Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 91–100

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 91–100

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड प्रकृत में निवेदनीय यही है कि, वैध - यज्ञकर्म्म भारतीय - विज्ञानकाण्ड का आचारनिष्ठात्मक — वह महान् स्तम्भ है, जिसे केवल पूजन हवन - पाठ -- पारायणादि बाह्य प्रतीकों पर ही परिसमाप्त नहीं कर दिया नासकता । जो ऐसा करते हैं, वे यज्ञकर्म के अध्यात्म - अधिदैवत - निबन्धन - प्रतिष्ठासूत्रों से सर्वथैव अपरिचित माने जायँगे, और वैसे केवल भूतवादी - बहिरङ्गलक्षणवादी - याज्ञिकों की कृपा से ही यज्ञकर्म जैसा वैज्ञानिक कर्म भी आज इतर - लौकिक - प्रदर्शनों की भांति प्रदर्शनमात्र ही बना रह गया है । इसी काल्वालीकृता भ्रान्तिपूर्णा धारणा के निराकरण के लिए श्राज्य ग्रहण कर्म्म- प्रसङ्गतः भगवान् याज्ञवल्क्य ने यज्ञविज्ञाननिबन्धन-आधिदैविक - आध्यात्मिक - - श्रधिभौतिक भेदेन त्रिधा विभक्त यज्ञविज्ञानों का स्वरूप - विश्लेषण किया है, जिसके माध्यम से यज्ञकर्मानुगता उन सभी काल्पनिकी भ्रान्तियों का सर्वथा ही विलयन होजाता है, जिन काल्प-निकी - भ्रान्तियों से ही ‘ यज्ञकम्म ' जैसा प्रजासर्ग का मूलभूत - इष्टकामधुक् - ( सर्वलौकिक - कामनापूरक, ( न तु इच्छापूरक ) * महतोमहीयान् भी कर्म्म आज उपहास का ही माध्यम प्रमाणित किया जारहा है, इत्यलं-' त्रिविध -- यज्ञानुगत -- संस्मरण ' -- प्रसङ्ग ेन । १६ – ( ७ )

* सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।

न प्रसविष्वध्वमेष वोऽस्त्वष्टकामधुक ॥

— गीता ६१

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श्री ( १७ ) - इध्म - परिध्यनुगत - कर्म्म - प्रसङ्गतः ' प्रस्तरग्रहणकर्मानुमत - शिखा धारणात्मक-संस्मरण ' क्रमप्राप्त तथोक्त नामक १७ वें कर्म में अनेक अवान्तर - कम्मों का स्वरूप- समन्वय हुआ है, जिनमें एक कर्म्मविशेष का नाम है-- ' प्रस्तरग्रहण कर्म्म ' । इसी कर्म्म के प्रसङ्ग से भगवान् याज्ञवल्क्य ने भारतीय--मानव की यज्ञकर्म्मनिबन्धना - सनातन संस्कृतिमूला उस ' शिखा ' के प्रतीकात्मक आधिदैविक विज्ञान का भी स्पष्टीकरण नुग्रह किया है, महतो महीयान् जो शिखात्मक सांस्कृतिक प्रतीक आज अन्यान्य सांस्कृतिक - परिचय-चिह्नों के विस्मरण की भाँति भारतीय प्रजा के लिए, विशेषतः प्रतीय शिक्षा ग्रहग्रस्त नवशिक्षितों के लिए तो सर्वथैव उपेक्षणीय ही प्रमाणित होचुका है – केशसंनिवेश - गुच्छ रूप- कबरी --भाव के स्त्रैणभावानुबन्धी महतो-महीयान् वारुणपाशबन्धन के अनुग्रह से ही । सचमुच यह अत्यन्त ही आश्चर्य का विषय है कि, आज का भारतीय - मानव, विशेषतः नवशिक्षायां-दीक्षित मानवश्रेष्ठ जहाँ पश्चिम की सभ्यता से सम्बन्ध रखने वाले बाह्य - प्रतीकात्मक - यच्चयावत् - सभ्यता - सूचक परिचयचिह्नों के साथ अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ( तमो बहुला - श्रन्धश्रद्धा से ही समन्वित ) समालिङ्गन करते रहने में अपना भौतिक- तन - मन - धन्य - कृतकृत्य ही अनुभूत करता रहता है प्रतिक्षण, उसी मानवश्रेष्ठ की दृष्टि में भारतराष्ट्र की संस्कृति, तथा सभ्यता से अनुप्राणित वे सभी - प्रतीकात्मक - परिचायक - चिह्न केवल उपहास के ही क्षेत्र ब हुए हैं, जिन भारतीय प्रतीकात्मक चिह्नों