Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1071–1080

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1071–1080

पृष्ठ 1071

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चतुर्थ श्रध्याय ग्रामात्राह्मण शतपथब्राह्मण परिधि का, तथा दो बार तूष्णीं, इसप्रकार तीन बार सम्मार्जन करता है । इसप्रकार पश्चिम, दक्षिण, उत्तरस्थ तीन परिधियों का एक एक बार मन्त्र से दो - दो बार तूष्णीं, सम्भूय ६ बार सम्मार्जन करता है । इसी इममम्माज्जन कर्म की इतिकर्त्तव्यता बतलाते हुए सूत्रकार कहते हैं-" मसन्नहनेनुपरिधि सम्माटि " अग्नेवाजजि " दिति त्रिस्त्रिः परिक्रामम् ” ( का ० श्र ० सू ० ३ | १ | १३ ॥ समन्त्रक परिधिमम्माज्जनान्तर उत्तरस्थान में खड़ा वह आग्नीध बिना मन्त्र-प्रयोग का ० के आहवनीय अग्नि का तीन बार सम्मार्ज्जन करता है, जैसा ि " पणीमुपरि " श्र ० सू ० ३।१।१४ ) सूत्र से प्रमाणित है । त्रि इसप्रकार जब आग्नीध त्रिस्त्रिवार समन्त्रक परिधित्रयसम्मार्जनकर्म्म " नमो , तथा देवेभ्यः, नष्णीं आहवनीयाग्निसम्मार्जन कर लेता है, तो अनन्तर वह श्रवयु के पूर्वभाग में श्रञ्जलि -स्वधा पितृभ्यः " यह बोलता हुआ जुहू, तथा उपभृत् नामक स्रुकपात्रों होता है । पुट रखता है ( प्रणाम करता है ) । देवता, तथा पितृ - भेद से दो बार पृर्वादिक अञ्जलिपुटस्थापन देवताओं की है । इन में प्रथम देवानुगत अञ्जलिपुट स्थापन पूर्व में होता है, क्योंकि एवं दूसरी अञ्जलि दक्षिण में होती है, क्योंकि दक्षिणा दिक् पितरों की है । " सत्रु चोत्तरमाघा-| ४ | १ ) के अनुसार अञ्जलिस्था -माघारयिष्यन् पूर्वेस व चावञ्जलि निदधाति " ( शत ० १ | ४ हूँ कि, जिस यज्ञ-पनकम्मे उत्तराघारकर्म्म से सम्बद्ध है । इस मे यही निष्कर्ष निकलता । एवं जहाँ उत्तराचारकर्म कर्म्म में उत्तराधारकर्म्म अभी है, वहीं अञ्जलिस्थापन कर्म होता है की इतिकर्त्त -विविक्षित है, वहाँ अञ्जलिस्थापन भी अविविक्षित है । इसी अञ्जलिनिधानकर्म व्यता बतलाते हुए सूत्रकार ने कहा है-" अपरमाहवनीयाञ्जलिं करोति ' नमो देवेभ्यः ', - ' स्वधा पितृभ्यः ' इति दक्षि--णत उत्तानम् ” [ का? श्र ० ० ३ १ १५ ] रहता है, एवं देवताओं के लिए पुटाञ्जलि की जाती है, उस समय व यज्ञोपवती अनन्तर ही देवकर्मा-पितरों के लिए सव्यभाव में परिणत होकर पुटाञ्जलि करता है । इस के पितृ - सम्बन्धी पुटा-त्मक उत्तरांधार के लिए जुहपभृत का ग्रहण होने वाला है । इस यज्ञोपवीतोभाव से पूर्वकृत में आकर पहिले ञ्जलि के व्यवच्छेद के लिए अध्वर्यु आचमन करता है । पुनः संभ्रियासम् " आचमनकरता है । अनन्तर- - " सुयमे मे भूयास्तमम्कनमद्य देवेभ्य आज्यं को लेकर -यह मन्त्र बोलता हुआ अपने दहिने हाथ में श्राज्यपूर्ण जुहूपभृत् १३४०

