Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1031–1040
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1031–1040
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चतुथ त्रध्याय सामिषेनी ब्राह्मण ऋचा ' पृथुमती ' है । तीनों की समष्टि लोकत्रयसम्पत्ति की संग्राहिका बनती है । प्रकृत सामिधेनी - प्रकरण में ' लोकत्रिच ' अध्वरवन्त त्रिच बृप एवन्तत्रिच ' इनमें पहला लोकत्रिच व्यष्टिरूप से ही त्रैलोक्य में व्याप्त दिव्याग्नि का समिन्धन है ॥२७,२८, ॥ प्रथमकाण्ड ' लोकत्रिच ' नाम से प्रसिद्ध भेद से तीन त्रिच हैं । कर रहा है मन्त्रार्थ स्पष्ट उक्त लोकत्रिच के अनन्तर वृपण्वन्तत्रिच का अनुवचन आरम्भ होता है । ' स नः पृथु श्रवाय्यम् ० ' इत्यादि चौथी ऋचा के अनन्तर यह होता क्रमप्राप्त पाँचवीं ( आवृत्यानुसार सातवीं ) वृपण्वन्तत्रिच की पहिली निम्नलिखित ऋचा का अनुवचन करता है -( ५ ) - " ओम् ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यते वृषा - ओम् ॥ ( ७ ) - ( १ ) ' ताप ' जहाँ अग्नि का प्रातिस्त्रिक धर्म माना गया है, वहाँ ' प्रकाश ' इन्द्र का प्रातिस्त्रिक धर्म माना गया ताप नहीं । है । चन्द्रमा में केवल इन्द्र का सम्बन्ध है, अतएव चन्द्रिका में प्रकाश है, उष्ण जल में केन अग्नि का सम्बन्ध है, अतएव इसमें ताप है, प्रकाश नहीं । अग्नि वरुगा का एकत्र समन्वय सम्भव है, परन्तु वरुण - इन्द्र का एकत्र सहवास असम्भव है । इसप्रकार तार - प्रकाश का भलीभांति पार्थक्य सिद्ध होजाता है । हम जिस सौर दिव्याग्नि का समिन्धन कर रहे हैं, उसमें ताप भी है, प्रकाश भी है । इसमें ताप अग्नि का धर्म है, प्रकाश इन्द्र का धर्म है । इन्द्र ही ' वृपा ' नाम से प्रसिद्ध है । बृषेन्द्र के समन्वय से ही यह यविष्ठव अग्नि ' वृप । ' ( प्रकाशयुक्त ) बन रहा है । इसी वृषेन्द्र के सहयोग से यह अग्नि अन्धकार दूर करने में समर्थ होरहा है । वृषेन्द्र यज्ञ का अधिपति माना गया है । जबतक यज्ञ में इन्द्र-सम्पत्ति का संग्रह नहीं होता, तबतक यज्ञ अपूर्ण रहता है । उसी वृषेन्द्र के संग्रह के लिए इन्द्रयुक्त होने से वृषा नाम से प्रसिद्ध अग्नि का प्रकृत ऋचा से समिन्धन हुआ है, जो कि अग्नि अलोकिकी मन्त्रभाषा से भी स्तुत ( वितन होने वाला ) हैं, एव लौकिक भाषा से भी नमस्कार करने योग्य है । शास्त्रीय कर्म में भी यह ( प्राणरूप से ) उपयुक्त है, तथा लौकिक मानवकर्म में भी यह ( भुतरूप से ) उपयुक्त है । ' ईडेन्यो नमस्यः ' ' के अनुवचनान्तर वह होता क्रमप्राप्त ६ ठी ( वृत्यानुसार आठवीं ) वृषण्वन्तत्रिच की दूसरी निम्नलिखित ऋचा का अनुवचन करता है— ( ६ ) - " ओम् - वृषो अग्निः समिध्यते अश्वो न देववाहनः । तं हविष्मन्त ईडते - श्रम् || ( ८ ) - २ ) वृषेन्द्र के सम्बन्ध से त्रृषा बनता हुआ ही यह अग्नि अश्व - रूप में परिणत होकर देवताओं के लिए यज्ञ का वहन करने में समर्थ होता है । सौरलोक से भूलोक की ओर आनेवाला इन्द्रयुक्त दिव्याग्नि ही अश्वरूप में परिणत होकर वापस लौटता हुआ पार्थिव हवि का द्युलोकस्थ देवतात्रों के लिए इनके विस्रस्तभाग की क्षतिपूर्ति के लिए - वहन करता है । सौरज्योति [ इन्द्रगर्भित दिव्याग्नि ] अपने सावत्ररूप से भूमि [ भूपृष्ट ] की ओर रहा है । जिसप्रकार तरणिकिरण - सङ्ग से पानीय पिण्डात्मक चन्द्रमा श्रद्ध भाग में हीं प्रकाशित रहता है, एवमेव यह श्रागत सौर तेज मी भूपृष्ठ के सूर्य्यदिगनुगत दृश्य श्रद्ध भूभाग को ही प्रकाशित १२६६
