Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 811–820

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 811–820

पृष्ठ 811

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प्रथमकाण्ड चलते हु • कार्य्यं को अवरुद्ध कर देने वाला शत्रु ' राक्षस ' कहलाता है । एवं आती हुई सम्पत्ति का अव— रोध करने वाला शत्रु ‘ अराति ' कहलाता है । चलती हुई मशीनरी मिट्टी भरने से रुक जाती है । यह मिट्टी मशीन के लिए राक्षस है । यदि मिट्टी न होती, तो मशीन ठीक चलती हुई द्रव्योपार्जन करती । इस द्रव्य के आगमन का अवरोध भी इसी मिट्टी के द्वारा ही हुआ है । अतः यह उसके लिए ‘ अराति ’ भी है । कृष्णमृगचर्म्म के रोमों में मिट्टी और सूक्ष्म कीटाणु लगे रहते हैं । दोनों हीं यज्ञिय हैं । इनका यदि यज्ञ में प्रवेश होजायगा, तो यज्ञिय पदार्थ के प्रवेश से यज्ञधारा में भी विच्छेद होगा, एवं यज्ञजनित सम्पत्ति का भी निरोध होगा । श्रुतः इहें हम अवश्य ही यज्ञ के राक्षस और अराति मान सकते हैं । वस्त्रादि में ये दोनों भाव रहते हैं । अतः श्रुति शिक्षा देती है कि, आसन वस्त्र पात्रादि को जब भी तुम काम में लो, उह्न पहिले झड़कारलो, स्वच्छं करलो । अन्यथा तद्गत दूषितभाव तत्कम्मं का बाधक होता हुया तत्कर्म्मजनित सम्पत्ति का विरोध कर देगा । कृष्णमृगचर्म्म को झाड़ते समय पात्रों का ध्यान रखना चाहिए । पात्रों में धूलि आदि प्रविष्ट न हो, अत: पात्रों से इसे हटाकर ही अवधूनन करना चाहिए । इससे यह भी शिक्षा मिलती है कि, वस्त्रादि झडकारते समय इस बात का भी ध्यान रक्खो कि, उस धूलि आदि का अन्य पदार्थों में प्रवेश न हो । जबतक वस्तु को अवधूनन के द्वारा स्वच्छ नहीं कर लिया जाता, तबतक उसे काम में लेने की इच्छा नहीं होती । आत्मा उसके साथ सङ्गम नहीं करना चाहता । वह श्रमेध्य रहता है । अवधूननानन्तर वह आत्मा का ग्राह्य बनता हुआ मेध्य बन जाता है । इसी मेध्यभाव की प्राप्ति के लिए कृष्णमृगचर्म्म काश्रवधूनना जाता है । इसी अभिप्राय से ' यद्धयस्माममेध्यमभूत्, तद्धयस्यै तद्वधुनोति ' यह कहा है || ४ || अत्रधूननानन्तर ‘ प्रत्यग्ग्रीवमास्तृणाति - अदित्या त्वक् ' इति ( का ० श्री ० २२४१३ ) के अनुसार उस चर्म्म को प्रतीचीनग्रीव बनाकर बिछाते हैं । चर्म का शिरोभाग पश्चिम में होना चाहिए, यही तात्पर्य्य है । पृथिवी को ' अदिति ' कहा जाता है । पृथिवी का वह भाग अदिति कहलाता है, जो कि सूर्य्य की ओर रहता है । अदिति, और दिति के तात्त्विक स्वरूप का पूर्व के ' सूर्य्य - पृथिवी - नक्षत्र -मूला ' अदिति - दिति प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है । प्रस्तुत रेखाचित्र के द्वारा तथोक्त अदिति, दिति, भावों का सर्वात्मना स्पष्टीकरण होजाता है । महिमा पृथिवी को पूर्व में अदितिरूपा पिएड़पृथिवी का ( जो कि सुप्ताग्नि-मय होने से कृष्णमृग है ) चर्म्म कहा है । पृथिवी के ऊपर जो कुछ है, सब इसकी त्वचा ही है । अतः इसे हम अवश्य ही इस अदिति की ' त्वचा ' मान सकते हैं । विरोधभाव श्रासुरभाव है । यह यज्ञ का विघातक है । परकीयता में विरोध है । किन्तु अपने आत्मीय के साथ कोई विरोध नहीं करता । कृष्णमृगचर्म्म वास्तव में पृथिवी का ही चर्म्म है । अतः इसे अपने ऊपर रखते हुए इसमें क्षोभ नहीं होता । ध्यान रहे, सर्वसामान्य की दृष्टि में नो जड़ है, ‘ ईशावास्यमिदं सर्वम् ' इस सिद्धान्त के मानने वाले ऋषियों की दृष्टि में वह चेतन ही है, जैसाकि पूर्व के – व्यापकचैतन्यदिग्दर्शनात्मक प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । अवश्य ही मनोमय - प्राणानुबन्ध से पार्थिवस्तर भी चेतन है, जो कि अदितिरूप है । एवं तत्त्वगुरूप कृष्णमृगचर्म्म भी चेतन है । दोनों सजातीय हैं । विजातीय प्राणों का श्राधाराधेयभाव जहाँ उभय प्राण - क्षोभ का जनक माना गया है, वहाँ सजातीय - प्राणों का आधाराधेयभाव शान्ति - स्वस्ति का ही प्रवर्तक बनता है । इसी प्राणसाना-त्यमूला स्वस्ति, शान्ति को लक्ष्य बना कर श्रु तिने कहा है कि— प्रति हि स्वः संजानीते । नेत् श्रन्योऽन्यं 1 ५४८ हिनसातै ॥५ ॥

