Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 651–660
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 651–660
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शतपथब्राह्मण रहेगा । ऐसी वस्तु कदापि शुभफल प्रद नहीं होगी । इसलिए ' तेन त्यक्त ेन भुञ्जीथा मागृधः कस्यस्विद्ध– नम् ' इस सिद्धान्त को लक्ष्य में रखते हुए उसे प्रसन्न करके, अतएव उदारमनोयुक्त बना कर ही वस्तु लो | इसी ' रातमनसो हविगृह खानि ', भाव के लिए ' देवानामसि ' इत्यादि बोलता है । जिसे भाषा में ' बढ़ावादेना ' कहते हैं, वेदभाषा में वही ' उपस्तुति ' नाम से प्रसिद्ध है । यदि हवि लेते समय शकट का कोई अवयव टूट जाता है, तो ' यात्रद्वित्तं तावदात्मा ' के अनुसार इसका प्रभाव यज्ञपति ( यज– ( मान ) पर होता है । इसलिए आरोहण से पहिले ही उस अन्तर्यामी अग्नि देवता से प्रार्थना की जाती है कि, आप तो ‘ अह ्मरुत हो । अतएव आप इस शरीररूप शकट को दृढ़ बनाते हुए यजमान को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रखिए ॥ १२ ॥
इसप्रकार ‘ देवानामसि ’ बोलते हुए ईषा का स्पर्श करने के अनन्तर ' विष्णुस्त्वाक्रभताम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ' हविग्रहण के लिए शकट पर चढ़ता है । यज्ञ को विष्णु कहते हैं । इस यज्ञरूप विष्णु के द्वारा ही देवताओं के लिए अन्नाहरण होता है । विष्णुदेवता ही शकट पर चढ़ के अन्न लाकर देवताओं में उसे आाहुत करते हैं । यह अध्वर्यु अपने यज्ञ का विष्णु है । अतएव अपने को उसी शब्द से सम्बोधित करता हुआ - ‘ विष्णु ( विष्णुरूप अध्वर्यु ) आप पर आक्रमण करें ' यह कह कर शकट पर चढ़ता है । विष्णु यज्ञ कैसे १, वे किस शकट पर आक्रमण करते हैं?, कौनसा अन्न लाते हैं?, इत्यादि विषयों का वैज्ञानिक विवेचन आगे आने वाले वेदिब्राह्मण में ( १ | २ | | ) यद्यपि विस्तार से होने वाला है,. तथापि प्रसङ्गोपात्त यहाँ भी उस का संक्षिप्त दिग्दर्शन करा देना अनुचित न होगा । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, इन पाँच अक्षरों से सम्पूर्ण विश्व का निर्माण होता है, जैसा कि पूर्व प्रकरणों में विस्तार से बतलाया जा चुका है । छोटे से छोटे, एवं बड़े से बड़े, यच्चयावत् पदार्थों में पाँचों अक्षर प्रतिष्ठित हैं । इन पाँचों अक्षरों के साथ -प्राण, आप:, बाकू, अन्न, अन्नाद्, ये पाँचों क्षुरु नित्य सम्बद्ध रहते हैं 1 । इन पाँचों से ये पाँचों उस वस्तु के प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण - बने रहते हैं । पाँचों अक्षरों में तीन अक्षरों का एक स्वतन्त्र विभाग है । एवं दो अक्षरों का दूसरा स्वतन्त्र विभाग है । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र का नाम ' अन्तर्यामी ' है । अग्नि - सोस का नाम सूत्रात्मा है । जैसे पञ्चकल अव्ययपुरुष का मध्यस्थ श्वोवसीयस् मन दोनों ओर जाता है, एवमेव पञ्चकल इस अक्षरपुरुष का मध्यंस्थ इन्द्र भी दोनों ओर जाता है । अतएव हम इन्द्र, अग्नि, सोम की समष्टि को सूत्रा-त्मा कहेंगे | ब्रह्मा के साथ प्रारणक्षर का सम्बन्ध है । विष्णु के साथ ' आप ' क्षर का सम्बन्ध है | इन्द्र के साथ ‘ वाक् ’ दर का सँम्बन्ध है । तीनों न्नरों से युक्त तीनों अक्षर ही अन्तर्य्यामी हैं । इन तीनों के भिन्न भिन्न स्वभाव हैं । प्राणमय ब्रह्मा प्रतिष्ठातत्त्व है । आपोमय विष्णु गतिधर्म्मा हैं । वाङ्मय इन्द्र वित्तेपणधर्म्मा है । प्रतिष्ठारूप ब्रह्मतत्त्व पर प्रतिष्ठित गति, विक्षेपणधर्म्मा इन्द्रा - विष्णू प्रतिष्ठित हैं । तीनों की समष्टिः ही ' हृदय ' है, जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है प्रत्येक वस्तु का हृदय इसी हृ ( विस्णु ) ' द ( इन्द्र ), य ( ब्रह्मा ), से सम्बन्ध रखता है । हृदय के प्राधार ही वह त्रस्तुपिण्ड-स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है ।
प्रजापतिश्चरतिगर्भेऽन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।
तस्य योनिं परिश्यन्ति धीरास्तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥
— ( यजुः ३१।१६ ) ३८६
