Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1041–1050
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1041–1050
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण अथ द्यायानुवचनोपपत्तिः प्रथमकाण्ड निंगदानुवचनानन्तर वह होता ' अमुकस्य पौत्रः ० ' इत्यादि रूप से आप मन्त्र का ऊह कर आ-यानुवचन करता है । इस का एकमात्र यही प्रयोजन है कि, इस से इस का महत्त्व ही बतलाया जाता है । ऋषिवंशपरम्परा ही इस महत्त्व - ख्यापन का मूल है । इस विषय का वैज्ञानिक विवेचन पूर्वाधारब्राह्मण में किया जायगा ॥ ३४ ॥
अथ - निवित्पाठः आर्षेयानुवचनानन्तर वह होता ' निवितपाठ ' करता है । सामिधेनी के द्वारा समिद्ध अग्नि जिन जिन गुण - कम्र्म्मादि विशिष्ट धर्मों से युक्त हैं, उनका यशःख्यापन ( बखान ) करते हुए अग्निदेव का अनुग्रह प्राप्त करना हीं प्रकृत ' निचितपाठ ' का मुख्य उद्देश्य है । प्रकृति में निश्ययज्ञ होरहा है, इसी नित्ययज्ञ से सृष्टि का स्वरूप सुरक्षित है । भीम मनुष्यविध देव-तानें ही सर्वप्रथम इस यज्ञरहस्य का स्वरूप पहिचाना पहिचान कर उह्नोंनें हीं सर्वप्रथम ' अरणिमन्थन ' नामक प्रक्रिया - विशेष से वैध अग्नि [ ] उत्पन्न कर उसका समिन्धन किया । इस समिद्ध वैध अग्नि से प्रकृतिवत् यज्ञवितान किया । इसप्रकार इस वैधयज्ञकर्म के प्रथमाविष्कार का श्रेय भौम देवताओं को ही मिला । तभी से यह समिद्ध अग्नि - ' देवेद्ध: ' नाम से व्यवहृत हुआ । भारतवर्ष में सर्वप्रथम यज्ञकम् - वितान का श्रेय मिला अयोध्याधिपति महाराज वैवस्वत मनु को, जिनका प्रातिविक नाम था ' श्रद्धादेवमनु, जो कि भारतवर्ष की मानव प्रजा के प्रथम सम्राट् थे । तत्र से ' देवेद्धः ' के साथ साथ समिद्ध अग्नि ' मन्त्रिद्धः ' नाम से भी व्यहृत होने लगे ॥ ५ ॥
ब्राह्मण -- सम्प्रदाय ने अपने पूर्वज महर्षियों की परम्परा से अग्निवितानलक्षणा अग्निस्तुति का अनुग-मन किया | इस ब्राह्मणसम्प्रदाय की अपेक्षा से साक्षात्कृतधर्म्मा भारतीय महर्षि हो इस अग्नि ( अग्नियज्ञ ) के प्रथम स्तोता ( वितानकर्त्ता ) माने गए । अतएव ये अग्नि आगे जाकर ' ऋषिषुतः ' नाम से प्रसिद्ध हुए ॥ ६ ॥
ऋषिप्रारम्यवेत्ता ये महर्षि ही ' विप्र ' नाम से प्रसिद्ध हैं । भीमदेवताओंने जिस अग्नि का सर्वप्रथम समिन्धन किया, तदनुरूप वैवस्वत मनु ने भारतवर्ष में जिम ग्रग्नि का समिन्धन किया, उस अग्नि का वितान करते हुए भारतीय महर्षियोंनें हृदय से इनका अनुमोदन किया । उन्होंने भी इसे ( अग्निमय यज्ञ को ) सर्वा-भीष्ट फलप्रदाता मानते हुए इस यज्ञकर्म का अनुगमन क्रिया । अतएव अग्निदेव - ' विधानुमद्दितः ' नाम से भी प्रसिद्ध हुए || ७ || साक्षात्कृतधम्र्म्मा, क्रान्तिदर्शी महर्षि ही तो ' कवि ' हैं । उाने सुप्रसिद्ध शस्त्रकर्म के द्वारा इस अग्नि का ‘ शंसन ' किय ।, इसलिए ये अग्निदेव ' कविशस्तः ' नाम से भी प्रसिद्ध हुए । जिस यज्ञकर्म से जिस ' देवा-स्मा ' का स्वरूप उत्पन्न किया जाता है, उस यज्ञकर्म में - ' शस्त्र, स्तोत्र, ब्रह ' नामक तीन कर्म्म किए जाते हैं । १३०६
