Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 771–780
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 771–780
पृष्ठ 771
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड ( १६ ) -सूर्य्यानुगत- उक्थामद ( मूर्त्ति ) वितानपरिलेख: — हि 1000000000000000 @ ooo000000000 , मा 00000000000000000009ape000000000 160000000000000000000000000 ooooooooooo00000000000000000000000000oooooooooooooooooooo000000000000 0000000000oooooooooooooooooooooooo I 0000006 00000000000000000 600000000000000000 @googoogoog booooooooo000000000000000000000 0000000000000000000000000d oooooo00000000000000000f 0000000000000000000 000000000 10000 0000 good 0000 % 000000000000pooo 1000000000000.ooooooooooooooooo • pcooooooooooooooooooood pooooo0000000000000000000boooooooooooOD प्ड ५०८
पृष्ठ 772
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण ( २० ) - सप्तदेवच्छन्दोमय - सौररथचक्रपरिलेख: -II कर्क वृत्तम 8 " मकरवृत्तम् I १२ for tat उपक्रम: ऋक् त्रयी मूर्ति सूर्य्य: -मध्यः यजुः अवसानम् -92 -साम. 8 दक्षिण ५०६ जयंती ( 3 ) 12 त्रिष्टुप् ( ६ ) ११ ( ५ ) १० → बृहती ( ४ ) d अनुष्टुप ( ३ ) ट उष्णिक् ( २ ) गायत्री ( १ ) ६
पृष्ठ 773
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
५१० पृष्ठ्यः अभिप्लवः .. आङ्गिरसः आदित्याः प्रथमकाण्ड ( २१ ) - मण्डलात्मक- पृष्ट्य- रश्म्यात्मक- अभिप्लव- मण्डलस्वरूपपरिलेख: -है. पृष्ठ्य मंडलभाव पिए है अभिप्लव रश्मिभाव
पृष्ठ 774
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण परिलेखानुगत उक्त् सत्यवेद ऋक्साम - यजुः के भेद से त्रिधा विभक्त है । एवं यही प्रत्केक वस्तु का आत्मा है । ' सूर्य आत्मा जगस्तस्थुषश्च ' के अनुसार त्रयीमय सूर्य्य ही स्थावर - जङ्गम का आत्मा बनता है । एवं सूर्य के आधार पर ही सम्पूर्ण देवता प्रतिष्ठित हैं । इसी आधार पर ' त्रिः सत्या वै देवाः ' यह कहा जाता है ॥ ‘ वेदाः सत्यम् ' के अनुसार वेद सत्य है । एवं वह त्रिकल है । इसी त्रिकल - ' वेदसत्य ' पर देवता प्रतिष्ठित हैं । अतएव बिना त्रित्त्व के किसी विषय पर देवता की सत्यनिष्ठा नहीं होती । यही कारण है कि, सम्पूर्ण विश्व में ' सत्यप्रतिष्ठा ' का आधार ' त्रित्त्ववाद ' ही प्रमाणित होरहा है । ' शान्तिपाठ ' तीन बार करना पड़ता है । न केवल वैदिक व्यवहार में हीं, अपितु लोकव्यवहार में भी इस त्रित्त्ववाद का सर्वात्मना साम्रा-ज्य है । मिलिट्री का सिपाही अपरिचित को आता देख कर तीन बार आवाज देता है । तीन बार की आवाज से न बोलने पर ‘ फायर ' कर देता है । न्यायालयों में वादी - प्रतिवादी को तीन बार ही ' आवाज ' दिलाई जाती है | वैद्य रोगी पर अपनी औषधि का फलाफल तीन दिन