Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 661–670

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 661–670

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शतपथब्राह्मण का पूर्वाह्णकाल है ।. यही ग्रीष्म है | माध्यन्दिनसवन मध्याह्नकाल है । यही वर्षा है । सायंसवन अपराह्णकाल • प्रकार सवनभेद से पाँचों ऋतुओं में तीनों कालों की सत्ता सिद्ध होजाती है । पूर्वा-हुह्णादि काल घंटा, मिनिट, पल, विपल, अनुपल, प्राण, आदि का उपलक्षण है । दशाक्रम के अनुसार सभी ऋतुओं मे सभी ऋतुओं का समावेश रहता है, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है— ‘ ऋतवो वा असृज्यन्त । ते सृष्टा नानैवासन् । तेऽब्रुवन् - न वा इत्थं शक्ष्यामः प्रजन-यितुम् | रूपैः समायामेति । त एकैकमृतु रूपैः समायन् । तस्मादेकैकस्मिन् ऋतौ सर्वेषां ऋतूनां रूपम् ' । - शत ० ८ | ४ | २४ इति । इससे यह भी सिद्ध होजाता है कि, भिन्न भिन्न ऋतुओं में उत्पन्न होने वाले भिन्न भिन्न अन्नों में प्रत्येक अन्न पाँचों ऋतुओं की सम्पत्ति से युक्त होता हुआ अवश्य ही पञ्चावय है । पञ्चावयभूत पूर्वोक्त ऋतुनों के सवनत्रय में विभक्त ७२ अहोरात्रों में से प्रारम्भ का १६ अहोरात्रात्मककाल उस की बालावस्था है । ४० का काल युवावस्था है । इसमें ततऋतुओं का पूर्ण विकास रहता है । यही लोकभाषा में ' चिल्ला ' कहलाता है । चिल्ला ’ ‘ चालीसा ’ का रूपान्तरमात्र है । उत्तर का १६ का काल तत्तद् ऋतुओं की वृद्धावस्था है । यज्ञ--सम्बन्ध में प्रधानता इन्हीं पाँच ऋतुओं की है । इसी आधार पर आज भी ' पून्यूँ पड़वा गाले, तो दिन बहत्तर टाले ' यह कहा जाता है । यदि ज्येष्ठ की पूर्णिमा, और प्रतिपत् में पूर्ण वृष्टि होजाती है, तो शकुन-शास्त्र के अनुसार पूरे चौमासे में ( ७२ अहोरात्रपर्यन्त ) वृष्टि का अभाव होजाता है, पूर्व वाक्य का यही अर्थ है । सम्पूर्ण प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि, अग्नीषोमात्मक सौरयज्ञ इन पाँच ऋतुओंों में परिणत होकर ही ' सम्वत्सर ' कहलाने लगता है । इसी सम्वत्सरात्मक पञ्चावयव सौरयज्ञ से प्रजा का निर्माण होता है, अतएव सम्वत्सर को प्रजापति कहा जाता है । यह यज्ञरूप है । अतएव इस सम्वत्सरप्रजापति को भी ' यज्ञ ' कहा जाता । यह नित्ययज्ञ ऋतुभेद के कारण पाङ्क्त ( पञ्चावयव ) है, जैसाकि निम्नलिखित वचनों से स्पष्ट हो-जाता है— ४- एष नैं प्रत्यक्षं यज्ञो यत् प्रजापतिः ( ० ४ | ३ | ४ | ३ ) इति! २ – सम्वत्सरसम्मितो वै यज्ञः । पञ्च वा ऋतवः सम्वत्सरस्य । तं पञ्चभि-राप्नोति । तस्मात् पञ्च जुहोति ( श ० ३ | १ | ४ | ५ ) इति । ३ – सम्वत्सरो यज्ञः प्रजापतिः ( शत २ २ २ २ ) इति । ‘ सौरसम्बत्सरयज्ञ पाङ्क्त है ', यह पूर्व के सन्दर्भ से भलीभाँति सिद्ध होजाता है, इसीसे प्रजा का निर्माण होता है | ‘ कारणगुणाः कार्य्यगुणानारभन्ते ' यह निश्चित सिद्धान्त है । अतएव पांक्तयज्ञ से उत्पन्न होने वाली प्रजा में भी पांक्तता निविष्ट रहती है । सम्वत्सर साक्षात् रूप से प्रजोत्पत्ति का कारण नहीं बनता, अपितु वर्षा, अन्न,, रेत, क्रम से ही यह कारण बनता है । रेतोंरूप में परिणत सम्वत्सर ही प्रजा का कारण चनता है, इसी अभिप्राय से ' सम्वत्सरे सम्वत्सरे वै रेतः सिकं प्रजायते ' ( ऐ ० ४ | १४ ) ' सम्वत्सरो वै प्रजननम् ' ( गो ० पू ० २।१५ ) ' सम्वत्सरं हि प्रजाः पशत्रोऽनु प्रजायन्ते ' ( ता ० ब्रा ० १०।१।६ ) इत्यादि ३६६

