Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 641–650

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 641–650

पृष्ठ 641

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शतपथब्राह्मण से प्रसिद्ध है, सम्पूर्ण इन्द्रियों में प्रज्ञारूप से अनुस्यूत मन ' सर्वेन्द्रिय ', अतएव ' अनिन्द्रिय ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव हमारा यह रस - चलात्मक अव्ययमन ' श्वोवसीयसूमन ' नाम से प्रसिद्ध है । तैत्तिरीयश्रुति में , भोक्त त्त्वं, महेश्वर त्त्वादि ं ६ धम्र्मों से यहीं ‘ श्वोवस्यस्ब्रह्म ' नाम से व्यवहृत हुआ है । उपद्रष्टृत्त्व युक्त जीवाव्ययरूप मन जैसे प्रत्येक जीवसंस्था का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण है, एवमेव सम्पूर्ण विश्वसृष्टि का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण यही श्वोवसीयस मनोरूप ईश्वराव्यय है । इसीलिए इसके लिए ' यो लोकत्रय-माविश्य ' यह कहा जाता है । अपि च जैसे जीवाव्यय के उपद्रष्टृत्त्वादि ६ धर्म्म हैं, एवमेव इस ईश्वरा-व्यय के ११ धर्म्म हैं, जैसाकि अव्ययपुरुषावतार भगवान् वासुदेव कृष्ण कहते हैं—

गति, भत्ता, प्रभुः, साक्षी, निवासः, शरणं, सुहृत् ।

प्रभवः, प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥

गीता इन पूर्वोक्त धम्र्म्मो से युक्त वही श्वोवसीयस्ब्रह्म, कामना, तप, एवं श्रम के द्वारा सम्पूर्ण विश्व का निर्माण कर ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार सर्वत्र व्याप्त होजाता है । इस में सत्र हैं, यह सत्र में है । इसी ब्रह्म का निरूपण करती हुई तैत्तिरीय - श्रुति कहती है— ' इदं वा अग्रे नैव किञ्चनासीत् । न द्यौरासीत्, न पृथिवी, नान्तरिक्षम् । तदसं-देव सन्मनोऽकुरुत - स्यामिति । श्रसतोऽधि मनोऽसृज्यत । मनः प्रजापतिमसृजत । तंद्वा इदं मनस्येव परमं प्रतिष्ठितं यदिदं किञ्च । तदेतच्छ्वोवस्यसं नाम ब्रह्म ' ( तै ० ना ०२ कां ० २ प्र ० ६ अनु ० ) इति । सृष्टि का प्रधान, एवं प्रथमज रेत ' काम ' ( कामना इच्छा ) है । काम के अनन्तर ' तप ' होता है । तप के अनन्तर ‘ श्रम ' होता है । इसप्रकार मनः प्राणवाक् - जनित काम, तपः, श्रम के समन्वय से अपूर्व ( नवीन ) वस्तु की उत्पत्ति होती है । इन तीनों में भी कामना ही प्रधान है, जैसाकि निम्नलिखित प्रकरण से स्पष्ट हो जायगा । ‘ कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ' इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार X सर्वं— जगत्प्रभत्र – प्रतिष्ठा – परायणरूप ' मन ' नाम से प्रसिद्ध इस ' श्वोवसीयसूत्रह्म ' में सबसे पहिले कामना का

* उपद्रष्टानुमन्ता च भर्त्ता भोक्ता महेश्वरः ।

परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन् पुरुषः परः ॥

गीता

x कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् ।

सतो बन्धुसमति निरविन्दिन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥

— ऋक्सं ० १०।१२६।४ । ३७६

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प्रथमकाण्ड उदय होता है । यही कामना संसार का प्रधान मूलकारण है, अतएव ऋषिने इसे ' रेतः ' कहा है | कामना मनका व्यापार है । हमने बतला दिया है कि, मन रस - चलात्मक है । रस - बलात्मक मन से कामना का उदय होता है । सुतरां कामना का द्वैविध्य सिद्ध होजाता है । मन उक्थ है । कामना इसके अर्क ( रश्मियाँ ) हैं । ये अर्क रस, और बलके - भैदसे दो प्रकार के हैं । बलगर्भित रसरूप अर्क का नाम ' मुमुक्षा ' है, एवं रस गर्भित वलप्रधान अर्क का नाम ' सिसृक्षा ' है । सिसृक्षा सृष्टिका आधार है, एवं मुमुक्षा मुक्ति का श्रालम्बन है | एक बात और । अबतक जो रस - चलात्मक परात्परब्रह्म असीम होता हुआ हृदय- ( केन्द्र ) -बल से शून्य था, वही आज मायाबल के कारण सीमित होता हुआ ' सहृदय ' बन गया । श्रव्ययपुरुषरूप मन के साथ ही ‘ हृदयबल ' प्रादुर्भूत होजाता है T । हृदय ही इस मन की प्रतिष्ठा है । अतएव इसके लिए

श्रुति ने कहा है-सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽमीशा भर्वाजिन इव ।

