Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 631–640
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 631–640
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शतपथब्राह्मण निकल जाता है । इस क्षतिपूर्ति के लिए प्राण पुन: अन्न लेता है । धन्न पुन: ऊर्क बनता है । ऊर्क पुन: प्राण बनता है । यह चक्र निरन्तर चलता रहता है । इसी आधार पर यज्ञ का ' अन्नोर्क प्राणानाभन्यो-ऽन्यपरिग्रहो यज्ञः ’ - यह लक्षण किया जाता है । इससे बतलाना यही है कि, अन्न - मनः प्राणवाङ्मय है | इसी से प्रजा उत्पन्न हुई है । अतएव प्रजा भी मन: प्राणवाङ मयी ही है । न्नरूपा ही है । अन्न ही इन का प्रभव - प्रतिष्ठा -परायण है । अन्न के गर्भ में हमने प्राण बतलाया । प्राण के गर्भ में मन बतलाया I सृष्टि में इन तीन की ही प्रधानता है । परन्तु विज्ञान, और आनन्द, इन में नहीं है, यह बात नहीं है । मन के गर्भ में विज्ञान, एवं आनन्द है । अन्न में सच है । हमारे में सत्र है । संसार में जड़, अथवा चेतन, ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है, जिस में ये पाँचों न हो । इन पाँचों में सब से स्थूल अन्न है । पहिले इसी पर दृष्टि जाती है, इसी के द्वारा आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राणवाङमय पञ्चकोशात्मक अव्ययब्रह्म का बोध होता है । अतः सत्र से पहिले इसी अन्नकला का निरूपण करती हुई तैत्तिरीय - श्रुति कहती है— ' अन्न ं ब्रह्म ेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्न ेन जातानि जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति ' । — तै ० उपनिषत् इस सर्वविध अन्न की पृथिवी में श्राहुति होती रहती है । इसी हविर्यज्ञ की प्रतिकृति हमारा वैध हवि-यज्ञ है । क्योंकि प्राकृतिक हविर्यज्ञ में अन्नरूप में परिणत सोम की आहुति होती है । अतः इस वैधयज्ञ में भी अन्नसोम की ही आहुति होनी चाहिए । आज यह यजमान हविर्यज्ञरूपा ' पौर्णमासेष्टि ' करने वाला है । इस में अन्नात्मक सोम की आहुति होती है । अतः यजमान का प्रतिनिधि अध्वर्यु उसी हवि को लेने के लिए जाता है । अपरिपक्व अन्न को ' हवि कहते हैं, एवं परिपक्वान्न ' ' पुरोडाश ' नाम से प्रसिद्ध है । पुरो-डाश की आहुति होती है । तदर्थ आज इसे हवि लाना है । यह हवि कहाँ से लाया जाय?, किस स्थान से लाया हुआ हविर्द्रव्य यज्ञस्वरूप - सम्पादक होगा?, इस के लिए यज्ञविद्यावित् - वैज्ञानिकोंने ' अनस ( शकट - छकड़ा ) को ही उपयुक्त समझा है । शकट से ही हविग्रहण करना चाहिए । शकट से हविग्रण करने में क्या लाभ है?, इसी प्रश्न के समाधान के लिए निम्नलिखित ' हविर्ग्रहणमीमांसा ' नामका प्रकरण हमारे सम्मुख उपस्थित होरहा है । हविगूहणमीमांसा– आगे आने वाले ( १।४ ) ब्राह्मण में हम मनु का स्वरूप बतलाते हुए ' श्रद्धा ' तत्त्व का निरूपण करने वाले हैं । दीक्षा, तप, श्रद्धा, आकूति, प्रयुक्, चित्ति, आदि तत्त्व यज्ञ के विशेष पारिभाषिक भाव हैं । यज्ञ इह्नीं तत्त्वों के आधार पर प्रतिष्ठित है । इन सम्पूर्ण तत्वों में श्रद्धातत्त्व प्रधान है । बिना श्रद्धा के कोई भी कार्य्यं सफल नहीं हो सकता । सूर्य्यं के ऊपर परमेष्ठीमण्डल है । उस में तेज, और स्नेह, दो तत्त्व उत्पन्न होते हैं । ये ही दोनों तत्त्व संसार के मूल हैं । तेज अङ्गिरा है, अग्नि है । स्नेह भृगु है, सोम है 1 द्रवभाग है । उस में रहने वाला प्राणात्मक ताप अङ्गिरा है । तेजोमय स्नेहतत्त्व ही संसार का उपादानभूत ' शुक्र ' है । ईशोपनिषत् का - ‘ स * पर्य्यगाच्छुक्रम् ' - ( ईश १ = ) यह मन्त्र इसी तेजः, स्नेह - मय शुक्र का निरूपण * इस विषय का विशद विवेचन ईशोपनिषत् के भाषाभाष्य में देखना चाहिए । ३६६