पृष्ठ 1072

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चतुर्थ श्रध्याय श्राधारब्राह्मण प्रथमकाण्ड " अडि घरणा विष्णो मा त्वाऽवक्रमिपम् " यह मन्त्र बोलता हुआ | श्रधारदान- प्रदेशरूप आह-चनीय के दक्षिण भाग में आजाता है । सभी होमकम्मों के लिए अध्वर्युपरिधि के पश्चिम भाग स नियत ' सञ्चर ' माग के द्वारा गमन करता है । साथ ही यागप्रदेश में सञ्चरमार्ग से पहिले बामपाद से गमन आरम्भ करता हैं, एवं योगानन्तर वापस लौटता हुआ पहिले दक्षिण-पाइ से आगमन आरम्भ करता है । इसप्रकार आहवनीय के दक्षिण भाग में पहुँच कर यह अध्वर्यु - " वसुमतीमग्ने ते च्छायामुपस्थेषं विष्णो स्थानमसि " यह मन्त्र बोलना हुआ आहुति देने के लिए सावधानी से खड़ा होजाता है । निम्न लिखित सूत्र उत्तरावारसम्बन्धिनी इसी इतिकर्त्तव्यता का स्पष्टीकरण कर रहे हैं-“ अप उपस्पृश्य " सुयमे म ” इति जुहूपभृतावादायोत्तरां जुहूं कृत्वा दक्षिणाऽति-क्राम " त्यङ घिणा विष्ण " विति " ( का ० ३।१।१६ ) । " परिधीनपरेण सञ्चरों होप्यतः " ( का ० ३।१०१७ ) । “ सच्येनेतो, दक्षिणेनामुतः " ( का ० ३ । १ । १८ ) । " वसुमती " मिन्यवस्थाय " ( का ० ३ । १ । १६ । ] । इति कात्यायन श्रौतसूत्रे तृतीयाध्याये प्रथमा कण्डिका ( ३ | १ ) नियत सवारमार्ग से आहवनीयाग्नि के दक्षिण भाग में आकर खड़ा होकर वह अध्वर्यु -6 इत इन्द्रो वीर्यमदूर्ध्वाऽध्वर आस्थात् । अग्ने वेत्रिं वेद्त्यमयतां त्वां द्यावापृथि-व त्वं द्यावापृथिवी स्विष्टकृद्द वेभ्य इन्द्राज्येन हविषाभूत् स्वाहा " यह मन्त्र बोलता हुआ । स्वाहान्त में जुहू स्थित श्राज्य की जुहू से श्राहवनीयाग्नि में आहुति देता है । यही उत्तराधारा-हुति है, जिसका निम्न लिखित सूत्र से स्पष्टीकरण हुआ है -" इत इन्द्र " इति जुहोत्युत्तराधारम् " [ का ० ० ० ३ | २ | १ | ] उत्तराघार -- सम्पादनानन्तर वह अध्वर्यु आहुतिसाधक जुहू को उपभृत से न मिलाता हुआ ही वापस उस स्थान से पश्चिम की ओर लौट आता है । वहाँ आकर नियत स्थान पर रक्खे हुए पूर्ण ध्रुवापात्र में जुहूस्थित शेष आज्य को " सञ्ज्योतिषा ज्योतिर्गच्छताम् " यह मन्त्र बोलता हुआ डाल देता है । यही उत्तराधारकम्म की अन्तिम इतिकर्त्तव्यता है, जिस का निम्न लिखित सूत्र से स्पष्टीकरण हुआ है -“ आघार्यासंस्पर्शयन् स्रुचावेत्य जुह्वा ध्रुवां समनक्ति - " सञ्ज्योतिषे ” ति ” [ का ० श्री ० सू ० ३२ ] | इति - सूत्रानुगत पद्धतिसंग्रह: १३४१

