु श्रासुरप्राण का घातक है । परन्तु वारुणवायु आसुरप्राण की प्रतिष्ठा है । आसुर प्राण - राक्षस, पिशाच, प्रेत, आदि भेदेन अनेक प्रकार के हैं । ये सूत्र दुष्ट प्राण वारुण वायु में सर्वत्र व्याप्त रहते हैं । वरुण पानी के देवता हैं । श्राप्यप्राण को ही वरुण कहते हैं । यह ग्राप्यप्राण वायुरूप में सर्वत्र व्याप्त रहता है । ' यद्वै वातो नाभिवाति, तत् सर्वं वरुणदैवत्यम् ' से अनु-प्राणित ‘ वात ’ रुद्रवायु हैं । रुद्रवायु में एक चतुर्थांश इन्द्र की ( विद्युत् की ) सत्ता है । इन्द्र, और वरुण में घोर शत्रुता है । श्रतएव जहाँ ऐन्द्र वायु नहीं रहता, वहाँ वारुण वायु प्रविष्ट हो पड़ता है । चातुर्मास्य में वारुणवायु की प्रधानता रहती है! अन्य ऋतु की अपेक्षा वर्षाऋतु में वारुण प्राण पर प्रतिष्ठित दुष्ट प्राण अधिक प्रबल रहते हैं । अतएव - ' वर्षासु दोषा कुप्यन्ति ' इस आयुर्वैदिक - सिद्धान्त के अनुसार ं इस ऋतु में बात पित्त कफ, तीनों धातु दोषाक्रान्त होजाते हैं । प्रकृति में व्याप्त प्रकाशाधिष्ठाता इन्द्रप्राण, एवं श्राग्नेय प्राण, दोनों हीं पानी की प्रबलता से मूर्च्छित होजाते हैं । अभिभूत होजाते हैं । यही देवताओं का शयन ( सोना ) कहलाता है । ' अग्निः सर्वा देवताः, इन्द्रः सर्वा देवताः, ' के अनुसार इन्द्राग्नी के गर्भ में ३३ देवता प्रविष्ट । कहना यही है कि, वारुणवायु इन असुरों की प्रतिष्ठा है । प्राप्य प्राण के सम्बन्ध से रुद्रवायु शिव ( ठंढा ) बन जाता है | इसके साथ राक्षसादि रहते हैं । अतएव भूत प्र ेतादि को शिव के गण कहा जाता है । जैसे मनुष्य भू, और द्यौ में आबद्ध रहकर, किन्तु दोनों से सीमित रहकर अन्तरिक्ष में विचरा करता है, एवमेव उभयतः अमूल द्यावापृथिवी से परिच्छिन्न यह नाष्ट्रा राक्षसप्राण वारुणवायु के आधार पर अन्तरिक्ष में विचरा करते हैं । आज यह यजमान यज्ञ करने वाला है । सर्वव्यापक नाष्ट्राप्राण का इस दिव्य भावापन्न यज्ञ में भी आक्रमण होना अनिवार्य है । यदि ऐसा हो जायगा, तो आसुरप्राणयुक्त यज्ञिय पदार्थों से निष्पन्न होने वाला यज्ञात्मा ( दैवात्मा ) श्रासुरप्राण के प्रभाव से दिव्यचल से क्षीण होता हुआ स्वर्गलोक में न जा सकेगा । इसलिए उसे हटाना नितान्त आवश्य है । पात्रों में जो असुरप्राण प्रविष्ट हो गया था, उसके लिए तो प्रतपन-३६३

पृष्ठ 626

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प्रथमकाण्ड क्रिया पर्य्याप्त थी | परन्तु आज यह अव हविग्रहण के लिए शकट के समीप जारहा है । शकट, और यज्ञमण्डप के मध्य में वह प्राण भरा है । उसके आक्रमण को कैसे रोका जाय १, इसका उत्तर है - मन्त्रशक्ति । मन्त्र बोलने से त्रान्तरिक्ष्य श्रासुरप्राण नष्ट होजाते हैं । कैसे हो जाते हैं?, इसके लिए निम्नलिखित संक्षिप्त ' मन्त्र विज्ञान ' को ही लक्ष्यानुगत करना चाहिए । ' द्वे वा ब्रह्मणो रूपे शब्दब्रह्म परं च यत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार विश्व के प्रभव – प्रतिष्ठा-परायण - भूत