Shatapathabrahman 1 1 — पृष्ठ 821–830

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

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प्रथमकाण्ड आत्मा प्रविष्ट होरहा है । इस षोडशी प्रजापति की व्याप्ति यद्यपि सम्पूर्ण विश्व में हीं रहती है । परन्तु अमृत, मर्त्य, अमृतमर्त्य, इन तीन भेदों के कारण घोडशी की तीनों कलाओं के [ अव्यय - अक्षर क्षर कलाओं के ] संनिवेश - क्रम में तारतम्य होजाता है । ' तस्माद्यत् किंचार्वाचीनमादित्यात् सर्वं तन्मृत्युना-' तम् ' के अनुसार सूर्य्य से नीचे के पृथिवी, और चन्द्रमा, मर्त्यभावापन्न हैं । सूर्य्य से ऊपर के स्वयम्भु, और परमेष्ठी, अमृतभावापन्न हैं । मध्यस्थ सूर्य ' निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ' के अनुसार अमृत - मृत्युमय है । उधर अव्यय अमृतमूर्ति है, मय्यस्थ अक्षर अमृतमृत्यु - स्वरूप है 1 इसी क्रम से पञ्चकल विश्व में इन तीनों का संनिवेश होता है । सूर्य्य से उपर के अमृत लोकों में अव्यय की प्रधानता है, नीचे के लोकों में क्षर की प्रधानता है, एवं मध्य में अक्षर की प्रधानता है । अव्यय - अक्षर - क्षर तीनों क्रमशः ज्ञान - क्रिया - अर्थ, शक्तियों के अधिष्ठाता हैं । अव्यय ज्ञानप्रधान है, अक्षर क्रियाप्रधान है, एवं क्षर अर्धप्रधान है । अव्ययपुरुष ज्ञान, क्रिया, अर्थ का कोश है । और यह कोश ( खजाना ) आनन्द - विज्ञान- मनः प्रारण वाक भेद से पञ्चकल है । इन पाँचों में आनन्द - विज्ञान - मनोभाग मुक्तिसाक्षी है । मनः - प्राण - वाक् सृष्टिसाक्षी है । सृष्टि में इसी भाग की प्रधानता रहती है । सृष्टिसाक्षी अव्यय-पुरुष का मन ज्ञानमूर्त्ति है, प्राण क्रियामूर्ति है, वाक् अर्थमूर्ति है । इन में से अव्यय में ज्ञानघन मन प्रधान है, अक्षर में क्रियाघन प्राण प्रधान है, एवं क्षर में अर्थघना वाकू ही प्रधान रहती है । दूसरे शब्दों में-अव्यय ज्ञानमूर्ति है, अतएव वह निष्क्रिय है । क्षर अर्थमूर्ति है, अतएव यह भी जड़ होता हुआ निष्क्रिय है | सक्रिय है मध्यस्थ प्राणमय अक्षर । अव्यय के ज्ञान से ' सर्वज्ञ ', एवं क्षर के अर्थ से ' सर्ववित् ' बनता हुआ प्राणमय अक्षर अपने ज्ञानमय तप से संसार का निर्माण किया करता है । इस प्रपञ्च से यह भलीभाँति सिद्ध होजाता है कि, अक्षर में अव्यय का भी समावेश है, एवं क्षर का भी समावेश है । इसमें अमृत भी है, मृत्यु भी है । मध्य में प्रतिष्ठित होकर यह दोनों को अपने अधिकार में किए हुए है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कठश्रुति कहती है—