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प्रथमकाण्ड करता है । इस शुक्र में जो स्नेहभाग है, उसी का नाम श्रद्धा है । यह श्रंद्धारस चान्द्रमोम का जनक है । चान्द्र-सोम श्रद्धा से उत्पन्न होता । इसी आधार पर पञ्चाग्निविद्या - प्रतिपादिका छान्दोग्य ति कहती है-‘ तस्मिन्न तस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति । तस्या श्राहुतेः सोमो राजा सम्भवति ' । - छान्दो ० ५।३।२ ‘ एष वै सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमाः ' के अनुसार चन्द्रमा हीं सोमराजा है । चान्द्रसोम के द्वारा वह श्रद्धारस अन्न में प्रतिष्ठित होता है । ' अन्नमयं हि सौम्य मनः ' के अनुसार अन्नगत दिव्यसोम मन बनता है । वह सोम श्रद्धामय है । अतएव सोममय मन भी श्रद्धामय होजाता है । श्रद्धा मन पर प्रति-ष्ठित है । मन विषयों के साथ बद्ध हो जाता है, इसका एकमात्र कारण यही श्रद्धातत्त्व ( स्नेहतत्त्व ) है । कितने हीं अन्न दिव्यभावापन्न हैं, कितने ही सुरप्राणप्रधान हैं । श्रद्धारस अपने स्वरूप से शुद्ध होता हुग्रा भी अन्न संसर्ग से तद्भावापन्न होजाता है । नो जैसा अन्न खाता है, उस की श्रद्धा वैसी ही होती है । एवं उस के लिए तत्सम पदार्थ ही श्रद्ध ेय बन जाता है । एक मनुष्य ऐसा हैं, जो - श्राद्ध, अवतार, मूर्तिपूजन, आदि पर श्रद्धा नहीं करता, श्रपितु कुत्सित शास्त्रविरुद्ध मद्यपानादि को ही आराध्य समझता है । शास्त्र, एक इन पर श्रश्रद्धा करता है, उन पर श्रद्धा रखता है । पूर्वजन्म के संस्कार, इस जन्म का संसर्ग, अन्न--सम्बन्ध, शिक्षा, देश की परिस्थिति, आदि आदि भाव श्रद्धा के स्वरूपसम्पादक हैं । जैसी श्रद्धा होजाती है, उसे वैसा ही हो जाना पड़ता है । श्रद्ध ेय में श्रद्धालु कभी दोषान्वेषण नहीं करसकता । अतएव श्रद्धा का ' दोष-दर्शनानुकूलवृत्तित्रतिबन्धकवृत्तिधारणं श्रद्धा ' यह लक्षण किया जाता है । आज इसी श्रद्धादेवी? की कृपा शास्त्रविरुद्ध कार्य्यं उपादेय, एवं अभ्युदयप्रवर्त्तक कार्य्यं उनं श्रद्धालुओं? की दृष्टि में बाधक बन रहे हैं । इस प्रपञ्च से केवल बतलाना यही है कि, श्रद्धा के द्वारा उस वस्तु का, किंवा भाव का आत्मा से सम्बन्ध होजाता है । इसी आधार पर - ' यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' ( गीता ) यह कहा जाता है । यद्विषयिणी श्रद्धा होगी, मन उसी विषय से भावना के द्वारा सम्बन्ध जोड़ लेगा । मनोविज्ञान के अनुसार पदार्थों के ग्रहण - परि-त्याग का प्रधान अधिष्ठाता श्रद्धामय मन है । यदि श्राप अपने श्रद्धामय मन में - ' मेरे कोश में कुछ नहीं है, कुछ नहीं है ' -यही भावना किया करते हैं, तो सचमुच आप थोड़े दिन पश्चात् ' कुछनहीं ' हीं होजाते हैं | ‘ यह भी मिथ्या - यह भी ढोंग - यह सब कल्पना है ' इसी भाव का अभ्यास करते करते आज भारतवर्ष अपने हाथ सबकुछ सेखो बैठा है । एवं अब भी उसी ' कुछ नहीं ' की ओर झुका हुआ है । ठीक इसके विरुद्ध यदि आप ‘ सब कुछ है ' यह भावना करते रहेंगे, तो अपने आप मन अपनी इस शक्ति से सब कुछ प्राप्त करने में समर्थ होजायगा । इसी आधार पर श्रुति कहती है-अन्न व सभवति सद्ब्रह्म ेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्म ेति चेद्वेद सन्तमेनं ततो विदुः ॥ - उपनिषत् यही कारण है कि, ' नास्तितत्त्व ' के उपासक सहस्रों मतवाद उत्पन्न हुए, और काल के गाल में विलीन होगए | परन्तु सत्ताब्रह्म की उपासना करने वाली हिन्दूजाति प्रबल से प्रबल आक्रमणों का तिरस्कार ३७०
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शतपथब्राह्मण करती हुई आज भी संसार को अपनी सभ्यता का पाठ पढ़ाने के लिए जीवित है, और रहेगी । जब मन पर ही सब कुछ हैं, तो इस से सिद्ध होजाता है कि, यज्ञकम्मों में जैसी भावना की जायगी, वैसा फल अवश्यमेव मिलेगा । इसीलिए स्थान स्थान पर ऋषियोंने इस भावना को ही प्रधान माना है । ' हमारी भावनामात्र से उसके साथ कैसे हमारे । सम्बन्ध होसकता है?, ' आगे के भावनामय श्रौत वचनों पर यह संदेह होसकता था । इसके लिए हमें पहिले से ही पूर्वोक्त समाधान करना पड़ा । अब प्रकृत की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । क्षेत्र से धान काटा जाता है । काट कर उसे सबसे पहिले शकट में ही भरा जाता है । अनन्तर शकट के द्वारा वह ग्राम में आता है । शकटधान ' प्रथमभावापन्न ' है । अभावापन्न है । जो मनुष्य प्रत्येक काम में ' अरे करलेंगे - देखा जायगा ' यह सोचा करता है, उसका कार्य्यं कभी सफल नहीं होता । क्योंकि उसकी वृत्ति उस भावना से निर्बल होजाती है । इसलिए उचित है कि, कल पर किसी काम को न छोड़े । जो करना हो, वह पहिले ही करे । आत्मा को सदा अग्रभावापन्न ही रखना चाहिए । यदि विद्या पढ़ना हो तो, सब सहपाठियों से पहिले पहुँचे । पहिले चिन्तन करे । इस अग्रता से श्रात्मा