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प्रथमकाण्ड कहा जाता है | शुक्र सम्वत्सर की ही प्रतिमा हैं । इसमें पाँच अवयव हैं । अतएव शरीरान्विता भूतचिति ( स्थूलशरीर ), देवचिति ( सूक्ष्मशरीर ), एवं बीजचिति ( कारणशरीर ), तीनों विवर्त्त ' पञ्चधा विभक्त होते है | अब केवल प्रश्न यही शेष रह जाता है कि, ऋतु पाँच पर्वों में हीं विभक्त क्यों हुई? | इसका उत्तर है आत्मविद्या । श्रात्मा को घोडशीपुरुष कहा जाता है । इस षोडशी का पूर्व के प्रकरणों में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है । अतएव अधिक न कह कर केव न यही निवेदन पर्य्याप्त समझते हैं कि अव्यय - श्रात्मा ही नगत् का मूलाधार है । इसी अधिष्ठान पर तत्प्रकृतिरूप अक्षर - क्षरादि प्रतिष्ठित हैं । अव्ययात्मा आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाक् भेद से पञ्चावयव है । ये ही पाँचों ' कोशब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध हैं | इस अव्ययमन के प्रतिष्ठारूप हृदय से अक्षरतत्व का प्रादुर्भाव होता है! क्योंकि अव्ययात्मा पञ्चावयव है । अतएव अक्षर भी ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम, भेद से पञ्चावयव बन जाता है | ' ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ' के अनुसार ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध क्षर अक्षर का मर्त्यभाग है । उस में भी इन्हीं नामों से प्रसिद्ध, किन्तु मर्त्या पाँच कलाएँ हैं । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकलात्मक क्षर एवं निष्कल परात्पर की समष्टि ही षोडशीपुरुष है । यह विश्व के प्रत्येक पदार्थ में, परमाणु परमाणु में व्याप्त है । इसी विज्ञान के आधार पर ‘ षोडशकलं वा इदं सर्वम् ' यह कहा जाता है । इस षोडशी प्रजापति के पञ्चकल क्षरभाग से विकारक्षर का जन्म होता है । क्योंकि जन्मदाता आत्म-क्षर पञ्चपर्वा है । अतएव विकारक्षर भी प्रारण, आप:, वाक्, अन्न, अन्नाद भेद से पञ्चपर्वा ही होता है । इन पाँचों के पञ्चीकरण से उत्पन्न, अतएव ' पञ्चजन ' नाम से प्रसिद्ध पाँच पञ्चीकृत क्षर हैं । पञ्चीकृत, पञ्चजनों के सर्वहुतयज्ञ से'पाँच पुरञ्जन उत्पन्न होते हैं । ये ही वेद, लोक, प्रजा, भूत, पशु, नाम से प्रसिद्ध हैं । यही विश्व का पहिला पाकयज्ञ है । इसके पाँचों से ( जो कि पञ्चीकृत होने से प्रत्येक पाङक्त है ) क्रमशः स्वयम्भू - परमेष्ठी – सूर्य्य - पृथिवी ( भूपिण्ड ) और चन्द्रमा का जन्म होता है । पाँच से पाँच ही उत्पन्न होते हैं । पाँचों में पाँच पाँच ही पर्व हैं । स्वयम्भू आकाश है, परमेष्ठी वायु ( साम्बसदा-शिव नाम से प्रसिद्ध शिववायु ) है, सूर्य्यं तेज है, पृथिवी पृथिवी है, ' अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि ' के अनुसार चन्द्रमा जल है । पाँचों भूत पञ्चीकृत हैं । इनका सम्वत्सरयज्ञ में विकास होता है । अतएव ऋतु को भी पञ्चधा विभक्त होजाना पड़ता है । ये पाँचों क्षर हैं । यज्ञप्रपञ्च क्षर है । यज्ञ में पाँच अवयव हैं । पाँचों की समष्टिरूप जो ' एकत्त्व ' है, वही अक्षर है । पाँच होते हुए भी पाँचों एक यज्ञ कहलाता है । अतएव मानना पड़ता है कि, पञ्चावयव इस यज्ञ के सन्धिस्थानीय चारों छिद्रों को पूरा करने वाला, पाँचों क्षरकूटों पर रहने वाला एक तत्व है । वही छिद्रपूरक कूटस्थ अक्षर कहलाता है । इसी अक्षरविज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अक्षरेणैव यज्ञस्य छिद्रमपिद-धाति ' ( तां ० ब्रा ० ८६ । १३ ) यह कहा जाता है । यह पाङक्त - विकार - तरसंघरूप सम्वत्सरयज्ञप्रजापति उस षोडश पुरुष से अविनाभूत है, इसी अभिप्राय से - ' स एप सम्वत्सरः प्रजापतिः षोडशकलः - ( श ० .१४ | ४ | ३।२२ ) यह कहा जाता है । विषय आवश्यकता से अधिक विस्तृत होगया है एवं अभी यज्ञ की पाङ क्तता में बहुत कुछ वक्तव्य है, परन्तु विस्तारभय से किसी आगे के प्रकरण के लिए इसे यहीं छोड़कर इस प्रकरण का उपसंहार किया ४००

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शतपथब्राह्मण जाता है । पूर्व के निरूपण से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, यज्ञ पाङ्क्त है । हमारा शरीर उसी से बना हैं । अतएव ‘ पुरुषो वै यज्ञः ' - ' पुरुषसम्मितो वै यज्ञः - यज्ञो वै पुरुषः ' इत्यादि श्रौत व्यवहार प्रच-लित हैं | हमारा हाथ भी एक यज्ञ है । इसका प्रत्यक्षप्रमाण पाँच अंगुलियाँ है | बिना पाङ क्लयज्ञ के अंगु-लियाँ पाँच हो ही नहीं सकतीं । पुरुष - सम्मित यज्ञ की अंगुलियाँ साक्षात् यज्ञ की प्रतिकृति है । और ओर अवयवों की अपेक्षा अंगुलियों में पञ्चावयवता सर्वथा स्फुट है । इसी अभिप्राय से याज्ञवल्क्य कहते हैं—