के साथ प्रतीच्य जगत् के सभ्यता - परिचायक प्रतीक चिह्नों की भाँति केवल बाह्यादृष्टि का ही सम्बन्ध नहीं है अपितु निदानविद्यानुगत जिन भारतीय बाह्य - प्रतीकों के साथ बिज्ञानसिद्ध आभ्यन्तर — प्राणभावों का भी निकटतम सम्बन्ध बना हुआ है धर्मलक्षणवत् । अपनी ग्रीवा में श्रमुक प्रकार के मृत्युपाशबन्धनात्मक बाह्य प्रतीक को ( टाई को ) अहर्निश अपना गलग्रह बनाए रखने वाले आज के सुसभ्य भारतीय मानव ने स्वप्न में भी यह तर्क नहीं उठाया होगा कि-" इस गलपाशबन्धन में ऐसा कौनसा परम वैज्ञानिक लाभ है, जिसके कारण यह हमारा आराध्य बन बैठा है? ' । उसी सुसभ्य भारतीय की वैज्ञानिकी? दृष्टि में आज उन भारतीय सभी प्रतीकात्मक नैदानिक - परिचय-चिह्नों के सम्बन्ध में इत्थंभूत तर्कप्रवाह प्रचण्डरूपेण जागरूक होपड़ा है कि, ' मस्तक क्यों नहीं उघाड़ा * ' कबरी - भाव ', अर्थात् लोकभाषानुसार- ' बबरीबाल ' । ६२

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड ही रक्खें?, शिखा रखने का क्या अर्थ?, तिलक लगाने का क्या प्रयोजन? | उदाहरणमात्र है । भारतीय - संस्कृति - सभ्यता से अनुप्राणित सभी विधि - विधानों के प्रतीकात्मक नैदानिक - लक्षणों - परिचायक-चिन्हों के सम्बन्ध में आज वह स्वयं भारतीय ही वैसा महान् तर्कवादी बन गया है, जिसे पश्चिम के प्राणाधार-शून्य - केवल बाह्य भूतप्रधान - परिचायक - चिह्नों के सम्बन्ध में कदापि क्यों?, कैसे?, आदिरूप तर्कों का स्मरण भी तो नहीं होपाता । इससे बड़ी श्रात्मप्रतारणा, अपनी वञ्चना सम्भवत: भारतीय मानव के अतिरिक्त अन्य किसी भी राष्ट्र का स्वराष्ट्राभिमानी नैष्ठिक - मानव नहीं ही करता होगा । तथाविध - भारतीय - सांस्कृति - परिचय - चिह्नोंनें शिखाधारण का कैसा, और क्या अन्तः ( प्राणात्मक ) बाह्य ( भूतात्मक ) - नैदानिक - महत्त्व है?, प्रस्तरग्रहणा मक कुशमुष्टिग्रहणरूप कर्म्मविशेष के प्रसङ्ग में स्वयं वंदपुरुषने- ' यज्ञो वै विष्णुः । तस्य - इयमेव - शिखा ' ं - इत्यादि रूपेण - भारतीय सभ्यता के सर्वमूर्द्धन्य उस - ' शिखा ' ( चोटी ) रूप महतो महीयान् प्रतीक का ही स्वरूप - समन्वय किया है, जिस परम - सांस्कृतिक इस-' शिखा ' रूप चिह्न के नामस्मरण को भी आज का नवीन प्रज्ञ - भारतीय- मानव व्यर्थतम - निम्मू-तर्काभासों को अग्रणी बनाता हुआ उद्वेगकर ही मान रहा है । तदुद्बोधनायैव तत्प्रकरण में हमनें- ' प्रस्तर ' रूप नैदानिक - शिखाभाव के पारिभाषिक- उस प्राणनिबन्धन कारण - के स्वरूप स्पष्टीकरण का प्रयास किया है, जिस के माध्यम से अवश्यमेव हम भारतीय अपने प्रतीक चिह्नों की निन्दा करने से तो उपरत हो ही सकते हैं, इसी उदाहरण - संस्मरण के साथ प्रक्रान्त - निदर्शन उपरत होरहा है । [ १७ ] –८ ११

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श्रीः [ १८ ] -सामिधेन्यनुवचनकर्म्म- प्रसङ्गतः ' संगीतानुगत- विशेष - उदाहरण ' का - संस्मरण ६ का स्वरूप -- विश्लेषण ' सामिधेन्यनुत्रचनकर्म्म ' नामक महतो महीयान् याशिक- कम्मं की अनेक इतिकर्त्तव्यता - रहस्यपूर्ण वैज्ञानिक - विषयों शतपथ के चार - ब्राह्मणों में हुआ है, जिस में प्रधानकर्मप्रसङ्गतः आवेदन ' का कलेवर क्योंकि विस्तार-का स्वरूप- समन्वय प्रयास हुआ है । प्रस्तावनानुगत इस ' किश्चिदिव - सामिधेन्यनुवचनकर्म से अनुप्राणित अनेक-पथानुगामी