Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 741–750
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 741–750
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शतपथब्राह्मण श्रयं वाव यजुर्योऽयं पवते । एष हि यन्न वेदं सर्वं जनयति । एतं यन्तमनु-प्रजायते । तस्माद् वायुरेव यजुः । श्रयमेवाकाशो जूः - यदिदमन्तरिक्षम् । एतं ह्याकाश-मनुजवते । तदेतद्यजुर्वायुश्चान्तरिक्षंच - यच्च जूश्च तस्माद्यजुः । एष एव यदेष ह्येति । तदेतद्यजुऋक्सामयोः प्रतिष्ठितम् । ऋक् सामे वहतः । ऋषिप्राणरूप सप्तपुरुषपुरुषात्मक - चित्यप्रजापति के काम- तपः - श्रम से सर्वप्रथम ' प्रतिष्ठा -रूप ' यही ' उपलब्धिवेद ' ( जिसे कि हमने पूर्व में ' ब्रह्मनिःश्वसित ' नाम से व्यवहृत किया है ) प्रादुर्भूत होता है । इसी प्रथमज़ प्रतिष्ठा वेद का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं— * “ स वै सप्त पुरुषो भवति । सप्त पुरुषो ह्ययं पुरुषः - यच्चचार आत्मा । त्रयः पक्ष – पृच्छानि । सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयत - भूयान्त्स्यां, प्रजायेय -इति 1 । सोऽ– श्राम्यत् । स तपोऽप्यत । स श्रान्तस्तेपानो ब्रह्मव प्रथममसृजत त्रयीमेव विद्याम् । सैवास्मै प्रतिष्ठाभवत् । तस्मादाहुः – ' ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रतिष्ठा ' इति । तस्मादनूच्य प्रतितिष्ठति । प्रतिष्ठा ह्येषा यद् ब्रह्म ( वेदः ) " इस वेदप्रतिष्ठा पर प्रतिष्ठित उस प्राणमय प्रजापति के तपः - श्रम से ' वेदत्रयी ' के यजुर्भाग से सर्व-प्रथम् अपतत्त्व उत्पन्न हुआ । वागुरूप ' जू भाग ' वायुरूप ' यद्भाग ' के व्यापार से ‘ द्रत ' हो पानी के रूप में परिणत हुआ । यह वाग्जन्य तत्त्व उत्पन्न होते ही सर्वत्र व्याप्त होगया, इसी ं व्याप्तिधर्म्म से इसने त्रैलोक्य का संवरण कर लिया, अतएव विद्वानोंनें - सर्वमाप्नोत् सर्वमवृणोत् - इन व्युत्पत्तियों के आधार पर इस तत्त्व को ‘ यदाप्नोत् ' - ' यदवृणोत् ' इत्यादि निर्वचनों के आधार पर ' आप: - वारि ' - इत्यादि नामों से प्रसिद्ध कर दिया । यही भृग्वङ्गिरोरूप ' आपस्तत्त्व ' गोपथप्राह्मण में ' सुब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । यही चौथा ‘ अथर्वव्रह्म ’ कहलाया । त्रयीब्रह्मावच्छिन्न स्वयम्भूब्रह्म का सब से ज्येष्ठपुत्र भी यही कहलाया X । अनन्तर ' त्रयीविद्या ' के साथ वह प्रजापति इस आपोमण्डल में प्रविष्ट होगए । जितनी दूर में वेदत्रयीमय प्रजापतिं व्याप्त हुए, उतनी दूर पर्य्यन्त एक ' अण्ड ' बन गया | क्योंकि यह अण्ड उस ' त्रयी ब्रह्म ' का था, अतएव वह ' ब्रह्माण्ड ' नाम से प्रसिद्ध हुआ । वेदगर्भित उस आपोमय मण्डल के * -प्रकरणसङ्गति के लिए यहाँ वेदस्वरूप - प्रतिपादिका श्रुतियों का उल्लेख मात्र कर दिया है । यदि इन का यहीं रहस्यार्थ भी बतलाने का उपक्रम किया जाय, तो प्रकृत प्रकरण से बहुत दूर हटना पडे । श्रुतः पाठकों को अभी इमी पर सन्तोष करना चाहिए । समय समय पर ये सब ग्रन्थियाँ सुलझतीं रहेंगी ।
X ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ।
सत्रह्मविद्यां सर्वविद्या - प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥
—मुण्डकोपनिपत् १ । १ । १ । ४७६
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प्रथमकाण्ड गर्भ में ( केन्द्र में ) पूर्वोक्त सौराग्नि उत्पन्न हुआ । यह वेद का दूसरा अवतार हुआ | वह स्वायम्भुव वेद ब्रह्मनिःश्वसित था, यह सौर वेद ' गायत्री मात्रिक ' हुआ । वह ज्ञानज्योतिर्म्मय था, यह भूतज्योतिर्म्मय हुआ । बह प्राणमुख वेद था, यह अग्निमुखवेद हुआ । वह अपौरुषेय था, यह ब्रह्मपुरुष से उत्पन्न होने के कारण पौरुषेय हुआ । यही हमारे प्रकरण का ' सत्यवेद ' है । इसी ' सत्यवेद ’ का निरूपण करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— “ प्रतिष्ठा ह्य ेषा यद् ब्रह्म । तस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितोऽतप्यत । सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् । वागेव साऽसृज्यत । सेदं सर्वमाप्नोद्यदिदं किंच | यदाप्नोत् तस्मा – दापः । यदवृणोत् तस्माद् वाः । सोऽकामयत श्राभ्योऽद्द्भ्योऽधिप्रजायेयेति -- सोऽनया त्रय्या विद्यया सहापः प्राविशत् । तत आण्डं समवर्त्तत । ततो ब्रह्मव प्रथमसृज्यत त्रय्येय विद्या । तस्मादाहुर्ब्रह्मास्य सर्वस्य प्रथमजम् - इति । अपि हि तस्मात् ब्रह्म व पूर्वम-सृज्यत । तदस्य तन्मुखमेवासृज्यत । तस्मादनूचानमाहुरग्निकल्प इति । मुखं ह्य तदग्नेर्यद्--ब्रह्म । अथ यो गर्भोऽन्त रासीत् - सोऽग्रिरसृज्यत । स यदस्य सर्वस्य ( रोदसीत्रैलो--क्स्य ) अग्रमसृज्यंत, तस्मादग्रिः । अग्रिर्ह वै तमग्निरित्याचक्षते परोक्षम् । परोक्षप्रिया इव हि देवाः " । - शतपथ ब्रा ० ६ | १ | ११८,६,१०,११, । सूय्यं सचमुच त्रयीविद्यावन है । एवं अग्निमूर्ति होने से यह सूर्य्यरूप ' गायत्रयीमान्त्रिकवेद ' अवश्य ही ‘ सत्यवेद ' है । इस सत्यवेद का ऋग्भाग ' महोक्थ ' है । सामभाग महाव्रत है | एवं यजुर्भाग पुरुषाग्नि है । ' उक्थ ' उस का नाम हैं, जहाँ से वस्तु अभिव्यक्त होती है, उत्थित होती है, उठती है । सूर्य्यपिण्ड रश्ििमयों का प्रभव है । रश्मियाँ सूर्य्य से ही उठतीं हैं । अत: हम सूर्य्यपिण्ड को अवश्य ही ‘ उक्थ ' कह सकते हैं । यह उक्थ एक सहस्र हैं । हम जिस सूर्य्य को देख रहे हैं, वह सूर्य्य ' उक्थ ' है, न कि ‘ महोक्थ ’ । किसी भी वस्तु को आप देखते जाइए, और पीछे हटने जाइए । ज्यों ज्यों आप पीछे हटते जायँगे, त्यों त्यों वह वस्तु उत्तरोत्तर आपको छोटी प्रतीत होने लगेगी, यहाँतक कि, किसी स्थान पर जाने से वह सर्वथा त्रिन्दुमात्र ही दिखलाई देने लगेगी । वस्तुपिण्ड से प्रारम्भ कर बिन्दुमात्र प्रतीत होने वाले स्थान पर्य्यन्त ऋषियोंने किसी विशेष