Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 751–760

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 751–760

पृष्ठ 751

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शतपथब्राह्मण ( ञ ) समष्टिपरिलेख: - ( छन्दोवितान रसलक्षणा वेदत्रयी ) । मूर्त्तिवेदः ऋक् तेजोवेदः साम १ - छन्दोवेदत्रदी ( ऋग्वेदत्रयी ) -१ – कूटस्थविष्कम्भः - ऋग्वेदः ( ऋक् ) १ २ – पिण्डपरिणाहः – सामवेदः ( ऋक् ) - ऋप्रतिकृतिः २ ३ – कूटस्थहृदयम् - यजुर्वेद: ( ऋक् ) २ - वितान वेदत्रयी ( सामवेदत्रयी ) -.१ - पूर्वपूर्वमण्डलम् - ऋग्वेदः ( साम ) २ – उत्तर - उत्तरमण्डलम् - सामवेदः ( साम ) ( - सामप्रतिकृतिः ३ –मण्डलद्वयभुक्ता मूर्त्तय: - यजुर्वेदः ( साम ) ३ - रसवेदत्रयी ( यजुर्वेदत्रयी ) -१ – उत्तरोत्तरं ह्रस्वीभवन्तो विष्कम्भाः - ऋग्वेदः ( यजुः ) ३ २ – उत्तरोत्तरं वृद्धिमन्ति पृष्ठानि-- सामवेद: ( यजुः ) ( यजुः प्रतिकृतिः गतिवेदः यजुः ३ - ऋजुभावापन्ना रेखा - यजुर्वेद: ( यजुः ) ( ट ) उक्थम् – १ – छन्दोवेदः – मूर्ति; —-महदुक्थम् - ऋग्वेदः साम --- २ - वितानवेदः - मण्डलम् - महाव्रतम् - सामवेदः ब्रह्म ——- ३- रसवेदः - प्राणाग्निः - पुरुषः - - यजुर्वेदः - “ मूलवेदत्रयी ”

पृष्ठ 752

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शतपथब्राह्मण १-४८ - स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी - ब्रह्माक्षरानुगृहीतः — द्युलोकः-पार्थिवाग्निविवर्त्तम् आन्तरिक्षयाग्निविवतम् म् ' दिव्याग्निविवत ४८६ १ -२ ऋक् ( स्वः ) “ स्वः ” -“ ऋक ” ( ब्रह्मनिःश्व-२ २ “ भुवः ’ – “ यजुः ” ( गायत्रीमात्रिकवेदः ) ३ ३ " साम'-( यज्ञमात्रिक-वेदः ) त्रिवृद्वं दपरिलेखाः – [ रोदसी त्रैलोक्यवितानपरिचयात्मकाः ] । १- ब्रह्मनिःश्वसितवेदात्मिका संयतो- त्रिलोकी पार्थिवी " ब्राह्मी " ( ब्रह्माक्षरानुगृहीता ) । * २-३३ – स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी – इन्द्रा विष्णवक्षरा ० – अन्तरिक्ष लोकः २ यजुः ( भुवः ) ३-१२ - स्तोमाबच्छिन्नो भूपिण्डः - अग्नीषोमाक्षरा ० - पृथिवीलोक: - २ साम ( भूः ) | सितवेदः ) २ - गायत्रीम।त्रिकवेदात्मका क्रन्दसी त्रिलोकी पार्थिवी " वैष्णवी " ( इन्द्राविष्णवदारानुगृहीता ) । १-३३ - स्तोमावच्छिना पृथिवी - ब्रह्माक्षरानुगृहीतः — द्युलोकः २ ऋक् ‘ स्वः ) ४२-२१ – स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी इन्द्राविष्वक्षरा ०- अन्त०- यजुः ( भुवः ) ०-२ ३- * -चित्यभूपिण्डः—— श्रग्नीषोमाक्षरानु ० – पृथिवी ० २ साम ( भूः ) ३ यज्ञमात्रिकवेदात्मिका रोदसी - त्रिलोकी पार्थिवी “ शैवी ” ( अग्नीषोमाक्षरानुगृहीता ) । १-२१ - स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी — ब्रह्माक्षरानुगृहीतः - श्रादित्यप्रधानः - द्य लोकः - ऋक् ( स्वः ) | { “ भः ” ४ २ - १५ – स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी – इन्द्राविष्यवक्षारानु ० - वायुप्रधानः - अन्त ० -यजु: ( भुव:) ( ३– ६ – स्तोमावच्छिन्नो भूपिण्डः - अग्नीषोमाक्षरा ० -- अग्निप्रधानः – पृ ० – साम ( भूः )