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण करता है, शेष श्रद्ध भाग अप्रकाशित ही रहता है । इसी दृष्टिकोण से एक ही पृथिवी के दिति अदिति, ये दो चिव ' होजाते हैं, जैसा कि अध्वरयन्त त्रिचोपपत्ति में विस्तार से बतलाया जाने वाला है । भूपिएड की दरारेचियों को काटता हुआ आगत सौर प्रकाश वक्रगति में परिणत होता हुआ, साथ ही भुच्छाया का स्वरूप- समर्पक बनता हुआ आगे निकल जाता है । यदि हम प्रकाश में चलते हैं, तो हमारी छाया विरुद्ध भाग में पड़ती है । कारण यही है कि, हमारे शरीर से टकरा कर प्रकाशरश्मियाँ प्रतिफलित होजातों है । जैसा श्राकार छाया का होता है, ठीक वैसे ही आकार में यद्यपि - प्रकाशरश्मियों का भी प्रतिकलन होता है, किन्तु प्रकाशपुञ्ज के द्वारा होने वाले अभिभव से उसका हमें प्रत्यक्ष नहीं होता । ठीक यही परिस्थिति आगत सौर तेज की समझिए । सौरप्रकाश भूपृष्ठ पर आया, गायत्ररूप में परिणत होकर पार्थिवरसरूप हवि को लेता हुआ । भन्छाय । के समतुलन से प्रतिफलित होगया । इस भन्छाया - समतुलिता प्रतिफलिता प्रकाशाकृति का साम्वत्सरिक तेज से अभिभव होजाने से हमें प्रत्यक्ष नहीं होता । यही प्रतिफलिता प्रकाशाकृति " अश्व " नाम से व्यवहृत हुई है पार्थिव अग्नि इसी नियत स्थिरयश्वाग्निधरातल मार्ग से यज्ञवहन करता है, इसी अभिप्राय से- ' अश्वो न देववाहन ' कहा गया है । लोक में जहाँ जिस ( निषेध ) अर्थ में ' न ' कार प्रयुक्त होता है, वहाँ मन्त्रमध्य में पटित ' नकार ' निषेधार्थक न होकर ' व्योम हत्याकारक दवार्थक भाव से ही सम्बन्ध रखता है । तभी तो ' अश्वो न ० ' का ' अश्वो ह बाएष भूत्वा ० ' यह अर्थ हुआ है । तात्पर्य यही है कि, ' न'कार प्रभाव का सूचक बनता हुआ । निरुक्तकोटि में प्रविष्ट है, अतएव यह निरुक्त प्रजापति का सूचक बन रहा है । प्रजापति ( आत्मा ) ही तथालक्षणा स्वीकृति के आधार हैं । अतएव मध्यस्थ नकार को तथावाचक मान लिया गया है । प्रजापति स्वयं मध्यस्थ हैं, अतः मध्यस्थ नकार तथावाचक माना जायगा । यदि ऋगायन्त में न कार पठित है, तो उसका निषेध ही अर्थ होगा, जैसाकि " न विजानामि यदि वेदमस्मि इत्यादि मन्त्रवर्शन से स्पष्ट है ॥ २६,३०. ॥ " तं हविष्मन्त ईडते " इस मन्त्रान्तभाग का अर्थ स्पष्ट है । अग्नि की दो प्रकार से उपासना होती है । एक बाचिक उपासना है, दूसरी कम्पासना है । अग्नि को नमस्कारमात्र कर लेना " नम ह विधेम " लक्षणा वाचिक उपासना है । भावशुद्धि के अतिरिक्त इस उपासना का अन्य फल नहीं है । यदि अग्नि को आत्मसात् कर मशकर्म के द्वारा विशेष अतिशय प्राप्त करना है, तो उस समय केवल याचिक उपासना से काम नहीं चल सकता । अतुि उस समय कम्मोपासना ही करनी पड़ेगी, अग्निसमिन्धन ही करना होगा, इसे तृप्त करने के लिए हविःप्रदान ही करना पड़ेगा । इस हवि से यह अग्नि लोकप चितत होगा, जिस इस वितान को ही स्तुतिकर्म कहा जाता है । याचिकोपासना की अपेक्षा जहाँ अग्नि * ओमित्यचः प्रतिगरः, तथेति गाथायाः । यमिति वै देवं तथेति मानुषम् " -ऐ ० ० ७ १६ ॥ १३००
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चतुथ श्रध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथम काण्ड ' नमस्य ' कहलाया है, वहाँ इस कम्र्मोपासना की दृष्टि से इसे ' ईडेन्य ' कहा गया है । वही प्रकृत में प्रधानरूप से अपेक्षित है । ' हामन्तो तं मनुष्या ईडते ' यह मन्त्रभाग अग्निदेव की इस कम्र्मोपासना का ही स्पष्टीकरण कर रहा है, और यही प्रकृत मन्त्रभागों की संक्षिप्त उपपत्ति है ॥। ३१ ॥ " वृषो अग्निः समिध्यते ० " इत्यादि ६ ही सामिधेनी के अनुवचनान्तर वह होता क्रमप्राप्त ७ वीं [ ग्रावृत्यानुसार ६ वीं ] वृषण्वन्तत्रिच की तीसरी निम्नलिखित ऋचा का अनुवचन करता है— ( ७ ) — ' ओम् वृषणं त्वा वयं वृषणः समिधीमहि । अग्न े दद्यन्तं बृहत् - ओम् ' इति ॥ ( ६ ) – ( ३ ) " यज्ञ सम्पत्तित्रर्षक यज्ञधिपति बृपा इन्द्र से यज्ञसम्पत्तिवर्षक बनते हुए ये वृपा ( वृपात्मक ) अग्निदेव आज ( उक्त सामिधेनियों से ) पूर्णरूप से समृद्ध हो गए हैं । द्युलोकस्थ इन्द्र के बृहत्-साम - सम्बन्ध से बृहत बन गए हैं " यह भाव प्रकट करता हुआ प्रकृत मन्त्र अग्नि के वृषात्मकरूप का ही स्पष्टीकरण कर रहा है ॥ ३२ ॥
उक्तरूप से तीनों मन्त्रों की समष्टि वृषएवन्त त्रिच बन को यज्ञपति वृषा इन्द्र की सम्पत्ति से युक्त करना । ३३ वीं है ॥ ३३ ॥
