Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 81–90

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 81–90

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शतपथ - प्रथमखण्ड ऋषिप्राणद्रष्टा, अतएव ऋषिप्राणात्मक मन्त्रब्राह्मएात्मक पूर्वोक्त शालाभेदभिन्न तत्त्ववेद ( वृ ० सं ० ७० ) के द्रष्टा मानवमहर्षियोंने अपनी दिग्देशकालातीता अबुद्धियोगात्मिका -- सत्त्वबुद्धियोगनिष्ठा से जिस शब्दात्मक -- वेदशास्त्र की आविर्भावात्मिका रचना ( निर्माण ) की, दूसरे शब्दों में मन्त्रदृष्टि के आधार पर जो मन्त्रकृति ऋषिप्रज्ञा से सहजरूपेणैव अभिव्यक्त हुई, पुरुषविध - तत्त्ववेद से भिन्न, अतएव अपु-रुधिवत् ही प्रमाणित, किन्तु मानव के बुद्धिपूर्वक प्रयासानुबन्ध से वस्तुगत्या पुरुषविध - पौरुयेय शब्दात्मक– वेदशास्त्र के भी मूल - तूल रूपेण ने ही दो विवर्त्त ' हुए, जो क्रमश: संहिता वेदात्मक मन्त्रवेद, तथा व्याख्यात्मक - ब्राह्मणवेद, नाम से प्रसिद्ध हुए । * तत्त्ववेदवत् मूलात्मक शब्दवेद की भी ऋक् - यजुः - साम-अथर्ग - नामक की चार संहिताएँ हुई । चारों के तत्त्ववेदवत् ही क्रमशः २१-१०१-१०००-६ शाखाविवर्त्त हुए । तथैवच तत्त्ववेद की तूलतत्त्ववेदचतुष्टयी के चारों तात्त्विक ब्राह्मणवेदों के अनुपात से ही शब्दात्मक-तूलवेद के भी चार ही विवर्त हुए, जो क्रमशः २१-१०१-१०००-६- भागों में विभक्त हुए । ब्राह्मणवेद के ही अवान्तर तीन विवर्त्त ' क्रमशः विधि आरण्यक - उपनिषत् - - नाम से प्रसिद्ध हुए । २१-१०१-१०००-६-संकलन से ११३१ ( ग्यारह सौ इकतीस ) तो मूलवेदात्मक संहितावेद हुआ । एवं प्रत्येक शाखानुपात से ११३१ ही विधिग्रन्थ, - इतने हीं आरण्यकग्रन्थ एवं इतने हीं उपनिषद्ग्रन्थ सम्पन्न हुए । सम्भूय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक शब्दात्मक - वेदग्रन्थों की संख्या ४५२४ ( चारहजार पान्सौ चौबीस ) - परिमाण से समन्वित हुई, और यही भारतराष्ट्र की अन्यतमा सांस्कृतिक निधि कहलाई । * यदि मानवीय पार्थिव - देशात्मक शरीर, चान्द्र - दिगात्मक मन, तथा सौरी कालात्मिका बुद्धि, इन तीनों प्राकृत भावों की समष्टि का नाम हीं ' पुरुष ' ( प्राकृतमनुष्य ) है, तत्र तो शब्दात्मक वेदशास्त्र सर्वथा ' अपौ-रुषेय ' इसलिए है कि, ऐसे प्राकृत - केवल शरीर --मनो- बुद्धि -- धर्म्मा मानव को न तो वेदतत्त्व का ही साक्षात्कार होसकता, नापि ऐसे प्राकृत पुरुष ( मनुष्य ) के अन्तःकरण में सहजरूप से तत्त्वानुग शब्द ही अभि-व्यक्त होसकते । यदि दिगात्मक मन, देशात्मक शरीर, तथा कालात्मिका बुद्धि से, अतएव दिग्देशकाल से अतीत श्रव्यपुरुषात्मा की स्वस्वरूपाभिव्यक्ति से मानव समन्वित है, तो इस की बुद्धि कालिक न रह कर कालातीत सनातन पुरुषतत्त्व की अनुगामिनी बन जाती है । ऐसी बुद्धि से युक्त श्रात्मपुरुषनिष्ठ मानव ही अप्राकृत - मानव हैं, यही ' ऋषिमानव ' की स्वरूप - परिभाषा है । ऐसा आत्मपुरुषरूप मानव ही वेदद्रष्टा है । : एवं यही श्रात्मानुगता सत्त्वबुध्दि से वेदशब्दों का संकलनकर्त्ता है । और इस आत्मपुरुषलक्षणा ' पुरुष-दृष्टि ' से अवश्य ही शब्दात्मक वेदशास्त्र को ' पौरुषेय ' कहा जासकता है, जिस इस दृष्टि से ही ' बुद्धिपूर्वा-वाक्यकृतिर्वेदे ' सिद्धान्त व्यवस्थित होसकता है । ७७

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आत्मनिवेन १- ऋग्वेद - शास्त्राग्रन्थाः २१- मूलवेदाः २ - ऋग्वेद - विधिग्रन्थाः २१ ] १ ऋगग्रन्थाः ८४ ३ - ऋग्वेद - आरण्यकग्रन्थाः २१ - तूल वेदाः ४- ऋग्वेद - उपनिषद्ग्रन्थाः २१. १ - यजुर्वेद - शास्त्राग्रन्थाः १०१ - मूलवेदा: २ -- यजुर्वेद -- विधिग्रन्थाः १०१ ] २ यजुर्ग्रन्थाः ४०४ ३ - यजुर्वेद -- आरण्यकग्रन्थाः १०१ - तूल वेदाः ४- यजुर्वेद -- उपनिषद्ग्रन्थाः १०१ १-- सामवेद -- शाखाग्रन्थाः १००० -मूलवेदाः २ -- सामवेद - विधिग्रन्थाः: १००० ] ३ | सामग्रन्थाः ४००० ३ - सामवेद - श्रारण्यकग्रन्थाः १००० तूलवेदा: ४ -- सामवेद - उपनिषद्यन्थाः १००० । १ - अथर्वशाखाग्रन्थाः ६ - मूलवेदाः २ -- अथर्वविधिग्रन्थाः ह ४ | ३- अथर्वारण्यक ग्रन्थाः - तूल वेदा: ४ -- अथर्वोपनिषद्ग्रन्थाः ७६ अथर्वग्रन्थाः ३६-मिताः संख्या ४५२४ सम्भूय वेदग्रन्थाः मन्त्रब्राह्मणात्मकाः-' - सांस्कृतिकनिधिः ' मूल - भारतराष्ट्रस्य सैषा