बनता जारहा है । अतएव ब्राह्मणचतुष्टयात्मक ' का स्वरूप संस्मरण ही इस क्रम व्यवस्था में पारिभाषिक - तथ्यों में से ' सङ्गतानुगत - एक विशेष उदाहरण पर्याप्त मान लिया गया है । से ही किया है युगधर्मा-' मङ्गीतोदाहरण ' के साथ ' विशेष ' शब्द का समन्वय हमने अपनी विभिन्न ओर दृष्टिकोणों से ' विशेष ' ही नुबन्ध से, जबकि श्रुति के तो सभी प्रासङ्गिक तथ्य अपने अपने है, जिसके अनुबन्धन से हमनें ' सङ्गीतो-प्रमाणित होरहे हैं । युगधर्म्म- निबन्धना वह ऐसी कौनसी विशेषता , प्रश्न का समाधान - ' सांस्कृतिक १ आयोजन ' दाहरण ' को अपनी ओर से ' विशेष ' - उपाधि दे डाली १? प्रवृत्ति ' से ही सम्बद्ध है, जिसमें नृत्य-नाम्ना सुविख्याता - युगधर्म्मनिबन्धना आज की उस ' सांस्कृतिकी के सर्वतन्त्र स्वतन्त्र भारत की प्रभुसत्ता समर्था-गीत - वाद्यात्मक - सङ्गीत ही प्रमुख बना हुआ है, और श्राज संस्कृति का ' विशेष ' मापदण्ड बना हुआ स्वतन्त्रतमा - प्रज्ञा की दृष्टि में इत्थंभूत सङ्गीत ही प्रमुखरूपेण भारतीय ' उदाहरण को ' विशेष ' उपाधि से समलङ्कत है । इसी वर्त्तमानाभिनन्दन की दृष्टि से हमने श्रुति के ' सङ्गीतात्मक कर दिया है इस संस्मरण - प्रसङ्ग में । महती सांस्कृतिक? नृत्य - गीत - वाद्य - समन्वयात्मक सङ्गीत से अनुप्राणिता वर्त्तमानयुगानुबन्धिनी - प्रज्ञा से ही अनुप्राणित मान बैठना प्रवृत्ति का समस्त उत्तरदायित्त्व केवल वर्त्तमाना सर्वतन्त्र - स्वतन्त्रा से भारतराष्ट्र के प्राच्य - संस्कृतिनिष्ठ? अमुक तो अन्याय ही होगा | क्योंकि विगत अमुक - कतिपय - शताब्दियों की निरतिशया - सफलता मानते हुए श्रेणि के विद्वान् भी ' परानुरञ्जन ' को ही अपने चरम पाण्डित्य - समाप्लुत ' साहित्य ' को, एवं मनोविनोद-' सङ्गीत ' को, एवं तत् सहयोगी - कल्पनाप्रधान - शृङ्गाररसादि की मानवता का महतो महीयान् वैसा मापदण्ड मानते ' परिशिष्ट - स्थानीय - कला ' को, इन तीनों को ही मानव सङ्गीत - कला - त्रयी के बिना उन विद्वानों आ रहे हैं बड़े ही गौरव के साथ, जिस तथाकथित साहित्य Εκ

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शतपथब्राह्मण २ खराड़ की दृष्टि में मानव ' मानव ' न होकर पुच्छ - विषाण - हीन ( बिना पूँछ सींग ) का एकप्रकार का पशुविशेष ही है । इन परम सांस्कृतिक? विद्वानों की मानवता? पूर्णा - विशाला? दृष्टि में तो साहित्य सङ्गीत - कला-यी से शून्य मानवों का बिना घास फूँस के जीवित रहता पशुओं की भाग्यशालिता का ही परि-चायक अर्थात् इस त्रयी से शून्य मानव और पशु में विद्वानों की दृष्टि में यही एकमात्र भेद शेष रह जाता है कि, पशु घास चारा खाकर जीवित रहते हैं । और ऐसे त्रयी - शून्य ( साहित्य सङ्गीत - कला - शून्य ) मानव चिना घास - फूँस के ही जीवित रह जाते हैं, जिस में भी पशुओं के भाग्यवाद का ही महत्त्व माना जायगा । यों भारतीय प्राच्य विद्वानों की दृष्टि में भी सङ्गीत एक विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त करता हुआ प्रतीत होरहा है अपने महान् सम्बन्धी साहित्य, तथा कला - परिग्रहों को स्त्र क्रोड़ में प्रतिष्ठत रखता हुआ । वही विद्वत्प्रवृत्ति आज के सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भारत में स्वतन्त्र - सत्ताधीशों के महतो महीयान् अनुग्रह से ही सङ्गीत - कला, और अंशत: साहित्य - रूपेण- सर्वाङ्गीण - रूपेण अभिव्यक्ति होपड़ी है, जिसे आधार बनाकर ही उदाहरणरूपेण हमें तत्सम्बन्ध में किञ्चिदिव निवेदन कर देना है एक ' विशेष ' ही तथ्य के स्पष्टीकरण के लिए, जिस विशेष - तथ्य का - ‘ साहित्य - सङ्गीत - कला- रूपा - त्रयी ' से सर्वात्मना - ऐकान्तिकी - प्रतिद्विन्द्विता रखने वाली उस ' त्रयीविद्या ' सही सम्बन्ध है, जिस के नैष्ठिक -- उपासक - भारतीय ब्राह्मण के लिए तो साहित्य सङ्गीत - कलात्मिका— त्रयी सर्वथा न केवल निरपेक्षा ही, अपितु आग्ला, एवं माल्व्य नामक घोरघोरतम मानसिक-शरीरिक- भयानक दोषों की प्रवृत्ति की दृष्टि से उपेक्षणीया, अतएव निषिद्धा ही उद्घोषित हुई है ऋषिप्रज्ञा के द्वारा । क्या ऋषिप्रज्ञा साहित्य - सङ्गीत - कला - रूपा लोकप्रसिद्धा त्रयी से शत्रुता रखती है?, इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न के समाधान का अत्र अवसर नहीं है । इसी प्रश्न की स्वरूप - मीमांसा के लिए हमें एक स्वतन्त्र-निबन्ध उपनिबद्ध करना पड़ा है । अतः तद्द्द्वारा ही तत्प्रश्न के नीरक्षीर विवेक से सान्निध्य प्राप्त करना चाहिए — साहित्य – सङ्गीत- कला - पर ही भारतीय संस्कृति की " इतिश्री " मान बैठने वाले महानुभावों को ÷ । प्रकृत उदाहरणात्मक - संस्मरण - प्रकरण में तो केवल - ' सङ्गीत ' के सम्बन्ध में ही हमें दो शब्द निवेदन कर देने हैं । सामिधेनीक में जिन सामिधेनी ऋचाओं का अनुगमन होता है ' होता ' नामक ऋत्विक के द्वारा, उन ऋङमन्त्रों के साथ ' हिङ्कार ' का सम्बन्ध अनिवार्य्यं माना गया है, जो कि ' हिङ्कार ' सामगान का मूला-धार ही माना गया है. जैसाकि ' नासामा हिक्रियते ' इत्यादि वचन से स्पष्ट है । सामिधेन्यनुवचन - कर्मानुगत, सामगानाधारभूत इस ‘ हिङ्कार ' के पारिभाषिक – स्वरूप - समन्वय के लिए ही हमें तत्सन्दर्भ में - ' नाद - श्रुति-* साहित्य - सङ्गीत - कला - विहीनः साक्षात् पशु: - पुच्छ - विषाण - हीनः । तृणन खादन्नपि जीवमानस्तद् भागधेयं परमं पशूनाम् ॥ " संस्कृति, और सभ्यता - शब्दों का चिरन्तन इतिवृत्त, एव भारतीय -- सांस्कृतिक आयोजनों की रूपरेखा " नामक सहस्र - पृष्ठात्मक स्वतन्त्र - निबन्ध, जो संस्था के द्वारा प्रकाशित हो-चुका है ६.५

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किञ्चिदिव- श्रावेदन कराना पड़ा है, जिस दिग्दर्शन के बिना म्वर ' भावानुत्रन्धी उस शास्त्रीय सङ्गीत का स्वरूप - दिग्दर्शन हिङ्कार का समन्वय सर्वथा असम्भव था । के भी सङ्गीत प्रकृति के अमुक महान् दोषभावों नाद - श्रुति - स्वर - जैसे अलौकिक भावों , और से सम्पन्न श्राग्ला नामक वैसे भयानक दोषों से श्रभिभूत कर लेता कारण मानवीय मन, और शरीर को माव्य आत्मा, और बुद्धि के सत्त्वभाव सर्वथैव अभिभूत होजाते हैं, है, जिन दोषों के आगमन के श्रनन्तर मानवीय के चल पर ही वेदशास्त्रानुगता त्रयीविद्या का स्वरूप- समन्वय-जिस श्रात्मानुगता सत्त्वभावनिबन्धना बुद्धिनिष्ठा को लक्ष्य में रख कर ऋषिने वेदतत्व - चिन्तक नैष्ठिक ब्राह्मण के अवलम्बित है । इसी प्रकृतिसिद्धा स्थिति अनिवार्य माना है । , न गायेत ' यह श्रादेश सम्बन्ध में — ' तस्मार् ब्राह्मणो न नृत्येत आत्मा, बुद्धि, मन, शरीर, इन चार उक्त आदेश का तात्पर्य्यार्थ स्पष्टतम है । मानव का स्वरूप पर्वों का एक स्वतन्त्र विभाग है । इनमें आत्मा, और बुद्धि नामक दोनों पर्वों के सहसमन्वय से ही अनुप्राणित है । बुद्धि से समन्वित आत्मा ही मानव का ' पुरुषभाव ' है, है, एवं मन और शरीर का एक स्वतन्त्र विभाग ' प्रकृतिभाव ' है । इस दृष्टि से श्रात्मना, बुद्धया च वही मानव जहाँ एवं शरीर से समन्वित मन ही मानव का स्त्रीभाव में प्रतिष्ठित माना गया है । मानव मनसा शरीरेण च ' पुरुषभाव में प्रतिष्ठित माना गया है, वहाँ वही ' कहलाया है, एवं मनःशरीरप्रधान वही मानव ' भावुक मानव आत्मबुद्धिप्रधान वही मानव ' नैष्ठिकमानव मानव - ' स्वतन्त्र - पुरुषार्थी - मानव ' कहलाया है, एवं मनः-कहलाया है | श्रात्म - बुद्धि- समन्वित वही - पराश्रित मानव ' माना गया है । इसप्रकार अनेक दृष्टियों से शरीर - समन्वित - वही मानव - ' परतन्त्र के समन्वय - तारतम्य से अनेक स्वरूप - विभाजन होरहे हैं । मानव के इन तथाकथित चार पर्वों मानव माना गया है, एवं मनःशरीर - भावुक— आत्मबुद्धिनिष्ठ नैष्ठिक मानव ही ' अन्तर्मुख ' आधार पर ब्राह्मण - क्षत्रिय-पुरुष - प्रकृति - सिद्ध - तथ्य के मानव ही ' बहिर्मुख ' मानव माना गया है । इसी - व्यवस्था हुई है, जिसका फलितार्थं निम्नलिखिता वैश्यशूद्र- मेदमित्र चतुर्विष वर्तमानकों की स्वरूप है -संक्षिप्ता तालिका से सर्वात्मना गतार्थ मान लिया जासकता एव – “ ब्राह्मणः " | ( १ ) - शरीर - मनो- बुद्धि गर्भितः - श्रात्मप्रधानो मानव - " क्षत्रियः ” । - मनः - श्रात्म गर्भितः बुद्धिप्रधानो मानत्र एव ( २ ) - शरीर- एव - " वैश्यः " | ( ३ ) - शरीर - बुद्धि- आत्म- गर्भितः- मनः प्रधानो मानव एव - " शूद्रः " । ( ४ ) - श्रात्म - बुद्धि मनो-- गर्भित: - शरीर प्रधानो मानव से अनुप्राणित चतुर्विध- मानववर्ग के चारों प्रकृतिविशिष्ट, एवं संस्कारों से सुसंस्कृत तथोक्त चातुर्वर्ण्य की व्यवस्थाएँ व्यवस्थित हुई है । - क्षमता - योग्यता - श्रादि अवान्तर वर्गमेदों के माध्यम से ही वर्णनिबन्धना ) भारतीय - समाजव्य -( नतु काल्पनिक - भूत साम्यमूला व्यवस्थापकों के द्वारा, जिस सुप्रसिद्धा - श्रात्मसाम्यमूला ३६

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शतपथब्राह्मण २ खण्ड वस्था का ही नाम है वह वैज्ञानिकी - ' बरव्यवस्था ', जिसकी व्यवस्था के सर्जक नहीं भारतीय ऋषि हैं, वहाँ ‘ व्यवस्था ' के आधारभूत चारों ' वर्ण ' प्रकृतिसिद्ध ही हैं, ईश्वरीय ही हैं * । उक्त चतुर्विध वर्णमानवों में आत्मनिष्ठ ब्राह्मणमानव को ऋषिने- ' गुहानिहित ' माना है, बुद्धिनिष्ठ क्षत्रिय मानव को ' सौय्र्यमारुतिक ' माना है, एवं मनः - शरीर - भावुक वैश्य - शूद्र मानव को - ' वातातपिक ' माना है । गुहानिहित - श्रात्मनिष्ठ - ब्राह्मणमानव ' अर तिर्जनसंसदि ' रूपेण - लोक - समाज - सम्पर्क से तटस्थप्राय ही बना रहता है । तभी इसकी श्रात्मचिन्तनमूला - ज्ञानविज्ञानतत्त्वान्बेषणात्मिका दुरधिगम्या-श्रध्यनपरम्परा सुरक्षित बनी रह सकती है । ऐसा गुहा निहित ब्राह्मण मनः शरीरनिबन्धन व्यासङ्गों से निष्टा-पूर्वक आत्मपरित्राण करता हुआ । ही तत्त्वचिन्तन - अन्वेषणादि कम्मों में सफलता प्राप्त कर सकता है । अतएव ऋषि वेदत्रयी के अनन्योपासक श्रात्मनिष्ठ ब्राह्मण के लिए मनःशरीर - निबन्धन - साहित्य - सङ्गीत - कला - त्रयी को निरपेक्ष ही मान लिया है । अमुक - चिगत - शताब्दियों में