पृष्ठ 812

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शतपथब्राह्मण सौर- अदितिमण्डलपरिलेख: ----—-नमस्त्रिमूर्त्तये तुभ्यं प्राक्सृष्टेः केवलात्मने— ) जगती ( आदित्याः आदित्य ---) त्रिष्टुप ( रूद्राः वायु: ) गायत्री बसवः ( अग्निः IIIII IIII IIII IIIII ) अग्निः देवदूतः () सहरक्षा असुरदूतः ( Y सायं सवनम् ------- माध्यन्दिनं नम अन्तरिक्षम् प्रातः पृथिवी सवनन दितिः ४४६

पृष्ठ 813

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प्रथमकाण्ड चर्म्मास्तरणानन्तर ‘ सव्याशून्ये निदधात्युलूखल - मद्रिरसि ग्रावासीति वा ' ( का ० श्र ० २/४/४ ) के अनुसार वह अध्ययुं वामहस्त से कृष्णमृगचर्म्म का स्पर्श किए हुए ही ॥ ५ ॥

दक्षिण हस्त से उलूखल मूसल का ग्रहण करता है । प्रत्येक कर्म्म की एक स्वतन्त्र धारा रहती है । यदि मध्य में हीं उसका विच्छेद होजाता है, तो उस कर्म्म का स्वरूप छिन्न भिन्न होना AT है 1 । आपने विपी विषय का अध्ययन प्रारम्भ किया । यदि ' दीर्घकालादर नैरन्तर्य्य सत्कारा सेवितो दृढभूमिः ' के अनुसार नियत समयपर्य्यन्त नियतरूप से अध्ययन करते रहते हैं, तो अध्ययन सफल होता है । यदि मध्य में अन्तराय होजाता है, तो सन्तान - क्रम के विच्छिन्न होजाने से विद्यासंस्कार विच्छिन्न होजाता है । अध्ययन निदर्शनमात्र है । संसार के जितने भी कर्म हैं, सर्वत्र यही साधारण नियम है । जिस काम को हाथ में ले लिया, उसे मनसा - वाचा - कर्मणा - पूर्ण करके ही विश्राम लेना चाहिए । मध्य में छोड़ देने से अथवा बीच बीच में उस कार्य्य को छोड़ छोड़ कर करने से कर्म्मसन्तानरूपा प्राणविद्य त् का विच्छेद होजाता है । यह विच्छेदक प्राण ह्रीं असुर है । कर्म्म छोड़ते ही वह आत्मा पर आक्रमण कर लेता है । इसी आसुरभाव के आक्रमण से श्राल-स्य का प्रवेश होजाता है । आत्मा का उत्साह नष्ट होजाता हैं । कृष्णमृगचर्म्म बिछा कर उसके ऊपर पात्रों को रख देना एक कर्म्म है । ऐसी अवस्था में चर्म्मास्तरण, और पात्रासादन के मध्य में अन्तराल होजायगा, तो इस एक कर्म्म से सम्बन्ध रखने वाली विद्युद्वारा विच्छिन्न होजायगी । अतः अध्वय्यु ' को चाहिए कि, वह इस विद्युद्घारा - सम्बन्ध को सुरक्षित रखने के लिए कृष्णमृगचर्म का स्पर्श किए हुए ही पात्रों को उस पर रक्खे | वैधयज्ञ के द्वारा अपने आत्मा को दिव्य भावापन्न करने वाला आहिताग्नि ब्राह्मण साक्षात् ' सान्त-पनाग्निमूर्त्ति ' है । ऐसे ब्राह्मण की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती । इसके दर्शन - स्पर्श - भाषण से आसुर भाव का विनाश होजाता है । ' अग्निहिं रक्षसामपहन्ता ' ( कौ ० ८ | ४ | ) के अनुसार आग्नेय प्राण आप्यप्रधान श्रासुरप्राण का विनाशक है । इधर ब्राह्मण इस ' असुरघ्न ' एवं ' रक्षोघ्न ' अग्नि की साक्षात् प्रतिकृति है । जिसके शरीर में यह अग्नि प्रज्ज्वलित रहता है, कार्य्याविरोधक - राक्षस - असुर उसका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकते । वह मनस्वी अपने अग्निबल के प्रभाव से सम्पूर्ण विघ्न - बाधाओं का सन्तरण करता हुआ अपने प्रारब्धकर्म्म को यथावत् सुसम्पन्न करने में समर्थ होजाता है । ब्रह्मवर्चस्वी ब्राह्मण कभी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं होसकता | उसके कोश में ' आलस्य ' शब्द का ऐकान्तिक अभाव है । समाज का सञ्चालक ज्ञानमूर्ति ब्राह्मण है | दुर्भाग्यवश यदि समाज के इस श्रृङ्ग में शिथिलता आ जाती है, तो सम्पूर्ण समाज बिना नींव के प्रासाद के समान विध्वस्त ही होजाता है । कहना न होगा कि, यज्ञमूला दिव्याग्निसम्पत्ति का तिरस्कार कर ब्राह्मणसमाज आज किस अवनति पर पहुँच गया है! किसी समय ब्राह्मण के लिए ' ब्राह्मणो हि रक्ष-सामपहन्ता ' यह कहा जाता था । आज ठीक इसके विपरीत इनके लिए ' राक्षसो हि ब्राह्मणानामपहन्ता ' यह वाक्य चरितार्थं होरहा है । प्रकृतिसिद्ध उसी प्राणाग्निवल के प्रभाव से वह ब्राह्मण अध्वर्यु अपने कर— स्पर्श से आासुरमाव का उन्मूलन कर रहा है । इसी आधार पर श्रुति ने कहा है—. " ब्राह्मणो हि रक्षसामपहन्ता " ॥ ६ ॥