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शतपथ - प्रथमखण्ड शाकल- बाष्कल - आश्वलायन - शाङ खायन - माण्डूक - ऐतरेय - कौषीतकि शैशिरि - पैङ्गी - मुद्गल-गोकुल - वास्य -शिशिर - इत्यादि भेदभिन्न ८४ ऋग्वेद - ग्रन्थ, चरक आवरक कठ- कपिष्ठल - श्वेता-श्वतर - औपमन्त्रत्र - पाताण्डिनेय- मैत्रायणीय मानव - बाराह- दुन्दुभ - छागलेय - हारिद्रवीय - श्यामायनीय-ओखीय -- खाण्डिकीय- आपस्तम्बीय - बौधायनीय -- सत्याषाढीय- शाट्यायनीय - वारवन्तीय - औखीया-इत्यादि भेदभिन्न कृष्णयजुर्वेदग्रन्थ, तथा काण्वमाध्यन्दिनीय - जाबाल - बुधेय- शाफेय - तापनीय-कपोल - पौण्ड्वत्स - आत्रटिक - पाराशरीय - वैनेय वैधेय औधेय गालव आदि भेदभिन्न - शुक्लयजुर्वेद्ग्रन्थ, सम्भूय ४०४ यजुर्वेदग्रन्थ, राणायनीय- शाटयमुग्र - कपोल - लाङ्गलिक - शार्दूल कौथुम आदि भेदभिन्न ४००० सामवेद्ग्रन्थ, एवं पैप्पलाद - शौनकीय दामोद - तोत्तायन - जायल - ब्रह्मपलाश -कुनखी - देवदर्शी आदि भेदभिन्न ३६ अथर्ववेदग्रन्थ, सम्भूय ४५२४ वेदग्रग्थों की राशि भारतराष्ट्र की वैसी तत्त्वराशि है, जिसे एकहेलया विस्मृत कर हमने भारत के सांस्कृतिक गौरव को सर्वथा ही अन्तर्मुख बना लिया है दिग्देश -कालानुबन्धी काल्पनिक उपयोगिता - वाद के व्यामोहन में ग्रासक्त होकर । यही प्रारम्भ के प्रतिज्ञात उस मूल उद्बोधनसूत्र का संक्षिप्त चिरन्तन इतिवृत्त है, जिसके पुनः संस्मरण के साथ तन्मूलसूत्र की पावनगाथा अत्र उपरत होरही है— इस भावुतापूर्ण प्रश्न के उत्तर को स्वगर्भ में प्रतिष्ठित किए हुए ही कि- " श्राज के इस भौतिक युग में उस पुरायुगीय, श्रतएव जीर्ण - शीर्ण - वेद के अध्ययनाध्यापन का जनतन्त्र के उपयोगी वर्त्तमान जीवन में क्या उपयोग "? –. " ब्राह्मणेन निष्कारणमेव षडङ्गो वेदोऽध्येयः, ज्ञेयश्च - ( विशेषतः ) ” दिग्देशकालानुत्रन्धिनी - वैय्यक्तिकी, पारिवारिकी, सामाजिकी, तथा राष्ट्रीया यच्चयावत् भौतिक - उपयोगि-तात्रों से यथाशक्ति अपने आपको तटस्थ बनाए रहते हुए ही, एकमात्र उक्त आदेश के आधार पर ही, तात्कालिकी उपयोगिता – अनुपयोगिता जैसे वाग्विग्ला पन को दूरतः की प्रणम्य - मानते हुए हमने अपने ब्राह्मण-वर्णानुबन्ध से आरम्भ से अबतक मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदपुरुष को प्रतिच्छायामात्र का संस्पर्शमात्र ही प्रक्रान्त रक्खा है । सुप्रसिद्धा माध्यन्दिनीया - शाखा की शुक्लयजुर्वेदसंहिता के विधिभागात्मक माध्यन्दिन - शाखीय-' शतपथब्राह्मरण ' नामक ग्रन्थ तच्छाखीय ब्राह्मण वर्णानुबन्धन से प्रारम्भ से ही हमारा स्वाध्याय ग्रन्थ रहा है | उपलब्ध ब्राह्मणग्रन्थों में ' शतपथब्राह्मण ' का अनेक दृष्टियों से विशेष - गौरव माना जासकता है । शतपथ की भाषा वर्त्तमाना संस्कृतभाषा के अंशतः सन्निकट बनती हुई अन्य ब्राह्मणग्रन्थों के समतुलन में अंशतः बोध-गम्या है | इसके अतिरिक्त इस वेद के द्रष्टा, और कर्त्ता भगवान् याज्ञवल्क्य अपने समय के अद्भुत वेदविद्वान् हुए हैं, जैस'कि राजर्षि जनक के तत्त्वानुगत ' ब्रह्मोद्य ' - प्रसङ्गों से स्पष्ट है । महाभारतयुगीय जनक के सर्वमूर्द्धन्य पौरोहित्य - पद पर समासीन भगवान् याज्ञवल्क्य के तत्वावधान में वर्ष में अनेक बार भारतराष्ट्र के ज्ञानविज्ञान-निष्ठ तत्त्वज्ञ - विद्वान् समवेत हुआ करते थे, जिनमें से — होता श्रश्वल, जारत्कारव आर्त्तभाग, भुज्यु लाह्यायनि, कहोड़ कौषीतकेय, उषस्त चाक्रायण, गार्गी वाचक्नवी, उद्दालक आरुणि, विदग्ध शाकल्य आदि के नाम विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं । इन सब विद्वानों की ओर से याज्ञवल्क्य से तत्त्वानुगत रहस्यपूर्ण सम्प्रश्न होते थे, एवं याज्ञवल्क्य - आधिदैविक- आधिभौतिक - आध्यात्मिक - विज्ञान का समन्वय करते हु आधि-याज्ञिकी श्राचारनिष्ठा के माध्यम से उन सम्प्रश्नों का ज्ञान - विज्ञान सम्मत समाधान कर सर्वान्त में अपनी * जनक व्यक्तिविशेष का नाम नहीं है । अपितु उपाधि नाम है । अनेक ननक हुए हैं । ७६

