Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1061–1070
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1061–1070
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चतुर्थ अध्याय श्राधारवाह्मण शतपथब्राह्मण युक्त होकर यह ( नीय ) अग्नि देवताओं के लिए यज्ञस्थ का वहन करे, ( सम्मार्जनकर्म्म की यही उपपत्ति है ) । इसीलिए सम्मार्जन करता है । यज्ञ त्रिवृत ( त्रिवृद्भावोवेत ) है ( इस यज्ञानुगता त्रिवृत सम्पत्ति प्राप्ति के लिए ही ) त्रिस्त्रिः सम्भार्जन किया जाता है || १४ || [ सम्माजन कर्म क्यों कया जाता है? इस प्रश्न का सोपनतिक समाधान किया गया । अत्र पद्धतिक्रम बतलाती हुई श्रुति कहतो है ] - वह अग्नीध - हे अग्ने! यज्ञपाधनभूत हविर्लक्षगण अन्न पर अपना अधिकार रखने से ' वाजजित् ' नाम से प्रसिद्ध हविलक्षण यज्ञसाधन ऐसे बाजा अन्न का देवताओं के लिए द्यलोक में वहन करने वाले आपका मैं सम्मार्जन करता हूँ ' इस अनुरूप अर्थ से युक्त ] ' अग्ने वाजन्निद्वाजं ० ' [ चजुःसं ० २ | ७ | ] यह मन्त्र बोलता हुआ [ तीनों परिधियों का त्रिरावृत्तरूप से ) सम्मान करता है । [ तात्पर्य यही है कि, तीनों परिधियों का प्रत्येक का उक्त मन्त्रोच्चारण के द्वारा तीन तीन बार सम्मार्जन करता है । फलतः परिधिसम्मार्जन ६ बार होजाता है । यही इसका त्रिवृद्भाव - तीन का त्रिगुणितभाव -- हैं ] । ( मन्त्र का तात्पर्य्यार्थ बतलाती हुई श्रुति कहती है - अग्ने जज-द्वाजं ० ' इत्यादि से ] ‘ यज्ञ वहन करने वाले यज्ञिय आपका सम्मार्जन करता हूँ । " यही कहा गया है | ( हविरन यज्ञसाधक होने से यज्ञ हैं, अतएव वाजं सरिष्यन्तं ' का तात्पर्य ' यज्ञं सरिष्यन्तम् ' ही होता है । वह अग्नि इस यज्ञात्मक हवि का वहन करता है, अतएव इसके लिए ' यज्ञियं त्वा सम्माजिम ' यह कहा जासकता है ] । [ समन्त्रक त्रिरावृत्तरूप से परिधि - सम्माजन करने के अनन्तर वह आग्नीध्र ] ऊपर सेनीयन का तूष्णीं ( अमन्त्रक ] तीन बार सम्मार्जन करता है । उपरिष्टात आह-नीय अग्नि का तूष्णीं सम्मार्जन क्यों किया जाता है?, इसकी उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है ] – सो जिसप्रकार [ रथ में बैलों को ] जोत कर ( कशाताड़नादि से उह्नौं ) चल चल! भार वहन कर! इसप्रकार गमन के लिए प्रेरित करते हैं, एवमेव [ उपस्थित सम्मार्जन-रूप ] कशाघात से इस अग्नि को, चलिए! चलिए!! देवताओं के लिए यज्ञवहन कीजिए!!! इसप्रकार प्रेरित ही करता है । तात्पर्य यही है कि – पूर्वाधार तो स्कन्ध प्रदेश में जूड़ा डालने के स्थान में हैं, एवं त्रिस्त्रिः सम्मार्जन पाशबन्धन स्थानीय है । पाशबन्धन के अनन्तर सारथि बृपभयुग्म को गत्यारूढ बनाने के लिए चलो, चलो, इत्यादि शब्द प्रयोग के द्वारा कशाचात करता है । इस उद्देश्य को सिद्धि के लिए उपरिषात् आहवनीय अग्नि में त्रिः सम्मार्जन होता है । ( अब एक प्रश्न शेष रहजाता है । सुबाघारलक्षण पूर्वाधार तथा सुगाघारलक्षा उत्तराधार, दोनों कम्मों के मध्य में उक्त सम्माजनकर्म्म क्यों किया जाता है, इसी प्रश्न को