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्भूये वाक्षरं परम् ।

एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥

– कठ २।१६ आनन्द – विज्ञान – मनोभाग को हमने मुक्तिसाक्षी बतलाया है । अतः उसका इस सृष्टिमूलभूत यज्ञ-काण्ड में प्रधान सम्बन्ध नहीं है । प्रधानता यहाँ केवल मनेः - प्राण - वाङ् मय सृष्टिसाक्षी अव्यय की ही है । स्वयम्भू में अव्यय के वाग्भाग की प्रधानता है । परमेष्ठी में अव्यय के बाक्प्राण भाग की प्रधा-नता है । सूर्य्य में मनः, प्राण, वाक्, तीनों की प्रधानता है । चन्द्रमा में वाक् - प्राण की प्रधानता है | पृथिवी में वाक् को प्रधानता है । अव्यय पुरुष है । प्राण, आपः, वागादि प्रकृति है । वहिरङ्ग प्रकृति है । स्वयम्भू प्रकृत्यपेक्षया प्राणमय है, पुरुषापेक्षया वाङ्मय है । परमेष्ठी प्रकृत्यपेक्षया आपोमय है, पुरुषापेक्षया वाक्प्राणमय है । सूर्य्य प्रकृत्यपेक्षया वाङ्मय है, पुरुषापेक्षया मनः-प्राण वाङ ्ममय है । चन्द्रमा प्रकृत्यपेक्षया अन्नमय है, पुरुषापेक्षया वाक्प्राणमय है । पृथिवी प्रकृत्यपेक्षया अन्नाद्मयी है, पुरुषापेक्षया वाङ्मयी है । भूतापेक्षया स्वयम्भू आकाश है । पर-मेष्ठी वायु है | सूर्य अग्नि है । चन्द्रमा जल है । पृथिवी पृथिवी ( मृत्तिका ) है । पुरापेक्षया यही ५५८

पृष्ठ 822

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शतपथब्राह्मण स्त्र ० - पर ० — सू ० - च ० – पृ ० इन नामों से व्यवहृत होते हैं । देवापेक्षया स्वयम्भू ब्रह्मा है । परमेष्ठी विष्णु है । सूर्य इन्द्र है । चन्द्रमा सोम हैं । पृथिवी अग्नि है । इसप्रकार भूत - देव - पुर - प्रकृति — पुरुष आदि भेद से पाँचों के अनेक महिमा - विवत होजाते हैं, जैसा कि तालिका से स्पष्ट होजाता है— पुरापेक्षया देवापेक्षया प्रकृत्यपेक्षया पुरुषापेक्षया भूतापेक्षया १ स्वयम्भूः | ब्रह्माः प्राणः बाक् आकाशः २ परमेष्ठी विष्णुः आपः वाक्प्राणौ | वायुः तदिदं विश्वम् ३ | सूर्यः इन्द्रः वाक् | वाक्प्रणमनांसि अग्निः | ४ | चन्द्रमाः | सोमः अन्नम् वाक्प्राणौ जलम् १५ पृथिवी. अग्निः अन्नादः वाक् पृथिवी १- स्वयम्भूः . अमृतमण्डलम् - परब्रह्म - अव्ययप्रधानम् - ज्ञानमयम् २- परमेष्ठी ३ - सूर्य्यः ४ -चन्द्रमाः ५- पृथिवी ' अमृतमृत्युमण्डलम् - परावरब्रह्म - अक्षर प्रधानम् - क्रियामयम् मृत्युमण्डलम् - अवरब्रह्म - क्षरप्रधानम् - अर्थमयम् २ ईश्वरप्रजापतिः पूर्व की तालिका से यह भलीभाँति स्पष्ट होजाता है कि, सूर्य्यं विश्व के केन्द्र में प्रतिष्ठित है, एवं उसका सम्बन्ध अवरब्रह्मात्मक मृत्युमय चन्द्र - पृथिवी - लोक से भी है, एवं परब्रह्मात्मक अमृतमय स्वयम्भू, परमेष्ठी से भी है | वह दोनों का यथास्थान सन्निवेश कर रहा है । अतएव हिरण्यगर्भमूला सृष्टि में सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठाता केन्द्रस्थ सूर्य माना जाता है । पर्वसत्ताधारण हीं वस्तु का जन्म कहलात । है | सर्वथा असत् वट - मिट्टी की मनः - प्राणवाङमयी सत्ता को लेकर ' अस्तिमान् ' बन जाता । यही घट ५५६

पृष्ठ 823

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प्रथमकाण्ड का जन्म है | वस्तु की · सत्ता के लिए, दूसरे शब्दों में उसके जन्म के लिए मनः- प्राण - वाकू, तीनों का समुच्चय अपेक्षित है । बिना तीनों के वस्तु के लिए ' अस्ति ' का प्रयोग नहीं होसकता । क्योंकि सत्ता का ' मनः - प्राण - वाचां संघातः सत्ता ' यही लक्षण है । पाँचों विश्वावयवों में मध्यस्थ सूर्य्य ही मनः - प्राण-वाङमय है । अस्तिमत् - पदार्थों में सबसे पहले ' अस्ति ' का ( मनः - प्राण - वाक् का ) उदय मध्यस्थ सूर्य्य में ही होता है । आगे होने वाली सृष्टियों में सूर्य्य - सत्ता का सम्बन्ध होता है । अतएव हम कह सकते हैं कि, उत्पन्न होने वालों में पहिला स्थान सूर्य्य का ही है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर मन्त्रश्रुति.