हृत्प्रतिष्ठं यद् जिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥

— यजुः संहिता ३४ | ६ । इस हृदयबल का नाम हीं ‘ प्रकृति ' है । आहर्त्ता, अतएव ' हृ ' नामसे प्रसिद्ध विष्णु एक कला है । विक्षेपणधर्म्मा, अतएव ‘ द ' नाम से प्रसिद्ध इन्द्र दूसरी कला है । नियमनकर्त्ता, श्रतएव ' यम् ' नामसे प्रसिद्ध ' ब्रह्मा ' तीसरी कला है । ब्रह्मगर्भित विष्णुरूप सोम चौथी कला है, एवं ब्रह्मगर्भित इन्द्ररूप– अग्नि पाँचवीं कला है । पञ्चकलोपेत ' हृदय ' ही प्रजापति है । यही अव्यक्त है । यही प्रकृति है । इसके—– ‘ अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदर्द्धममृतम् ' के अनुसार अमृत - मर्त्य, दो भाग हैं । अमृतभाग ' अविपरिणामी ' होने से ' अक्षर ' कहलाता है । मर्त्यभाग ' विपरिणामी ' होने से ' क्षर ' कहलाता है । यह मर्त्यक्षर उसी अक्षर से प्रादुभूत हुआ है, अतएव इसके लिए ' ब्रह्मात्तर - समुद्भवम् ' ( गीता ) यह कहा जाता है । जैसे * चिदात्मा ' अव्यय ' नाम से प्रसिद्ध है, अक्षर ' अमृत ' नाम से प्रसिद्ध है, परात्पर ‘ शाश्वतधर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है, निर्विशेष ( शुद्धरस ) ' ऐकान्तिकसुख ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव जगदुपादानभूत यह क्षर ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध है । . यह ब्रह्म ( क्षर ) से समुद्भूत है । विपरिणामी क्षरब्रह्मरूपा अपराप्रकृति, एवं अविपरिणामी, किन्तु कुर्वद्र पा, अमृत नाम से प्रसिद्धा अक्षररूपा पराप्रकृति ही अव्ययाधार पर सम्पूर्ण विश्वका निर्माण करती है । पञ्चजन, पुरञ्जन, विश्वसृट् पुर, आदि आगे का सम्पूर्ण प्रपञ्च वैकारिक भाग होने से ' वहिरङ्ग-प्रकृति ' नाम से प्रसिद्ध है । परन्तु अक्षर और आत्मक्षर, दोनों आत्मस्वरूप में प्रविष्ट होने के कारण * इस विषय का विस्तृत विवेचन गीताभाषाभाष्य के—

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।

शाश्वतस्य च धर्म्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

इस श्लोक के रहस्यार्थ - निरूपण में देखना चाहिए । ३८०

पृष्ठ 643

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शतपथब्राह्मण ' अन्तरङ्ग प्रकृति ' है । यह उस की ' स्वप्रकृति ' है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' प्रकृतिं स्व मधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ’ – ( गीता ) यह कहा जाता है । इस अव्यय, अक्षर, तर की समष्टि को ही हम ' जगत्कर्त्ता ' ईश्वर कहेंगे । क्षर की अपेक्षा से वही ईश्वर ' जगत ' बना हुआ है । अक्षर की अपेक्षा से वही जगत् को बना रहा है । एवं अव्यय की अपेक्षा से उसी पर जगत् बन रहा है । वह कर्त्ता है । कार्य्य हैं । कारण है । अकर्त्ता है । सब कुछ है । ईश्वर के तीन विभत्तों में पहिला अव्ययभाग ज्ञानप्रधान होने से विकुर्वाण है । तीसरा चरभाग अर्थरूप होने से विकुर्वाण है । मध्यस्थ अक्षरभाग ही क्रियाप्रधान होने से कुर्वाण है । सृष्टि क्रियासापेक्षा है । अतएव - ' तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते ' * इत्यादि श्रुति अक्षर को ही कर्त्ता बतलाती है । क्षर व्यक्त है । अक्षर श्रच्यक्त है । ' परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात् सनातनः ' के अनुसार अव्यय ' पर ' है । अक्षर ' परावर ' है । क्षर ' अवर ' है । क्षर पूर्वकथनानुसार ' ब्रह्म ' है । ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्धं क्षर, एवं ‘ पर ' नाम से प्रसिद्ध श्रव्यय, मध्यस्थ अक्षर इन दोनों का सञ्चालक है । अक्षर के द्वारा ही अव्यय की पाँचों कलाओं का विकास होता है, जैसा कि अनुपद में हीं बतलाया जानेवाला है | अक्षर के द्वारा ही क्षर – कलाएँ उद्भूत होतीं हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर उपनिषत् - श्रुति कहती है- -एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ – कठोपनिषत् अस्तु, कर्म्मप्रधान प्रस्तुत यज्ञप्रकरण में हम आत्मप्रकरण को अधिक नहीं चढ़ाना चाहते । इस प्रपञ्च से बतलाना हमें केवल यही है कि, अक्षर के कारण हीं ( हृदयबल के कारण हीं ) इस एक्कल मनोमय अव्ययपुरुष में पाँच कलाओं का उदय होता है । आजदिन चेतना, और ' चित् ' को पर्य्याय समझा जाता है | परन्तु यह भ्रान्ति है । चित् भिन्न वस्तु है, एवं चेतना भिन्न पदार्थ है । अक्षर चेतना है । अव्यय चित् है | अक्षर अव्यय के ऊपर अन्त:, और बहिरूप दो चितियाँ करता है । अतएव ' चेतयते सा ' इस व्युत्पत्ति से अक्षर ह ' चेतना ' नाम से प्रसिद्ध है । चिति व्यापार है । व्यापार क्रिया है । क्रिया का अधिष्ठाता एकमात्र अक्षर है । अव्ययमन में रस, बल, दो तत्त्व हैं । अक्षर उस पर उसी के रसभाग की भी चिति करता है, एवं बलभाग की भी चिति करता है । मन पर रस की चिति होती है । परन्तु रस में बल का प्रात्यन्तिक अभाव है, यह बात नहीं हैं । बल भी अवश्य है । रस की प्रधानता से वह अभिभूतमात्र है । ऐसी अवस्था युक्ता से पहिली ‘ रसचिति ' का नाम ही ' विज्ञान ' है । आगे जाकर बलभाग सर्वथा ही अभिभूत होजाता है | उसी अवस्था का नाम ' आनन्द ' है । आनन्द, और विज्ञान, दोनों रसचिति है । यही रसचिति ' अन्त—

* यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।

तथा - अक्षराद्विविविधाः सोम्य! भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥

— उपनिषत् २८१

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प्रथमकाण्ड श्चिति ' कहलाती है । इसीप्रकार - ' बलप्रधाना रसगर्भिणी चिति ' प्राण ' है । इसमें रसभाग भी है । परन्तु आगे जाकर वह एकान्ततः अभिभूत होजाता है । वही ' धाचिति ' है । इन दोनों चितियों का नाम ' बल चिति ' है 1 । यही ' बहिश्चिति ' है । इसप्रकार रसबल के तारतम्य से उस अव्ययमन के साथ –श्रानन्द, विज्ञान, प्राण, वाक्, इन चार चितियों का सम्बन्ध होजाता 1 इन चारों चितियों के कारण हीं वह पुरुष ' चिदात्मा ' नाम से व्यवहृत होने लगता 1 इन पांचों चितियों के निम्नलिखित लक्षण किए जा सकते हैं-१ – सर्वथा प्रसुप्तं यद् बलं, तदवच्छिन्नो रसः - श्रानन्दः । २ – किञ्चित् प्रबुद्धं यद् बलं, तदवच्छिन्नो रसः - विज्ञानम् । ३ – रस — बलयोः साम्यावस्थापन्नं ब्रह्म - मनः । ४ – किच्चित् प्रबुद्धो यो रसस्तदवच्छिन्नं बलं - प्राणः । ५ – सर्वथा प्रसुप्तो यो रसस्तदवच्छिन्नं बलं - वाक् विश्व में व्याप्त रहने वाले चैतन्य का निरूपण अपेक्षित है । विश्व सृष्टिसाक्षी अव्ययपुरुष के मनः-प्राण - वाग - भाग से सम्बन्ध रखता है । विश्व में आनन्द - विज्ञान नहीं है, यह बात नहीं है । परन्तु वे यहाँ गौण हैं । अतएव उनकी अपेक्षा न रख कर सृष्टिसाक्षी आत्मा के लिए केवल ' स वा एष आत्मा वाङ्मय: प्राणमयो मनोमयः ' ( बृ ० आ ० ) यही कहा जाता है । इस अक्षर से आत्मा के द्वारा सम्पूर्ण विश्व बना है | विश्वनिर्माण कैसे हुआ?, इस प्रश्न का समाधान यहाँ करना अप्राकृत होगा । अक्षर की ब्रह्मादि पाँचों कलाओं से क्रमशः प्राणादि पाँचों कलाएँ प्रादुर्भूत होती हैं । पाँचों के पञ्चीकरण से ' विश्वसृट् ' उत्पन्न होते हैं । अनन्तर ' सर्वहुतयज्ञ ' से पञ्चजन, पञ्चजन से वेद, लोक, देव, भूत, पशु, ये पाँच ' पुरञ्जन ' उत्पन्न होते हैं । पाँचों पुरञ्जनों से क्रमशः स्वयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य्य, पृथिवी, चन्द्रमा, ये पाँच ‘ पुर ’ उत्पन्न होते हैं । इन पाँचों को उत्पन्न कर क्षराक्षरविशिष्ट वह सच्चिदानन्दघन आत्मा ' तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ' के अनुसार इन पुरों में प्रविष्ट होजाता है । अतएव उसे ' विश्वचर, विश्वाधार, जगन्नियन्ता, ' आदि नामों से व्यवहृत किया जाता है । इस आत्मसत्ता के कारण ही पाँचों पुर ' ब्रह्मपुर ' नाम से प्रसिद्ध हैं । वह महाविश्व उस ईश्वरात्मा का शरीर है, इधर यह क्षुद्र शरीर इस जीवात्मा का विश्व है । विश्वरूप महा शरीरधारी उस ईश्वर से ही भूतभौतिकी सृष्टि हुई है । सब उसी के अंश हैं । इसी अभिप्राय से भगवान् व्यास कहते हैं— १ – जिस रसने अपनी प्रधानता से चल को सर्वथा अभिभूत कर लिया है, ऐसे रस का नाम ही ' आनन्द ' है । २ – जिस रस में बल किञ्चित् मात्रा में उल्बण है, वही रस ' विज्ञान ' है । ३ – रसबल की समानावस्था ही ' मन ' है । ४ – किञ्चित् मात्रा में उल्वण, किन्तु बल से अभिभूत रह ही ' प्राण ' है । ५ — रस को सर्वथा अभिभूत करनेवाला बल ही ' वाक् है । ३८२