में स्फूर्ति आती है । श्रात्मबल बढ़ता है, एवं उस कार्य्य में उत्तरोत्तर अभ्युदय ही होता है । अग्रभाव से कार्य्यनिर्भरता श्राती है । अतः यज्ञकर्त्ता श्राराधना करनी चाहिए । शकट अभावापन्न है । शाला अध्वर्यु को प्रारम्भ से ही उस अग्रभाव की अनन्तर अन्न रक्खा नाता है । अतः वह ' पश्च व ' है । ऐसी अवस्था में यदि शाला से धान ग्रहण किया जायगा, तो - तद्गत श्रोछापना आत्मा में प्रविष्ट होपड़ेगा । वह आगे के कार्य्यं में निर्बलता उत्पन्न करदेगा । ऐसा न हो, जो अभाव है, उसीका हम ग्रहण करैं, इसीलिए अग्रभावापन्न शकट से ही हविग्रहण करना उचित है । इसी पहिली उपपत्ति को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' सवा अनस एव गृह्णीयात् । ग्रनो ह वा अग्रे, पश्चव वा इदं ' यच्छालम् । स
यदेवाग्रे - तत् करवाणि इति । तस्मादनस एव गृह्णीयात् ॥५ ॥
अभ्युदय, निश्रेयस, भेद से सुख दो प्रकार का माना गया है । मुक्ति निश्रेयससुख है । स्त्री, पुत्र, धन, धान्य, प्रासाद, पशु, अनुचर आदि आदि विभूतियाँ ऐहलौकिक अभ्युदय से सम्बन्ध रखतीं हैं । एवं ‘ सप्तदश ’ नाम से प्रसिद्ध नाचिकेत स्वर्गसुख पारलौकिक अभ्युदय है । सुख तीन हीं भागों में विभक्त है । इन तीनों में पारलौकिक स्वर्गसुखप्राप्ति का साधन कर्म्मकाण्ड है । इष्ट, आपूर्त्त, दत्त नाम से प्रसिद्ध विद्यानिरपेक्ष-प्रवृत्तिकर्म करता हुआ मनुष्य ऐहलौकिक सुख भोगता हुआ शरीर छोड़ने के अनन्तर उदन्वती, पीलु-मती, प्रद्यौ, इन तीनों में से किसी एक पितृस्वर्ग में जाता है । वहाँ नियतकाल पर्य्यन्त सुख भोगकर बुनः इसी भूमण्डल पर कर्म्मानुसारिणी योनि में जाता है । यज्ञ, तप, दान नाम से प्रसिद्ध विद्यासापेक्ष - प्रवृ-त्तिकर्म्म करता हुआ मनुष्य जीवितदशा में ऐहलौकिक सुख भोगता हुआ अनन्तर स्वर्ग में ( देवस्वर्ग में ) प्रतिष्ठित होता है | पश्चात् ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोके वसन्ति ' के अनुसार पुनः यहीं आजाता है । यदि विद्यासापेक्षकर्म्म प्रवृत्ति छोड़ कर करता है, तो यही कर्म्मयोग - ‘ काम्यानां कर्म्मरणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः ’ ३७१
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प्रथमकाण्ड इस गीतासिद्धान्त के अनुसार ज्ञानयोग बनता हुआ ' निश्रेयस ' नाम से प्रसिद्ध मुक्ति का साधक बन जाता है । एवं ‘ अकर्म्म ' ( निरर्थककर्म्म - जलताड़नादि ), और ' विकर्म्म ' ( शास्त्रप्रतिषिद्ध - सुरापानादि ) कर्म्म, दोनों हीं लोकों में दुःख के कारण बनते हैं । यदि इन कम्मों के अवान्तर विभागों का प्रस्तार किया जाता है, तो अनन्त गतियाँ होजाती हैं, जिनका कि विशद स्वरूप किसी आगे के प्रकरण में बतलाने की चेष्टा की जायगी । अभी हमें केवल यही बतलाना है कि, हमारे प्रकृत यज्ञकाण्ड का सम्बन्ध पारलौकिक स्वर्गसुख से है । स्वर्ग-प्राप्ति ही एकमात्र काम्ययज्ञ का फल है । सुख और दुःख है क्या पदार्थ?, इस प्रश्न का उत्तर देती हुई श्रुति कहती है-“ यो नै भूमा - तत्सुखम् । यद्ल्पं - तदु: खम् - नाल्पे सुखमस्ति ” । - उपनिषत् भूमा को सुख कहते हैं, एवं अल्पता को दुःख कहते हैं । अभी मनुष्य उत्पन्न हुआ । अब क्रमशः बढ़ने लगा । युवावस्था में पादार्पण किया । विवाह हुआ । पुत्र हुआ । द्रव्योपार्जन करने लगा | यह सत्र भूमाभाव की ही क्रमिक वृद्धि है । ज्यों ज्यों मनुष्य के कोश में सम्पत्ति की वृद्धि होती है, त्यों त्यों सुख की वृद्धि होती है । इस से आनन्द आता है । इसी सांसारिक आनन्द को वैज्ञानिक ' समृद्धानन्द ' नाम से व्यवहृत करते हैं । एवं आत्मानन्द ' शान्तानन्द ' नाम से सम्बोधित हुआ है । दोनों हीं भृमा से सम्बन्ध रखते । साधारण मनुष्य सांसारिक सुख को दुःख का कारण समझते हैं । परन्तु ऐसा है नहीं । सांसारिक सुख दुःख के कारण नहीं हैं, अपितु उन को अल्पता ही दुःख का कारण है । पुत्र होना सुख है । परन्तु वह यदि मर जाता है, तो दु: ख होता हैं । यदि निरन्तर वृद्धि ही होती रहे, तो कभी दुःख नहीं होसकता । इसी विज्ञान के आधार पर ' अजितं जेतुमनुचिन्तयेत् न कचिदप्यलंबुद्धिमादध्यात् ' – यह श्रुति-वचन हमारे सम्मुख आता है । ' हम कृतकृत्य हो गए । अब हमें क्या करना है ' - यह विचार कभी मत करो, अपितु जो आपके कोश