पृष्ठ 1073

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चतुर्थ अध्याय वैज्ञानिविवेचना-आघारब्राह्मण शतपथब्राह्मण १ - आधार कम्मोपपत्तिः ( भाग्य ) पूर्वब्राह्मण मं प्रतिपादित सामिधेन्यनुवचनकर्म्म से ग्राहवनीय इद्ध अग्नि का होता के द्वारा समिन्धन होगया है । इस समिन्धनकर्म से यह ग्राहवनीय लौकिक इद्ध ग्रग्नि समिद्ध बनता हुआ अलौकिक दिव्याग्नि बन गया है । आहुतिलक्षण यज्ञकर्म से यजमान के आध्यात्मिक देवताओं का आधि-दैविक प्राणदेवताओं के साथ ग्रन्थि - बन्धन- सम्बन्ध अभीष्ट है । आहुतिद्रव्य में ' यावद्वित्तं तावदात्मा ' सिद्धान्त के अनुसार यजमान का मनः प्राणवाङमय आत्मा प्रविष्ट है । आहुतिप्रविष्ट यजमानात्मा दिव्य-देवप्राणयुक्त आहवनीय अग्नि के द्वारा दिव्यदेवताओं के साथ अवश्य ही युक्त होजाता है । इसी लक्ष्य की सिद्धि के लिए ग्राहवनीयाग्नि का सामिधेन्यनुवचन से समिन्धन किया जाता है । बिना दिव्य प्राणाग्नि-प्रवेश के आहवनीय ग्राग्न लौकिकाग्निवत् सामान्य अग्नि है । इसमें आहुति देना लौकिक भूताग्नि में ह्रीं आहुति देना है | एवं ऐसे आहुतिकर्म से दिव्यलोपत्राप्तिफलरूप यज्ञातिशय की प्राप्ति सम्भव है । ऐसी स्थिति में यह आवश्यक होजाता है कि, आहुति - कर्म से पहिले इस लौकिक अग्नि को किसी वैज्ञा-निक प्रक्रियाविशेष से दिव्यमान से युक्त कर दिव्याग्नि बना लिया जाय । वही वैज्ञानिक प्रक्रिया सुप्रसिद्ध ' सामिधेन्यनुवचनकर्म्म ' है, जिसका पूर्वववेचना - प्रकरण में विस्तार से स्पष्टीकरण किया जाचुका है । उस काम से आहवनीय अग्नि दिव्यदेवप्राणयुक्त बन जाता है । अत्र इसमें जो आहुति दी जायगी, वह अवश्य ही द्युलोकम्थ देवताओं की भोग्या बनेगी एवं ग्राहुति के द्वारा आहुतिद्रव्य में प्रविष्ट यजमान का आत्मा भी अवश्य ही दिव्यभाव - प्राप्ति का अधिकारी बन जायगा । पूर्वब्राह्मणोक्त सामिधेन्यनुवचन-कर्म्म की इसी उक्त उपपत्ति का सिंहावलोकन - न्यायेन स्मरण कराती हुई श्रुति कहती है-" तं वा एतमग्निं समैन्धिषत ( सामिधेन्यनुचनक र्मणा समन्धित ) ' समिद्ध देवेभ्यो जुहवाम ' इति " सामिधेन्यनुवचनकर्म्म से ग्राज यह ग्राहवनीय अग्नि दिव्यप्राणयुक्त बनता हुआ देवाहुति - ग्रहण-योग्य बन गया है । अच इस में अयु नामक ऋत्विक् नियत इष्टिदेवता [ आवापदेवता, प्रधानदेवता ] के लिए आहुति प्रदान करेगा । परन्तु इस प्रधानाहुतिरूप प्रधानदेवतायाग से पहिले इस समिद्ध अग्नि में पूर्वाधार, उत्तराधार, नाम की दो मुख्य आहुतियाँ और दी जाती हैं । इनमें पूर्वाघाराहुति से मन की स्वरूप - निष्पत्ति होती है, एवं उत्तराधाराहुति से वाक् की स्वरूप - निष्पत्ति होती है । मनो - बाक् के स्वरूप - निष्पादन की प्रकृत यज्ञ - कर्म में आवश्यकता क्यों हुई?, अगला प्रकरण इसी प्रश्न की वैज्ञा-निक उपपत्ति बतलाने के लिए प्रवृत्त होरहा है । चतुविशत्यक्षरा गायत्री - सम्पन् से ' युक्त - चतुर्बिशन [ २४ ] स्तोमावच्छिन्न पृथिवीलोक, चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप - सम्पत से युक्त चतुश्चत्वारिंशत् ( ४४ ) स्तोमावच्छिन्न अन्तरिक्ष-लोक, एवं अष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगतीसम्पत से युक्त - अष्टाचत्वारिंशत् ( ४ = ) स्तोमावच्छिन