कारण से १००० मूर्तियाँ मानीं हैं । इन में ६६६ आपेक्षिक छोटी बड़ीं सत्र मूर्त्तियाँ उक्थ हैं । क्योंकि प्रत्येक से स्वतन्त्र प्राण निकलता है । परन्तु इन सत्र मूर्त्तियों का उक्थ वह मूलपिण्ड ही है । इन सत्र की अपेक्षा वह बृहत् है । अतएव उसे ' महोक्थ ' कहा जाता है । इतर सब उक्थ ‘ उक्था– मद ' हैं | एवं महापिण्ड महोक्थ है । यही ऋक् है । मूर्त्तिका नाम ' ऋग्वेद ' है - यहो निष्कर्ष है । ४८०
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शतपथब्राह्मण एवं जो सौर प्रकाशमण्डल है, अर्चिमण्डल है, वही सामवेद है । मूर्ति की समाप्ति प्राणमण्डल पर ही होती है । जहाँ वस्तुप्राण उपरत - विश्रान्त होता है, वहीं वस्तु का ' अवसान ' होता है । ' अवसान ' ही ' साम ' है । ' अत्र ' पूर्वक षोऽन्तकर्म्मरिण धातु से ' न ' प्रत्यय करने पर ' अवसान ' शब्द निष्पन्न होता है । एवं ' म ' प्रत्यय से ' साम ' बनता है । ' व्रत ' नाम ' साम ' का है । प्रत्येक उक्थका स्वतन्त्र ‘ व्रत-( मण्डल ) ' है । इन में सत्र से अन्तका मण्डल ' बृहत् ' है । अत: इसे ' महाव्रत ' कहा है । ' मूर्ति ', और ' ‘ मण्डल ' दोनों ‘ वयोनाघ ' हैं । ' आयतनमात्र ' हैं । जिस की यह मूर्ति है, एवं जिस का यह मण्डल है, वही तीसरा ' अग्नितत्त्व ' है । वही यजु है । मूर्ति, श्रौर मण्डलरूप पुर में वह अग्नि व्याप्त रहता है । अतएव ' पुरि शेते ' इस व्युत्पत्ति से यजुरग्निको ' पुरुष ' कहा जाता है | तथित्थं महोक्थ - महाव्रत - पुरुष, समष्टिरूप सूर्य क्या तप रहा है, साक्षात् ' त्रयी - विद्या ' ही तप रही है । इसी तत्त्वात्मिका - वेदत्रयी ' को लक्ष्य बनाती हुई बाजसनेय - श्रति कहती है— “ यदेतन्मण्डलं तपति - तन्महदुक्थम् । ता ऋचः । स ऋचां लोकः । अथ यदे--तदर्चिर्दीप्यते - तन्महाव्रतम्, तानि सामानि । स साम्नां लोकः । य एष एतम्मिन् मण्डले पुरुषः, सोऽग्निः । तानि यजूंषि । स यजुषां लोकः । सैषा त्रय्येव विद्या तपति ' । -- शतपथ ० १०।५।२।१,२, । प्रत्येक वस्तु में तीनों भावों का प्रत्यक्ष किया जासकता है । ' वस्तुपिण्ड ' पहिला भाव है । ' वस्तु-' गति ' दूसरा भाव है । एवं ' वस्तुमण्डल ' तीसरा भाव है । वस्तुपिण्ड ' आधार ' है । उस में निरन्तर ' परिवर्तनरूपा गति ' हुआ करती है । इसी नित्यगति से वस्तु नवीनता से जीर्णभाव को प्राप्त होजाती है । एवं वस्तु से एक प्राण निकलता है । वह वस्तुको केन्द्र में रखता हुआ बड़ी दूर पर्य्यन्त अपना मण्डल बनाता है । जो प्राण पिण्ड में था, वही सूक्ष्म होकर बाहिर व्याप्त होता हुआ अपना स्वतन्त्र मण्डल बनाता है । वस्तुपिण्ड का आधार ऋग्वेद है । यही महोक्थ है । पिण्ड से निकलने वाला प्रारण सामवेद है । सिनेमा की मशीन से निकलने वाले, ३ अंगुल की व्याप्ति रखने वाले चित्र पुरोवस्थित रजतपट पर जिस तत्त्व के आधार से अपने को महाकाराकारित बना देते हैं - वही ' साम ' है । मूल में छोटा होकर तूल में वितत होजाना, फैल जाना हीं तेजोभाव ' है । यही साम है । क्योंकि वितान को साम कहते हैं, जैसा कि अनुपद में ही बतलाया जाने वाला है । एवं गति का अधिष्ठाता वही ' यजुर्वायु ' है । इसी वेदत्रयी-विज्ञान को लक्ष्य में रख कर महर्षि तित्तिरि कहते हैं-ऋग्भ्यो जातां सर्वशो मूर्त्तिमाहुः सर्वागतिर्याजुषी हैव शश्वत् । सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् - सर्व हीदं ब्रह्मणा हैव सृष्टम् ॥ - तै ० ब्रा ० उक्त तैत्तिरीय – मन्त्र का अक्षरार्थ यही है कि, “ ऋचाओं से ही सम्पूर्ण मूर्त्तियाँ ( वस्तुपिण्ड ) अभिव्यक्त - उत्पन्न हुई हैं । पिण्डात्मिका मूर्त्तियाँ, तथा मण्डलात्मक वितानभावों में परिव्याप्त पञ्चधा विभक्ता सम्पूर्ण गतियाँ यजुओं से हीं अभिव्यक्त हुई हैं । मूर्त्ति ( पिण्ड ) के आधार पर ४८१
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प्रथमकाण्ड वितत सम्पर्ण तेजोमण्डल सामों से ही अभिव्यक्त हुए हैं । और ' ब्रह्म ' नामक अथर्ववेद से ही इस मूर्त्ति - गति - तेजो - रूपा त्रयीविद्या के द्वारा यह सब कुछ ( सम्प पूर्ण विश्व ) उत्पन्न हुआ है " । पिण्डात्मिका मूर्त्ति ही ऋक् है, मण्डलात्मक वितानभाव ही साम है, इसी का नाम - ' छन्दोवेद ' है । वितानात्मक मण्डल ही साम है, यही ‘ वितानवेद ' नाम से प्रसिद्ध है । एड और मण्डल से ( ऋक् और साम से ) परिच्छिन्न ( श्रंथर्वब्रह्ममय ) गतिभावापन्न श्राग्नेय - पुरुष ही ' यजु: ' है, और यही ' रसवेद ' है । त्रिवृत्करण से ' इन तीनों छन्दः - बितानम् - रसः - नामक ऋक् - साम - यजुः- तत्त्वों के, प्रत्येक के ऋक् - यजुः साम - रूपेण तीन तीन विवर्त्त होजाते हैं । जैसाकि निवेदन किया गया है - वेद में वेद ही एकमात्र दुरधिगम्य तत्त्व है, जैसाकि पूर्वोक्ता कतिपय-परिभाषाओं से पाठकों को अवगत होगया होगा । अतएव तत्समन्वय के लिए तो स्वतन्त्र चिन्तन ही अपेक्षित है । दुरधिगम्य, अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण, सृष्टिमूलभूत पूर्वसङ्केतित तत्त्ववेद के सम्बन्ध में अधिक विस्तार में न जाकर प्रकृत में हम वैसी कतिपय तालिकाएँ, तथा रेखाचित्र मात्र ही अत्र उद्धृत कर देते हैं, जिनके माध्यम से प्रार्षप्रज्ञानिष्ठ विद्वानों का तो अवश्य ही अनुरञ्जन होगा । इन पारिभाषिक - तालिकाओं, तथा रेखाचित्रों के तत्त्वात्मक - समन्वय – स्पष्टीकरण के लिए तो तदात्मक ' उपनिषद्विज्ञानभाष्यभूमिका ' ( खण्डत्रयात्मक ) नामक स्वतन्त्र निबन्ध ही द्रष्टव्य है । ४८२