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चतुर्थ अध्याय श्राघारब्राह्मण प्रथमकाण्ड उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है ) – सो जो कि आग्नीध पूर्वोत्तराधार के मध्य यह में सम्मार्जन करता है, इसीलिए मन, तथा वाक दोनों समान रहते हुए नाना हैं । [ दोनों आधार साथ करना दोनों को समान बनाना है, एवं दोनों के मध्य में सम्मार्जनकर्म करना दोनों समानों को नानावन बनाना है, यही तात्पर्य है ॥ १५ ॥
चौथे अध्याय में चौथा, तथा तीसरे प्रपाठक में ६ ठा ब्राह्मण समाप्त आधारब्राह्मणानुगत प्रथम ब्राह्मण समाप्त -9. चोथे अध्याय में पञ्चम तथा चौथे प्रपाठक में प्रथम ब्राह्मण धारवाह्मणानुगत द्वितीय ब्राह्मण -२--उत्तराघारतिककर्त्तव्यता ( पूर्व ब्राह्मण में पात्र के द्वारा सम्पन्न होने वाले मनोऽनुगत पूर्वावार - कर्म की इतिक-र्त्तता एवं पूर्वोतरायार के मध्य में होने वाले अग्निसम्मर्जिनकर्म की इतिकर्त्तव्यता बतलाई गई । अब क्रमप्राप्त कुपात्र के द्वारा सम्पन्न होने वाले बागनुगत उत्तराधार - कर्म की इतिकर्त्तव्यता बतलाई जाती है ) - कुपात्र ( जुहू, तथा उपभृत ) से उत्तराधार - कर्म्म सम्पादान करने वाला अध्वर्यु ' ( उत्तराधारकर्म से पहिले ) जुहू, तथा उपभृन्, इन दोनों स्रु कुपात्रों के पूर्वभाग में ( जिस मुख्य भाग से आहुति दी जाने वाली है, उस मुख्य भाग की ओर ( ' देवताओं के लिए नम-स्कार है, पितरों के लिए स्वधा है ' इस अर्थ से युक्त " नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः " ( २।७ ) यह मन्त्र बोलता हुआ अञ्जलिस्थापन करता है ( दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम करता है ) । इस अञ्जलिनिधान - कर्म से वह अध्वर्यु ( देवताओं, तथा पितरों के लिए क्रमशः नमः, तथा स्वधा करता हुआ ) आज्यिक करना चाहता हुद्या देवताओं, तथा पितरों से अपने आप को छिपाता है ( तात्पर्य यहीं है कि, देवपितृ कम्म आज्यिक है । यह एक महान कर्म है, दिव्यकर्म्म है | उधर अव असत्यसंहित एक मनुष्य है, सामान्य व्यक्ति है | सामान्य १३३१
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चतुथ त्रध्याय आघारब्राह्मण शतपथब्राह्मण व्यक्ति दिव्यदेवसर्ग का यजन करावे, यह असङ्गत - सा है । परन्तु करना पड़ता है । अपने इसी मदत अपराध के लिए पहिले से ही क्षमा माँग लेना आवश्यक है । इसी उद्देश्य की सद्धि के लिए उत्तराचाररूप त्रिज्य से पहिले ही अध्वर्यु स्र पात्रों के पूर्वभाग में खड़ा होकर प्रणाम कर लेता है ) । ( अञ्जलिनिधानानन्तर बह् ) अध्वर्यु -- " सुयमे मे भृयास्तम् " ' हे जुहू, तथा उप-भृत् नामक पात्रो! आप दोनो मेरे इस यज्ञार्थं गृहीत आज्य के लिए आज्य के -अच्छी प्रकार से धारण करने वाले बनें " २७ ) यह मन्त्र बोलता हुआ ( दक्षिण हस्त में जुहू, उपभृत नामक दोनों ) कुपात्रों का ग्रहण करता है । " आप दोनों मेरे लिए आज्य का - उत्तम प्रकार से धारण करने वाले बनिए, साथ ही आप दोनों पात्रों को मैं अपने हाथ में भलीभाँति धारण करने योग्य बनूँ " मन्त्र भाग से बड़ी कहा है । ( आगे का मन्त्र है ) — " अस्कन्नमद्य देवेभ्य आज्यं सम्भ्रियासम् " ( " आज इस यज्ञा-नुष्ठान काल में