कहती है-हिरण्यगर्भः समवत्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।

स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥।

अण्डज -1 - यजुः संहिता न - पिण्डज - उद्भिज्ज, स्वेदजं, इन चारों सृष्टियों का मूल यही हिरण्यगर्भ सूर्यप्रजापति है । इसी आधार पर ‘ नूनं जनाः सूर्येण प्रसूताः प्रयन्नर्थः कृण्वन्नपांसि ' - ' सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुःसंहिता ) इत्यादि कहा जाता है । अक्षरावच्छिन्न, मनः प्रारणवाङ्मय, सर्वसृष्टिप्रवर्त्तक उस मनोमय अव्ययतत्त्व का ही नाम ' मनु ' है । पुराणशास्त्र ने इसी को ' कालाग्नि ' कहा है । यही ' काल-पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध है । यह ' कालपुरुष ' ही महामाया से अवच्छिन्न होकर शनायारूप पाप्मा से आक्रान्त होता हुआ सृष्टिकामना से प्रकृति के द्वारा सर्वहुतयज्ञ का अधिष्ठाता बनता हुआ ' यज्ञपुरुष ' नाम से प्रसिद्ध होजाता है | यज्ञपुरुषात्मक इस प्रजापति का पूर्ण विकास सूर्य्यं में ही होता है, जैसाकि पूर्व में बतलाया जा चुका है । कालपुरुष कालाग्नि - स्वरूप है । ' मातरिश्वा ' वायु के द्वारा बहुत होने वाले ' पड्ब्रह्म ' ( ३ भृगु-३ अङ्गिरा ) स्वरूप अप्तत्त्व ( अथर्ववेद ) के समन्वय से यही कानाग्नि पूर्वकथनानुसार यज्ञस्वरूप में परिणत होता हुआ । सम्पूर्ण विश्व का ' उत्पादक ' बनता है । यह कालाग्नितत्त्व भिन्न भिन्न प्रकरणों में ब्रह्माग्नि, बेदाग्नि, सार्वयाजुषाग्नि, यजुरग्नि, प्रथमजत्रा, प्रतिष्ठाब्रह्म, स्वायम्भुवब्रह्म, प्राणब्रह्म, ऋषि, आदि अनेक नाम से व्यवहृत हुआ है । इसी सर्वमूलभूत अग्नितत्त्व का नाम ' मनु ' हे | सृष्टिविद्या के अनुसार क्षरब्रह्म मरणधर्मा है । क्योंकि ' क्षरः सर्वाणि भूतानि ' इस गीतासिद्धान्त के अनुसार भौतिक प्रपञ्च ही क्षर है । एवं सम्पूर्ण भौतिक प्रपञ्च मर्त्य है । क्षर का अधिष्ठाता अक्षर शाश्वतब्रह्म है, नित्यतत्त्व है । श्वोवसीयस् मनोमय, श्रतएव ' मनुः ' स्वरूप श्रव्ययानुगृहीत अक्षरतत्त्व का विकास हमने सूर्य्य में बतलाया है । यहीं अक्षर मनुरूप में परिणत होकर, दूसरे शब्दों में अव्ययवत्त्व से भिन्न बन कर ‘ सर्वज्ञ ', एवं ' सर्ववित् ' बनता हुआ अपने ज्ञानमय तप से विश्व का निर्माण करता हैं । अतएव इस मनुस्तत्त्व को हम अवश्य ही ' शाश्वतत्रह्म ' कह सकते हैं । वस्तुतस्तु शाश्वतब्रह्म ' परात्पर ' का नाम है । अव्यय भी मायावच्छेद के कारण ' शाश्वत ' नहीं माना जासकता । ‘ संयोगा विप्रयोगान्ताः ' के अनुसार माया के संयोग से अपना ' अव्ययत्त्व ' सुरक्षित रखने वाला अव्यय कदापि शाश्वततत्त्व नहीं हो सकता | वैज्ञानिकी परिभाषा में क्षर तत्त्व ' ब्रह्म ' नाम से प्रसिद्ध है । ५६०