में हीं निश्चित कर पाता है । इन सब त्रिर्भावों का कारण वही ' त्रिकलवेदमूर्त्ति संत्यात्मा ' है । चिना तीन के उस का पूर्ण स्वरूप निष्पन्न ही नहीं होता! इसी त्रित्त्व के आधार पर निम्न लिखिता ' त्रयीसमष्टि ' प्रक्रान्त है । इस के निदर्शन से पाठकों को विंदित होगा कि, ‘ वेदत्रयी ' ही सबका मूल है । एवं उसी के त्रित्त्व से सम्पूर्ण भाव आक्रान्त हैं । सप्त - पञ्च - त्रिः- द्वि - एक - नव - दश- एकादश - द्वादश- त्रयोदश -- आदि सभी संख्याओं के आधार पर श्रुतियों में भिन्न भिन्न पारिभाषिक निगम, अनुगम वचन प्रचलित हैं । पूर्व में हमने ‘ पञ्चावयवयज्ञ ' की ' पाङ्तता ' का संक्षिप्त विवेचन किया था । यहाँ प्रसङ्गागत ' त्रित्त्ववाद ' की ओर ही आपका ध्यान श्राकर्षित किया जाता है । ऋगु - यजु: - साम - रूपा ' वेदत्रयी ' के आधार पर ही देवता प्रतिष्ठित हैं । ग्रतएव देवता त्रिःसत्य हैं । एवं ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' के अनुसार उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थ देवमय हैं । श्रतएव सृष्टिधारा त्रित्त्ववाद को आधार बना कर ही प्रक्रान्त है । उन त्रित्त्वों में से कुछ एक त्रिकों का अत्र नामोल्लेखमात्र कर दिया जाता है । १ पृथिवी ( भूः ) [ १ ] २ अन्तरिक्षम् ( भुव:) १ ऋक् इति त्रयो लोकाः [ २ ] २ यजुः इति त्रयो वेदाः ३ द्यौः ( स्वः ) ३ साम १ श्रग्निः १ वसवः [ ३ ] २ वायुःदेहर > इति त्रयो - देवाः [ ४ ] २ रुद्राः इति त्रयोऽधिदेवाः ३ श्रादित्यः ३ श्रादित्याः ५११
पृष्ठ 775
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड २ मनुष्याः १ गार्हपत्याग्निः [ ५ ] २ पितरः इति तिस्रः प्रजाः [ ६ ] २ दक्षिणाग्निः इति त्रयोऽग्नयः ३ देवाः ३ श्राहवनीयाग्निः १ गायत्री १ मा [ ७ ] २ त्रिष्टुप इति त्रीणि छन्दांसि [ ८ ] २ प्रमा इति वा त्रीणि छन्दांसि ३ जगती ३ प्रतिमा १ वसन्तः [ ६ ] २ ग्रीष्मः १ मनः इति ऋतवः [ १० ] २ प्राणः ३ वर्षाJ } इति श्रात्म कलाः ३ वाक् १ ब्राह्मणः [ ११ ) २ क्षत्रियः ३ वैश्यः इति वर्णाः १ वेदाः [ १२ ] २ नियतिः ३ सूत्रम् } इति स्वायम्भुवमनोताः १ भृगुः [ १३ ] २ अंगिरा: १ इड़ा इति पारमेष्ठ्यमनोता: [ १४ ] २ ऊर्क् ू } इति वा पारमेष्ठ्यमनोताः ३ अत्रिः ३ गौ: १ ज्योतिः १ रेतः [ १५ ] २ गौः इति सौरमनोताः [ १६ ) २ श्रद्धाः} इति चान्द्रमनोताः ३ श्रायुः ३ यशः ५१२
पृष्ठ 776
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ वाक् [ १७ ] २ गौः इति पार्थिवमनोताः ३ द्यौः १ भर्गः इति तेजांसि [ १६ ] २ महः ३ यशः १ रथन्तरम् [ २१ ] २ वैरूप्यम् इति पार्थिवसामान ३ शाक्वरम् १ वाक [ २३ ] २ आपः } इतिशुक्राणि ३ अग्निः १ वात: इति धातवः [ २५ ] २ पित्तम् ३ कफम् १ शिरः [ २७ ] २ उर: } इति शरीरपर्वाणि ३ उदरम् शतपथब्राह्मण १ आपः [ १८ ] २ वायुः इति भृगवः ३ सामः १ उक्थम् [ २० ] २ ब्रह्म इति श्रात्मभाषा: ३ साम १ बृहत् [ २२ ] २ वैराजम् इति सौरसामान ३ रैवतम् १ जाति: इति कर्म्मनिबन्धनानि } [ २४ ] २ आयुः ३ भोगाः १ शिरा [ २६ ] २ स्नायुः इति नाड्यः ३ धमनी १ इड़ा [ २८ ] २ पिङ्गला इति नाड्यः ३ सुषुम्णा ५१३