सर्वव्यापक ब्रह्म के अर्थ, और शब्द, भेद से दो विवर्त्त हैं । अर्थसृष्टि भी उसी से ं होती है । शब्दसृष्टि भी उसी से होती है । शब्दार्थसृष्टि के मूलभूत उस ब्रह्म का नाम है ' षोडशीपुरुष ', जिसका कि पूर्वप्रकरणों में अनेक स्थानों पर निरूपण किया जाचुका है । इस षोडशी में अव्ययपुरुष सृष्टि का ‘ अधिष्ठान ' ( आलम्बन ) है । पञ्चकल अक्षर ( ' परा प्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध ' अव्यक्तपुरुष ' ) निमित्त-कारण है | एवं - क्षर ( अपराप्रकृति नाम से प्रसिद्ध ' ० यक्तपुरुष ' ) आरम्भण ( उपादानकारण ) है । अव्ययपुरुष की आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाक्, भेद से पाँच कलाएँ बतलाई गई हैं । इन पाँचों में - आनन्द विज्ञान मन -'मुक्तिसाती ' भाग है । मनःप्राण वाक् की समष्टि ' सृष्टिसाक्षी ' भाग है । सृष्टि में श्रानन्द - विज्ञान सहकारी हैं, मनःप्राण वाक् प्रधान हैं । मुक्ति में मनःप्राण वाक् - रूप निवृत्तिकर्म्म सहकारी है, श्रानन्द - विज्ञान - रूप ज्ञानभाग प्रधान है । हमें प्रकृत में सृष्टि का निरूपण करना है । अतएव श्रानन्दविज्ञानगर्भित मनःप्राणवाङमय अव्ययात्मा के सृष्टिभाग की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । मनोभाग ज्ञानशक्तिमय है । प्राणभाग क्रियाशक्ति-मय है । एवं वाग्भाग अर्थशक्तिरूप है । इन तीन कलाओं से ज्ञान, क्रिया, अर्थ, ये तीन भाव उत्पन्न होते हैं । सम्पूर्ण शब्दार्थसृष्टि इन तीनों में अन्तर्भूत है | ज्ञानमय मन का विकासस्थान अव्यय है । क्रिया-मय प्रारण का विकासस्थान अक्षर है । एवं अर्थमयी वाक् का विकासस्थान क्षर है । दूसरे शब्दों में-ज्ञानसृष्टि मनोमय अव्यय से होती है । क्रियासृष्टि प्राणमय अक्षर से होती है । एवं वाङ्मयी क्षरसृष्टि का आलम्बन अव्यय का वाग्भाग है । किंवा अर्थमया तरसृष्टि का उपादान अव्यय का वाग्-भाग है । क्रियायी अक्षरसृष्टि का अधिष्ठाता अव्यय का प्रारणभाग है । एवं ज्ञानमयी अव्ययसृष्टि का अधिष्ठाता अव्यय का मनोभाग है । ज्ञानसृष्टि नाममात्र की सृष्टि है । अतएव इसे ' भात्रसृष्टि ' कहा जाता है । स्वायम्भुव — सप्तविध ऋषिप्राण, मानवसृष्टि के मूलभूत चार प्रकार के मनुप्रारण, ये भावात्मक विवर्त्त भावसृष्टि के ही अन्तर्भूत हैं । यही ' अव्ययसृष्टि ' है । अनेक क्रियाएँ मिलकर एक एक गुण बनता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये पाँच तन्मात्राएँ हीं ‘ गुरणभूत ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इस ' गुरणसृष्टि ' का प्रवर्त्तके अक्षर है । अनन्तर ‘ तत्तु समन्वयात् ’ ( व्याससूत्र ) इस सिद्धान्त के अनुसार वैकारिक जगत् के उपादानभूत अर्थशक्तिमय दर के समन्वय से अक्षर से सृष्ट वही गुणभूत क्रमश: अणुभूत, रेणुभूत, महाभूत, भूतभौतिक, रूप में परिणत होता हुआ अर्थसृष्टि में परिणत होजाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' गुणकूटो द्रव्यम् ' यह कहा जाता है 1 संसार के सम्पूर्ण पदार्थ द्रव्य हैं 1 । अर्थ हैं । इन की समष्टि ही वैकारिक विश्व है । इसका उपादान क्षर है | गुणसृष्टि का अधिष्ठाता अक्षर है । भावसृष्टि का अधिष्ठाता अव्यय है । अव्यय पुरुष है । अक्षर इस पुरुष ३६४

