Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 801–810
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 801–810
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शतपथब्राह्मण ( २३ ) - पारावतपृष्ठानुगत - पार्थिव - जागतमण्डलपरिलेख: -जायतस्तोम वाक् पृष्ठ ( ब्रह्मपृष्ठ ) महिमामंडलकी अन्तिमसीमा ( उच्च बिन्दु ) त्रैष्टुभस्तीम 88 33 अप पृष्ठ ( विष्णुपृष्ठ ) त्रयस्त्रिंशस्तीम गायत्रस्वीम एकविरा स्तोम अग्निपृष्ठ - २१ पर दृरेश पृष्ठ की समाप्ति सामगर्भित अग्निमुख अग्निमण्डल चित्यापि पिण्ड - स्पृश्य, पृष्ठभूत पिण्ड को सीमा सर्वाक्षर मर्ति ब्रह्मासम्प्रजापति यादमा ) ५३८
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प्रथमकाण्ड ( २४ ) - पार्थिव - सम्वत्सरातिमान परिलेख: -महाव्रतीयग्रह २५. - परागबिन्दु: स ४ सावित्रग्रहः-२२-२३-२४ रेखा पार्थिव → कामप्रस्वर्गः - २५ इन्द्रविष्टप ( ३ ) ७ ' रोचन: ( २४ ) ६ प्रद्यौः ( २३ ) ( ५ अधिद्य: ( २२ ) ३ ज्योतिष्टोमः मध्यबिन्दुः 29 - नाकस्वर्गः -२१ विष्णुविष्टप ( 2 ) ४ अन्तनीकः ( २ पार्थिवसम्वत्सरः वैश्यकम्मरी. १८-१८-२० १ समियागः / ( 26 ) रा ० १ / ३- अपराजित: ( २० ). २ ऋतंधामा ( १८ ) अवबिन्दु: १६ १2 अ दि : वै अदिति ' ईर्यं ल असुराः CN S १४ भूमिः, अपटक ( त्रिणाचिकेत स्वर्गः १७ ब्रह्मविष्टप ( १ ) डे दैवाः w म दि
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शतपथब्राह्मण यज्ञमात्रिकवेदमयी पृथिवी, एवं गायत्रीमात्रिकवेमय सूर्य से सम्बन्ध रखने वाले वेदस्व-रूप का संक्षिप्त निदर्शन उपरत हुआ । अत्र सम्पूर्ण विश्व के साथ वेदत्रयी के उपभोग का सम्बन्ध बतलाते हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूय्य, चन्द्रमोपलक्षित अन्तरिक्ष, पृथिवी, ये पाँचों ईश्वरप्रजापति की पाँच कलाएँ हैं । इन पाँचों की समष्टि ही ईश्वरप्रजापति है । दूसरे शब्दों में पाँचों की समष्टि ही विश्व है । एवं ‘ अवि-भक्त ं विभक्तेषु विभक्तमिव च स्थितम् ' के अनुसार पाँचों में प्रविष्ट रहने वाला ' पोडशीपुरुष ' ही इस पञ्चात्रयत्र विश्व का आत्मा है । पञ्चकलात्मक विश्व - प्राण - अपः - बाक् - अन्न अन्नाद् - इन पाँचों के ‘ सर्ग-हुत ' यज्ञ से उत्पन्न हुआ है । अतः सम्पूर्ण विश्व को हम यज्ञरूप ही कहते हैं । इसी विश्वयज्ञ को ' सर्ग -हुतयज्ञ ' कहा जाता है । इस के स्वयम्भू - परमेष्ठी - आदि पूर्वोक्त पाँच अवयव हैं । इसी आधार पर ' पाङ क्तो वै यज्ञः ' यह अनुगमनवचन प्रचलित है । सर्वहुतयज्ञ - स्वरूप इत्र विश्व की प्रतिष्ठा भी वही वेद है I वेद् मौलिकतत्त्व है, यज्ञ यौगिकतत्त्व है । तथा मौलिक तत्त्व ही यौगिक तत्त्व का प्रभव है । इन पाँचों में स्वायम्भ ू , और परमेष्ठी ये दोनों अमृत -- प्रधान हैं । -‘ तस्माद्यत् किञ्चार्वाचीनमादित्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् ' ( श ० १०।५।१४ ) के अनुसार सूर्य्य. से नीचे के पृथिवी, और चन्द्रमा मर्त्य हैं । एवं मध्यस्थ सूर्य्य ' निवेशयन्नमृतं मर्त्यच ' ( यजुः संहिता ) के अनुसार अमृत भी है, मर्त्य भी है । ऊपर के अमृतमण्डल के साथ अमृतसूर्य का सम्बन्ध है, एवं नीचे के मर्त्यमण्डल के साथ मत्र्यसूर्य का सम्बन्ध है । ग्रात्मा को ' षोडशी ' कहा जाता है । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल आत्मक्षर, एवं परात्पर की समष्टि हो षोडशीपुरुष है । इसमें अव्ययभाग ‘ परब्रह्म ' कहलाता है । चरभाग ' अवरब्रह्म ' कहलाता है । एवं मध्यस्थ अक्षरभाग क्षर की अपेक्षा ' पर ', एवं अव्यय की अपेक्षा ' अवर ' होने से ' परावरा ' कहलाता है । पर - अवर - परावरावरात्मक आत्मा पूर्वोक्त पञ्चावयव विश्व में व्याप्त रहता है अवश्य । परन्तु स्वयम्भू-परमेष्ठीरूप अमृत भाग में आत्मा के ' पर ' भाग की ( अव्यय की ) प्रधानता रहती है । अत्तः विश्व का वह भाग उपनिषदों में ' परब्रह्म ' नाम व्यवहृत होता है । पृथिवी, चन्द्रमा, इन दोनों में श्रात्मा के ' अवर ' भाग की प्रधानता रहती है । अत: यह भाग ' अरब्रह्म ' कहलाता है । एवं अमृतमर्त्यात्मक मध्यस्थ सूर्य्य में आत्मा का ' परावर भाग ' ( अक्षर ) प्रधान रहता है । अतः सूर्य्य को ' परावर ब्रह्म ' माना जाता है । पृथिवी पृथिवी है, यह अन्नादमयी है । चन्द्रमा अन्तरिक्ष है, यह अन्नमय है । सूर्य्य द्यौलोक है, यह वाङ्मय है | परंमेष्ठी आपोलोक है, यह आपोमय है । एवं स्वयम्भू वेदलोक है - दूसरे शब्दों में वाक्लोक है । और यह प्राणमय है । १ वाक - स्वयम्भू - प्राणमयः परब्रह्म २ आपः - परमेष्ठी - ग्रापोमयः ३ द्यौः – सूर्य्यः – वाङमयः पावरब्रह्म ईश्वरप्रजापतिर्यज्ञमूर्त्तिः ४ अन्तरिक्षम् - चन्द्रमाः - अन्नमयः अवरब्रझ ५- पृथिवी - पृथिवी - अन्नादमयी ५४०
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शतपथब्राह्मण इन पाँचों में पृथिवी ' कृष्णा ' है, द्यौ शुक्ला है । मध्य का अन्तरिक्ष सांध्य होने से हरित है | एवं आपः ( परमेष्ठी ) कृष्ण है । वाक् ( स्वयम्भू ) शुक्ला है । यदि पृथिवी को मूर्त्ति मान कर द्यौ को महिमामण्डल माना जाता है, तो पूर्व कथर्नानुसार मूर्त्तिरूप ऋग्वेद पार्थिव होने से कृष्ण है, मण्डल-रूप सामवेद दिव्य होने से शुक्ल है, एवं मध्य का श्रान्तरिक्ष्य यजुः हरित है । यदि द्यु लोक पर्य्यन्त ( सूर्य्य पर्य्यन्त ) मूर्ति, एवं परमेष्ठी पर्य्यन्त महिमा मानी जाती है, तो मूर्त्ति-रूप ऋग्वेद द्यौस्थानीय होने से शुक्ल है । एवं मण्डलरूप सामवेद आपः स्थानीय होने से कृष्ण है । मध्य में यजुः है । यदि श्रापोमय परमेष्ठी पर्य्यन्त मूर्ति, और वेदमय स्वयम्भू पर्य्यन्त महिमा मानी जाती है, तो मूर्त्तिरूप ऋग्वेद आपःस्थानीय होने से कृष्ण है । एवं मण्डलस्वरूप सामवेद स्वयम्भू-स्थानीय होने से शुक्ल है । १ स्वयम्भूः - वाक् - वेदाः - प्राणः - शुक्लः - यानि शुक्लानि तानि साम्नाम् २ परमेष्ठी - श्रापः - श्रापः - श्रापः - कृष्णाः यानि कृष्णानि तानि साम्नाम्, ३ सूर्य्यः -- अग्निः - द्यौः - वाक् - शुक्ला – यानि शुक्लानि तानि साम्नाम्; ४ चन्द्रमाः – आपः - अन्तरिक्षम् - अन्नम् - भ्रूणीव हरीणि तांनि यजूषि ५ पृथिवी – वाक् – पृथिवी – अन्नादः – कृष्णः- यानि कृष्णानि तान्यृचाम् या. कृ. तान्यृचाम् या. शु. तान्यृचाम् कृष्णमृगचर्म्म त्रयीविद्यामय है, यह पूर्व के प्रकरण से भलीभाँति सिद्ध होजाता है । वास्तव में ' त्रयीविद्या ' ही ' कृष्णमृगचर्न्स ' की प्रतिष्ठा है । पृथिवी यज्ञमयी है । यही यज्ञ सौरदेवमण्डल से उत्क्रान्त हुआ था । इस की प्रतिष्ठा वही वेद था । इसी सम्पूर्ण विज्ञान को लक्ष्य में रख कर याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' सैषा त्रयीविद्या यज्ञः ' । हौत्र, औद्गात्र, आध्वर्य्यत्र, भेद से यज्ञेतिकर्त्तव्यता तीन भागों में विभक्त है । होता का कर्म्म हौत्र है । उद्गाता का कर्म्म श्रद्गात्र है, एवं अध्वर्यु की इतिकर्तव्यता श्राध्वर्य्यव है । होता ‘ शस्त्र ' करता है, उद्गाता ‘ स्तोत्र ' करता है, अध्वर्यु ' ' ग्रह ' करता है । शस्त्र - स्तोत्र - ग्रह, तीनों के समन्वय से ही यज्ञ– स्वरूप निष्पन्न होता है । शस्त्र ऋग्वेद से होता है । इसका अधिष्ठाता ऋग्वेदी