देवताओं को लिए आप दोनों पात्रों में स्थित इस आज्य को मैं उस प्रकार से रख रहा हूँ, जिससे यह भूमि पर न गिरता हुआ अस्कन्न - प्रतिष्ठित बना रहे " २. ८ ) । " अक्षुब्ध रूप से आज मैं देवताओं के लिए यज्ञ का वितान करने में समर्थ बनूँ ” मन्त्र भाग से यही कहा गया है । ( जुहूपभृत - पात्रों में गृहीत आज्य सर्वथा स्थिर रहना चाहिए | तभी यज्ञवितासिद्धि है । यदि हस्तकम्पनादिरूपा असावधानी से पात्रस्थित घृत कम्पित होना-यगा, तो वह उछट कर भूमि पर गिर पड़ेगा । परिणाम में यज्ञन्तान उच्छिन्न होजायगी, याहुति से उत्पन्न होने वाले दैवात्मा का स्वरूप विकृत होजायगा । इस स्कन्नभय से त्राण पाने के लिए ही उक्त मन्त्रशक्ति का आश्रय लिया गया है ) ॥ १ ॥
( आगे का मन्त्रभाग है ) — “ अङि घृणा विष्णो मा त्वावक्रमिपम् " ( हे यज्ञमूर्त्ति विष्णो! मैं अपने पैरों से आपका अतिक्रमण न करूँ " २२८ ) । यज्ञ निश्चयेन विष्णु है । ( इस मन्त्र भाग से ) उसी यज्ञात्मक विष्णु के लिए अपना अपराध शमन करवाता है, जो -कि-" मैं आपका अतिक्रमण न करूँ " यह कहता है । ( ताप बड़ी है कि, श्राज्यपूर्ण दोनों स्रु कुपात्रों को लेकर इस अध्वर्यु ' को बागनुगत उत्तर आधार के लिए आहवनीय कुण्ड से दक्षिण दिशा की ओर आना पड़ता है । यह दक्षिणागमन श्राहवनीयरूप यज्ञमूर्ति विष्णु का अतिक्रमण रूप निर।दर है | मन्त्रप्रार्थना के द्वारा इस दोष के लिए ही विष्णु से क्षमा प्रार्थना करता है ) । १३३२
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चतुर्थ श्रध्याय आधारब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( आगे का मन्त्रभाग है ) — " वसुमतीमग्ने ते च्छायामुपस्थपेम् " ( हे श्राहवनीयान! आप की छाया से युक्त सम्पत्तियुक्ता भूमि के समीप मैं प्रतिष्ठित होरहा हूँ " २८ ) " हे अन! आप की श्रेष्ठ ( छत्र छाया में मैं प्रतिष्ठित होने जारहा हूँ " मन्त्रभाग यही कहा है कि । दक्षिणादिक याम्यादिक है, प्राणनाशिनी ठिक है । यहाँ आकर ही अध्वर्यु को उत्तराधारकर्म्म करना है । दक्षिणदिगनुगत इस याम्यभाव को निवृत्ति के लिए ही मन्त्रशक्ति के द्वारा यह भावना की जाती है कि, मैं याम्यादिक में नहीं जारहा, अपितु अग्नि की छायारूप यज्ञसम्पत्तियुक्ता भूमिका आश्रय ले रहा हूँ ) ॥ ॥ २ ( आगे का मन्त्र भाग है ) — " विष्णोः स्थानमसि ” ( हे दक्षिण भूप्रदेश! आप यज्ञ-मूर्ति विष्णु की आवासभूमि हैं " २२ ) 1 यज्ञ ( यज्ञसाधक आहवनीय अग्नि ) त्रिमूर्त्ति है । ( दक्षिण प्रदेश में उत्तराधार के लिए खड़ा होता हुआ ) अध्वर्यु यज्ञात्मक विष्णु के समीप हो खड़ा होता है, इसी अभिप्राय से ' आप विष्णु के स्थान हैं ' यह कहा गया है । ( तात्पर्य यही है कि, आहवनीय अग्निरूप यज्ञप्रदेश से दक्षिण का प्रदेश वस्तुतः असुर राक्षसों का प्रदेश है । यहीं खड़े होकर अध्वर्यु को उत्तराधारकर्म करना है । मन्त्रशक्ति के द्वारा इस प्रदेश की सुरभावना हटाने के लिए, साथ ही आहवनीय यज्ञसामीप्य से इस प्रदेश में देवभावना स्थापित करने के लिए ही ऐसा कहना आवश्यक माना गया है ) । ( मन्त्र का अगला भाग है ) | — इत इन्द्रो