रही है । इसका एकमात्र फल है - दिव्याग्नि कग्रिडका से इसी फल का स्पष्टीकरण हुआ वृषण्वन्त त्रिच के अनुवचनानन्तर वह होता क्रमप्राप्त यादवीं [ आत्यानुसार १० वीं ] निम्न-लिखित ऋचा का अनुवचन करता है । - " ओम् अग्नि दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम् । अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम् ओम् ” ॥ ( १० ) मन्त्र का “ अग्नि दूतं बृणीमहे " वाक्य एक महत्त्वपूर्ण विज्ञान का स्पष्टीकरण कर रहा है । पार्थिव दिव्याग्नि होता कैसे कहलाया? इस प्रश्न के समाधान के साथ साथ ब्राह्मणश्रुति ने पृथिवी की दैनन्दिनगत का स्पष्टीकरण करते हुए साम्वत्सरिकगति का भी विश्लेषण किया है । उसी का संक्षिप्त वैज्ञानिक - स्वरूप पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया जारहा है । भौतिक पदार्थों को स्वस्वरूप से सुरक्षित रखने वाली इनके जीवन साचक श्रादान- विसर्गात्मक यज्ञ-कर्म का नियतकाल पर्यन्त सञ्चालन करने वाली अन्तःशक्ति ही विज्ञानभाषा में ' प्राण ' नाम से व्यवहृत हुई है । ' विरूपास इऋपयस्त इद्गम्भीरवेपसः [ ऋक्सं ० ] इस ऋग्वन के अनुसार ये शक्ति-रूप प्राण अनन्त हैं । प्राणों का श्रानन्त्य ही भूतपदार्थों के आनन्त्य का कारण हैं । अधामच्छदधर्म्मा इन अनन्त प्राग़ों में से प्रकृत में हमें सौर- पार्थिव, इन दो प्राणों की ओर ही विशेषरूप से पाठकों का ध्यान याकर्षित करना है । सूय्य स्वज्योतिर्घन है, अतएव इसका प्राण ज्योतिष्मान् माना गया है । एवं रूपज्योतिर्घना
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चतुथ व्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण पृथिवी का प्रातिविक प्राण कृष्ण माना गया है । ज्योतिर्मय प्रकाशित प्राण ही ' देव ' नामक देवता है, एब तमोमय अप्रकाशित पार्थिव प्रागा ही ' असुर ' है । तम असर है, एवं ज्योति देवता है । यह ठीक है कि, आरम्भ में सम्पूर्ण भूपिण्ड इसके प्रातिश्विक तमोमय श्रासुर प्राथ से ही युक्त था । जब पृथिवी बनी ही होगी, उस समय अवश्य ही असुरों के मुख से " अस्माकमेवेद्र खन्तु भुबनम् ये वाक्य निकले होंगे । परन्तु न तो ऐसा नहीं है । आज भूषण्ड पर अमरीकी भांति दिव्य सौरप्राणात्मक देवताओं का भी साम्राज्य है । देवताओंने राज को आगे कर अजपाज भप्रदेश अपने अधिकार में कर लिया है, जिसका कि पूर्व के बेदनिम्मब्राह्मण में विशदरूष में विवेचन किया जाचुका है * । यही क्यों आज तो सम्वत्सरचक्र की दृष्टि से सम्पूर्ण विण्ड देवताओं के ही अधिकार में आगया है । तभी तो दाखविभागप्रतिपादिका श्रुति का " नेमा सर्वा पृथिवीमभिदन्त " यह कथन अन्वर्थन रहा है ॥ भूषिगड के साथ सीखाना का भी सम्पन्न होरहा है, साथ ही उसका अपना प्राण भी इस पर बल-प्रयोग कर रहा है । पार्थिवप्रा इसे [ भूषिण्ड की ] अपनी ओर [ सूयविरुद्धादिक में ] ले जाना चाहता है. तो सीरप्राण अपने आकर्षण से इसे अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है । दोनों प्राणों का समानाका है । इस समानाकर्षण से भूदि आजतक उसी स्थान पर घूम रहा है । इसी स्वापरिभ्रमण से दैनन्दि नगति का उदय हुआ है | इसी दैनन्दिनगत से अहोरात्र का जन्म हुआ है । घूमते हुए भूषिगड का सूक्ष्य-प्रकाश की ओर आ जाना ग्रहाकाल का जन्म होना है, एवं मुख्यनिरुदृटिक में खजाना रात्रिकाल का जन्म होना है । हाल में देवता उस भूषिण्ड पर अपना अधिकार कर लेते हैं, तो रात्रि में उसी श्रद्ध-भाग पर अमर अपना अधिकार जमा लेते हैं । इसप्रकार अहोरात्ररूप से देवता - अमुर दोनों में परम्पर प्रतिस्पर्द्धा चलती रहती है । इसप्रकार इस स्वाक्षपरिभ्रमणम्ला, दैनन्दिनगति की दृष्टि से भूषिगड दोनों का भोग्य बना रहा है । आगे जाकर साम्वत्परिकगति के प्रभाव से भूषिगड असुरों के अधिकार से निकलकर केथल देवताओं की ही प्रातिम्बिक सम्पति बन जाता है । " अश्वो न देववाहनः " इत्यादि मन्त्रोपपत्ति में यह स्पष्ट किया गया है, भूषिगड में दिति श्रदिति नामक दो भाव उत्पन्न होते हैं । भूकेन्द्र से आरम्भ कर दि विरुद्धदिक की ओर व्याम तेजोमण्डलाकार से समतुलित भूच्छाया - मण्डल ही दिति है । एवं * " देवा वाऽश्रसुराख उभये प्राजापत्याः परधिरे । ततो देवा अनुयामि-बासुः । अथ हासुरा मेनिरे ' अस्माकमेवेदं खलु भुवनमिति । तद्वै देवाः शुश्रुवुः - विभ जन्ते ह वा इमामसुराः पृथिवीं प्रेत- तदेष्यामो यत्रेमा मसुरा विभजन्ते । के वयं ततः स्याम, यदस् न भजेमहि इति । ते बज़मं व विष्णु पुरस्कृत्येयुः । तेनेमां सर्वा पृथिवी-मन्ति । तस्माद्वंदिनम । तस्मादाहुः यावती बेदिस्तावती पृथिवी " ( शत ० ११२ -२।१–१२ ) । १३०२