पृष्ठ 645

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शतपथब्राह्मण " ' शो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके " - शा ० द ० - ४३ सू ० इति । ऐसी अवस्था में उस चैतन्य के अंशभूत विश्व के पदार्थों में चैतन्य का प्रभाव कदापि नहीं माना जासकता । चैतन्य उल्वण हो, अथवा अनुल्वरण, यह बात दूसरी है । परन्तु नहीं हो, यह बात नहीं है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पदार्थमात्र में होने वाली क्रिया है । साधारण मनुष्यों की दृष्टि के अनुसार भी जड़पदार्थों में व्यापार देखा जाता है । आदान - विसर्ग - रूप कर्म्म प्रत्येक पदार्थ में देखा जाता है । यदि यह कम न होता, तो कभी पदार्थ पुराना न पड़ता । श्रतएव हम सभी को कर्माक्रान्त मान सकते | यह क्रिया बिना कामना-मय मन के असम्भव है । बिना ज्ञान के क्रिया हो ही नहीं सकती । कामना क्रिया का आधार है, एवं कामना मन से निकलती है । मन ज्ञानमय है । सुतरां सत्र में चैतन्यसत्ता सिद्ध होजाती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् मनु कहते हैं—

" कामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित् ।

यद्यद्धि कुरुते किंचित्तत्तत् कामस्य चेष्टितम् " ॥

— मनुः २/४ इति । ' यदि सत्र में चेतना समान है, तो फिर अस्मदादिवत् - पाषाणादि में भी इन्द्रियाँ क्यों नहीं होतीं?, ..इस प्रश्न का उत्तर है - पदार्थ - तारतम्य । आत्मा सत्र में समान है । केवल भौतिक पदार्थों के सन्निवेशतारतम्य से पदार्थों में इस वैचित्र्य का उदय होजाता है । पूर्व में १४ प्रकार के भूतसर्ग का निरूपण किया जाचुका है । पार्थिव अर्थप्रधान वैश्वानर, अन्तरिक्ष्य क्रियाप्रधान तैजस, एवं दिव्यज्ञानप्रधान प्राज्ञ के तारतम्य से संज्ञ, अन्तःसंज्ञः, ससंज्ञ, भेद से १४ प्रकार का भूतसर्ग तीन भागों में विभक्त है । पाषाणादि श्रसंज्ञ हैं. । इन में केवल वैश्वानर है । वृक्षादि श्रन्त: संज्ञ हैं । इन में वैश्वानर, तैजस है । हम सत्र ' चेतन ' नाम से प्रसिद्ध ससंज्ञ हैं | हम में वैश्वानर, तैजस, प्राज्ञ, तीनों हैं । प्राज्ञ इन्द्र है । इसका विकास हमारे में है । अतएव इन्द्रियों का विकास इन्द्रप्रधान ससंज्ञ जीवों में हीं होता है । जड़ और चेतन की व्यवस्था आत्मा के भावा-भाव पर अवलम्बित नहीं हैँ । अपितु महर्षि चरक के ' सेन्द्रियं चेतनद्रव्यं निरिन्द्रियमचेतनम् ' इस कथन के अनुसार इन्द्रियों का भावाभाव ही जड़ - चेतन का व्यवस्थापक है । अत्ररुद्ध घट में रक्खा हुआ दीपक यदि अन्धकार को दूर करने में असमर्थ है, तो एतावतैव घट में प्रकाश का अभाव नहीं माना जासकता । एवंमेत्र इन्द्रियों का प्रभाव व्यापक आत्मसत्ता को उच्छिन्न नहीं करसकतां । चान्द्रप्रज्ञानरूप संकल्प - विकल्पात्मक इन्द्रियमन भले ही उन पदार्थों में न हो, परन्तु सर्वव्यापक श्रव्ययरूप ज्ञानघन श्वोवसीयस्मन भूतमात्र में अवश्य ही प्रतिष्ठित है । उसे देखना साधारण मनुष्य का काम नहीं है । ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरः ' के अनुमार उसके देखने का चक्षु विज्ञान है । महामहिमशाली ऋषियोंनें अपने विज्ञानचक्षु से भूतमात्र में चैतन्य की सत्ता देखी, तदनुसार सम्पूर्ण कर्म्मकलाप को व्यवस्थित किया । ईश्वर सच्चिदानन्द है । सत्ता अस्तिभाव है | चेतना उपलब्धि है । जो उपलब्ध होता है, जो है-वही रस है । वही आनन्द है । तीनों अविनाभूत हैं । संसार में ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं है, जिसमें ३८३

पृष्ठ 646

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प्रथमकाण्ड ' अस्ति ' न हो । अस्ति विना ' भाति ' के अनुपपन्न है । दोनों रस से अविनाभूत हैं । इस अस्ति, भाति, रस, दृष्टि से भी सर्वत्र चैतन्यव्याप्ति सिद्धहोजाती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - - ' ' ईशावास्यमिदं सर्वम्'-यह कहा गया है । इसी का स्पष्टीकरण महर्षि कठने इन शब्दों में किया है कि, –

