Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 781–790
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 781–790
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१ सत्वविशाल प्रथम काण्ड १ जलचर १ श्रध्यात्मिक [ १६ ] २ रजोविशाल चान्द्रसृष्टित्रयी [ १७ ] २ थलचर अनात्म्यजीव [ १८ ] २ श्राधिभौतिक तापत्रयी त्रयी ३ तमोविशाल ३ नभचर ३ श्राधिदैविक १ विजातीय ' १ जहत् १ कतृ प्रधान [ १६ ] २ सजातीय भेदत्रयी [ २० ] २ अजहत् लक्षणात्रयी [ २१ ] २ कर्मप्रधान | वाक्यप्रकार ३ स्वगत ३ जहदजहत् ३ भावप्रधान १ स्थूल [ २२ ] २ सूक्ष्म १ कृतात्मा ( मुक्त ) १ प्रथम शरोरत्रयी [ २३ ] २ आरुरुक्षु ( मुमुक्षु ) मानव [ २४ ] २ मध्यम पुरुष ३ कारण ३ अकृतात्मा ( विषयी ) । ३ उत्तम १ एकवचन १ रूढ १ लिङ्ग [ २५ ] २ द्विवचन वचनत्रयी [ २६ ] २ यौगिक संज्ञाभेदत्रयी [ २७ ] २ वचन संज्ञाभंग ३ बहुवचन-१ स्वर संधि ३ योगरूढ ३ का १ अङ्कगणित १ पद [ २८ ] २ व्यञ्जन संधि सन्धित्रयी [ २६ ] २ रेखागणित गणितत्रयी [ ३० ] २ वाक्य तर्की ३ विसर्गसंधि ३ बीजगणित ३ न्याय १ स्फोट १ जठरानल १ - पुरुष [ ३१ ] २ स्वर शब्दब्रह्मत्रयी[ ३२ ] २ दावानल नलत्रयी [ ३३ ] २ - प्रकृति | तत्त्वत्रयी ३ वर्ण ३ बडवानल १ हरीत कि [ ३४ ] २ विभीतक त्रिफलात्रयी १ भूत [ ३५ ] २ वर्त्तमान २- विकृति १ सोंठ कालत्रयी [ ३६ ] २ मिर्च त्रिकुट त्रयी ३ श्रामलक ३ भविष्य ३ पीपल ५१८
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शतपथब्राह्मण १ दान १ नित्यगति [ ३७ ] २ भोग वित्तगतित्रयी [ ३८ ] २ सांपरायगति ३ नाश ३ ब्रह्मगति १ ब्रह्मसंस्कारा गतित्रयीं [ ३६ ] २ देवसंस्कार संस्कारत्रयी ३ भूतसंस्कार १ दोषमार्जन १ प्रत्यक्ष .१. काल ' [ ४० ] २ अतिशयाधान संस्कार-प्रकारत्रयी [ ४१ ] २ अनुमान प्रमाणत्रयी [ ४२ ] २ स्वभाव नियतित्रयी ३ हीनाङ्गपूर्ति १ परक १ [ ४३ ] २ कुम्भक प्राणायाम ३ प्राप्त ३ कम्म १ ब्रह्म १. काली [ ४४ ] २ क्षत्र वीर्य्यत्रयी [ ४५ ] २ लक्ष्मी शक्तित्रयी त्रयी ३ रेचक ३ वि ३ सरस्वती १ कायिक १ द्वैत १ जिन [ ४६ ] २ वाचिक पुण्यपाप [ ४७ ] २ अद्वैत आस्तिक- [ ४८ ] २ बुद्ध नास्तिक भेदत्रयी त्रयी भेदत्रयी ३ मानसिक ३ विशिष्टाद्वैत ३ अर्हन् १ दिगम्बर १ रम्भा १ हीनयोग [ ४६ ] २ श्वेताम्बर जिनत्रयी [ ५० ] २ मेनका अप्सरात्रयी [ ५ ९ ] २ प्रतियोग योगत्रयी ३ दूदिया ३. उर्वशी ३ मिथ्यायोग | १ अशन १ यन्त्र १ रोग [ ५२ ] २ वसन शरीरयात्रा [ ५३ ] २ मन्त्र साधनत्रयी निगमत्रयी [ ५४ ] २ शोक व्याधित्रयी ३ शयन ३ तन्त्र ३ परिताप १ ऐरावत १. गरुड़ [ ५५ ] २ उच्चैःश्रवापशुश्रेष्ठत्रयी [ ५६ ] २ हंस १ निम्ब पक्षिष्ठ [ ५७ ] २ तुलसी वायुशोधकवृक्षत्रयी ३ कामधेनु त्रयी ३ मयूर ५१६ ३ श्रामलका
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· प्रथमकाण्ड निदर्शनमात्र है । इन त्रिकों का एकमात्र कारण वही हमारा ' त्रि सत्यवाद है । आत्मा त्रिसत्य है, इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि, बिना तीन के सत्यनिष्ठा होती ही नहीं ॥ इसी सत्यनिष्ठा - प्राप्ति के लिए प्राणायाम - आचमन - शान्तिपाठ, आदि तीन तीन बार ही किए जाते हैं । इसी त्रिसत्य को आधार मान कर त्रिसत्य वेद के लिए भगवान् को - त्रैगुण्यविषया ' वेदा निस्त्रैगुण्यो भावार्जुन! ' यह कहना पड़ा है । प्रसङ्गात् त्रिसत्यवाद का निदर्शन कराया गया । ऋत्र पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । आपोमय परमेष्ठी के केन्द्र में प्रकट होने वाला महोक्थ, महाव्रत, पुरुषरूप, अग्निमय सूर्य्य साक्षात् सत्यवेद है । पूर्व में इसी अग्निमूर्ति सत्यवेद का निरूपण किया गया है । अत्र