उलूखल ग्रहणानन्तर ‘ अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुध्नः ' यह मन्त्र बोलता हुआ अध्वर्यु उलूखल को कृष्णमृगचर्भ के ऊपर रखता है । हविर्यज्ञ के अनन्तर पिण्डपितृयज्ञ - वसिष्ठयज्ञ - दाक्षायण-५५०

पृष्ठ 814

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शतपथब्राह्मण यज्ञ - वरुणप्रवासेष्टि आदि अनेक इष्टियाँ होतीं हैं । अनन्तर ' पशुबन्ध ' यज्ञ होता है! सर्वान्त में बहुत श्रागे जाकर पुरुषार्थस्वरूप ' सोमयज्ञ ' किया जाता है । सोम साक्षात् ' राजा ' है । भौमन्निलोकी के व्यवस्थापक प्राग्मेरुस्थ ( पामीरस्थ ) हिरण्यशृङ्ग पर्वत - निवासी भगवान् ब्रह्मा ने महर्षि अत्रि के पुत्र परमसुन्दर चन्द्रमा को उत्तर दिशा का दिक्पाल बनाया था । इहें गन्धर्वों का नायक बनाकर सोमल्ली की रक्षा के लिए नियत किया था । सोमाहुति से यज्ञ निष्पन्न होता । यज्ञ ही ब्राह्मणों का बल है । अतएव ब्राह्मण इस सोम के लिए बड़े गर्व से - ‘ सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा ' यह कहा करते हैं । ब्राह्मणों के ऊपर त्रिष्टुप्छन्दा क्षत्रिय राजाओं का शासन नहीं है, अपितु सोम ही उनका शास्ता है । हमारा राजा सोम है ॥ सोम का प्रभव-स्थानं चन्द्रमा है । इसी आधार पर ' एष वै सोमो राजा देवानामन्न ं यच्चन्द्रमाः ' - यह कहा जाता है । चान्द्रसोम से निष्पन्न होने वाली सोमवल्ली का वड़े आदर के साथ क्रय किया जाता है । अनन्तर प्रादेशमात्र खण्ड करके उसके ' अंशु [ पूली ] ' बना लिए जाते हैं । उन सोमाशुओं का ग्रावाओं से ' अन्त-र्याम ' नाम से प्रसिद्ध शिला पर पेषण किया जाता है । यज्ञ बिना सोमाहुति के नहीं होता, यह निश्चित है । इधर प्रकृत के इस हविर्यज्ञ में पुरोडाश की आहुति दी जाती है । यह भी एक प्रकार का सोम ही है । साथ ही जैसे उस साक्षात् सोम का ' अभिपत्र ' होता है, वैसे ही यहाँ भी उलूखल - मुसल से, एवं हबदुपल ( तिल-लोढी ) से इस हवि का ‘ अभिषव ' होता है । इसप्रकार सोमसम्पत्ति का इस ' हविर्यज्ञ ' में सर्वात्मना सम्बन्ध सिद्ध होजाता है 1 । ‘ अन्नसोम ' की आहुति से हविर्यज्ञ भी अपने ' यज्ञ ' नाम को सर्वात्मना चरितार्थ कर लेता है । इसी यज्ञसम्बन्ध का प्रतिपादन करते हुए याज्ञवल्क्य कहते हैं- ' तद्यथैवादः सोमं राजानमभिषुण्वन्ति ० ' । सोम की अनेक जातियाँ हैं । अमुक सोम पदार्थ को तरल बना देता है । अमुक विरल वना देता है, तो अमुक सोम उस पदार्थ में प्रविष्ट हो उसे घन बना देता है । पदार्थ में घनता सम्पादन करने वाला घनसोम ही वैदिक विज्ञानशास्त्र में ' अद्रि ' नाम से प्रसिद्ध है । पाषाण अति कठिन होता है । कारण इसका वही है कि, पाषाण में अद्रिसोम अत्यधिक मात्रा में रहता है । अतएव यह ' अद्रि ' नाम से प्रसिद्ध होता है । वनस्पतियों में सब से कठिन ' भद्रपर्णी ' है । उसी का उलूखल, मुसल बनता है । वनस्पति का होता हुआा भी यह अद्रि है । सहसा द्रुत नहीं होसकता । क्योंकि इस में अद्रि सोम की प्रधानता है, अतएव इसका एक नाम ' अद्रि ' भी रख दिया है । अद्रिरसि वानस्पत्यः ' इस मन्त्र से, अथवा ' ग्रावासि पृथुबुध्नः ' इससे, दोनों में से किसी एक से उलूखल का निधान करना चाहिए! यह ग्रावा ( पाषाणतुल्य होने से पाषाण ) ही है । इसका पैंदा चौड़ा है । इसप्रकार पूर्वोक्त मन्त्र - भागों में से किसी एक भाग के द्वारा उलूखल का निधान करके तदव्यवहितोत्तर ‘ प्रतित्वादितिर्वेत्तु ’ ( तुंमको अदिति पहिचाने ) यह मन्त्र बोलता है । यह ध्यान रखना चाहिए कि, ‘ प्रति-त्वेत्युभयोः ' ( का ॰ श्रौ ० २ | ४५ ) के अनुसार ' अद्रिरसिं वानस्पत्यः प्रतित्यादितिर्वेत्तु ’ ‘ पृथुबुध्नः-ग्रावासि प्रतित्त्वादितिर्वेत्तु ” इसका सम्बन्ध कराना आवश्यक है । पूर्व के कृष्णमृगचर्म्म - प्रकरण में कृष्ण-मृगचर्म्म को अदिति - स्वरूप बतलाया है । सजातीय पदार्थों का सम्बन्ध क्षोभरहित होता हुआ शान्ति का कारण बनता है । एवं विजातीय पदार्थों का सम्बन्ध क्षोभमूलकत्त्वेन शान्ति का कारण बनता है । अशान्ति आसुरभाव है । आज अध्वर्यु वानस्पत्य उलूखल का अदितिरूप कृष्णमृगचर्म्म के उपर प्रासादन करता है । ५५१