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चतुर्थ अध्याय सामिनी प्रथमकाण्ड सौरमण्डलानुगत सौर - प्रतिकलित पार्थिव ज्योतिर्भाग ही अदिति है । छापा भी भूपिण्ड से संलग्न है, तो भूप्रकाश भी भूपिण्ड से संलग्न है । भूप्रकाशमण्डललक्षणा अदिति में ज्योतिर्मय दिव्य प्राण का साम्राज्य है । एवं भुच्छायालक्षगा दिति में तपोमय आसुर प्राण प्रतिष्ठित हैं । दोनों हीं प्राण भौम-हृयप्रजापति से सम्बन्ध रखते हुए प्राजापत्य है । यह स्थिति है, और इसी को लक्ष्य में रखते हुए श्रुति ने कहा है-" देवाश्व वा असुराश्च उभपे प्राजापत्याः पस्पृधिरे " । " देवता और असुर दोनों इसी पृथिवी पर खड़े होकर स्पर्द्धा करने लगे । दोनों के इस स्पर्द्धा लक्षण केरा को शान्त करने के लिए दोनों के बीच में गायत्री खड़ी हो गई । यह गायत्री पृथिवी ही है " यह कथन अदिति - दिति का स्वरूप न जानने वालों के लिए कुशङ्का का प्रवर्तक बन रहा है । श्राख्यानों की रहस्यभाषा मे अपरिचित वर्त्तमान युग के कतिपय जिज्ञासु सम्भवतः यह कुतर्क उठावेंगे कि- “ जब देवता और असुर, दोनों इसी पृथिवी पर खड़े थे, तो दोनों के बीच में कौनसी पृथिवी खड़ी हुई? | यदि यही पृथिवी खड़ी हुई तो ये दोनों वर्ग किस पर खड़े हुए? " । परन्तु जत्र इङ्खं दिति - ग्रदिति का स्वरूप- ज्ञान हो जाता है, तो कुराङ्का का कोई अवसर नहीं रहता । जिस पृथिवी पर देवता- अमुर खड़े होकर स्पर्धा करते हैं वह भिन्न है, एवं जो पृथिवी दोनों के मध्य में खड़ी होती है-वह पृथिवी भिन्न है । भूपिण्ड के चित्य चितेनिधेय - -- भेद से दो विवर्त्त होजाते हैं । मत्यग्निमय भूपिण्ड मर्त्या पृथिवी है, यही अस्मदा की पतिष्टाभूमि है । इसे ही ' भूमि ' कहा जाता है । इस भूमि लक्षण भूषिएड का निर्माण-म्वरूपस्थिति - जिन द्रव्यों से हुई है, वे द्रव्य ' आप: - फेन मृन् -मित्रता शर्करा- अश्मा अयः--हिरण्य ' इन आठ मार्गो में विभक्त है ( देखि ०६ । १ । २ । ६ ) इन आठ द्रव्यों की क्रमिक चिति से ही भूपेएड का स्वरूपनिर्माण हुआ है । छन्दोविज्ञान के अनुसार प्रत्येक द्रव्य एक एक अक्षर समलित है । फलतः आठ द्रव्यों के सम्बन्ध से वार छन्द के आठ अक्षरों का संग्रह होजाता है । अष्टाक्षरछन्द का ही नाम गायत्री है । इसी छन्दः सम्पत्ति के कारण इस भ्रष्टव्याहृत्यात्मक भूपिण्ड को श्रुति ने ' गायत्री ' कहा है । अतएव ' या वै सा गायत्री - आसीत् इयं वै सा पृथिवी ' यह कहा गया है । यहाँ ' पृथिनी ' शब्द चित् पृथिवी लक्षण ' भूपिण्ड ' के अभिप्राय से ही प्रयुक्त हुआ है । दूसरी चितेनिधेया पृथिवी है । भीम आग्नेय प्राण उत्थरूप से मुकेन्द्र में प्रतिष्ठित रहता हुआ अरूप से भूपिण्ड से निकल कर अपना एक स्वतन्त्र मण्डल बनाता है जहाँतक इस पार्थिव प्रा की व्याप्ति है, वहाँतक ' अप्रथयत् ' लक्षणा अमृता पृथिवी की सत्ता मानी गई है । अमृतापृथिवी के सौरप्राण के सम्बन्ध से आगे जाकर दिति -- अदिति रूप से दो विवर्त होजाते हैं! श्रागत सौरप्राण भपिण्ड से टकराकर प्रतिफलित होता हुआ भच्छाया से समतुलित अपना जो ज्योतिर्मय मण्डल जनाता है, यह अमृता पृथिवी का भाग सौरप्रकाश से अविच्छिन्नरूप से सम्बन्ध रखता हुया ' अदिति ' भाग है । एवं इस प्रकाशमण्डल से समतुलित भच्छाया - मण्डल अमृता पृथिवी का सौरप्रकाश से वञ्चित भाग दिति है । श्रदिति-१३०३