पृष्ठ 753

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II स्वः - ऋक् - द्यौः अष्टाचत्वारिंशस्तोमः १ -)( १ - भुवः - भूः यजुः - साम ० - ० श्रत पृथि -- ---- त्रयस्त्रिशस्तोमः ३ - एकविंशस्तोमः ) २ ) ( २ ( ३ ब्रह्मा स्वः भुवः - भूः ऋक् - यजुः साम -- ० ० -- द्यौः - श्रन्त - पृथि विष्णुः ': त्रयस्त्रिशस्तोमः - एकविंशस्तोमः भूपिण्ड १ - २ ३-' महीप्रथिवी ) ) ** ( ४ ५ २ ( २ ) त्रिलोकी पार्थिवी ( सैषा स्वः भुवः ए भूः - --ऋक् - यजुः साम ' — ० ० -द्यौः अन्त - - पृथि रुद्रः पृथिवी -: - पञ्चदशस्तौम त्रिवृत्स्तोम सागराम्बरा ' एकविंशस्तोमः १- २ ३ -२ ६ ) ) ७ ( * ( २ विश्वम् पार्थिवं तदिदं ) ५।१।५।२१ ० शत ( ” परे द्वेऽस्याः , इयमहैका । पृथिव्यः इमाः वा तिस्रो " ” वेदाश्च , लोकाः त्रिवृतो इमे वा ह त्रयो " छन्दोमायज्ञमूर्त्तिः गोसवयज्ञमूर्त्तिः यज्ञमूर्त्तिः सम्वत्सर ' पृथिवी - यज्ञिया ' प्रथमकाण्ड

पृष्ठ 754

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' म् पलितवामाग्निविवत्त म् ' नारायणाग्निविवर्त्त सत्याग्निविवर्त्तम् शतपथब्राह्मण त्रिवृद्व दपरिलेखाः – ( त्रैलोक्यत्रिलोकी वितानपरिचयात्मकः ) १- ब्रह्मनिःश्वसितवेदात्मिका संयती - त्रिलोकीं - ' ब्राह्मी'- ( ब्रह्माक्षरानुगृहीता ) । १- स्वयम्भूः- -- { ब्रह्माक्षरानुगृहीतः — द्युलोकः – { ऋक् ( स्वः ) ] २ – मध्यस्थभावाः - { इन्द्रावैष्णवक्षरानु ० - अन्तरिक्षलोकः { यजु: ( भुव ) ३ - समहिमपरमेष्ठी { अग्नीषोमाक्षरानु ० --पृथिवीलोकः -- साम ( भूः ) ) } { ‘ स्वः ’ – ‘ ऋक ’ ( ब्रह्म निःश्वसितवेदः ) २ - गायत्रीमात्रिकवेदात्मिका क्रन्दसी - त्रिलोकी ' वैष्णवी ' - ( इन्द्राविष्ण्वक्षरानुगृहीता ) । १ - परमेष्ठी- - २ ब्रह्माक्षरानुगृहीत:: - -- द्यु लोकः - { ऋक् ( स्वः ) २ - मध्यस्थभावाः { इन्द्रा विष्वक्षरा ० - अन्त ०--२ यजुः ( भुवः ) ३ - समहिमसूर्य्यः - अग्नीषोमाक्षरानु ० - पृथिवी ० ) साम ( भूः ) २ २ “ भुवः ” - “ यजुः ” ( गायत्रीमात्रिकवेदः ) ३ - यज्ञमात्रिकवेदात्मिका रोदसी - त्रिलोकी " शैत्री " - ( ग्रग्नीषोमाक्षरानुगृहीता ) १ - सूर्य्य: – – २ ब्रह्माक्षरानुगृहीतः - द्युलोकः २ ऋक् स्वः ) २- मध्यस्थभात्राः - { इन्द्राविष्वक्षरा ० अन्त ० - २ यजुः ( भुव:) ३- समहिमभूपिण्डः { अग्नीषोमाक्षरा ० - पृथिवी ० २ साम ( भूः ) ३ ३ “ भूः ” – “ साम ” ( यज्ञमात्रिकवेदः ) ४६१