पृष्ठ 627

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शतपथब्राह्मण की पराप्रकृति है । क्षर अपराप्रकृति है । परा और अपरा प्रकृति से गुण, और विकारसृष्टि होती है । एवं पुरुष से भावसृष्टि होती है | इसप्रकार त्रिपुरुषात्मक ब्रह्म से - ' एकं वा इदं वि बभूव सर्वम् ' के अनुसार सबका उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है । इसी सृष्टित्रयी - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् कहते हैं— महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।

भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ।

विकारांथ गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥

गीता अव्यय, अक्षर, क्षर, तीनों क्रमशः भाव, गुण, विकार, इन तीन सृष्टियों के प्रभवप्रतिष्ठा-परायण - बनते हुए सर्वत्र व्याप्त हो रहे हैं । आप जितना भूतप्रपञ्च आँखों से देख रहे हैं, सब ' क्षर ' है, यही ‘ वाक् ’ है । उसके गर्भ में ' अक्षर ' है, यही ' प्राण ' है । सत्र के गर्भ में ' अव्यय ' है, यही ' मन ' है । तर स्थूल है, यही ' भूतयोनि ' नाम से प्रसिद्ध है । अक्षर सूक्ष्म है, यही ' भूतभावन ' नाम प्रसिद्ध है । एवं अव्यय सुसूक्ष्म है, यही ' भूतेश्वर ' है । अव्यय सुसूक्ष्म है, अतएव उपनिषदों में यह ' गूढोत्मा'- ( निगू-ढोत्मा - छिपा हुआ आत्मा ) नाम से प्रसिद्ध है । ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः ' के अनुसार वह केवल विज्ञानगम्य है | इसी अभिप्राय से कठश्रुति कहती है-एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । • दृश्यते त्वग्रच्या बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिमिः ॥ - कठ १ | ३ | १२ इति मनः, प्राण, वाक्, तीनों की समष्टि ' सत्ता ' है । अव्यय की चौथी कला विज्ञान है, यही ' चित् ' है । पाँचवीं कला ' आनन्द ' है । आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाक् कहो, किंवा आनन्द, चित्, सत् कहो, एक ही बात है । पूर्व में कहा जाचुका है कि, सृष्टि में प्रधानता यद्यपि सत्तारूप मनः -प्राण-वाक् - की ही है । परन्तु श्रानन्द - विज्ञान -भी सहकारी रहते हैं । ऐसी अवस्था में हम कहसकते हैं कि, सम्पूर्ण विश्व ' सच्चिदानन्दब्रह्ममय ' है । इस सच्चिदानन्दब्रह्म से ही अर्थसृष्टि होती है, इसीसे शब्दसृष्टि होती है । मन सुसूक्ष्म है, अतएव इसे ' अ ' कहा जाता है । क्योंकि शब्दसृष्टि में— “ अकारो वै सर्वा त्राक् । सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना वह्नी नानारूपा भवति ” - ऐ ० आर ० २/३/७ इस ऐतरेयश्रुति के अनुसार ' अकार ' ही शब्दप्रपञ्च का मूलाधार है । एवं यह असंस्पृष्ट है, असङ्ग है । वाक् स्थूल है । अतएव इसे ' म् ' कहा जाता है । क्योंकि शब्दसृष्टि में ' म् ' में ससङ्गभाव का प्रवेश है । मध्यस्थ प्राणभाग स्थूलसूक्ष्म है । अतएव इसे ' उ ' कहा जाता है । ' उ ' कारोच्चारण में मुखभाग संकुचित होजाता है । परन्तु स्पर्श नहीं होने पाता । इन तीनों के अतिरिक्त एक परात्पर और बच जाता है । इसी के सम्बन्ध से वह प्रजापति षोडशी कहलाता है । वही तत्त्व शब्दसृष्टि में ' अर्द्ध मात्रा ' नाम से प्रसिद्ध ३६५