होता है । स्तोत्र सामवेद से होता है | इस का अधिष्ठाता सामवेदी उद्गाता है । ग्रह यजुर्वेद से होता है, इसका अधिष्ठाता यजुर्वेदी अध्वर्यु है । ऋग्वेद अग्निस्थानीय है । यजुर्वेद वायुस्थानीय है । सामवेद स्थानीय है । पार्थिव त्रैलोक्याग्नि में सोमाहुति होना हीं यज्ञ है । यह यज्ञ कृष्णमृग है । इसकी प्रतिष्ठा शस्त्र-स्तोत्र - ग्रह – स्वरूप सम्पादक. ऋग्यजुः साम ही हैं । ऋक् साम, दोनों वाकू - प्रधान हैं । दोनों से आत्मा का वाग्भाग सम्पन्न होता है । यजुः प्राणप्रधान है । इस से प्राणभाग की निष्पत्ति होती है | एवं त्रयीवेदमूर्ति ब्रह्मा मन के स्वरूप का सम्पादन करते हैं । इसप्रकार त्रयीविद्या के आधार पर सोमाहुति के द्वारा मनः - प्राण-वाङमय यज्ञात्मा, किंवा दैवात्मा निष्पन्न होजाता है, जैसाकि, प्रारम्भ में हीं विस्तार से बतलाया जाचुका है । इसी विज्ञान के आधार पर हम यज्ञ के लिए श्रवश्य ही ' सैषा त्रयी विद्या यज्ञः ' यह कह सकते हैं । ५४१
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प्रथमकाण्ड प्रजापति शिल्पी हैं | नवीन नवीन शिल्प सम्पन्न करते रहना हीं उनका नित्यकर्म्म है । अपने आत्मा का नवीन नवीन छन्दों से संस्कार करते रहना हीं ' शिल्प ' कहलाता है । प्रजापतिने इसी ग्रात्म-संस्काररूप ' विश्वशिल्प ' से उसीप्रकार अपने आपको संस्कृत कर रक्खा है, जैसे कि प्रजापति के अंशभूत जीवात्माने शरीरावच्छिन्न होकर नाना संस्कार - शिल्पों से अपने आपको संस्कृत कर रक्खा है । सम्पूर्ण विश्व उस का संस्कार है । सूर्य्य - चन्द्र - पृथिवी - आदि सब उसके शिल्प हैं । असंस्कृत प्रजापति शुद्धरूप परिणत होता हुआ विश्वातीत है । मन की कामना से, प्राण के तप से, एवं वाक् के श्रम से नवीन नवीन पदार्थ उत्पन्न कर उनको अपने आप में प्रतिष्ठित करता हुआ आज वह शिल्पी विश्व का अध्यक्ष बन रहा है । सूर्य्य चन्द्रादि आत्मसंस्कृति है । यही शिल्प है । इसी आधार पर ' आत्मसंस्कृतिर्वै शिल्पानि ' ( गो ० ब्रा ० उ ० ६।७ ) यह कहा जाता है | विश्वस्वरूप · सम्पादक सर्वहुतयज्ञ के द्वारा जैसे महाप्रजापति ( ईश्वर ) आत्मसंस्काररूप नवीन नवीन शिल्प का निर्माण करते रहते हैं, उसी प्रकार अपने वैधयज्ञ के द्वारा यह प्रजापति ( यज्ञकर्त्ता यजमान ) भी मन: - प्राण - वाक् के द्वारा शस्त्र - स्तोत्र - ग्रह - रूपा वेदत्रयी से आत्म– सस्काररूप नवीन दिव्यात्मा का निर्माण कर उससे अपने आत्मा का ( मानुषात्मा ) संस्कार कर लेता है । इसी आधार पर श्रुति ने कहा है— “ आत्मसंस्कृतिर्वै शिल्पानि । छन्दोमयं वा एतैर्यजमान आत्मानं संस्कुरुते ” । = ऐतरेयब्राह्मण ६,१७ । वास्तव में आत्मसंस्कृति ही शिल्प है । चित्रकार पहिले अपने मानस पटल पर चित्र बनाता है । अनन्तर उसे बहिः पटल पर खचित करता है । अन्तर्जगत् के चित्र से उसका आत्मा संस्कृत होजाता है । वासना - भावनारूप कर्म्म - ज्ञान - जनित संस्कार ही शिल्प हैं । इह्रीं से आत्मा संस्कृत होरहा है । मनः, वाक्, प्राण, तीनों में मन, और वाक् पङगु हैं । प्राण ही गतिशील है । प्राण के आधार पर मनोवाक् श्रागे चलते हैं । मध्यस्थ प्राण मन का भी सञ्चालन करता है, वाक् का भी सञ्चालन करता है । प्राण - व्यापार ही मुख्य है । इसी के तप से नवीन वस्तु का निर्माण होता है । अत: ' प्राणाः शिल्पानि ' ( कौ ० ब्रा ० २५।१२।