पृष्ठ 824

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शतपथब्राह्मण अक्षर ' अमृत ' नाम से व्यवहृत होता है, ' अव्यय ' प्रसिद्ध ही है । रस, बल की समष्टिरूप एकमात्र परात्पर ही ‘ शाश्वतधर्म्म ' नाम से व्यवहृत होता है, एवं शुद्ध रसस्वरूप, अतएव श्रानन्दघन निर्विशेष ' ऐकान्तिक– सुख ' नाम से प्रसिद्ध है । रस, बलात्मक ब्रह्म के इह्रीं पाँचों विवर्त्तो का निरूपण करते हुए भगवान् कहते हैं—

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।

शाश्वतस्य च धर्म्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

- गीता . ईश्वरसंस्था के उक्त पाँचों महिमाविवर्त्त जीवसंस्था के पाँचों की प्रतिष्ठा हैं, यही तात्पर्य है । और अत्रैव दो शब्दों में हमें इन महिमामय श्रात्मविवर्त्तो के सम्बन्ध में रेखाचित्रों के माध्यम से किञ्चिदिव स्पष्टीकरण कर लेना है । नित्यशान्त - निगुण - निरञ्जन - म या, कला, गुण, विकार, आवरण, अञ्जन, नामक सुप्रसिद्ध षड्विधं परिग्रहों से सर्वात्मना असंस्पृष्ट, दिग्देशकालानवच्छिन्न, असीम, अनाद्यनन्त, सर्वचल विशिष्टरसैकघन, विज्ञेय, अनिर्वचनीय, अप्रज्ञात, सदसदतीत, वाङ्मनःपथातीत, तद्व्यावृत्त, इत्थंभूत अचिन्त्य - अप्रतर्क्य - तत्त्व का नाम ही है - ' परात्पर परमेश्वर, ' जिस के सम्बन्ध में ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' यह घोषणा हुई है । इस का मान-सिक रेखाचित्र भी सम्भव नहीं है । अतएव अखण्ड - धरातलात्मक इस ' परात्पर परमेश्वर ' का कोई भी रेखाचित्र नहीं बनसकता! यही प्रथम महिमाविवर्त्त - ' शाश्वतधर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है, जिस का निर्विशेषभावापन्न निरपेक्ष विशुद्ध ' रस ' भाव ही तत्रैव गीतायां - ऐकान्तिकसुख ' नाम से व्यवहृत - मात्रं होगया है - तटस्थपरिचयमात्र के लिए । तथोक्त, तथोपवर्णित, किंवा सर्वात्मना वर्णनातीत अखण्डधरातलात्मक परात्पर परमेश्वर की भूमा पर मायात्रलावच्छिन्न, मायोपाधिक मायापरिग्रह से समन्वित, अतएव - ' मायी ' नाम से प्रसिद्ध जिस श्रात्म-विवर्त्त ' का आविर्भाव होता है, वही इस मायापुर के सम्बन्ध से " पुरि शेते ' निर्वचन से ' पुरुष ' ( अव्यय-पुरुष ) नाम से प्रसिद्ध होता है । इसी पुरुषेश्वर का नाम है - अश्वत्थब्रह्म ', इसी का नाम है - ' मायी-महेश्वर ' । जिसप्रकार एक व्यापक - निरवच्छिन्न - समुद्र - धरातल पर बत्तु लवृत्तावच्छिन्न [ गोलाकार ] अगणित - अनन्त - असंख्य बुद्द् प्रतिष्ठित रहते हुए श्राविर्भूत, तिरोभूत - होते रहते हैं, ठीक वही स्थिति • समुद्रसमतुलित मायातीत परात्पर परमेश्वर, तथा बुद्बुद्समतुलित मायी महेश्वर की समझिए । परात्परधरातल पर असंख्य - गणित हैं ये - ' मायी महेश्वर ', जो कि अपने अपने ब्राह्मकालानुबन्धों से परात्परधरातल पर आविर्भूत- तिरोभूत होते रहते हैं । इसी स्थिति का प्रथम - रेखाचित्र के माध्यम से हम अनु-मान लगा सकते हैं । ‘ मायां तु प्रकृति विद्यात्, मायिनं तु महेश्वरम् ' के द्वारा इसी महेश्वरविवत ' का यशोगान हुआ । रेखाचित्र में पाठक देखेंगे कि, एक निवच्छिन्न - असीम धरातल पर गणित ' वृत्तौजाः ' मण्डल यत्र तत्र प्रतिष्ठित हैं । प्रत्येक वृत्तौजा: [ वत्तु ' लमण्डल ] एक एक मायी महेश्वर है । एक एक मायी महेश्वर अपने अपने एक एक स्वतन्त्र ब्रह्माण्ड का प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण - बना हुआ है । विदित नहीं, उस अखण्ड— मायातीत — परात्पर – धरातल पर ऐसे ऐसे कितनें मायी महेश्वर, तथा तदनुबन्धी ब्रह्माण्ड हैं।‘क्वेदृग्विधावि-गणिताण्डपरागुचर्य्या ' रूपेण श्रार्षप्रज्ञा [ ऋषिप्रज्ञा ] भी थक थक गई है इस श्रानन्त्य को स्मृत्त्वा स्मृत्त्वा ५६१