पृष्ठ 815

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प्रथमकाण्ड कहीं अदिति इसे विजातीय न समझले । इसे यह ध्यान रहे कि, वानस्पत्य होता हुआ यह मेरा ही अस है । अदिति - पृथिवी ही तो ओषधि, वनस्पति का मूल है । इसी परस्पर के सम्बन्धभाव को व्यक्त करने के लिए, ' प्रतित्वा ' इत्यादि कहा जाता है । इससे विरोधभाव शान्त होजाता है । इसी अभिप्राय से ऋषि कहते हैं—

' तत् संज्ञामेवैतत् कृष्णाजिनाय च वदति । नेदन्योऽन्यं हिनसातै ' - ॥७ ॥

उलूखलासादनानन्तर ‘ हविरावपत्यग्नेस्तनूरिति ' ( का ० श्रो ० २ | ४ | ६ | ) के अनुसार ' अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीतये त्वा गृहणामि ' ( यजुः १ | ५ | ) ( है हवि! आप अग्नि के शरीर हो, वाक् के विसर्जन हो, देवताओं के लिए आपका ग्रहण करता हूँ ) यह मन्त्र बोलता हुआ उलूखल में हवि डालता है । यह हविद्रव्य यज्ञ का ( यज्ञात्मा का ) सम्पादन करता है । प्रथम ब्राह्मण के भाष्य में यह विस्तार से बतलाया जाचुका है कि, मन्त्रपूत दिव्याग्नि में सोम की आहुति से नवीन दिव्यात्मा उत्पन्न किया जाता है । दिव्यात्मा सोमगर्भित अग्नि ही है । सोमगर्भितं अग्नि का, दूसरे शब्दों में- अग्नीषोम - समुच्चय का ही नाम यज्ञ है । अतएव अग्नीषोम के समन्वय से उत्पन्न होने वाले, स्वर्गप्राप्ति के कारणभृत इस दिव्यात्मा को ' यज्ञात्मा ' भी कहा जाता है | इस यज्ञात्मा की योनि अग्नि है, एवं रेत सोम है । सोमरेत की आहवनीयाग्नियोनि में आहुति होने से ही दैवात्मा का जन्म होता है । इसप्रकार एकमात्र सोमाहुति पर ही यज्ञात्मा का स्वरूप अवलम्बित है | श्राप जितने भी पिण्ड देख रखे हैं, सब इसी सोमाहुति का प्रभाव है । अग्नि विशकलनधर्मा हैं । वह कभी एक स्थान पर पिण्डीभूत नहीं रह सकता । इधर मोम संकोचधर्म्मा है । इसके प्रभाव से अग्नि की विशकलनशक्ति का अभिभव होजाता है । अग्नि सशरीरी बन जाता है । इसीप्रकार हमारे वैधयज्ञ में भी यज्ञस्वरूप - सम्पादक, अतएव ' तात्स्थ्यात्ताच्छव्यम् ' इस न्याय के अनुसार ‘ यज्ञ नाम से प्रसिद्ध यह हविः सोम दिव्याग्नि को शरीर ( पिण्ड ) रूप में परिणत करता हुआ इसे ' दैवात्मा ' बना देता | अतः हम अवश्य ही इसे अग्नि का शरीर कह सकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' यज्ञो हि, तेनाग्नेस्तनूः ' यह कहा 1 आपको स्मरण होगा कि, पात्र ग्रहण करते समय अविक्षुब्ध रहते हुए यज्ञवितान करने के लिए अध्वर्यु ' और यजमान, दोनों हीं ' वाक्संयमन करते हैं । आज इस हविग्रहणकाल में ही वाक् का विसर्जन होता है । अतएव इस हवि को हम अवश्य ही चाक् का विमोक करने वाला कह सकते हैं । वागुविसर्जन के विषय में दो मत हैं । अनुपद में हीं हविष्कृदाह्वानक होने वाला है । अध्वर्यु हविः सम्पादन के लिए पहिले से ही नियत ' हविष्कृत् ' नाम से प्रसिद्ध ऋत्त्विक का ' हविष्कृदे हि हविष्कृदे हिं ' ( हविः सम्पावन करने वाले चलो ) यह बोलता है । यही समय हविष्कृदाह्वान काल ' नाम से प्रसिद्ध है । इस समय वाग्वसर्जन करना, यह एक पक्ष है । एवं ' हवि॑िष्कृदेहि ' यह मन्त्र बोलते हुए वाग्विसर्जन करना, दूसरा पन्न् है । दोनों में कामाचार है । वाक् का विसर्जन ( शब्दप्रयोग - वाणी की अभिव्यक्ति ) सचमुच हविग्रहण पर ही निर्भर है । नत्रतक शरीराग्नि में हवि की ( अन्न की ) आहुति होती रहती है, तभीतक वागिन्द्रिय अपना काम करती रहती है । अन्नाहुति से अग्नि प्रवृद्ध होता है । एवं ' अग्निर्वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् ' इस औपनिषद् सिद्धान्त के ' ५५२