में नहीं है, उसे लेने के लिए निरन्तर प्रयास करते रहो । कभी ‘ अलम् ' ‘ पर्य्याप्तम् ’ यह भाव समीपं मत आने दो । कहना नहीं होगा कि, इस आदेश का तिरस्कार करने के कारण हीं अधिकार— विरुद्ध आत्मज्ञान का घन्टाघोष करने वाला ग्रान का भारतीय - जगत् अल्पता का उपासक बन कर ग्राम एका-न्तत: ही अल्प बन गया है | ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, आदि आदि के उच्च शिखर पर विराजमान हमारा भारतवर्षं श्राज कर्म्मण्य बन कर सचमुच अपने कोश से सभी कुछ तो खो बैठा है ' यत् किञ्चित् ज्ञानमात्रा से विद्वान् अपने आप को कृतकृत्य मान लेते हैं । यही दशा इतर वर्णों की हैं । परन्तु श्रुति कहती है कि, भूलते हो । अभी प्राप्तव्य बहुत कुछ है । इसी विषय का बड़ा सुन्दर निरूपण करता हुआ निम्नलिखित उपनिषद्-• वचन हमारे सम्मुख उपस्थित होता है— ' यदि मन्यसे सुवेदेति, दभ्रमेव त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ' । - ईशोपनिषत् तात्पर्य्यं कहने का यही है कि, भूमाभाव सुख का कारण है । आज यज्ञ के द्वारा यजमान इसी भूमा-सुख को प्राप्त करना चाहता है । इसलिए यह अभी से अपने श्रद्धामय मन को भूमाभाव की ओर ही झुकाता ३७२
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शतपथब्राह्मण है । जन्न अधिक होता है, तो शकट की अपेक्षा होती है । अतएव हम शकट को अवश्य ही ' भूमा ' भावा-पन्न कहसकते हैं । इससे हविग्रहण करने से यजमान का मन अवश्य ही भूमाभाव की ओर झुक जाता है । इस भूमा को प्राप्त करने के लिए ही ( जोकि इसका अभीष्ट फल है । शकट से ही हविग किया जाता है 1 इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर क्रमप्राप्ता श्रुति ने कहा है-“ तद् भूमानमेवैतदुपैति ” ॥६ ॥
“ शकट से भी अधिक भूमा कृषिभूमि में है । अन्न काट कर कृषिभूमि में ढेर लगा दिया जाता है ।. यदि भूमा ही अपेक्षित है, तब तो वहीं से हविग्रहण करना चाहिए ": - इस पूर्वपक्ष का निराकरण करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, यह सच है कि, शकट की अपेक्षा वहाँ भूमा अधिक है । परन्तु ध्यान रहे, –हम यज्ञ कर रहे हैं । श्रतः हमें उसी भूमा का ग्रहण करना चाहिए, जो कि यज्ञ से सम्बन्ध रखती हो । खेत में पड़ा हुआ अन्न अयज्ञिय है, एवं शकटस्थ अन्न यज्ञिय है । अवश्य ही शकट की अपेक्षा कृषिप्रदेशस्थ अन्नराशि यद्यपि त्रहु - भूमा – भावानुगता हैं 1 । तदपि उसे अनेक अनुबन्धों से - ' यज्ञियभूमा ' नहीं माना जासकता । कृषि– भूमि में अनेक प्रकार के अन्न समुत्पन्न होते हैं । · मात्र, मसूरादि प्रयज्ञिय अन्न भी इसी कृषिक्षेत्र में उत्पन्न होते हैं । इसके अतिरिक्त विविध प्रकार के तृण - कण्टक- आदि प्रवर्ग्य - उच्छिष्ट - भावों के सम्पर्क - सान्निध्य से भी कृषिक्षेत्रस्था अन्नराशि अयज्ञिया बनी रहती है । अतएव जबतक इसे इस क्षेत्र से पृथक् कर परिष्कृतरूपेण शकटादि से समन्वित नहीं कर लिया जाता, तबतक इस की भूमा यज्ञिया नहीं बन सकती । अतएव कृषिक्षेत्रस्थ अन्न को जहाँ यज्ञिय माना जायगा, वहाँ शकटस्थ अन्न को ही ' यज्ञिय ' कहा जायगा । ' यज्ञेन यज्ञमयजन्त ' यह सिद्धान्त है | अतः इस यज्ञ में यज्ञरूप शकटान्न का ही ग्रहण करना उचित है । इससे श्रुति यह भी शिक्षा देती है कि, तुम भूमा का सञ्चय अवश्य करो । परन्तु यज्ञिय ( यज्ञरूप आत्मानुकूल ) भूमा का ही सञ्चय करो । यदि अन्याय से, अत्याचार से तुम भूमा प्राप्त करोगे, तो वह दुःख का ही कारण बन जायगी । सुख मिलेगा, परन्तु वह सुख अन्ततोगत्वा श्रात्मा का घातक ही प्रमाणित होगा । माना कि, तुमने वकालत से, डाक्टरी से, एवं ओर ओर साधनों से मिथ्याभाषण, आडम्बर आदि आदि महास्त्रों के उपयोग से पर्य्याप्त धन सञ्चय कर लिया । एवं उसके द्वारा विलास में रत रहे । परन्तु विश्वास करो, यह भूमा अन्त में तुझारे ( आत्मा के ) विनाश का ही कारण बन जायगी * । इसलिए भूमा ही प्राप्त करनी चाहिए, जो न्यायसङ्गत हो, वर्णधर्म्मानुकूल हो, आत्मयज्ञ को समृद्ध करने वाली हो | हमारी शकटभ्रूमा ऐसी ही है । इसलिए इसी से हविग्रहण करना उचित है । शकट— ऐसी ही कैसे हैं?, इसका उत्तर है - परोक्षार्थ को देखने वाले महर्षियों का आदेश | उनका विश्वास है भूमा कि, शकटभूमा यज्ञिया है । ६ वीं कण्ड़िका में इस शकट की यज्ञरूपता बतलाई जाने वाली है । अभी केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि, यज्ञप्रतिपादक यजुर्वेद में शकटसम्बन्धी ही मन्त्र उपलब्ध होते हैं ।