तं वा अंगुलिभिर्मिमीते । पुरुषो वै यज्ञः ।

तेनेदं सर्वं मितम् । तस्यैषावमा मात्रा - यदङगुलयः ॥

- शत ०१०।१।६।२ इति आज अध्वर्यु ' हवि के द्वारा पाङ क्तयज्ञ का स्वरूप निष्पन्न करना चाहता है । यह हविद्रव्य प्रारम्भ में हीं पाङक्तसम्पत्ति से युक्त होकर पांक्त होता हुआ यज्ञ वन जाय, अतएव ' यच्छन्तां पञ्च ' यह चोलते हुए पाँचों अंगुलियों का इसमें प्रवेश किया जाता है । पाँच से यज्ञप्रजापति का स्वरूप गृहीत हो जाता है । एवं प्रजापति सर्वरूप है । अतएव भारतीयोंनें निर्णयसमिति में पाँच पञ्चों को ही प्रधानता दी है । सर्वत्त्व-सम्पादक इसी पांक्तविज्ञान के आधार पर ' अमुक की तो पाँचों अंगुलियाँ घी मे हैं'- — यह कहा जाता है । स्वरूपसिद्धि प्राप्त करने वाले मनुष्य के लिए ही पूर्ववाक्य का प्रयोग होता है । क्यों पाँच अंगुलियों किया जाता है?, इस की यही संक्षिप्त उपपत्ति है । इसी उपपत्ति को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है—

' पांक्तो वै यज्ञः । तद्यज्ञमेवैतदत्र दधाति ॥ १६ ॥

इसप्रकार ' यच्छन्तामित्यालभते ' ( का ० श्र ० २।१६ ) के अनुसार शकटस्थ हवि में पाँचों अंगुलियों का प्रवेश करने के अनन्तर वह अध्वर्यु ' ' देवस्यत्वे ' ति गृहणाति आग्नेयं चतुरो मुष्टीन् ' ( का ० श्रौ ० २।२० ) के अनुसार ' देवस्य त्वा प्रसवे ' - ( यजु: १ । १० ) इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ हविग्र हणं करता है । हाथ डाल कर चार बार हवि लेकर उसे शूर्पस्थ अग्निहोत्रहवणी में डालता है । इन चार मुष्टि— ग्रहणों में तीन में तो ‘ देवस्य त्वा ' इत्यादि मन्त्र बोला जाता है, एवं चौथी मुष्टि ' मुष्टौ चोत्तमे ' ( का ० श्रौ ० १ | ७ | ११ ), ‘ चतुर्थ ं तूष्णीम् ' ( अप ० श्री ० १११७ २ ) के अनुसार तूष्णीं ही डालता है । ' सविता देवता के प्रसव में, अश्विनीकुमारों के बाहू से, एवं पूषादेवता के हाथों से मैं तुम्हारा ग्रहण करता हूँ ' मन्त्र का यही अक्षरार्थ है । इस मन्त्र में प्राकृतिक नित्ययज्ञ से सम्बन्ध रखने वाली नक्षत्रमूला श्रदिति का ही स्वरूप - विश्लेषण हुआ है । ' अदिति ं शब्द वेदों में अनेक स्थानों पर प्रयुक्त हुआ है । साधारण दृष्टि से देखने पर उन प्रयुक्त अदिति - शब्दों में परस्पर विरोध प्रतीत होता है । कहीं सम्पूर्ण त्रैलोक्य को ' अदिति ' बतलाया जाता है | कहीं केवल पृथिवी को ही अदिति कहां जाता है । कहीं पृथिवी को अदिति बतलाया जाता है । कहीं त्रैलोक्य की जड़ - चेतनात्मिका ( स्थावर - जंगम ) - प्रजा को अदिति बतलाया जाता है । कहीं संसार के पदार्थों को खाने वाले तत्त्वविशेष को अदिति कहा जाता है । कहीं गौ को अदिति बतलाया जाता है । कहीं वाक को अदिति ४०१

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प्रथमकाण्ड बतलाया जाता है । इसप्रकार भिन्न भिन्न अर्थों में ग्रदिति शब्द प्रयुक्त देखा सुना जाता है, जैसा कि निम्न लिखित वचनों से स्पष्ट हो जाता है—