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प्रथमकाण्ड उक्त मन्त्र इसी केन्द्रविद्या का निरूपणं कर रहा है । " हृदयरूप प्रजापति प्रत्येक वस्तु के गर्भ में ( केन्द्र में ) प्रतिष्ठित रहता है, एवं वह अक्षररूप होने से नित्य है | अतएव ' अजायमान ' है । परन्तुविश्वास कीजिए! उस के आधार पर रहने वाले पिण्डगत सम्पूर्ण पदार्थ उसी से उत्पन्न हुए हैं । वह स्वयं अनुत्पन्न होकर भी [ क्षर के द्वारा ] सत्र को उत्पन्न करता है । कारण ही कार्य्य की प्रतिष्ठा बनता है । ' वत्तुल ( गोल ) वस्तु त्रिकोणमिति के द्वारा केन्द्र का अन्वेषण किया जासकता । परन्तु षट्कोण, चतुष्कोण, आदि के केन्द्र का बोध प्राप्त कर लेना साधारण मनुष्यों का काम नहीं है । जो विद्वान् हैं, वैज्ञानिक हैं, वे ही उस की योनि ( केन्द्र ) को पहिचान सकते हैं " । इसप्रकार केन्द्रज्ञान की दुर्विज्ञेयता बतला कर उस के पहिचानने का सरल उपाय बतलाती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है कि, “ विश्वास करो - उस केन्द्र के आधार ही पर सम्पूर्ण पदार्थ प्रतिष्ठित हैं । ” वस्तु के नीचे सूक्ष्मातिसूक्ष्म सूचिका के प्रभाग का सम्बन्ध कर दीजिए । जहाँ वह वस्तु उस अग्रभाग पर प्रतिष्ठित हो जाय, समझ लीजिए, वही उस का केन्द्रस्थान है । केन्द्रभाग के समीप जाकर वह सूच्यग्रभाग सम्पूर्ण वस्तु को अपने ऊपर प्रतिष्ठित करने में समर्थ होजायगा । यही इस को पहिचानने का सरल उपाय हे । केन्द्रविद्या को जानने वाला विद्वान् गुरुतर वस्तु को भी केन्द्र के द्वारा सहज में ही उठा सकता है । कहना यही है किं, केन्द्रशक्ति का ही नाम ' अन्तर्यामी ' है । उस में स्थिति, आगति, गति, ये तीन तत्त्व हैं । शक्तित्रयसमष्टि ही हृदय है । अत्र चलिए पिण्ड की ओर | अग्नि - अक्षर अन्नाद -क्षर से युक्त रहता है । सोमाक्षर अन्न - क्षर से युक्त रहता है । क्षरावच्छिन्न इन्द्रगर्भित श्रग्नीषोम ही वस्तुपिण्डं के प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण हैं । इसी का नाम ' सूत्रात्मा ' है । आप जो कुछ आँखों से देखते हैं, वह सत्र अग्नीषोमप्रपञ्च है । इसी आधार पर - ' अग्नीषोमा-त्मकं जगत् ' यह कहा जाता है । इस विश्व के केंन्द्र में समष्टि, एवं व्यष्टिरूप से वही अन्तय्यौमी प्रतिष्ठित है । उदाहरण के लिए भूपिण्ड की ओर ही आपका ध्यान आकर्षित किया जाता है । भूपिण्ड में भी पाँचों हैं । पाँचों क्या हैं?, पाँचों की समष्टि का नाम हीं भूपिण्ड है । यद्यपि इसमें हैं पाँचों हीं । परन्तु इन पाँचों के पञ्चीकृत अग्निमय होने के कारण ' वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः ' के अनुसार भूपिण्ड को अग्नि ही माना गया है । भूपिण्ड के ब्रह्मा, त्रिष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, पाँचों अक्षर, एवं प्रारण, आप:, वाक्, अन्नाद्, अन्न, पाँचों क्षर अग्निप्रधान ही हैं । अग्नि ही ब्रह्मा है । अग्नि ही विष्णु है । अग्नि ही इन्द्र है । अग्नि ही सोम है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अग्निः सर्वा देवताः ' यह कहा जाता है । भूमण्डल में ब्रह्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित इन्द्र – विष्णु के द्वारा निरन्तर आदान -विसर्गात्मक यज्ञ हुआ करता है । इन्द्र के द्वारा पार्थिव पदार्थ निरन्तर उच्छिन्न हुआ करते हैं | इसी को ' प्रजापति का विस्त्रसन ' कहा जाता है । विस्रस्त प्रजापति ( क्षीणकाय प्रजापति ) आदानधर्म्मा विष्णु की कृपा से निरन्तर उसे पुनः संहित किया करते हैं । यही यज्ञ ' भैषज्ययज्ञ ’ नाम से प्रसिद्ध है । विष्णु, और इन्द्र की इसी परस्पर की स्पर्द्धा के कारण - ब्रह्मप्रतिष्ठा के आधार पर प्रतिष्ठित इन्द्र, और विष्णु के द्वारा विष्णु से समन्वित इन्द्रात्मक प्राण, आपः, वाक्, इन तीनों क्षरों का ' वीररण ' होता है । तीनों क्षर बाहिर निकल कर अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाते हैं । ब्रह्माक्षरमय प्राण का बहिर्मण्डल ‘ वेद ' कहलाता । विष्णुमय आपः का बहिर्मण्डल ' लोक ' कहलाता है । एवं इन्द्रमय वाक् का बहिर्मण्डल ‘ वषट्कार ' कहलाता है । ३६०
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शतपथब्राह्मण तीनों मण्डल प्राणरूप होने से अधामच्छद हैं । अतएव तीनों एक ही स्थान पर प्रतिष्ठित रहने में समर्थ होजाते हैं | भूपिण्ड को केन्द्र बना कर इसके चारों ओर तीनों सर्वत्र एकरूप से व्याप्त हैं । अतएव ' पूर्ण ' नै सहस्रम् ' इस निगम ति के अनुसार वेद, लोक, वषट्कार ( वाक् ), तीनों ‘ सहस्र ’ कहलाते हैं । वेदसाहस्री का प्राणमय ब्रह्मा से सम्बन्ध है, लोकसाहस्री का आपोमय विष्णु से सम्बन्ध है, एवं वाक्साहसी का वाङ्मय इन्द्र से सम्बन्ध है । यही कारण है कि, इन्द्र के लिए जब भी आहुति दी नाती है - तो ‘ इन्द्राय वौषट् इस वषट्कार से ही दी जाती है । मण्डलव्याप्ति की समाप्ति यहीँ होती है । यह क्रीड़ा ÷ कौतुक इन्द्र, और विष्णु की स्पर्द्धा से ही होरहा है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः । इन्द्रश्च त्रिष्णो यदपस्पृवेथां त्रेधा सहस्र ं वि तदैरयेथाम् || - ऋक्सं ० ६।