पृष्ठ 1074

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चतुर्थ अध्याय आघारब्राह्मण प्रथमकाण्ड लोक, इन तीनों लोकों की समष्टिरूपा, भूकेन्द्र से आरम्भ कर पारावतपृष्ठान्ता ४८ वर्गण पर्यन्त व्याप्ता, शाकरसामानुगता, त्रैलोक्यरूपा, अमृतलक्षण - वाक् शुक्रानुगता, द्युलोकात्मिका, वाङमयी महा-पृथिवी ही पार्थिव जगत् का तीसरा विवर्त्त है । त्रयस्त्रिंशत् ( ३३ ] अहर्गणात्मक युलोक, द्वात्रिंश [ २२ ] अहर्गणात्मक अन्तरिक्षलोक, एवं एकादश [ ११ ] अर्गणात्मक पृथिवालोक, इन तीनों लोकों की समष्टिरूपा, भूकेन्द्र से आरम्भ कर आयान्ता, ३३ वें अहर्गण पर्यन्त व्याप्ता, वैरूपसामानुगता, त्रैलोक्यरूपा, अमृत-लक्षण - आपः - शुक्रानुगता, अन्तरिक्ष लोकात्मिका, आपोमयी पृथिवी ही पार्थिव जगत् का दूसरा विवर्त है । एकविंश [ २ ९ ] अहर्गणात्मक द्यलोक, पञ्चदश [ १५ ) अहर्गणात्मक अन्तरिक्ष लोक, एवं त्रिवृत् [ ६ ] अहर्गणात्मक पृथिवीलोक, इन तीनों लोकों की समष्टिरूपा, भूकेन्द्र से आरम्भ कर आग्नेयपृष्ठान्ता, २१ वें अहर्गण पर्यन्त व्याप्ता, रथन्तरसामानुगता, त्रैलोक्यरूपा, अमृतलक्षण - अग्निः शुकानुगता, पृथिवीलोकात्मिका, अग्निमयी ( अग्निसोममयी ) पृथिवी ही पार्थिवजगत् क । पहिला विवर्त है । अचत्त्वारिंशन् ( ४८ ) स्तोमावच्छिन्ना वाङ्मयी पृथिवी ' विश्वम्भरा ' कहलाई है, त्रयस्त्रिंशत् [ ३३ ] स्तोमात्रच्छिना आपोमयी पृथिवी ' सागराग्वरा ' कहलाई है, एवं कत्रिंश ( २१ ) स्तोमावा-च्छिन्ना अग्निमया पृथिवी ' अदिति ' कहलाई हैं । त्रैलोक्यात्मिका अदिति पृथिवी ' पृथिवीलोक ' है, त्रैलोक्यात्मिका सागराम्बरा पृथिवी ' अन्तरिक्षलोक ' है, एवं त्रैलोक्यात्मिका विश्वम्भरा पृथिवी ' लोक ' है । इस त्रैलोक्य त्रिलोकीरूपा नवलोकात्मिका ' महिमा पृथिवी का वितान भूपिण्ड के केन्द्र से हुआा है । भूकेन्द्रावच्छिन्न भूपिण्ड ' भू ' है, एवं त्रैलोक्य त्रिलोकीरूप महिमामण्डल ' पृथिवी ' है । इस महिभा-पृथिवी के पृथिवी - लोकस्थानीय, एकविंशस्तोमावच्छिन्न, अदिति नामक त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश - भेद स त्रैलोकक्यात्मक पार्थिव विवर्त का ही प्रकृतयज्ञ कर्म से सम्बन्ध है, जैसा कि अनुपद में हीं स्पष्ट होने वाला है । १३४३