वीर्यमकृणोत् " ( " आहवनीयाग्नि से दक्षि-प्रदेश से ही इन्द्र ने दक्षिणस्थ असुर राक्षसों का निरोधात्मक पुरुषार्थ किया है " २८ ) | दक्षिण दिशा में खड़े होकर ही इन्द्र ने दक्षिण की की ओर से आक्रमण करने वाले असुर - राक्षसों का संहार किया था, इसी अभिप्राय से ' यहाँ से इन्द्र ने वीर्य ( पुरुषार्थ ) क्रिया ' यह कहा गया है । ( तात्पर्य यही है कि, जिस दक्षिण प्रदेश में खड़े होकर अध्वय - उत्तराधार-कर्म करने वाला है, वह प्रदेश यज्ञमूर्त्ति विष्णु के सम्बन्ध से तो यज्ञियप्रदेश बन ही रहा है, साथ ही यज्ञपति इन्द्रप्राण के सम्बन्ध से साक्षाद्रूप से भी यह यज्ञभूमि बन रहा है । मन्त्रशक्ति के द्वारा उसी ऐन्द्रसम्पत्ति की भावना की गई है । || ( मन्त्र का अगला भाग है ) - " ऊर्ध्वोऽध्वर आस्थात " ( " दक्षिणस्थ इन्द्र के द्वारा सुरक्षित यह यज्ञ द्यलोकपर्य्यन्त प्रतिष्ठित वितत होगया " २८ ) | ' यज्ञ ऊर्ध्वस्थान में प्रतिष्ठित होगया ' मन्त्रभाग से यही कहा गया है । ( तात्पर्य यही है कि, जिस दक्षिण प्रदेश को भयावह समझा जाता है, वह तो यज्ञाग्निलक्षण विष्णु के सम्बन्ध से, तथा यज्ञाधिपति इन्द्र के १३३३
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चतुर्व अध्याय श्राधारब्राह्मण शतपथब्राहाण का प्राकृतिक सम्बन्ध से यक्षस्वरूपसंमाधक बन रहा है । इन्द्ररक्षा से रक्षित होकर ही देवताओं प्रतिष्ठा की भावना यज्ञ भूलोक से चलकर द्युलोक में प्रतिष्ठित हुआ है । मन्त्र के द्वारा उसी ऊर्ध्व की गई है ) || ३ || ( आगे का मन्त्रभाग है । ) — “ अग्नं वेर्होत्रं वेत्यम् " [ हे आहवनीयाग्ने! आप अपने कर्म से परिचय प्राप्त कीजिए, एवं अपने देवदूतच्च से परिचय प्राप्त किजिए " २२६ ) ये अग्नि देवताओं के होता भी हैं, दूत भी हैं, दोनों हैं । “ जो कि आप देव-ताओं के होता, तथा दूत, दोनों हैं, अपने इस उत्तरदायित्व को अपने ध्यान में पहुँचाने में लाइए से " ये मन्त्रभाग से यही कहा गया है । ( हुन आज्याहुति ) को य लोकस्थ प्राणदेवताओं प्रतिष्ठित कर उनका अग्नि देवताओं के होता हैं । साथ ही दिव्य देवताओं को आहवनीय में पार्थिव देवताओं से स बन्ध कराने के कारण ये ही अग्नि देवताओं के दूत भी हैं । प्रकृत आज्या-हुति से दोनों सम्पत्तियाँ अभी हैं । मन्त्र के द्वारा उह्नी की भावना की गई है ) । ( मन्त्र का अगला भाग है - " त्वां द्यावापृथिवी, अब स्वं द्यावापृथिवी " [ आाज्या. हुति लेकर भूलोक से लोक जाते हुए आप की द्यावापृथिवी रक्षा भी करें अस्पड़ एवं नहीं आप है, स्वयं भी द्यावापृथिवी की रक्षा करें ' २६ ] | इस मन्त्र भाग में कुछ [ अर्थात मन्त्रार्थ स्पष्ट है ] ॥ ( मन्त्र का अगला भाग है ) ' स्विष्टकृद्द वेभ्य इन्द्र आज्येन हविषाभूत् स्वाहा ' ( ' आयरूप हविद्रव्य से युक्त इन्द्र देवताओं के लिए स्विष्टकृत् - भली भाँति इष्टसाधक बन गए २।