प्रकारान्तर से वेदतत्त्व का निरूपण किया जारहा है । ईश्वर वेदमूर्त्ति है । वेदमूर्त्ति ईश्वर - प्रजापति यज्ञमय है । पाको वै यज्ञः ' के अनुसार वह प्रजापति स्त्रयम्भू, परमेष्ठी, सूर्य, पृथिवी, चन्द्रमा, भेद से पञ्चावय है । स्वयम्भू प्राणमय है, परमेष्ठी आपोमय है, सूर्य्य वाङ्मय है, पृथिवी अन्नादमयी है, एवं चन्द्रमा अन्नमय है | प्राणमय स्वयम्भू के अधिष्ठाता देवता ‘ ब्रह्मा ’ हैं | आपोमय परमेष्ठी के अधिष्ठाता ' विष्णु ' हैं । वाङमय सूर्य्य के अधिष्ठाता ‘ इन्द्र ’ हैं । ऋन्नादमयी पृथिवी के अधिष्ठाता ' अग्नि ' हैं । एवं अन्नमय चन्द्रमा के अधिष्ठाता ' सोम ' हैं । ये पाँच ही देवता ससार के प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण हैं । ' व्यक्तिस्तु पृथगात्मता ' के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपना स्वतन्त्र ‘ आत्मा ' रखता है । श्रानन्द - विज्ञान - मनः - प्रारण - वाक् - भेदभिन्न पञ्चकल अव्ययपुरुष का ही नाम ' आत्मा ' है । इस आत्मा में ' अन्तर्यामी - सूत्रात्मा ', भेद से दो अक्षर प्रतिष्ठित रहते हैं । वस्तु-पिण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठत होकर उस वस्तु का अपनी स्वाभाविक नियति से नियमन करने वाला तत्त्व. ही ‘ अन्तर्य्यामी ' है । एवं हृदय के आधार पर प्रतिष्ठित होकर अन्तःसूत्र, और बहिःसूत्र से वस्तुपिण्ड का निर्माण करने वाला तत्त्व ही ' सूत्रात्मा ' है । हृदय में प्रतिष्ठित रहने वाला अन्तर्यामी ' हृ - दु - य- ' भेद से त्रिकल है | ' हृ ' विष्णु है । ' द ' इन्द्र ' है । ' यम् ' ब्रह्मा है । प्रत्येक वस्तु में आदान, विसर्ग, नियमन, भेद से तीन शक्तियाँ प्रतिष्ठित रहतीं हैं । आदानशक्ति का उक्थ ब्रह्म साम - विष्णु है । विसर्गशक्ति का उक्थ ब्रह्म साम – इन्द्र है । एवं नियमनशक्ति का उक्थ - ब्रह्म- साम - ब्रह्मा है । वस्तु पिण्ड ' पुर ' है । इसके निर्माता इन्द्र, अग्नि, सोम, ये तीन देवता हैं । इसप्रकार वस्तुकेन्द्र, और वस्तुपिण्ड, भेद से. पूर्वोक्त पाँचों देवता पूर्वोक्त दो भागों में विभक्त होजाते हैं । इन में ब्रह्मा विष्णु - इन्द्र, ये तीनों ' विष्णु ' शब्द से व्यवहृत होते हैं । कारण इसका यहीं है कि— " सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्म्मणि ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार आध्यात्मिक पक्ष में ' विष्णु ' शब्द से ' अन्तर्यामी ' का ग्रहण किया जाता है । एवं ब्रह्मा - विष्णु -- इन्द्र तीनों की समष्टि ' अन्तर्यामी ' है । इधर इन्द्र, अग्नि, सोम, तीनों की समष्टि ‘ शिव ' कहलाती है । ' यो लोकस्य कर्त्तारो ब्रह्म - विष्णु - महेश्वराः ' के अनुसार पुराणने इन्द्र, अग्नि, सोम, तीनों का ' शिव ' शब्द से ही ग्रहण किया है । हृदयपृष्ठ, अन्तः पृष्ठ, बहिः पृष्ठ पारावतपृष्ठ, भेद से प्रत्येक पदार्थ चतुःपृष्ठ होता है । वस्तु केन्द्र ' हृदयपृष्ठ ' है । वस्तुपिण्ड ' अन्तःपृष्ठ ' है । वस्तुपिण्ड से बाहिर निकल कर अपना महामण्डल बनाने वाला महाप्राणमण्डल ३३ अहर्गणों से युक्त है । इन में २१ वे अहर्गण पर्य्यन्त वहिःपृष्ठ है, एवं ३३ पर्य्यन्त पारावतपृष्ठ है । इन चारों पृष्ठों में हृत्पृष्ठ - अन्तःपृष्ठ— ५२०