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श्रात्मनिवेदन • ओर से कुछ एक वैसे जटिल प्रश्न उपस्थित कर देते थे तत्र समवेत विद्वानों के सम्मुख, जिनका कोई भी उत्तर नहीं देसकता था । अतएव जो प्रश्न- ' असमावेय प्रश्न ' नामों से प्रसिद्ध हुए हैं, जिनका समाधान • स्वयं याज्ञवल्क्यने हीं किया है, और यों तथाकथित ' ब्रह्मोद्य ' ( तत्त्वचर्चाप्रसङ्ग ) में याज्ञवल्क्य ही सर्वात्मना तद्युग के सर्वश्रेष्ठ तत्त्वज्ञ, तथा आचारनिष्ठ उद्घोषित हुए हैं । अपने युग के दुर्द्धर्षं वेदविज्ञाननिष्ठ भगवान् याज्ञवल्क्य के तत्त्वावधान में आप के मेधावी शिष्य सर्वश्री श्रद्ध ेय मधुश्रवा के द्वारा वाङमय काय से उपनिबद्ध प्रस्तुत ' शतपथब्राह्मण ' के सम्बन्ध में असंदिग्धरूप से वही कहा जासकता है, जो कि ' महाभारत ' के लिए कहा गया है । महाभारत के लिए प्रसिद्ध है कि— ‘ यदि हास्ति तदन्यत्र, यन्न ेहास्ति न कुत्रचित् । अर्थात् “ जिन तत्त्वों का धर्म्म, अर्थ, काम, मोक्ष नामक पुरुषार्थों के सम्बन्ध में महाभारत में संक्षेप से, एवं विस्तार से निरूपण हुआ है, वे ही तत्त्व अन्य ग्रन्थों में उपवर्णित हैं । और जो महाभारत में नहीं है, वह अन्यत्र भी नहीं है ” । महाभारत का यह कथन किंमूलक है?, प्रश्न का चिन्तन करने पर हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, भगवान् बादरायण के तत्त्वावधान में उपनिबद्ध महाभारत का ज्ञान - विज्ञानात्मक समस्त -- तत्त्ववाद वेदशास्त्र के इस तत्कालीन ' शतपथब्राह्मण ' का भाष्यमात्र ही है । महाभारत के व्याज से पुराणपुरुष ने मानो सर्वसंग्रहात्मक इस ब्राह्मणग्रन्थ शतपथ के तत्त्ववाद का स्वरूपोपट हरण करते हुए अपनी - ' इतिहास-पुराणाभ्यां वेदं समुपबृ ंहयेत् ' इस प्रतिज्ञा का अक्षर: निर्वाह किया है । सम्भवतः क्यों, इसी ग्राधार पर पुराणपुरुषने शतपथब्राह्मण के कर्त्ता भगवान् याज्ञवल्क्य का जनक, और याज्ञवल्क्य के संवादरूप से बड़े गौरव से स्मरण भी किया है, जैसाकि निम्न लिखित वचनों से स्पष्ट प्रमाणित है—

याज्ञवल्क्य- उवाच- - शीतीभूतं च मां दृष्ट्वा भगवानाह भास्करः ।

प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः सोत्तरो द्विज ॥

कृत्स्नं शतपथं चैव प्ररणेभ्यति द्विजर्षभ ।

तस्यान्ते चापुनर्भावे शुद्धिस्तव भविष्यति ॥

ततः शतपथं कृत्नं सहरस्यं ससंग्रहम् ।

चक्रे सपरिशेषं च हर्षेण परमेण ह ॥

-म ० शान्ति ० मो ० ३१८ वाँ अध्याय मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के निष्कारण अध्ययन, और विजानन के साथ साथ ऋषिने जिस ‘ षडङ्ग ' की ओर सङ्केत किया है, दुर्भाग्यवश उस षडङ्गशास्त्र का भी अध्ययन मनन अनेक शताब्दियों से विद्वत्प्रज्ञा से पराःपरावत ही प्रमाणित होचुका है । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, निरुक्त ज्यौतिष, सुप्र

-धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ! ।

दिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ॥

म ० स्वर्गा ० प ० ५ ० ५० श्लो ०

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शतपथ - प्रथमखण्ड सिद्ध इन वेदाङ्गशास्त्रों में शिक्षाशास्त्र की छन्दोभ्यस्ता नाम की वैदिकी जिस ' पथ्यास्वस्ति ' ( वैदिकवर्णमात्रिका ) में २८८ वर्ण हों, उस सर्वाङ्गसम्पूर्ण वैदिकी- वर्णमात्रिका की तुलना विश्व की कौनसी भाषा कर सकती है? | स्नेहनधर्म्मा - संकोचधर्म्मा - सोम, तथा तेजोधर्म्मा - विकास - धर्म्मा अग्नि के सम्बन्धतारतम्य से जिसप्रकार एक ही ब्रह्माक्षर नामक तत्त्व वर्णात्मक क्षर से समन्वित होता हुआ सम्पूर्ण विश्व - पदार्थों के स्वरूप में परिणत होरहा है, तथैव इसी ब्रह्माक्षर से समतुलित एक ही ' अकार ' नामक क्षर स्पशत्मिक संकोचधर्म्मा सौम्यभाव के, तथ्था ऊष्मात्मक - विकासधर्म्मा आग्नेयभाव के सम्बन्ध - तारतम्य से क्षरस्थानीय व्यञ्जन से समन्वित होता हुआ २८८ वर्णभावों में परिणत होरहा है । इसी शब्दाक्षरवर्ण - विस्तार का नाम है - ' पध्यास्वस्ति ', यही है वैदिक - वर्णमात्रिका, जिसका वेदशास्त्र में प्रवेश करने से पहिले ही स्वाध्याय कर लेना आवश्यक मान लिया है ऋषिने । ‘ सिद्धो वर्णः समाम्नायः ' * से अनुप्राणित वर्णसमाम्नाय - शिक्षणात्मक ' प्रातिशाख्यशास्त्र ' ही हमारा पहिला वह ' शिक्षा ' नामक अङ्गशास्त्र है, जिसका संस्मरण भी विलुप्तप्राय है । यही अवस्था इतर श्रृङ्गशास्त्रों की है, जिन का विस्तारभिया श्रत्र दिग्दर्शन सम्भव नहीं है । शिक्षावत् वेदविहित - कर्मेतिकर्त्तव्यताओं का क्रमबद्ध संकलन करने वाला आश्वलायन - गोभिलीय-कातीय - यादि भेदभिन्न कल्पशास्त्र भी पठन - पाठन - प्रणाली से उच्छिन्न - प्राय है । शब्दार्थव्युत्पत्तिप्रकार - सम-न्वयात्मक व्याकरणशास्त्र नामक तीसरे अङ्ग का यद्यपि यत्र तत्र नाम अवश्य सुना जारहा है | किन्तु व्या-करणशास्त्र का प्रयोज्य व्युत्पत्तिवाद, तदनुगत शब्दविज्ञान तो सर्वथा ही विदूर प्रमाणित हो चुका है । यावज्जीवन विचार सबार घोष - अघोष - अल्पप्राण - महाप्राणादि प्रयत्नों को कण्ठस्थ करते रहने वाले व्याकरणधुरीण मी विवार -संवार घोष आदि तथ्यों के आचारात्मक - व्यावहारिक स्वरूप से वञ्चित ही प्रमाणित होरहे हैं । सर्वो-परि व्याकरणशास्त्रानुबन्धी आर्पग्रन्थों की ( तत्त्वव्याख्यारूप महाभाष्यादि ग्रन्थों की ) उपेक्षा, एवं तत्स्थाने च विगत - कतिपय - शताब्दियों में शास्त्रार्थमात्रभक्त विद्वानों के द्वारा उपनिबद्ध शब्दजालात्मक अभिनव ग्रन्थों का ही व्याकरणशास्त्र के नाम से यत्र तत्र प्रचार - प्रसार सुना जारहा है । सो भी ग्राज तो शिथिलप्राय ही है | छन्दःशास्त्र की भी नामगाथा ही शेष है । निरुक्त शास्त्र के बृहद्देवतादि सर्वमूर्द्धन्य ग्रन्थ भी अन्तम्मुख हैं । शेषभूत ' यास्क निरुक्त ' भी केवल पूजन - श्राराधन पर ही परिसमाप्त है । वेदाङ्गज्यौतिप भी सर्वात्मना चिस्मृत - प्राय है । और एक वाक्य में यह कहा जासकता है कि, वेदार्थोपयोगी शिक्षा - कल्पादि ६ श्रीं ह्रीं अङ्ग-शास्त्र हमारे अध्ययनाध्यापन -क्रम से पराङमुख प्रमाणित होचुके हैं, एवं तत्स्थान में प्रधान बन गए हैं— नव्यन्याय, साहित्य - काव्यादि । - अकारो नै सर्वा वाक्, सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना वही नानारूपा भवति । ' स्पर्शः ' | - सोमः, ऊष्मा - अग्निः - ऐतरेय आरण्यके * हमारे सांस्कृतिक अध: पतन का प्रज्ज्वलन्त उदाहरण - उक्त सूत्र का आजकल की चटशा-लानों में जोशियों के द्वारा उद्घोषित कराए जाने वाले - ' सीधो वरणा समा- मुनाया ' जैसे विकृत रूप का प्रचार | ८१

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श्रात्मनिवेदन षड़ङ्गों के अतिरिक्त चार ' उपाङ्गशास्त्र ' भी अनिवार्य माने हैं ऋषि ने वेदार्थ -- समुन्वय सम्बन्ध में, जो कि क्क्रमशः धर्म्मशास्त्र, ( स्मृतिशास्त्र ), पुराणशास्त्र ( इतिहाससमन्त्रित पुराण ), मीमांसा, न्यायविस्तर, नामों से प्रसिद्ध हैं । इन चारों में आदि के दो उपाङ्गशास्त्र तो सर्वथा ही उपेक्षित-प्राय हैं | शेष दोनों भी क्लाचिक्त हैं । तदिथं अङ्ग, तथा उपाङ्ग, दोनों शास्त्रधिवत्त से सर्वथैव पराङ मुख होजाने से ' वेदशास्त्र ' आज भारतीय विद्वानों के लिए भी एक ' समस्या ' ही प्रमाणित होगया है । उधर प्रती-च्य — साहस के पथानुगामी अभिनव भारतीय विद्वान् अङ्गोपाङ्गों से सर्वथा अपरिचित रहते हुए प्रतीच्यपद्धति-वत् अपने बुद्धिवादात्मक = व्यामोहन से ' वेदशास्त्र ' जैसे तत्त्वपूर्ण शास्त्र के सम्बन्ध में - ' बिभेत्यल्पश्रुताद्वेदो मामयं प्रहरिष्यति ' को ही अक्षरशः चरितार्थ करते जा रहे हैं । विदेशिय ने अपनी मान्यता के अनुसार जैसा जो कुछ लिख दिया है, वही आज के वेदभक्त - भारतीयों का उपास्य बन रहा है, जिसके सम्बन्ध में एक उदा-हरण त्र उद्धत कर देना अप्रासङ्गिक न होगा । सुप्रसिद्ध ऐतरेयब्राह्मण का आरम्भ का एक वचन है कि- ' अग्निर्वै देवानामवमः, विष्णुः परमः | तदन्तरेण सर्वा अन्या देवता: ' । अक्षरार्थ है- ' अग्नि देवताओं में निश्चयेन नीचा स्थान रखते हैं, एवं विष्णु अन्तिम स्थान रखते हैं । अन्य सब देवता दोनों के मध्य में हैं ' । प्रतीच्य विद्वानोंनें समः न्वय किया है कि— “ आर्य्यलोग आरम्भ में अग्निपूजक ही थे । अतएव आरम्भदृशा में अग्नि-( भूताग्नि- जो चकमक पत्थरों से आर्य उत्पन्न करते थे, और प्रत्यन्तदृष्ट सूर्य्य का भौतिक ताप ) ही इनके लिए प्रमुख - ज्येष्ठ - प्रधान देवता बना हुआ था । आगे चलकर शनैः शनैः विकासानुपात से इह्न अन्य देवताओं का बोध होने लगा । जब विष्णु नामक देवता का बोध हुआ, तो आरम्भ का अग्निदेवता नीची श्रेणि का देवता माना जाने लगा, और विष्णु सबसे प्रमुख देवता बन गया, एवं शेष देवता दोनों की मध्यश्रेणि के अधिकारी बने " इत्यादि इत्यादि । इसी वेदार्थाभ्रिमान का हमारे तथाकथित अभिनव वेद्भक्त भारतीय विद्वान् अहर्निश यशोगान करते रहते हैं । कुछ ही समय पूर्व हमें एक वैसे सूजन मिले थे, जिन्होंनें विदेशों की किसी युनिवर्सिटी में अमुक वर्ष प्राणपण से प्रयास कर वहाँ के वेद--निष्णात विद्वानों के तत्वावधान में ' ऐतरेय ब्राह्मरण ' के स्वाध्याय - निबन्ध पर ही वर्त्तमानयुग की सुप्रसिद्धा ' डाक्टरेटू ' उपाधि प्राप्त की है । आप से जब हमने ऐतरेय के उक्त प्राथमिक = वचनार्थ के सम्बन्ध में जिज्ञासा की, तो सम्भवत: हमें पात्र समझ कर ही आपने अपना वहाँ का मन्तव्य व्यक्त करना उचित नहीं समझा । वस्तुस्थिति के विश्लेषण का अवसर नहीं है । एतावन्मात्र ही निवेदन कर दिया जाता है इस सम्बन्ध में कि, भूपिण्ड से संलग्ना मण्डलासिका प्राणमयी पृथिवी का प्रतिष्ठावा मारणदेवता- ' यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी ' इस मन्त्र ति के अनुसार- ' अग्नि ' माना गया है, जो प्रत्यक्ष दृष्ट भूताग्नि से सर्वथा पृथक तत्त्व है । इस प्राणाग्नि की ही ध्रुव - ध - धरुण - रूपेण तीन व्यवस्थाएँ होजाती हैं, जो क्रमशः अग्नि - वायु आदित्य नाम से प्रसिद्ध हैं । लीनों प्राणाग्नि क्रमशः अष्टाक्षरा गायत्री, एकादशा-क्षरा त्रिष्टुप, द्वादशाक्षरा जगती - इन तीन वाक्छन्दों से छन्दित होते हुए क्रमशः ८-११-१२ इन अवा-न्तर अवस्थाओं में परिणत होजाते हैं, जो क्रमशः ८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, नामों से प्रसिद्ध हैं! दो प्राण इन तीनों के सान्ध्यप्राण हैं. जो कि नासत्य, दुख- नामक ' अश्विनीकुमार ' नाम से प्रसिद्ध हैं । इसप्रकार एक ही पार्थिव - प्राणाग्नि के अवान्तर ३३ विभाग होजाते हैं, जो कि " इति स्तुतासो असथा रिषा-८२