६ । ) । इन्द्र यज्ञ के देवता हैं । इसी अभिप्राय से ' इन्द्र आाज्य अध्वर्युवाक से ( युक्त के होकर लिए स्विष्टकृत् बन गए ) ” यह कहा गया है । इस उत्तराचार का सम्पादन । ही करता है । वैज्ञानिकोंन इन्द्र को बाकू कहा है । इसलिए भा ' इन्द्र आज्य सं ' यह कहा डाला है ( तात्पर्य यही है कि, प्रकृत मन्त्र भाग से सकृपात्र के द्वारा आहवनीय में में उत्तराधार का हुआ है । जाता है | यह आधार वाक के लिए है । परन्तु मन्त्र के द्वारा नामनिर्देश इन्द्र भाज्याहुति के कारण यही है कि, इन्द्र यज्ञ के देवता हैं । इस यज्ञ । धिपतित्त्वेन भी वागर्थविहिता है, एवं बाकू के लिए ही लिए-- ' इन्द्र आज्येन ' यह कह दिया गया है । साथ ही इन्द्र ही बाक़ ) || ४ || उत्तराधार है, अतएव ' इन्द्र आज्येन ' कहना अन्यर्थ बन जाता है ) मन्त्र वोलता ( ' अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा सरिष्यन्तं वाजजितं सम्मामि ' ( २७ यह करता है । हुआ आग्नीध्र ऋत्त्विक् अध्वर्यु के द्वारा पूर्वाधाराहुति होने के अनन्तर अग्निसम्मार्जन १३३४
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चतुर्थ - अध्याय श्राधारात्म प्रथमकाण्ड अनन्तर आहवनीय से उत्तर प्रतिष्ठित अध्वर्यु जुहू एवं उपभृन को अपने आगे रखकर इनके मुख-स्थानीय पूर्व भाग की ओर ' नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः ' ( २ | ७ | ) यह मन्त्र बोलता हुआ प्रणाम करता है ।प्रणामानन्तर र -- - ' सुयमे मे भूयास्तं कन्नमद्य देवेभ्य आज्यं सम्भ्रियासम् ' ( ३८ ) यह मन्त्र बोलता हुआ कुपात्रों का ग्रहण करता है । ग्रहणानन्तर उत्तराधारकर्म्म के लिए दक्षिणप्रदेश में आता हुआ – ' अङित्रणा विष्णो मा त्वात्रक्रमिपम् ' यह मन्त्रोचारण कर अतिक्रमण - जनित अपराध का निह्नव करता है । अपराध के निह्नवानन्तर - ' वसुमतीगग्ने ते च्छायामुपस्थेषं विष्णो स्थानमसि ' यह मन्त्र बोलता हुआ आहुति देने के लिए नियत स्थान पर खड़ा होजाता है | सर्वान्त में - " इत इन्द्रा वीर्य्यमकृणोदुर्ध्वाऽध्वर आस्थात् । अग्ने वेर्होत्रं वेदूत्यमत्र-त्वां द्यावापृथिवी अव त्वं द्यावापृथिवी । स्विष्टकृद्देवेभ्य इन्द्र आज्येन हविषाभूत् स्वाहा ' यह मन्त्र बोलता हुआ आहवनीयाग्नि में उत्तराधाराहुति हुत कर देता है । इसप्रकार यहाँ आकर उत्तरवारकर्म समाप्त होता है । १,२,३,४, इन चार कण्डिकाओं में इसी कर्म की इतिकर्त्तव्यता का प्रतिपादन हुआ है, जिस का सुविधा के लिए एकत्र संकलन कर दिया गया है । उत्तराधारा हुतिकर्मानन्तर क्या होता है?, आगे का ब्राह्मणप्रकरण इसी प्रश्न का समाधान कर रहा है ) – ( उपभृत् नामक स्रु कृपात्र पर जुहू नामक स कृपात्र रक्खा रहता है । आहुति देते समय उपभृत् से जुहू को पृथक् कर लिया जाता है । इसी सम्बन्ध में विशेषता बतलाती हुई श्रुति कहती है ) उत्तराघार - होमानन्तर वह अध्वर्यु उपभृत, तथा जुहू नामक दोनों स्रु कुपात्रों का परस्पर स्पर्श न कराता हुआ दोनों को पृथक् पृथक् रखता ( हुआ ही आहवनीय अग्नि के दक्षिण भाग से ) बापस ( आहवनीय अग्नि के पूर्वभाग में ) लौट कर ( यहाँ रक्खे हुए ध्रुवपात्र से उस जुहू को मिलाता है । ( क्यों मिलाता है?, इस की उपपत्ति बतलाते हैं ) - बागनुगत यह उत्तराघारहोम ( पूर्वकथनानुसार ) यज्ञ का मस्तक है, एवं ध्रुवापात्र आत्मा है । ( जुहू को ध्रुवा से मिलाता हुआ अध्वर्यु ) आत्मा