* - श्रधर्मेणैधते तावत्, ततो भद्राणि पश्यति ।
ततः सपत्नाज्जयति, समूलस्तु विनश्यति ॥
- मनुः ३७३
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प्रथमकाण्ड ' मन्त्र ' निर्माण प्राकृतिक विज्ञान के आधार पर अवलम्बित है । जैसा प्रकृति में हैं, तदनुरूप ही मन्त्र हैं । क्योंकि शकट से ग्रहण करने का मन्त्र है, अतएव हम अवश्य ही शकट को यज्ञरूप कह सकते हैं । याज्ञ-वल्क्य से पहिले कितने हीं ऋषि भस्त्रा से हविर्ग्रहण करते थे । उनकी समालोचना करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, सम्भव है, किसी शाखा में भस्त्रा - सम्बन्धी मन्त्र उनं ऋषियों को उपलब्ध होगया हों । परन्तु आज हमें जो शाखाएँ उपलब्ध होरहीं हैं - उनमें हम भस्त्रा - सम्बन्धी मन्त्र का प्रभाव पाते हैं । इस समय तो शकटसम्बन्धी यजुर्मन्त्र ही उपलब्ध होता है । अतः ' स्थितस्य गतिचिन्तनीया ' इस सिद्धान्त के अनुसार ' हम यज्ञ से यज्ञनिर्माण करें - यज्ञिय भूमा से अपने यज्ञ को भूमायुक्त बनावें ' - इस भावना को प्रधान मान कर यज्ञरूप शकट से ही हविग्रहण करना चाहिए । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कहा है-' यज्ञाद्यज्ञं निर्म्ममा ' - इति । T - 11911 नहाँतक सम्भव हो, शकट से ही हविग्रहण करना उचित है । परन्तु सम्भव है - यज्ञकाल में शकट उपलब्ध ही न हो । तब क्या करना चाहिए? | शकटाभाव में किससे हविग्रहण करना चाहिए १, यह प्रश्न सम्मुखं उपस्थित होता है । इसका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि- “ उतो पात्र्यै गृह्णन्ति ” । पात्री से यहाँ ' इड़ापात्री ' ही अभिप्रेत है । इडाप्राशनद्रव्य का परिपाक करने वाली पात्री इड़ापात्री हैं । अतएव यह कम्म ' इड़ाप्राशन ' नाम से प्रसिद्ध । यदि शकट न मिले, तो इस इड़ापात्री को शकट का प्रतिनिधि मान कर इस में हवि भर देना चाहिए । परन्तु इसमें इतना और करना पड़ेगा कि, जिस समय अध्वर्यु इड़ापात्री से हविग्रहण करै, उस समय ' रुपत्य ' को उसके नीचे लगाले, जिससे कि ग्रहण करते समय हविर्द्रव्य भूमि पर न गिर जाय । एक बात और यदि शकट से ही हविग्रहरण किया जाता है, तत्र तो - शकट के ' धू ’ भाग का स्पर्श करते हुए ' धूरसि ' यही मन्त्र बोला जाता है । यदि पात्री से ग्रहण करने का पक्ष है, तो ' धूरसि ' इस मन्त्र के पूर्व में “ यतो युनजाम ततो विमुञ्चाम ” - यह निगदमन्त्र और जोड़ दिया जाता है | शेष सम्पूर्ण कार्य्य शकय्ग्रहणवत् ही होता है । निम्नलिखित सूत्र इसी तथ्य का स्पष्टीकरण कररहे हैं— पात्र्यां वा स्योपहितायाम् । ( का ० श्री ० अ ० २,२८ ) धूरीपारोहणानि पात्रीबिले जपति । ( का ० श्रौ ० अ ० २,२८ ) हँु हन्तामित्युत्थानम् । ( का ० औ ० अ ० २,२६ ) इति । I इड़ापात्री को शकट मान कर शकट - सम्बन्धी सम्पूर्ण कर्म्म यहाँ भी करना चाहिए, तीनों सूत्रों का यही तात्पर्य्य है । ' धूरसि ' यह धू के स्पर्श का मन्त्र है । ' देवानामसि ' यह ' ईषा ' के स्पर्श का मन्त्र है । ‘ बिष्णुस्त्वाक्रमताम् ’ यह शकटारोहण का मन्त्र है । ' धूरीषारोहणानि ' के अनुसार ये तीनों मन्त्र उदगाग्र स्थिता इड़ापात्री के बिल के समीप ( जहाँ हविद्रव्य रक्खा गया हैं, वही प्रदेश बिल है ) बैठकर बोलने चाहिए । एवं ‘ हँ हन्तां दुर्य्याः ’ – यह शकट से नीचे उतरने का मन्त्र है । यहाँ पर यह मन्त्र बोलते हुए श्रध्वर्यु ' को आसन से उठ जाना चाहिए । यतो युनजाम ततो विमुञ्चाम ' यह भाव पात्री से ग्रहण करने पर ही उपलब्ध होता है । अतएव पात्री - ग्रहण पक्ष में हीं इस निगदमन्त्र का सम्बन्ध किया जाता है 1 तात्पर्य्य यही है कि, यदि शकट से हविग्रहण किया जाता है, तत्र तो जुहू, और उपभृत्, इन दोनों को ३७४