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण ऋक् से शस्त्रकर्म होता है, साम से स्तोत्र होता है, एवं यजु से ग्रह होता है । प्रजास्वरूप निर्माण में उड़ान द्रव्य, उसका अनयत्र - निर्माय एवं स्वरूप - सम्पत्ति, 3 ये तीन कम्मे अपेक्षित है । गर्भा शयगत शोणिताग्नि में शुक्राहुति देना ही महकम्मं है । शुक्रात्मक ग्रह ही प्रजा का उपादान है । सिक्त रेत का अवयव विशेषरूप से काटछाँट रूप में परिणत होना हीं शस्त्रकम्म है । १० मासान-तर स्वरूप निर्माण का अवसान होजाना हीं स्तोत्रकम्मं है ॥ ये ही तीनों प्रजननकर्म इस यज्ञ में किए जाते हैं, जिनका स्वरूप परिचय भाष्यारम्भ के उपोद्घात प्रकरण में हीं कराया जाचुका है । यजुर्वेदी ध्वजु से जो ग्राहुति देता है, वही ग्रहकर्म है । आहुतिरूप यह ग्रह ही ' उपादान ' है । ऋग्वेदी होता ऋक् से शंसन करता हुआ । ' शस्त्रकर्म्म ' का प्रवत्र्तक बनता है । सिक्क रेतःस्थानीय ग्रह की शस्त्रवत् काटछाँट करना, इस से उसमें अवयव विशेष स्थापित करना होता का ही काम है । सामबेटी उद्गाता सामगानलक्षण लोक से एवं शंसनक गया है ॥ ८ ॥
इसे देवात्मस्वरूप में वितत करता है । प्रकृत का निवित्पाठ क्योंकि होता कर रहा है, क्योंकि होता का प्रातिश्विक कर्म्म है, अतएव यहाँ अग्नि के लिए - ' कविशस्तः ' कहा पार्थिव महिमामण्डल में व्याप्त इस होतृकम्र्म्माध्यक्ष प्राणाग्नि का उत्तरोत्तर सुतीक्ष्णभाव में परिणत होना भूकेन्द्रस्थ कथात्मक ब्रह्माग्नि की ही कृषा का फल है । अग्नितत्त्व विकास - धम्र्म्मा है । इसी स्वधर्म्म से यह उत्तरोत्तर सुतीक्ष्ण ( सुसूक्ष्म ) बनता जाता है । यही सुतीक्ष्णभाव इसकी गति का कारण है । यही इसका सहितावस्था में परिवत रहना है । इस तीक्ष्णमाय का मूलप्रवर्तक केन्द्रस्थ प्रजापति - नामक ब्रह्म ( एतन्नापक अग्नि ) ही है । उक्थ से ही तो ग्ररूप तीक्ष्णभाव का उदय होता है । इसी धर्म की अपेक्षा से ये अग्नि-देव ' ब्रह्मसंशितः ' नाम से भी प्रसिद्ध है ॥ ' घृतमित्युदकनाम ' के अनुसार मृत शब्द आाज्य के साथ साथ इस उटक का भी नाम है! भूगर्भ से वाष्परूप में परिक्षित होकर आन्तरिक्ष्य वायुधरातल पर प्रतिष्ठित होने वाला पत्र इस अग्निगर्भ में हीं प्रतिष्ठित रहता है । युलोक की ओर जाते हुए अग्निदेव ही इस अप की प्रतिष्ठा बनते हैं, जैसा कि " अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीर अति मरुतः सृष्ठान्नयन्ति " इत्यादि ब्राह्मणति से स्पष्ट हैं । इसके अतिरिक्त धान्त-रिदम मृत भी इसी के आधार पर प्रतिष्ठित रहता है, जैसाकि पूर्व के अवत्राह्मण के नीरक्षीर विवेक-प्रकरण ' में विस्तार से स्पष्ट किया जाचुका है । इसप्रकार आधिदैविक संस्था में उदक, तथा घृत का आधार बनता हुआ अग्नि ' घृतवाहन ' बन रहा है । इस आधिभौतिक वैधयज्ञ में आहुत श्राज्य का वाहन तत्प्रतिरूप समिद्ध ग्राहवनीयाग्नि बन रहा है । एवमेव प्राध्यात्मिक त्र्यग्नि भुक्त घृत का वाहन बन रहा है । जिसका शारी-राग्नि प्रदीप्त रहता है, वही घृत को पचा