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शतपथब्राह्मण बहिःपृष्ठ, इन तीनों में तो विष्णु की ( ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र की ) व्याप्ति रहती है, एवं अन्तः पृष्ठ, बहिःपृष्ठ पारावत्नपृष्ठ, इन तीनों में शिव की ( इन्द्र - अग्नि - सोम की ) व्याप्ति रहती है । विष्णु की प्रतिष्ठा शिव है, तो शिव की प्रतिष्ठा विष्णु है । दोनों अविनाभूत हैं । जबतक हृदय हैं, तभीतक अन्तः - पृष्ठ - बहिःपृष्ठ-पारावत - पृष्ठरूप शिवमण्डल की सत्ता है । एवं जबतक अग्नि - सोमात्मकं यज्ञमूर्ति शिव की सत्ता है, तभी तक विष्णुमण्डल की सत्ता है । इसी पारस्परिक प्रतिष्ठा को लक्ष्य में रख कर सर्वस्व ( पुराण ) ने कहा है-" शिवस्य हृदयं विष्णुर्विष्णोव हृदयं शिवः । पूर्व में हमने इन्द्र को ' वाङ् मय ' बतलाया है. अग्नि को ' अन्नादमय ' बतलाया है, सोम को ' अन्न — मय ' बतलाया है, एवं तीनों की समष्टि को ' शिव ' कहा है । इस इन्द्राग्निसोममूर्ति शिव के अधिकार में वाक्-अन्नाद - अन्नरूप अन्तःपृष्ठ - बहिः पृष्ठ - पारावतपृष्ठात्मक तीन पुर हैं । शिवाधिष्ठित इनं तीनों पुरों में अन्त-र्य्यामी विष्णु [ ब्रह्मा - विष्णु-- इन्द्र ] का वीरण होता है । ब्रह्मतत्त्व पर [ जोकि प्रतिष्ठारूप है ] इन्द्र, और विष्णु की स्पर्द्धा होती है 1 | इसी स्पर्द्धा का नाम वीरण है । इस स्पर्द्धा से क्रमश: वेद, लोक, वाक इन तीन साहस्रियों का जन्म होता है । वेदसाहस्री ब्रह्ममूला है, और यह प्राणमयी है । लोकसाहस्री विष्णु-मूला है, एवं यह आपोमयी है! एवं वाक्साहस्त्री इन्द्रमूला है, एवं यह वाङ्मयी है । इसी साहस्री--विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है—
" उभाजिग्यथुर्न पराजयेथे न पराजिज्ञे कतरश्च नैनोः ।
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्र वितदैरयेथाम् " ॥
‘ किंतत् सहस्रमिति - इमे लोका:, इमे वेदाः, अथो वागिति ब्रूयात्, इति । मूल में वेदसाहस्री है । उसके आधार पर लोकसाहस्री है | लोकसाहस्री पर वाक्साहस्त्री है । यही प्रजा है । वेद - लोक - प्रजा - मयी तीनों साहस्रियाँ शिवगर्भित अग्नि - सोम के भेद से द्विधा विभक्त होजातीं हैं । परमेष्ठी में उत्पन्न होने वाला गोतत्त्व सहस्रधा विभक्त है । उस का वेद - लोक - प्रजा, इन तीनों से सम्बन्ध होता है । अतएव तीनों सहस्र भावापन्न होजाते हैं । ऋग, यजुः, साम, ये तीनों वेद, पृथिवी - अन्तरिक्ष- द्यौ - ये तीनों लोक, एवं अग्नि - वायु - आदित्य, ये तीनों देवता - अग्निमय हैं । अग्नि के सम्बन्ध से गोसाहस्री -वेद - लोक-प्रजा - स्वरूपों में विभक्त होजाती है । एवं अथर्ववेद, आपोलोक -- पितर, इस त्रयी भैद का कारण सोम है | इसप्रकार अग्नि, सोम के भेद से साहस्री दो भागों में विभक्त होजाती हैं । सहस्र गोमय वषट्कार – मण्डल में हमने पूर्व के प्रकरणों में ३३ अहर्गण बतलाए हैं । इन में २१ वे अहर्गण पर्य्यन्त अग्निमयी साहस्री की सत्ता है, एवं २१ से ३३ पर्य्यन्त सोममयी साहस्री की सत्ता है । दूसरे शब्दों में- जहाँतक अग्नि की व्याप्ति है, वहाँतक तीन वेद, तीन लोक, तीन देवताओं की व्याप्ति है । एवं जहाँतक सोम की व्याप्ति है, वहां-तक आपोलोक, एवं पितरों की व्याप्ति है । इसप्रकार सम्पूर्ण विश्व अग्नि, सोममय होता हुआ वेद -- लोक-प्रजा से आक्रान्त है । इन तीनों में से लोक, और प्रजा को अप्राकृत होने से छोड़ते हैं । केवल ‘ वेदसाहस्री ’ की श्रोर ही आपका ध्यान आकर्षित करते हैं । ५२१
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प्रथमकाण्ड त्रयीवेद, एवं अथर्ववेद --भेद से वेद भागद्वय में विभक्त हैं । अग्निवेद त्रयीवेद है, एवं सोम-वेद अथववेद है । इन में अग्निवेद पृथिवी, सूर्य्यभेद से दो भागों में विभक्त है । दोनों में से पूर्व के ‘ सत्य-वेद ' प्रकरण में सूर्य्यवेद का निरूपण किया जाचुका है । दूसरा पार्थिववेद चितेनिधेय अग्नि के सम्बन्ध से पृथिवी, अन्तरिक्ष, - द्यौ, इन तीन भागों में विभक्त होजाता है । पिण्डपृथिवी के चारों ओर ३३ पर्य्यन्त अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाने वाली महापृथिवी है । इसे ही महावेदि कहते हैं । ' यात्रती वै वेदस्तावती पृथिवी ' [ शत ० ] के अनुसार यह महावेदि वेदमयी है । इस महावेदि-रूपा महापृथिवी के त्रिवृत् स्तोमपर्यन्त [ ६ पर्य्यन्त ] अग्निमय [ घनाग्निमय ] ऋग्वेद की सत्ता है । पञ्चदशस्तोम पर्य्यन्त [ १५ पर्यन्त ] वायुमय [ तरलाग्निमयं ] यजुर्वेद की सत्ता है । एकविंशस्तोमं पर्य्यन्त [ २१ पर्य्यन्त ] श्रादित्यमय [ विरलाग्निमय ] सामवेद की सत्ता है | एवं त्रयस्त्रिंशस्तोम पर्य्यन्त आपोमय अथ-र्ववेद की सत्ता है । त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश - त्रयस्त्रिंश, ये चारों स्तोम क्रमशः इस महापृथिवी के अवयत्र-भूत पृथिवी, अन्तरिक्ष, -यौ, - आप:, ये चार लोक हैं । चतुर्लोकात्मिका पृथिवी के २२ वे अहर्गण पर्य्यन्त अग्निवेद, किंवा त्रयीवेद है । ३३ वे ग्रहण पर्य्यन्त ' सोमवेद ', किंवा ' अथर्ववेद ' है । इस पार्थिवेद को ‘ यज्ञमात्रिकवेद ' कहा जाता है । जैसा कि पूर्व की तालिकाओं से स्पष्ट किया जाचुका है, ' कृष्णमृगचर्म्म-विद्या का इसी पार्थिव यज्ञमात्रिकवेद से सम्बन्ध है, जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट होनायगा । इसी यज्ञ-मात्रिक वेद को लक्ष्य में रखकर गोपथश्रुति कहती है— “ ऋचामग्निर्देवतं पृथिवीस्थानम् । यजुषो वायुर्दैवतमरिक्षस्थानम् । साम्ना-मादित्यदैवतं द्यौः स्थानम् । अथवणां चन्द्रमा दैवतमापः स्थानम् ' ' | -गोपथब्राह्मण अथर्ववेद को थोड़ी देर के लिए छोड़ दीजिए । एवं अग्निवेद पर ही दृष्टि - निक्षेप कीजिए । अग्नि-वेद त्रयीवेद है । वह आत्मा - प्रतिष्ठा - ज्योति -- भेद से तीन प्रकार का है । ' अस्ति ' यह प्रतिष्ठातत्त्व है । इस प्रतिष्ठा में ‘ आत्मा ' प्रतिष्ठित होकर ही प्रतिभासित होता है । वस्तुभाव ' ज्योतिर्वेद ' है । वस्तुप्रतिष्ठा ' प्रतिष्ठावेद ' है । प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित आत्मा ' आत्मवेद ' है । तीनों की समष्टि ही पदार्थ की उपलब्धि है । उपलब्धि वेदरूपा है । इसीलिए हमने पूर्व में उपलब्धि को वेद कहा है । आत्मा प्रतिष्ठित है । प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित ही आत्मा का भान होरहा है । इसप्रकार प्रतिष्ठा और भान हीं श्रात्मा की उपलब्धि है । इन तीनों में प्रतिष्ठाग्नि, किंवा प्रतिष्ठातत्त्व ही ऋग्वेद है । आत्माग्नि, किवा आत्मतत्त्व ही यजुर्वेद है, एवं ज्योतिरग्नि, किंवा ज्योतिस्तत्त्व ही - ' सर्व ' तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् ' के अनुसार सामवेद है । सम्पूर्ण विश्व समष्ट्या, व्यष्ट्या, उभयथा वेदमय है । प्रतिष्ठाग्नि पृथिवी स्थानीय है, यही ॠग्वेद है । आत्माग्नि अन्तरिक्षस्थानीय है, यही यजुर्वेद है । एवं ज्योतिरग्नि दिव्यस्थानीय है, यही सामवेद है | १ प्रतिष्ठाग्निः – प्रतिष्ठावेदः पार्थिवः - —- ऋग्वेदः | २ आत्माग्निः - आत्मवेदः -- श्रान्तरिक्ष्य: -यजुर्वेदः ३ ज्योतिरग्निः – ज्योतिर्वेदः - दिव्यः —— सामवेदः-मूर्त्तिः - अग्निः अग्निवेदः, गतिः – वायुः त्रयीवेदः तेजः – इन्द्रः ५२२
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शतपथब्राह्मण तीनों वेदों में तीनों वेदों का उपभोग है । दूसरे शब्दों में- प्रत्येक वेद ऋग्यजुः -साभ - भेद से त्रिधा विभक्त है । इन में प्रथम प्रतिष्ठावेदरूप ऋग्वेद के अवयवभूत ऋग्यजुः साम का ही अत्र दिग्दर्शन अपे— क्षित है । १ - प्रतिष्ठावेदः - ऋग्वेदः ( १ ) -आत्मभृतिः -स्थिरभाव ( ठहराव ) का नाम प्रतिष्ठा है । यह प्रतिष्ठातत्त्व आत्मधृति, असतोधृति, सतो -धृति, भेदसे तीन महिमाभावों में विभक्त है । इनमें प्रथमा ' आत्मघृति ' ' स्वप्रतिष्ठा ' कहलाती है, एवं आगे की दोनों प्रतिष्ठाएँ ' परप्रतिष्ठा ' नाम से व्यवहृत होतीं हैं । मनः- प्राण - वाक् की उन्मुग्धावस्था को ही ' सत्ता ' कहते हैं, जैसाकि उपलब्धिवेद - निरूपण में बतलाया जाचुका है । घट है, ' इस वाक्य में जो ' ' अस्ति ' भाव है, वही ' आत्मधृति ', किंवा ' आत्मसत्ता ' है । ' घटोऽस्ति ' का अर्थ है ' घटः - आत्मानं धत्त े ' । जबतक यह सत्ता है, तभीतक घट स्व - स्वरूप में प्रतिष्ठित है । ' अहमस्मि ' यही आत्मसत्ता है । यही स्व – स्वरूपरक्षिका सत्ता है । ' घटोऽस्ति ' का अर्थ है - ' घटः सत्तां धत्ते ' । इसका अर्थ है - ' आत्मानं धत्ते ' । इसका अर्थ है - ‘ मनो धत्त - प्राणं धत्ते, अथ च वाचं धत्ते ' । सूर्य्य है, पृथिवी है, चन्द्रमा है, मनुष्य है, घट है, पट है, इसप्रकार से जिस वस्तुस्वरूपरक्षक ' अस्तिभाव ' का हम प्रत्येक पदार्थ में साक्षा-त्कार कर रहे हैं, मनःप्राणवाक् की समष्टिरूपा वह सत्ता ही ' श्रात्मधृति ' है । जत्रतक आत्मवृति है, तभी— तक वस्तु स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित है । आत्मा के अभाव में वस्तु की बिनष्टि है । और यही प्रथमा ' आत्म-धृति ' नाम की प्रतिष्ठा है । ( २ ) - असंतोषृतिः-सत्ताशून्य पदार्थ में सत्ता का प्रवेश, एवं तदनुगता सत्ता ही ' असतोधृति ' है । अभी घट का आत्य-न्तिक अभाव है । घट नहीं है । होता क्या है - कुम्भकार मिट्टी के मनः - प्राण - वाक् – पर अपने मनः- प्राण– वाक् I का व्यापार करता है । घटनिर्माणानुकूल अपने बल का मिट्टी में सन्निवेश करता है T । ' मैं घट बनाऊँ ’ इस इच्छा से वह पहिले अपने अन्तर्जगत् में घट का निर्माण करता है । घटाकाराकारित मनोवच्छिन्न प्राण-व्यापार के द्वारा दण्ड - चक्र - चीवर आदि साधनभूत वाक्तत्व की सहायता से ' मृत्सत्ता ', और ' कुम्भकार-सत्ता ', दोनों सत्ताएँ मिट्टी में प्रविष्ट होकर ' घटरूप ' धारण कर लेती है । घंट कुम्भकार से अनुग्रहीत मृत्सत्ता का परिग्रह कर उत्पन्न होजाता है । ‘ अपूर्वसत्ता ' धारण कर लेना हीं उस वस्तु का ‘ जन्म ’ कह-लाता है | उत्पन्न होने वाला पदार्थ ' विकृति ' है । एवं जिससे वह उत्पन्न होता है, वह उसकी ' प्रकृति ' है । उत्पन्न होने वाले विकृतिरूप पदार्थ अपनी प्रकृति में ही प्रतिष्ठित रहते हैं । वह सत्ता उनकी नहीं है, अपितु प्रकृति की है । वे तो स्वयं सत् हैं । प्रकृति की सत्ता को लेकर ही वे सत्तावान् बन रहे हैं । इसी आधार पर श्रुति ने कहा है-“ वाचारम्भणं विकारो नामधेयं, मृत्तिकेत्येव सत्यम् " । - उपनिषत् ५२३
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प्रथमकाण्ड बिकृतिरूपं असत् पदार्थ को धारण करने वाल । यह ' प्रकृतिप्रतिष्ठा ' ही ' असतोधृति ' है । और यही दूसरी प्रतिष्ठा है । पूर्वप्रतिपादिता श्रात्मवृति, एवं इस असतोधृति में अन्तर एतावन्मात्र ही है कि, उसके लिए ' अस्ति ' शब्द का प्रयोग होता है, एवं इसके लिए ' जायते ' शब्द प्रयुक्त होता है । ' घट हैं ', यह आत्मवृति का उदाहरण है, एवं ' घटो जायते ' यह ' असतोधृति का उदाहरण है । ( ३ ) –सतोधृतिः-तीसरी है - ' सतो धृति ' । यह सत्ता धाराधेयभाव - रूपा है । घट में जल है । अश्व पर अश्वारोही है । पृथिवी पर योषधि, वनस्पतियाँ हैं । शरीर पर वस्त्र है । टेबिल पर पुस्तक है । ये सत्र सतोधृति के ही उदाहरण हैं । यहाँ आधार, और आधेय, दोनों सत्तावान् हैं । दोनों की सत्ता स्वतन्त्र है । अप्रतिष्ठित पदार्थ अन्य में प्रतिष्ठित होता है । दूसरे शब्दों में- अल्पप्राण की प्रतिष्ठा महाप्राण बनता है । यही ‘ सतोधृति ’ है | तदित्थं संसार में प्रतिष्ठा तीन हीं प्रकार की है । इन तीनों में प्रथमा