एप सर्वेषु भूतेष गूढोत्मा न प्रकाशते ।

दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥

— कठोपनिषत् पूर्व में आठ प्रकार के देवताओं का निरूपण करते हुए जिन अक्षररूप श्रभिमानी देवताओं का स्वरूप-बिश्लेष हुआ था, वह यही आत्मदेवता है । इसी अभिमानी देवता को अक्षररूप अन्तर्य्यामी कहा जाता है । चैतन्यघन यह अन्तर्य्यामी लौकिकी किंवदन्ती के अनुसार घट घट में व्यापक हैं । पानी सर्वथा भौतिक पदार्थ है, परन्तु उसमें अभिमानी देवता प्रतिष्ठित है । इसी देवदृष्टि से हम पानी की भी स्तुति करते हैं । ' श्रद्धामयो-ऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ' यह परीक्षित, अतएव निश्चित सिद्धान्त है । जिस की व्यापक चैतन्य-वाद के अस्तित्त्व पर श्रद्धा है, वह अवश्य ही सबमें उसे देखता है । उस की दृष्टि में नड़, चेतन, इस द्वैतभाव का समावेश है ही नहीं । श्रतएव जहाँ औषधि छुरिका से काटी जाती है, वहाँ ' ओषधे त्रायस्व ' कहा जाता है | दीक्षित यजमान के केशवपन करते समय ' स्वधिते मैनं हिंसीः ' कहा जाता है । ' उपांशुस-बन ' नाम से प्रसिद्ध सोमवल्ली पीसने की शिला पर रक्खे हुए ग्रावाओं को ' शृणोतु ग्रावाणः ’ – यह कहा जाता है । यह आलङ्कारिक वर्णन नहीं है, अपितु जैसी स्थिति है, उसी का दिग्दर्शन है । शकट के धू प्रदेश के अभिमानी देवता अग्नि हैं । उन का अतिक्रमण होता है । यह अनिष्टकर है | तन्निवारणार्थ उन की स्तुति करना परम आवश्यक हैं । घुर्य्य - अग्नि से अपराध क्षमापनात्मक इसी तथ्य को लक्ष्य बना कर श्रुति नै कहा कि-' तथो हैतमेषोऽतियन्तमग्निधु र्यो न हिनस्ति ' ॥१० ॥

मन्त्र ब्रह्मशक्ति है, जैसा कि ब्राह्मण की चौथी कण्डिका में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । इसी वाग्वज्र से यज्ञकर्त्ता ऋषि अपने शत्रुओं को नष्ट किया करते थे । अरुणपुत्र, अतएव -‘आरुणि ' नाम से प्रसिद्ध याज्ञवल्क्य के गुरु उद्दालक याज्ञवल्य से कहाँ करते थे कि, याज्ञवल्क्य! मैं पक्ष पक्ष में अपने शत्रुओं को नष्ट किया करता हूँ । उसी इतिहास का स्मरण दिलाते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं कि, आरुण ' धूरसि ' इस ब्रह्मबल को लक्ष्य में रखकर ही ' अर्द्ध मासशो ह ० ' इत्यादि कहा करते थे । इस कथन का तात्पर्य्यं यही है कि, जो विद्वान् इस विज्ञान को जानता हुआ दर्शपौर्णमासेष्टि करता है, संसार में उसका कोई भी शत्रु नहीं रहता || ११ || इसप्रकार - ‘ श्रपणस्य पश्चादन स्तिष्ठन् - समङ्गि - धूर सीति - धूरभिमर्शनम् ' ( का ० श्र ० २।२।३।१३ ) इस श्रौत सूत्र के अनुसार ‘ श्रपरण ' नाम से प्रसिद्ध दक्षिण श्रग्नि के पश्चिम भाग में प्रतिष्ठित शकट के ' धू ’ भाग का ' धूरसि ' इत्यादि मन्त्र से स्पर्श करने के अनन्तर वह अध्वर्यु ' ' देवानामित्युपस्तम्भनस्य पश्चादी-षाम् ' ( का ० श्र ० २ | ३ | १४ ) के अनुसार ' देवानमसि ० ' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ ईषा का स्पर्श करता ३५४