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शतपथ - प्रथमखण्ड दसो -- येस्थं त्रयश्च त्रिंशञ्च मनोर्देवा यज्ञियासः " इत्यादि मन्त्रानुसार तैतीस - ' यज्ञिदेवता ' कहलाए हैं । ‘ त्रयस्त्रिंशद्वै देवाः ' से इह्रीं का सङ्केत हुआ है । क्योंकि वे सभी पार्थिव देवतां अग्निमूलक, हैं जैसेकि सौरदेवता इन्द्रमूलक हैं । अतएवं इन पार्थिव देवर्ताओं की ' अग्नि ' से ही परिग्रहणे होजाता हैं । इसी आधार ' पर ‘ अग्निः संर्वा देवता: ' - ' अग्निपुरोगां सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ' इत्यादि प्रसिद्ध है | उक्तं ३३ दैवताओं में आरम्भ के ग्रांट वसुदेवताओं में उपक्रम - स्थानीय प्रथम ( पहिले ) अग्नि का नाम ' अग्नि ' हैं, एवं ग्रन्त के १२ श्रादित्यदेवताओं में सर्वान्ति का बारहवाँ आदित्य ' विष्णु ' नाम से प्रसिद्ध हैं * | शेष ३१ पार्थिवदेवतां दोनों के अन्तराल रूप मध्यस्थान में प्रतिष्ठित हैं । याँ ३३ में उपक्रम - स्थानीयं अग्नि अवम, उपसंहार - स्थानीय विष्णु परम एवं अन्य मध्यस्थं बने हुए हैं, जिसें इस सहज - प्राणदेव-स्थिति कां ही महर्षि ऐतरेयने स्पष्टीकरण किया है पूर्ववचन से । यज्ञारम्भ में- दीक्षणीयेषि ' नामक कर्म होता हैं, जिसका अर्थ हैं यज्ञकर्म से पूर्व यज्ञ के साक्षीभूत ३३ यज्ञिय देवप्राणों का अपने अन्तर्जगत् में धान करें लेना । उपक्रमात्मक श्रवमं अग्नि, तथा उपसंहारात्मक परमं विष्णु, इन दोनों आद्यन्त के यज्ञिय -- देवताओं के ग्रहण से तैतीसों देवतां परिगृहीत हैं । अतएव दीक्षणीयेष्टि में इन दोनों का ही प्रमुख रूपेण यजन करं लियां जातां हैं । अतएव यह इष्टि - ' ऑग्मावैष्णवेष्टि ' कहलाई है । और यही श्रुति के अग्न्यनुबन्धी ' अवम ' शब्दका; एवं विष्ण्वनुत्रन्धी ' परम ' शब्द का प्रकृतिसिद्धं तात्त्विक समन्वय है, जिसे वैदिक - पारिभाषिक तथ्यं से अर्सेस्पृष्टे रहने वालें प्रतीच्य - विद्वानोंने अपनी कल्पना से, दिग्देशकालानुबन्धी बुद्धिवाद से अन्यथा ही प्रमाणित कर दिया है, और वही अन्यथाभवि तदुच्छिष्टभोगी अभिनव भारतीय - वेदभंक्तों की ज्ञानबुभुक्षां उपशन्ति कर रहा है, इति नुं अनंण्यमेव । प्रतीच्य - त्रिंद्वानों की पुण्यंगांथा = ' पराधिकार चर्चा सर्वथा न कर्तव्या ' न्याय से छोड़ते हैं | हम भारत के अपने प्राच्य विद्वानों की ही दिशा का जंत्र इस दशां में अन्वेषण करने चलते हैं, तो हमें सहंसा स्तब्धं ही रह जाना पड़ता है । वेदशास्त्र की रहस्यपूर्णा परिभाषाओं का उस प्रकृतिसिद्धं नित्य - तत्त्ववेद से ही सम्बन्धं है, जिस तत्त्ववेद से विगतं शताब्दियों में हमारे एतद्देशीय वेद्भाष्यकार भी तटस्थ ही बने हुए हैं । अतएवं उनके भाष्य यज्ञेतिकर्त्तव्यतारूप- कर्मकाण्ड के समन्वय की दृष्टि से जहाँ महान् उपकारकं हैं, वहाँ तत्त्वसम-न्वय - दृष्ट्या, तदनुंगत मन्त्रं -- ब्राह्मण - वचनों की अर्थसमन्वयदृष्ट्या सर्वथा ही वे भाष्य असमर्थ ही प्रमाणित हुए हैं, जैसाकि प्रत्येक प्रज्ञाशील संस्कृतज्ञ तद्भाष्यांक्षरों के अवलोकनमात्र से ही जान सकता है । स्वयं प्रस्तुतं ' शतपथभाष्य ही इसे तथ्य के लिए पर्याप्त मान लिया जायेगा | अंतएवं यंत्र स्वतन्त्रोदाहरण अनपेक्षित है । क्यों ऐसा होपड़ा?, प्रश्न अनतिप्रश्नांत्मक प्रश्न है, जिसका समाधान असम्भव है । कैसे ऐसा होपड़ा?, प्रश्न का समाधान है - ज्ञानविज्ञानात्मिका परिभाषाओं की विलुप्ति, किंवा श्रन्तम्मु खिता । कैसे ये परिभाषाएँ * - इन्द्रो --रे 3 ४ I -- धाता - भगः -- पूषा -- मित्रोऽथ - वरुणो ऽर्य्यमा । 19 १२ शु - विवस्वान्त्वष्टा च - सविता - विष्णु-- रेव च ॥ == इत्येते द्वादशादित्याः ५३