१ - प्रदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिताः ।

विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥

- ऋक्संहिता २ - ' मा गामनागामदितिं वधिष्ट ' ( ऋ ० २८।१५ ) । ३ - ' वाग्वा श्रदितिः ' ( श ० ६ | ५ | २ | २० ) । ४- ' इयं वै पृथिव्यदितिः ' ( श ० १० ५,५ ) ५- ' सर्वं वा त्तीति- तददितेरदितित्वम् ' ( ० १० | ६ | ५ | ५ ) इत्यादि निम्मलिखित ' अदितिविज्ञान ' से पूर्ववचनों का सम्पूर्ण विरोध सुसमन्वित हो जाता है । खण्डनार्थक ' दो ' धात से ही ' दिति ' शब्द निष्पन्न होता है । कटा हुआ भावविशेष ही ' दिति ' है । दिति का प्रभाव ही अदिति है । अविच्छिन्न तत्त्व ही अदिति है । पृथिवी, सूर्य्य नक्षत्र, भेद से अदिति तीन प्रकार की है । इन तीनों अदितियों में इतर सम्पूर्ण अदिति - विवों का अन्तर्भाव होजाता है । इन तीनों में से सर्वप्रथम सूर्य्यमूला अदिति की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ( १ ) सूर्य्यमूला - अदिति: -एक ओर भूपिण्ड है | दूसरी ओर सूर्य्यपिण्ड है । सूर्य्यपिडस्थान ' लोक ' कहलाता है, भूपिण्डस्थान ‘ भूलोक ' कहलाता है । भूपिण्ड ' श्रयं ' लोक है । सूर्य्य पिण्ड ' असौ ' लोक हैं । श्रुति में जहाँ कहीं ‘ अयं लोकः ' यावे, वहाँ सर्वत्र भूलोक का ही ग्रहण करना चाहिए | एवं जहाँ ' असौ लोकः ' आवे, वहाँ द्युलोक का ही ग्रहण करना चाहिए । यह सामान्य परिभाषा है । यह भूलोकस्थ भूपिण्डं द्यु लोकस्थ सूर्य्यपिण्ड के चारों ओर ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध नियत मार्ग पर परिक्रमा लगाया करता है । सूर्य्य, औरं भूपिण्ड, दोनों में हीं भूत, प्राण, दोनों की सत्ता है । भूपिण्डानुगत भूत ' पृथिवी ' कहलाता है । यह भूत मर्त्यभाग है । हम इसी मर्त्यभाग को देख रहे हैं । पार्थिव प्राण अग्नि है । अग्नि इस भूतमयी पृथिवी के गर्भ में प्रविष्ट है । उधर सूर्य का भूतभाग ' तेज ' नाम से प्रसिद्ध है, एवं प्राण भाग ‘ इन्द्र ' नाम से प्रसिद्ध है । तेजोमय सूर्य्यपिण्ड इन्द्रगर्भित है । इसी अभिप्राय से ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्र ेण गर्भिणी ’ ।शत ० १४७ । ५ । २० ) यह कहा जाता है । प्राण ही देवता है । भूत इस का आधार है । भूत पर प्रतिष्ठित प्राणदेवता चारों ओर व्याप्त रहते हैं । पृथिवी का प्राणाग्नि पृथिवीकेन्द्र से निकल कर वत्त ' लमण्डल बनाता हुआ पिएड से बड़ी दूर पर्य्यन्त व्याप्त रहता है । एवमेव प्राणेन्द्र सूर्य्यकेन्द्र से निकल कर उसी प्रकार बड़ी दूर पर्य्यन्त व्याप्त रहता है । पृथिवी में प्राणाग्नि गौण है, भूतभाग प्रधान है । दूसरे शब्दों में- देवता अनुवण हैं, भूतभाग उल्वण है । सूर्य्य में प्राणेन्द्र प्रधान है. भूतभाग गौण है । देवताभाग सूर्य्य में हीं उल्वण है । अतः ‘ चित्रं देवानामु– दगात् ' इत्यादि यजुर्मन्त्र सूर्य्य को ही ' देवघन ' बतलाते है । वस्तुतः हैं दोनों में दोनों । साथ ही यह भी सम-४०२

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शतपथब्राह्मण झलेना चाहिए कि, पृथिबी में भी इन्द्र का प्रभाव नहीं है । एवं सूर्य्य में भी अग्नि का प्रभाव नहीं है । दोनों में दोनों हैं । केवल प्रधानता में तारम्य है । सूर्य्य में इन्द्रप्राण प्रधान है, तो पृथिवी में अग्निप्राण प्रधान है । पार्थिव अग्नि ‘ गायत्र ' कहलाता है । गायत्राग्नि ' अष्टाक्षर ' बनता हुआ आठ वसु कहलाता है । सौरमण्डल से श्राया हुआ ऐन्द्रप्राण पार्थिव वस्वग्नि से युक्त हो तन्मय बन जाता है । अतएव पार्थिव इन्द्र ' वासव ' कहलाता है । एवमेव सौर अग्नि सविता से युक्त हो ' सावित्राग्नि ' कहलाने लगता है । एवं ' बृहत् ' नाम से प्रसिद्ध ' महासाम ' से युक्त ' मह: ' भावापन्न सौर इन्द्र ' मघवा ' कहलाता है । पार्थिव इन्द्राग्नी पृथिवी से निकल कर निरन्तर सूर्य्य में जाया करता है, एवं सौर इन्द्राग्नी सूर्य्य से निकल कर पृथिवी में श्राया करता है | इस ग्रगति, गति, से दोनों प्राणों का परस्पर यजन ( मेल ) होता रहता है । विश्वस्वरूप सम्पादक त्रैलो-क्य में व्याप्त प्रकृतिसिद्ध यही नित्य ' ऐन्द्राग्नयज्ञ ' है । इन्द्र से सब का आत्मा बनता है, अग्नि से सब का भूत बनता है । सौर अग्नि ऐन्द्रप्राण - प्रधान होने से ' इन्द्र ' है । अतएव उस में रहने वाली प्रजा ' दिव्य प्रजा ' ( देवता ) कहलाती है । पार्थिव आग्नेय प्राण अग्निप्रधान है । अग्नि को ही * ' मनु ' कहते हैं । अतएव तत्प्रधाना पार्थिवी प्रजा ' मानव ' नाम से प्रसिद्ध है । दोनों हीं प्रजा ऐन्द्राग्नयज्ञ पर प्रतिष्ठित हैं । पृथिवी में रहने वाला आग्नेय प्राण सूर्य्यपिण्ड के ऊपर पर्य्यन्त ( २२ वें अहर्गण पर्य्यन्त ) व्याप्त रहता है । ' असौ वा आदित्य एष रथः ' ( शत ० ε | ३ | ४ | ५१ ) के अनुसार सूय्य हिरण्मय रथ है । पार्थिव प्राण का अबसान इस की बाह्य सीमा में होता है । अतएव इस की यह अवसानबिन्दु ' रथन्तरसाम ' नाम से व्यवहृत होती है । ' अवसान ' ही ‘ साम ’ है । वस्तु की सीमा ही उस वस्तु का साम है । साम एक सहस्र हैं । उन में सत्र से अन्त का साम ' उचसाम ' कहलाता है । यही ' निधनसाम ' नाम से भी प्रसिद्ध है । सूर्य स्वज्योतिर्घन है । अतएव भूप्रधाना पृथिवी की अपेक्षा इस का तेजोमय ऐन्द्रप्राण पृथिवी से कहीं दूर पर्य्यन्त व्याप्त रहता है । सम्पूर्ण त्रैलोक्य इस सौरमण्डल में अन्तर्लीन होरहा है । सूर्य्य का २१ वाँ अहर्गण पृथिवी से अनन्त दूर है । उससे ऊपर पर्य्यन्त सौर प्राण जाता है । क्योंकि सौरप्राण की सीमा के गर्भ में सब कुछ समाविष्ट है । त्रैलोक्यगत यच्च यावत् पदार्थों के साम इस साम उदर में भुक्त हैं, अतएव सौर साम को ‘ बृहत्साम ' कहा जाता है । इस बृहत्साम के कारण ' बृहत् ' नाम से प्रसिद्ध यह सूर्य्य - ' बृहद्ध तस्थो भुवनेष्वन्तः ’ – के अनुसार स्वयम्भूः, परमेष्ठी, चन्द्र, पृथिवीरूप महाभुवनों के केन्द्र में बृहती छन्द पर प्रतिष्ठित होकर तप रहा है । ÷ वेदि ही वेद की प्रतिष्ठा है । वेद ही यज्ञ की प्रतिष्ठित है । यज्ञ ही प्रजापति की प्रतिष्ठा है । प्रजापति ही प्रजा का प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण है । त्रयीवन सूर्य्यपिण्ड वेदि है । यह वेदि भूत, प्राण, भेद से दो भागों में विभक्त है I सूर्य्यपिण्ड भूतवेदि है 1 । सौरप्राणमण्डल प्राणवेदि है । यह प्राणवेदि भूतवेदि की अपेक्षा * इस विषय का विशद विवेचन आगे आने वाले ब्राह्मण में किया जायगा । --ईशोपनिषत् के - भाषाभाष्य में ' अनेजदेकं मनसो जवीयः - इत्यादि मन्त्र के वेदस्वरूप - निरूपण में वेद, वेद, यज्ञ, प्रजापति, भेद से चतुर्द्धा विभक्त चतुष्पाद् ब्रह्म का विशद निरूपण देखना चाहिए | ४०३