पृष्ठ 1075

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चतुथ अध्याय पार्थिवानवत्तपारलखः— * ( ६ ) – ३ - जागतस्तोमः ( ४८ ) - चौ: ( ३ ) आधारब्राह्मण शतपथब्राह्मण ( ३ ) ( ८ ) - २ - त्रैष्टुभस्तोमः ( ४४ ) - अन्तरिक्षम् ( ३ ) -३ बाङ ्ममयी पृथिवी विश्वम्भरा पृथिवी ' द्यौः ' [ [ शाकरसाम ] ] ( ७ ) - १ - गायत्रस्तोन: ( २४ ) - पृथिवो * ( ६ ) — ३ - त्रयत्रिंशत्स्तोभः ( ३३ ) द्यौः ( २ ) ( २ ) ( ५ ) – २ - द्वात्रिंशस्तोम: २२ ) अन्तरिक्षम् ( २ ) ( ४ ) १ - एकादशस्तोमः ( ११ ) पृथिवी ( २ ) * ( ३ ) – ३ - एकविंशस्तोमः ( २१ ) द्यौः ( १ ) -२ पोमयी पृथिवी - सागराम्बरा पृथिवी [ वैरूपंसाम ] ' अन्तरिक्षम ' ( १ ) ( २ ) – २ – पञ्चदशस्तोम: ( १५ ) अन्तरिक्षम् ( १ ) ( १ ) - १ - त्रिवृत्स्तोमः ( ६ ) पृथिवी ( १ ) -- १ अग्निमयी पृथिवी [ रथन्तरं साम यदितिः पृथिवी ' पृथिवी ' उक्त तीनों पार्थिव विवर्त्तो में से खन्तरसामामानुगत, अदितिल क्षरण प्रथम पार्थिव विवर्त्त की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । भूकेन्द्र से आरम्भ कर २१ व अहर्गण पर्यन्त व्याप्त क्रमशः त्रिवृत् [ ६ ], पश्चदश [ १५ ], एकविंश [ २१ ], ये तीन युग्मम्तोम युग्मस्तोमों में क्रमश: अग्नि, वायु, इन्द्र, अग्निः शुक्र के आधार पर प्रतिष्ठित है । इन तीनों तीनों के विभूतिभाव आगे जाकर ८, ११, १२, क्रम से ३१ संख्या में ये तीन प्राणदेवता प्रतिष्ठित हैं । परिणत होजाते हैं, २ सान्ध्य प्राणों होजाती है । ये ही यज्ञिय देवदेवता के संकलन से अदिति के गर्भ में ३३ प्राणदेवदेवताओं की सत्ता सिद्ध कहलाए हैं । ग्राहवनीयाग्निसमिन्धनकर्म से इह्रीं यज्ञिय प्राणदेवताओं का संग्रह हुआ है । ये ३३ सों यज्ञिय देवता स्वयं प्राणात्मक हैं । मन, तथा वाक ये दोनों तत्त्व इन प्राणात्मक दोनों की मूलप्रतिष्ठा हैं । जिसप्रकार एक पात्र में जल भरा रहता है, एवमेत्र मनोमय वागूरूप पात्र में प्राणरूप देवता प्रतिष्ठित हैं । मनोत्रागूरूपपात्र वयोनाध है, छन्द है । प्राणरूप देवता वय हैं । एव वय-वयोनाध की समघ्र ही ' बयुनम ' है । यही मनः प्राण वाङ् मयी देवसम्पत् है, जिनका प्रकृत इष्टिकम्मं के द्वारा यज्ञकर्त्ता यजमान अपने मन: - प्राण- बाङमय आत्मा के साथ योग करना चाहता है । भूकेन्द्र में प्रजापति प्रतिष्ठित है, यही हृद्य अन्तर्यामी अनिरुक्त प्रजापति कहलाया है! यही प्रजापति भूपिण्ड, पृथिवी भेद- भिन्न पार्थिवजगत की मूलप्रतिष्ठा है । इस हृद्य प्रजापति की प्राण--वाग्गर्भित मनोमय अनिरुक्त प्रजापति, मनो-- बाग्गर्भित प्राणमय उद्गीथ प्रजापति, एवं मनः प्राणगर्भित वाङ्मय सर्वप्रजापति, इस रूप से तीन अवस्था होजाती हैं । भृकेन्द्र में आत्मप्रजापति की १३४४