आत्मप्रतिष्ठा ही ऋग्वेद है । ब्रह्माक्षर की प्रकृति प्राण है । यही वेद है । प्राणसाहस्री को ही पूर्व में ' वेद ' बतलाया गया है । स्वयम्भू प्राणमय है । एवं स्वयम्भू का अधिष्ठाता ब्रह्माक्षर है । ब्रह्माक्षर से समुद्भूत प्राणरूप वेद ही आपो-मय, दूसरे शब्दों में अप्प्रकृतिक ' विष्णु ' नाम के पारमेष्ठ्य अक्षर से उद्भूत सम्पूर्ण पदार्थों की प्रतिष्ठा है । अव्ययविशिष्ट ब्रह्माक्षर से अनुगृहीत यही बेद सब का आत्मा बनता है । अन्य प्रतिष्ठित पदार्थों की यही प्रतिष्ठा है । एवं मूल प्रतिष्ठातत्त्व को पूर्व में ऋग्वेद कहा गया है । इधर यह आत्मवृतिरूपा प्रतिष्ठा आगे की असतोधृति, और सतोधृति, दोनों प्रतिष्ठाओं की भी प्रतिष्ठा है । अत: हम अवश्य ही इस श्रात्मधृति को ऋग्वेद कह सकते हैं । दूसरी है असतोधृति । यही यजुर्वेद है । यजन का यजुः से सम्बन्ध है । यजुर्वेद ' सर्वा गति– यजुषी हैव शश्वत् ' के अनुसार ' गतिप्रकृतिक ' है । गति के द्वारा ही एक वस्तु अन्य वस्तु में आहुत होती है । इसी यजुर्मूलक आहुति - व्यापार को ' यजन ' कहते हैं । बलाग्नि में मृत्तिकारूप कारणसत्ता की आहुति होने से ही ‘ असतोधृति ' का स्वरूप निष्पन्न होता है । दूसरे शब्दों में- कार्य्यंजात की उत्पत्ति के लिए कारण-सत्ता की ही आहुति होती है । इससे ' यजनसम्पत्ति ' प्राप्त होती है । ऐसी अवस्था में यजनरूपा असतोधृति को हम अवश्य ही यजुर्वेद कह सकते हैं । तीसरी है सतधृति । ' ऋचा समं मेने तस्मात् साम ' के अनुसार ऋक् की समानता के कारण हीं तीसरा वेद ‘ साम ' कहलाता है । आत्मप्रतिष्ठारूप ऋक् का जैसा स्वरूप होता है, उसीके अनुसार ‘ सतोधृति ' की प्रवृत्ति होती है । प्रतिष्ठा जैसी होती है, तदनुरूप ही उस पर अन्य वस्तु प्रतिष्ठित रह सकती है । पानी अपने ऊपर तृण को प्रतिष्ठित कर सकता है, पाषाण को नहीं । क्योंकि पात्राण उस ' जलसत्ता ' से अधिक बल रखता है | यहाँ समानरूपता का अभाव है । आधार की अनुरूपता ही प्राधेय की प्रतिष्ठा में मुख्य कारण है । ऐसी अवस्था में श्राघेयरूपा इस सतोधृति को अवश्य ही ' सामवेद ' कहा जासकता है । इसप्रकार प्रतिष्ठारूप ऋग्वेद में प्रतिष्ठात्रयी के कारण तीनों वेदों का उपभोग होजाता है । ५२४
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शतपथब्राह्मण १ आत्मवृत्तिः — ऋग्वेदः - प्रतिष्ठानां प्रतिष्ठात्त्वात् । २ असतोधृतिः – यजुर्वेदः– बलाग्नौ कारण सत्ताया हू - ] सोऽयं ऋग्वेदे यमानतया यजनसंपत्तेः । ३ सतोवृतिः - सामवेद दः: - -- आत्मधु तिसाम्येन तत्र वृत्तेः । २- श्रात्मवेद: -यजुर्वेदः-वेदत्रयोपभोगः .१. दूसरा है आत्मवेद । इसी को हमने पूर्व में यजुर्वेद कहा है । पूर्व के प्रकरणों में ' यस्य यदुक्थं ' सत् - ब्रह्म सत् - साम स्यात् स तस्य आत्मा ' आत्मा का यह लक्षण किया गया है । उक्थ - ब्रह्म - साम की समष्टि ही आत्मा है | ‘ यस्मादुत्तिष्ठते ' के अनुसार प्रभव ( उपादानकारण ) का नाम हीं ' उक्थ ' है । ' यो बिभर्त्ति ' के अनुसार आधारभूमि का नाम हीं ' ब्रह्म ' है । एवं ' यत्समं सर्वेषु ' के अनुसार समान - जातीय पृथक पृथक् व्यक्तियों में समानभाव से व्याप्त रहने वाला तत्त्व ही ' साम ' है । जो कारणतत्त्व अपने कार्य्यं का उक्थ - ब्रह्म- साम होता है, वही उस कार्य का आत्मा माना जाता है । ‘ तदेतत् त्रयं सदेकमेयमात्मा । आत्मा उ एकः सन्नेतत् त्र्यम् ' ( शत १४ | ३ | ३ | ) के अनुसार उक्थ - ब्रह्म - साम, तीनों मिल कर एक आत्मा का स्वरूप निष्पन्न होता है । आत्मा एक होता हुआ भी उक्थ-ब्रह्म - साम भेद से त्रिकल है । आत्मा की ये तीनों कलाएँ ह्रीं क्रमश: त्रयीवेद है । उक्थभाग ऋग्वेद है । ब्रह्मभाग यजुर्वेद