Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 791–800
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 791–800
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प्रथमकाण्ड • कहना प्रकृत में यही है कि, जबतक सूर्य्यसता रहती है, तभीतक आत्मा कर्म करने में सन्नद्ध रहता है । साथ ही ‘ सौरप्रकाश ' में वह भयावह स्थान में भी चला जाता है । सूर्यास्त होने पर ' चन्द्रज्योति ' का श्राश्रय लेना पड़ता है । यदि चन्द्रमा नहीं रहता है, तो ' अग्नि ज्योति ( दीपक आदि प्रकाश के साधन ) की अपेक्षा होती है । यदि अग्निज्योति का भी अभाव होता है, तो ' वाग्ज्योति ' की अपेक्षा होती हैं । शून्य, एवं भयावह जँगल में अमावास्या की रात्रि में एकाकी मनुष्य भयभीत होजाता है । उस समय यदि उसके कान ' किसी मनुष्य की ध्वनि जाती है, तो उसका भय दूर होजाता है । ' अग्निर्वा भूत्वा मुखं प्राविशत् ' इस औपनिषद सिद्धान्त के अनुसार ' वाक् ( शब्द ) ' साक्षात् अग्निज्योति है । अग्नि ह्रीं शरीर का बल है । चल की अल्पता से ही भय का संचार होता है । वाक् के द्वारा बलप्राप्ति होजाती है, भय की निवृत्ति होजाती है । पाँचवीं ज्योति श्रात्मज्योति है । यदि कोई श्राश्रय नहीं होता है, तो उस समय वह एकाकी मनुष्य ‘ मुझे किसका डर है ' इसप्रकार ग्रात्मंबल के आश्रय से ही निडर होजाता है । यदि किसी का आत्मा निर्बल होजाता है, तो ऐसे समय में उसका आत्मा शरीर से उत्क्रान्त ही होजाता है । ये पाँचों ही ज्योतियाँ सूर्य्यमूलक ही हैं । ' सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' के अनुसार श्रात्मज्योति का भी अन्न सूर्य्यज्योति ही है । यही कारण है कि, हमारा आत्मा अन्धकार में श्राकुल - व्याकुल होपड़ता है । बिना भूतज्योति के यह ज्ञानज्योतिर्म्मय आत्मा कथमपि स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । तीसरी है. ‘ सत्यज्योति ’ । नाम - रूप को ही पूर्व में ' सत्यज्योति ' कहा है । नाम रूप ही विषय का स्वरूप है । संसार के पदार्थमात्र नामरूपात्मक हैं । ज्ञानज्योतिर्म्मय हमारा आत्मा इन नामरूपात्मक विषयों को लेकर ही ‘ अहं जानांमि ', ' अहं करोमि ' इसप्रकार अपने आप को प्रकाशित करने में समर्थ होता है । निर्विषयक ज्ञान ( आत्मा ) नहीं के समान हैं । बहिर्जगत् के विषयों के साथ जबतक आत्मा का सम्बन्ध रहता है, तत्रतक जाग्रदवस्था है । अन्तर्जगत् ( सांस्कारिक जगत् ) के विषयों के साथ जबतक सम्बन्ध है, तत्रतक के लिए अपने आप में ' पीत ' होता हुआ यह सुषुप्ति में लीन होजाता है । इससे सिद्ध होजाता है कि, नामरूपात्मक सत्यज्योति को लेकर ही ज्ञानज्योति स्वस्वरूप प्रतिष्ठित करने में समर्थ होती है । इसी विज्ञान के
श्राधार पर भगवान् भर्तृहरि कहते हैं--न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते ।
अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते ॥
- वाक्यपदी ' गो ' शब्द के सुनते ही हमारा ज्ञान ' गोरूपाकाराकारित ' होजाता है । एवं ‘ गोरूप ' को देखते ही हमारा ज्ञान ' गोशब्द ' से श्राक्रान्त होजाता है । बिना नामरूप के किसी भी वस्तु का ज्ञान सम्भव ही नहीं है । ऐसी अवस्था में ज्ञान - भूत - सत्य, तीनों ज्योतियों को हम परस्पर अनुषक्त, एवं परिष्वक्त मान सकते हैं । पूर्वोक्त तीनों ज्योतियों में ज्ञानज्योति ब्रह्मनिःश्वसित वेद है, जिस का कि निरूपण पूर्व के उप-लब्धिवेद -- प्रकरण में किया जाचुका है । यही पहिला ' ऋग्वेद ' है । यही सब का उक्थ होने से ‘ महोक्थ ’ है । महोक्थ ही ऋग्वेद है । सूर्यज्योति - रूपा भूतज्योति ' गायत्रीमात्रिकवेद ' है । इसी को हमने पूर्व में ‘ यजु-५२८