१३ ) के अनुसार प्राणों को ही ' शिल्प ' मान लिया जाता हैं । यह शिल्प अनुरूप प्रतिरूप भेद से दो प्रकार का है । ( ( ( ( ( इन रेखाओं का परस्पर जो सम्बन्ध है, वही ' अनुरूप ' सम्बन्ध कहलाता है । एवं ( ( ( ( ( इन का भी परस्पर का सम्बन्ध अनुरूप ही कहलाता है । दोनों स्वतन्त्ररूप से अनुरूप हैं । परन्तु दोनों में एक दूसरे के साथ जो सम्बन्ध है, वही ' प्रतिरूप ' सम्बन्ध कहलाता है । पूर्वरूप का उत्तररूप प्रतिरूप है । उत्तररूप का पर्वरूप प्रतिरूप है । एवं दोनों का समुच्चय ही अभिरूप है । अर्थात् दोनों का परस्पर का सम्बन्ध ही ' अभिरूप ' कहलाता है । अभिरूप का नाम ' शिल्पसौन्दर्य्य ' ( कारीगरी ) है । शिल्प वही सुन्दर होता है, जिसमें दो प्रतिरूप शिल्पों का सम्बन्ध हो । मनुष्य वही सुन्दर कहलाता है, जिसके दक्षिण, और वाम भाग परस्पर प्रतिरूप होते हैं । जैसा आकार वाम भाग का होता है, वैसा ही यदि दक्षिण भाग का होता है, तभी सौन्दर्य्य का विकास होता है । दहिनी आँख से बाँई आँख, दहिने कपोल से वाम कपोल, दक्षिण नासिका से वाम नासिका, इसप्रकार एक ५४२
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शतपथब्राह्मण दूसरे के ठीक प्रतिरूप होने में ही सुडोलभाव उत्पन्न होता है । यदि दोनों भागों में वैषम्य है, तो सौन्दर्य्य का अभाव है । अभिरूपता में ही सौन्यर्थ्य का विकास है । मूर्त्ति वही उपास्या मानी जाती है, जिसका शिल्प अभिरूप हो । ‘ आभिरूप्याच्च बिम्बानां देवः सान्निध्यमृच्छति ' ( १ ) यह प्रसिद्ध है । इसी अनुरूप शिल्प का स्वरूप बतलाते हुए महर्षि ताण्ड्य कहते हैं । " पूर्वमुचैव तद्र पमपरेण रूपेणानुवदति । यत् पूर्वं रूपमपरेणानुवदति, तदनु-रूपस्यानुरूपत्वम् ” । तां ० महाब्राह्मण ०१२।१।५ इस अनुरूप शिल्प की प्रतिकृति ( नकल ) ही ' प्रतिकृतिशिल्प ' कहलाता है । मनुष्य अनुरूप शिल्प है । चित्र प्रतिकृतिशिल्प है । जैसे लौकिक शिल्प ( मनुष्यकृत शिल्प ) दो प्रकार का है, उसीप्रकार ईश्वरीय शिल्प भी भागद्वय में हीं विभक्त है । यज्ञपुरुष, स्वयम्भू, कूर्म्म, आदि त्रिवर्त्त ' ईश्वरप्रजापति के अनुरूपशिल्प हैं । मनुष्य- शालग्राम - कछुआ - ये उन अनुरूप शिल्पों की प्रतिकृतियाँ है । उपासनाकाण्ड में इस प्रतिकृतिशिल्प का मुख्यरूपेण उपयोग होता है । यज्ञपुरुष त्रैलोक्य में व्याप्त है । पृथिवी गार्हपत्य है । अन्त-रिक्ष दक्षिणाग्नि है । द्युलोक श्राहवनीय है । महामण्डल वेदि है । इसी यज्ञपुरुष की प्रतिकृति ( नकल ) मनुष्य । मनुष्य उस यज्ञ की प्रतिकृति है । इसके द्वारा उस यज्ञपुरुष की उपासना की जाती है । प्रतिकृति के द्वारा उपासक उस वास्तविक तथ्य के समीप पहुँच जाता है । अतएव इस व्यापार को ' उपासना ' ( समीप बैठना ) कहा जाता है । उपास्य वास्तविक शिल्प है । उपासना का साधनभूत मनुष्य प्रतिकृतिशिल्प है । दोनों अभिन्न । इसी आधार पर ' यज्ञो वै पुरुषः । पुरुषो वै यज्ञः ' ये दोनों निगम प्रचलित हैं 1 किसी निरावरण प्रान्त में खड़े होजाइए । वहाँ आपको चारों ओर का क्षितिज आकाश से मिला हुथ्रा प्रतीत होगा । ऊपर वत्तु ' लाकार आकाश देखेंगे । नीचे सपाट धरातल ( मैदान ' ) देखेंगे । यही ' कूर्म्म प्रजापति ' है । नीचे का भाग बुध्न ( पैंदा ) है । ऊपर का भाग पृष्ठ [ पीठ ] है । जैसा स्वरूप कछुए का है, वैसा ही इसका है । अतएव इसे ' कूर्म्म ' कहा जाता है । यह ईश्वरप्रजापति का वास्तविक शिल्प है | इस की नकल कछुआ है । जैसा स्वरूप त्रैलोक्यव्यापक उस कूपप्रजापति का है, वैसा ही इस कछुए का है । त्रैलोक्यव्यापक कूर्म्स के चारों ओर पारमेष्ठ्य पानी भरा हुआ है । एवं वह दधि घृत - मधु - इन तीनों रसों से युक्त है । पृथिवी दधि से युक्त है । अन्तरिक्ष घृत से पर्ण है । द्युलोक मधुमय है | चिदात्मा-स्वरूप उस चित्य ईश्वरप्रजापति के ऊपर इस श्रगर्भित दधि मधु धृतात्मक त्रैलोक्यव्यापक कूर्म्म का चयन हो रहा है | इसीलिए वैधयज्ञ में भी कूर्म की ' चिति ' की जाती है । श्राप: के स्थान में कछुए के चारों ओर अत्रमूर्ति ' अवका ( शैवाल ) ' त्रिछाए जाते हैं । एवं दधि - मधुघृत का उस पर लेप किया जाता है 1 इस कूर्म्म की उपासना से उस वास्तविक कूर्म्म का सम्बन्ध होजाता है । कहना यही है कि, कछुआ उस कूम्र्म्म-( १ ) - अर्चकस्य तपोयोगात्, यर्च्चनस्यातिशायिनात् । भिरूप्याच्च विम्बानां देवः सान्निध्यमृच्छति ॥। ५४३