६६ | ८ | “ किंतत् सहस्रमिति - इमे लोकाः, इमे वेदाः अथो वागिति ब्रूयात् " । — ऐतरेयारण्यक उक्त निरूपण से पाठकों को यह भलीभांति विदित होगया होगा कि, लोकसाहस्री का वितान आपो-विष्णु से ही होता है । पोमय विष्णु शनाया से युक्त है । बुभुक्षा को ही ' अशनाया ' कहते हैं । एतद्रूप बन कर ही विष्णु बाहिर निकलते हैं । भूपिण्ड में हमने चित्य, चितेनिधेय, भेद से दो प्रकार का अग्नि बतलाया है । चित्याग्नि पिण्ड़रूप है, चितेनिधेयाग्नि प्राणरूप है । यह चितेनिधेय प्राणाग्नि विष्णु से युक्त है । विष्णु अग्निरूप में परिणत होकर बाहिर निकलते हैं । न केवल विष्णु ही, अपितु पूर्वकथना -नुसार पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाले सभी अक्षर अग्निमय बन कर ही निकलते हैं । उदाहरणार्थ - शरीर को ही लीजिए । बुभुक्षित मनुष्य ग्रन्न – ग्रहण की इच्छा करता है । इसी इच्छा का नाम ' अशनाया ' है । यह इच्छा आदान- शक्त्यवच्छिन्ना विष्णुमयी है । इसका स्वरूप अग्नि ही है | शरीराग्नि ही इस अवस्था में क्षुब्ध होता है । कहना यही है कि - विष्णु अग्निमय बन कर ही ऊपर जाते हैं । भूपृष्ठ से सूर्य्य पर्य्यन्त आहुतिद्रव्यरूप सोम भरा हुआ है । ‘ त्वमातथन्तोर्वन्तरिक्षम् ' के अनुसार अन्तरिक्ष रूप हविर्द्धानशकट में प्रतिष्ठित सोमरूप हषिग्रहण कर पार्थिव देवताओं में इसे बहुत करना हीं विष्णु का एकमात्र कार्य्य है । अग्निरूप विष्णु ऊपर जाते हैं । स्तोमभेद से इस विष्णु के तीन ' विक्रम ' होजाते हैं । त्रिवृत्स्तोम इनका पहिला विक्रम है । पञ्चदशस्तोम दूसरा विक्रम है । एकत्रिंशस्तोम तीसरा विक्रम है । जिस वाक्साहस्री का पूर्व में आभास कराया गया है, उसके अनुसार पार्थिव प्राण के ३३ विभाग हो जाते हैं । ' त्रयस्त्रिंशत्तन्तवो ये वितत्निरे ' इस श्रुति के अनुसार ये ३३ विभाग ही ' तन्तु ' कहलाते हैं । इन्हीं को ' स्तौम्यदेवता ं कहते हैं | इन ३३ में २१ पर्य्यन्त अग्नि रहता है । ऊपर सोम रहता है । २१ पर्य्यन्त रहने वाला अग्नि - घन, तरल, विरल, भेद से ६, १५, २१, इन तीन स्तोमों में विभक्त होजाता है । एक ही अग्नि की तीन अवस्थाएँ ३६१
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प्रथमकाण्ड होनातीं हैं । त्रिवृत्स्तोम पृथिवीलोक है । इसमें ' अग्नि ' नाम से प्रसिद्ध घन अग्नि की सत्ता है । पञ्चदशस्तोम अन्तरिक्षलोक है, इसमें ' वायु ' नाम से प्रसिद्ध तरल: अग्नि की सत्ता है । एक– विंशस्तोम द्युलोक है, इसमें ' आदित्य ' नाम से प्रसिद्ध विरल अदित्य की सत्ता है । ऊपर का चौथा सोमलोक है । इसीके लिए ' अस्ति वै चतुर्थो देवलोक आपः ' - यह कहा जाता हैं । ये चारों हीं लोक पार्थिवलोक हैं । पृथित्री का ही अमृतप्राण साहस्रीरूप में परिणत होकर चार लोक बन गया है । भूपिण्ड वेदि है । ६, १५, २१ स्तोमों से युक्ता मृतप्राणमयी पृथिवी महावेदि है । महावेदरूपा पृथिवी त्रैलोक्यरूप है एवं वेदि पिण्डरूप है । महावेदि के तीनों लोकों में विष्णुप्राण व्याप्त है । यह महावेदि ही शकट है । इसमें भी सोम है । २१ के ऊपर तो सोमलोक है ही । अपने पहिले विक्रम से विष्णुप्राण त्रिवृत्-स्तोमरूप पृथिवीलोक को अपने अधिकार में करते हैं, दूसरे से पञ्चदशस्तोमरूप अन्तरिक्ष में व्याप्त होते हैं, एवं तीसरे से एकविंशरूप द्युलोक में व्याप्त होते हैं । आापोमय विष्णु श्रापो– भाग से लोकनिर्माण करते हुए ही अग्रगामी बनते हैं । लोकसृष्टि केवल ग्रापोमुख पर ही निर्भर है । वेद-साहस्री, वाक्साहस्री, इन दोनों की प्रतिष्ठा लोकसाहसी ही बनती है । यदि आपोमय लोक न हों, तो वेद और वाक् किस पर प्रतिष्ठित रहें । इसी विज्ञान को लक्ष्य में स्वकर - ' यदपस्पृवेथां त्रेधा सहस्र ं वितदैरयेथाम् ' – यह कहा गया है । श्रापोभाग पर स्पर्द्धा होने से ही तो तीन साहस्रियाँ अभिव्यक्त होतीं हैं । यही कारण है कि, यद्यपि तीनों के क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र, अधिष्ठाता हैं, तथापि मूलभूत होने से विष्णु को ही तीनों साहस्तियों का अधिष्ठाता मान लिया जाता है, जैसाकि ऐतरेयश्रुति कहती है — ' स इमाँ– लोकान् विचक्रमे, अथों वेदान्, अथो वाचम् ', ( ऐत ० ६ । १५ ) इति । इसप्रकार ईश्वरशरीर के प्रादेश-मात्र - भागरूप भूपिण्ड में प्रतिष्ठित, अतएव ' वामन ' नाम से प्रसिद्ध भगवान् विष्णु अपने तीन विक्रमों से त्रैलोक्य को अपने अधिकार में करलेते हैं । तीनों में हमने अग्नि, वायु, आदित्य, तीन देवताओं की सत्ता बतलाई है । तीनों हीं