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शतपथब्राह्मण ( क ) १ - ग्रात्मवेदः -- ग्रानन्दः - ( श्रानन्दः ) - यजुर्वेदः २ - प्रतिष्ठावेदः - सत्ता- - ( सतू ) –ऋग्वेदः - " अग्निमयो - मूलवेदः ” ३ - ज्योतिर्वेदः --चेतना - ( चित् ) - सामवेदः ( ख ) * १ – उक्थम् — उक्थवेद: ' " ऋग्वेदः यजुः १ २ - ब्रह्म —— ब्रह्मवेद:: “ यजुर्वेद: - ग्रात्मवेदः - यजुर्वेदः - यजुरग्निः ( वायुः ) ३- साम-- सामवेद: “ सामवेदः १ - आत्मा —— आत्मवृतिवेदः ' ऋग्वेदः ऋक् २ २ – वृतिः -- असतोषृतिवेदः यजुर्वेदः प्रतिष्ठा वेद: - ऋग्वेदः - ऋग्निः ( अग्निः ) ३ - विधृतिः — सतोधृतिवेदः ” “ सामवेदः १- श्रात्मा - ज्ञानज्योतिर्वेदः ' ऋग्वेद: साम ३ २ - भूतानि - भूतज्योतिर्वेद: • “ यजुर्वेदः - ज्योतिर्वेदः सामवेदः - सामाग्निः ( श्रादित्यः ) ३ - नामरूपे - सत्य ज्योतिर्वेदः * सामवेदः ( ग ) १ –यजुः– यजुर्वेदत्रयी — वाक्प्राणमनोमयी मनः प्रधाना, आनन्दलक्षणा — ' रस वेदत्रयी ' । २ – ऋक् – ऋग्वेदत्रयी— मनोवाक्प्राणमयी प्राणप्रधाना, सल्लक्षणा ---- -'छन्दोवेदत्रयी ' ' | ३ – साम — सामवेदत्रयी - मनः प्राणवाङ मयी वाकप्रधाना चिल्लक्षणा - ' वितानवेदत्रयी ' । ४८३
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१ - श्रानन्दः - ज्ञानशक्तिमयं मनः प्रथमकाण्ड ( घ ) ( आनन्द विकासभूमि: ) २ – चेतना ——क्रियाशक्तिमयः प्राण: ( चेतना विकासभूमिः ) ३ - सत्ता -- [ अर्थशक्तिमयी वाक् ( सत्ताविकासभूमिः ) १— श्रानन्दात्मकः – मनोमय आत्मा - आत्मा २ – चेतनात्मकः -- प्राणमय आत्मा - ज्योति: ३ – सत्तात्मकः --- वाङ् मय श्रात्मा - प्रतिष्ठा १ – श्रानन्दात्मको मनोमय श्रात्मा - आत्मा - ( आत्मा ) आत्मवेदः - रसवेदः ( यजुर्वेदः ) २ – चेतनात्मकः प्राणमय आत्मा - श्रात्मा - ( ज्योतिः ) ज्योतिर्वेदः - वितान वेदः ( सामवेदः ) ३ - संत्तात्मको वाङमय आत्मा - आत्मा - ( प्रतिष्ठा ) प्रतिष्ठावेदः - छन्दोवेदः ( ऋग्वेदः ) * ( ङ ) * १ - तदित्यमानन्दात्मके मनोमये आत्मलक्षणे यजुर्वेदे मनसस्त्रिवृद्भावाद्व दत्रयोपभोगः । १ – आनन्दगर्भितं मनोमयं मनः - - ( मनः ) — सामवेद: २ – श्रानन्दगर्भितो मनोमयः प्राणः-३ – आनन्दगर्भिता मनोमयी वाक्-- ( मन ) – यजुर्वेदः - श्रात्मवेदत्रयी - मनोमयी – “ मनः ” ( १ ) - ( मनः ) — ऋग्वेदः ४१४
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शतपथब्राह्मण २ - तदित्थं चेतनात्मके प्राणमये ज्योतिर्लक्षणे सामवेदे प्राणस्य त्रिवृद्भावाद्वं दत्रयोपभोगः । १ - चेतनागर्भितं प्राणमयं मनः ( प्राण: ) - जानज्योति: - ऋग्वेदः २ - चेतनागर्भितः प्राणमय: प्राण: ( प्राणः ) - भूतज्योतिः – यजुर्वेदः - ज्योतिर्वेदत्रयी प्राणमयी ३ - चेतनागर्भिता प्राणमयी वाक् ( प्राणः ) - सत्यज्योतिः - सामवेदः “ प्राणः ” ( २ ) ( a ) ३- तदित्थं सत्तात्मके वाङ्मये प्रतिष्ठालक्षणे ऋग्वेदे वाचस्त्रि-वृद्धावाद दत्रयोपभोगः । · १ – सत्तागर्भितं वाङ्मयं मनः ( वाक् ) - आत्मधृतिः ऋग्वेदः २ – सत्तागर्भितो वाङ्मयः प्राणः ( वाक् ) - असतोधृतिः – यजुर्वेदः - प्रतिष्ठा वेदत्रयी - वाङमयी ' वाक् ' ( ३ ) ३ - सत्तागर्भिता वाङ यी वाक् ( वाक् ) - सतोधृतिः -- सामवेद: प्रकारान्तरेण समन्वयो द्रष्टव्यः-१ - श्रात्मवेदः - श्रानन्दः - श्रानन्दः -- यजुर्वेदः २ - ज्योतिर्वेदः -- चेतना— चित् —-- सामवेदः - " सच्चिदानन्द वेदत्रयी ” ३ - प्रतिष्ठावेदः - सत्ता-- सत्--ग्वेद: ४८५