पृष्ठ 816

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 816 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण अनुसार अग्नि हीं क - च - ट - त - प · आदि वर्णरूप में परिणत होकर निकलता है । यदि हविर्ग्रहण ( अन्ना-हुति ) अवरुद्ध कर दिया जाय, तो बोलना चालना, सत्र अवरुद्ध होजाय । ऐसी अवस्था में हम इस हवि को अवश्य ही ' वाग्विसर्जन ' ( जिससे वाक् का विसर्जन होता हो ) कह सकते हैं । इस वैधयज्ञ में भी इसी विज्ञान के आधार पर हविग्रहणकाल में हीं वाक - विसर्जन करने को नियम रक्खा है । वाक् को पूर्व में [ बाक्संयमन कर्म्म मे ] ‘ यज्ञ ' बतलाया है । उसे यज्ञ को आजतक अपने में प्रतिष्ठित रक्खा गया था । श्राज हंविःस्वरूप यज्ञ के साथ साथ ही इस वाग्यज्ञ को भी इस ऊखल में प्रतिष्ठित किया जाता है । यहाँ प्रतिष्ठित होने वाला वाग्यज्ञ, और हविर्यज्ञ, दोनों एकीभूत होकर आहुति के द्वारा सप्तदशस्तोम पर्य्यन्त वितत होंगे । सञ्चित यज्ञ का वितान यहीं से उपक्रान्त होगा । सञ्चित वाकू का विसर्जनरूप वितान यहीं से होगा, इसलिए भी हम इस हवि को ‘ वाग्विसर्जन ' कह सकते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य रखकर ऋषि कहते हैं— " यत्र वा हविग्रहीष्यन् वांचं यच्छति, अत्र नै तां विसृजते एष हि यज्ञः ( वाग्यज्ञः-हविर्यज्ञश्च ) उलूखले प्रत्यष्ठात् ' इत्यादि ॥८ ॥

हत्रिष्कृदाह्वानकर्म्म से पहिले, एवं पात्रासादन के अनन्तर वाक्यमन करने वाला अध्वर्यु ', और यजमान यदि मानुषी वाक् का प्रयोग करदें, तो उहें उसी समय विष्णुदेवतामयी ऋचा का, अथवा यजुर्मन्त्र का जप करना चाहिए | यज्ञ विष्णुस्वरूप है । इस मन्त्र जपकर्म्म से विच्छिन्न यज्ञ का पुनः सन्धानं होजाता है । इस कर्म्म का यही प्रायश्चित्त है । ' यव्य देवताओं को हमारा हवि तृप्त करै ' इसी अभिप्राय से हविग्रहण किया जाता है । इसी आधार पर ' देववीतये त्वा गृहणामि ' यह कहा है । वाक् यज्ञतत्त्व है, जैसाकि वाक्संयमन प्रकरण में विस्तार से बतलाया जाचुका है । इस यज्ञतत्त्व के सञ्चय के लिए ही ' संयमव्रत ' धारण किया जाता है । ऐसी अवस्था में यदि लौकिक वाणी का प्रयोग कर दिया जाता है, तो यज्ञ निर्बल हो जाता है । यज्ञधारा विच्छिन्न होजाती है । विष्णु साक्षात् यज्ञस्वरूप हैं । अग्नि में सोम की आहुति होना हीं यज्ञ है । ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र - अग्नि - सोम, ये पाँच अक्षर संसार के कर्त्ता धर्त्ता हैं । इनमें ब्रह्मा विष्णु - इन्द्र की समष्टि का नाम ' अन्तर्यामी ' है । प्रत्येक बस्तुपिण्ड के केन्द्र में प्रतिष्ठित होकर उसका नियमन करना इन हृदयाक्षरों का मुख्य कर्त्तव्य है । एवं अग्नि - सोम से पिण्डस्वरूप निष्पन्न होता है । केन्द्रस्थ ब्रह्मतत्त्व प्रतिष्ठा है । विष्णुतत्त्व अन्नाहरणं करता है । अन्नभोक्ता –स्वरूप अग्नि में अन्न रूप सोम की आहुति देना विष्णु का काम है । उक्थरूप विष्णु से निकलने वाली अर्करूपा ' शनाया ( बुभुत्ता ) ' ही श्रशीतिरूप अन्न का प्रदान करती है । इसी से अग्नीषोमात्मक यज्ञ सम्पन्न होता है । यदि विष्णु अपना व्यापार छोड़दें, तो उसी क्षण अग्नीषोमात्मक यज्ञ अवरुद्ध होजाय । ऐसी अवस्था में हम यज्ञ-स्वरूप – सम्पादक उस विष्णु को अवश्य ही यज्ञमूर्ति मान सकते हैं । विष्णु के द्वारा ही ' यज्ञसंधान ' होता है । अतः इस वाग्यज्ञ के विच्छिन्न होजाने पर विष्णुदेवता के ही मन्त्र का जप करना आवश्यक है । विष्णु-रूपा मन्त्रवाक् साक्षात् यज्ञ है । इस यज्ञरूपा वाक् के प्रयोग से यज्ञ का पुन: संधान होजाता है । यज्ञ पुनः वितत होने लगता है । इसी अभिप्राय से श्रुति ने कहा है— यज्ञो वै विष्णुः ।तद्यज्ञ ं पुनरारभते ॥६ ॥