पृष्ठ 1076

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चतुर्थ अध्याय श्राधारब्राह्मण प्राण तथा वाक ये दोनों कलाएँ उन्मुग्ध रहती है, मनःकला उद्बुद्ध रहती है । यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " ( गजुःसं ० ३४१६ ) इत्यादि रूप मान लिया जाता है । प्रथमकाण्ड अतएव " इन्प्रतिष्ठं से मन को भी हृत्प्रतिष्ठ हृत्पृष्ठ से आरम्भ कर १० वें पर्यन्त आग्नेय प्राण का प्राधान्य रहता है । इसमें भी १७ व अहर्गण मुख्य माना गया है कारण यही है कि ३३ अहर्गणात्मक सागराम्बरा - लक्षण पार्थिव विवर्त के १६-१६ भेद से दो विवर्त्त होजाते हैं । हृत्पृष्ट से प्रारम्भ कर १६ पर्यन्त अग्नितत्त्व का, तथा १८ से आरम्भ कर ३३ पर्यन्त [ १८ से २७ पर्यन्त भास्वरसोम का, तथा २८ से ३२ दिक्सोम का इसप्रकार द्विविध ] सोम का साम्राज्य रहता है । इन अग्नि - सोम - मण्डलों का केन्द्र १७ वाँ ग्रहण पड़ता है । १७ से नीचे - नीचे श्रग्नि है, १७ से ऊपर - ऊपर सोम है । १७ वें स्थान में दोनों का समन्वय होता है, अतएव सप्तदशस्थान ' आइवनीय ' कहलाया है । सोमाहुति के सम्बन्ध मे प्रज्ज्वलित अग्नि २१ अहर्गण पर्यन्त व्याप्त होजाता है । अतएव मकेन्द्र से २१ पर्यन्त अग्नीषोमात्मक यज्ञ की व्याप्ति मानली गई है । कव्य यही है कि हत्पृष्ठ से १७ पर्यन्त आत्मप्रजापति की ' कला ' का प्राधान्य है, जिस की विकासभूमि स्वयं १७ वाँ ग्रहण है । मन, तथा वाक, दोनों यहाँ उन्मुग्ध हैं, प्राण उद्बुद्ध है । यही दूसरा प्राणप्रधान उद्गीथ प्रजापति ' विवर्त है । इत्पृष्ठ से आरम्भ कर २१ पन्त व्याप्त रन्तरतामसीमावच्छिन्न मण्डल में ' वागग्नि ' का प्राधान्य है यहाँ मन तथा प्राण, दोनों उन्मुग्ध हैं, एवं आत्मप्रजापति की माक्कला उद्बुद्ध है । यही मनःप्राण-वागूगर्भित वाङ्मय सप्रजापति है । यही यशमण्डल की अन्तिम सीमा है । इसी के गर्भ में अग्नीषो मात्मक यज्ञ तथा वशिय ३३ देवता प्रतिष्ठित हैं । रथन्तसीमा यश की परिधि है, उपसंहारस्थान है, उदचस्थान है । केन्द्र यज्ञ का उपक्रम स्थान है भूकेन्द्रामायागर्भित मनोमय ' अनिरुक्तप्रजापति ', तथा रथन्तरलक्ष्य परिध्ययन्नि मनः प्रागर्भित वाट म ' सर्गप्रजापति ', दोनों के मध्य में खाग्नेय - सौम्ब-प्राणोभयमूर्ति मनोवाग्गर्भित यज्ञात्मक उद्गीथ प्रजापति ' प्रतिष्ठित है । इसी स्थिति का वो भी अभिनय किया जासकता है कि, यज्ञमण्डल का इस ओर का आधार मन है, उस ओर का आधार वाक् है, एवं मध्य में प्रायामय यश किंवा प्राणात्मक यज्ञिय देवता प्रतिष्ठित हैं प्राकृतिक यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाली पार्थिव यज्ञ, द्रव्याहुति मनोवाक् के द्वारा ही प्राणात्मक यज्ञिय देववर्ग की तृप्ति का कारण बनती है । इसप्रकार नित्य प्राकृतिक यज्ञ में भूकेन्द्र, यज्ञमण्डलकेन्द्र, यज्ञपरिधि, भेद से मन, प्राण, वाक्, तीनों हुया प्राजापत्या-आत्मकलाओं का उपभोग होरहा है, जैसा कि परिलेख से गतार्थ है-२- एकविंशतीमान रथन्तरसाम [ २१ ] मनःप्राणगतिवाद मय ' सर्वप्रजापतिः ' -२ – सप्तदशस्तोमावच्छिन्न मण्डलं हृदयम् - [ १७ ] मनोवाग्गर्भितः प्राणमय: ' उद्गीथ श्रजापतिः ’ १ - भूकेन्द्रः - [ * ] गर्मिती मनोमनः ' अनिरुक्तप्रजापतिः ' - ** -१३४५