पार्थिव - देवता हैं, तीनों के ८ बसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, नामक तीन अधिदेवता हैं । आठों वसुओं में पहिला वसु अग्नि है । यह उपक्रम में है । १२ वाँ ग्रादित्य विष्णु है । विष्णु अन्त में ग्रादित्य रूप से विकसित होता है । एक छोर में अग्नि है, ये ही देवताओं के पृष्ठपोषक हैं । अन्त में विष्णु हैं । ये ही द्वारपाल हैं । वहाँ पर विष्णु को सदा पहिरा देना पड़ता है । सम्पूर्ण देवता दोनों के मध्य में प्रतिष्ठित हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है— ' अग्निर्वै देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' ( ऐ ०११ ) । ' अन्तो विष्णुर्देवतानाम् ' ( ताण्ड्य ०२१ । ४ । २६ ) । ‘ एते वै यज्ञस्यान्त्ये तन्वौ यदग्निश्च विष्णुश्च ' ( ऐ ० १।१ ) । ' विष्णुर्वै देवानां द्वारः ( ऐ ० १ । ३० ) । महावेदिरूपा पृथिवी के पृथिवीलोक में ( ६ स्तोम में ) वसुदेवताओंने अपना विक्रमण कर रक्खा । अन्तरिक्ष में रुद्रदेवता व्याप्त रहे हैं । एवं द्य लोक में श्रादित्यों का राज्य होरहा है । इसप्रकार त्रैलोक्य में प्राणदेवताओं की विक्रान्ति देखी जाती है । यह सब उस विष्णु की विक्रान्ति का हो फल है । विष्णु ही सोम ३६२
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शतपथब्राह्मण का आहरण कर इस की आहुति देते हैं । इसी से यज्ञस्वरूप की सिद्धि होती है । यज्ञ के द्वारा ही अग्निमय प्राणदेवता २१ पर्य्यन्त गमन करने में समर्थ होते हैं । जैसे घृताहुति से अग्निज्वाला बड़ी दूर पर्यन्त व्याप्त हो जाती है, उसी प्रकार सोमाहुति से प्रज्ज्वलित प्राणदेवता भूपिण्ड से निकल कर २१ पर्यंत जाते हुए त्रैलोक्य को अपने अधिकार मे कर लेते हैं । यह सत्र अग्नीषोमात्मक यज्ञ की ही कृपा है, किंवा यज्ञविष्णु की ही कृपा है । अशनायारूप विष्णु हीं सोमाहूति के द्वारा यज्ञ का स्वरूप - निर्माण करते हैं । यदि आदानशक्ति के अधिष्ठाता विष्णु न होते, तो सोमाहुति सम्भव न थी । त्रिना सोम के यज्ञनिष्पत्ति असम्भव थी. सोम का अग्नि में आहुत होना हीं यज्ञ है । सोम की आहुति आपोमय, अतएव ' सोमवंशी ' नाम से पुराणों में प्रसिद्ध विष्णु के द्वारा ही होती है । अतएव सोम, और विष्णु का अभेद मान लिया जाता है, जैसा कि श्रुति श्रु कहती है ---' यो वै विष्णुः, सोमः सः १ ( शत ० ३ । ३ । ४ । २१ इति ) । इसी आधार पर यज्ञस्वरूप - सम्पादक विष्णु हम अवश्य ही ' यज्ञ ' कहसकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ‘ य॒ज्ञो वै विष्णुः । स देवेभ्य इमां विक्रान्ति विचक्रमे ० इत्यादि कहा | यह अध्वर्यु ' यजमान का दिव्य आत्मा बनाने वाला है । उस में ३३ देवताओं की विक्रान्ति अपेक्षित | विक्रान्ति के लिए विष्णु का त्रिक्रमण अपेक्षित है । एतदर्थ ' विष्णुस्त्वाक्रभताम् ' बोलता हुआ ही यह शकट पर चढ़ता है । शकट त्रैलोक्य की प्रतिकृति है । अव विष्णुस्थानीय है । यजमान के लिए ग्रांज यह अध्वर्यु रूप विष्णु उसी विक्रान्ति का विक्रमण कर रहा है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं-' एतमु एवैष एतस्मै विक्रान्ति विक्रमते ' || १३ || इसप्रकार ‘ विष्णुस्त्वाक्रमताम् ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु हविग्रहण के लिए शकट पर चढ़-नाता है | चढने के अनन्तर ' उरु बाताय ' यह मंत्र बोलता हुआ अध्वर्यु ' शकटस्थ हवि पर दृष्टि निक्षेप करता है । शकट भूमाभावापन्न है, यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । शाला में स्थित अन्न की अपेक्षा यह हवि भूमा भावापन्न है, इस में तो कोई सन्देह नहीं । परन्तु शकटरूप सीमाभाव से बद्ध होने के कारण यह परिच्छिन्न होता हुआ अल्पता से भी पृथक् नहीं है ' । शकट में प्रतिष्ठित अन्न परिछन्न होजाता है । परिच्छेद एक प्रकार का बन्धन है । बन्धन हीं ' वरुणपाश ' कहलाता है । ' वरुण्या रज्जुः ' के अनुसार जहाँ भी कहीं किसी भी प्रकार का बन्धन है, सब वरुणपाश है । वरुण पानी के देवता हैं । श्राप्यप्राण का ही नाम असुर है, जैसा कि पूर्व के अपां प्रणयनकर्म में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका 1 वरुण श्रासुर प्राणमय पानी के अभिमानी देवता होते हुए असुरों के देवता हैं । इसीलिए शकटमें स्थित सीमाभावापन्न हवि को हम श्रासुरभाव से श्राक्रान्त कह सकते हैं । अपिच खेत में रक्खा हुआ जो अन्न उन्मुक्त ऐन्द्रवायु में रहता हुआ वायुंगत इन्द्र के कारण वारुणभाव से शून्य था, वही शकट में आकर शकट, और आधारभूत वस्त्र ( वस्त्र लगा कर ही अन्न शकट में भरा जाता है ) से युक्त हो वायुःसम्पत्ति से पृथक् होता हुआ ' यद्वै किञ्चिद् वातो नाभिवाति, तत् सर्वं वरुणदैवत्यम् ' इस निगम-श्रुति के अनुसार अवश्य ही आसुरभाव से समन्वित होजाता है । ऐसा हवि आसुर प्राण के विरोधी यज्ञिय देवताओं ३६३