सकता है । इसप्रकार तीनों संस्थाओं की दृष्टि से अग्निदेव ' घृत-वाहनः ' बन रहे हैं || ६ || पाकयज्ञ, अतियज्ञ, महायज्ञ, शिरोयाग, आदि यदि जितनें भी यज्ञ हैं, उन सबका सञ्चालन अग्नि के द्वारा ही होता है | ' अग्नि से यह इस परिभाषा के अनुसार अग्नि ही सर्वयज्ञ प्रतिष्ठा हैं । व्याधिदैविक प्राणदेवताओं के साथ आधिभौतिक अग्नि के माध्यम द्वारा आध्यात्मिक प्राणदेवताओं का मेल करा देना हीं तो यज्ञ है । उबर ' अग्निपुरोगाः सर्वे देवाः प्रीयन्ताम् ' - ' अग्निः सर्वा देवता: ' के अनुसार अग्नि सर्वदेवपूर्ति हैं । फलत: अग्नि के द्वारा सम्पूर्ण वशों का प्रणयन मशीमति सिध्द हो जाता है | ॥ १० ॥
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनी [ ह्मण प्रथमकाण्ड यह अग्नि रसरूप में परिणत होकर ही द्युलोकस्थ देवताओं के लिए यज्ञ का वहन करते हैं । अग्नि के भूत - प्रारण भेद से दो विवर्त्त बतलाए गए हैं । भूताग्नि ( चियानि ) भूबिएड में प्रतिष्ठित है, यही मर्त्या--ग्नि है । प्राणाग्नि ( चितेनिधेयाग्नि ) भूमहिमा में प्रतिष्ठित है, यही अमृताग्नि है । यही अमृताग्नि ' रसाग्नि ' है । इस रसाग्नि का ही महिमारूप से ऊर्ध्व वितान होता है । इस | वतान को अन्तिम सीमा २२ वाँ ग्रहा है । यही न्तिम साम साग्नि की अवसानभूमि है । अतएव इस अन्तिम रसाग्नि - साम को ' रथन्तर ' साम कहा जाता है । वस्तुत: शब्द है - ' रसतमसाम ' | परन्तु देवताओं की परोक्षभाषा में ' रसतम ' ही ' रथन्तर ' नाम से व्यवहृत हुआ है, जैसा कि निम्न लिखित ब्राह्मणश्रुति से स्पष्ट है— ' रसतमं ह नैं तद्रथन्तरमित्याचक्षते परोक्षम् ( शत ० । १ । २ । ३६ ) । हमारॆ ये अग्निदेव रसावस्था से ही द्युलोक की ओर गमन करते हैं । अतएव इहें ( यज्ञवहन - दशा में ) ' रस ' कहा जाता है | रस को ही परोक्ष भाषा में - " तं वा एतं रसं सन्तं रथ इत्याचक्षते " ( गो ० ब्रा पू ०२ । २ १। ) के अनुसार ‘ रथ ' कहा गया हैं । सम्पूर्ण यज्ञों के ये अग्निदेव रथी ( रसावस्था से युक्त होकर यज्ञ वहन करने वाले ) हैं || ११ || अन्तरिक्ष्य- बारुण वायव्य धरातल में उभयतः अमूल विचरण करने वाले यज्ञविनाशक श्रासुरप्राण- विशेषों का ही नाम ' राक्षस ' है । परन्तु द्युलोक में जाते हुए इस अग्नि का ये ग्रान्तरिक्ष्य आासुरप्राण संतरण नहीं कर सकते । यही इस होता का अभाव है । इस तूर्त्तधर्म्म का एकमात्र कारण है - समिद्ध प्राणाग्नि का पूर्वोक्त गतिविज्ञानानुसार सम्वत्सरमण्डल में एकाधिपत्य | इनका असुर क्या सन्तरण करेंगे, ये स्वयं अपने ' ऐति - प्रेति ' चल से असुरों का तरण कर जाते हैं । ऐसे अग्नि का यज्ञ में जत्र समिन्धन होगया हो, तो फिर यहाँ भी मुराक्रमण की कहाँ सम्भावना है ॥ १२ ॥