पृष्ठ 647

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शतपथब्राह्मण है । “ हे अग्निरूप शकट! आप देवताओं का हृवि वहन करने वाले हो । आप चर्म्मरज्जु से वेष्टित होने के कारण सस्नितम हो । हविद्रव्य से परिपूर्ण हो । अतएव देवताओं को अत्यन्त प्रिय हो । एवं देवताओं का आह्वान करने वाले हो । आप अकुटिल हो । क्योंकि आप अकुटिल होने के कारण स्थिरभावापन्न हो, अतएव हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि, आप हमारे हविर्द्धान-शकट को दृढ़ करो | आप, और यज्ञपति, दोनों ही दृढ़ बने रहें, अपनी प्रतिष्ठा न छोड़ें, हम आप से यहीं कामना करते हैं " - यह है मन्त्र का अक्षरार्थ । इस मन्त्र का अध्यात्म, अधिभूत ( वैधयज्ञ ), आधदैवत, तीनों से सम्बन्ध है । अग्नि संसार में क्या काम करता है?, अग्नि का क्या स्वरूप है?, मन्त्र इन्हीं प्रश्नों का समाधान कर रहा हैं । पहिले आधिदैविक - स्वरूप की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । अग्नि अनेक प्रकार के हैं । सूर्य्य में भिन्न अग्नि है । अन्तरिक्ष में भिन्न अग्नि है । सूर्य्य से ऊपर प्रतिष्ठित परमेष्ठी में भिन्न अग्नि है | परमेष्ठी से ऊपर प्रतिष्ठित स्वयम्भू में भिन्न अग्नि है । पृथिनी में भिन्न ही प्रकार का अग्नि है । हमारे प्रकृत हविर्यज्ञ का सम्बन्ध भूपिण्ड से है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जाचुका है । यहाँ यही पार्थिव अग्नि अभिप्र ेत है | सौर प्राणदेवता आहुति लेने वाले हैं । पृथिवी का अग्नि ग्राहुति पहुँचाने वाला है । भूपिण्ड में भूत, और प्राण, दो तत्त्व हैं । भूत प्रत्यक्ष है, प्राण अप्रत्यक्ष है । भूत, और प्राण भेद से पृथिवी भी दो ही प्रकार की होजाती हैं । भूतमयी पिण्ड - पृथिवी ( भूपिण्ड ) को हम आँखों से देख रहे हैं । परन्तु अधाम-च्छदा प्राणमयी अमृता पृथिवी को हम देखने में असमर्थ हैं । अतएव इन दोनों को निरुक्त, अनिरुक्त, कहा जाता है । भूतपृथिवी निरुक्ता है | अमृता पृथिवी अनिरुक्ता है । अनिरुक्त प्राण अमृताग्नि है । निरुक्त भूत मर्त्याग्नि है । याज्ञिक परिभाषा में ये ही दोनों ' चितेनिधेयाग्नि ' ' चित्याग्नि ' नाम से प्रसिद्ध हैं । भूमण्डल पर उत्पन्न होने वाली श्रोषधि, वनस्पति, कृमि, कीट, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि प्रजा का इसी से सम्बन्ध है । ‘ आयुर्वा अग्निः ' ( श ० ६ | ७ | ३ | ७ ) ' अग्निर्वायुष्मानायुष ईष्ट ' ( श ० १३८ | ४ | ८ ) के अनुसार प्रजामात्र का पार्थिवाग्नि ही जीवनाधार है । प्रजापालकत्वेनैव इसे ' प्रजापति ' कहा जाता है । भूत, प्राण, भेद से यह प्रजापति निरुक्तानिरुक्त कहलाता है, जैसाकि श्रुति कहती है- ' प्रजापतिरेषोऽग्निः । उभयम्वेतत् प्रजापति।नरुक्तश्चानिरुक्तश्च । परिमितश्चापरिमितश्च ' ( श ० ६।५।३।७ ) इति । इस प्रजापति के कारण ‘ प्राजापत्यो वा अयं ( भूः ) लोक: ' - ( तै ० ब्रा ० १२३ | ७ | ५ | ) के अनुसार यह भूलोक ‘ प्राजापत्थलोक ’ कहलाता है । भूमण्डल पर व्याप्त औषधि वनस्पतियों का रस इसी पार्थिव प्राजापत्याग्नि के कारण सौर प्राणदेवताओं में निरन्तर आहुत होता रहता है । उसी रस को लेकर सूर्य्यं वर्षा के द्वारा पुनः इस लोक में औषधि वनस्पतियाँ उत्पन्न किया करते हैं । इस श्रादान - विसर्गात्मक यज्ञ के कारण हीं दोनों लोक स्व - स्व – स्वरूपों में प्रतिष्ठित हैं । औषधि - वनस्पतियों की आहुति नहीं होती, अपितु इनका रस जाता है | रस आर्द्रभाग है । पानी है । यह पानी अग्नि के द्वारा ऊपर जाता है । सूर्य के द्वारा पुनः पृथिवी ता है । सूर्य्य पर्जन्य ( वृष्टि के अधिष्ठाता वायु ) के द्वारा यहाँ बरसाता है, एवं अग्नि वहाँ बरसाता है । इसी विज्ञान को ज्ञक्ष्य में रखकर मन्त्रश्रुति कहती है— समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः । भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिवं जिन्वन्त्यग्नयः । - ऋक्सं ० अस्यवामीयसूक्त ३८५

पृष्ठ 648

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प्रथमकाण्ड ' इसी अभिप्राय से - ' अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति । यदा वाव खल्वसावादित्यो न्यङ् रश्मिभिः पय्यावर्त्तते, अथ वर्षति ' - यह कहा जाता है । पार्थिव हवि को अपने ऊपर प्रतिष्ठित रख कर अग्नि उसे द्युलोक में पहुँचाते हैं, अतएव हम इन्हें अवश्य ही ' वह्नितम ' ( भारवाही - हव्यवाहक ) कह सकते हैं । पृथिवी से निकलने वाला प्राणाग्नि ग्रङ्गिरा नाम से प्रसिद्ध है । जैसे आदित्याग्नि, किंवा सावित्राग्नि सूर्य्य से निरन्तरं पृथिवी की ओर आया करता है, एवमेव यह अनिरुक्त प्राणाग्नि भूपिण्ड से निकल कर निरन्तर सूर्य्यं में जाया करता है । इसी अभिप्राय से ऋषि ने कहा है-इत एत उदारुहन दिवस्पृष्टान्यारुहन् । प्रभुर्जयो यथा पथि धामङ्गिरसो ययुः ॥ — अथर्व १८ | १ | ६१ निरुक्त भूपिण्डरूप भूताग्नि हवि लेजाने में असमर्थ है । हवि लेजाना एकमात्र प्राणरूप अनिरुक्त अग्नि का ही काम है । इसी अभिप्राय से ताण्ड्यश्रुति कहती है-. ' स ( प्रजापतिः ) ऐक्षत - यन्निरुक्तमाहरिष्यामि - असुरा मे यज्ञं हनिष्यन्तीति । सोऽनिरुक्तमाहरत् ' । इसप्रकार पूर्वोक्त श्रौत एवं— - तां ० ब्रा ० १८१३ इति ।

नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते ।

आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्टिरेन्नं ततः प्रजाः ॥

- मनुः इस स्मार्त्त ' सिद्धान्त के अनुसार अग्नि का हव्यवाहकत्त्व भलीभाँति सिद्ध होजाता | अतएव इसके लिए - ' वह्नितमम् ' कहा है । भूताग्नि- प्राणाग्निमय भूपिण्ड शकट है । षषि - वनस्पतिरूप अन्न इस शकट में भरा हुआ है । यह शकट चलता है । भूपिण्ड सूर्य के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । इसी परिभ्रमण के द्वारा सम्पूर्ण सौरदेवता इस शकटरूप पार्थिवाग्नि से अन्नग्रहण करते हैं । प्रतिबेग से चलता हुआ भी शकटात्मक यह भूपिण्ड नहीं टूटता । इसके सभी श्रवयव दृढ़ रहते हैं । क्योंकि यह ' सस्नितम ' है । सौररश्मियाँ हीं चर्ममरज्जु है | इससे यह भ्रमण्डल चारों ओर से वेष्टित हो रहा है । यदि सूर्य का आकर्षण न हो, तो भूपिण्ड अपने नियतमार्ग से च्युत होता हुआ खण्ड खण्ड रूप में परिणत होजाय । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ' सस्नितमम् ' कहा है । अपिच- आपोमय भूपिण्ड अपने गर्भस्थ अग्नि के द्वारा यद्यपि प्रतिक्षण खण्ड – खण्ड - रूप में परिणत होकर श्रापोमय पार्थिव अर्णवसमुद्र में निमजित होने की स्थिति से समन्वित होता रहता है । तदपि बराह भगवान् की कृपा से ऐसा नहीं हो पाता । भूपिण्ड के चारों ओर के अन्तरिक्ष ३८६ R

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 649 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण में मण्डलरूपेण परिव्याप्त - ‘ एमूत्रवराह ' नामक अन्तरिक्ष्य वायु देवता ने ही भूपिण्ड को स्वस्वरूप से सुरक्षित कर रक्खा है । जिसप्रकार पार्थिव रस विज्ञानभाषा में - ' दधि ' ( वही ) कहलाया है, सौर दिव्यरस ' मधु ' ( शहद ) नाम से व्यवहृत हुआ है, एवमेव श्रन्तरिक्ष्य - स्निग्ध - सोममय वायव्यरस - ' घृत ' ( घी ) कह-लाया है * । स्नेहगुणात्मक - आवरणात्मक - यही वायुस्तर ( एमूधवराह ) वह चर्म्मरज्जु है, जिससे भूपिण्ड स्वस्वरूप से सुरक्षित है । तयुक्त भौम अग्नि को इसलिए भी ' सस्मितम ' ( स्नेहगुणयुक्त सोमसमन्वित ) कहा जासकता है । पृथिवी के किसी नियत प्रदेश में हीं हवि नहीं है । अपितु सम्पूर्ण भूपिण्ड अन्नरस से परिपूर्ण है | कहीं ओषधि है, कहीं चनस्पति है, कहीं पशु आदि हैं । इस परिपूर्णता की अपेक्षा से ही ' पप्रतिमम् ' कहा है । अन्न से अन्नाद की सत्ता रहती है । सौर प्राणदेवता अन्न खाने वाले हैं । जो पार्थिवाग्नि अन्न जैसी प्रियवस्तु देवताओं को देते हैं, देवताओं का इस हविः प्रदाता अग्नि से अधिक प्रियतम और कौन हो सकता है । इसी अभिप्राय से ‘ जुतमम् ' कहा है । पार्थिव अग्नि के द्वारा ही सौर प्राणदेवताओं का भूमण्डल से सम्बन्ध होता है । सौर रश्मियों में सौर देवता प्रतिष्टित हैं । सूर्य्य से निकल कर ये रश्मियाँ चारों ओर जारहीं हैं । भूमण्डल मध्य में अवरोधक बनजाता है । अतएव इन रश्मियों को इस लोक की प्रजा के साथ सम्बन्ध करना पड़ता है । पार्थिवाग्निमय भूपिण्ड की कृपा से ही सौर प्राणदेवताओं का हमारे आत्मा में आगमन होता है । इसी अभिप्राय से - ‘ देवहूतमम् ' कहा है । पृथिवी, एवं पृथिवी का अग्नि, दोनों सत्य हैं । अतएँव दोनों के जाने का मार्ग नियत है । भूपिण्ड कभी क्रान्तिवृत्त को नहीं छोड़ता । राग्नि कभी द्युलोक को छोड़कर अन्य पथ का अनुसरण नहीं करता । दोनों नियतपथारूढ होने के कारण अकुटिल हैं । इसी अभिप्राय से ' अह्न तमसि ' कहा है । इसप्रकार ईश्वरप्रजापति का अग्निप्रजापतिरूप भूपिण्डात्मक अन्न से परिपूर्ण यह छकड़ा सर्वत्र घूम घूम कर सत्र को अन्न प्रदान कर सब के आयु को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रखता है | यही हविर्द्धान-कट है । सोमयज्ञ में इसी की प्रतिकृति पर हविर्द्धानमण्डप में हविर्द्धानशकट खड़ा कर उसमें हविरूप ' सोमांशु ' ( सोमल्ली के खण्ड - टुकड़े ) रक्खे जाते हैं । पार्थिव हविरूप अन्न इसी पर प्रतिष्ठित है । अान्तरिक्ष्य सोम— रस की प्रतिष्ठा भी यही है । अतएव हविर्यज्ञ, और सोमयज्ञ, दोनों यज्ञ इसी से सुसम्पन्न होते हैं । अत्र चलिए अध्यात्मपक्ष की ओर । हम क्या हैं?, इसका उत्तर है मनः, प्राण, वाक् की समन्विता-वस्था । मन आत्मा है, प्राण देवता है, बाकू भूत । रसासृङ मासादि युक्त स्थूलशरीर भूतप्रपञ्च है । यही शरीर है | यही भूताग्नि है । इसके गर्भ में जो ऊष्मा ( गर्मी ) है, वही प्राणाग्नि है । प्राणाग्नि अनिरुक्त है, भूताग्नि निरुक्त है । ऊष्मारूप प्राणाग्नि जबतक रहता है, तभीतक ग्रायुः सत्ता रहती है । भूत, और प्राण, दोनों अग्नि हैं । पार्थिव भूताग्नि से भूतभाग बना है, एवं प्राणाग्नि से प्राणभाग निष्पन्न हुआ है । * दधि हैवास्य लोकस्य रूपम् । घृतमन्तारक्षस्य । मध्वमुष्य । - शतपथे ३८७