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१ – उक्थं – उक्थवेदः ~~ ऋग्वेदः २– ब्रह्म — ब्रह्मवेदः— यजुर्वेदः ३- साम -- सामवेदः—— सामवेदः १- श्रात्मा -- ग्रात्मधृतिवेदः— ऋग्वेदः ३ - विधृतिः - सतोधृतिवेदः — सामवेदः १ - आत्मा - ज्ञानज्योतिर्वेद: - ऋग्वेदः २ - भूतानि - भूतज्योतिर्वेदः – यजुर्वेदः ३ - नामरूपे - सत्यज्योतिर्वेदः - सामवेदः प्रथमंकाण्ड ( झ ) ४८६ } आत्मवेदो वेदत्रयात्मकः– “ यजुर्वेदः ” – “ आनन्दः ” ( १ ) २ - धृतिः —- असतोवृतिवेदः — यजुर्वेदः प्रतिष्ठावेदो वेदत्रयात्मकः - " ऋग्वेदः " - " सत्ता " ( २ ) - ज्योतिर्वेदो वेदत्रयात्मकः-- " सामवेद: - " चेतना " ( ३ )
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शतपथब्राह्मण ( ञ ) समष्टिपरिलेख: - ( छन्दोवितानरसलक्षणा वेदत्रयी ) । मूर्त्तिवेदः ऋक् * १ - छन्दों वेदत्रदी ( ऋग्वेदत्रयी ) -१ - कूटस्थविष्कम्भः - ऋग्वेदः ( ऋक् ) १ २ – पिण्डपरिणाहः – सामवेदः ( ऋक् ) ( ऋप्रतिकृतिः ३ –कूटस्थहृदयम् -- यजुर्वेदः ( ऋक् ) २ - वितान वेदत्रयी ( सामवेदत्रयी ) -१ - पूर्वपूर्वमण्डलम् - - ऋग्वेदः ( साम ) तेजोवेदः २ – उत्तर - उत्तरमण्डलम् - सामवेदः ( साम ) - सामप्रतिकृतिः २ साम ३ – मण्डलद्वयभुक्ता मूर्त्तयः - यजुर्वेदः ( साम ) ३- रसवेदत्रयी ( यजुवंदत्रयी ) -१ – उत्तरोत्तरं ह्रस्वीभवन्तो विष्कम्भाः - ऋग्वेदः ( यजुः ) गतिवेदः २- उत्तरोत्तरं वृद्धिमन्ति पृष्ठानि-- सामवेद: ( यजुः ) - यजुःप्रतिकृतिः यजुः ३ - ऋजुभावापन्ना रेखा * ( ट ) - यजुर्वेदः ( यजुः ) उक्थम् – १ – छन्दोवेदः – मूर्ति; — -महदुक्थम् - ऋग्वेदः साम —- २ – वितानवेदः - मण्डलम् - महाव्रतम् - सामवेदः - “ मूलवेदत्रयी ” ब्रह्म — ३ — रसवेदः — प्राणाग्निः - पुरुषः - — यजुर्वेदः J
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— स्वः - ऋक् द्यौः स्वयम्भूः-१ – ) १ ( ) श्वसितवेदः ब्रह्मनिः ( ] त्रिलोक्यत्रिलोकी सैषा [ २ । ) -ऋक् स्व: — ( संयती - भूः - भुषः साम ० - ब्रह्मा • --यजुः ० पृथि ० --अन्त परमेष्ठी मध्य स ० २ - ३ -) ) ( २ ३ ( * स्वः ऋक -द्यौः -परमेष्ठी १ -” वितदैरयेथाम् सहस्रं त्रेधा यदपस्पृधेथाम्— विष्णु इन्द्रश्च “ " लोकाः त्रिवृतो इमे वा त्रयो " . ” वेदाः त्रिवृतो इमे वा त्रयो " = * = - भुवः - यजुः ० अन्त - [ ० मध्य २ -)( ४ २ – भूः साम ० – - पृ सूर्य्यः ३-० ) ( ५ विष्णुः ) वेदः मात्रिक गायत्री ( । ) -यजुः : भुव -( क्रन्दसी २ - श्वः --ऋक् द्यौः — सूर्य्यः १ -* - भुवः -- भूः यजुः साम -० - ० -श्रन्त पृथि: शिव --० भूपिण्डः मध्य स ० -२- ३ ) ) ( ६ ( ७ ३ ) साम - भूः यज्ञमात्रिकवेदः ( ( रोदसी २ स मः महाविश्वम् तदिदं