देवताँ जिस पात्र में आहुतिद्रव्य का अशन करते हैं, वह ' वपट्कार ', तथा ' अग्नि ' भेद से दो प्रकार का माना गया है | आधारपात्र वाङ्मय वपटूकार है, इसी पर सब देवता प्रतिष्ठित हैं । इस वाङमय, महिमारूप वषट्कार के २१ व अहर्गण पर्यन्त प्राणाग्नि की व्याप्ति रहती है । यही श्राणाग्नि यज्ञिय ३३ देवताय्रो का प्राहुतिलक्षण पात्ररूप मुखम्थानीय अग्निपात्र है | आधारपत्र जहाँ पट्कार ' कहलाया है, वहाँ यह अग्निपात्र ' आसूपात्र ' ( आस्यपात्र मुखरूपपात्र ) नाम से व्यवहृत हुआ है । जो ऐसे अग्नि का समिन्धन करता है, वह आस्पात्रता प्राप्त करता मुद्रा अभीप्सित भोग्य का संग्राहक बन जाता है || १३ || किया करते है, जैसे कि भीमदेवता इन्द्र की करते थे । आहुतिरस ( जिसका कि प्राणदेवता पान अतएव इस अग्नि को देवताओं का पानपात्र कहना पार्थिव रसों का सौररश्मिगत प्राणदेवता उसीप्रकार पान सग्धि ( सहभोज ) में + चमस से सोमपान किया करते हैं ) इसी प्राणाग्निगर्भ में प्रतिष्ठित रहता है । अन्वर्थ है || १४ || पूर्व के गतिविज्ञान में बतलाया गया है कि, यह प्राणाग्नि सम्पूर्ण सम्वत्सरचक्र का अधिष्ठाता बन रहा है । रथ के पहिए में नेमि, आरा, भेद से दो विभाग रहते हैं । नेमि में सत्र श्रारे श्रोतप्रोत रहते हैं । यहाँ भी नेमिस्थानीय अग्नि में सवत्सर मण्डलान्तर्वर्ती रास्थानीय सम्पूर्ण देवता श्रोतप्रोत हैं । प्रकृत निवि--मन्त्र अग्नि की इसी सम्वत्सरख्याप्ति का बखान कर रहा है || १५ || + - मद्यपानपात्र ' चपक ' कहलाता है, एवं सोमपानपात्र ' चमस ' कहलाता है । सम्भवतः ' नमस ' शब्द ही निरुक्तकमानुसार कालान्तर में ' चमश ' - चनता हुआ ' चम्मच ' रूप में परिणत होगया है । एवमेव मद्यपानानुगत ' चषक ' पात्र के आधार पर ही मय के साथ - ' चुस्की ' शब्द समन्वित होगया है । १३११
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण अथ देवतावाहनोपपत्तिः शतपथब्राह्मण सामिधेनियों से प्राणाग्नि का समिन्धन किया गया, निगदानुवचन से वीर्य्याधान किया गया, एवं पूर्वोक्त निवित्पाठ से अग्नि के व्यष्टि - समयात्मक गुण कम्मों का बखान करते हुए इसमें यशोवीर्य्य का आधान किया गया । अत्र ये अग्नि देवयजन कर्म्म लिए सर्वथा उपयुक्त बन गए है । अतएव आव श्यक है कि, अब इन ग्रग्निदेव से प्रार्थना की जाय क, प्रकृत दृष्टि में जिन जिन देवताओं का यजन अभीष्ट हैं, उहें भी आप इस यज्ञसंस्था में ( द्युलोक से ) प्रतिष्ठित कीजिए । यही आह्वानकर्म्म की संक्षि'त उपपत्ति है, जिसकी इतिकर्त्तव्यता का १६, १७, इन दो कण्डिकाओं में स्पष्टीकरण हुआ है । इस देवता — आवाहन कर्म में - स्त्र- ' महिमानमात्र ' पद की व्याख्या महत्त्वपूर्ण है । श्रु तिने कहा है कि, वाक् ही इस अग्नि की अपनी महिमा है | यह वाकू ही ' तस्य वा एतस्याग्नेवत्रोपनिषत ' के अनुसार अग्नि की मूल प्रतिष्ठा है । वाग्वितान ही वषट्कारमण्डलरूप महिमामण्डल है । यही आध्यात्मिक श्रग्निमहिमा है । आधिभौतिक भूतपिण्ड वाङमय हैं । वाङ् मय भूतपिण्डों के गर्भ में अग्नि प्रतिष्ठित रहता है । यहाँ भूतमयी वाक् भूताग्नि की महिमा बन रही है । आध्यात्मिक अग्नि की महिमा वागिन्द्रिय - लक्षणा वाक् ही बन रही है । वाक्तत्त्व ही शरीराग्नि का परिचायक है । शब्दविन्यास के आधार पर शरीराग्नि का बलाबल अनुमेय है । इसप्रकार तीनों संस्थाओं में वाक् ही अग्नि की