पृष्ठ 755

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बृहत्प्राणात्मकम सौर - साम बृहत् ) ( आप वैराजं :) ( अग्नि बृहत् ) ( वाक् रैवतं . ) आयुः पशुमडल ( -गौ:) मंडल ( ऋतु : ) ज्योति मंडल आदित्य ( प्रथमकाण्ड : → पिड़ : सूथ्य ४६२ ( सम्वत्सरं साम सौर - हिरण्मयम् ) ( ३ ) -सौर सम्वत्सरचक्रानुगत- सामत्रयो - परिलेख: –

पृष्ठ 756

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शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्य-( ४ ) - रशम्यर्कसहस्रवितानपरिलेख: -शतपथब्राह्मण उक्वार्क मंडलम् ४६३ अर्क या रश्मियाँ

पृष्ठ 757

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प्रथमकाण्ड ( ५ ) छन्दो - वितान - रस - भावानुगत - त्रयीवेदस्वरूपपरिलेख: -( १ ) - सैषा छन्दोवेदत्रयी ( ऋग्वेदत्रयी ) --१ - कूटस्थविष्कम्भः - ऋग्वेदः - ऋक् । २- पिण्डपरिणाहः - सामवेदः ऋक् ३- कूटस्थहृदयम् – यजुर्वेदः - ऋक् ( २ ) --सैषा वितान वेदत्रयी ( सामवेदत्रयी ) --१ - पूर्वपूर्व मण्डलम् -- ऋग्वेदः साम-२- उत्तर - उत्तरमण्डल - - सामवेद: साम ३ - मण्डलद्वयभुक्ता मूर्त्तयः - यजुर्वेदः -साम ऋक् प्रतिकृतिः साम प्रतिकृतिः ( ३ ) -- सैषा रसवेदत्रयी ( यजुर्वेदत्रयी ) --१ - उत्तरोत्तरं ह्रस्वीभवन्तो विष्कम्भाः - ऋग्वेदः - यजुः २ - उत्तरोत्तरं वृद्धिमन्ति पृष्ठानि - सामवेद: -यजुः ३- ऋजुभावापन्ना रेखा --- – यजुर्वेद: -यजुः यजु: प्रतिकृति: III

पृष्ठ 758

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शतपथब्राह्मण ( ६ ) - विष्कम्भ ( व्यास ) भावानुगतस्त्रिगुणितपरिणाहमण्डलपरिलेख: -प वि म्भः → हृदयम् ४६५ III

पृष्ठ 759

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४६६ . जातो मूर्तिमाह " ऋग्म्या सर्वशो साम परिणाहः - प्रथमकाण्ड ( ७ ) - छन्दों वेदप्रतिकृतिप्रदर्शनात्मकः परिलेख: ---ऋक् विष्कम्भः . यजुः हृदयम्

पृष्ठ 760

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- मूर्त्तिः स्कन्धः वितानम् 0 : वेद छन्दो शतपथब्राह्मण - मूर्तिः स्कन्धः विष्कम्भः → योग्यः वितान पार्श्वबिन्दुः-: d : परित एवं Uj मध्यबिन्दुः- > अ 000000000 योग्य वितान -: पावबिन्दु ४६७ ( ८ ) - अणु - सन्ध - प्रतिकृतिप्रदर्शनात्मकः परिलेख: -