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प्रथमकाण्ड प्रजापति का प्रतिकृतिशिल्प ही है । ईश्वर प्रजापति स्वयम्भूमूर्ति है । सूर्य्यरूप भूतज्योति का वहाँ अभाव है ।
प्रतएव -श्रासीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।
अप्रतर्क्यमनिद्दश्यं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥
— मनुः इस के अनुसार उसे घोर कृष्ण माना जाता है । वतुल स्वयम्भू काला है 1 । उसके उदर में ( केन्द्र में ) ज्योतिर्म्मय हिरण्मय सूर्य्यं प्रकाशित होरहा है । यह है ईश्वर का साक्षात् शिल्प | ' शालग्राम प्रतिमा ' ठीक इस की प्रतिकृति है । शालग्राम ऊपर से वतु लवृत्त है । काला है । इसके केन्द्र में सुवर्ण है । एवं रश्मियों के स्थान में भीतर धाराएँ पड़ी हुई हैं | वास्तविक शालग्राम वही कहलाता है, जिसके केन्द्र में सुंत्रण हो | वही वास्तविक प्रतिकृति होने से उपासना का साधन है । परन्तु ऐसे शालग्राम बहुत कम मिलते हैं । नेपाली लोग सूक्ष्म छिद्र कर उनका सोना निकाल लेते हैं । ऐसा शालग्राम अनुपास्य है । कहना यही है कि, शालग्रामप्रतिमा उस स्वयम्भूप्रजापति की प्रतिकृति हैं । ठीक इसी प्रकार ‘ कृष्ण-मृग ' उस कृष्णमृग ( पार्थिव अग्नि ) की प्रतिकृति ही है । जैसा इस का स्वरूप है, ठीक वैसा ही स्वरूप इस कृष्णमृग ( पशु ) का है । इस के तीनों वर्ण उत वेदत्रयी के शिल्प हैं । प्रकृति की लीला बड़ी विचित्र है । जिस देश में वेदावतार हुआ है, उसी देश में ' कृष्णमृग ' उपलब्ध होता है । काला हरिण भारतवर्ष की प्रातिस्विक वस्तु है । क्योंकि वेदत्रयीघन कृष्णमृग की प्रधानता इसी देश में हैं । यहीं वेदविद्या प्रादुर्भूत हुई है । वेद के आधार पर चातुर्वर्ण्य मूलक धर्म्मतत्त्व प्रतिष्ठित है । उधर उसी वेदाग्नि का अवतार कृष्णमृग है । इसी आधार पर ये प्राप्तवचन प्रसिद्ध हैं कि-' ब्रह्मणो दा एतदुं ऋक्सामयो रूपं, यत् कृष्णाजिनम् ' । – तै ० व्राः २ | ७ | ३ | ३
' कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः ।
सज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ' ॥
— मनुः २ रा २३ यज्ञ वेदत्रयी पर ही प्रतिष्ठित है | कृष्णमृग वेदत्रयी का ही प्रतिकृतिशिल्प है । अत: यज्ञप्रतिष्ठा के लिए यज्ञ में वेदत्रयी की सम्पत्ति प्राप्त करना आवश्यक होजाता है । वह वेदत्रयी प्राणरूपा । उसका ग्रहण इस मनुष्ययज्ञ में सम्भव नहीं है । ऋषियोंने अपने विज्ञानचक्षु के द्वारा यह देख लिया कि, जो स्वरूप प्राकृतिक वेद का हैं, कृष्णमृगं साक्षात् उसी की प्रतिकृति है । तभी से उन वैज्ञानिकोंनें यह विधान कर दिया कि, वैधयज्ञ में यज्ञप्रतिष्ठाभूत वेदतत्त्व की प्राप्ति के लिए तत्प्रतिकृतिभूत कृष्णमृग का ग्रहण करना चाहिए । प्रतिकृतिरूपा प्रत्ययालम्बनस्वरूपा उपासना में पशु कूर्म के द्वारा जैसे कूर्म्म-प्रजापति की चिति होजाती है, वैसे ही यहाँ भी कृष्णमृगचर्म्म के द्वारा तत्प्रभवभूता वेदसम्पत्ति का इस वैधयज्ञ से सम्बन्ध होजाता है । ५४४