पृष्ठ 628

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 628 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड है | यह अद्ध मात्ररूप अखण्ड है । व्यापक है । विश्वातीत है । श्रव्ययपुरुष ईश्वर कहलाता है । एक एक माया से एक एक मायी ईश्वर का स्वरूप सम्पन्न होता है । एक एक मायाप्रपञ्च एक एक ब्रह्माण्ड है । सर्व-बलविशिष्ट रसरूप उस परात्पर में ऐसे ऐसे अनन्त मायाप्रपञ्च हैं । अनन्त मायी ईश्वरों का आधारभूत वह परात्पर ‘ परमेश्वर ' नाम से प्रसिद्ध है । ईश्वर अनन्त हैं । सावच्छिन्न हैं । किन्तु परमेश्वर एक है । निरवच्छिन्न है | यह तत्त्व मनः - प्राण - वाक् तीनों से अतीत है । अतएव अविज्ञेय, एवं अनिर्वचनीय है । अद्ध'मात्ररूप परात्पर की इसी विज्ञेयता का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है-संविदन्ति न यं वेदा विष्णुर्वेद न वा विधिः । यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । - इसी श्रौत सिद्धान्त का अनुसरण करता हुआ पुराण कहता है-मात्र स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः । त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवी जननी परा । — देवीभागवत । इस स्रष्टा ईश्वरप्रजापति में - परात्पर, अव्यय, अक्षर, क्षर, ये चार भाग हैं । परात्पर अर्द्ध मात्रा है । अव्यय ' अ ' है । अक्षर ' उ ' है । तर ' म् ' है । यही ' ओम् ' है । इसीलिए ‘ तस्य वाचकः प्रणवः ' यह कहा जाता है । ' ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम् ' ( मुण्डक २१२६ ) का भी यही रहस्य है । परात्पर, एवं अव्यय को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए, एवं अक्षर, और क्षर की ओर दृष्टि डालिए । अक्षर से गुणसृष्टि होती है । गुणसृष्टि शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, इन पाँच तन्मात्राओं में विभक्त है । इनमें शब्दतन्मात्रा प्रधान है । इसी से क्रमश: वायु, तेज, जल, पृथिवी ( मृत् ) इन भूतों की सृष्टि होती है । क्षर के समन्वय से वही गुणभूत अणुभूत में परिणत होता है । अणुं रेणु में, एवं रेणु पञ्चमहा-भूत में परिणत होता है । पञ्चमहाभूतों का मूल वही शब्दतन्मात्रा है । क्षर की पाँच कलाओं में से पहिली कला ‘ प्राण ' है । इससे स्वयम्भूमण्डल का विकास होता है । दूसरी ' आप: कला है । इससे आपोमय परमेष्ठी का विकास होता है । आपोमय परमेष्ठी ही मैथुनी सृष्टि का मूल है । यहीं से शब्द और अर्थसृष्टि उप-क्रान्त है । पर्मेष्ठी में भृगु, अङ्गिरा, दो तत्त्व हैं । भृगुधारा ' आम्भृणीवाकू, है, इसीसे