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पृष्ठ 817

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 817 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड उत्बूखल में हवि प्रतिष्ठित करने के अनन्तर वह आग्नीध्र, ( अथवा ) यजमानपत्नी ' बृहद् ' ग्रावासि वानस्पत्यः ' यह मन्त्र बोलता हुआ मुसल को अपने हाथ में उठाता है । सोमयज्ञ में सोमवल्ली का ग्रावा से अभिषव किया जाता है । पूर्वकथनानुसार यह हविर्यज्ञ भी सोमाङ्गभूत होता हुआ सोमयज्ञ ही है । इसी सादृश्य का प्रतिपादन करने के लिए मुसल के लिए ' ग्रावासि ' विशेषण दिया है । यह उलूखल की अपेक्षा बड़ा होता है । अतएव ' बृहद्यावा ' कहा है । मुसलग्रहणानन्तर ‘ स्र इदमित्यवदधाति ' ( का ० श्र ० २/३ | १२ ) के अनुसार ' स इदं देवेभ्यो ह॒विः शमीका सुशमि शमीठा ' ( यजु: १ | १५ ) यह मन्त्र बोलता हुआ श्राग्नी ( हविः सस्कार के लिए ) उलू-खल में मुसल का प्रवेश करता है । हे मुसल! आप भलीभाँति हविद्रव्य का संस्कार कीजिए, यही तात्पर्य्यं है ॥१० ॥

मृगचर्म्म का आस्तरण कर ( बिछा कर ) उस पर उलूखल रख कर हवि श्रावपन कर देना अध्वर्यु का काम है | एवं कूटना हविष्कृत् का काम है । ' अतः पत्न्यव हत्यन्यो वा ' ( का ० २२४ | १४ | ) के अनु-सार यजमानपत्नी, अथवा ग्राग्नीघ्र, दोनों में से कोई एक हविः सम्पादन करते हैं । अपना कर्म्म समाप्त करके ध्व ' ' हचिष्कृदेहि ' इस मन्त्र भाग को तीन बार बोल कर ' हविष्कृत् ' नाम से प्रसिद्ध आग्नीध्र का आह्वान करता है । बाक् ही हविष्कृत् है । इविष्कृत् का ग्राह्नान करना हीं वाक् का विसर्जन करना है । वाक् ही यज्ञ है । यज्ञ का ही पुनः ब्राह्वान करते हैं । तात्पर्य्य यही है कि, ' हविष्कृदेहि ' बोलता हुआ ही अध्वर्यु वाग विसर्जन करता हैं । बाक् विस– र्ज़न इह्नीं अक्षरों से होता है । ' हविष्कृदेहि ' से ही क्यों वाग बिसर्जन होता है?, इस की उपपत्ति यही है कि, प्राकृतिक, आधिदैत्रिक नित्ययज्ञ में वाक्तत्त्व ही ' हविष्कृत् ' ( हविः स्वरूप सम्पादन करने वाला ) है । पञ्चकोशात्मक अव्ययब्रह्म हीं सम्पूर्ण प्रपञ्च की आधारभूमि है । वे पाँचों कोश क्रमशः आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, बाक् - नाम से प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों का ही पूर्व के तत्तत् स्थलों में विस्तार से निरूपण किया जाचुका है । यहाँ केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि, इस पञ्चकोशात्मक ब्रह्म का आनन्द - विज्ञान-मनो भाग मुक्तिसाक्षी है । सृष्टि में आत्मा का यह भाग सहकारीमात्र है । एवं मनः- प्राण- वाक् - भाग सृष्टिसाक्षी है । मुक्ति में यह् सहकारीमात्र है । मन ज्ञानशक्ति है, प्राण क्रियाशक्ति है, वाक् अर्थशक्ति है । इसी वाक्तत्त्व का नाम ‘ अन्नमयकोश ' है । कारण इसका यही है कि, यह अन्न पृथिवी - जल - तेज -- वायु- आकाश ( मर्त्या-काश ) भेद से पञ्च महाभूत की समष्टि है । श्राकाश का ही नाम ' वाक् ' है । यही वागाकाश उत्तरोत्तर होने वाली बलग्रन्थियों के कारण क्रमशः वायु - तेज -- जल -- मिट्टी के रूप में परिणत होजाता है । मिट्टी वाक् का अन्तिम विकार है । अभेदसत्ता -- सम्बन्ध के कारण उत्तर उत्तर के भूत में पूर्व पूर्व का भूतभाग समाविष्ट रहता है । सुतरां मिट्टी में पाँचों भूतों की सत्ता सिद्ध होजाती है । इसी विज्ञान के आधार पर पृथिवी को सम्पूर्ण भूतों का रस कहा जाता है, जैसा कि श्रुति कहती है— ' एषां वै भूतानां पृथिवी रस: ' ( शत ० १४ । ६ । ५ । १ ) इति । यही वाङ्मयी, दूसरे शब्दों में पचभूतमयी पृथिवी चान्द्रसोम को अपने गर्भ में रखती हुई अन्न-रूप में परिणत होजाती है । यह वाक्तत्व ही हविः ( षधि वनस्पति ) रूप अन्न बना हुआ है । लौकिक अन्न ५.५४

पृष्ठ 818

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 818 का मूल पृष्ठ
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शतपथब्राह्मण ' अन्न ' कहलाता है । यज्ञमदा में वही अन्न ' हवि ' नाम से व्यहृत होता है । इसी विज्ञान के आधार पर हम ‘ वाक् ' ' को हविष्कृत् ( अन्नसम्पादक ) कह सकते हैं । वाक् हविष्कृत् है । हमें वाक् का विसर्जन करना है । इधर हविष्कृद्रूपा वाक् का प्रतिनिधि हविष्कृत् ' आग्नीध ' नामक ऋत्त्विक है । अत: इसी के सम्बन्ध से वाग विसर्जन करना उचित है । जो वाग्यज्ञ वितत होने के लिए अबतक उक्थ - त्रिम्बरूप से सुरक्षित था, वही विसर्जन के साथ ही ' वितान ' [ अर्कमण्डलरूप विस्तार ] कोटि में आजाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं-“ वाग् वै हविष्कृत् । वाग् वै यज्ञः । तद्यज्ञमेव पुनरुपह्वयते ” ॥११ ॥