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शतपथब्राह्मण यज्ञ की सर्वता के लिए ही कृष्णाजिन का ग्रहण होता है । इसी सार्व्य के लिए सोमयज्ञ में इसी कृष्णमृगचर्म्म पर बैठके यजमान दीक्षा लिया करते हैं । इसी सार्व्य की प्राप्ति के लिए हवि कूटना - पीसना --आदि सम्पूर्ण कार्य्य इसी पर किए जाते हैं । यज्ञ का स्वरूप हवि है । हवि ही पुरोडाश - स्वरूप में परिणत होकर अग्नि में आहुत होता है । यज्ञात्मा के स्वरूप - निर्माण के लिए जितना सा हविद्रव्य उपयुक्त समझा जाता है, उतना हीं लिया जाता है । ऐसी अवस्था में हविद्रव्य के कूटते पीसते हुए यदि उछट कर हविर्भाग भूमि पर गिर जायगा, तो उतना भाग यज्ञिय प्रदेश में गिर जाने से पुन: नहीं लिया जायगा । ऐसी अवस्था में उतने भाग के कम होजाने से यज्ञस्वरूप अधूरा रह जायगा । इस विषमा समस्या के निराकरण का एक-मात्र उपाय है कृष्णमृगचर्म्म पर हविः सम्पादन करना । यज्ञ की प्रतिष्ठा यज्ञ ही होसकती है, अन्य नहीं । इधर ' यज्ञो वै कृष्णाजिनम् ( श ० ६,४,६, ६ ) यज्ञो हि कृष्णः - स यः स यज्ञस्तत् कृष्णाजिनम् ( श ० ३,२,१,२ ) इत्यादि के अनुसार कृष्णमृगचर्म्म यज्ञमूर्ति है । वेदमूर्ति है । अतः इसी पर पेषणादि कर्म्म होने से पूर्वापत्ति का निराकरण होजाता है । पेषणादिकम्म करते समय जो कुछ हविर्भाग इधर उधर गिर जाता है, वह मृगचर्म्मरूप यज्ञ पर ही प्रतिष्ठित होता है । उसे पुन: उठाकर काम में ले लिया जाता है । इसप्रकार यज्ञ सर्वात्मना सम्पन्न होजाता है । यज्ञ में कृष्णमृगचर्म का ग्रहण क्यों किया जाता है?, इतर चम्म की अपेक्षा इसे क्यों पवित्र माना गया?, इत्यादि प्रश्नों का यही संक्षिप्त स्वरूप - समाधान है । एकत्रात औौर | यज्ञ सौरमण्डल से प्रवृक्त हुआ हैं । सौर तेन ' वर्च ' कहलाता है । ब्रह्मतेज, किंवा ब्रह्मवीर्य्य की प्रतिष्ठा यही ' वर्च ' है । इसका उद्गमस्थान सूर्य्यमण्डल है । कृष्णमृग इसी की प्रतिकृति है । अतः इसके चर्म्म में वर्चप्राण विशेषरूप से रहता है । इसी आधार पर श्रुति कहती है-“ कृष्णाजिनेऽध्यभिषिच्यत । एतद् वै प्रत्यक्षं ब्रह्मवर्चसम् " ( तां ० १७ | ११८ ) । “ स ( ब्रह्मचारी ) यन्मृगाजिनानि वस्ते, तेन तद् ब्रह्मवचे समवरुन्धे " ( गो ० पू ० २।२ ) । इसीलिए क्षत्रवीर्य्य - प्रधान क्षत्रियों को जहाँ सिंहच के ऊपर बैठने का आदेश है, वहाँ ब्राह्मणों को कृष्णाजिन पर ही बैठने का आदेश है । अतएव वेदस्वाध्यायोपक्रममूला सुप्रसिद्धा माता ' सावित्री ' से अनुप्राणित सुप्रसिद्ध यज्ञोपवीत संस्कार में इसी मृगचर्म्स का ग्रहण हुआ है महर्षियों के द्वारा | लोकसामान्य-दृष्टि से, एवं वर्त्तमानयुगीया धर्मनिरपेक्षा दृष्टि से मृगचर्म्म जहाँ साधारण चर्म्ममात्र है, वहाँ प्राणविद्यावित् परमवैज्ञानिक महामहर्षियों की दृष्टि से कृष्णमृगचर्म्म ही भारतीय संस्कृति का सर्वस्वाधार प्रमाणित होरहा है । इसी सम्पूर्ण विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं— “ सैषा त्रयी विद्या यज्ञः । तस्या एतच्छिल्पमेष वर्णः । तद्यत् कृष्णाजिनं भवति-यज्ञस्यैव सर्वत्वाय । तस्मात् कृष्णाजिनमधिदीक्षन्ते यज्ञस्यैव सर्वत्वाय " । — इत्यादि १,२,३, । उपपत्ति -- प्रकरण समाप्त हुआ । अत्र पद्धति बतलाते हैं । ' सञ्चरेण प्रोक्षणीर्निघाय - ' शम्र्मा--सीति कृष्णाजिनादानम् ' ( का ० श्र ० २ ० ४ क ० १ सू ० ) के अनुसार प्रणीता, और आहवनीय के ५४५