पृष्ठ 666

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प्रथमकाण्ड कहीं बड़ी है, अतएव इसे ' महावेदि ' कहा जाता है । सूर्य्यपिण्डरूपा वेदि से बाहिर इस का स्वरूप प्रतिष्ठित है, अतएव इस महावेदि को ' बहिर्वेदि ' कहा जाता है । सूर्य्यपिण्डरूपा वेदि महावेदि के गर्भ में, केन्द्र में प्रति— ष्ठित है । अतएव इसे ' अन्तर्वेदि ' कहा जाता है । यही परिमिता वेदि है । वह अपरिमिता वेदि है । दोनों वेदियाँ एक सौरसंस्था है । यही संस्था पृथिवी में है । भूपृष्ठ से रथन्तरसाम पर्य्यन्त व्याप्त पार्थिव आग्नेय प्राणमण्डल महावेदि है । भूपिण्ड अन्तर्वेदि है । दोनों की समष्टि एक पार्थिवमण्डल है । इसी वेदिविज्ञान को लक्ष्य में रख कर श्रुति कहती है— ‘ तस्याः ( पृथिव्याः ) एतत् पमितं रूपं यदन्तर्वेदि । अथैष भूमाऽपरिमितो यो बहिर्वेदि ' - ( ऐ ० ८ । ५ ) इति । मध्यस्थ सूर्य्य का तेजोमय प्राण सर्वत्र त्रितत होता हुआ हमारे भूपिण्ड पर भी आरहा है । इसी प्राण की महिमा से अदिति, दिति का स्वरूप सम्पन्न होता है । सूर्य्यमण्डल से अविच्छिन्न रूप से आता हुआ प्राण भ्रमण्डल का स्पर्श करता हुआ - इतर भाग से बाहिर निकल जाता है । जो प्राण भूपिण्ड पर रह जाता है, वह तो प्रतिफलित हो कर सूर्य्य की ओर ही चला जाता है, एवं पृथिवी के दोनों पाश्र्वों का स्पर्श करता हुआ शेष भाग आगे निकन जाता है । पृथिवी अवरोधक बन जाती है । अतएव पृथिव्यवच्छिन्न सौरप्राण आगे नहीं जाने पाता । अपितु इससे प्रत्याहित होकर पुनः सूर्य्यलोक की ओरही चला जाता है । पृथिवी का पृष्ठभाग इस सौरप्राण से वञ्चित रह जाता है । यहाँ आके उसकी अविच्छिन्ना धारा टूट जाती है । पृथिवी के पृष्ठ से सूर्य पय्यन्त व्याप्त जो अविच्छिन्न - अखण्डित प्राणमण्डल है, वही अदिति है । सूय्यदिक् के विरोध में रहने वाला, अतएव तमोमय भाग हो दिति है । प्रतिदिक् में यहाँ आतेहुए सौर प्रकाश का त्याग हो जाता है । अतएव तमोमय, अतएव आसुरभाव प्रधान इस भाग को ‘ राहु ' कहा जाता है । ‘ सिंही भूत्त्वा चचार ' के अनुसार पृथिवी ' सिंही ' है । इसी की कृपा से इस तमोमयं राहु का जन्म हुआा है । यही इस की जन्मदात्री हैं । अतएव इस पार्थिव -राहु को ' सैंहिकेय ' कहा जाता है । जैसे पृथिवी में राहु का जन्म होता है, उसी प्रकार चन्द्रमा में भी राहु का जन्म होता है । चन्द्रमा का जो भाग सूर्य्यं की ओर है, वह पितृस्वर्ग कहलाता है । चान्द्र राहु के इस स्वर्भाग की ओर भानु ( सूर्य्य ) रहता है, अतएव चान्द्रराहु को ' स्वर्भानु ' कहा जाता है । सैंहिकेय राहु से चन्द्रग्रहण होता है । अतएव इसे ‘ विधुन्तुद् ' कहा जाता है, एवं स्वर्भानु से सूर्य्यग्रहण होता है । अतएव इस के लिए ' स्वर्भानुर्ह वा आदि-त्यन्तमसाऽविध्यत् ' ( ' शा ० का ० ४।५।२ ) यह कहा जाता है । पृथिवी की छाया से चन्द्रग्रहण होता है, एवं चन्द्रमा की छाया से सूर्यग्रहण होता है, यह सभी को त्रिदित है । इस प्रपञ्च से प्रकृत में यही बतलाना है कि, ऊपर से आकर भूपिण्ड से टकराता हुआ, ग्रतएव पार्थिव सम्पत्ति से युक्त होता हुआ सूर्य्य पर्य्यन्त व्याप्त नो पार्थिवप्राणसंश्लिष्ट सौर - प्राणमण्डल है, वही अविच्छिन्ना धारा के कारण ' अदिति ' कहलाया है । सूर्य पिता है । पृथिवी माता है । दिति का स्वरूप माता पृथिवी के सम्बन्ध से निष्पन्न होता है । अतएव पार्थिवभाग को ही अदिति मान लिया जाता है । परन्तु कौनसा पार्थिव भाग? । वही पूर्वोक्त महावेदिरूपा बहिर्वेदि । भूकेन्द्र से निकल कर २२ पर्य्यन्त व्याप्त होने वाला पार्थिव ग्राग्नेय प्राण ही सौर प्राण से संश्लिष्ट होकर अदिति कहलाने लगता है । केन्द्र से २२ वें ४०४