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प्रथमकाण्ड का स्वरूप विकृत करने में समर्थ है | अतः हविग्रहण से पहिले उसे दूर करना आवश्यक है । उस का एकमात्र उपाय है मन्त्रबल । क्योंकि ग्रहण करना है शकट से ही । ग्रहण से पहिले उसे निरावरण ऐन्द्रप्रान्त में रक्खा नहीं जासकता । चिना वायु के सम्बन्ध के उस का आसुरभाव निवृत्त नहीं होसकता । ऐसी परिस्थिति में मन्त्रबल ही इसे वायुःसम्पत्ति से युक्त करसकता है । ऋषि की दृष्टि में हवि भी चेतना से युक्त है । यदि मनुष्य को किसी से अवरुद्ध कक्ष ( बन्द कमरे ) में निरुद्ध कर दिया जाता है, तो उसी वरुणदेव की कृपा से ऐन्द्रवायु की सत्ता अभिभूत होजाती है । अतएव उसका प्राण सकुचित होने लगता है ( ' श्वास ' घुटने लगता है ) । वायु ही श्वास-प्रश्वासरूप में परिणित होकर जीवनसत्ता सुरक्षित रखता है । यह प्राणरूप वायु आज अवरुद्ध हो गया है । शकटान्न सकुञ्चित बन रहा है । इस में वायुरूप प्राण के समावेश के लिए ही ' उरु वाताय ' बोला जाता है । शरीरस्थ इन्द्रियों में चक्षुरिन्द्रिय सब से अधिक अभिव्यक्त है । प्राणघन आदित्य ही अध्यात्म में आकर चक्षु कहलाने लगता है | प्राणात्मक आदित्य इन्द्ररूप है । इन्द्र साक्षात् विद्युत् है । अतएव इस का विषय के साथ श्रुति शीघ्र सम्बन्ध होजाता है । अपने प्राण को दूसरे में समाहित करने का प्रधान साधन विद्युदुरूप चक्षु ही है । अतएव ' मेस्मेरेजम ' नाम की क्रिया में दृष्टि को ही प्रधानता दी जाती है । मन्त्रबल पहिला बल है । चक्षु-' ल दूसरा बल है । मन्त्रविद्युत् को चतुर्विद्युत् के साथ यदि समन्वित कर दिया जाता है, तो वह प्रबल हो जाती है । ऐसौ विद्युत् कभी व्यर्थ नहीं जाती । इसी बल के आधार पर ऋषिगण दृष्टि के द्वारा भी कत्त ' मकत ' मन्यथा-कत्तु ं समर्थ थे । आज अध्वर्यु मन्त्रविद्युत् से युक्ता इसी चक्षुर्विद्युत् से हवि में प्राणाधान कर उसे दिव्य भाव से युक्त करता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है-G C. 12 ' अथ प्र ेक्षते - तद् ब्रह्मणैनैतत् प्राणाय वाताय उरुगायं करोति ॥ १४ ॥
प्र ेक्षणानन्तर ' अपहृतं रक्षः ' बोलता हुआ अध्वर्यु दृष्ट स्थान पर जो कुछ हविद्रव्य से अतिरिक्त ( विजातीय कंकड़, तृण आदि ) रहता है, उसे उठा कर फैंक देता है । यदि कुछ इतर वस्तु नहीं होती है, तो केवल स्पर्शमात्र ही करलेता है । पूर्वमन्त्र से आासुरभाव को नष्ट किया था, इस मन्त्र से उस मरे हुए को बाहिर फेंकता है | भावना के द्वारा ही यह सम्पूर्ण विधिविधान सम्पन्न हो जाता है, जैसाकि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जाचुका है । देवता और असुर, किखी नियत व्यक्ति का नाम नहीं है, अपितु इन का तत्तद् भावों से हीं सम्बन्ध है । विरोधी भाव का नाम असुर है, एवं अनुकूलभात्र का नाम देवता है । जो वस्तु हमारे अनुकूल होती हुई हमारे कार्य को सुसम्पन्न करती है, वह हमारे लिए देवता है । परन्तु जो विजातीय होने से हमारे प्रतिकूल होती हुई हमारे कार्य्यं का नाश कर देती है, कार्य्यधारा को अवरुद्ध कर देती है - त्रही नाष्ट्रा ( नाशक ) राक्षस ( अबरोधक ) है । हवि हमारे यज्ञस्वरूप को सुसम्पन्न बनाती है, अतएव यह हमारे लिए दिव्यभाव है । परन्तु तृण आदि विजातीय पदार्थं हविः स्वरूप को नष्ट करते हुए यज्ञस्वरूप को अभिभूत करने में समर्थ हैं | अतः हवि से अतिरिक्त और कुछ पड़ा हुआ विजातीय भाव हमारे लिए नाष्ट्रा राक्षस हैं । अतः मन्त्रत्रल से स्पर्शं कर इन्हें निर्जीव बना कर हवि से बाहिर फैंक देना नितान्त आवश्यक है । मान लीजिए कि, हवि में विजातीय द्रव्य नहीं हैं । क्या फिर भी मन्त्र बोलने की आवश्यकता है? । श्रव-श्य | विजातीय तृण आदि से भी कहीं भयङ्कर नाष्ट्राराक्षस तो आन्तरिक्ष्य वारुण वायु में व्याप्त रहते हैं । सर्वत्र अन्तरिक्ष में अमूल उभयतः ( द्यावापृथिवी से ) परिच्छिन्न इन दिव्यभाव - नाशक प्राणों का राज्य ३६४