में हीं ( धड़ में हीं ) शिरोभाग प्रतिष्ठित करता है । उत्तराघारहोम इस यज्ञ का शिर है, ( आत्मा का अमृताग्निलक्षण ) श्रीभाग ( ' सार ' भाग ) ही ' श्री ' है । शिरोभाग निश्चयेन श्री है, श्रतएव जो ( जिस ) भाग का श्रेष्ठ होता है, ( उसके लिए लोक में ) ' वह अमुक भाग का शिर है ' यह कहा जाता है । इसीलिए शिर वास्तव में श्री का रूप है । जुहू को आत्मा से मिलाना आत्मा को इस शिरोरूप श्रीभाग से ही युक्त करना है, यही तात्पर्य है ) || ५ || यज्ञकर्त्ता यजमान ध्रुवापात्र को लक्ष्य बना रहा है ( यजमान ध्रुवास्थानीय है ) । एवं जो इस यजमान के लिए शत्रुता करता है, वह उपभृत् को लक्ष्य बना रहा है, ( अर्थात उपभृत् १३३५
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चतुर्थ अध्याय आवारबाह्मण शतपथब्राहामा यजमान के शत्रु को प्रतिकृति है ) | ( ऐसी स्थिति में ) यदि वह अव उपनपात्र से धुवा का सम्बन्धं करा देगा, तो जो यजमान के लिए शत्रुता करता है, उस यजमानशत्रु में श्री का स्थापन कर देगा | ( ऐसा न कर ) अध्वर्यु ( जुहू के सम्बन्ध से ) यजमान में ह्रीं श्री का स्थापन करता है । इसीलिए ( जुहू को हो धुवा से मिलता है ॥ ६ ॥
( जुहू ध्रुवा ' से मिलाने की उपपत्ति बतलाकर पद्धति बतलाते हैं ) - यह अध्वर्यु ‘ मञ्ज्योपि ज्योतिः ' ( ध्रुवास्थित आज्यरूप ज्योति के साथ जुहूस्थित आज्यरूप ज्योति मिल जाय - २ - ९ ) यह् मन्त्र बोलता हुआ जुहू को ध्रुवा से मिलाता है । ( ध्रुवा, तथा जुहू, दोनों यज्ञ-पात्रों में से ) एक ( ध्रुवा ) पात्र में स्थित आज्य ( भी ) निश्चयेन ज्योति है, एवं एक ( जुहू ) में स्थित आज्य ( भी ) ज्योति है | ( जूहू का ध्रया से सम्बन्ध कराने पर ) ये दोनों आज्यज्योतियाँ परस्पर मिल जातीं हैं । इसीलिए पूर्वोक्तरूप से समञ्जन करता है ॥ ७ ॥
( उत्तराधार ऐन्द्र बनता हुआ बागनुगत है, एवं पूर्वाधार मनोऽनुगत बनता हुआ प्राजा-पत्य है | बागनुगत उत्तराधार समन्त्रक होता है, एवं मनोऽनुगत पूर्वाधार उपांशु हाता है । प्राजा-पत्य पूर्वाधार क्यों होता है?, इसकी वैज्ञानिक आख्यानके द्वारा उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है । कि ) अब यहाँ से मन, तथा बाकू, इन दोनों के ( अहमहमिका - लक्षण ) अहंभद्र ( पारस्परिक उत्कर्ष ख्यापन ) के सम्बन्ध में कहा जाता है । मन, और वाक् दोनों अपने अपने उत्कर्ष के सम्बन्ध में विवाद करने लगते हैं ॥ ॥ ( इस पारस्परिक ) विवाद - प्रसङ्ग में मन कहने लगा कि, ( हे बाकू! ) मैं हीं तुझ से श्रेष्ठ-उत्कृष्ट - हूँ । ( इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि ) तू ऐसा कुछ भी नहीं बोलती ( बोल सकती ), जो सेधित न हुआ हो । ( अर्थात मेरे संकल्पितभाव का तू अनुवाद मात्र ही कर सकती है ) । जो कि तू ( बाकू ) मेरी कृतानुकरा ( मानसिक संकल्प का अनुवाद मात्र करने वाली ), है अतएव मेरे
पीछे पीछे चलने वाली ( अनुवर्त्मा ) है । अतः मैं हीं तुझसे श्रेष्ठ हूँ ॥ ६ ॥