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शतपथब्राह्मण वेद ' कहा है | जैसे नामरूप ' सत्य ' कहलाते हैं, वैसे ही ' अग्नि ' भी सत्य कहलाता है । इसी के लिए ' तद्यत् तत् सत्यं - त्रयी सा विद्या ( श ० ६ १५ | १ | १८ ) यह कहा जाता है । यही ' यजुर्वेद् ' है । भूतज्योति अग्निस्वरूप है I । अग्नि पुरुष है । पुरुष यजुर्वेद है । तीसरी सत्यज्योति सामवेद है । अबसान ही साम है | वस्तु की अन्तिम सीमा ही ' उच्च ' साम है | नामरूप ही वस्तु का अन्तिम अवसान है, अन्तिम स्वरूप है । इसप्रकार ज्योतिःस्वरूप इस सामवेद में हीं ज्ञान -भत- सत्य भेद से तीनों वेदों का उपभोग होजाता है । १ ज्ञानज्योतिः-- ब्रह्मनिश्वसितवेद: -- -ऋग्वेदः : २ भूतज्योतिः - गायत्रीमात्रिक वेदः - यजुर्वेद. ` ३ सत्यज्योतिः - अनन्तवेदाः - सामवेदः ं सोऽयं सामवेदे वेदत्रथोपभोगः ' प्रतिष्ठातत्व ऋग्वेद है, आत्मतत्त्व यजुर्वेद है, एवं ज्योतिः -- तत्त्व सामवेद है । तीनों में तीनों का उपभोग है । इसी वेदत्रयी का नाम ' सच्चिदानन्द ' है । प्रतिष्ठा ' सत् ' भाव है । सत्ता को [ अस्तित्त्व को ] ही प्रतिष्ठा कहते हैं । ' रसो ह्येव सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वा आनन्दी भवति ' के अनुसार आत्मा आनन्दस्वरूप है । यही यजुर्वेद है | चेतना ज्योतिः- तत्त्व है । सत्ताश्रय तत्त्व ही सत् हैं । चेतनाश्रयतत्त्व ही चित् है । श्रानन्दाश्रयतत्त्व ही आनन्द है । सच्चिदानन्दस्वरूप वेदमूत्ति तत्त्व ही ईश्वर है । तदंशभूत जीव, और विश्व भी सच्चिानन्द ही है । सर्वत्र वेदमूर्त्ति प्रजापति का ही साम्राज्य है । इस ' सच्चिदानन्दब्रह्म ' के परिज्ञान के लिए ' वेदस्वरूप ' जानना नितान्त अपेक्षित है । न केवल ईश्वर का ही, अपितु जीवस्वरूप, एवं विश्वस्वरूप - विज्ञान भी वेदज्ञान पर ही निर्भर है । जो वेद का वास्तविक स्वरूप नहीं जानता, केवल परायणमात्र से ही अपने आपको कृतकृत्य मान बैठता है, -न स वेद, न स वेद् । १ प्रतिष्ठावेदः - ऋग्वेदः- सत्ता, – सत्ताश्रयः सत् २ ज्योतिर्वेदः -- सामवेदः - चेतना - चेतनाश्रया चित् ३ आत्मवेद:: - यजुर्वेदः - आनन्दः -- आनन्दाश्रय आनन्दः सच्चिदानन्दो वेदमय ईश्वरः प्रसङ्गात् आत्म - प्रतिष्ठा – ज्योतिर्म्मयी वेदत्रयी का संक्षिप्त परिचय कराया गया । अब प्रकृत का अनुसरण किया जाता है । ज्योतिर्वेद के निरूपण में बतलाया गया है कि, ज्ञान - भूत - सत्य भेद से ज्योति तोन प्रकार की है । इन में मध्य की भूतज्योति सूर्य्यज्योति है । इसी का नाम गायत्रीमात्रिकवेद है । कृष्ण-मृगचर्म्म · का इसी सूर्य्यवेद, किवा गायत्रीमात्रिकवेद से सम्बन्ध है |
सप्रसङ्ग उपोद्घातो हेतुतावसरस्तथा ।
निर्वाहकैक्य - कार्यैक्ये षोढा सङ्गतिरिष्यते ॥
उक्ता मीमांसोक्ति के अनुसार प्रकरणसङ्गति ६ प्रकार से होती है । किसी मुख्य विषय की चर्चा चल रही हैं । प्रसङ्गात् उसी प्रकरण में ' एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिज्ञानस्य स्मारकं भवति ' इस न्याय के अनुसार उसी प्रकरण से सम्बन्ध रखने वाले अन्य प्रकरण का भी उल्लेख कर दिया जाता है । ५२६
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प्रथमकाण्ड पुराणों में ऐसी ‘ सप्रसङ्गसङ्गति ' का प्राचुर्य्यं है | नवीन प्रकरण से पहिले परिचयार्थ ' भूमिका ' लिखी जाती है । वही ‘ उपोद्घातसङ्गति ' कहलाती है । कारणप्रदर्शन ही ' हेतुसङ्गति ' कहलाती है । अवसर-प्राप्त क्रमिक कथन हीं चौथी ' श्रवसरसङ्गति ' है । ' निर्वाहकैक्य ' का प्रतिसञ्चरपक्ष से सम्बन्ध है । ‘ सर्वे पदार्थाश्चणकेन निम्मिताः ' यही प्रतिसञ्चरपक्ष है । ' सब ' उद्देश्य है । ' चरक ' विधेय है । उद्द ेश्य अनेक हों, विधेय एक हो, यही ' प्रतिसञ्चरपक्ष ' है । छठी सङ्गति का सञ्चरपक्ष से सम्बन्ध है । ' चणकेन विविधाः पदार्थाः सम्पद्यन्ते ' यही ' काय्यैक्य - सङ्गति ' है । ' चणक ' उद्देश्य है । ' सर्व ' विधेय है । एक उद्द ेश्य हो, नाना विधेय हों, वही सञ्चरपक्ष है । इसप्रकार सङ्गति षड्धा समन्वित है | १ प्रसङ्गसङ्गतिः - ‘ एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बधिज्ञानस्य स्मारकं भवति ' । २ उपोद्घातः - भूमिका । ३ हेतुता - कारणप्रदर्शनम् । ४ अवसरः - अवसरप्राप्ता क्रमबद्धोक्तिः । ५ निर्वाहकैक्यम् -- प्रतिसञ्चरपक्षः, यथा ' सर्वे पदार्थाश्चरण केन निम्मिताः ' । ६ कार्यैक्यम् – सञ्चरपक्षः- यथा ' चणकेन सहस्रशः पदार्थाः सम्पद्यन्ते ' । इन ६ औं सङ्गतियों में से प्रकृत के आख्यान में ' उपोद्घातसङ्गति से ही सम्बन्ध है । श्रुतिको कृष्ण-मृगचर्म्म की ‘ यज्ञता ’ सिद्ध करनी है । तदर्थ ' यज्ञो वै कृष्णो भूत्वा चचार ' इत्यादि रूप से भूमिका ही उपोद्घातसङ्गतिरूपेण उपनिबद्ध हुई है । यज्ञ की सर्वता के लिए ही प्रकृत में ' कृष्णमृगचर्म्म ' का ग्रहण किया जाता है । अतः सत्र से पहिले यही विचार करना चाहिए कि, ' यज्ञ ' कहते किसे हैं? । भिन्न भिन्न ऋषियोंनें यज्ञ के भिन्न भिन्न लक्षण किए । उन सत्र लक्षणों के निरूपण का प्रकृत में अवसर नहीं है । केवल एक दो लक्षणों का ही समन्वय साम-यिक होगा | भगवान् ऐतरेय के अनुसार यज्ञ का ' वाचश्चित्तस्योत्तरोत्तरिक्रमो यज्ञः ' यह लक्षण है I एवं यजुर्वेद के अनुस्मर ‘ अन्नो प्राणानामन्योऽन्यपरिग्रहो यज्ञः ' यह लक्षण है । मनः, प्राण, वाक् की समष्टि ही आत्मा है । यह आत्मा यज्ञ के प्रभाव से महिमाशाली ही बन जाता है । यज्ञ से ही आत्मा सश-रीरी बनता हुआ वित्तादि से युक्त होजाता है I । ' एकोऽहं बहु स्याम् के अनुसार आत्मा के मनोभाग से ' कामना ' का उदय होता है । कामना के द्वारा ' तप ' होता है । अनन्तर वाग्व्यापाररूप ' श्रम ' होता हैं । एवं श्रमानन्तर उसे अन्य वस्तु की प्राप्ति होती है । प्राप्त होने वाली वस्तु भी मनः, प्राण, वाङमय ही है । वस्त्वागमन से ' इस आत्मा का आयतन बढ़ जाती है । इसप्रकार उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है । इस वृद्धि से आत्मा सशरीरी बन जाता है । चित्त [ मन ], और वाक् ये दोनों प्राण की ' वर्त्तनी ' ( पगडण्डी ) | प्राणव्यापार के द्वारा मनो, वाक् का उत्तरोत्तर चयन होता जाता है । यही यज्ञ है । हम अन्न खाते हैं । दूसरे शब्दों में - शरीराग्नि में अन्नात्मक सोम की आहुति देते हैं । आहुत सोम ' ऊर्क ' रूप में परिणत होजाता है । ऊर्क् श्रागे जाकर ‘ प्राण ' रूप में परिणत होजाता है । प्राण के आकर्षण से पुनः अन्न का आगमन होता है । इसप्रकार अन्न, ऊर्क, प्राण, का परम्पर अनुग्रह होता रहता है । इसी प्रक्रिया का नाम यज्ञ है | ‘ अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' यही निष्कर्ष है । सम्पूर्ण विश्व समष्टथा, व्यष्ट्या, उभयथा यज्ञरूप है । सूर्य्य IIIII
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प्रथमकाण्ड अग्निमय है । इसमें निरन्तर पारमेष्ठ्य सोम की आहुति होती रहती है । इसी आधार पर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं -“ सूर्यो ह वा अग्निहोत्रम् । तद्यदेतस्या अग्र आहुते रुदैव तस्मात् सूर्योऽग्नि-होत्रम् " । — शतपथ २ | ३ || २ ‘ चित्रं देवानामुद्गात् ’ के अनुसार सूर्य्यं देवग्रामघन है । सौरयज्ञ, दूसरे शब्दों में सौरमण्डल देवमय है । सृष्टिक्रम के अनुसार भूपिण्ड सूर्य का उपग्रह है । जिस स्थान पर बाज भूपिण्ड है, किसी समय सूर्य्यपिण्ड यहाँ तक फैला हुआ था । उपग्रहों के निर्माण से छोटा होता होता आज वह पृथिवी से अत्यन्त विदूर होगया है । सूर्य्य अपने स्वाक्ष पर बड़े वेग से घूम रहा है । घूमने के कारण ' हृदय ', और ‘ परिधि ' की गति में अन्तर है । इस गति वैषम्य से सूर्य्य का आगे का भाग सूर्य्य से पृथक् होगया । वही ' शनि ' कहलाया । पुनः सूर्य्य का भाग पृथक् हुआ ॥ वही ' बृहस्पति ' कहलाया । पुनः एक भाग पृथक् ' हुा । वही ' मङ्गल ' कहलाया । पुनः एक भाग पृथक् हुआ । वही ' पृथिवी ' ( भूपिण्ड ) कहलाई । इसके आगे का भाग ' शुक्र ' कहलाया । इसके आगे का भाग ' बुध ' कहलाया । अब भी माठर - कपिल, यादि ग्रह सूर्य्य से पृथक् होते जा रहे हैं । इसप्रकार उस सूर्य्य से बुध, शुक्र, पृथिवी, मङ्गल, बृहस्पति, शनि,.. यदि ग्रह बन गए । बतलाना इससे यही है कि, पृथिवी सूर्य का उपग्रह ही है । सूर्य्य का ही प्रवृक्त भाग है । यह पृथिवी भूतमयी है | इस भूतमयी पृथिवी में यज्ञमूर्ति सौराग्नि का प्रवेश होता है । दो प्रकार से सौराग्नि का पृथिवी के साथ सम्बन्ध होता है । अन्तर्य्यामसम्बन्ध से प्रविष्ट होने वाला अग्नि पृथिवी की प्रातिस्विक वस्तु बन जाता है । सौराग्नि सूर्य से सर्वथा पृथक होकर उसीप्रकार पृथिवी का श्रात्मा बन जाता है, जैसे कि अन्नादि में सौर अग्नि अन्नादि का आत्मा बन जाता है । उतना सौर अग्नि सूर्य्य से पृथक होकर अन्न की परिपाक – क्रिया में उपयुक्त होजाता है | इस अग्नि का सूर्य्य के साथ अब कोई सम्बन्ध नहीं रहता । इसप्रकार जो सौर अग्नि पृथिवी का आत्मा बन जाता है, वह ' गायत्र ' कहलाता है । इसी को ग्रङ्गिरा भी कहते हैं । गायत्राग्नि के सम्बन्ध से ही इसे ' गायत्री ' कहा जाता है । ' या वै सा गायत्री - आसीत्, इयं वै सा पृथिवी ' ( शत ० १।४१ ) के अनुसार पृथिवी साक्षात् ' गायत्री ' है । सौर अग्नि ' सावित्राग्नि ' कहलाता है । वह पृथिवी की ओर आता है । पार्थिव गायत्राग्नि ऊपर की ओर जाता है । पार्थिव गायत्राग्नि अङ्गिरा है, एवं सौर सावित्राग्नि आदित्य है । दोनों में निरन्तर स्पद्ध होती रहती है । अङ्गिरास्वरूप गायत्राग्नि पृथिवी से . निकलकर द्युलोक पन्त जाया करता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर बेदमहर्षि कहते हैं—
इत एत उदारुहन् दिवस्पृष्ठान्यारुहन् ।
भूर्जयो पथा पथा द्यामङ्गिरसो ययुः ॥
- अथर्व सं ० १८ कां ० १,६१ मं ० यह एक प्रकार से सौराग्नि का पृथिवी में श्रागमन हुआ । बहिर्य्याम - सम्बन्ध से भी सौराग्नि का श्रागमन होता है । सौराग्नि पृथिवी पर आता है । एवं पृथिवी से प्रत्याहित होकर ( टकराकर ) पुनरावर्त्तित ५३१
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प्रथमकाण्ड होजाता है ( वापस चला जाता है ) । इसी अग्नि से ' अश्व ' का स्वरूप निष्पन्न होता है । पृथिवीपृष्ठ से द्यौ पय्र्यन्त त्रैलोक्य में ' अश्व ' खड़ा है । इन दोनों अग्नियों में से प्रकृत में ' गायत्राग्नि ' से ही हमारा सम्बन्ध है | ‘ यथाग्निगर्भा पृथिवी, तथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी ' के अनुसार पृथिवी में अग्नि की प्रधानता है । एबं सूर्य्य में इन्द्र की प्रधानता है । ' इन्द्रो रूपाणि करिकृदचरत् ' - ' रूपं रूपं मघवा बोभवीति ' के अनुसार इन्द्र रूप के अधिष्ठाता हैं । अतएव सौराग्नि का हमें प्रत्यक्ष होजाता है । परन्तु वही सौराग्नि पृथिवी में आकर इन्द्रसम्पत्ति से वियुक्त होता हुआ ' कृष्णरूप ' धारण कर लेता है । पार्थिव पदार्थमात्र अग्निमय हैं | परन्तु सर्वत्र अग्नि प्रतिमूच्छित होरहा है । दूसरे शब्दों में- दिव्य - सौरमण्डल से श्राया हुआ ' यज्ञाग्नि ' ' कृष्णरूप ' में हीं परिणित होरहा है । सो रहा है । अग्नि की इसी कृष्णावस्था का निरूपण करते हुए वेदमहर्षि कहते हैं—
शेषे वनेषु मात्रोः संत्वा मर्त्ता इन्धते ।