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शतपथब्राह्मण है | जहाँ ऐन्द्रवायु नहीं होता, वहाँ ये अपना व्यापार किया करते हैं । दिन में ऐन्द्रप्राण की सत्ता रहती है | अतएव दिन में इन को अपना प्रभाव प्रतिष्ठित करने का अवसर नहीं मिलता । परन्तु रात्रि में इन का पूर्ण साम्राज्य है । उस में भी ऐन्द्रप्राण के सर्वथा तिरोहित हो जाने से श्रद्ध रात्रि तो इन की निश्चित ही आावा-सभृमि है | कहना यही है कि, अन्तरिक्ष में व्याप्त ये नाष्ट्राराक्षस सर्वत्र व्याप्त होते हुए दिव्यभावापन्न इस शकटस्थ हवि में भी प्रविष्ट होरहे हैं । ऐसी अवस्था में यदि इन को न हटाया जायगा, तो यह दिव्ययज्ञ ग्रासुर भावापन्न होता हुआ स्वस्वरूप से च्युत हो जायगा । अतएव मन्त्रत्रल से इन्हें निकालना आवश्यक है | मन्त्र वाक् है | साधारण वाक् नहीं, अपितु बलवती वाक है । एवं इन्द्र ही वाक् है । इन्द्र जहाँ प्रबल है, वहाँ असुरों का नाश निश्चित है । साथ ही तपःपूत ग्राहिताग्नि अध्वर्यु ' भी साक्षात् देवमूर्ति है, अग्निमय है । गर्भाधानादि संस्कारों से युक्त विद्युदुरूप ब्राह्मण में एक प्रकार का नया वैध अग्नि उत्पन्न होनाता है | वह अग्नि श्रासुरं भाव को दग्ध करदेता है । अतएव इस अग्नि को ' सान्तपन ' अग्नि कहा जाता है इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर निम्नलिखित श्रुतिवचन हमारे सम्मुख आते हैं । १– “ एष ह वै सान्तपनोऽग्निर्यद् ब्राह्मणः । यस्य- गर्भाधानपुंसवन - सीमन्तोन्नयन-जातकर्म्मनामकरणनिष्क्रमणान्नप्राशनगोदान चूडाकरणोपनयनाप्लवनाग्निहोत्रव्रतचर्य्या-दीनि कृतानि भवन्ति स सान्तपनः । " ( गोपथब्रा ० पू ० २।२४ ) इति । ' २ " ब्राह्मणो हैव सर्वा देवता: " ( तै ० ब्रा ० १,४,४ इति ) । ३ - " एप वा अग्निर्वैश्वानरो यद् ब्राह्मणः " ( तै ० ब्रा ०३,७,३,२ इति ) । मन्त्र भी ब्रह्म है । एवं ं ‘ ब्रह्मणो वा एतद्रूपं यद् ब्राह्मण: ' ( शत ० १३,१,५,२ ) के अनुसार ब्राह्मण भी ब्रह्म है | ‘ विद्युद्वय व ब्रह्म ' ( शत ० १४८,७,१ ) के अनुसार ब्रह्म साक्षात् विद्युत् है | ' यदेतदा विद्योतते वित् ' ( केनोपनिषत् ) के अनुसार विद्युत् साक्षात् इन्द्र है । इन्द्र असुरों का नाश करनेवाले हैं । आज यह अध्वर्यु ' मन्त्र बोल कर हवि का स्पर्श करता हुआ अपनी आध्यात्मिक विद्यु त् से, एवं मन्त्ररूप आधिभौतिक - विद्युत् से हविर्गत नाष्ट्राराक्षसों का आमूलचूड़ विनाश करदेता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है—
व्यद्युनाभ्येव - मृशेत् । तन्नाष्ट्रा ० ' ॥ १५ ॥
अनन्तर हविग्रहण के लिए ' यच्छन्तां पञ्च ' ( पाँच तुह्मारा ग्रहण करे - तुम पाँच से छन्दित बनो ) यह मन्त्र बोलता हुआ अपनी पाँचों अंगुलियाँ हवि में डालता है । अंगुलि भी पाँच हैं । उधर यज्ञ भी पाङक्त ( पञ्चावयव ) है । ऐसी अवस्था में पाँच से ग्रहण करता हुआ श्रध्वर्यु यज्ञस्वरूप को ही हवि में प्रतिष्ठित करता है । श्रुति का अक्षर अक्षर गहन विज्ञान से सम्बन्ध रखता है । अक्षर साधारण प्रतीत होते हैं । परन्तु विज्ञान ऐसा गहन होता है कि, जिसे समझलेना अति दुस्कर कार्य्य है । यज्ञ से सम्पूर्ण विश्व विनिर्मित है । एवं ग्राज भी जो कुछ बनता है, यज्ञ से ही बनता है । संसार का प्रत्येक पदार्थ यज्ञरूप है, और यह पाङ क्ल होता है । अतएव इस विश्व के लिए ' पाक्त ' वा इदं सर्वम् ' यह कहा जाता है । श्रात्मा से विश्व बना है । ३६५
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प्रथमकाण्ड आत्मा षोडशकल है । अतएव ' षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' यह कहा जाता है । ब्रह्म से विश्व बना है । ब्रह्म चतुष्पात् है । अतएव ' चतुष्टयं वा इद सर्वम् ' यह कहा जाता है । अग्नि सोम से विश्व बना है । अतएव ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' यह कहा जाता है । सत्यानृत से विश्व बना है । अतएव ' द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति सत्यं चैवानृतं च ' यह कहा जाता है । प्रजापति से विश्व बना है | अतएव ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं किंच ' यह कहा जाता है । पानी से विश्व बना है । अतएव ' सर्वमापोमयं जगत् ' यह कह । जाता है । देवतानों से विश्व बना है । अतएव ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो देवताभ्यः ' यह कहा जाता है । इसप्रकार श्रुतिग्रन्थों में सृष्टि के अनेक मूल बतलाए गए हैं । सब भी मूल परस्पर सर्वथा भिन्न हैं । भिन्न भिन्न प्रभवों की अपेक्षा से सब की कलाएँ भी भिन्न भिन्न हैं । सभी प्रभव सत्य हैं । श्रौत व्यवहारमात्र सत्य हैं । परन्तु यह सत्यता ब्रह्मविज्ञान पर ही निर्भर है । विज्ञान न समझने से श्रौत व्यवहारों में परस्पर विरोध प्रतीत होने लगता है । और वही विज्ञान ज्ञान से पंराङमुख हो जाता है । पूर्वोक्त व्यवहारों में से आज हम आपका ध्यान केवल यज्ञप्रभव की ओर ही आकर्षित करते हैं । त्रिश्व को उत्पन्न करने वाला यज्ञ वास्तव