पृष्ठ 1077

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चतुर्थ अध्याय ३ - सर्वप्रजापतिर्वाङमयः —बाकू २ – उद्गीथप्रजापतिः प्राणमयः-- प्राणः १ अनिरुक्तप्रजापतिर्मनीमयः मनः यामारवाह्मण • मनः प्राणवाङ्मया यज्ञिया देवाः हृदयावच्छिन्न मनः- अनिरुक्तम् मध्यावच्छिन्नः प्राणः निरनिरुक्तः परियच्छा निरुता - पार्थिवयज्ञः प्राकृतिको नित्यः शथप श्रब्राह्मण मनः प्राणवाङमय, उक्त लक्षण, प्राकृतिक, ' नित्य, देवयज्ञ ' के आधार पर ही ब्राहाणग्रन्थोक्त पुरुषप्रयत्नसाध्य ' मानुप वैध यज्ञ ' का वितान हुआ है । प्राकृतिक यज्ञ में मन, तथा वाक् के आधार पर ही प्राणात्मक यशिप देवताओं में पार्थिव राहुति मुक्त होती है । अतएव ' याँ देवा अस्त करवा निगमानुसार इस वैध - मानुपयश में भी ( यशात्मक - आहवनीयाग्नि में भी ) मन: - प्राण - वाक, तीनों कलाओं का समन्वय श्रावश्यक रूप से अपेक्षित होजाता है । चिना तीनों के समन्वय के आहवनीय समिद्धाग्नि प्राजापत्यसम्पत् से सर्वथा वञ्चित है । एवं बिना प्राजापत्यसम्पत् के यज्ञसम्पत्सिद्धि सम्भव है । मन: प्राणवामय प्राकृतिक यज्ञ की विधा पर ही वितत इस यज्ञ में देवयजन से पहिले मनःप्राणवाक् सम्पत्ति अपेक्षित है, यही निष्कर्ष है इसी सम्बन्ध में एक रहस्य का विश्लेषण और I अधिटेक्त का अधि के द्वारा यजमान के आध्यात्मिक यज्ञात्मा का प्राकृतिक उक्त लक्षण प्राधिदैविक यज्ञात्मा से सम्बन्ध कर भूत देना हीं यज्ञनिष्कर्ष है । अधिदैवतयज्ञ पूर्वकथनानुसार स्वस्वरूप से मनः प्राणवाङ् मय है, एवमेव अध्यात्मयज्ञ भी स्वस्वरूप से मनः प्राणवाद मय है । शेष रह जाता है वितायमान, आहवनीयाग्निलक्षण प्रधिभूतयज्ञ । इसे जबतक मनःप्राणवाङमय नहीं बना दिया जाता, तबतक इस का माध्यम निष्फल है । अधिभूतयज्ञ उसी अवस्था में मन: प्राणवाङ्मय अध्यात्मयज्ञ [ यजमानात्पा ] का मनःप्राणवाङमय अधिदैवत यज्ञ से सम्बन्ध करा सकता है, दूसरे शब्दों में अधिभूतयज्ञलक्षण ग्राहवनीय अग्नि में प्रदत प्राहुति का तभी अधि-दैवत यशात्मक दिव्य देवताओं के साथ सम्बन्ध होसकता है, जब कि इस आहवनीयाग्निरूप अधिभूतयज्ञ को भी किसी वैज्ञानिक - प्रक्रिया - विशेष से मन प्राणवाङमय बना दिया जाय । इस के मनःप्राणवाह मय बनाने से आहुतिद्रव्य के द्वारा श्राध्यात्मिक यज्ञ के मनः प्राणः वाक्प इस अधिभूतयज्ञ में अन्तयमसम्बन्ध से प्रविष्ट होजायँगे | आहुति का अधिद्वैत से सम्बन्ध होना अनिवार्य होगा । इसप्रकार अधिभूतयज्ञ के द्वारा परम्परया यजमानात्मा का दिव्यातिशय से अन्तर्य्याम सम्बन्ध होजायगा । छात्र इस सम्बन्ध में दो कर्तव्य हमारे सामने उपस्थित होते है । आधिभौतिक लक्षण इस ग्राहवनी-याग्नि में मनःप्राणवाक् का सम्बन्ध करा देना, एक कर्त्तव्य है । एव इस मनःप्राणवाङमय आधिभौतिक यज्ञ १३४६