( मन के इस तर्क को सुनकर बाक् कहने लगी, ( हे मन! ) मैं हीं तुझसे श्रेष्ठ हूँ । ( इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि ) जो कुछ तू ( अपनी भावना के साम्राज्य में ) जानता है ( सकल्प करता है ), उसे मैं हीं ( दूसरों को ) जनाती हूँ, सम्यग्रूप से बोध कराती हूँ । ( इसलिए मैं हीं तुझ से श्रेष्ठ हूँ ) || १० || ( मन, और बाक् का यह पारस्परिक विवाद दोनों से जब किसी निर्णय पर न पहुँचा तो ) दोनों अपने अपने प्रश्न के निश्चयात्मक निर्णय के लिए प्रजापति के समीप पहुँचे । प्रजापति
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चतुर्थ अध्याय श्राब्राह्मण प्रथमकाण्ड दोनों की मुक्ति, तर्क सुनकर ) मन की श्रेष्ठता के पक्ष में हीं अपनी सम्मति प्रकट की । ( और निर्णय किया कि, हे बाक! ) मन हीं तेरी अपेक्षा श्रेष्ठ, ( अतएव उत्कृष्ट ) है । तू मन के द्वारा कृत संकल्पित मनोभाव ) का अनुकरण करने वाली है, मन के पीछे पीछे ही अनुधावन करने वाली है । ( लौकिक दृष्टि से भी यह सिद्ध विषय है कि ) निम्न श्रेणि का व्यक्ति ही अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति के किए का अनुकरण करता है, एवं उसके निर्दिष्ट पथ पर चलता है ॥ ११ ॥
( इस प्रकार प्रजापति के मुख से ) पराजित कही जाती हुई वह बाकू त्रिस्मिता बनकर दर्पशून्या ( मदगलिता ) बन गई, सका अभिमान चूर - चूर होगया । [ प्रजापति से निर्णय का प्रतिशोध लेती हुई ] वह वाक् प्रजापति से कहने लगी कि, [ आज से ] मैं तुम्हारे लिए व्यवहन करने बाली न बनूँ [ नहीं बनूँगी ], जिम मुझको कि आपने आज मन की प्रतिस्पर्द्धा में ] पराजित कहा है । [ क्योंकि बाकू ने प्रजापति के लिए अहव्यवाट् बनने का निश्चय कर लिया था ] अतएव यज्ञकर्म में प्रजापति - सम्बन्धी ] जो भी प्राजापत्य कर्म किया जाता है, वह उपांशु ही होता है । क्योंकि बाक् प्रजापति के लिए अहव्यवाहना थी । [ तात्पर्य श्राख्यान का यही हुआ कि, मनो-S नुगत पूर्वाधार प्राजापत्य कर्म्म है, यहाँ बाकू व्यापार अवरुद्ध है । अतएव पूर्वाधार उपांशु ही किया जाता है || १२ | प्रजापति के निर्णय से वाक् का गर्भपात होगया, रेतस्खलन होगया । वह स्खलित वात कहाँ गय " सम्बन्ध में एक वैज्ञानिक तत्त्व का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है कि ] — देवताओंनें [ बाक् क । च रेतोभाग [ स्खलित - चाग्रेत ] को चर्म्म में [ गर्भाशयरूप चर्म्मपात्र में ], अथवा जिस किसी भी ( अनु. ) पात्र में रख दिया । ( इसप्रकार चर्म्म, किंवा अन्य किसी इस अनुरूप पात्र में स्खलित बागुंत का -तिष्ठित कर ) देवता परस्पर पूँछते हैं कि, ' चर्म्म. तथा अनुरूप अन्य पात्र में रक्खा गया बागे किस अवस्था में परिणत होगया " १, ( देवताओं के ' त्यात् ' इस विचार से ही कालान्तर में ) चर्म, तथा पात्रस्थ उस वाग्-रेत से ' नि ' उत्पन्न होगया । क्योंकि गर्भाशय में स्थित बागत से ही अत्रि का दुर्भाव हुआ, अतएव मृतगर्भा रजस्वला स्त्री ' आत्रेयी ' नाम से व्यवहृत की जाती है । ऐसी ( आत्रेयी ) स्त्री से ( काम- स्पर्शादि लक्षण ) सम्पर्क रखने वाला पुरुष पातकी बन जाता है । स्त्रीरूपात्मिका इस बाग् देवता से ही सम्पूर्ण गर्भों की स्वरूप निष्पत्ति हुई है ( होती है ) ॥ १३ ॥