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श्रात्मनिवेदन अन्तम्मुख बन गई ं?, इस महान् प्रश्न का उत्तर है वेदशास्त्र के ही ' तस्माद्ब्राह्मणोऽराजन्यः स्वात् ’ ( शत ०४ | १ | ४ | ६ । ) इस आदेश की उपेक्षा, जिस इस आदेश के तात्त्विक - समन्वय के लिए ही हमें सहस्र--पृष्ठात्मक दो स्वतन्त्र निबन्ध उपनिबद्ध करने पड़े हैं । स्वदर्शन की निरतिशयरूपेण प्रतिबन्धिका दिग्देश-कालानुबन्धिनी परदर्शनमूला भावुकता ही वह महान् दोष है, जिसके कारण भारतराष्ट्र की सांस्कृतिक प्रज्ञा, विशे-षतः संस्कृति - साहित्यादि - की चिन्तनशीला ब्राह्मणप्रज्ञा राजन्यसत्ता - सापेक्षता, सम्पत्तिशाली - वर्गसापेक्षता, दिग्देशकालिक - प्रावाहिक - मतवादसापेक्षता, आदि आदि परःशत सापेक्षताओं के आकर्षण से स्वदर्शननिष्ठा से वचत ही होती आरही है विगत तीन सहस्र वर्षों से । विविध सापेक्षतामूला तथाकथिता इस भावुकता से ही ' समझने ' के स्थान में इसकी बुद्धि - ' समझाने के लिए ' ही विशेषरूपेण श्राकुल- व्याकुल बनसी आरही है तथोक्ता अवधि में । अतएव समझने वाले दिग्देशकाल - प्रावाहिक - भावुक - मानवों के अनुरञ्जन के प्राधान्य से ही इस भावुक व्याख्याता को अपनी व्याख्याओं में प्रवृत्त होजाना पड़ा, जिस के जैसे, एवं नो भी परिणाम हुए, आज राष्ट्र के सम्मुख विद्यमान हैं । ' समझा देने ' की आतुरताने हीं भारतीय सांस्कृतिक - प्रज्ञा को ' समझने ' के क्षेत्र से पृथक् कर दिया । फलतः ‘ समझ ’ से सम्बन्ध रखने वाला स्वयं मूलशास्त्र, तत्सहयोगी पूर्वोक्त अङ्ग - उपाङ्ग - शास्त्र तो बन गए उपेक्षणीय, एवं ' समझानेवाले ' भाष्य-- टीका - व्याख्या -- प्रन्थादि, और आज तो मौखिक तात्कालिक-' व्याख्यान ' ही बन गए प्रधान | व्याख्यानानुगत -- प्रचार -- व्यामोहन, समझाने की आतुरता से अनुप्राणित व्याख्याग्रन्थ, इसी व्यामोहन से अनुप्राणित श्राज की लेख - मालाओं का प्रकाशन - - व्यामोहन, इत्यादि इत्यादि ज्ञात - अज्ञात, लोकैषणा - वित्तैषणात्मक - भावुकतापूर्ण महान् व्यामोहनों की परम्पराने हीं हमें स्वदर्शनात्मक पारिभाषिक -- स्वाध्यायचिन्तन से, तदाधारभूत मूलशास्त्रों के आराधन से सर्वथा ही पराङमुख कर दिया । हमारी निष्ठा है कि, यदि आज भी परदर्शनमूला - भावुकता का संवरण करते हुए, भावुकतापूर्ण व्याख्याग्रन्थों को प्रणम्य मानते हुए सर्वथा ऋजुभाव से यदि हम मूलशास्त्र की आराधना में प्रवृत्त होजायँ, तो--‘ उतो - त्त्वस्मै तन्वं विसत्र े जायेव पत्ये उशती सुवासा ' के अनुसार स्वयं मूलशास्त्र ही अपने श्रङ्गोपाङ्ग-शास्त्रों के समन्वय से उस पारिभाषिक - रहस्य का स्पष्टीकरण कर सकता है, जिसके बिना राष्ट्र की यह मूलनिधि सर्वथा उपेक्षणीया ही बन रही है । मन्त्रवेद, और ब्राह्मणवेद, दोनों में से ब्राह्मणवेद के अन्तिम भाग ( उपनिषद्भाग ) का ही विशेष रूपेण समादर हुआ है विगत - शताब्दियों के वेदान्तभावुक - विद्वानों के द्वारा । श्रतएव तत्सम्बन्ध में भी किञ्चिदिव ग्रात्मनिवेदन आवश्यक होजाता है । आधिदैविक - सृष्टिसर्ग की ज्ञानगभिता विज्ञानात्मिका व्याख्या का नाम जहाँ ' विधि ' नामक वेद का ' ब्राह्मण ' भाग है, वहाँ विज्ञानगर्भिता ज्ञानात्मिका व्याख्या का हीं नाम आरण्यक -- समन्वित - ' उपनिषत् ' भाग है । दोनों, किंवा तीनों ( विधि - आरण्यक - उपनिषत् - तीनों ) एक दूसरे के पूरक हैं | तीनों मिलकर एक ' ब्राह्मणवेद ' है । अतएव तीनों में से किसी भी एक को पृथक कर देने पर एक का भी स्वतन्त्ररूपेण तत्त्वसमन्वय कदापि सम्भव नहीं है । यही कारण है कि - शतपथब्राह्मण * - ‘ “ सत्तानिरपेक्ष ‘ संस्कृति ' शब्द, तथा सत्तासापेक्ष ' सभ्यता ' शब्द का चिरन्तनेइतिवृत्त, एवं भारतीय - सांस्कृतिक -- आयोजनों की रूपरेखा " नामक सहस्र - पृष्ठात्मक निबन्ध, एयं - ' दिग्देशकालस्व-रूपमीमांसा ' नामक सहस्र -- पृष्ठात्मक निबन्ध । ८४