अतन्द्रो हव्या वहसि हविष्कृत्यादिदेवेषु राजसि ॥
-ऋ ० सं ०८ मं ० ६० सू ० १५ मं ० " काष्ठरूप माता की गोद में अग्नि सोरहा है । मरणधर्म्मा मनुष्य उस सुप्त अग्नि का समिन्धन करते हैं, उसे जगाते हैं । जगने के अव्यवहितोत्तरकाल में ही वह हविः सम्पादन करने वाला अग्नि तन्द्रारहित होकर हव्यवहन करने लगता है । एवं अनन्तर ही देवताओं में ( सूर्य्यमण्डल में अपने लोक में ) प्रदीप्त होने लगता है " -मन्त्र का यही अक्षरार्थ है । काष्ठ में अग्नि है । परन्तु हम उसे नहीं देख रहे । वह हमारे लिए कृष्ण है । हमारे लिए वह ' मृग्यमाण ' है । अन्वेषण करेंगे, तब वह हमें मिलेगा । ‘ मृग्यमाण ’ होने से ही यह पार्थिव सुप्त, किंवा प्रतिमूच्छित अग्नि ' कृष्णमृग ' कहलाया है । सम्पूर्ण भूमण्डल कृष्णमृग है | यह साक्षात् यज्ञ है | क्योंकि यज्ञात्मक सौर अग्नि हीं तो देवताओं से अपक्रान्त ं होकर ‘ कृष्णमृग ’ रूप में परिणत हुआ है । पृथिवी में सौराग्नि प्रविष्ट हुआ । वह पृथिवी का आत्मा बना । वही ' कृष्णमृग ' कहलाया, यह सिद्ध होचुका । यह कृष्णमृग ही साक्षात् त्रयीविद्या है । इस पार्थिववेद को ही ' यज्ञमात्रिकवेद ' कहा जाता है । भूपिण्ड ‘ अग्निभू स्थानः ' ( या ० नि ० ) के अनुसार अग्निमय है । इसमें अग्नि प्रकट नहीं है, अपितु गर्भ में है । इसी आधार पर ' यथाग्निगर्भा पृथिवी ( शत ० १४ ) यह कहा जाता है । पृथिवी के गर्भ में रहने वाला अग्नि प्रतिमूच्छित होने से ' कृष्ण ' है, एवं ' मृग्यप्राण ' होने से ' मृग ' है । पृथिवी-स्तर उस कृष्णमृग का चर्म्म है । इसी आधार पर ' तस्य ( अग्नेः ) एष स्त्रो लोको यत् कृष्णाजिनम् ' ( श ० ६ | ४ | २ | ६ ) इयं ( पृथिवी ) वै कृष्णाजिनम् ' ( श ० ६ | ४ | ११६ ) यह कहा जाता है | यह कृष्णाजिन यज्ञरूप है । दूसरे शब्दों में कृष्णमृग यज्ञस्वरूप है । अग्नि में सोम की आहुति होना हीं यज्ञ है, यह पूर्व में कहा गया है | पार्थिव अग्नि अमृत, मर्त्य, भेद से दो प्रकार का है । अमृताग्नि प्राणाग्नि है, यही देवता है । मर्त्याग्नि भूताग्नि है, पृथिवीपिण्ड भूत है । पृथिवीपिण्ड में रहने वाला मृगरूप प्राणाग्नि देवता है । यह अग्निरस पृथिवी से निकलकर बड़ी दूर पर्य्यन्त अपना एक मण्डल बनाता है, जैसा-कि पूर्वप्रकरणों में अनेक स्थलों पर बतलाया जाचुका है । ५३२
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शतपथब्राह्मण यह अग्नि पृथिवी से निक़ल कर सप्तदशस्तोम पर्य्यन्त व्याप्त रहता है । उसी १७ के ऊपर सोम है | उस सोम की सप्तदश - स्थानीय अग्नि में आहुति होती है । इसी आहुति के कारण सप्तदश स्थानीय अग्नि-को ' आहवनीयाग्नि ' कहा जाता है । इसमें आहुत होने से वह अग्नि एकविंशस्तोम पर्य्यन्त व्याप्त होजाता है | इसी यज्ञ के द्वारा वह अग्नि २१ पर्य्यन्त वितत होजाता है । अतएवं इस अग्नि - सोमात्मक यज्ञ को ' वितानयज्ञ ' कहा जाता है । त्रिवृत्स्तोम पर्य्यन्त अग्नि है । यहाँ तक ॠग्वेद की व्याप्ति है । पञ्चदशस्तोम पर्य्यन्त वायु है । यहाँ तक यजुर्वेद की व्याप्ति है । एकविंशस्तोम - पर्य्यन्त आदित्य है । यहाँतक सामवेद की व्याप्ति है । ‘ वेदाः सत्यम् ' के अनुसार वेद सत्यतत्त्व है । यह वेद अग्निस्वरूप है । इसी यज्ञ के द्वारा इस ‘ सत्यवेद ’ का ‘ त्रिंतान ’ होता है । दूसरे शब्दों में - वह सत्यवेद यज्ञ के द्वारा ही त्रैलोक्य में ( स्तोमंत्र लोक्य में ) व्याप्त होता है । इसी आधार पर “ तद्यत् तत् सत्यं त्रयी सा विद्या । ते देवा अत्र॒ वन् - यज्ञं कृत्वेदं सत्यं तनबाम है " ( श ० १० कां ० ५ अ ० प्रा ० १८ कं ) यह कहा जाता है । यह त्रयीमय यज्ञ क्योंकि कृष्णमृग है, इसी आधार पर ' यज्ञो हि कृष्णः । स य: स यज्ञ-स्तत् कृष्णाजिनम् ' ( श ० ३ | २ | १ | २८ ) यह कहा जाता है । पार्थिव अग्निमय ऋग्वेद मूल में है । दिव्य आदित्मय सामवेद अन्त में है । एवं प्रान्तरिक्ष्य वायुमय यजुर्वेद मध्य में है । पार्थिवाग्नि में ' कृष्ण रूप ' की प्रधानता है । क्योंकि यहाँ रूपाधिष्ठाता इन्द्र का अभाव है । यह अग्नि ' कृष्ण ' है, अतएव तत्सम्बन्धी पार्थिव ऋग्वेद को हम अवश्य ही ' कृष्ण ' कह सकते हैं | आदित्य इन्द्रात्मक होने से ज्योतिर्मय है । अतएव तत्सम्बन्धी सामवेद को अवश्य ही ' शुक्ल ' कहा जासकता है । शुक्ल, और कृष्ण की सन्धि में ' बभ्रु णी-वं हरीणि ' रूप का प्रादुर्भाव होजाता है । इधर यजुर्वेद वायव्य होने से सान्ध्य है । अत: हम यजुर्वेद को तद्वर्णात्मक मान सकते हैं । इसप्रकार प्रकृति के पार्थिव यज्ञात्मक इस कृष्णमृगचर्भ का त्रयीवेदत्त्व भलीभाँति सिद्ध होजाता है । इसीके आधार पर यज्ञ निष्पन्न होता है । त्रयीवेदस्वरूप त्रैलोक्य - व्यापक यही कृष्ण-मृग यज्ञ की आधारभूमि है । भूपिण्ड कृष्णमृग है । एवं महिमाभाग चर्म्म है । दूसरे शब्दों में २१ ( एकविंश ) स्तोम पर्य्यन्त ब्याप्त महापृथिवी चर्म्म है । इसी में ६-१५-२१ इस क्रम से वेदत्रयी का उपभोग है । यही ' यज्ञमण्डल ' । सौरयज्ञ भूस्वरूप से सौर देवताओं से अपक्रान्त होकर कृष्णमृग बन कर बिचरने लगा था । “ सूर्य्य से पृथिवीरूप कृष्णमृग प्रवृक्त होकर क्रान्तिवृत्त पर परिभ्रमण करने लगा था, एवं आज भी घूम रहा है । देवता उसे तो न लेसके । किन्तु अपने यज्ञ की सर्वता के लिए उह्नोंनें उसकी त्वचा को उखाड़ लिया " । तात्पर्य्य इसका यही है कि, महिमापृथिवी में व्याप्त त्रयीवेदात्मक प्राणयज्ञ का ही सौरमण्डल से सम्बन्ध होता है । पृथिवीपिण्ड तो अपने हीं स्थान पर घूमता है । इस कृष्णमृग को देवता नहीं प्राप्त करसकते । इसका चर्ममात्र ही उहीं मिलता है । इसी सम्पूर्ण गुहानिहित विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है-— “ अथ कृष्णाजिनमादत्ते - यज्ञस्यैव सर्वत्वाय । यज्ञो ह देवेभ्यो ( सूर्यमण्डलात् ) ऽपचक्राम । स कृष्णो भूत्वा चचार । तस्य देवा अनुविद्य त्वचमेवावच्छाय आजहुः । तस्य यानि शुक्लानि च लोमानि तान्यृचां साम्नां च रूपम् । यानि शुक्लानि, तानि साम्ना रूपम् । यानि कृष्णानि, तान्य चाम् ” इति । ५३३
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प्रथमकाण्ड ‘ ऋङ्मूर्त्तिर्मण्डलं साम ’ के अनुसार मूर्त्ति ऋग्वेद है, एवं मण्डल साम है, । मण्डल द्युलोक है, एवं मूर्त्ति पृथिवीलोक है । दोनों का अन्तराल अन्तरिक्ष है । इस दृष्टिकोण से मूर्त्तिरूपा पिण्डपृथिवी ऋग्वेद है, और यह कृष्णवर्णात्मक है । मण्डलरूपा महापृथिवी द्यौ है । यही सामवेद है । इसका इन्द्रज्योति के कारण शुक्लरूप है । मध्यस्थ अन्तरिक्ष्य यजु हरितवर्ण है । वषटकारमण्डल का निरूपण करते हुए पूर्व में बतलाया गया है कि, प्रत्येक वस्तुपिण्ड का जो चहिर्मण्डल हैं, वही ' वषट्कार ' कहलाता है । बहिर्मंण्डल वाङमय होता है । उस वाक् तत्व के ६-१५-१७-२१-२७-३३ इसप्रकार ६ स्तोम होते हैं । वाक् का यह षट्कार ही ' वषट्कार ' है । वषट्कार की अन्तिम सीमापर्य्यन्त उस वस्तु की सत्ता मानी जाती है । इस वषट्कारात्मिका महापृथिवी में त्रिवृत् - पञ्चदश एकत्रिशत्रयस्त्रिंश भेद से क्रमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष- द्यौ - आपः- इन चारों लोकों की सत्ता मानी गई है । चतुर्लोकात्मिका यह महापृथिवी ही यज्ञ-परिभाषा में ' महावेदि ' नाम से प्रसिद्ध है | वेदिदेवेभ्यो निलायत । तां वेदेनान्वविन्दन् ।
वे वेदं विदुः पृथिवीं सा पप्रथे पृथिवी पार्थिवानि ।
गर्भ विभर्त्ति भुवनेष्वन्तस्ततो यज्ञो जायते विश्वदानिः ॥