पृष्ठ 777
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ श्रव्ययः [ २६ ] २ अक्षरः । इति पुरुषाः २ क्षरः १ आकृतिः इति महत्कलाः [ ३१ ] २ प्रकृतिः ३ ग्रहंकृतिः १ मनता - इति अवस्थाः [ ३३ ] २ तरलता ३ विरलता १ बाल: अवस्थाः [ ३५ ] २ युवा ३ वृद्धः १ उक्थम् } [ ३७ ] २ अर्काः वृत्तयः ३ शीतयः १ इच्छा [ ३६ ] २ तप: श्रात्मव्यापारत्रयी ३ श्रमः प्रथमकाण्ड १ सत्त्त्र: [ ३० ] २ रजः इति गुणाः ३ तमः १ श्रात्मा [ ३२ ] २ प्राणाः इति प्राजापत्यकलाः ३ पशवः १ जाग्रत् [ ३४ ] २ स्वप्नः - अवस्थाः ३ सुषुप्तिः १ सत् २ चित् [ ३६ ] ब्रह्मकला: ३ श्रानन्दः १ नाम } [ ३८ ] २ रूपम् अम्वनि ३ कर्म १. प्रातः कालकलाः [ ४० ] २ मध्याह्नम् ३ सायम् ५१४
पृष्ठ 778
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
१ सृष्टिः [ ४१ ] २ स्थितिः महाकालकलाः ३ विनाशः १ असंगः } [ ४३ ] २ उदारः सम्बन्धाः ३ समवायः १ तेजः [ ४५ ] २ आपः भूतकलाः ३ अन्नम् १ इष्टिः } [: ७ ] २ पशुः यज्ञाः ३ सोमः १ सृष्टम् ( विश्वम् । ३ प्रत्रिविक्तम् ( विश्वातीतः ) १ नरकम् } [ ५१ ] २ स्वर्गः श्रात्मगतयः ३ अपवर्गः शतपथब्राह्मण १ ब्रह्मा २ विष्णुः > सृष्टिसाक्षिण: [ ४२ ] ३ शिवः १ श्रात्मा [ ४४ ] अध्यात्मकलाः २ सत्वम् ३ शरीरम् १ व्यक्तिः } [ ४६ ] २ श्राकृतिः अभिव्यक्तयः ३ जातिः १ यज्ञायज्ञियम् } [ ४८ ] २ वारवन्तीयम् सामान ३ श्रान्तीयम् १ ज्ञानशक्तिः शक्तयः ३ अर्थशक्तिः १ ज्ञानम् [ ५२ ] २ कर्म काण्डानि ३ उपासना ५१५ [ ४६ ] २ प्रविष्टम् ( विश्वात्मा ) ( ब्रह्मणोऽवस्थाः [ ५० ] २ क्रियाशक्तिं
पृष्ठ 779
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमकाण्ड १ सविषयकं सांसारिकं ज्ञानम् १ ज्ञाता [ ५३ ] २ ईश्वरविषकं सोपाधिकं ज्ञानम् ( ज्ञानत्रिपुटि: -[ ५४ ] २ ज्ञानम् प्रत्ययत्रिपुटि: ३ मुक्तिसाधकं निष्कैवल्यं ज्ञानम् ३ ज्ञेयम् १ यज्ञः [ ५५ ] २ तपः विद्यासमुच्चितकर्माणि ३ दानम् १. इष्टम् [ ५६ ] २ आपूत्तम् | ' विद्यानिरपेक्ष कर्माणि ३ दत्तम् १ कर्त्ता १ सत्यवती [ ५७ ] २ करणम् ३ कर्म कर्म्मत्रिपुटिः [ ५८ ] २ अङ्गवती} उपासना: ३ अन्यवती न केवल सनातनधर्म्मावलम्बी ही इस त्रित्ववाद से सम्बन्ध रखते हैं । अपितु चर चर, सभी इस त्रित्त्व से आक्रान्त हैं । लौकिक कर्म्म हो, अथवा पारलौकिक, सत्रका कोई न कोई मूल कारण अवश्य रहता है । अपने आपको परम वैज्ञानिक समझने वाले कितने हीं महानुभाव कितनीं हीं बातों को ‘ बाईचान्स ' कह कर उनके मूलकारण को खोजने की चेष्टा से