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 650 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड इनमें तीसरा मनोमय आत्मा भोक्ता है । प्राणाग्नि के द्वारा ही अन्नाहरण होता है । यह प्राणाग्नि - भूताग्नि-रूप शकट शारीरिक - चम्मं से चारों ओर से वेष्टित है । चर्म्मनद्ध इस शरीरशकट के द्वारा ही श्रात्मदेव --ताओं में अन्नाहुति होती है । एक चमत्कार और है । शकट घूम घूम कर ही अन्न पहुँचाने में समर्थ होता है । जो अकर्म्मण्य हैं, आलसी हैं, उनका शकट जीर्णशीर्ण होता हुआ अन्नाहरण करने में असमर्थ होजाता है । चलता फिरता शकट ( शरीर ) * ही काम की वस्तु है । शेष सम्पूर्ण भाव यहाँ भी ज्यों के त्यों ही समझने चाहिए । अब चलिए अधिभूत ' की ओर । अधिभूत से ऐतिह्य, और वैधयज्ञ, दोनों अभिप्र ेत हैं । पूर्वं के ऐतिहासिक सन्दर्भ में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि, इसी भूमण्डल पर किसी समय त्रैलोक्य - विभाग था । जिसे आज ' एशिया ' कहते हैं, वही हमारा ' भौमत्रैलोक्य ' था । इस त्रैलोक्य के अग्नि, वायु, इन्द्र, तीन देवता अधिपति थे । भारतवर्ष के सम्राट् ' मनु ' थे । इस मानवीय प्रजा के ऊपर मनु का नियन्त्रण था मानवधर्म के माध्यम से । इधर मनु स्वर्गाधिपति इन्द्र के शासन से नियन्त्रित थे । इन्द्र ने अपनी ओर से प्रतिनिधिरूप में अग्निदेवता को इस भारतवर्ष के लिए नियुक्त कर रक्खा था । यह अग्नि श्रुतिग्रन्थों में ‘ शवसोनपात् ' नाम से प्रसिद्ध है | आज जिस देशप्रतिनिधि के लिए ‘ वायसराय ’, किंवा ' लाठसाहिब ' शब्द प्रयुक्त किया जाता है, उसी अर्थ के लिए वेद मे ' शवसोनपात् ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । यह शवसोनपात् अग्नि हीं ' एष वै देवेभ्यो हव्यं भरति ' इत्यादि के अनुसार मानवीय प्रजा से कर लेकर देवताओं के समीप ( स्वर्ग में ) पहुँचाया करते थे । शकटों के द्वारा ही यह करद्रव्य यहाँ से अग्नि - द्वारा वहाँ लेजाया जाता था । इस हविर्वहन करने के कारण हीं तत्कालीन देवमण्डली में यह अग्नि ' वह्नितम ' नाम से प्रसिद्ध हुए । प्राणदेवताओं के आधार पर मनुष्यदेवताओंने वैधयज्ञ का आविष्कार किया! मनुष्यदेवताओं से यह यज्ञविद्या भारतवर्ष में ग्राई । जैसा प्रकृति में होता है, वैसा ही देवताओं का वैधयज्ञ था । ' देवाननु-विधा वै मनुष्याः ' के अनुसार ठीक उसी की प्रतिकृति आज इस मनुष्ययजमान का वैधयज्ञ है । वहाँ शकट था, यहाँ शक है । शकट उस हव्यवाहन अग्नि की प्रतिकृति है । इसलिए हम इस शकट को अग्नि कह-सकते हैं । चर्म्मरज्जु से वेष्टित होने के कारण यह सस्नितम है । हवि से भरा हुआ है, अतएव देवताओं का प्रियतम है । प्राणदेवता इस शकटगत हवि को लेने के लिए ही इस यज्ञ में आते हैं, अतएव हम इसे अवश्य ही देवहूतम ( देवताओं को यश में बुलाने वाला ) कहसकते हैं । इस शकटगत अभिमानी देवता से अध्वर्यु प्राथना करता है कि, हे अग्ने! ( प्राणाग्ने! ) आप अपने प्रतिष्ठारूप ( शरीररूप ) इस हविर्द्धानशकट को दृढ़ रखिए । आप का यज्ञपति ( यजमान ) स्थान से च्युत न होजाय । किसी मनुष्य से यदि कोई वस्तु लेना हो, तो पहिले उस की पर्याप्त प्रशंसा करो । बढ़ावा दो । ऐसा करने से वह प्रसन्न हो कर उदार मन से वह वस्तु तुझे देदेगा । बलात्कार से लेने में उसे दुःख होता है । बलात्कार भी न सहीं, तुह्मारे बहुत आग्रह करने पर यदि वह वस्तु तुझें प्राप्त भी होजायगी, तत्र भी उस में उस मनुष्य का संकुचित भाव प्रविष्ट * इसी आधार राजस्थान में यह लोकसूक्ति प्रसिद्ध है कि - ' डील तो चालतो फिरतो ही काम को ' । ' डील ', अथात् ' शरीर ' तो क्रियाशील ही कार्य्यसवाहक है । ३८८