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शतपथ - प्रथमखण्ड का अन्तिम ( चौदहवाँ ) काण्ड - ' बृहदारण्यकोपनिषत् रूप से सर्वथा अभिन्न ही प्रमाणित होरहा है । तथैव ग्रैौपनिषद - वचनों का भी समन्वय तत्रतक सर्वथा असम्भव है, जबतक कि तद्गर्भित आधिदैविक - सृष्टिविज्ञानात्मक-यज्ञविज्ञान का समन्वय नहीं कर लिया जाता । तत्सम्बन्ध में एक उदाहरण का समन्त्रयानुग्रह कीजिए । पार्थिव - भोक्तात्मा का प्रमुखरूपेण स्वरूप - विश्लेषण करने वाली कठोपनिषत् का वह प्रसङ्ग सम्मुख रखिए, जिसमें जिज्ञासु नचिकेता यमराज से ' स्वर्ग्याग्नि ' के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं इस रूप से कि— “ स त्वमग्नि स्वर्ग्यमध्येपि मृत्युो! प्रत्र हि तं श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते, एतत् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ " “ हे यमराज! हे मृत्युदेवता! जिस स्वर्ग्य - अग्नि में आप विराजमान हैं, अनुग्रह कर तत्प्रति अनन्य श्रद्धा रखने वाले मुझ नचिकेता के लिए आप उस स्वर्ग्याग्नि का स्वरूप व्यक्त करें, जिसे जान कर तदुपासक अमृतभाव उपलब्ध कर लेते हैं । अपने दूसरे वर से मैं आप से यही माँग रहा हूँ ", इस प्रश्न का यमराज ने दो मन्त्रों से जो भी समाधान किया है *, तदुपनिषद-क्षरमात्र से तत्रतक उस समाधान का समन्वय सर्वथा असम्भव है, जबतक कि चित्य -- चितेनिधेय - सम्वत्सराग्नि-मूलक — लोकम्पृणा - इष्टकाचि तिरूप ( - स'न्तदशस्तोमात्मक पार्थिव - स्वर्ग्याग्नि से अनुप्राणित ब्राह्मणग्रन्थान्तर्गत अग्निचयनयज्ञ का स्वरूपत्रोध नहीं प्राप्त कर लिया जाता । स्वयं उपनिषच्छ्र ुति का ' या इष्टका यावतीर्वा यथावा ' यह वाक्यांश ही स्पष्टरूपेण यह प्रमाणित कर रहा है कि, " इस स्वग्र्याग्नि का स्वरूप ब्राह्मणग्रन्थ के इ I काचितिरूप चयनयज्ञ से ही गतार्थ है । अतएव वह वहीं से जानना चाहिए ' । विधिभागात्मक ब्राह्मणभाग से आरण्यकोपनिषद्भाग का पार्थक्य कर केवल उपनिषद्भाग के आधार पर ही भारतीय तत्त्ववाद की, सांस्कृतिक - निधि की परिसमाप्ति मान बैठने वाले वेदान्तव्याख्याता ( उपनिषद्-` व्याख्याता ) भारतीय श्राचाय्यने ब्राह्मणग्रन्थानुगत उस आधिदैविक- आचारात्मक - सृष्टिसौन्दर्य को सर्वथा ही अभिभूत कर दिया है अपनी काल्पनिकी जगन्मिथ्यात्त्वमूला ज्ञानप्रधाना अद्वैतभावुकता से, जिस इस दार्शनिकी - श्रौपनिषद्भावना से ही भारत को अभ्युदय ( ऐहलौकिक - सुख - समृद्धि ), तथा पारलौकिक निःश्र ेयस् ( आत्मशान्ति, एवं तन्मूला भवपाशबन्धन विमुक्ति ), दोनों से ही वञ्चित रह जाना पड़ा है । उप--निषन्मात्रप्रेमी विद्वानों की श्रद्वतब्रह्मव्याख्याओं की भाष्य - व्याख्यानुगता प्रतिभा मूलसंहिता, तथा तद्द्व्याख्यारूप ब्राह्मणभाग के प्रति कैसे तटस्थ बनी रह गई?, यह एक वैसा प्रतिप्रश्नात्मक प्रश्न है, जिसका तथाकथित श्रद्वैत-वादियों के प्रज्ञाकोश में इसलिए कोई भी समाधान नहीं है कि, उनका तथ्थजगत् की अपेक्षा कल्पनाप्रसूता,

* प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्नि नचिकेतः प्रजानन् ।

अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥१ ॥

लोकादिमग्नि तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।

स चापि तत् प्रत्यवद् यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनेरेव तुष्टः ॥ २ ॥