— तै ० ना ० ३ | ३ | ह उक्त तैत्तिरीय - श्रुति के अनुसार वेद के द्वारा प्राप्त होने के कारण हीं यह पृथिवी ' वेदि ' कहलाती है । वेदि ही वेद की प्रतिष्ठा है । सूर्य्यमण्डलस्थ ज्योतिर्म्मय देवताओं से तिरोहित होने वाली कृष्णमृगरूपा यह पृथित्री वेद के द्वारा ही प्राप्त होती है । इस वेदि में मूर्ति, और मण्डल के अपेक्षा - भेद से ऋक्, ग्राम, दोनों ही शुक्ल, कृष्ण, भेद से दो दो स्वरूप धारण कर लेते हैं । यदि त्रिवृत्स्तोम पर्य्यन्त मूर्त्ति मानी जाती है, एवं एकविशस्तोम पर्य्यन्त महिमा मानी जाती है, तो ऋक् कृष्ण है । क्योंकि त्रिवृत् - पर्य्यन्त पृथिवी का प्रातिस्विक कृष्णरूप ही प्रधान बना रहता है । एवं २१ पर्य्यन्त मण्डल माना जाता है, तो साम शुक्ल होआता है । क्योंकि ‘ एकविंशो वा इत आदित्यः ' के अनुसार पृथिवी के २१ वें ग्रहगंण पर ( जो कि स्थान ' रथन्तरसाम ' कहलाता है ) सूर्य है । रूर्य के सम्बन्ध से ही वहाँ का साम शुक्ल है । यदि एकत्रिंश-स्तोम पर्य्यन्त मूर्त्ति मानी जाती है, तो मूर्तिरूप ऋग्वेद शुक्ल है । एवं ऊपर का ३३ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाला आपोमण्डल, किंत्रा सोममण्डल सामवेद है । यह तत्त्व सर्वथा कृष्ण है । अत: वह साम भी कृष्ण है । यजुः दोनों हीं पक्षो में सान्ध्य होने से हरित है । इसी मूर्ति, और मण्डल के स्तोमानुगत आपेक्षिक विष— र्थ्यय को लक्ष्य बना कर श्रुति आगे चल कर कहती है— ‘ यदि वा इतरथा - यानि कृष्णानि तानि साम्नां रूपम् । यानि शुल्कानि, तान्यृ-चां । यान्येव वभ्रूणीव हरीणि, तानि यजुषां रूपम् ' । सूर्य्यरूप ‘ गायत्रीमात्रिकवेद ' में भी यही अवस्था समझनी चाहिए । सूर्य्य में भी पिण्ड, और.. महिमा है | केन्द्र में सूर्य्यपिण्ड है । उसके बाहिर एकविंशस्तोम पर्य्यन्त ' हिरण्मयमण्डल ' है । २१ के बाहिर ३३ पर्य्यन्त पारमेष्ट्य आपोमय मण्डल है । उसके बाहिर ३४ वें से वेदमण्डल है । इसी को ' चत-५३४
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शतपथब्राह्मण स्त्रिंशः प्रजापतिः ' के अनुसार ' प्राजापत्यमण्डल ' भी कहा जाता है । ' आ कृष्णेन रजसा वर्त्तमानः ' के अनुसार सूर्य्यपिण्ङ घौर कृष्ण है । आप जो सूर्य्य में प्रकाश देख रख रहे हैं, वह सोमाहुति का ही प्रभाव है । सौराग्निदाह्य है, पारमेष्ट्य सोम दाहक है । इस दाहक सोम की दाल अग्नि में आहुति होती है । इसी से प्रकाश का जन्म होता है । ' त्वं ज्योतिषा वितमो ववर्थ ' के अनुसार प्रकाश सोमाहुति की ही महिमा है | निष्कर्ष यही हुपा कि, सूर्य्यपिण्ड घोर कृष्ण हैं । सूर्य्यं के २२ वें स्तोम पर्य्यन्त व्याप्त हिरण्मय मण्डल ज्योतिर्म्मय है, शुक्ल है । पुनः ३३ पर्य्यन्त व्याप्त आपोमण्डल, किंवा सौरमण्डल कृष्ण है । क्योंकि अग्निवत् सोम भी कृष्ण ही है । न अग्नि में प्रकाश है, न सोम में प्रकाश है । प्रकाश है दोनों के समन्वय में । ३३ के बाहिर का वेदमण्डल ज्योतिर्म्मय ( ज्ञानज्योतिर्म्मय ) होने से शुक्ल है । इसप्रकार सौरसंस्था में २१–३३-३४–४८ इन चार संस्थाओं के कारण सूर्य्य में - कृष्ण - शुक्ल - कृष्ण - शुक्ल - ये चार स्वरूप निष्पन्न होजाते हैं । ज्यों ज्यों हम वस्तु से आगे बढ़ते जाते हैं, त्यों त्यों उसका स्वरूप छोटा दिखाई देने लगता है । इस का कारण यही है कि, उस वस्तु के व्यासार्द्ध से सूचीमुख होता हुआ ऋक्तत्त्व वर्गमूल के कारण उत्तरोत्तर तीन तीन बिन्दु छोटा होता जाता है । अतएव वस्तुस्वरूप भी उत्तरोत्तर छोटा होता जाता है । प्रत्यक्ष हमें इसी महिमामयी ऋङमूर्त्ति का होता है । दूसरे शब्दों में ऋक् ही वस्तुमूर्ति के प्रत्यक्ष का कारण है । अतः ऋक् को अवश्य ही मूर्त्ति