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शतपथब्राह्मण अहर्गण पर्यन्त व्याप्त रहने वाला यह पार्थिव अग्नि त्रिवृत, पञ्चदश, एकविंश, स्तोम के भेद से त्रेधा विभक्त है | इन तीनों में क्रमश: इस एक ही पार्थिव अग्नि के अवस्था - विशेष अग्नि, वायु, आदित्य, प्रतिष्ठित हैं । ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, ये ही इन तीनों शवसोनपाद्द ेवताओं के ' अधिदेवता ' हैं । ये सम्पूर्ण देवता ही ' विश्वेदेव ' कहलाते हैं । ये सब उस महापृथिवीरूप अदिति में ही गर्भ धारण करते हैं, वहीं प्रतिष्ठित रहते हैं । इसी अभिप्राय से महर्षि वाल्मीकि ने कहा है-अदित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिन्दम! | आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च परंतप! ॥ - वाल्मीकि रामायणे त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविंश, तीनों पृथिवी के भाग हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर— “ तिस्रो वाऽइमाः पृथिव्यः – इयमहैका, द्व े अस्याः परे " ( शत ० ५,१, ५, २१ ) यह कहा जाता है । अतएव इस सूर्य्यमूला अदिति के लिए अवश्य ही ' इयं वै पृथिव्यदितिः ' यह कहसकते हैं । भूपिण्ड ( माता ), त्रिवृरूपा महिमापृथिवी, पञ्चदशरूप अन्तरिक्ष, एवं एकविंशरूप द्युलोक, २१ पर रहने वाला स्वयं पिता ' सूर्य्य, सम्पूर्ण देवता, सत्र कुछ इसी में प्रतिष्ठित हैं । महिमारूप अदिति में जैसे वश्वेदेवा उत्पन्न होते हैं, तथैव उसी अग्निरूपा अदिति से इस भूमण्डल पर ' पञ्चजन ' उत्पन्न होते हैं । ' विश्वसृट् ' नाम से प्रसिद्ध प्राण, आपः, वाक्, अन्नाद, अन्न, इन पाँच क्षरों के पञ्चीकरण से पाँच ' पञ्चजन ' * उत्पन्न होते हैं । आगे जाकर इन पञ्चजनों का ' सर्वहुतयज्ञ ' होता है । इन सर्वहुत यज्ञरूप पाँच पञ्चजनों से अग्नि आदि भूत उत्पन्न होते हैं । अग्नि क्योंकि पाँच पञ्चजनों से उत्पन्न होता । अतएव ' पञ्चभिर्जनैरुत्पन्नः ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इस पार्थिव अग्नि को ' पाञ्चजन्य ' कहा जाता है । इसी पाञ्चजन्य अग्नि से धातु, उपधातु, स, उपरसादि, धातुजीव, ओषधि वनस्पत्यादि मूलजीव, कृमि, कीट, पशु, आदि चेतन-जीव उत्पन्न होते हैं । धातु - ओषधि आदि का पहिला स्थावरविभाग़ है । कृमि दूसरा विभाग है । कीट तीसरा विभाग है । पक्षी चौथा विभाग है । एवं पशु ( पुरुष - अश्व - गो - वि - ज ) पाँचवाँ विभाग है । पाञ्चजन्य अग्नि से ये ही पाँच पञ्चजन उत्पन्न होते हैं । पाङ्क्त अग्नि से उत्पन्न होने वाले इन पाँचों में लोम, त्वक्, मांस. अस्थि, मज्जा, ये पाँच पाँच चितियाँ हैं, जैसाकि यज्ञ की पाङ ्मक्तता का निरूपण करते हु विस्तार से बत-* विश्वसृद्, पञ्चजन, पुरञ्जन, पुर, आदि का विशद निरूपण ईश्यभाष्य के सृष्टिप्रकरण में देखना चाहिए । ÷ ऋचो नामास्मि यजूंषि नामास्मि सामानि नामास्मि ।

ये अग्नयः पाञ्चजन्या अस्याः पृथिव्यामधि ।

तेषामसि त्वमुत्तमः प्र नो जीवातवे सुवं ॥

–यजुःसंहिता १८,६७, ४०५

पृष्ठ 668

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प्रथमकाण्ड लाया जाचुका है | यह पञ्चजनप्रजा भी उसी अदिति से उत्पन्न हुई है । इसी सूर्य्यमूला दिति का निरूपण