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शतपथब्राह्मण धूभाग के समीप रक्खा जाता है । यदि इड़ापात्री से ग्रहण किया जाता है, तो वेदि के उत्तरांस ( उत्तर-स्कंध ) के समीप स्पयं को उत्तराय रख कर इसके समीप ही पूर्वाय में जूहूपभृत् रखने का आदेश है, जैसाकि कात्यायन कहते हैं— ' घृताची ' इति धुरि निदधाति अनसि चेद् ग्रहणम् । - का ० श्र ० सू ० अ ० कं ० ७ सू ० १६ । स्फ्ये पात्र्यां चेत् ( का ० ८ श्रौ ० सू ० ( का ० ३।७।२० ) इति । पात्री — ग्रहण – पक्ष में स्पय के साथ ही जुहूपभृत् का योग है, एवं इसी से वियोग है । परन्तु शकट— ग्रहण - पक्ष में यह बात नहीं है । यहाँ जूहूपभूत् का धू से ही योग है, एवं इस पक्ष में वैय्यधिकरण्य है । पात्री-पक्ष में योग - वियोग का सामानाधिकरण्य है । इसी सामानाधिकरण्य को बतलाते हुए इस पक्षान्तर का निरूपण करते हुए याज्ञावल्क्य कहते हैं— ' यतो व युञ्जन्ति, ततो विमुञ्चन्ति ॥ ८ ॥
इति हवि हणमीमांसा - उपरता शकट से, यदि शकट समय पर उपलब्ध न हो, तो स्फ्योपहिता इड़ापात्री से हविग्रहण करना चाहिए । एवं जो कर्म्म शकट के सम्बन्ध में होता है, वह सत्र पात्री के सम्बन्ध में भी करना चाहिए, यह पूर्व में बतलाया जाचुका है । शकट के सम्बन्ध में क्या कर्म करना पड़ता है अब यही प्रकरण आरम्भ होता है । प्राकृतिक नित्य यज्ञ का प्रतिकृतिभूत पुरुष जैसे ' यज्ञ ' है, एत्रमेव तत्प्रतिकृतिभूत यह शकट भी यज्ञस्वरूप है । प्रकृति के यज्ञ में यों तो अवान्तर अनेक पदार्थ होते हैं । परन्तु प्रधानरूप से उसमें अग्नि, वेदि, हविर्द्धान ये तीन पदार्थ होते हैं । हविर्वेदि दर्शपौर्णमासेष्टि से सम्बन्ध रखती है, एवं महावेदि का ग्रहयागापरपर्य्यायक ज्योतिष्टोमयज्ञ से सम्बन्ध है । सम्पूर्ण भूपिण्ड गार्हपत्यग्निकुण्ड है । भूपृष्ठ से सूर्य्यं पर्य्यन्त सम्पूर्ण प्रदेश महावेदि है । १७ हवाँ अहर्गण उत्तरावेदिस्थ आहवनीय है । एकविंशस्थ सूर्य्य यूप है । सूर्य्यरूप यूप के नीचे १७ हवाँ आहवनीय है ↓ इसी में व्यापक सोम की निरन्तर आहुति होती रहती है । अतएव ' आहूयते यत्र सोमः ' इस व्युत्पत्ति से इसे ' आहवनीय ' कहा जाता है । इस आहवनीय से नीचे अन्नरस जो कि अन्नरस ‘ ऊर्क ’ नाम से प्रसिद्ध है ) नियत स्थान पर प्रति-ष्ठित रहता है | अन्नरस ही प्राणदेवताओं का हवि है । यह हवि अन्तरिक्ष के जिस प्रदेश में प्रतिष्ठित रहता है, उसे याज्ञिक – परिभाषा में ' हविर्द्धानि शकट ' कहा जाता है । पार्थिव श्रोषध्यादि का रसरूप सोम भूपिण्डं से उत्क्रान्त होकर पहिले इस प्रदेश में प्रतिष्ठित होता है, अनन्तर यहाँ से १७ वें ग्राहवनीय में श्रहुत होता है । अग्नि, और वेंदिवत् यह हवि भी यज्ञ का प्रधान उपकारक है । हविर्द्धान से नीचे का प्रदेश ‘ सदोमण्डप ' है । यहीं ८ प्रकार का ‘ नक्षत्राग्नि ' है । ये ही अग्नियाँ याज्ञिक - परिभाषा में ' धिष्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हैं । ६ मध्य में हैं । श्राग्नीध्रीय उत्तर में है, मार्जालीय दक्षिण में है । इसके नीचे आव संध्य, एवं सभ्य, नाम से प्रसिद्ध दो अग्नि और हैं । ३७५
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प्रथमकाण्ड हविर्यज्ञ का स्वरूप बतलाते हुए हमनें केवल भूपिण्ड में हीं अग्नित्रयी की सत्ता बतलाई थी । भूपिण्ड का पृष्ठभाग गार्हपत्य बतलाया था । सूर्य की ओर का भाग श्राहवनीय बतलाया था । श्राज इस ग्रहयज्ञ में अग्नित्रयरूप सम्पूर्ण भूपिण्ड गार्हपत्य बन जाता है । १७ वाँ स्थान आहवनीय होता है । इसी भेद-को समझाने के लिए याज्ञिकोंनें हविर्यज्ञ के पृष्ठरूप गार्हपत्य की - ' पुराण गार्हपत्य ' संज्ञा रक्खी है । एवं हविर्यज्ञ के श्राहवनीय, स्थानीय, किन्तु महायज्ञ के गार्हपत्यभूत सूर्य्यसम्मुख पार्थिवाग्नि की ' नूतन गार्हपत्य ' संज्ञा रक्खी है | इस विषय का विशद निरूपण आगे आने वाले ब्राह्मणों में होने वाला है, अतः यहाँ अधिक विस्तार न कर हम केवल यही बतला देना चाहते हैं कि, पुराण - नूतन गार्हपत्य, ८ धिष्ण्य, आहवनीय, सभ्य वसध्य, ये सब अग्नि हैं । सम्पूर्ण त्रैलोक्य वेदि है । अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित हवि का आधारभूत स्थान ‘ हविर्द्धान ' है । इसप्रकार यज्ञ में तीन हीं पदार्थ मुख्य हैं । हमारे इस शकट में तीनों भाव ज्यों के त्यों विद्यमान हैं । अतएव हम अवश्य ही शकट को ' यज्ञ ' कह सकते हैं । पहिले अग्नि को ही लीजिए । बैल अपने कंधों पर शकट के जिस भाग को रख कर शकट का वहन करते हैं, वह ‘ धू: ' नाम से प्रसिद्ध है । शकट के दोनों धू प्रदेश साक्षात् अग्नि हैं । यज्ञाग्नि यहाँ धू