भारतीय - सत्तातन्त्र के सञ्चालक - क्षत्रिय राजत्रोंनें ब्राह्मणपुरोधा के सांस्कृतिक अनुशासन की उपेक्षा कर अपने प्रतिष्ठात्मक बुद्धितन्त्र को जलाञ्जलि समर्पित कर केबल मन: -शरीर - निबन्धना कामार्थभोग- परम्पराओं को ही अपने जीवन का प्रमुख लक्ष्य बना लिया था । राजसत्ता की तथाभूता परम्परा का ही दुर्भाग्यवश अमुक आत्मनिष्ठ वर्गविशेष भी स्वार्थलिप्सावश समर्थक बन गया, और उमी ने सत्तातन्त्रों की चाटुकारिता के लिए तन्मनःशरीरानुरञ्जक- प्रधान - शृङ्गारादि- समन्वित माहि-त्यानि का सर्जन कर डाला । और यों स्व - नैष्ठिक - लक्ष्य - मे च्युत राष्ट्र की ब्राह्मणप्रज्ञा ने ही सर्वप्रथम अपनी गुहा निहिता तत्त्वचिन्तनवृत्ति को जलाञ्जलि समर्पित करदी, जिस शिरोभाग के प्राथमिक - सांस्कृतिक पतन से ही भारत की ग्रात्मग्रह्ममला ज्ञानविज्ञानप्रधाना मौलिक संस्कृति आगे जाकर - साहित्य सङ्गीत - कला - आदि मनः शरीर - निबन्धन- उपलालनों पर ही विश्रान्त होगई, जिसका सविस्तर यशोवर्णन? ( ऐतिहासिक - स्वरूप-विश्लेषण ) हमने – ' श्वेतक्रान्ति का महान् सन्देश ' नामक स्वतन्त्र निबन्ध में हीं किया है । यों लोकैषणा-वित्तणा के युगधर्मानुबन्धी पङ्क में निमग्ना ब्राह्मण - विद्वानों की काल्वालीकृता प्रज्ञा के कारण ही भारतराष्ट्र की ज्ञानविज्ञानात्मिका त्रयीमला निगम आगम- पुराण - शास्त्रसम्मता - वास्तविक - संस्कृति, और तदनुगता वास्तविक - सभ्यता तो होती गई उत्तरोत्तर स्मृतिगर्भ में विलीन, एवं त्स्थाने च कामार्थभोगपरायण - राज्यतन्त्रों के मनोऽनुरञ्जन से अनुप्राणित सामयिक प्ररोचनात्मक साहित्य सङ्गीत - कलात्मक मनः शरीरप्रधान- व्यासङ्ग ही बनते गए प्रधान, और ये ही बन गए कालान्तर में महान् सांस्कृतिक प्रायोजन । श्रात्मबुद्धिसम्मत नै ष्टिक तत्त्वचिन्तन की मूल प्रतिष्ठा से वञ्चित इत्थंभूत - जिन इन आयोजनों का भारतीय- पारिभाषिक- ' संस्कृति ' ' सभ्यता ' शब्दों के चिरन्तन वैज्ञानिक - इतिवृत्त से स्वानिक - सम्पर्क भी तो नहीं है । तदित्थं आत्मबुद्धिप्रधाना अपनी ज्ञानविज्ञानात्मिका - निगमागमपुराणसम्मता मौलिक - संस्कृति, तथा सभ्यता को अनेक - शताब्दियों से पूर्व ही सत्तातन्त्रानुरञ्जनाकर्षणधिया जलाञ्जलि समर्पित कर बैठने वाले, परानुरञ्जनपूर्वक - स्वार्थसंसाधन में अपने स्वरूप को विस्मृत किए रहने वाले एतद्द ेशीय विद्वान् ब्राह्मणों की * - प्रकृतिविशिष्ट ंचातुर्वर्ण्य, संस्कारविशेषाच्च । —वसिष्टः ६७

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किञ्चिदिव श्रावेदन महती प्रज्ञा से विनिर्गत - साहित्य सङ्गीत कलादि - व्यासङ्गों ने ही ' संस्कृति ' का श्रासन अपहृत कर लिया, जिस उस बिगता - भुक्ता - प्रकान्ता - दायादभित्ति के आधार पर ही आज का सर्वतन्त्र - स्वतन्त्र - भारत, और उसके प्रभुसत्ता समर्थ - सत्ताधीश नाच - गान - वाद्य - हास - परिहास - नाटक - अकादमी - आदि आदि बालो-पलालनात्मक - नितान्त - भावुकतापूर्ण एवं श्राग्ला, तथा माल्व्य - नामक भयानक दोषों से काल्वालीकृत-ताक - घिनाधिन -त - न - र - री - म् - सामयिक - कविता माधुर्य्य - प्ररोचनात्मक - विविध कलात्मक - विन्यास श्रादिपर ही भारतीय -- संस्कृति का पर्यवसान मानते हुए तत्प्रचारार्थं अपने देश के कुशल गायक - अभिनेता-अभिनेत्री आदि कलाकारों के समूहात्मक महतो