अनुगम, और निगम, भेद से पारिभाषिक श्रुतिवचन दो भागों में विभक्त हैं । नियत देवता, एवं नियत अर्थ से सम्बन्ध रखने वाले श्रतिवचन ' निगम ' नाम से प्रसिद्ध हैं । ' वाग्वै यज्ञः ' - ' यज्ञो वै विष्णुः ’ - ‘ इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता ' - इत्यादि वचत निगम हैं । एवं अनियतार्थ का प्रतिपादन करने वाले वचन ' अनुगम ' नाम से प्रसिद्ध हैं । अनुगम का किसी एक ही देवता के साथ सम्बन्ध नहीं है । अपितु जहाँ उस अर्थ का समन्वय होजाता है, वहीं वह अनुगमश्रुति चरितार्थं होजाती है । ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' - विराड्वा यज्ञः ' -द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति ' इत्यादि वचन अनुगम हैं । इह्रीं अनुगमन्त्रों में से निम्नलिखित अनुगममन्त्र सुप्रसिद्ध है-चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ इस अनुगममन्त्र के अनेन अर्थ हैं । स्वयं ऐतरेय महर्षिने ऐतरेय आरण्यक में इस के ५-६ अर्थ किये हैं | वैय्याकरण परा- पश्यन्ती- मध्यमा, वैखरी -- भेद से वाक् को चतुर्द्धा विहित मानते हैं । वैज्ञा-निक – सत्या -- आम्भृणी- बृहती - अनुष्टुप् - भेद से वाक् के चार विभाग करते हैं । इन सम्पूर्ण भेदों का प्रकृत में निरूपण नहीं किया जासकता । इन सब का विशद निरूपण जानने की इच्छा रखने वालों को तत्प्रतिपादक अन्य निबन्धों का ही अवलोकन करना चाहिए । प्रकृत में भिन्न प्रकार से ही वाक् को चतुर्द्धा विहित त्रतलाया जाता है । आह्वानसम्बधिनी वाक् एहि, आगहि, आद्रव, आधाव, भेद से चार भागों में विभक्त है । यह आप को स्मरण रखना चाहिए कि, यथाजात मनुष्य ' मनुष्य ' कहलाता है । ऐसा यथाजात असंस्कृत मनुष्य वर्णव्यवस्था के अनुसार ' शूद्र ' है । इतर तीनों वर्ण संस्कारों से संस्कृत होते हुए मनुष्य--कोटि से त्रर्हिभूत हैं । उनके श्रात्मा में क्रमश: अग्नि, इन्द्र - विश्वेदेव, प्रतिष्ठित हैं । वे मनुष्य नहीं, देवता हैं । मनुष्यशब्दभाक् केबल शूद्र हैं । यही कारण है कि, सेवावृत्ति के लिए ' इतने आदमियों को बुलाओ ' यही व्यवहार होता है | पूर्वोक्त तीनों वाग् भेद तीनों वर्णों में हीं प्रयुक्त होते हुए गुहा निहित | एवं ' आधार ' यह तुरीयभाग यथाजात सर्वसाधारण मनुष्यों के व्यवहार में आता है । ब्राह्मण चारों वर्णों का पूर्वोक्क क्रम से आह्वान करता है । ब्राह्मण ब्राह्मण से ' एहिं [ आइए | ' कहता है | क्षत्रिय से ' आगहिं [ आओ ] ५५५

पृष्ठ 819

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 819 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड कहता है ' । वैश्य से ' आद्रव [ जल्दी आओ ] कहता है । एवं शूद्र से ' आवा ' [ जल्दी दौड़ो ] यह कहता है | क्षत्रिय ब्राह्मण से ' एहि ' कहेगा । क्षत्रिय से ' आवा ' कहेगा । वैश्य से ' आद्रव ' कहेगा | एवं शूद से ' आधा ' - कहेगा । यही व्यवस्था इतर दोनों वर्णों में समझनी चाहिए | समाजव्यवस्था के अनु— सार पूर्वोक्त वाग व्यवहार प्रचलित हैं । हविष्कृत् श्राग्नीघ्र ब्राह्मण है । अत: ' एहि ' कह कर ही उसका आह्वान करना उचित है । अपिच ब्राह्मण शान्तमूर्ति है ।

क्रुध्यन्तं प्रति न क्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ।

कुर्य्यादयं न वा कुर्य्या - मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ॥

' सवय वा अयं ब्राह्मणो मित्रः । न वाऽयं कञ्चन हिनस्ति ' ( श ० २ | ३ | २।१२ ) इत्यादि श्रौत स्मार्त्त ' वचनों के अनुसार ब्राह्मण संसार का मित्र है । सब के साथ शान्तिपूर्ण व्यवहार करना ब्राह्मण का प्रथम, एवं प्रमुख कर्त्तव्य है । इसी भाव का द्योतन करने के लिए ' एहि ' पद का निर्देश किया है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर याज्ञवल्क्य कहते हैं— ' एतदु ह