महिमा बन रही है । निवित् - मन्त्र ने अग्नि को ' जातवेदः ' कहा है । यह विशेषण भी महत्त्वपूर्ण है । परिचय रखने वाला ही ' जातवेद: ' है | अधिदैवत में अग्नि ही तद्रूप देवताओं के यथार्थ स्वरूप से परिचित है । अधिभूत में भूताग्नि हीं भूतपिण्ड के स्वरूप - संघटन - लक्षण परिचय से अवगत हैं । एवं अध्यात्म में शरीराग्नि ही ' वाक् - प्राण - चक्षु ' रूप से जातवेदा बन रहा है । चक्षु से हम वस्तु पहिचानते हैं, वाङमय नाम से वस्तुयों का परिचय प्राप्त करते हैं, एवं प्राणमय कम्मं से वस्तुस्वरूप का परिचय मिलता है । वामिन्द्रिय अग्नि से मम्बद्ध है, प्राणेन्द्रिय वायु से सम्बद्ध है, एवं चतुरिन्द्रिय ग्रादित्य से सम्बद्ध है । अग्नि वायु - श्रादित्य, तीनों एक ही अग्नि के तीन विवर्त्त हैं । फलतः श्राध्यात्मिक अग्नि का भी जातवेदत्त्व भलीभांति सिद्ध होजाता है ॥ १६.१७, ॥ अनुवचनकर्म्म खड़े खड़े होता है, याज्याकर्म्म बैठे बैठे होता है । श्रध्वर्यु यजुर्म्मन्त्र से याज्या करता है, एवं होता ऋङमन्त्र से अनुवाक्या करता है । श्राह्वान होता है द्युलोकस्थ देवताओं का । वे हम से चिदूर हैं । ग्रतएव अनुवचनकर्म्म खड़े खड़े ही होना चाहिए । क्योंकि निदानविधि से द्युलोक अनुवाक्या है । यजन होता है - उन प्राणादेवताओं का, जो होता के अनुवचन से इस पृथिवी पर प्रतिष्ठित हैं । श्रुत-एव यजन कर्म बैठे बैठे ही होना चाहिए | क्योंकि याज्या निदानेन पृथिवी का ही प्रतिरूप है १८,१६., ॥ चौथे अध्याय में दूसरा, तथा तीसरे प्रपाठक में चौथा ब्राह्मण समाप्त सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत तृतीय ब्राह्मण अत्र उपरत १३१२
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड चौथे अध्याय में तीसरा, तथा तीसरे प्रपाठक में पाँचवाँ ब्राह्मण सामिधेनी - ब्राह्मणानुगत - चतुर्थ ब्राह्मण अथ शान्तिकम्मोपपत्तिः वेदरहस्यवित् विद्वान् होता के यथाविधि सामिधेन्यनुवचन से, आर्षेय - प्रवरण से, निगदानु-वचन से, निवित्पाठ से तथा आवाहन के द्वारा देवप्रारणाधान मे आज हमारा यह वैध ग्राहवीयाग्नि साधारण लौकिक इद्ध अग्नियों की अपेक्षा अतिशयरूप से समिद्ध, अलौकिक, अनाक्रमणीय, तथा अन-त्वमृश्य बन जाता है । न केवल अग्नि हीं, अपितु अपने श्रनुवचनादि कर्म से भूताग्नि में प्राणाग्नि का समावेश कर उसे यह स्वरूप देने वाला स्वयं होता भी अपने शरीराग्नि से तत्समानधर्म्मा बनता हुआ अनत्रधृष्य, तथा अनवमृश्य ही बन जाता है । जो सामान्यबुद्धि मन्त्रशक्ति के उक्त प्रभाव को न जानत । हुआ इस अग्नि को सामान्य अग्नि, एवं अनुवचनकर्त्ता इस ब्राह्मण को सामान्य मनुष्य समझने की भ्रान्ति करता हुआ इसका तिरस्कार - अपमान करने की भूल कर बैठेगा, वह निश्चयेन अपना उसीप्रकार सर्वनाश करा बैठेगा, जैसे अज्ञ मनुष्य विद्य त् - स्पर्श से अपना नाश करा बैठते हैं । अतः ऐसे अग्नि, तथा ऐमे यज्ञिय ब्राह्मण सर्वथैव प्रणम्य हैं, स्तुत्य हैं ॥ १,२ ॥ अग्निसमिन्धन के लिए होता जिन सामिधेनियों का अनुवचन करता है, उस अनुत्रचनकर्म्म से ही यद्यपि इसके शारीराग्नि में अतिशय उत्पन्न होजाता है । तथापि साक्षात् रूप से सावयव शरीराग्नि - समिन्धन के लिए अनुवचनकाल में तत्तद्विशेष मन्त्र -भागों के द्वारा तत्तद्विशेष आध्यात्मिक पर्वो के समिन्धन के लिए भावना कर लेता है । किस मन्त्र से कौनसा आध्यात्मिक पर्व समिद्ध होता है?, प्रस्तुत ब्राह्मण इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है । ' प्र वो वाजा अभिद्यवः ० ' इत्यादि प्रथम मन्त्र होता के ' प्राण ' का ही समिन्धन करता है । ' श्रग्न श्रायाहि वीतये ० ' से ' अपान ' का ही समिन्धन होता है । एवं तृतीयमन्त्र के — ' बृहच्छोचा यवि-ष्ट्य ' मन्त्रभाग से ' उदान ' ही समिद्ध होता है । ' नक्थप्रारण ' नाम से प्रसिद्ध प्रश्वासात्मक प्रारण की ( इन्द्रियप्राण की ) ' प्राण - अपान ' भेद से दो अवस्था हैं । निर्गच्छत् अवस्था में वही गमनधर्म से ' प्राण ' है, आगच्छत् अवस्था में वही आगमन धर्म से ' अपान ' है । प्राण प्रवान् ( गतिधर्म्मा ) है, अपान एतवान् ( आगतिधर्मा ) है । ' प्र ' उपसर्गयुक्ता ' प्र बो ० ' इत्यादि ऋचा से तत्सम निःश्वासाव-स्थापन्न ' प्राण ' का, एवं ' आङ ' उपसर्गयुक्ता ' अग्न आयाहि ' ऋचा से तत्सम प्रश्वासात्मक ' अपान ' का समिन्धन हुआ है | तेजोनाड़ी के द्वारा कण्ठदेश में प्रतिष्ठित श्रायुःस्वरूप रक्षक प्राण ही ‘ उदान ' है । इस का बृहत्साममण्डलस्थ आयुः प्रदाता सौर विश्वामित्र प्रारण से समतुलन है । श्रतएव इसे ' वृहन्छोचा ' बहना श्रन्वर्थं बन रहा है । ‘ बृहच्छोचा यत्रिष्ठ्य ' से इसीका समिन्धन हुआ है ॥ ३ ॥
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चतुर्थ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण शतपथब्राह्मण स नः पृथुश्रवाय्यम् ' मन्त्रभाग से श्रोत्रेन्द्रिय का समिन्धन हुआ है । वैलोक्यध्यापक, अतएव महा पृथु ( विस्तीर्ण ) या समुद्र में अन्य शब्दाघात से उत्पन्न बीचि ही कर्णशष्कुली पर प्रतिष्ठित प्रज्ञान मन से सम्ब ( आहित - प्रत्याहित ) होती हुई शब्दश्रवण का कारण मानी गई है । इस व्यापक वाक् - लहरी के आधार पर शब्दश्रवण करने के कारण ही श्रोत्र पृथुश्रवाय्य है ॥ ४ ॥
“ ईडेभ्यो नमस्यः ० ” इस मन्त्रभाग से वागिन्द्रय का ही समिन्धन हुआ है । सम्पूर्ण भौतिक विश्व वाक का ही वितान है । मनःप्राणर्मिता वाक ही आकाश है । श्राकाशात्मिका वाक् ही चलयस्थि के तारतम्य से पञ्चमहाभूतरूप में परिणत हुई है, जैसाकि - ' वाचीमा विश्वा भुवनान्यर्पिता ' - ' अथ बागेवेद सर्वम ' इत्यादि निगमों से स्पष्ट है 1 जिसप्रकार अधिदेवत में तत्त्वात्मिका वाक् से सब वितत हैं, एवमेव अध्यात्म में इन्द्रियात्मिका शब्दात्मिकावा से ही सब स्तुत्य है । वाक् ही सर्वकर्म विज्ञान को प्रतिष्ठा है, जैसाकि निम्नलिखित ब्रह्मति से प्रमाणित है— * सा यत्रेयं वागासीत् सर्वमेव तत्राक्रियत, सर्व प्राज्ञायत । अथ पत्र मन आसीत नैव तत्र किञ्चनाक्रियत न प्राज्ञायत । नो हि मनसा ध्यायतः कश्चन आ जानाति ' ( शत ० ४ | ६ | ७ | ५ | ) || ५ || ' अश्वो न देववाहनः ' इत्यादि मन्त्रभाग से ' प्रज्ञान ' नामक सर्वेन्द्रिय मन का ही समिन्धन होता है । प्राणात्मक देवता सोमम मनोधरातल पर ही प्रतिष्ठित रहते हैं । इसीलिए तो उपवास में मनः परितोषक अनाशन निषिद्ध माना गया है । प्राणवाहन के अतिरिक्त मनस्वी मनुष्य का मन इमे काम सफलता के लिए उठाए फिरता है । मनस्वी का संकल्प कभी व्यर्थ नहीं जाता देवप्राण - प्रतिष्ठा रूप होने से ही मन श्वस्था नी देववाहन है || ६ || ' अग्ने दीयन्तं बृहत् ' इत्यादि मन्त्रभाग से चतुरिन्द्रिय का ही समिन्धन होता है । सर्वाङ्गशरीर में अङ्गारलण्डवत् चतु ही प्रदीप्त हैं, साथ ही बृहत्सामात्मक आदित्य से उत्पन्न होने के कारण बृहत्साम-सम्पत्ति से युक्त हैं । चतुः साम के गर्भ में अवस्थित वस्तु ही दृष्टि का विषय बनती है । एक विशाल प्रतिमा का स्वरूप तत्रतक शवसमान ही दिखाई देता है, जबतक कि उसमें दो चन्तुकनीनिकाओं का सम्बन्ध नहीं कर दिया जाता । चक्षु के सम्बन्ध कराते ही पाषाणप्रतिमा प्रज्ज्वलित सी होजाती है, उभरमी जाती है । तभी प्रतिमा की बृहत्ता बृहत्तारूप से प्रतीत होती है ॥ ७ ॥
' अग्नि दूतं वृणीमहे ' इत्यादि मन्त्रभाग से ' व्यान ' नामक मध्यमाण का समिन्धन होता है । अन्तरिक्ष्य श्रादेशमित, उन्थरूप से हृदयस्थ सप्रतिष्ठात्मक रूप से सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त जीवना-धारभूत, श्वास - प्रश्वासात्मक प्राणीदान के उपांशु - अन्तम नामक व्यापारों का सचालक प्राणविशेष हो * केवल मानस मंकल्पों से 4 इन्छामात्र की चर्व्वणा से तबतक किसी कर्म में सफलता नहीं मिल सकती, जयतक कि वाङ्मय शारिरीक श्रम तथा वाङ्मय शब्द का आश्रय न लिया जाय । कर्म, तथा शब्दा-भिनय से ही संकल्प कारूप में परिणत होते देखे गए हैं । १३१४
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चतुथ अध्याय सामिधेनीब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' मान ' है । इस से ऊपर सौरदिव्यप्राण, तथा नीचे पार्थिव प्राण है, इसी के लिए निम्नलिखित उपनिषद्दचन विहित हैं--न प्राणेन नापानेन मन्य जीवति कश्चन ॥ इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्न ताबुपाश्रितौ ॥१ ॥
ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति ॥ मध्ये वामनमासीनं सर्वे देवा उपासते ॥ २ ॥
व्यान से ऊर्ध्व स्थित प्राण प्रारण उदान भेद से दो स्वरूपों में विभक्त है, व्यान से नीचे स्थित पान समान अपान भेद से दो भागों में विभक्त है । इसप्रकार आध्यात्मिक प्राण के पाँच विवर्त्त होते हैं । इन में व्यानप्राण मध्यस्थ है, अन्तःस्थ है । इस अन्तःस्थ प्राण के समिन्धन से आठवीं ऋचा भी मध्यस्था है । इस समिन्धन से समिन्धनकर्ता अपनी मण्डली में मध्यस्थ वन जाता है ॥ ८ ॥
' शोचि केशस्तमीमहे ० ' इत्यादि मन्त्रभाग से शिश्नेन्द्रिय का ही समिन्धन करता है । कामाग्निमय-ताप लौकिक इतर तापों से कहीं अचल है । इस का बीज शिश्न ही माना गया है । शिश्नोदर - परायण, कामभोगासक्त मनुष्य कामप्रतिबन्ध दशा में अतिशयरूप से सन्तप्त रहते हैं । इसी सादृश्य से शिश्न के लिए ' शोचिष्केश ' पद प्रयुक्त हुआ है ॥६ ॥