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण भाग में श्रादित्य ( ज्योतिर्मय देवता ) प्रतिष्ठित हैं, एवं दिति भाग में दैत्य ( तमोमय असुर ) प्रतिष्ठित हैं । इसप्रकार अमृता पृथिवी के दिति श्रदिति भागों में प्रतिष्ठित असुर एवं देवताओं के बीच में मत्यं - ' गावत्री ' नामक भूपिण्ड प्रतिष्ठित है । भूविड के उस ओर ( सूर्य्य की और ) भूषिण्ड से संलग्न देवमय ज्योतिर्म्मण्डल है, इस ओर ( सूर्य्यविरुद्धदिक की ओर ) भूपिण्ड से संलग्न मुरमय तमोमण्डल है, एवं दोनों के मध्य में चित्य भूपिण्ड प्रतिष्ठित है । इसी स्वाभाविक स्थिति का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है— " देवाश्च वा असुराश्च - उभये प्राजापत्याः पस्पृधिरे । तान् स्पृद्ध मानान् गायत्री -तस्थौ । या वैमा गात्री - आसीत् इयं वैसा पृथिवी । इयं हैव तदन्तरा अन्तरा तस्थौ ” । उक्त स्थिति को लक्ष्य में रखते हुए ही आगे की श्रुति का समन्वय कीजिये । दोनों की स्पर्द्धा होरही है । दीनों के मध्य में गायत्री ( भ. पण्ड ) खड़ी है । दोनों यही चाहते हैं कि, यह गायत्री हमारी ओर आजाब | इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए गायत्री के समीप दोनों अपने अपने दूत भेजते हैं । देवताओं के दूत ' अन ' हैं, एवं असुरों के दूत ' सहरक्षा ' हैं । श्रदितिलक्षण ज्योतिम्मण मण्डल में प्रतिष्ठित ज्योतिर्मय अग्नि ' अग्नि ' नामक देवदूत है । ' रक्ष ' का ही नाम ' भस्म ' है । यह भस्म निदानेन भुच्छाया का प्रतिरूप है । दितिलक्षण तमोमय मण्डल में प्रतिष्ठित तमोमय अग्नि ही ' सहरक्षा ' नामक सुरदूत है । लोक में भी प्रज्ज्वलित अग्निज्वाला को हम ग्रग्नि कहेंगे, एवं भस्मनिगूढ अग्नि को सहरक्षा कहेंगे । दिव्यप्राण की अपेक्षा सुरप्राण चलवान् होता है । यही कारण है कि, ज्ज्वालाग्नि की अपेक्षा भस्माग्नि अधिक बलवान् होता है । भूपिण्ड स्वाक्षपरिभ्रमणलक्षणा दैनंदिनगति का अधिष्ठाता बन रहा है । दोनों प्राणों का समाना कर्षगा हो रहा है । परिणाम इस प्राथमिक स्थिति का यह होरहा है कि, भूपिण्ड अभी किसी ओर नहीं जारहा । इस का एकतः गमन तभी सम्भव होसकता है, जब कि दोनों प्राणगतियों में से एक प्राणगति चलवती बन जाय । समानप्राणसंघर्ष से तो उसी प्रकार स्थिति का उदय होजाता है, जैसे कि समानबल वाले दो मल्लों के आकर्षण कति रस्सा पूर्व - पश्चिम, किसी ओर न जाकर मध्य में हीं स्थिर होजाता है । यह चलाधान सुप्रसिद्ध गतवर्म्मा सौर - इन्द्र के अनुग्रह पर निर्भर है । सौर इन्द्रप्राण उसी अदितिमण्डल के द्वारा आता हुआ तत्रस्थ देवदूत अग्नि में अपनी आकर्षणशक्ति का आधान करता है । इस गति से बलवान बनता हुआ आग्नेयप्राण श्रासुर - प्राणगति का याकर्षण शिथिल कर देता है । परिणामतः भूषिएड असुरों की ओर ( पश्चिम की ओर ) न जाकर देवताओं की ओर ( पूर्व की ओर ) श्राता हुआ सम्वत्सरगतिरूप में परिणत होजाता है । इन्द्र ही भूषिड की साम्वत्सरिक गति का मुख्य कारण है । इधर प्राकृतिक दिव्याग्नि इस वृषेन्द्र से नित्ययुक्त रहता है । ' या च का च बलकृतिरिन्द्रकम्मैव तत् ' के अनुसार चलकृतिलक्षणा वृषेन्द्र के सहयोग से ही भूपिण्ड का देवमण्डल की ओर आकर्षण होजाता है । भूपिण्ड स्वाक्षपरिभ्रमण करता हुआ पूर्व की ओर चल पड़ता है 1 इसी गतिविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए ऋषि ने कहा है-१२०४
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण " यज्ञ इन्द्रमबद्ध यत्, यद् भूमिं व्यवर्त्तयत् । चक्राण पशं दिवि " || ( ऋक्सं ० ८ | १४ | ५ | ) प्रथमकाण्ड साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि पश्चिमदिगनुगता यह श्रासुरप्राणगति ही भूपिण्ड को सू-गोलगर्भ में जाने से रोक रही है । यदि पश्चिमाकर्षण न होता, तो पूर्वाकर्षण से आकर्षित भूपिण्ड स्वस्थान से च्युत होता हुआ अवश्य ही सूर्य्यगोलकगर्भ में विलीन होजाता । पश्चिमाकर्षया है, इसलिए तो भूपिण्ड स्वस्थान ( क्रान्तिवृत्त ) को नहीं छोड़ता । पूर्वाकर्षण प्रचल है, इसलिए पश्चिम की ओर पीधा नहीं चला जाता । क्या पूर्व की ओर सीधा जाता है? नहीं । इसी आसुरप्राणाकर्षण से भूपएड सीधा न जाकर तक