वाचः शान्ततमं - यदेहोति । तस्मादेहीत्येव ब्रूयात् ॥ १२ ॥

पुराने युग में यह सम्प्रदाय था कि, अध्वर्यु ' के ' हविष्कृदेहि ' यह प्रैष ( अनुज्ञा ) करने पर स्त्री वि: सम्पादन करने के लिय उपस्थित होती थी । वह नियम आज भी प्रचलित है । यदि स्त्री उस समय उपस्थित न हो, तो अन्य कोई ऋत्विक इस कर्म के लिए उपस्थित होजाता है । ' आह्वयत्याहन्त्यन्यो दृषदुपले ‘ कुक्कुटोऽसी ' ति त्रिः शम्यया द्विपदं सकृदुपलम् ' [ का ० श्र ० २ | ४ | १५ ] के अनुसार पत्नी, अथवा आग्रीन का अध्वर्यु आह्वान करता है । आहूत आग्नीध्र सर्वप्रथम ' कुक्कुटोऽसि मधुजिह्वः ' यह मन्त्र बोलता हुआ शम्या से दो बार दृषत् [ सिल ] पर ध्वनि करता है । एक बार उपल पर ध्वनि करता है । सो जो कि श्राग्नीघ्र यहाँ वाक्- ध्वनि करता है, इसकी उपपत्ति बतलाते हैं । हविः सम्पादन करने पूर्व शम्या से सिल लोढी पर शब्दध्वनि क्यों की जाती है? इस प्रश्न की वैज्ञानिक उपपत्ति बत-लाते हैं || १३ || पूर्व के प्रकरणों में हमने आख्यानों के १ - आध्यात्मिक, २ - आधिदैविक, ३ - आधिभौतिक, ४ - आध्यात्मिक - आधिभौतिक, ५ – आध्यात्मिक आधिदैविक, ६- आधिदैविक- आधिभौतिक, ७ - आध्या-त्मिक - आधिदैविक - आधिभौतिक असदाख्यान, भेद से आठ भेद बतलाएँ हैं । हमारा प्रकृत का यह आख्यान उन आठों आख्यानों में से सर्वात्मना ५ वें ' आध्यामिक, आधिदैविक ' आख्यान से ही सम्ब-न्ध रखता है | एवं प्रांशिकरूप से श्रधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) भाव से भी इसका सम्बन्ध है । आख्यान में मनु - मनावी- ऋषभ - किलात कुली आदि शब्दों का वैज्ञानिक स्वरूप जानना आवश्यक है । बिना इनके स्वरूप - ज्ञान के इस वैज्ञानिकी कथा का समन्वय कथमपि सम्भव नहीं है । इन सब में से प्रथम मनु: स्वरूप की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ५५६

पृष्ठ 820

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 820 का मूल पृष्ठ
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थ - मनुः स्वरूपदिग्दर्शनम् — शतपथब्राह्मण

मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्ज! ।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

—गीता ७/७

गतिर्भर्त्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥

- गीता ६।१८ इस स्मार्त्त ' सिद्धान्त के अनुसार आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाक्, ' भेदभिन्न पञ्चकोशात्मक अव्ययपुरुष ही सम्पूर्ण विश्व का कर्त्ता - धर्त्ता - हर्त्ता है । वही अपने अपराप्रकृतिरूप श्रात्मक्षरभाग से विश्व का ‘ उपादान ' बनता है I । पराप्रकृतिरूप अक्षर के द्वारा वही सृष्टिकर्त्ता बनता है । एवं अपने शुद्ध श्रव्यय-रूप से वही जगदालम्बन बनता है | वही विश्वालम्बन है, वही विश्वस्रष्टा है, एवं वही विश्व है । परात्परविशिष्ट वही पुरुष ' षोडशी प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध है | इस प्रजापति के अव्ययभाग से भाव-सृष्टि होती है, अक्षरभाग से गुण सृष्टि होती है, एवं क्षरभाग से विकारसृष्टि होती है । प्रकृत की मनुः-सृष्टि का इन तीनों सृष्टियों में से भावसृष्टि से ही सम्बन्ध है ।

महर्षयः ः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।

मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥

—गीता १०/६ उक्त गीता - सिद्धान्तानुसार सप्तर्षिप्राण, एवं अण्डज - उद्भिज्ज, पिण्डज - स्वेदज भेदभिन्ना चतुर्द्धा विभक्ता सृष्टि के मूलभूत चार मनु, ' अस्मत् ' पद से व्यवहृत अव्यय से ही उत्पन्न होते हैं । यही अव्यय क़ी भावसृष्टि है । यही मानसीसृष्टि नाम से पुराणों में प्रसिद्ध है । आगे की प्रजाएँ, एवं लोक इह्रीं सात ऋषियों, एवं चार मनुओं के आधार पर प्रतिष्ठित हैं । ' एकोऽहं बहु स्याम् ' इस नित्य कामना से अव्यय -पुरुष का मन हीं ' मनु ' रूप में परिणत होता है । जबतक शरीर में मनोऽवच्छिन्न मनुस्तत्त्व प्रतिष्ठित रहता है, तभीतक श्रायुःसत्ता रहती है । मनु हीं आयु का सम्पादक है । इसी आधार पर — ‘ आयुर्वै मनुः ' ( कौ ० ब्रा ० २६।१७ ] यह कहा जाता । पूर्व में बतलाया जा चुका है कि, अव्यय ही अपने मन की कामना से अक्षर के द्वारा क्षर से सम्पूर्ण विश्व का निर्माण करता है । इस अव्ययपुरुष की पराप्रकृतिरूप क्षरभाग की ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, अग्नि, सोम ये पाँच कलाएँ हैं । इन पाँचों मर्त्यकलाओं से क्रमशः प्रारण - आपः-वाक् - अन्नाद् - अन्न, ये पाँच विकार उत्पन्न होते हैं । प्राणकला स्वयम्भूपुर की जननी है । श्राप: कला परमेष्ठी की जननी हैं । वाककला सूर्य्य की जननी है | अन्नादकला पृथिवी की जननी है, एवं अन्नकला चन्द्रमा की जननी है | स्वयम्भू प्राणमय है, परमेष्ठी श्रापोमय है, सूर्य्य वाङ्मय है, पृथिवी अन्नादमयी है, एवं चन्द्रमा अन्नमय है । इन पाँचों की समष्टि ही विश्व है । सर्वथा विभक्त इन पाँचों में वह षोडशी ५५७