अर्थसृष्टि होती है, एवं अङ्गिराधारा ‘ सरस्वतीवाक् ' है । इसीसे शब्दसृष्टि होती है । दोनों का प्रभवस्थान एक है, अतएव दोनों अभिन्न हैं । यही कारण है कि, अर्थसृष्टि का ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं, जिसमें शब्द ( ध्वनि ) न होता हो । एवं ऐसा कोई शब्द नहीं, जिसका अर्थ से सम्बन्ध न हो! इसी आधार पर ' न सन्ति यदृच्छाः शब्दाः ' ( महाभाष्य ) यह कहा जाता हैं । इस शब्दार्थप्रपञ्च का विशद निरूपण पूर्व प्रकरणों में किया जा चुका है । अतः उसकी पुनरुक्ति करने की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि, शब्दार्थ प्रपञ्च का ऋषियोंनें अपनी दृष्टि से साक्षात्कार किया । एवं उस अर्थविज्ञान को तदनुरूप शब्दों के द्वारा ( जो कि शब्दसृष्टि ईश्वरीया है ) उसका संकलन किया । परोक्ष पदार्थों का शब्द के द्वारा होने वाला वह ३६६

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शतपथब्राह्मण संकलन हीं ‘ वेदसंहिता ' नाम से प्रसिद्ध है । साधारण वाक् वाक् है । परन्तु परोक्ष अर्थ का निरूपण करने वाली वाक् ‘ मन्त्र ' है । प्रकृति के प्राणदेवता भिन्न भिन्न छन्दों से छन्दित हैं, जैसा कि विराट्छन्दः प्रकरण में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । उन उन छन्दों से छन्दित प्राणदेवताओं के छन्दों के अनुरूप ही मन्त्रों के छन्द हैं । अर्थच्छन्द में जैसी उदात्त॥द स्वररूपा वीचि है, वे ही स्वर इस मन्त्रबाकू में समाविष्ट हैं । इनके उच्चारण से छन्द से छन्दित देवता पकड़ में आ जाते हैं । यदि इनके बोलने में यत्किञ्चित् भी सावधानी होजाती है, तो इष्ट के स्थान में अनिष्ट होजाता है । मन्त्रवाक् उस शब्दार्थमय ब्रह्म की ही प्रतिकृति है । इससे वह पकड़ में आजाता है । अतएव इसे भी ' ब्रह्म ' कहा जाता है । इसका बल वही है । विद्वान् ब्राह्मण के मुख से निकली हुई मन्त्रबाक् साक्षात् ब्रह्म है । इससे वह तत्त्व गृहीत होजाता है । मन्त्र के द्वारा देवता गृहीत हो जाते हैं । देवता अग्निमय हैं । अग्नि श्रसुरप्राण का नाशक है । अतएव कहीं आसुर प्राण के नाश के लिए साक्षात् वैध अग्नि की सहायता ली जाती है, तो जहाँ अग्निकर्म्म सम्भव नहीं होता, वहाँ इस मन्त्ररूप वागग्नि की सहायता लीनाती है । मन्त्रवाक् वास्तव में अग्नि है । शरीर का अग्नि ही वायु से धक्का खाकर उरः, कण्ठ, शिरोभाग में जाकर मुख में आता हुआ शब्दरूप में परिणत होता है । इसी आधार पर श्रुति कहती है-“ तस्य या एतस्याग्नेवगेियोपनिषत् " ( शत ० १ ३ | ५ | १ | कं ० ) । “ अग्निवाग भूत्वा मुखं प्राविशत ” ( ऐ ० उ ० २।