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प्रथमकाण्ड मध्य में प्रोक्षणी पानी रखने के अनन्तर ' शम्र्मासि ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु ( यज्ञ की सर्वता के लिए ) कृष्णमृगचर्म्म का ग्रहण करता है । लौकिक भाषा में ( ' संस्कृत ' नाम से प्रसिद्ध भारतीय भाषा में ) जो‘ चर्म्म ' नाम व्यवहृत होता है, वेदभाषा में ( छन्दोभ्यस्ता नाम की वेदभाषा में ) वही ' शर्म्म ' नाम से व्यवहृत होता है | ' शर्म्म ' छन्दोभाषा ( वेदभाषा ) का शब्द है । इसी अर्थ में संस्कृत - साहित्य में ' चर्म्म ' ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ' शम्र्मासि ' का अर्थ है ' चम्मसि ' । निरुक्तक्रम के अनुसार स - ह, -च - श, स – ख, ग – ज, द − ड, श -- छ, र ल ड -ल, आदि का अभेद सम्बन्ध माना जाता है । देशभाषाओं में इन के नृत्य-धिक उदाहरण मिलते हैं । ' हमारी सुनिए ' इस वाक्य के स्थान में मारवाड़ प्रान्त में ' झारी हुणो ' बोला जाता है । यहाँ ' स ' के स्थान में ' ह ' प्रयुक्त हुआ है । समानवयस्क के लिए जहाँ ' सम ' उमर प्रयुक्त होना चाहिए, वहाँ ' हम उमर ' बोला जाता है । जिसे हम ' सोम ' कहते हैं, जरथुस्थ सम्प्रदायानुगामी उसे ही ' होम ' कहते हैं ।‘गङ्गा ' का ' गेजस ' होजाता है । ' श्याम ' का ' छग्राम ' होजाता है । ' होली ' ' होरी ' होजाता है । इसीप्रकार चर्म्म का ' शर्म्म ' होजाता है । प्रयत्नतारतम्य हीं इस व्यवहार का मूलाधार है । भाषा के द्वारा भी मनुष्य के बलाबल का अनुमान लगाया जासकता है । उदाहरण के लिए एक भारतीय के साथ एक युरोपियन की तुलना कीजिए । भार--तीय ‘ तुम क्या करते हो’- बोलता है, तो युरोपियन इसी वाक्य के स्थान पर ' टुम क्या करटे हो ' यह बोलता | कारण इसका यही है कि- ' त ' दन्तस्थान से बुलता है । ' ट ' मूर्द्धास्थान से बुलता है । मूर्द्धा-स्थान पूर्व में है । उस के आगे दन्तस्थान है । अतएव इससे वर्णोच्चारण करने में मूर्द्धास्थान की अपेक्षा अधिक बल का प्रयोग करना पड़ता है । भारतीय मानव कृष्णमृगाग्निप्रधानदेश का निवासी है । अतः शीतप्रधान पाश्चात्य देशों की अपेक्षा इस में अधिक बल है । अग्निर्वा ' भूत्वा मुखं प्राविशत् ' इस औप-निषद सिद्धान्त के अनुसार कायाग्नि हीं वायु से धक्का खाकर क - च - ट - त - प- श्रादि वर्णरूप में परिणत होता है । अतएव युरोपियन की अपेक्षा प्रयत्नवल की अधिकता होने से भारतीय ' तुम ' बोल लेता है । युरोपियन भी बोलना चाहता है ' तुम ' ही । परन्तु वल की कमी से उसका प्रयत्न दन्तस्थान पर न जाकर मूर्द्धा पर ही विश्रान्त हो जाता है | अतएव ' तुम ' न बुल कर ' टुम ' बुल जाता है । ' श ' की अपेक्षा ' च ' में अधिक बल लगाना पड़ता हैं | इधर भौमस्वर्ग के देवता उत्तर में रहते थे । उत्तर सोम ( शीत ) प्रधान है । अतएव उनके मुख से ' च ' के स्थान में ' श ' बुल जाता था । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' शम्र्मासीति । चर्म्म वा एतत् कृष्णस्य ( कृष्ण मृगम्य ) । तदस्य तन्मानुषम् । देवा । तस्मादाह शम्र्मासीति ' । लाज यजमान यज्ञ कर रहा है । अपने अध्यात्म - देवताओं का आहुति के द्वारा आधिदैविक प्राणदे-वताश्रों के साथ योग करा देना हीं यज्ञ है । इस यज्ञविद्या के प्रथमप्रवर्त्तक भौम मनुष्यदेवता थे । उहीं से भारतीयोंने यज्ञविद्या की शिक्षा प्राप्त की । वे लोग क्योंकि चर्म को ' श ' बोला करते थे, अतएव ' यद्वै देवा अकुर्वंस्तत् करवाणि ' - देवाननु त्रिधा नै मनुष्याः ' के अनुसार यहाँ भी ' शर्म्म ' हीं बोलना उचित है | ‘ देवो भूत्त्वा देवं भावयेत् ' के अनुसार देवमण्डलरूप यज्ञमण्डल में देवमर्थ्यादा का ही अनुगमन करना उचित है । वास्तव में ‘ शर्म्म ' ‘ चर्म्म ' हैं । इसीलिए तो ब्राह्मण को ' शर्मा ' कहा जाता है । ब्राह्मण शर्मा है | क्षत्रिय वर्मा है । वैश्व गुप्त है । समाज एक महती संस्था है । यदि इसका यथावत् सञ्चालन न ५४६