है, यह कल्पना नहीं है, अपितु वास्तव में अग्नि धू है । यही कारण है कि, जो बैल अपने कन्धों से इस धूभाग का वहन करते हैं, उनके कन्धे अग्निग्धत्रत् होजाते हैं । स्कन्ध और धू के घर्षण से यहाँ अग्नि उत्पन्न होजाता है | वही श्रग्नि बैलों के उस प्रदेश के रक्त को जला देता है । अतएव यह प्रदेश शून्य होजाता है । क्योंकि ‘ यावानु वै रसस्तावानात्मा ' इस सिद्धान्त के अनुसार रसरूप रक्त ही चैतन्य की प्रतिष्ठा है । अग्नि का काम जलाना है | जलाना कार्य्य है । इस कार्य से अवश्य ही कारणाग्नि अनुमेय बन जाता है । अत्र चलिए वेदि की ओर । जिन अग्रभागस्थ दो लम्बे दण्डों के आधार पर शकट खड़ा किया जाता है, वहाँ से शकट के पश्चिमप्रदेश पर्य्यन्त सम्पूर्ण भाग ( दूसरे शब्दों में सम्पूर्ण शकट ) वेदि है । एवं शकट के जिस प्रदेश में हवि रक्खा जाता है, ' नीड ' नाम से प्रसिद्ध वही भाग इस शकटयज्ञ का ' हविर्द्धान ' है । शकटनिर्माण यज्ञ की प्रतिकृति पर ही हुआ | आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि, भारतीय सम्पूर्ण आविष्कार प्रकृति की ही प्रतिकृतियाँ हैं । इसी आधार पर -' यद्वै देवा अकुर्वं स्तत् करवाणि ' - ' देवाननुविधा वै मनुष्या'-इत्यादि निगमं प्रचलित हैं । इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रख कर पूर्व में ' यज्ञो वा अनः ' इत्यादि कहा है | एवं इस कण्डिका में - ' तस्य वा एतस्याने ः ० ' इत्यादि रूप से उसी यज्ञभाव का निरूपणं किया गया है || ६ || व्यापक चैतन्यवाद पर एक दृष्टि-' हे अग्ने! आप धू हैं । सन्ताप पहुचाने वाले हैं । तापधर्म्मा हैं । अतएव जो सन्ताप पहुँचा रहा है, आप उसे सन्तप्त करो । जो हमें सन्तप्त कर रहा हो, उसे भी सन्तप्त करो । एवं उन को सन्तप्त करो, जिन्हें हम सन्तप्त कर रहे हैं ' - इस अर्थ को प्रकट करने वाले – ‘ धूरसि ' इत्यादि मन्त्र को बोलता हुआ अध्वर्युं शकट के धू भाग का स्पर्श करता है । प्राणसत्त्व का अनादर करके किसी कार्य्य के लिए आगे बढ़ना संकट का कारण है । इसी भूल ने मार्गस्था नन्दिनी माता का अनादर करने वाले ३७६.
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शतपथब्राह्मण स्वर्ग जाते हुए राजा दिलीप को अभिलत्रित फल से कुछ काल पर्यन्त वञ्चित कर दिया था । नीड़ प्रदेश वह लावेगा । मध्य में अग्निरूप धू पड़ता है । इसका अतिक्रमण होना अवश्यंभावी है । यह यजमान का अनिष्टकर होगा । इसलिए उचित है कि, अध्वर्यु मन्त्र के द्वारा पहिले ही उससे अपने अपराध को क्षमा करवाले । धू का स्पर्श करते हुए मन्त्र बोलने की एकमात्र यही उपपत्ति है । ' शकट यज्ञरूप है । शकट का धू प्रदेश साक्षात् अग्नि है । इतना ही नहीं, अपितु उस अग्नि को भले बुरे का ज्ञान भी होरहा है । वह समझ रहा है कि, आज अध्वर्यु ' मेरा अति-क्रमण करके हवि लेने जारहा है । अग्नि अतिक्रमणरूप अनादर से रुष्ट होकर अध्वर्यु का नष्ट करते हुए यजमान का अनिष्ट करसकते हैं । ऐसा न हो । श्रग्नि हमारा अनिष्ठु न कर बैठे, इसीलिए हविग्रहण से पहिले अध्वर्यु ' ' धूरसि ' यह मन्त्र बोलता हुआ उस की स्तुति करता है | इस वह अग्नि उसी प्रकार अपने अतिक्रमणभाव को भूल जाता है, जैसे कि क्रुद्ध स्वामी सेवक की गिड़गिड़ाहट पर करुणा कर उसके अपराध को भूल जाता है ।, - क्या श्रुति के पूर्वोक्त अक्षर विश्वास करने योग्य हैं? | क्या आज के वैज्ञानिक युग में ऐसी बातों का कोई मूल्य है? । सर्वथा नड़ अग्नि, और उसके लिए प्रार्थना । यही नहीं - प्रार्थना सुन भी ली जाती है, और अग्नि क्षमा भी कर देते हैं | विदित होता है, ऋषि साहित्य के आचार्य थे । इसीलिए तो कवियों की भाँति वे जड़पदार्थों का. भी चेतनरूप से निरूपण करते हैं । ऐसी असम्भव अप्राकृतिक बातें देख कर ही तो विज्ञान के अन्तस्तल का अवगाहन करने वाले पाश्चात्य वैज्ञानिकोंनें वेद को गडरियों के गीत बतला दिया है । क्या हम यहीं पर विश्राम करलें? । क्या पाश्चात्यों की मान्यता ठीक है? | हम कहेंगे, ठीक है - और अवश्य ही ठीक है । क्यों?, उत्तर स्पष्ट है | मनः – प्राण - वाङमय आत्मा के वाग्भाग का नाम ' भूतप्रपञ्च ' है । यही आज दिन पाश्चात्य भाषा में ‘ मेटर ’ नाम से प्रसिद्ध है । जिन वैज्ञानिकों का आराध्य एकमात्र भूतप्रपञ्च ही है, जो अभीतक