महीयान् सांस्कृतिक -- शिष्टमण्डल? के माध्यम से भारतीय - ' संस्कृति ' के गौरव ९ को पुनः स्थापित करने के लिए प्रतिक्षण ही आकुल - व्याकुल ही बन रहे हों, तो इसमें उनका यत्किञ्चित् भी अपराध इसलिए नहीं माना जासकता कि, आज के स्वतन्त्र - सत्तातन्त्र को भारतराष्ट्र के वर्त्तमान, तथा अतीत के तथाकथित सांस्कृतिक विद्वानों के द्वारा अमुक शताब्दियों से परम्परया ' सांस्कृतिक ' के नाम पर यही तो सब कुछ उपलब्ध हुआ है । माल्व्य, तथा श्राग्ला- दोष -से समन्वित, नाद - स्वर - श्रुति - विश्लेषण के प्रसङ्ग से ही तत्कर्म में विस्तार से हिङ्कारमूलक -- सङ्गीत के नाद--ति - स्वर - भावों की स्वरूप मीमांसा हुई है, जिसकी पूर्वोक्ता - युगधर्म्म - निबन्धना -- विशेषता के कारण ही हमनें इस उदाहरण को ' विशेष ' उपाधि से सुविभूषित कर देना अन्वर्थ मान लिया है, इत्यलमति-पल्लवितेन-- " सङ्गीतानुगत- विशेष - उदाहरण- संस्मरणेन ' । [ १८ ] - 8 EC

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श्रीः ( १६-२० ) - पूर्वोत्तराघारकर्म्म -प्रसङ्गतः “ कतिपय-- वैज्ञानिक तथ्यों का संस्मरण ” १०- ११ द्विब्राह्मणात्मक - ' आवारब्राह्मण ' नामक ब्राह्मणसन्दर्भ में पूर्वाघारकर्म्म, उत्तराघारकम्मे नामक १६- २० वें -- इन दो कम्मों का सोपपत्तिक स्वरूप - विश्लेषण हुआ । है, जिसके प्रसङ्ग से अनेक प्रासङ्गिक परिभाषिक - तथ्यों का भी श्रति ने समन्वय किया है । उहीं में से एक दो तथ्यों का उदाहरण रूपेण दो शब्दों में संस्मरण कर लिया जाता है । ( क ) - मनोवाग्भावों के पारिभाषिक- स्वरूप का संस्मरण-पूर्वाधारक का तिने मन से सम्बन्ध माना है, और वह तूष्णीं किया जाता है । एवं उत्तरा--घाग्क्रम्मं का वाक् से सन्बन्ध माना गया है, और वह मन्त्रोच्चारणपूर्वक किया जाता है । मनुष्यकृत अग्नीषोमात्मक इस वैध - यज्ञ के द्वारा उसीप्रकार यज्ञकर्त्ता - यजमान के लिए स्वर्गप्रापक एक अपूर्व - यज्ञा-तिशयरूप - प्राणप्रधान --अतएव -- परोक्ष भावापन्न - सुसूक्ष्म - ' दैवात्मा ' अभिव्यक्त, किंवा सम्पन्न किया जाता है, जो उत्पन्न - अभिव्यक्त होकर - ' त्रिणाचिकेत ' नामक सप्तदशस्थ स्वर्गस्थान में प्रतिष्ठित होजाता है यजमान के भूतात्मा के साथ प्राणसूत्र माध्यम से ग्रन्थि बन्धन - करता हुआ । जब यजमान मानवीय - आयुर्भोगकाल पर्य्यन्त इस लोक में यथाकर्म्म भोग भोग लेता है, तो आयुःसूत्रोपराम के अनन्तर उसी दैवात्माकर्षण से यज्ञकर्त्ता यजमान का भूतात्मा स्वर्गस्थान में प्रतिष्ठित होजाता है अमुक अवधि के लिए, जैसाकि -'दर्शपूर्ण-मासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत ' इत्यादि फलश्रुतियों से स्पष्ट है । श्रात्मा का स्वरूप ज्ञान - क्रिया - अर्थ - शक्तिमय इसलिए माना गया है कि, ज्ञानशक्तिमय मन, क्रियाशक्तिमय प्राण, और अर्थशक्तिमयी बाक्, इन तीनों के सहसमन्वय से ही मानवीय ‘ श्रात्मा’के स्वरूप * - " सयदुशु क्रियते तन्मनो देवेभ्यो यज्ञं वहति । अथ यद्वाचा निरुक्त ' क्रियते -- ता. देवेभ्यो यज्ञं वहति । तूष्णीं तमाघरयति, यं मनसे -- आघारयति । मन्त्रेण तमाघार पति, यं वाचे श्रावारयति " — इत्यादि - सन्दर्भ EE

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शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 100 का मूल पृष्ठ