४ ) । ७ लौकिक वागग्नि विच्छिन्न होता है, अतएव वह निर्बल होता है । इससे सुर प्राण का नाश नहीं होसकता । परन्तु स्वरयुक्ता देवमयी मन्त्रवाक् छन्द से छन्दित रहने के कारण अविच्छिन्ना रहती है । अतएव यह सबल है | यही मन्त्रबल है । यही ब्रह्मबल है । ब्रह्मर्षि वसिष्ठने राजर्षि विश्वामित्र को इसी ब्रह्मबल से परास्त किया था । श्राज यह अध्वर्यु इसी ब्रह्मबल से अन्तरिक्ष में व्याप्त आसुर प्राण का नाश करता है । ' वाग्वा इन्द्रः ' के अनुसार मन्त्रवाक् साक्षात् इन्द्र है । यह इन्द्र ही व्याकरण करता है, जिसका कि निरूपण किसी आगे के प्रकरण में किया जायगा । वाक् बोलते ही उस का एक बत्त ' लवृत्त ( गोल मण्डल ) बनता है । उस मण्डल. में वही इन्द्रप्रारेण व्याप्त होजाता है । आसुर प्राण वारुण है । वरुण, और इन्द्र में परस्पर अश्वमाहिष्य है । श्रुतएव प्रबल इन्द्रप्राण के आते ही अन्तरिक्ष में रहने वाला वारुण आसुर प्राण विलीन होजाता है । ऐसा. होने से इसका अन्तरिक्ष निरुपद्रव बन जाता है । हम देखते हैं कि, यदि किसी के ग्रावासगृह में तस्कर ( चौर ) घुस आता है, एवं उस समय खड़खड़ाहट से जागे हुए घर के किसी मनुष्य के मुख से - ' अरे घर में कौन है रे'– ये अक्षर निकल जाते हैं, तो सुरप्राणयुक्त चौर का हृत्कम्प हो उठता है, एवं वह उसी समय भाग जाता है | भला साधारण लौकिकी वाक् में जब उपद्रावक दुष्टों को मार भगाने की शक्ति है, तो फिर मन्त्र-वाक का तो कहना ही क्या है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं— ‘ ब्रह्मणैनैतदभयमनाष्ट्र ं कुरुते ' इति ॥४ ॥

‘ श्रग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ’ – के अनुसार अग्नि में सोमाहुति प्रवेश का नाम हीं यज्ञ है । ' अन्नोर्क-प्राणानामन्योऽन्यपरिग्रहो यज्ञः ' - वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यद्यज्ञः ' - ' आध्यात्मिकप्राणदेवैः सह ३६७

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 630 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड आधिदैविकप्राणदेवानां संगमनमेव यज्ञः ' इत्यादि रूप से यज्ञ के अनेक लक्षण किए जाते हैं । सभी लक्षणों का पर्य्यवसान ‘ अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' - इसी लक्षण पर होरहा है । अध्यात्म, श्रधिभूत, अधिदैवत, तीनों स्थानों पर अग्नि में सोम की आहुति हो रही है । इसी अग्नीषोमात्मक यज्ञ पर तीनों स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित हैं । ‘ बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः - के अनुसार अधिदैवत विश्व के केन्द्र में प्रतिष्ठित सूर्य्यं निरन्तर अग्निहोत्र कर रहा है । पारमेष्ठ्य सोप निरन्तर इस सौराग्नि में आहुत होरहा है । हम प्रतिदिन सायं प्रातः अपने शारीरिक अग्नि में अन्नसोम की आहुति दे रहे हैं । संसार का प्रत्येक भौतिक पदार्थ अग्निमय है । वह भी सोमाहुति लेकर ही स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित होरहा है । जबतक यज्ञ है, तभीतक इन तीनों की सत्ता है । इन तीनों यज्ञों में जो आधिदैविक सौरयज्ञ है, वही हमारा ग्राराध्य है । इस सौरयज्ञ के प्रभाव से ही सौरप्राणदेवता पार्थिव मर्त्यभाव से निकल कर अमृतभाव में परिणत होरहे हैं । हमारा आध्यात्मिक यज्ञ पार्थिव प्राण की प्रधानता से मर्त्यभावापन्न है | आध्यात्मिक - प्राणदेवताओं को उसी