पृष्ठ 825

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प्रथमकाण्ड ही । सचमुच ही तो - ' जाके रोमकोटिब्रह्मण्डा '! पुराणशास्त्रोक्त सुप्रसिद्ध ' मार्कण्डेयाख्यान ' के द्वारा इसी ब्रह्माण्डानन्त्य का यशोगान हुआ है । और यही इस प्रसङ्ग के प्रथम - रेखाचित्र का स्वरूप - दिग्दर्शन है । अत्र दो शब्दों में उन अनन्त - असंख्य ' मायी - महेश्वर ' विवत्तों में से केवल एक ‘ मायी - महेश्वर ' का भी यशोगान कर लीजिए, जिसे पूर्व में हमनें ' अश्वत्थब्रह्म ' कहा है । अपनी परिपूर्णा ' अर्काभिव्यक्ति ’ से यही अश्र्वत्थ ‘ सहस्रबल्शेश्वर ' नाम से प्रसिद्ध होरहा है, जिस का अर्थ [ समझने के लिए ] है - ' एक हजार बल्शाओं- [ टहनियों - शाखाओं ] का अधिपति ', जिस प्रत्येक बल्शा में स्वयम्भू - परमेष्ठी-सूर्य्य - चन्द्रमा - भूपिण्ड- नाम से प्रसिद्ध पाँच - पाँच ' पुण्डीर ' [ पर्व - पोर - ] हैं, अतएव जो प्रत्येक शाखा ‘ पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्यबल्शा ' नाम से प्रसिद्ध हुई है । ' सहस्र - पूर्णम् ' के अनुसार यहाँ का ‘ सहस्र ” शब्द ‘ हजार संख्या ' का वाचक न होकर ' पूर्णसंख्या ' [ अर्थात् - असंख्य - सख्यात्रों ] का ही सूचक है । जिस प्रकार परात्पर -- परमेश्वर- धरातल पर असंख्य अनन्त - ' अश्वत्थब्रह्म ' हैं, तथैव इस प्रत्येक अश्वत्थधरा--तल पर अनन्त - असंख्य - शाखाएँ व्याप्त हैं । और ' सहस्रञल्शा वि वयं रुहेम ' [ ऋक् सं ३।८।११ ] के अनु-सार यही ‘ सहस्र ' शब्द का तात्त्विक समन्वय है, जिस का ' सहरुधा महिमानः सजलम् ' [ ऋक् सं १० | ११ | ८ | ] से सङ्केत हुआ है । ' हजारों के हजारों ' हीं यहाँ सहस्र - शब्दार्थ है । एक वत्तु ' ल-- मण्डल बनाइए, इस के केन्द्र में एक छोटा वत्तु ' लमण्डल बनाइए, इस से स्पर्श करती हुई चारों ओर बड़े वर्त्त ल - वृत्त की परिधि-पर्य्यन्त अगणित रेखाएँ लेजाइए, जिन से कि वह बृहद् वत्तु ' ल मण्डल ' अच्छिद्रपवित्र ' रूप से ग्रासम -न्तात् परिव्याप्त होजाय । इस प्रत्येक रश्मिरेखा को एक एक पञ्चपुण्डीरा ' बल्शा ' [ शाखा ] समझिए । और इत्थंभूत द्वितीय रेखाचित्र के माध्यम से ही सहस्रधा - महिमानः सहस्रं रूप इस दुर्विज्ञेय अश्वत्थब्रह्म-मायी -- मेहश्वर के यशोगान में ग्रहोरात्र तल्लीन रहिए । तत एव महती सम्भूतिः! अभी स्थिति का सर्वात्मना स्पष्टीकरण नहीं हुआ । ' अश्वत्थ ' शब्दमात्र से कुछ भी तो स्वरूपाभास उपलब्ध नहीं होरहा हमारी लोकप्रज्ञा को । अतएव तत्सम्बन्ध में अवश्य ही किञ्चिदिव स्पष्टीकरण सापेक्ष बन जाता है । इस अश्वत्थ की मूल अभिधा [ नाम ] है - ' अव्ययपुरुष ' । ' प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि ' इत्यादि गीतासिद्धान्तानुसार ' पुरुष ' शब्द ' प्रकृति ' शब्द से नित्य सापेक्ष है । बिना प्रकृति के पुरुष अनुपन्न है, तो बिना पुरुष के प्रकृति अनुपपन्ना है । अतएव - ' पुरुष ' से स्वत: ही ' प्रकृति ' संगृहीता बन जाती है । रस - बला - नुबन्धों से वह एक ही प्रकृति अमृता प्रकृति, मर्त्या प्रकृति, भेदेन द्विधा विभक्त होजाती है, जो कि दोनों प्राकृत -- विवर्त्त ' क्रमशः --परा प्रकृति, अपराप्रकृति, नामों से प्रसिद्ध हैं * । ये ही