है । सामभाग सामवेद है | महोक्थ को ऋक् कहते हैं । महाव्रत को साम कहते हैं । एवं ब्रह्माग्नि को ( पुरुषाग्नि को ) यजुर्वेद कहते हैं । उदाहरण के लिए नाम — रूप – कर्म्म – को ही लीजिए । ‘ स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः ' के अनुसार सृष्टिसाक्षी आत्मा मनः, प्राण, वांङमय है । यह इस आत्माप्रजापति का श्रमृतभाग है । एवं ' अर्द्ध ह वै प्रजापतेरात्मनो मर्त्यमासीदद्धम-मृतम् ' के अनुसार श्रात्मा अमृत मर्त्य भेद से उभयभात्रापन्न है । आत्मा के मर्त्यभाग नाम - रूप - कर्म्म हैं | नाम वागभाग का मर्त्यरूप है, कर्म्म प्राणभाग का मर्त्यरूप है, एवं रूप मन का मर्त्यरूप है । नामों का उक्थ - ब्रह्म – साम वाक्तत्त्व है । सम्पूर्ण ' नाम ' वाक् से ही उठते हैं । वाक् पर ही सम्पूर्ण नाम प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं सर्वथा विभिन्न नामों में वाक्तत्त्व ही समान है । रूपों का उक्थ चतुस्ताराग्रवर्त्ती मन है । इस चाक्षुष मन को ही लोकभाषा में ' मानस ' किंवा ' माणस्या ' कहा जाता है । यही चक्षु का चक्षुष्ट्व ( चक्षुपना ) है । चक्षुः - शब्दोपलक्षित इसी मन से सम्पूर्ण रूप उठते हैं, इसी पर प्रतिष्ठित रहते हैं, एवं यही मन सम्पूर्ण विभिन्न रूपों में समान रूप से व्याप्त है । तीसरा है कर्म्म । श्रात्मा ( १ ) ( ब्रह्माग्निरूप भौतिक शरीर ) सम्पूर्ण कम्मों का उक्थ. यही सत्र की आधारभूमि है । एवं सभी विभिन्न कम्र्मों में यही समान ( १ ) चत्त्वार आत्मा ( शत ० ६ । १ । १ । ) के अनुसार कण्ठ से मूलाधार पर्य्यन्त का भाग श्रात्मा कहलाता है । यहीं से कर्म्म - प्र ेरणा होती है । प्रकृत में ' आत्मा ' शब्द से यही भाग अभिप्रेत है । ५.२५
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प्रथमकाण्ड है । नाम - रूप - कर्म्म - स्वरूप अपने मर्त्यभाग से अविनाभूत वाक् मनः - प्राणरूप त्रिकल आत्मा त्रिकल होता हुआ भी ‘ एक आत्मा ' है । दूसरे शब्दों में- एक आत्मा त्रिकल है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर वाजिश्रुति कहती है— “ त्रयं वा इदं नाम - रूपं – कर्म्म । तेषां नाम्नां बागित्येतदुक्थम् । श्रतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति । एतदेषां साम । एतद्धि सर्वैर्नामभिः समम् । एतदेषां ब्रह्म । एतद्धि सर्वाणि नामानि विभत्तिं । अथ रूपाणां चक्षु ( प्राज्ञ - मन: - चक्षुः स्थानीयम् ) रित्येतदे-षामुक्थम् । अतो हि सर्वाणि रूपाणि उत्तिष्ठन्ति । एतदेषां साम । एतद्धि सर्वै रूपैः समम् । एतदेषां ब्रह्म । एतद्धि सर्वाणि रूपाणि विभर्त्ति! अथ कम्र्म्मणां श्रात्मा ( ब्रह्म-प्राणात्मकं शरीरं ) इत्येतदेषामुक्थम् । अतो हि सर्वाणि कर्माणि उत्तिष्ठन्ति । एतदेषां साम । एसद्धि सर्वैः कर्म्मभिः समम् । एतदेषां ब्रह्म । एतद्धि सर्वाणि कर्माणि बिभर्त्ति । तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्मा । आत्मा उ एकः सन्नेतत्त्रयम् " । - शत ० १४ का ० । ३ प्र ०३ ब्रा ० । १-२-३ - कं ० इति । १ — नाम - वाक् — वाग्ब्रह्म २ – रूप - मन - चतुर्ब्रह्म ३ - कर्म - प्राण - आत्मब्रह्म - “ स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्रारणमयो मनोमयः ” त्रिकल आत्मा ‘ आत्मवेद ' है । इसका उक्थभाग ' ऋग्वेद ' है । ब्रह्मभाग ' यजुर्वेद ' है । सामभाग ‘ सामवेद ’ है । इसप्रकार यजुर्वेदात्मक आत्मवेद में भी तीनों वेदों का उपभोग सिद्ध हो जाता है | उक्थम् – महोक्थम् -- ऋक् -ब्रह्म पुरुषः यजुः साम - महाव्रतम् -- साम आत्मवेद: - यजुर्वेदः " सोऽयं यजुर्वेदे वेदत्रयोपभोगः " ३ – ज्योतिर्वेदः सामवेदः-‘ सर्वं तेजः सामरूप्यं ह शश्वत् ' के अनुसार ज्योतिस्तत्त्व का नाम ही ' सामवेद ' है । ज्योतिस्तत्त्व ‘ ज्ञानज्योति, भूतज्योति, सत्यज्योति, भेद से तीन भागों में विभक्त है । इनमें भूतज्योति – सूर्य्य, चन्द्र, तारक, विद्यत्, अग्नि, भेद से पञ्चधा विभक्त है । सत्यज्योति नाम - रूप - भेद से द्विधा विभक्त है । एवं ज्ञानज्योति सविषयक - निर्विषयक, भेद से द्विधा विभक्त है । इनमें भूतज्योति, और सत्यज्योति का आत्मा ५२६