जाता है । क्या भूपिण्ड सर्वथा तिर्य्यक् जाता है? नहीं । इसी इन्द्रप्राणाकर्षण से तिय्यक जाते हुए भूषिण्ड की परिभ्रमण-बिन्दु - बिन्दु पूर्व की ओर आकर्षित होती रही है, जिसका ' सम्वत्सर ' शब्द से स्पष्टीकरण होरहा है । शब्द है वास्तव में ' सर्वत्सर ' । परन्तु परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्षभाषा में यह ' सर्वत्सर ' ही ' सम्वत्सर ' नाम से व्यवहृत हुआ है । भूपिण्ड जिस वृत्त ( क्रान्तिवृत्त ) पर परिक्रमा ( साम्वत्सरिकगति ) लगा रहा है, उसकी बिन्दु बिन्दु कुटिल है । गोलवृत्त का निर्माण इसी ' त्सर ' भाव से होता है । सर्वतः त्सरभाव ( कुटिल भाव ) ही सवत्सर है ( ' त्सर ' छद्मगतौ ) । यही सर्वत्सर है । सम्बत्सर नाम के सम्बन्ध से यह व्युत्पत्ति होगी कि, भूपिण्ड एकत्र ( सम् ) बसता हुआ वसन् ) कुटिल रूप से पूर्व की ओर बढ रहा है । देवदूत ग्रग्नि के इस इन्द्राका सहयोग का फल यह निकला कि, सम्पूर्ण भूपिण्ड देवमण्डलोप-लक्षित दिव्य श्राग्नेय सम्वत्सर का अनुगामी बन गया । यही दिव्य आग्नेय देवताओं का विजय कहलाया, एवं तमोमय सुरप्राणों का पराजय कहलाया । निवर अग्नि का रुख था, उसी ओर भूषिगड गत्युन्मुख बना, यही निष्कर्ष है । यही इस अग्नि का दौत्यकर्म है । इसीलिए यह अग्नि देवताओं का ' दूत ' कहलाया । जो यजमान देवदूत श्रग्नि का उक्त गति - रहस्य जानता है, साथ ही जिस यजमान का होता अग्नि के इस दूतस्त्ररूप को जानता है, वह अपने यजमान के लिए लोकसम्पत्ति असपत्न बना देता है । मन्त्र का दूसरा भाग है - " होतारं विश्व वेदसम् ” यह ॥ इसके सम्बन्ध में काल्पनिकोने एक नई उपपत्ति की कल्पना करते हुए मौलिक उक्त मन्त्र भाग में— " होता यो विश्ववेदसम् " इस परिवर्तन की कामना प्रकट की है । कल्पना का उपहासास्पदरूप यही है कि-" होतारं " का " होता - श्ररम् " यह भी छेद सम्भव है । अरं शब्द अलं अर्थ का भी बोधक है । सम्पत्ति का आगमन होता है अग्नि के द्वारा उस के सम्बन्ध में ' अलम् ' बोलना सम्पत्ति का ही निरोध करना है । इस ' अल- भावात्मक ' ' अरं ' से सम्पत्ति निरोध न होजाय, अथवा स्वयं होता अग्नि का अभाव ( आगमन-निरोध ) न होजाय, इसके साथ ही अनुवचन करने वाला होता अपने आप को समाप्त न कर बैठे, इसलिए ' होतारं ' के स्थान में ' होता बो ' इत्यादि रूप से परिवर्तन कर डालना चाहिए " । उक्त मानुत्र- कल्पना क । श्रुति ने कर्त्तव्यताओं में अपनी मानुष - कल्पना के आमूलचूड़ खण्डन करते हुए कहा है कि, यज्ञमन्त्रों में, यज्ञेति-द्वारा काल्पनिक उपपत्तियाँ मानते हुए परिवर्तन कर डालना यज्ञ-स्वरूप का नाश ही कर लेना है । आज भी तो ऐसे कल्पनारसिकों की कमी नहीं है । भारतवर्ष के गौरवभूत १३०५
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीत्राह्मण शथपथब्राह्मण नित्यमज्ञाधार पर प्रतिष्ठित, वैध्यज्ञों को ' वायुशोधक ' मानने की कल्पना करते हुए जो ' महाशय ' चिरन्तन पद्धतियों से विरुद्ध केसर - कपूर - गोला आदि को आहुतिद्रव्य मानने की पृष्टता कर रहे हैं, क्या वे यज्ञकर्म के शत्रु नहीं है? । ऐसे ही काल्पनियों का प्रबोधन करवाती हुइ श्रुति कहती है कि, कम्मंट को चाहिए कि, वह जैसा विहित है, वैसा ही करें । अपनी कल्पना से उसमें अणुमात्र भी परिवर्त्तन न करें । तभी यज्ञ के द्वारा अभीष्टसिद्धि सम्भव है । इसी आदेश के साथ फलोक्सहार करती हुई ३४-३५ कण्डिकाएँ उपरत हुई हैं ॥ ३४, ३५, ॥ मूलानुवाद में स्पष्ट कया गया है कि, ' अग्नि दूतं ० ' इत्यादि को ग्राठबीं मान कर ही अनुवचन करना चाहिए । ऐसा करने से साक्षात् रूप से अष्टाक्षर गायत्रीछन्द से छन्दित गायत्राग्नि - सम्पत्ति का यज्ञ में संग्रह होजाता है । जो महानुभाव काम्येष्टि से सम्बन्ध रखने वाली दो ' धाय्या ' ऋचाओं का समावेश इस से पहले करते हैं, साथ ही काल्पनिक उपपत्ति बतलाते हैं, वे गायत्र सम्पत्ति से विमुख होते हैं । ऋतः धाय्या-ऋचाओं का समावेश इस जाटवें मन्त्र से आगे ही होना चाहिए || ३७ ॥ यदि दर्शपूर्णमास के साथ काम्येष्टि भी अपेक्षित है, तो उस दशा में १५ के स्थान में १७ सामिधे-नियाँ होतीं हैं । इसके लिए २ मन्त्रों का ऊपर से सम्बन्ध किया जाता है, एवं उनके अनुवचन का समय यही माना गया है । ( काग्येष्टि - संग्रह पक्ष में ) ' अग्नि दूतं ० ' के अनन्तर पहिले ' समिध्यमानो अध्वरे ० ' इस ऋचा का अनुवचन होता है, अनन्तर घाय्या नामक दोनों ऋचाओं का अनुवचन होता है । अनन्तर ‘ समिद्धो अग्न आहुत ० ' इत्यादि का, सर्वान्त में ' आजुहोता दुवस्यत ' का त्रिरावृत्तिपूर्वक अनुवचन होता है, जैसा कि मूलानुवाद में स्पष्ट कर दिया है । ( केवल दर्शपूर्णमासपक्ष में १५ सामिधेनी ही विहित हैं । इस पक्ष में ) ' अग्नि दूतं • ' के अनन्तर जिन तीन ऋचाओं का क्रमशः अनुवचन होता है, उनकी समष्टि ' अध्वरवन्तत्रिच ' नाम से प्रसिद्ध है । ' समिध्यमानो अध्वरे ० ' - ' समिद्धो अग्न आहुत: ' ' श्राजुहोता दुवस्वत ० ' तीनों मन्त्रों की समष्ट ही ' श्रध्वरवन्तत्रिच ' है । तीनों मन्त्रों के सम्बन्ध में कोई विशेष वक्तव्य नहीं है । श्रध्वरसम्पत्तिप्राप्ति ही अध्वरवन्त - त्रिचानुवचन का मुख्य फल है । इसप्रकार उक्तरूप से इन १५ सामिधेनियों का अनुवचन होता है | इस अनवचन से अध्वर्यु के द्वारा इद्ध अग्नि समिद्ध ( दिव्य तेजोयुक्त ) बन जाता है । यही समिद्ध अग्नि देवयजन की मूलप्रतिष्ठा है ॥ ३८, ३६, ४० ॥ चौथे अध्याय में पहिला, तथा तीसरे प्रपाठक में तीसरा ब्राह्मण समाप्त सामिधेनी - बाह्मणानुगत - द्वितीय ब्राह्मण अत्र - उपरत २ १३०६
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथम काण्ड चौथे अध्याय में दूसरा, तथा तीसरे प्रपाठक में चौथा सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत- तृतीय- ब्राह्मण 3 अथ निगदानुवचनकर्मोपपत्तिः ब्राह्मण मन्त्रशक्ति के द्वारा ग्राहवनीय में प्रतिष्ठित इस दिव्याग्नि का यही मुख्य कर्म है कि, इसमें जिस देवता के लिए आहुति डाली जाय, उसका विशकलन कर अग्निदेवता द्युलोक की ओर जाते हुए उस देवता तक पहुँचाते हुए इस अन्न के सम्बन्ध से यजमान के मानुषात्मा के साथ उस दिव्यप्राण का सम्बन्ध करादे । कैसा महत्त्वपूर्ण, तथा शक्तिसापेक्ष कार्य है । समिद्ध अग्नि आज थोड़े ही समय में इस दुरूह कम्म में प्रवृत्त होने वाले हैं । इससे पहिले गुण - वीय्य परिचायक निगद्पाठ से इस अग्नि को उत्साहचल से युक्त करना हीं प्रकृत कम्म की मुख्य उपपत्ति है । लोक में इस वाग्वीर्य्यं का हम अद्भुत चमत्कार देखते हैं । कर्णार्जुन का युद्धप्रसङ्ग इस सम्बन्ध में प्रत्यक्ष प्रमाण है । शल्य के अनुत्साहपूर्ण वाक्यों से महावीर भी कर्ण मन्दोत्साह होते देखे गए हैं । कारण यही है कि, ' अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार वागिन्द्रिय अग्निप्रधान है । इसके प्रयोग का फल अवश्य ही शारीराग्नि पर पड़ता है । यदि हमें कोई निरन्तर ' कायर ' कहता रहेगा, तब भी कालान्तर में हमारा अग्निबल मन्द होजायगा । साथ ही यदि हम स्वयं भी अपने आपको धिक्कृत करते रहेंगे, तब भी हमारी वही दशा होगी । इसी आधार पर ' नात्मानमवसाइयेत ' आदेश विहित है । ठीक इसके विपरीत यदि हम किसी के प्रति उत्साहवर्द्धक शब्दों का प्रयोग करते रहेंगे, साथ ही हम स्वयं भी अपने लिए यदि पौरुषसमर्पक शब्दों का प्रयोग करते रहेंगे, तो इस वाक् प्रयोग से तत्समतुलित हमारा शारीरग्नि अवश्य ही वीर्य्यशाली बन जायगा इसीलिए धर्मशास्त्र ने यह आदेश दिया है कि, न तो हमें दूसरों के लिए ही अशुभ वाणी का प्रयोग करना चाहिए, न अपने लिए ही अशुभ शब्द बोलने चाहिए । कभी कभी यह भी देखा गया है कि, मनुष्य को अपनी शक्ति का स्वयं बोध न होने से वह समर्थ-मा बना रहता है । यदि कोई अन्य व्यक्ति वागद्वारा इसे प्रबुद्ध कर देता है, तो उसकी सुप्त शक्ति प्रबुद्ध हो-जाती है | भगवान् मारुति इसी सम्बन्ध में प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । वाग्द्वारा यशोकीर्तन से वीर्य का प्रधान होता है, और अवश्य होता है, यही वक्तव्य है । जब लौकिक वाक् में यह शक्ति है, तो उस दिव्यवाक् ( मन्त्रवाक् ) का क्या कहना, जिसका स्वरूप निर्माण तत्त्वों के अनुरूप हो हुआ है । होतृलक्षण गुरुतम कार्य में नियुक्त करने से पहिले अग्नि में उसी स्ववीर्य्यजागृति के लिए, साथ ही मन्त्र के द्वारा ओर भी शक्ति समावेश के लिए यह निगदानुवचनकर्म होता है ॥ १ ॥