* - -भूमि - रापोऽनलो वायुः - खं - मनो- बुद्धि - रेव च ।

अहङ्कार - इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

‘ अपरेयम् ’ - ( अपराप्रकृतिरियं - मर्त्या --क्षरात्मिका ) ॥

इतस्त्वन्यां -- प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्य्यते जगत् ॥

—गाता ७ | ४,५, ५६२

पृष्ठ 826

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( १ ) - परात्पर परमेश्वरगर्भितानन्ता संख्यमा यी महेश्वर स्वरूप परिलेख: - ( प्रथम - रेखाचित्र ) -( स एष परमेश्वरोऽविज्ञेयः -‘शाश्वतधर्म्म ' मूर्त्तिः ) ( १० सं ० ५६२ ) महेश्वरः महेश्वरः महे महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महे ० महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः ' महे ० महेश्वरः महे महेश्वरः महेश्वरः महे ० महे महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः महे ० महेश्वरः महेश्वर महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः • महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः 00 महे महेश्वरः महेश्वरः महेश्वरः

पृष्ठ 827

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( २ ) -स एप मायी महेश्वरः पोडशीप्रजापतिदुर्विज्ञेयः – ( द्वितीय - रेखाचित्र ) ( पृ ० सं ० ५६२ ) महेश्वरः G

पृष्ठ 828

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शतपथब्राह्मण ' दोनों पूर्वप्रकरणोपच हित, सुप्रषिद्ध ' अमृताक्षर ', एवं ' मर्त्यक्षर ' हैं । इसप्रकार इन दोनों प्रकृति - विवत्त से वह अव्ययपुरुष ' त्रिपुरुषपुरुषात्मक ' ही प्रमाणित होरहा है. जैसे कि सप्तप्राणसमष्टिरूप स्वायम्भुव - प्रजा-पति - ' सप्तपुरुषपुरुषात्मक ' नाम से प्रसिद्ध है [: ] । यद्यपि ' पुरुष ' की अभिधा का प्रधान लक्ष्य - ' अव्यय ' ही है । तदपि क्यों कि इसी अव्ययपुरुष के रस - बलानुबन्धों से क्योंकि - अक्षर, क्षर, नाम के प्रकृतिभावों की अभिव्यक्ति हुई है | अतएव इन दोनों प्रकृतिरूपों के साथ भी - ' पुरुष ' शब्द का [ गौणरूपेण ] सम्बन्ध होजाता है । और यों एक ' अव्ययपुरुष ' के स्थान में तीन पुरुषविवत समन्वित होजाते हैं, जैसा कि निम्न लिखित गीता - वचन से प्रमाणित है—