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आत्मनिवेदन मतवादमूला, मान्यता से हीं प्रधान सम्बन्ध प्रान्त रहा हैं । और यों संहितावेद, तथा ब्राह्मणवेद के ज्ञानगर्भित विज्ञानतत्त्व से तटस्थ बने रह जाने वालें उपनिषत् मात्रं व्याख्यातां द्वैताभिनिविष्ट श्राचाय्यों के द्वारा उपनिषदों कीं भी ज्ञानगर्भिता विज्ञानविद्याओं का संस्पर्श नहीं हो सका हैं । फलस्वरूप विज्ञानसिद्धा रहस्य-पूर्णा परमविद्या- प्रवग्यविद्या- उद्गीथविद्या - मधुविद्या- परयङ्कविद्या स्वग्यग्निविंद्यां - सांमविद्या-चाक्षुष पुरुषविद्या - श्यैतनौध सविद्या - परिप्लवविद्या -- अभिप्लवविद्या अश्वत्थविद्या --- सम्वत्सरंविद्यां सुपर्णविद्या - आत्मगतिविद्या - पञ्चाग्निर्विद्यां - त्रिवृत्करणविद्या- उक्थब्रह्मसाम विद्या अव्यक्तर्ब्रह्मविद्या-महद्ब्रह्मविद्या - विज्ञानब्रह्मविद्यां प्रज्ञानब्रह्मविद्या- भूत ब्रह्मविद्या - पुरुषविद्या - पञ्च - पर्वा प्रकृतिविद्या--ब्रह्मौद्नविद्य -- षडङ्गवैश्वानरे विद्या-- इरामयपुरुषविद्या - हिरण्मयपुरुषविद्यां आदि आदि पर: शांताधिक आधिदैविकी सर्गानुंगंता विभक्ता औपनिषद्विद्याओं का भी संस्पर्श- सम्भव नहीं बन सकां है तद्द्व्याख्याताओं से । अपितु अपने काल्पनिक ब्रह्माद्वतप्रवाह में सम्पूर्ण विभक्त विज्ञानवाद अभिभूत हीं होंगयां है इन उपनिषद्भक्तों के द्वारा । क्यों?, और कैसे? । ब्राह्मणभाग के आख्यानोपख्यानात्मक प्राधिदैविक क- -२ सृष्टिविज्ञान की वैज्ञानिक -- परिभाषाओं से तटस्थ बनां रह जाना हीं, इस क्यों और कैसे? का उत्तर्र हैं । सम्भवतः इसी प्रतिक्रियां को मूल बना कर कुछ एक अर्वाचीन भावुक वेदभक्तों में ऐसी प्रतिक्रिया जागरूक होपड़ी कि; संहिताभाग ही, इसमें भी अमुक चार संहिता हीं मूलवेद, प्रमुख वेद हैं, यहीं स्वतःप्रमाणशास्त्र है; एवं ब्राह्मण - अरण्यक - उपनिषत् - नामक ग्रन्थ तो वेद की ऋषिकृतां व्याख्याएँ हैं; जिह्न पौरुषेयां होने से परतः प्रमाण ही माना जायगा ' । इस अभिनव जागृति का पूर्व में समाधान किया जाचुका है । यदि ब्राह्मणांरण्यकादि पौरुषेय होने से परतः प्रमाणं हैं; तों अवश्य ही स ंहिताग्रन्थं भी ऋषिकृत होने से पौरुषेयं हीं; अतएव परतः प्रमाणं ही माने जाने चाहिएँ । यदि संहिताएँ स्वतःप्रमाण हैं, तो तत्समंतुलिता अन्य शाखासंहिताएँ एवं तद्व्याख्यारूप ब्राह्मणादिं भी निश्चयेंन ऋषिं को प्रत्यक्षदृष्टि बनते हुए स्वतः प्रमाण हीं माने जायेंगे, इत्यलमतिवाग्विग्लपनेने | वक्तंत्र्य इस दिशा में यहीं है कि, अपने पूर्वीक व्यानोइन से व्या मुग्ध ' आर्य ' महाशय ब्राह्मण-आरण्यकें - उपनिषत्; तीनों की ओर से प्राय: उन्मुखं रहते हुए अपनी मान्यां चार संहिताओं के प्रति हीं अपनी वेदविज्ञानशक्ति उँडेज देने के लिए आतुर बने रहते हैं । मूल संहिता का भाष्य हीं स्वयं ब्राह्मणवेद है; जो ऋषिदृष्ट है । इस भाष्य के माध्यम से ही, अर्थात् ब्राह्मण - आरण्यक उपनिषत् के माध्यम से ही, इनकी ज्ञानविज्ञानात्मिका परिभाषाओं के समन्वय के माध्यम से ही दुरधिगम्य - रहस्यपूर्ण संहितामन्त्रों का संस्पर्शमात्र किया जासकता है । कैदापि हम अपनी वैखरी वाणी से इन मन्त्रों की भाष्य, टीका; किंवा व्याख्यां कर ही नहीं सकते । संहिता का एक एक मंत्र एक एक स्वतन्त्रं ग्रन्थंनिर्माणं की अपेक्षा रख रहा है अपनीं गभीरतमा तत्त्वनिष्ठा से | हमारी स्वल्पमतिं तो संहिता के प्रत्येक मन्त्र के पारिभाषिक प्रत्येक शब्द पर दृष्टिंनिक्षेपमात्र से हीं विकम्पित होजाती हैं । अतएव हमारी धारणा के अनुसार लोकभाषा में संहितामन्त्रों की व्याख्या उपनिबद्ध कर देना असम्भव है । मन्त्र तो यावज्जीवन मननीय नै रहकर ही स्वस्वरूप - दर्शन - प्रदान का अनुग्रह प्रदान किया करते हैं । सम्भवतः इसी तथ्य को लंदन में रखकर सर्वश्री कौत्स महाभाग ने मंन्त्रों के सम्बन्ध में ' अनर्थ-का हि मन्त्राः ' ( वेदमन्त्रों का कोई अर्थ नहीं होता ) ये उद्गार अभिव्यक्त कर दिए होंगे, जो मन्त्रोपांत्त - शब्द की गभीरा, अतएव बहुविस्तारसापेक्षा पारिमात्रिकी तत्वदृष्टि से सर्वथा उचित ही प्रतीत होरहे हैं । कौस ८६