कहा जासकता है । इस ऋक् की व्याप्ति ३३ पर्य्यन्त रहती है । ३३ पर मूर्त्तिरूपा ऋग् बिन्दु-मात्र रह जाती है । अतएव वहाँ के साम को ' निधनसाम ', किंवा ' उच्चसाम् ' कहा जाता है । पूर्व में ऋक् रहता है । आगे उसी की समानता से साम रहता है । जिस स्थान पर खड़े रहने से वस्तु का जो आयतन प देख रहे हैं, वहाँ खड़े होकर उस वस्तु को केन्द्र में मानते हुए आप अपने स्थान से एक मण्डल बनाइए । वही मण्डल ' साम ' कहलावेगा । उस मण्डल पर खड़े रहने वाले सभी मनुष्यों को उस वस्तु का उतना हीं बड़ा आायतन दिखलाई देगा, जितना कि आप को दिखलाई दे रहा है । ऋक् के समान हीं सामात्मक मण्डल की व्याप्ति होती है । अतएव साम का ' ऋचा समं मेने तस्मात् साम ' यह लक्षण किया जाता है । इससे बतलाना हमें यही है कि, मूर्ति ऋग्वेद है, एवं मण्डल सामवेद है | साथ ही पूर्वमण्डल उत्तर मण्डल की अपेक्षा मूर्त्ति है । यह ऋग्वेद है । आगे का मण्डल साम है । उससे भी आगे का मण्डल अपने आगे के मण्डल की अपेक्षा ऋक् है । इसप्रकार मूर्ति, और मण्डल की अपेक्षा से ऋक्, साम, धारावाहिक रूप से व्याप्त रहते हैं । ऐसी अवस्था में कृष्णसूर्य्यपिण्ड को जब हम मूर्ति मानते हैं, एवं २१ पर्यन्त हिरण्मय भाग को मण्डल मानते हैं, तो ऋग्वेद कृष्ण होजाता है । और सामवेद शुक्ल होजाता है । यदि २१ पर्य्यन्त मूर्त्ति मानते हैं, एवं ३३ पर्य्यन्त मण्डल मानते हैं, तो ऋग्वेद शुक्ल होजाता है, सामवेद कृष्ण होजाता है । यहि ३३ पर्य्यन्त मूर्त्ति मानते हैं, तो ऋग्वेद शुक्ल होजाता है, एवं सामवेद कृष्ण होजाता है । यदि ४८ पर्य्यन्त मण्डल मानते हैं तो ऋग्वेद पुनः कृष्ण होजाता है, एवं सामवेद शुक्ल होजाता है । इसप्रकार मूर्ति, और मण्डल के अपेक्षा-कृतभेद से दोनों भाव उत्पन्न होजाते हैं । सूर्य्यं क्या तप रहा है, साक्षात् ' त्रयीविद्या ही तप रही है ' । इसी आधार पर ' सैषा त्रयी विद्या तपतीति ' ( श ० १० काण्ड ) यह कहा जाता है | आपोमय पारमेष्ठ्य मण्डल के केन्द्र में रहने वाले त्रयीमय नारायण श्वेतद्वीपनिवासी ये ही सूर्य्यवेद हैं । आगे के रेखाचित्रों से सौर- पार्थिव - स्तोमानुगत - मण्डलों का, एवं तदनुगत - शुक्ल - कृष्ण - भात्रों का भलीभांति स्पष्टीकरण होजाता है । ५३५
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प्रथमकाण्ड ( २१ ) - कृष्णमृगत्रयी - स्वरूप - परिलेख: -साम ऋक् - सामे ऋकू - सामे ऋ साम ऋक् ४८ ३३ २१. १५ ह " छन्दोमा स्तोमः त्रयस्त्रिंशसोमः एकविंशस्तोमः यानि शुद्धानि तानि /यानि शक्तानि तानि साम्न यानि कृष्णानि कृष्णम् कृष्णानि यानि शुक्लांनितानि तान्यृचाम् कृष्णानि ' यानि तान्यचाम यानि कृष्णम् " साम्नाम् शुक्रम पञ्चदशस्तोमः त्रिवृत्स्तोमः उक्थ पिण्डः श्रथ कृष्णाजिनमादत्ते यज्ञस्यैव सर्वत्वाय । यज्ञो ह वै देवेभ्योऽपचक्राम । स कृष्णो भूत्वा चचार । तस्य देवा अनुविद्य त्वचमेवावच्छाया जह्न: || १ || तस्य यानि शुक्लानि च कृष्णानि च लोमानि, तान्यृचां च साम्नां च रूपम् । यानि शुक्लानि तानि साम्नाँ रूपम्, यानि कृष्णानि - तान्यृचाम् । यदि वेथरथा । यान्येव कृष्णानि - तानि साम्ना ँ रूपं, यानि शुक्लानि तान्यृचाम्, यान्येव बभ्रु णीत्र हरीणि तानि यजुषा रूपम् || २ || सैषा त्रयी विद्या यज्ञः । तस्या एतच्छिल्पमेष वर्णः ॥३ ॥
- शतपथब्राह्मण १।१।४।१,२,३, । ५३६
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५३७ ← ब्रह्म ४८ ३३ पारावतम् २१ दृश्यम् स्पृश्य निधनम् प्राणमण्डलम् ४ : प्रतीहार सैौम्यमण्डलम् ३ : . अग्निमण्डलम उद्गीय चिते चित्याग्निपिण्डः १ : प्रस्ताव हिङ्कारः नभ्यप्रजापतिः अपृष्ठः-प्रथमकाण्ड ( २२ ) - पञ्चविध सामानुगत - पार्थिवमण्डलपरिलेखः—