केवल ' भूतवर्ग को ही पहिचान पाए हैं- यदि वे वेद को गडरियों का गीत बतलावें, तो कोई आश्चर्य नहीं है । • जन्मान्ध यदि दिन में भी अन्धेरा समझता है, तो इसमें उसका क्या अपराध है । उसको अन्धकार भावना यथार्थ । समय आवेगा, और अवश्य श्रावेगा, जिस दिन भूतानुस्यूत प्राण, एवं प्राणानुस्यूत मनस्तत्त्व को पहि— चानता हुआ आधुनिक वैज्ञानिकजगत् भी अवश्य ही वेद को साक्षात् परमेश्वर की वाणी मानने लगेगा, उसके अक्षर अक्षर पर विश्वास करने लगेगा । अस्तु, उनके लिए वह समय कभी भी आवे, परन्तु अध्यात्म-विद्या के आचार्य्य - भारतवर्ष के लिए तो वह समय सदा से ही रहा है, एवं सदा ही रहेगा । भारतवर्ष का व्यापक ' चैतन्यवाद ' विज्ञान की दृढ नींव पर प्रतिष्ठित है । " संसार की कोई भी शक्ति उसे नहीं उखाड़ सकती । आगे आने वाले प्रकरणों में पद पद पर इस चैतन्य की प्रधानता है । इसलिए हम यह उचित समझते हैं कि, संक्षिप्तरूप से यहाँ उसका निरूपण कर दिया जाय, जिससे कि भविष्य में संदेह का अवसर ही न रहै । आशा है - पाठकों के लिए यह विषय अधिक मनोरञ्जक होगा { ' संसार का कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसमें चेतना न हो ' - इस व्यापक चैतन्यवाद का निरूपण करती हुई उपनिषत् - श्रुति कहती है-३७७
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प्रथमकाण्ड
' ईशावास्यमिदमिदं सर्वं यत् किञ्च जगर्त्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ' ॥
* ईशोपनिषत् १ संसार का प्रत्येक पदार्थ चेतनामय है । कैसे है?, इसके लिए पहिले सृष्टिक्रम पर ही ध्यान देना आवश्यक होगा । ‘ ईश्वर से सृष्टि होती है ' - यह श्रास्तिकों का दृढ विश्वास है । वह ईश्वर क्या पदार्थ है?, इसका उत्तर देती हुई स्मार्त्ती उपनिषत् कहती हैं—
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
-गीता अव्ययपुरुष का ही नाम ईश्वर है । इस अव्ययपुरुष की आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राणं, वाक् ये पाँच कलाएँ हैं । इन पाँचों कलाओं का पूर्व में अनेक स्थानों पर निरूपण किया जाकुका है । यहाँ केवल यही कह देना पर्य्याप्त होगा कि, इन पाँचों कलाओं के अनुबन्ध से ही अव्ययपुरुष ज्ञानकर्ममय है । श्रानन्द - विज्ञान - ज्ञानभाग है, प्राण - वाक् – कर्म्मभाग है, मध्यस्थ मन उभयात्मक है । अमृत, और मृत्यु, नाम से प्रसिद्ध रस, तथा बल, की ( सर्वत्रलविशिष्ट रस की ) समष्टि ' परासर ' है । यही ' परमेश्वर ' है । यही व्यापक, अतएव मनः- प्राण- चाक् से अतीत ' विश्वातीतब्रह्म ' है । इसीके लिए- ' यस्यामतं तस्य मतम्'-' यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह " इत्यादि कहा जाता है । इस व्यापक परात्परतत्त्व के किसी एक प्रदेश में अनन्त बलों को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित रखने वाले जाया, धारा, आप:, अभ्व, आदि नामों से प्रसिद्ध १६ बलकोशों में से सर्वप्रधान मूलभूत ' मायाबलकोश ' का उदय होता है । मायाबल इस असीम-तत्त्व के उस प्रदेश को सीमित कर देता है । मायाचल से सीमित परात्पर का वही अंश ' अव्यय ' नाम धारण करलेता है । अबतक वह सीमा से प्रसंस्पृष्ट था, अतएव पुरुष था, पुर ( सीमा ) से बहिर्भूत था । परन्तु श्राज वही तत्त्व इस मायापुर के वशीभूत होकर ' पुरि शेते ' इस व्युत्पत्ति से ' पुरुष ' नाम धारण कर रहा है । इस पुरुष में रस, और बल, दोनों तत्त्व हैं । रस अमृत है, बल मृत्यु है । रस ज्ञान भाग है, यही ब्रह्म है । मृत्यु क्रिया है, यही कर्म्म है, सांसारिक क्षररूप ब्रह्म, कर्म्म ( ज्ञानक्रिया ) उस मूलभूत ब्रह्म कर्म्म का भौतिकरूप है । एवं विश्वातीत शुद्ध भागदिव्यरूप । अव्ययपुरुष के विश्वातीत रस - बल- दिव्य ब्रह्म - कर्म हैं । इसी अभिप्राय से ' ब्रह्म कर्म्म च मे ( मम - अव्ययपुरुषस्य ) दिव्यम् ' ( गीता ) इत्यादि कहा जाता | मायावच्छिन्न ब्रह्म - कर्म . की समष्टिरूप इसी मौलिक तत्त्व का नाम ' मन ' है । जैसे संकल्प - विकल्पात्मक मन ' इन्द्रियमन ' नाम * –ईशोपनिषत् के मन्त्र धर्म्मनीति, राजनीति, विज्ञान, तीनों भावों से सम्बन्ध रखते हैं | इन तीनों में प्रकृत में विज्ञानपक्ष ही अभिप्र ेत है । इन सब भावों का निरूपण तदुपनिषत् के भाषाभाष्य में ही देखना चाहिए । ३७८