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।

क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।

यो लोकत्रयमाविश्य विभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥

—गीता १५ १६,१७ । श्रव्ययात्मक ' पुरुष ' ही साङ्केतिक भाषा में - ' अमृतम् ' है, अक्षरात्मिका पराप्रकृति ही ( तत्प्रकरणा-पेक्षया ) ‘ ब्रह्म ' है, एवं क्षरात्मिका अपरा प्रकृति ही - ' शुक्रम् ' है । इसप्रकार उस अव्ययपुरुषप्रधान, माय महेश्वररूप ‘ अश्वत्थब्रह्म ' के अव्यय - अक्षर - क्षर - विवतों के अनुबन्ध से ' अमृतम् -ब्रह्म - शुक्रम् ' ये तीन महिमाविवर्त्त होजाते हैं । वही अधिष्ठानावस्था में ' अमृतम् ' है, निमित्तावस्था में वही ' ब्रह्म ' है । एवं आरम्भणात्मिका उपादानावस्था में वही - शुक्रम् ' है । अमृतब्रह्मात्मक अव्ययपुरुष ही अधिदैवतविवर्त्त की ‘ प्रतिष्ठा ’ है, ब्रह्म – ब्रह्मात्मक अक्षरपुरुष [ पराप्रकृति ] ही जीवात्मक - अध्यात्मविवर्त्त की ‘ मूलधृति ’ है, एवं शुक्रब्रह्मात्मक क्षरपुरुष [ अपराप्रकृति ] ही विश्वात्मक अधिभूतविवर्त्त की ' विधृति ' है | ज्ञान-शक्तिघन अमृताव्यय ही मनोघन आत्मा है, क्रियाशक्तिघन ब्रह्माक्षर ही प्राणघन आत्मा है, एवं अर्थशक्तिघन शुक्रक्षर ही वागूघन आत्मा है । तीन आत्मा नहीं हैं, अपितु एक ही श्रात्मा के सञ्चर- [ सर्ग ] भावानुगत तीन महिमाविवर्त्तमात्र हैं, जैसाकि - ' आत्मा उ एकः सन्न तत्त्रयम् ' ( सञ्चरात्मके सर्गपक्षे ). ‘ त्रयं सदेकमयमात्मा ' ( प्रतिसञ्चरात्मके प्रतिसर्गपक्षे ) – ( शतपथ ० १० काण्डे ) इत्यादि. श्रुति से प्रमाणित है । तभी तो अश्वत्थब्रह्म के इन तीनों महिमा - विवत्त के साथ — — तदेव - तदेव - तदेव ' उद्घोष ग्रन्वर्थं बनता है | यही इस त्र्यात्मक - त्रिपुरुषपुरुषात्मक - प्रकृतिविशिष्ट - मायी - महेश्वर - नामक ' अश्वत्थब्रह्म ' का ं किञ्चिदिव स्पष्टीकरण हैं, " जिसका आधार निम्नलिखित श्रार्षवचन ही माना गया है— ÷ “ त इवाः सप्त नाना पुरुषानसृजन्त । तऽएतान्त्सप्त पुरुषानेकं पुरुषमकुर्वन् । स एष पुरुषः प्रजापतिरभवत् । स वै सप्तपुरुषो भवति " । - शतपथब्रा ० ६।१।१ ब्राह्मणे ५६३