' समिद्धो अग्न श्राहुतः ० ' इत्यादि मन्त्रभाग से अवाङा ( गुदप्राण ) का ही समिन्धन होता है | एवं - ' आजुहोता दुवस्यत ० ' इत्यादि से समष्टिरूप से सर्वाङ्गशरीर का ही समिन्धन होता है || १० || इसप्रकार उक्त समिन्धन - भावना से होता का सर्वाङ्गशरीर व्यष्टि - समष्टिरूप से समिद्ध अग्निवत् प्रज्ज्वलित होजाता है । यदि होता चाहे, तो अपमान करने वाले पर उक्त भावना के साथ ' प्राणं वा एतदा-त्मनोऽग्नाबाबा: ' इत्यादि रूप से कृत्याप्रयोग कर सकता है, जिनका ५१, १२, १३, १४, १५. १६, १७, १८, १६, २०, २१, इन ११ कडिकाओं में स्पष्टीकरण हुआ है । उक्त समिन्धनकर्म्म, तथा अभिचारकर्म्म से बतलाना प्रकृत में यही है कि, सामिधेनी से समिद्ध अग्नि, तथा समिन्धनकर्त्ता होता, दोनों समानधम्मों हैं, अनवधृष्य हैं, अनवमृश्य हैं । उनका कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिए । ऐसे इस महान - स्तुत्य - नमस्य अग्निदेवता के लिए, एवं अग्निरस्यवित् ऐसे ब्राह्मणश्रेष्ठ होता के लिए निरतिशय प्रणतभाव से ग्रास्था - श्रद्धा - पूर्वक ही हमारी अनेक नमः उक्तियाँ समर्पित हैं || २२ || चौथे अध्यान में तीसरा, तथा तीसरे प्रपाठक में पाँचवाँब्राह्मण समाप्त समाप्तं चेदं ब्राह्मणचतुष्टयात्मकं सामिधेनी - ब्राह्मणम् * --१३१५
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श्रीः इति - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये-ब्राह्मणचतुष्टयात्मकं - " सामिधेनीब्राह्मणम् ” उपरतम् *
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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये— द्विब्राह्मणात्मकं - " आघारब्राह्मणम् ”
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श्रीः थ - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये द्विब्राह्मणात्मकं " श्राधारवाह्मणम् " अथ चतुर्थाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् तृतीय - प्रपाठक के च षष्टं ब्राह्मणम् ( आधारब्राह्मणानुगतञ्च प्रथमं ब्राह्मणम् ) १६- पूर्वोत्तराधारकर्म्म याघारयोर्निदानम ( मूल ) – तं वा एतमग्नि सन्धिपत - ' समिद्धे देवेभ्यो जुवाम ' - इति । तस्मिन्नते - एव प्रथमे आहुती जुहोति - मनसे चैत्र वाचे च । मनश्च ह वै वाक च युजौं देवेभ्यो यज्ञं वहतः ॥ १ ॥।
स यदुपांशु क्रियते तन्मनो देवेभ्योयज्ञं वहति । अथ यद्वाचा निरुक्त ं क्रियते-तद् - बाग देवेभ्यो यज्ञ ' वहति । एतद्वा इदं द्वयं क्रियते; तदेते - एवैतत सन्तर्पयति । तृप्ते प्रीते देवेभ्यो यज्ञं वहात इति ॥ २ ॥
स्रुवेण तमाघारयति - यं मनस श्राधारयति । वृषा हि मनः, वृषा हि स्रुचा तमाघारयति - यं वाच आधारयति । योपा हि वाक्, योपा हि स्रुवः स्रुक् ॥ ॥ ३ ॥
४ ॥ तूष्णीं तमाघारयति - यं मनस आधारयति न स्वाहेति चन । अनिरुक्तं हि मनः, अनिरुक्तं तत् - यत्तणीम् ॥५ ॥
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