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किश्चिदिव श्राबेदन की अभिव्यक्ति होती है, फिर वह पार्थिव - यथाजात - ' भूतात्मा ' हो, अथवा तो श्रपार्थिव - प्राणप्रधान - ' दैवात्मा ' हो | यज्ञकर्म से प्राणप्रधान देवभाव का सम्पादन होता है, जो कि प्राणतत्त्व गतिधर्म से किया प्रधान बना हुआ है । यों प्रधानदेवता से अनुगत ' वापक ' नामक यज्ञकर्म से प्राणदेवानुचन्धेन यज्ञिय - संस्कारात्मक दैवोत्मा के ' प्राणभाग ' की तो स्वरूप- निष्पत्ति होजाती हैं । किन्तु अभी मन, और वागभाग शेष ही रह जाते हैं, जिनके चित्र्यात्मक - त्रिपर्वा आत्मा का स्वरूप सर्वात्मना सम्पन्न नही होसकता । इसीलिए पूर्वाधार, और उत्तरचार, नामक दो गौगाकर्म किए जाते हैं, जिनमे क्रमश: -- प्राणात्मक - टैवात्मा में इस ओर मन का, तथा उम और वाकू का प्राधान भी होजाता है । और य देवात्मा मन: प्राण- वाक् -- रूपेण सर्वात्मना सुसम्पन्न बन जाता है । इनके सम्बन्ध में ही श्र तिने यह व्यवस्था की है कि, मनका स्वरूप - सम्पादक पूर्वाधार तो उपांशु, अर्थात चुपचाप होता है, एवं बाक का स्वरूप- सम्पादक- उत्तराधार - उच्चारणपृत्रक होता है । ऐमा क्यों?, इसी प्रश्न का आख्यानभाषा में समाधान करते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कह रहे हैं कि – " एक बार मन श्रीर वाक् ( वाणी ) में परस्पर ' अहँ भद्रत्त्व ' के लिए घोर संघर्ष उपक्रान्त होपड़ा | दोनों ही परस्पर एक दूसरे के समतुलन में अपने अपने ही अहंभद्रत्व ( श्रेष्ठत्व ) की घोषणा में निमग्न थे स्व -- स्व - तर्क -- परम्परा के माध्यम से । वाक् की अपेक्षा अपनी श्रेष्ठता स्थापित करते हुए मनोदेव ने यह तर्क उपस्थित किया कि, “ मेरे ज्ञानीय संकल्प का आधार बनाए बिना तुम कदापि किसी भी तथ्य को अभिव्यक्ति नहीं कर सकती " । ठीक इसके विपरीत मन की अपेक्षा अपना श्रेष्ठत्त्व स्थापित करते हुए बाग्देवी ने यह तक उपस्थित किया कि – “ तुम अपने संकल्पात्मक - - मानस - सूक्ष्म - श्रभ्यन्तर-जगत में जो भी ज्ञानीय- कल्पना करते रहते हो, मैं हीं उसे बहिर्जगत् में अभिव्यक्त कर सकती हूँ, करती रहती हूँ । यदि मेरा सहयोग तुम्हें न मिले, तो तुझारे संकल्प केवल संकल्परूप में ही निरर्थक ही प्रमाणित होते रहैं " । दोनों के द्वारा दोनों का समाधान जब सम्भव न बन सका, तो दोनों सर्बाधारभूत प्रजापति की शरण में पहुँचे इस समस्या के निर्णयात्मक समाधान के लिए । प्रजापति ने मन के पक्ष में ही अहंभद्रत्त्व का निर्णय- व्यक्त करते हुए वाक् के सम्मुख यही स्पष्टीकरण रख दिया कि, “ वाग्देवी! तुम मन की कृतानुकरा हो, अनुवर्त्तिनी हो । बिना मन के तुमारा कुछ भी तो मूल्य नही है । " प्रजापति के इस निर्णव से वाक् का अतिमानात्मक गव चूर चूर होगया । इस अपमान से अपमानिता वाग्देवी प्रजापति के प्रति सर्वथा अग्निश्च वायुश्च ( क्रुद्ध ) ही बन गई, और तत्परिणाम -- स्वरूप वाक्_ केमुख से ये ही उद्गार अभिव्यक्त होपड़े प्रजापति के प्रति कि – ' हे प्रजापते! आपने क्योंकि मुझे मन की अपेक्षा अवरश्रेणि की, तथा मन को श्रेष्ठ प्रमाणित किया है, तब मैं कदापि आपके लिए विद्रव्य का वहन नहीं करूँगी ' * सवा एप आत्मा वाङमयः, प्राणमय, मनोमयः ( ० आ ० उप ० ) ब्र ० त्रयं सदेकमयमात्मा, आत्मा उ एकः सन्नं तत्त्रयम् ( शत ० ब्रा ० )