Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 761–770

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 761–770

पृष्ठ 761

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= मंडलम् महिम ) ( मूत्तिः स्कन्धः व्यासः केन्द्रबिन्दु ( ६ ) - व्यासाविन्दुवितानपरिलेखः— प्रथमकाण्ड 0000

पृष्ठ 762

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C ( १० ) - व्यासा गुसाहस्रीवितान परिलेखः-शतपथब्राह्मण ( भतव्यासानां परितो वितानम् ) चोर्ध्वमधश्व उस्रा पश्चादवादक मण्डलयन्त पुरञ्च तन्महिमस्वरूपम् । सर्वादिशो ---रवेरिवोद्भय नाभेः प्रावृण्वते || नित्यदा महिमान्वितमेव धत्ते विग्रहं द्विविधोऽपि स । स्वभावतः द्विधा भवत्यगुस्कन्धविभेदतो प्राणमयो प्रजापतिः :) : -पिण्ड मूर्त्ति : ( स्कुन्ध समष्टिरेव हबिन्दु -[ . 10000०००००००००००० :) सम्पादका ( मूर्ति समष्टिरेवा॒णवः हृद‌बिन्दु G ००००० . o oe gou ...... 20800000 a समष्टिरेव हृदबिन्दु भूतव्यासाः 000 0000 0000000000 Doooo coooo oooo ... हृ‌बिन्दु ॥ । पुरुषः रहस्यम् नु एतावानस्य इति जनिष्यमाणः । किञ्च ज्यायाश्च प्रजापतिहृदयमेव प्रजापतिरेव । एव उ यदिदं तो । सर्वमु स । सर्वं प्रजापतिः वै जातः एव महिमा पृष्ठम् 1 श्रनिरुक्तो । उ स । प्रजापतिरुवेवेदं गर्भे अनिरुक्तम् वै चरति ममष्टिरव हृदयं ४६६

पृष्ठ 763

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प्रथम काण्ड ( ११ ) -छन्दोवेदात्मक– विष्कम्भवितानपरिलेखः— सहस्रम महिमानः सहस्रधा तदैक्यम् सम्पद्यते व्यास्भुवामनामित्यं स्थानमेतद् पार्वाणु तद्वदिहोत्तरेषाम् || तिर्य्यग् स भजते उत्तरस्याय ततोर्ध्वम् निहितैक्यसिद्धाणु ॥ रसस्य महिम्ना कूटस्थित । नाभि: : सयुजां - - -५०० अणोरणीयान् ← पाः महीयान् महतो व्या साः क्ष यावद्ब्रह्म विष्ठितं तावती वाकू सक ह्युत्तरस्मिन् पृष्ठेऽणवः न ॥ हसत्युत्तरमुत्तरञ्च स्यात् श्रात्मा नभ्य व्यासो । क्रमः द्वौ तु पूर्वस्य तदित्थम् यावदेते हि पूर्वस्य क्रमतेक्रमात्प्रतिब्यासमयं सन्ति भवतस्तु सर्वे ॥ विदिकस्थौ तावनुसृत्य प्रतिमूर्त्तिमेतम् व्यासोयौ प्रकल्प्याः । व्यासः तेषाम् कूटस्थव्यासोऽक्षरमयः

पृष्ठ 764

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शतपथब्राह्मण ( १२ ) विष्कम्भ - मूर्ति - वितान - समष्टिपरिलेख: -उहच बिन्दु Beee 00000004 00000 1000000000 bee beco नम्यबिन्दु पार्श्ववर्ती अशुद ५०१ 16-05 आविर्भाव-का व्यासकेन्द्रों उत्तर से व्यासाद्रय पार्श्ववर्त्ती के केन्द्रबिन्दुओं व्यासानुगत -

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प्रथमकाण्ड ( १३ ) - व्यासानुगतपरिणाहसास्री वितानपरिलेख: -( भूतव्या सानुगत - परिणाभावानां परितो वितानम् ) पूर्णम् 158 ५०२

पृष्ठ 766

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शतपथब्राह्मण ( १४ ) - प्रक्रान्तरेस - सहस्रमामवितान परिलेखः ----उदृचबिन्द्र महिमा मंडल 500000 * 90000 उत्तरव्यासका नभ्यबिन 100000 200000 पाश्र्ववत्ता बिन्दुदय व्यासकेन्द्र भूतव्यास, और उदृचत्रिन्दु के मध्य में सहस्र महिमामण्डलों की कल्पना है 00000000000000000 भूत ५०३ व्यास

पृष्ठ 767

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प्रथमकाण्ड ( १५ ) - अभिप्लवस्तोमार्कवितानपरिलेख: -सहस्राश मडलम् प्रामतमा प्रभा H 20 ऐ ऐ केन्द्रस्थ विराट न्यून I ७ ६ शतस्यदशत् १००० सहस्रम् १00. " दशतादशशतम् एकम दशम एकस्य साम उद्यचसंज्ञकनिधन सहस्रसाम्नामन्य साम ५०४

पृष्ठ 768

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शतपथब्राह्मण ( १६ ) - परिणाहात्मकसाममण्डलवितानपरिलेख: -पृष्ठ्यस्तोम मंडलसमष्टिः भिप्तवस्तोम ५०५ उत्तरोत्तर बड़े होते हुए - " पर उर्व्य: मंडल - वितान वेद सामवेद -उत्तरोत्तर छोटा होती हुई परी मूर्तियों

पृष्ठ 769

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प्रस्तावना ( १७ ) - परिणाहात्मक सहस्रसाम वितानपरिलेख ः— 101010 000 उत्तर मंडलम साम मूर्ति मंडलम् यजु पूर्व मंडलम् ऋक ० पंज साम यजु ऋक यजु साम यजु त्रडक यजुः साम: यजु ० सर्ववेज: सामरूप्यं दृशम्वत् छन्दोवेदत्रयी ऋक् मूर्तिमंडल यजु ऋक्साम के बीच में है. 50000 ५०६ साम यजुः ऋक् ०००० मूर्तिभावाः यजूंषि पर्वोंत्तर मण्डले ऋक्सामे

पृष्ठ 770

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(? ) ---शतपथब्राह्मण II 1000000c O + 20000 III II Poooooo0000000E ----III 200000000 Em III IIII I-साममंडलानि । वास्तु यज ५०७