करती हुई श्रुति कहती है-अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः ।

विश्वेदेवा अदितिः पञ्जजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥

- ऋक्संहिता सैपा - सूर्य्यमूलान्यदितिः -3-२ पृथिवीमूलान्यदितिः-दूसरी है पृथिवीमूला आदिति । भूमण्डल के दृश्य और अदृश्य, दो विभाग है । दृश्य भाग का नाम हीं अदिति है, एवं अदृश्य भाग ही दिति हैं । इस अवस्था में रात्रि में भी अदिति की सत्ता सिद्ध होजाती है । सूर्य्यमूला अदिति का ग्रह: से ही सम्बन्ध था । किन्तु इसका रात्रि से भी सम्बन्ध है । क्योंकि रात्रि में भी दृश्यभाव का सम्बन्ध वैसा ही रहता है, जैसाकि दिन में | सूर्य्यमूला अदिति १२ हों आदित्यों के साथ सूर्य्य से युक्त रहती है । परन्तु यह दृश्यकपालरूपा भूपिण्डात्मिका अदिति अपने आठ पुत्रों के साथ ही सूर्य्य से युक्त होने में समर्थ होती है । कारण इसका यही है कि, पृथिवी घूमती हुई आगे चलती है । सूर्य्य द्वादश श्रादित्य - प्राणघन है । यह १२ हों आदित्य अदिति के पुत्र हैं । पूर्व क्षितिज पर जिस समय सूर्य ता है, वहाँ से पश्चिम क्षितिज पर्य्यन्त ७ आदित्य प्राण रहते हैं । ' पश्यन्ति सप्तमं सर्वे ' के अनुसार सामने का पश्चिम - क्षितिजवाला श्रादित्य सातवाँ पड़ता है । आठवाँ स्वयं सूर्य है । सौरकाल इन आठ से ही युक्त है । अतः दिन में पृथिवी इन सातों से ही सूर्य्यं के साथ युक्त होने में समर्थ होती है । इसी पृथिवीमूला अदिति ` के स्वरूप को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है—

अष्टौ पुत्रासो श्रदितेर्ये जातास्तन्वस्परि ।

देवा उपप्र्प्यत् सप्तभिः परा मार्ताण्डमास्यत् ॥

- ऋ ० १०/७२ | ८ |

सप्तभिः पुत्रैरदितिरुपप्रैत् पूर्व्यं युगम् ।

प्रजायै मृत्यवे त्वत् पुनर्मार्त्ताण्डमाभरत् ॥

- ऋक् ० १०।७२।६ । इति । पृथिवी का सम्पूर्ण वृत्त अदिति है । दिन भी अदिति है । रात्रि भी अदिति है । साथ ही सम्पूर्ण भूपिण्ड दिति भी है । दिन में आधा दृश्यभाग अदिति है, अदृश्य भाग दिति है । रात्रि में दिन का दृश्यभाग ४०६

पृष्ठ 669

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शतपथब्राह्मण दिति है । दृश्यभाग रात्रि में दृश्य बनता हुआ अदिति है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर ' इयं वै पृथिवी अदिति: ' - ' इयं ह्येव दितिः ' - यह कहा जाता है । सैषा -पृथिवी मूला - - अदितिः ३- नक्षत्रमूला- श्रदितिः---? --तीसरी है नक्षत्रमूला दिति । प्रकृत में यही तीसरी अदिति अभिप्रेत है, जैसाकि आगे जाकर स्पष्ट होजायगा । पृथिवी- परिभ्रमण - वृत्त जैसे ' क्रान्तिवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है, एवमेव चन्द्रपरिभ्रमणवृत्त ' दक्षवृत्त ' नाम से प्रसिद्ध है | दक्षवृत्त चन्द्रमा के सम्बन्ध से सोममय है । सौम्य प्राण हीं योषा है । योषा ही स्त्री है । यह स्त्रीरूप दक्षसोम उस दक्षरेखा पर प्रतिष्ठित है । दक्षवृत्त ही इस सोम का प्रभव है । अतएव इस सोम को दक्ष की कन्या मान लिया जाता है । सोम योषा होने से स्त्री है, अतएव इसे दक्ष की कन्या ही मानना उचित है । सूर्य, चन्द्र, अरिनेमि, धर्म्म, अङ्गिरा, कृशाश्वा, भार्गव, आदि आदि भिन्न भिन्न वृषाप्राणमय देवता इस योषाप्राणमय दक्षसोम का उपभोग करते हैं । सोमावच्छिन्ना एक ही दक्षकक्षा के भिन्न भिन्न देवताओं के उपभोग के कारण ६० विभाग होजाते हैं । चन्द्रमा * २७ नक्षत्रों के सम्बन्ध से दक्षवृत्त के २७ विभाग कर उनका उपभोग करने में समर्थ होता है | अतएव चन्द्रमा के सम्बन्ध से वह कन्यात्मक सोम २७ विभागों में विभक्त होजाता है । ये ही चन्द्रमा की २७ स्त्रियाँ हैं । वृद्धश्रवा इन्द्र ( इन्द्रोपलक्षित चित्रानक्षत्र ), विश्ववेदा पूषा ( रेवती ), तार्य नाम से प्रसिद्ध अरिष्टनेमि ( तार्योपलक्षित श्रवण नक्षत्र ), बृहस्पति ( लुब्धकबन्धु नक्षत्र ), इन चार खस्वातेकों के सम्बन्ध से इस दक्षवृत्त के चार विभाग होजाते हैं । चारों ' अरिष्टनेमि ' हैं । कृशाश्वा के सम्बन्ध से सम्पूर्ण दक्षवृत्त के दो विभाग होते हैं । अङ्गिरा के सम्बन्ध से दो विभाग होते हैं । धर्म्म के सम्बन्ध से १० विभाग होते हैं । भार्गव के सम्बन्ध से २ विभाग होते हैं । एवं मलिम्लुच ( अधिकमास ) के सम्बन्ध से सौर सम्वत्सर के १३ विभाग होते हैं । इसीलिए सूर्य के सम्बन्ध से दक्षवृत्त के १३ विभाग होजाते हैं । सूर्य्य कश्यपरूप में परिणत होकर ही प्रजा का निर्माण करता है । सूर्य्य से निकल कर त्रैलोक्य में व्या'त होने वाला सौरप्राण ही ' कश्यप ' कहलाता है । सूर्य्यरश्मियाँ मरीचि नाम से प्रसिद्ध हैं । इन मरी— चियों में प्राणदानत् क्रिया से परस्पर घर्षण होता है । मरीचियाँ अग्निमयीं हैं । ' अग्नेराप: ' इस सिद्धान्त * —जिस समय इस विज्ञान का आविष्कार हुआ था, उस समय रोहिणीनक्षत्र पर वसन्त – सम्पात था । अतएव रोहिणीनक्षत्र २७ नक्षत्रों में श्रेष्ठ माना जाता था । यही कारण है कि, पुराण में जहाँ चन्द्रमा की २७ पत्नियों का निरूपण हुआ है, वहाँ रोहिणी को चन्द्रमा की प्रधान राज्ञी ( पटरानी ) बतलाया गया है । ४०७