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शतपथब्राह्मण ज्ञानज्योति है । क्योंकि ज्ञानज्योति ही इतर दोनों ज्योतियों का उक्थ - ब्रह्म - साम है । जबतक अध्यात्मजगत् इस श्रात्मरूप ज्ञानज्योति से प्रकाशित रहता है, तभीतक वह भूतज्योति और सत्यज्योति का साक्षात्कार करने में'समर्थ होता है । अतएव ज्ञानज्योति को ' ज्योतिषां ज्योति: ' कहा जाता है । बात यथार्थ है । भूतज्योति का प्रभाव केवल प्रकाश में ही रहता है । अन्धकार को हटा कर वहाँ की वस्तु का साक्षात्कार करा देना मात्र भूतज्योति का कार्य्य है । परन्तु ज्ञानज्योति तो प्रकाश, अन्धकार, दोनों में समानरूप से ब्याप्त रहती है । घोर अन्धकार में भी हमारा ' ज्ञान ' स्वच्छन्द्गति से विचरण किया करता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर उपनिषच्छ्र ुति कहती है-न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ — उपनिषदि सूर्य्य - अग्नि - विद्युत् - चन्द्र - तारक - ये पाँचौं भूतज्योतियाँ चतुरिन्द्रिय पर अनुग्रह करतीं हैं । भूतों के द्वारा चक्षु पर प्रतिष्ठित होतीं हैं । तीसरी नामरूपात्मिका सत्यज्योति है । घट में घटत्त्व रहता है । यह ' घटत्त्व ' ही विशेषण है, एवं ' घट ' विशेष्य है । इस घट - घटत्त्व में जो विशेष्य भाग है, नहो अमृततत्त्व है । वह सत्र में समान है । केवल विशेषण के मेद से वह पृथक् प्रतीत होने लगता है । नाम - रूप के द्वारा ही वह अमृततत्त्व ‘ अयं घटः - अयं पटः - श्रयं मनुष्यः ', इत्यादि रूप से पृथक् पृथक् प्रतीत होने लगता है । घटत्त्व के सम्बन्ध से वही अमृततत्त्व ' घट ' कहलाने लगता | पटत्त्व के सम्बन्ध से वही ' पट ' कहलाने लगता है । नामरूप के द्वारा सर्वथा तिरोहित भी वह अमृत प्रकाश में आजाता है । अतः नामरूप को ज्योति कहा जा-सकता है | नामरूपात्मिका सत्यज्योतिने ही उस अमृतरूप विशेष्य - प्राण को श्रावृत - आच्छन्न - परिच्छिन्न कर रक्खा है । इसी अभिप्राय से ऋषि कहते हैं ---" तदेतदमृतं सत्येन च्छन्नम् । प्राणो वाऽअमृतम् । नामरूपे सत्यम् । ताभ्यामयं प्राणश्छन्नः ” । - शत ० १४ | ३ | ३ | इति ज्ञान - भूत - सत्य, तीनों ही ज्योतियों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है । तीनों का परस्पर एक दूसरे पर अनुग्रह है । ज्ञानमय आत्मा जबतक शरीर में प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक भूतज्योति और सत्यज्योति का साक्षात्कार होता है । चिना आत्मसत्ता के दोनों निरर्थक हैं | हृदयस्थ विज्ञानघन अन्तर्ज्योति ही ज्ञानज्योति है । शरीर में प्रतिष्ठित रह सकता उत्क्रान्त होज़ाता है | विदेह यही आत्मा है । जबतक इसे भूतज्योतिरूप अन्न मिला करता है, तभीतक यह है । प्रकाश ( भृतज्योति ) के अभाव में यह ज्ञानज्योतिर्मय आत्मा शरीर से जनक के ‘ किं ज्योतिरयं पुरुषः? ' यह प्रश्न करने पर भगवान् याज्ञवल्क्यने ' पञ्चज्योतिरयं पुरुषः ' यही समाधान किया है । वहाँ सूर्य्य - चन्द्र - अग्नि चाकू- आत्मा, इहें पाँच ज्योतियाँ बतलाया गया है । इन पाँचों में - सूर्य्य - चन्द्र - अग्नि - वाक्, ये चार भूतज्योति हैं – आत्मा ज्ञानज्योति है । इस पक्ष में तारक, और विद्यु-ज्ज्योति का सूर्य्य में अन्तर्भाव है । ५२७