पृष्ठ 829

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 829 का मूल पृष्ठ
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प्रथमकाण्ड ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं, तद्ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोका श्रिताः सर्वेतदुनात्येति कश्चन, ए तत् 11 * — कठोपनिषत् २५१ सैषा मूलस्थितिरश्वत्थब्रह्मणो मायीमहेश्वरस्य । अत्र इसी की तूलस्थिति का भी दो शब्दों में अन्वे-बण कर लीजिए | ‘ पाङ्क्क्तो वै यज्ञः ' के अनुसार यज्ञतत्त्व ' पञ्चचिति ' के सम्बन्ध से पञ्चावयव है । उक्त मायी महेश्वर का पूर्वोक्त - अमृत - ब्रह्म - शुक्रात्मक - प्राथमिक छन्दोरूप: जहाँ - ' कालपुरुष ' कहलाया है, बहाँ सृष्ट्यनुबन्धी – श्रग्नीषोमात्मक - यज्ञ के समन्वय से उसी कालपुरुष का द्वितीय महिमाविवर्त्त ' - ' यज्ञपुरुष ' नाम से प्रसिद्ध हुआ है । कालपुरुष ही यज्ञपुरुष का प्रवर्तक माना गया है, जैसा कि – ' कालो यज्ञं समैरयत् ' इत्यादि वचन से स्पष्ट है । कालपुरुषानुगत यज्ञपुरुष क्योंकि ( पूर्व प्रकरणोक्त - व्याख्या के अनुसार ) पाङ्क्त ( पञ्चावयव ) है । अतएव इस यज्ञानुबन्ध से ही तथोक्त त्रिपुरुष - पुरुषात्मक कालपुरुषात्मक अश्वत्थब्रह्म के अमृत - ब्रह्म-शुक्र - नामक तीनों विवत्त की - प्रत्येक की पाँच - पाँच अवान्तर महिमाएँ निष्पन्न होजातीं हैं | और यों - पाँच - पाँच के तीन महिमाविवत्त ' अभिव्यक्त होनाते हैं । ' अमृतम् ' रूप अव्यय के वे ही पांचों विवर्त्ती ' क्रमशः आनन्द, विज्ञान, मनः, प्राण, वाग् रूप से, ' ब्रह्म ' रूप अक्षर के वे हीं पाँचों विवर्त्त ' क्रमशः अमृत - ब्रह्मा-बिष्णु - इन्द्र - अग्नि सोम - रूप से, तथा शुक्ररूप क्षर के वे ही पाँचों क्रमशः मर्त्य - ब्रह्मा - विष्णु - आदि रूप से पूर्वप्रकरणों में यत्र - तत्र अनेकधा उपवर्णित हुए हैं । इन पञ्चदश [ १५ ] कलाओं का [ १ ] का पूरक, सर्व-व्यापक मायातीत वही परात्पर परमेश्वर है । तदित्थ – परात्पर - पञ्चकलाव्ययामृत -- पञ्चकलाक्षरब्रह्म--पञ्चकल क्षरशुक्र, रूपेण मायी महेश्वरात्मा अश्वत्थब्रह्म ही ' षोडशकल - षोडशी - प्रजापति ' नाम से प्रसिद्ध होजाता है, जिसका तदनुरूप तृतीय रेखाचित्र से सर्वात्मना नहीं, तो अंशतः तो समन्वय हो ही जाता है ।

* -ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थ प्राहुरव्यंयम् ।

--छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥

- गीता - छन्दः पुरुषमिति यमवोचाम ( स एव महापुरुषो मायी महेश्वरः ) । – ऐतरेय आरण्यक ( १ ) गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठां देवाश्च सर्वे प्रति देवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति । - उपनिषत् ५६४

पृष्ठ 830

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-१ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 830 का मूल पृष्ठ
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( ३ ) - मायी - महेश्वरात्मक - अश्वत्थब्रह्मानुबन्धी- अमृत - ब्रह्म - शुक्र - वितानस्वरूपपरिले ( तृतीय- रेखाचित्र ) -तदेवामृतम् परात्परः श्रानन्दः आन, विज्ञा. मुकः मायी - महेश्वरः सकल: - षोडशी ( अमृतम् विष्णुः ब्रह्मा अब्ययः मनः इन्द्रः इन्द्रः : प्राण )( वा । सोमः सोम अग्निः अग्नि अमृतानमर्त्याः ( पृ ० सं ०. ' सनातनषोडशी तद्ब्रह्म तदेवशुक्रम् पररात्परः मिनः प्राया वाक सगुणः - सत्यः ब्र आन ब्रह्मा विष्णुः ब्रह्म सविकार: - यज्ञः याक्षरः इन्द्रः मनः इन्द्रः अमृतम् सो . :, प्राण वाकू अग्निः मर्त्याः सोमः परत्पिरः वाक् आपः अग्निः साञ्जनम् विराट सावरणं विश्वम् विष्णुः आनन्दः ब्रह्मा विज्ञानम आत्मक्षरः इन्द्रः इन्द्रः मनः .अ LE सोमः / अग्निः झाणण मत्यः अमृताः वाकू प्रतिमाषोडशी उपेश्वरषोडशी