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चतुर्थ - यध्य श्राधारब्राह्मण शतपत्राद्वाण चौथे अध्याय में पाँचवाँ तथा चौथे प्रपाठक में पहिला ब्राह्मण समाप्त आघारब्राह्मणानुगत - द्वितीय ब्राह्मण उपरत .२--द्वित्राह्मणात्मक - ' घारब्राह्मण ' समाप्त इति - मूलानुवादः शतपथ ब्राह्मणविज्ञानभाष्यान्तर्गत - प्रथम काण्डानुगत चतुर्थ - अध्याय - अत्र उपरत -४--- ** -१३३८
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चतुर्थ अध्याय श्राधारब्राह्मण प्रथमकाण्ड सूत्रानुगतपद्धतिसंगृहः-सामिधेनी कर्म्मसमाप्ति के अनन्तर ' पूर्वोत्तराधार - कर्म्म ' विहित है | मिद्ध इति प्रागतः समिध्ममेक वर्जमनुयाजाश्चेत् " [ का ० ० सू ० २ स श्रौत सिद्धान्त के अनुसार सामिधेन्यनुवचन - कम्र्मानन्तर अनुयाजकरण - 9 एक इष्मकाष्ठ बचा कर शेष सम्पूर्ण इध्म-है । काष्ठ आहवनीयाग्नि में डाल दिए जाते है एवं यही सामिधेनी - कर्म की अन्तिम समाप्ति वेद ( कुशा ) इस सामिवेन्यनुनवचनकर्म्म के नन्तर कुशनिम्मित, अग्निप्रदीपक, व्यजनस्थानापन्न से आहवनीयाग्नि कुन बार प्रज्ज्वलन कर आज्यस्थाली से ध्रुवापात्र में घृत लेकर इस स्रुव से तूण उत्तर प्रदेश में दक्षिणजान को नमाकर बैठना हुआ आहवनीयाग्नि के प्रदेश में पूर्व की ओर झुकती हुई पूर्वाधाराहुति देता है । आहुति देते समय अपने मन मन में प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये, न मम " यह ध्यान करना आवश्यक है । क्योंकि यह पूर्व घाराहुति मनोऽनुगता बनती हुई प्राजापत्या है । तूर्णी पूर्वाधाराहुति के अनन्तर वह अध्वर्यु ' ' स्फ्य ', तथा ' इध्मसन्नहन ' इन दोनों को आग्नीध नामक ऋत्विक को सोंपता हुआ उसके प्रति अग्निमग्नीत् समृद्धि " यह प्रेप करता है । [ हे आग्नाध । क्योंकि इस अग्नि में ज्योतिलक्षण उत्तरावार की समन्त्रक हति होने वाली है, अवनीय अग्नि को भस्मरहित कर प्रज्ज्वलित करो, यहा तात्पर्य हैं । अग्नि को प्रज्वलित करना हीं अग्निसम्मार्जन कर्म है | अवकृत पूर्वावार के अनन्तर क्योंकि यही कम्र्म होता है, अतः अध्वर्यु इसी के लिए पूर्वाधारमावाप्रैप करता है । पूर्वाधारकर्म्म की इसो इतिकर्तव्यता का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— “ अनुवचनान्ते वेदेनाहवनीयं विरुपवाज्य, स्रुवेण पूर्वाधारमाघार्य - आह " अग्नि-मग्नीत् समृद्धी " ति " ( का ० श्री ० पू ० ३।१।१२ ) । बतलाया गया है कि, पूर्वाधारकम्र्मानन्तर स्क्य, तथा इध्मसन्नहनतण, दोनों को आग्नीध के हाथ सोंपता हुआ उसे अग्नि सम्माजनक के लिए प्रेरित करता है । अ के द्वारा प्रेरित आग्नीध्र अध्वर्यु के द्वारा प्रदत्त इध्मसन्नहन नृणसमूह से पूर्व की ओर से घूम-कर - ' अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा सरिष्यन्तं वाजजितं सम्माज्मि यह मन्त्र बोलता हुआ दक्षिण-परिधि का सम्मान करता है । एक बार उक्त मन्त्र से, तथा दो बार तूष्णीं, इसप्रकार दक्षिण परिधि का तीन बार सम्मान करता है । अनन्तर उसी मन्त्र एक बार पश्चिम परिधि का, दो बार तूष्णीं, इस प्रकार तीन बार सम्मार्जन करता है । अनन्तर उसी मन्त्र से एक बार उत्तर १३३८