नित्य यज्ञ की प्रतिकृतिभूत वैधयज्ञ के द्वारा उन आधिदैविक प्राणदेवताओं के साथ मिला कर अमृतभाव प्राप्त कर लेना हीं कर्म्मप्रधान यज्ञ का अन्यतम फल है । यज्ञ - हत्रिं, सोम, अति, महा, भेद से अनेक प्रकार के हैं । इन में सब से पहिला यज्ञ हविर्यज्ञ है । अधिकारसमर्पक अग्निहोत्र के अनन्तर हविर्यज्ञ किया जाता है । अनन्तर सोमयज्ञ किया जाता है । सोमयज्ञ का ही नाम ‘ ज्योतिष्टोम ' है । यही स्वर्गप्राप्ति का साधक है । परन्तु तबतक यह नहीं किया जासकता, जत्रतक कि पहिले हविर्यज्ञ नहीं करलिया जाता । हविर्यज्ञ पार्थिव यज्ञ की प्रतिकृति है । सोमयज्ञ, सौरयज्ञ की प्रतिकृति है । अध्यात्म को सूर्य्य में ले जाना है । मध्य में पार्थिव प्राण है । अतः पहिले इस के साथ आध्या-त्मिक् देवताओं का योग कराना आवश्यक होजाता है । पार्थिव प्राणदेवता ' द्यामङ्गिरसो ययुः ' - ( अथर्व०-८ | १ | ६१ ) के अनुसार द्य, लोक से सम्बद्ध हैं । इन से सम्बद्ध हमारे प्राणदेवता इन के द्वारा उस द्युलोक में जाने के लिए समर्थ होजाते हैं । पार्थिव यज्ञ में अन्नसोम की आहुति होती है । पृथिवी के दो भाग कर दीजिए । एक सूर्य्यं की ओर रहेगा, एक विरुद्ध दिक् में रहेगा । जो सूर्य्यविरोधी भाग है, वही गार्हपत्या-ग्निकुण्ड है । इस में रहने वाला पार्थिव अग्नि गार्हपत्याग्नि है । सूर्य की ओर का पार्थिवखण्ड ग्रह-वनीयकुण्ड है । इस का अग्नि आहवनीयाग्नि है । मध्य का प्रदेश वेदि है । दक्षिणभाग दक्षिणाग्निकुण्ड है | वहाँ का अग्नि दक्षिणाग्नि है । यही ' श्रपणाग्नि ' नाम से प्रसिद्ध है । चन्द्रसोम अन्नरूप में परिणत होता है | अन्नरूप में परिणत इस चान्द्रसोम की पार्थिव ग्राहवनीय अग्नि में निरन्तर आहुति होती रहती है । सम्पूर्ण अन्न इसी पर उत्पन्न होते हैं । अन्त में इसी में बहुत होजाते हैं । पृथिवी पर रहने वाले जितने प्राणी हैं, सब अन्नमय हैं । अन्न में - स्थूल, सूक्ष्म, सुसूक्ष्म, तीन भाग रहते हैं । स्थूल भाग पार्थिव है । इस से रसासृगादि सप्तधातुओं का निर्माण होता | सूक्ष्मभाग आन्तरिक्ष्य है । इस से ' प्रोज ' नाम से प्रसिद्ध प्राण उत्पन्न होता है । सुसूक्ष्म भाग दिव्य है । यही ' मन ' कहलाता है । सप्तधातु वाक् है, ओज प्रारण है, दिव्य सोमभाग मन है । अन्न- मनः प्राण- वाङमय है | इस को खाने वाले सभी प्राणी भी मनः-प्राणवाङ ्ममय ही हैं । वागुरूप अन्न प्राण के द्वारा चित्त - ( मन ) - बनता है | वह विषयग्रहण में ( इन्द्रियों के द्वारा ) उपयुक्त हो कर पुन: वागरूप अन्न लेता है । यह धाराक्रम निरन्तर चला करता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ऐतरेयने यज्ञ का ' वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यज्ञः ' -यह लक्षण किया है । अन्न जत्र खाया जाता है, तो वह पहिले ' ऊक् ' बनता है ' बलप्रद रस ही ' ऊ ' है । इसी से तृप्ति-भाव उत्पन्न होता हैं । उर्क ' प्राण ' बनता है | प्राण इन्द्र की विक्षेपणशक्ति के द्वारा रोमकूपों के द्वारा बाहिर ३६८