में पाङक्त है । सम्पूर्ण शरीर पञ्चपर्वा है | मस्तक पहिला पर्व है | कण्ठ से मूलद्वार पर्य्यन्त दूसरा पर्व है | श्रोणि से जान्वस्थि ( गोड़े की कपाली ) पर्य्यन्त तीसरा पर्व है । जान्वस्थि से पादमूलान्त चौथा पर्व है । पाद पांचवा पर्व है । ' शिर स्वयं पञ्चपर्वा है । वे पाँचों पर्व पार्श्व कपाल, जतूकास्थि, शङ्खास्थि, गण्डास्थि, अधोहन्वस्थि, इन नामों से प्रसिद्ध हैं | दूसरा पर्व भी पञ्चपर्वा है । वे पाँचों पर्व ग्रोवाकशेरुक, पशु क, कटोकशेरुक, श्रोणिफलक, त्रिकास्थि, नाम से प्रसिद्ध है । ३-४-५ वें पर्व तीनों प्रकारान्तर से एक पर्व है । इसमें उर्वस्थि, जान्वस्थि, अनुजङ्ङ्घास्थि, जङ्घास्थि पादमूलशलाका, ये पाँच पर्व हैं । अत्र केवल बाहु को लीजिए | वह भी अक्षकास्थि, अंसफलक, प्रमण्डास्थि, बहिःप्रकोष्ठास्थि, अन्तःप्रकोष्ठास्थि, भेद से पञ्चपर्वा है । केवल हाथ को लीजिए । उसमें पाँच अङ्गलियाँ हैं । प्रत्येक श्रृङ्ग ुलि में कूर्चास्थि नाम से प्रसिद्ध पाँच पाँच मूलशलाकाएँ हैं । यही व्यवस्था पैरों की अङ्गलि लियों में हैं । ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं I । कर्म्मन्द्रियाँ पाँच है । लोम, त्वक्, मांस, अस्थि, मज्जा, ( शत ०६, १,२,१७ ) भेद से सम्पूर्ण शरीर में पाँच ही चितिपर्व हैं । इसप्रकार सम्पूर्णं प्रपञ्च इन पञ्चों को पञ्चायती व्यवस्था से ही आक्रान्त है । पुरुष के द्वारा स्त्री में आसक्त ( बहुत ) द्रव द्रप्स ( स्थूल बिन्दु - ' टपका ' नाम से भाषा में प्रसिद्ध, ‘ ड्रॉप्स ' नाम से पाश्चात्य जगत् में प्रसिद्ध ) कैसे इन नानाभावों में परिणत होजाता है?, अपने आपको भूतविज्ञानधुरीण मानने वाले पाश्चात्य वैज्ञानिकों के प्रज्ञाकोश में क्या इस प्रश्न का कोई समाधान है? | उत्पन्न शिशु के केश पहिले भूरे होते हैं । अनन्तर काले होजाते हैं । अनन्तर श्वेत होजाते हैं । अनन्तर पीत होकर उड़ जाते हैं । उत्पन्न शिशु दन्तक होता है । फिर दाँत आते हैं । फिर टूट कर नए आजाते हैं । वृद्धावस्था में टूट कर फिर नहीं आते । बिना अस्थिवाला शुक्र आहुत होता है, और उससे हाड़ वाला उत्पन्न होता है । ओषधि - वनस्पत्यादि की अपेक्षा कहीं अधिक उपादानशक्ति रखने वाले मनुष्यादि ३६६
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शतपथब्राह्मण चेतनप्राणियों के हस्त पादादि काट लिए जाते हैं, तो वे पुनः नहीं उत्पन्न होते । किन्तु इन की अपेक्षा सर्वथा स्वल्प उपादानशक्ति रखने वाले श्रद्ध चेतन वृक्षादि को काट दिया जाता है, तो वे पुनः अङ्क ुरित होजाते हैं । क्या आज के विज्ञान के लिए यह समाधेया प्रश्नावली नहीं है? | क्या इन सब का ' प्रकृति ऐसा ही करती है, यह सब तो नेचरल है ' उत्तराभासात्मक यही उत्तर पर्याप्त मान लिया जायगा? । नहीं, कदापि नहीं | यदि हमें इनका वास्तविक उत्तर जानना है, तो हमें वैदिक विज्ञान की शरण में आना पड़ेगा । सर्वथा सहजरूपेणैव ‘ ब्रह्मविद्यया ह वै सर्व भविष्यन्तो मन्यन्ते मनुष्याः ' यह कहने वाले विदितवेदितव्य विचारकक्षापरपारगामी महर्षि ही हमें सहजभाव से ही तथोक्त प्रश्नों के प्रकृतिविज्ञानसम्मत यथार्थ समाधान से समन्वित करसकते हैं । प्रकृत में इन सत्र प्रश्नों में से केवल ' पाकयज्ञ ' मात्र का ही संक्षिप्त समाधान करने की चेष्टा की जाती है । जब संसार में कुछ न था, तो क्या था? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं - ' असदेवेदमग्र आसीत् ' * । ' असत् ' नाम का ' प्राणतत्त्व ' ही सत्र से पहिले विद्यमान था । वही प्राण जगत् का मूल-प्रभव बनता हुआ आगे जाकर ' ऋषि ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही ऋषिप्राण ' ' आगे जाकर चितिक्रम से सप्तपुरुषात्मक पुरुषरूप में परिणत होता हुआ ' प्रजापति ' नाम धारण करता है । इस प्रजापति से सर्व-प्रथम् ‘ प्रतिष्ठारूप वेद ’ उत्पन्न होता है । वेदत्रयी के यजुर्वेद के जुरूप वाग् भाग से सर्वप्रथम प्रप्तत्त्व ही उत्पन्न होता है । वेदब्रह्मप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित वह सप्तपुरुषपुरुषात्मक प्रजापति इसी त्रयीविद्या के साथ उस आपो— मण्डल में प्रविष्ट होपड़ता है । इसी अभिप्राय से अथर्वश्रुति ने कहा है-आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम् | अन्तरैते त्रयो वेदा भृगूनङ्गिरसः श्रिताः ॥ —गोपथब्राह्मणे वही अब्रूगर्भित त्रयीवेद आगे जाकर घनावस्था में परिणत होता हुआ ' गायत्रीमात्रीक ' नाम धारण करता हुआ सूर्य्यरूप से प्रकट होता है । हमारे रोदसीब्रह्माण्ड में होने वाले पाङक्लयज्ञ के प्रभव – प्रतिष्ठा - परा-यण - रूप ' सैषा त्रयीविद्या तपति ' ( शत ० १० काँ ० ) के अनुसार त्रयीघन, त्रिगुणात्मक, आपोमय परमेष्ठी के गर्भ में बुबुद्रूप से प्रतिष्ठित, अतएव ' आपो नारा इति प्रोक्ताः ' इत्यादि के अनुसार ' नारायण ' नाम से प्रसिद्ध भगवान् सहस्रदीधिति ही ( सूर्य्य ) हैं | अपने उदर में सूर्य्यनारायण को प्रतिष्ठित रखने बाला आपोमय परमेष्ठीमण्डल तीसरा द्युलोक है । ' तृतीयस्यां वै इतो दिवि सोम आसीत् ' के अनुसार यह लोक सोममय है | सूर्य्य स्वयं अग्निमय | सोम इसका अन्न है । बिना सोमाहुति के यह अग्नि कभी प्रतिष्ठित नहीं रहसकता । अतएव अग्नि को ' अन्नाद ( अन्न खाने वाला ) कहा जाता है । वह पारमेष्ठ्य सोम इस सौर अग्नि में निरन्तर आहुत होता रहता है 1 । परमेष्ठी प्रजापति कहलाता है । इस प्रजाकाम प्रजापति से सत्रसे * ं इस पाङ ्मक्लसृष्टि का विशद निरूप ईशोपनिषत् के सृष्टिप्रकरण में विस्तार से किया जाचुका है | यहाँ इस सृष्टि का पूरा विवेचन नहीं किया जासकता । केवल दो चार पङक्तियों में आभासमात्र ही करा दिया जाता है | ३६७
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प्रथमकाण्ड पहिले अग्नीषोमात्मक यही सौरयज्ञ उत्पन्न होता है । सूर्य्य यज्ञरूप है । ' ब्रह्म वै सर्वस्य प्रतिष्ठा ' ( श ० ६।१।१ ) के अनुसार वेदतत्त्व ही यज्ञ की प्रतिष्ठा है । यज्ञात्मक सूर्य्य, दूसरे शब्दों में सूर्य्यरूप यज्ञ इसी पूर्वोक्त गायत्रीमात्रिक वेद पर प्रतिष्ठित है । इसी अभिप्राय से ÷ ‘ सैषा त्रयीविद्या यज्ञ: ' - ( शत ० १ काँ ० १ ० १ ० ४ ब्रा ० ३ कं ० ) यह कहा जाता है । त्रयीमय अग्नीषोमात्मक यह सौरयज्ञ आगे जाकर ऋताग्नि के कारण ऋतुरूप में परिणत होता हुआ ‘ सम्ब-त्सर यज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । ताग्नि में सोम की ग्राहुति होने से अग्नीषोमात्मक जो पूर्व भाव उत्पन्न होता है, वही ‘ ऋतु ' कहलाया है । सोम एक वी - स्नेहगुणान्वित - ऋत - धरातल है । इस में अग्नि उद्माभ ( चढ़ाव ), तथा निग्राभ ( उतार ) के तारतम्य से पाँच विभाग होजाते हैं । वे ही पाँचों विभाग वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत्, हेमन्त नाम से प्रसिद्ध हैं । ' हेमन्त - शिशिरयोः समासेन ' के अनु-सार शिशिर का हेमन्त में अन्तर्भाव होजाता है । वसन्त और ग्रीष्म एक विभाग है । शरद और हेमन्त का एक विभाग है । वर्षा एक विभाग है । वसन्त और ग्रीष्म, दोनों ग्रीष्म ऋतु है । शरद्ध ेमन्त शीतंतु है । वर्षा वर्षा ऋतु है । ‘ उष्णकाल ' ( लोकभाषा में - ' उह्नालू ' नाम से प्रसिद्ध. ), ' शीतकाल ' ( लोकभाषा में ' श्यालू ’ नाम से प्रसिद्ध ), एवं वर्षाकाल ( बरसात ), तीन काल आजदिन अति सुप्रसिद्ध हैं । तीनों से तीन ही कृत्रियाँ होती हैं । ये ही तीन चातुर्मास्य ( चौमासे. ) हैं । ४-४ मास का एक एक विभाग है । पहिला चौमासा अग्निप्रधान है, दूसरा चौमासा अग्नीषोमात्मक है । एवं तीसरा चौमासा सोमप्रधान है । ग्राद्यन्त के दोनों क्रमशः गर्मी सर्दी है | मध्य के चौमासे में दोनों का समन्वय है । ' उष्मा ' ( उमस ) भी है, सर्दी भी है । अतएव वर्षां को ‘ सर्वऋतु ' मान लिया जाता है । इतर दोनों चौमासों का इस मध्य के चौमासे में अन्तर्भाव है । यही कारण है कि, विज्ञानप्रधान भारतवर्ष उन दोनों को ' चौमासा ' न कहकर वर्षाकाल को ही ' चौमासा ' कहता है । क्योंकि दोनों चौमासे इसके स्वरूप में प्रविष्ट हैं । अतएव इस शब्द का प्रधान अधिकारी वर्षाकाल ही है । इस व्यव-हार का मूल निम्नलिखित श्रुतिवचन ही है— ‘ स वै वर्षास्वाधीत । वर्षा नै सर्गऋतवः । अथादो वर्षमकुर्म, इति सम्वत्सरान् पश्यति । वर्षा ह त्वेव सर्वेषामृतूनां रूपम् । उत हि तद्वर्षासु भवति यदाहुः - ग्रीष्मऽइव-वाऽद्य ' इति । उतेव दद्वर्षासु भवति यदाहु: - शिशिर इव वा द्य इति वर्षादिद्वर्षाः, अथै-तदेव परोक्षं रूपम् । यदेव पुरस्ताद्वाति- तवसन्तस्य रूपम् 1 । यत् स्तनयति - तद्ग्रीष्मस्य । यद्वर्षति तद्वर्षाणाम् । यद्विद्योतते - तच्छरदः । यद्दृष्ट वा उद्गृह्णाति – तद्ध मन्तस्य । वर्षाः सर्वऋतवः । ऋत्न् प्राविशत् ' ( श ० कां ० २ प्र ० २ ब्रा ० ६–८ कं ० इति । प्रकृत में प्रधानरूप से वसन्तादि पाँच ऋतुएँ हीं अपेक्षित हैं । पाँचों ऋतुएँ क्रमशः ७२-७२ अहो-रात्रों में विभक्त हैं । ७२-७२ अहोरात्रों की एक एक ऋतु है । इन ७२ अहोरात्रों में भी १६, ४०, १६, ये तीन विभाग हैं । ये ही तीनों प्रातः सवन, माध्यन्दिनसवन, सायंसवन, नाम से प्रसिद्ध हैं । प्रातःसवन इस ऋतु-÷ इस विषय का विशद विवेचन आगे के ब्राह्मण में किया जायगा । ३६८