वञ्चित रह जाते हैं । ' बाई चान्स ' का अर्थ उनकी दृष्टि में ' निर्मूल – कार्य्यकारणमावशून्य ' है । जिसका कोई कारण न हो, जो यों ही होजाय, उसे ही ये महानुभाव ‘ बाईंचान्स ' कहते हैं | परन्तु ऐसा समझना भारी भूल है । ' बिना कारण के कोई भी कार्य्य नहीं हो-सकता ', यह निश्चित सिद्धान्त है । हाँ, वह कारण अज्ञात होसकता है । अज्ञात कारण के द्वारा होने वाले कार्य्य के लिए ही सस्कृतसाहित्य में ' दैवात् ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ' दैवसंयोग से ऐसा होगया'- इसका अर्थ यह नहीं है कि, बिना हीं कारण के कार्य्य होपड़ा । अपितु अज्ञातकारण के लिए ही दैवात् कहा जाता है । जो कारण हमारी दृष्टि से परे है, मानना पड़ेगा कि, उसके कर्त्ता त्रैलोक्य - व्यापक प्राणदेवता ही हैं । इह्रीं को लक्ष्य में रख कर ‘ दैवात् ' कहा जाता है | भला, बुरा, सबकुछ इह्रीं प्राणदेवताओं की प्रेरणा पर अवलम्बित है । वे क्योंकि त्रिसत्य हैं । अतएव सम्पूर्ण प्रपञ्च तीन कलाओं से युक्त रहता है । त्रित्त्व-सम्बन्धी कुछ एक निदर्शन पूर्व में उद्धत हुए हैं । अब कुछ निदर्शनों की ओर पुनः आपका ध्यान आकर्षित किया जारहा । इससे आपको विदित होगा कि, त्रित्त्व की व्याप्ति किस सीमापर्यन्त अनुधावन कर रही है, एवं त्रित्त्ववाद — प्रतिपादक त्रिकलवेद किस प्रकार से – “ भूतं भव्यं भवञ्चैव सर्वं वेदात् प्रसिद्ध्यति ” इस मनुवचन को चरितार्थ कर रहा है । ५१६
पृष्ठ 780
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शतपथब्राह्मण भला बुरा, ऐहलौकिक, पारलौकिक, सम्पूर्ण प्रपञ्च ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' इस निगमश्रुति के अनुसार देवताओं से ही आक्रान्त है । देवता ही सबके मूलप्रभव हैं । इधर देवता ' वेदत्रिसत्य ' के कारण त्रिसत्य हैं । श्रतएव सम्पूर्ण प्रपञ्च इस ' त्रिसत्य ' से श्राक्रान्त है, जैसाकि निम्नलिखित कतिपय त्रिकों से सर्वथा स्पष्ट होजाता है— १ ईश्वर १ औौषश्लेषिक विराट् [ ] २ जीव तत्त्वत्रयी [ २ ] ३ प्रकृति २ वैषयिक ३ अभिव्यापक धारत्रयी [ ३ ] २ हिरण्यगर्भ ईश्वरत्रयी ३ सर्वज्ञ १ वैश्वानर | १ विश्वेश्वर १ ब्रह्मर्षि [ x ] २ तैजस जीवत्री [ ५ ] २ विश्वकर्त्ता साक्षी [ ६ ] २ देवर्षि ऋषित्रयी ३ प्राज्ञ १ संचित ३ विश्वात्मा ३ राजर्षि १ अकर्मक १ क्रिया [ 3 ] २ प्रारब्ध | कर्म्मत्रयी [ ८ ] २ सकर्मक कर्मत्रयी ३ क्रियमाण ३ प्रेरणार्थक [ ६ ] २ पूर्वकालिकक्रिया | क्रियात्रयी ३ संभावनार्थक्रिया १ सालग्राम १ माता [ १० ] २ नन्दीग्राम ग्रामत्रयी [ ११ ] २ पिता ३ सवलग्राम ' १ गुरु गुरुत्रयी [ १२ ] २ विद्या संहितात्रयी ३ श्राचार्य ३ शिष्य १ पिता १ संज्ञ १ धातु [ १३ ] २ पुत्र ३ माता संहितात्रयी [ १४ ] २ अन्तःसंज्ञ प्राणित्रयी [ १५ ] २ मूल भूतसर्गत्रयी ३ ससंज्ञ ३ जीव ५१७