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शतपथब्राह्मण ` किया जाय, तो समाज में अनेक दुर्गुणों का समावेश होजाय, जैसा कि आज होरहा है । तत्कालीन समाज-शास्त्रियोंने ं समाजशान्ति के लिए ब्रह्म-- क्षत्र -- विड् -- वीर्य्य भैद से समाज को तीन भागों में विभक्त किया । समाज का प्रधानबल अर्थबल ( सम्पत्तिबल ) है । जिस समाजका सम्पत्तिचल क्षीण होजाता है, उसका नाश शीघ्र ही होजाता है । ईश्वर न करै, इसी रोग के कारण भारत अपनी ' भा ' किसी दिन खो बैठे । सम्पत्ति के अधिष्ठाता वैश्य हैं । यही वास्तत्रिक समाज है । ज्ञानप्रधान ब्राह्मण, क्रियाप्रधान क्षत्रिय, शिल्पप्रधान शूद्र, तीनों की सत्ता इसी वैश्यवर्ग पर अवलम्बित है । बाहिर के शत्रुओं का आक्रमण शरीर पर होता है । इसे रोकने के लिए क्षत्रिय है । एवं आधिदैविक - आध्यात्मिक - आधिभौतिक - आक्रमण अन्तरङ्ग आक्रमण । समय में वर्षा होना, भूकम्प होना, महामारी होना, ये सब आधिदैविक आक्रमण हैं । अविद्या - अस्मिता - रागद्वेषादि का प्रभुत्त्व होजाना आध्यात्मिक आक्रमण हैं । ज्वर-- गठिया - सन्नि-पात - त्रण आदि आधिभौतिक आक्रमण हैं । इन तीनों श्राक्रमणों से समाज को बचाने वाला ब्राह्मणवर्ग है । आधिभौतिक आक्रमण से रक्षा करने वाला आयुर्वेदशास्त्र है । अध्यात्माक्रमण से बचाने वाला दर्शनशास्त्र है | एवं आधिदैविक आक्रमण से बचाने वाला धर्मशास्त्र है । तीनों हीं शास्त्रों के प्रवर्त्त'क ब्राह्मण हैं । इसप्रकार ब्राह्मण, और क्षत्रिय, दोनों से समाज सुरक्षित रहता है । उदाहरण के लिए शरीर को ही लीजिए । शरीर एक समाज है | सर्दी गर्मी - यदि बाहिर के आक्रमणों को रोकने के लिए वस्त्र, किंवा ' चम् ( कवच ) ' धारण करना पड़ता है । इस से बहिरङ्गरक्षा का सम्बन्ध है । एवं रसासृङ ्ममांसादिमय शरीर की रक्षा च से होती है । चम्र्म्म, और वर्ग से समाजरूप शरीर ' सुगुप्त ' ( सुरक्षित ) रहता है । इसी विज्ञान के आधार पर बहिरङ्गरक्षा करने वाला क्षत्रिय ' व ' स्थानीय होने से ' धर्मा ' कहलाता है । एवं अन्तरङ्गभाग की रक्षा करने वाला ब्राह्मण चर्म्मस्थानीय होने से शर्मा ' ' कहलाता है । ब्राह्मण भूदेव है । एवं देवसम्प्रदाय में पूर्वकथनानुसार ' च ' के स्थान में ' श ' प्रयुक्त होता है । अतः वह ‘ चर्म्मा ' न कहलाकर ' शर्मा ' शब्द से ही व्यवहृत किया जाता है । चर्म्म - श - रूप इन ब्राह्मण, क्षत्रिय के द्वारा समाजरूप वैश्य क्योंकि गुप्त, सुरक्षित रहता है । अतएव वैश्य को ' गुप्त ' कहा जाता है । तीनों वर्णं क्रमशः शम्र्मा, वर्मा, गुप्त, क्यों कहलाते हैं?, इस प्रासङ्गिक प्रश्न का यही संक्षिप्त समाधान है ( १ ) । • शर्म्म ( चर्म्म ) ग्रहणानन्तर ' अपेत्य पात्रेभ्योऽवधूनोत्यवधूतमिति ' ( का ० श्रौ ० सू ० २ श्र ० ४ कं ० २ सू ० ) के अनुसार वेदि पर रक्खे हुए पात्रों से ( पात्रों को मृगचर्म्म की धूलि से बचाने के लिए ) कृष्णमृगचर्म्म को पृथक् कर उत्कर में कृष्णमृगचर्म्म को ' अवधूतं रक्षोऽवधूता श्रतियः ' यह मन्त्र भाग बोलता हुआ ध्वर्यु ' झड़कारता है । ' राक्षस ' और ' अराति ' भेद से शत्रु दो प्रकार के होते हैं | ( १ ) -विस्तार के लिए देखिए! गीताभाष्यभूमिकान्तर्गत ' कर्म्मयोगपरीक्षा ' नामक चतुर्थखण्ड का--' वरणत्र्यवस्थाविज्ञान ' नामक प्रकरण । * यज्ञ में जो द्रव्य निरर्थक होजाता है, वह सब ( हवि का निरर्थकं भाग, हाथ धोने से शेष बचा पानी ) जिस नियत स्थान में डाला जाता है, वह स्थान ' उत्कर ' कहलाता है । ५४७