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण प्राकृतिक प्राणदेवता नित्य वर्णव्यवस्था के अनुसार " ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र " भेद से चार भागों में विभक्त हैं । अग्नि ब्राह्मण हैं, इन्द्र क्षत्रिय है, विश्वेदेव वैश्य हैं, एवं पार्थिव पूजाप्राण है । ये ही चारों श्राधिदैविक देवता क्रमशः ब्रह्म - क्षेत्र - विड्वी के एवं शूद्रलक्षण पशुभाव के शूद्र प्रवत्तक माने गए हैं । पार्थिव प्रजा में जिसमें जिस वर्ण के देवता का प्राधान्य रहता है, वह उसी वर्ण की प्रजा कहलाती है । यही भारतीय वर्णव्यवस्था की प्राकृतता, नित्यता, तथा जन्मानुरूपता है, जिसका कि विशट वैज्ञानिक विवेचन ' गीतात्रिज्ञानभाग्यभूमिका - द्वितीयखण्ड - कर्मयोगपरीक्षात्मक ' ख ' विभाग के ' व-स्थाविज्ञान ' प्रकरण में हुआ है । उक्त चारों वर्णों में ब्रह्मबीर्य्यप्रवत्त ' के ब्राह्मणवर्ण सर्वोत्कृष्ट माना गया है । इसी वर्ण के आधार पर इतर तीनों वर्ण प्रतिष्ठित हैं, यही ब्राह्मणवर्णात्मक होता अग्निदेव का महान् उत्कर्ष है । इसी ब्रह्मवी के प्रभाव से ब्राह्मण अग्नि होतृकर्म में समर्थ हुए हैं । वीपेक्षया जहाँ अग्नि वर्णत: ब्राह्मण हैं, वहाँ कम्मी-पेक्षया ये ही अग्नि ' भारत ' नाम से प्रसिद्ध हैं । पार्थिव हव्य का वहन कर इसके द्वारा द्युलोकस्थ देवप्रजा का भरण पोषण करना भी इह्रीं का काम है । एवं वैश्वानर प्रिप्राणरूप से पार्थिव प्रजा की अध्यात्मसंस्था में प्रतिष्ठित होकर अपने स्वाभाविक अन्नादधर्म से अन्नाकर्षण के द्वारा पार्थिव प्रजा का भरण पोषण करना भी इह्रीं का काम है । इसी मरणकर्म से इहें ' भारत ' कहना अन्वर्थ बन रहा है । जो त्रैलोक्य - प्रजा के भरण - पोषण करने में समर्थ हैं, उनके उत्कर्ष का क्यों बखान करें । तभी तो ये होतृत्त्व जैसा गुरुतम का करने में समर्थ हैं 1 अष्टविध देवव्यवस्था के अनुमार ( जिसका - विज्ञान भाग्य- प्रथम खण्ड में विशद वैज्ञानिक विवेचन किया जाचुका है ) किसी समय इसी भूपृष्ट पर त्रैलोक्य - व्यवस्था थी । पृथिवी अन्तरिक्ष - यौ, तीनों लोक प्रकृतिवत् यहाँ भी व्यवस्थित थे, जिसे ' भौमत्रिलोकी ' कहा जाता है । दक्षिणसमुद्र से आरम्भ कर हिमालय पन्त सम्पूर्ण प्रदेश उस समय का पृथिवीलोक था, अलताबीगिरि से आरम्भ कर उत्तर समुद्र पर्य्यन्त सम्पूर्ण प्रदेश लोक था, एवं हिमालय से प्रारम्भ कर अलतायो पर्वतान्त मध्य प्रदेश अन्तरिक्षलोक था । तीनों के क्रमशः अग्नि, इन्द्र, वायु- ' शव सोनपात् ' देवता थे । इसीलिए तीनों को अग्निलोक, इन्द्रलोक, वायुलोक, नामों से भी यत्र - तत्र व्यवहृत किया गया है । पृथिवीलोक ही इस अग्निदेवता के सम्बन्ध से ' भारतवर्ष ' कहलाया है । पार्थिव प्रजा से कर ग्रहण कर भौम देवलोक में पहुँचाना भी इह्रीं भौम अग्नि का कार्य्य था, साथ ही बामदेव, ओङ्कार आदि अन्ना-ध्यक्षों के द्वारा यहाँ की प्रजा की व्यवस्था करना भी इह्रीं का कार्य्य था । इह्रीं कम्मों से ये ' भारत ' इस ' उपाधि - नाम ' से विभूषित किए गए । इह्रीं के इस ' भारत ' नाम से यह पृथिवीलोक ' भारतवर्ष ' कहलाया । दौष्यन्ति भरतादि के सम्बन्ध से जो इस देश का नाम-करण बतलाया जाता है, वह केवल भरत का यशोगानमात्र है । वस्तुतः ' भारतवर्ष ' संज्ञा की मूलप्रतिष्ठा भौम ' भारत ' नामक अग्निदेव ही हैं । इसप्रकार अधिदैवत, अध्यात्म, अधिभूत, तीनों पक्षों में उक्त निगमन्त्र का समन्वय होरहा है, जो कि निगदमन्त्र उपस्तुतिपरक माना गया है । क्यों निगढ़ा-नुवचन किया जाता है? इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है || २ || १३०८