पृष्ठ 670

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प्रथमकाण्ड के अनुसार इस ग्राग्नेय घर्षण से पानी उत्पन्न होजाता है । वही पानी आगे जाकर रुद्रवायु के सम्बन्ध से घन-भाव में परिणत होजाता है । जैसे अतिताप से, और ऊपर के वायुप्रवेश से दुग्ध के परमाणु घन होजाते हैं, दूसरे शब्दों में दुग्ध का द्रव भाग ( पानी ), और वायु, दोनों प्रतिमूर्च्छित होकर घन बन जाते हैं, एवमेव मरीचियों से उत्पन्न पानी, और वायु, दोनों प्रतिमूच्छित होकर घन बनाते हैं । यही घन पानी ' अपांशर ’ नाम से प्रसिद्ध है । जो अवस्था दुग्धशर ( दूध की थर मलाई ) की होती है, वही अवस्था अपांशर ( पानी की मलाई ) की है । यदि अग्निताप के वेग से दुग्ध के परमाणु और भी अधिक संहत - घनीभूत हो जाते हैं, तो आगे जाकर वह मलाई ' खो ' ( मावा ) के रूप में परिणत होकर पिण्डरूप में परिणत हो जाती है । यही अवस्था यहाँ होती है । एमूत्रवराह की कृपा से प्रापोमय समुद्र में परमाणुरूप से इतस्ततः त्रिखरे हुए पार्थिव परमाणुओं का संहनन होता है, संघात होता है । अवएव वे परमाणु आगे जाकर ‘ भूपिण्ड ’ रूप में परिणत होजाते हैं । पृथिवीपिण्ड यद्यपि मरोचि - पानी से बना है । परन्तु घनता अग्नि से ही आई है । अग्नि की रूक्षता ने हीं पानी को पिण्डरूप में परिणत किया है । वह अग्निमय प्राण अधिक चापन से ( दबाव से ) पृथिवीकेन्द्र से निकल कर बड़ी दूर पर्य्यन्त चारों ओर व्याप्त होजाता है । इस व्यापार से उस एक ही पार्थिव अग्नि कीधन, तरल, विरल, ये तीन अवस्थाएँ होजातीं हैं । घन अग्नि ' अग्नि ' है । यही पहिला पृथिवीलोक है । तरल अग्नि ' वायु ' है । यही दूसरा अन्तरिक्षलोक है । विरल अग्नि ' आदित्य ' है । यही तीसरा द्यु लोक है । इसप्रकार सृष्टिकामना से वह सूर्य्यप्रजापति अपने मरीचिभाग से पानी उत्पन्न कर त्रैलोक्य रूप में परिणत होजाता है । तीनों लोक मरीचि - पानी से उत्पन्न हुए हैं । इसी त्रैलोक्य - विज्ञान को लक्ष्य में रख कर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— ‘ स एष एव मृत्यु: -य एष तपति ' ( १० कां । तृ ० प्र ० । ब्रा ० ६ । कं ० २३ ) । अशनाया हि मृत्युः । तन्मनोऽकुरुत - आत्मन्त्री स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत् । तस्यार्चत आपोऽजायन्त । तद्यदपां शर आसीत् तत् - समहन्यत । सा पृथिव्यभवत् । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्त्तताग्निः । स त्रेधात्मानं व्यकुरुत | आदित्यं तृतीयं, वायुं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधा विहितः । - शत ६ १०१४ | ८ | १ - २ - ३ कं ० इति । मृत्युरूप सूर्य्यमरीचि से उत्पन्न त्रैलोक्य की आकृति ठीक कूर्म्म ( कछुए ) जैसी ही है । कूर्म्म का बुध्न ( पैंदा ) समधरातलभाव से युक्त है । ऊपर का भाग वतुल है । किसी निरावरण प्रान्त में खड़े होजाइए । * —संसार में जितने भी पिण्ड बनते हैं, वायु के सम्बन्ध से ही बनते हैं । एककालावच्छेदेन घनीभूत पर-माणुओं का संवरण कर उन पर व्याप्त होता हुआ, अतएव ' मातरिश्वा ' नाम से प्रसिद्ध होता हुआ यह वायु ' वृणुते इति वरः । ग्रह्नोतीति श्रहः । वरश्चासौ अश्व ' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ‘ वराह ' नाम धारण कर लेता है । इस वराहावतार का विशद निरूपण ईशोउपनिषत् भाषाभाष्य में देखना चाहिए | ४०८