पृष्ठ 1078

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चतुर्थ अध्याय आघारब्राह्मण प्रथमकाण्ड के साथ आध्यात्मिक यज्ञ [ यजमानाच्या ] के मन - प्राणवाक्प का सम्बन्ध करा देना, दूसरा कर्त्तव्य है । पहिले कर्त्तव्य की पूर्ति होता, तथा अध्वर्यु पर निर्भर है, तथा इस दूसरे कर्त्तव्य की पूर्ति अध्य होता, उद्राता, ब्रह्मा ' इन चारों ऋत्विजों पर निर्भर है भूकेन्द्र से २१ पय्यन्त वितत वातव क्रमशः त्रिवृद वच्छिन्न [ ६ ] अग्निमय पार्थिव ऋग्वेद, पञ्चदशावच्छिन्न [ १५ ] वायुमय यजुर्वेद, एकविंशावच्छिन्न [ २२ ] आदित्यमय सामवेद, इन तीन अग्निवेदों के सम्बन्ध से पद्यात्मिका वाक्, गद्यात्मका बाकू, मेवात्मिका वाक् के भेद से तीन स्वरूपों में परिणत होरहा है । पद्यात्मिका वाक् ऋकू है, गयात्मिका वाक् यजुः है, एवं गेवात्मिका बाकू साम है! पद्यात्मिका ऋषा का सम्पादन ' होता ' नामक ऋत्विक करता है, वही इस का ' शस्त्रकर्म्म ' नामक ' हौत्रकर्म ' कहलाया है । गद्यात्मिका यजुर्वाक का सम्पादन अभ्य नामक ऋति करता है । यही इस का ' क ' नामक ' आययेव ' कम्मं कहलाया है । ' गेयात्मिका सामचाक ' का सम्पादन उद्गाता नामक ऋत्विक करता है, यही इस का ' स्तोत्रकर्म ' नामक ' अद्भावकर्म ' कहलाया है । इस -प्रकार शम्र्माधिष्ठाता ऋग्वेदी होता के शतक से अम्मधिष्ठाता यजुर्वेदी अध्य ' के महक से, तथा स्तोत्रकर्माधिष्ठाता सामवेदी उद्गाता के स्तोत्रकर्म्म सेवमानात्मा के विविध वाक्यों का इस धिमीतिक यज्ञ के वाकपर्वो के साथ सम्बन्ध होजाता है । त्रैविय ' ब्रह्मा ' नामक ऋत्विक अपने ब्राह्मव्यापार से यजमानात्मा के मनःपर्व का सम्पादन करता है । शेष रहता है ' प्राण ' पर्व । अध्ययुकृत याज्याकर्म्म से [ आाइतिकर्म से ] इस प्राण का आधान होजाता है इसप्रकार अध्वर्युक्त प्राणव्यापार होता-अध्य - उद्गाता कृतवाग्व्यापार तथा ब्रह्माकृत मनोव्यापार तीनों व्यापारों से आधिभौतिक यज्ञ के साथ यजमानात्मा के तीनों ग्रात्मपर्वों का सम्बन्ध होजाता है । और यों प्रथम कर्त्तव्य की पूर्ति होजाती है । १ - ब्रह्मा — मनस्तन्वसम्पादकः - त्राह्मकर्म्मणा २ - ग्रध्वर्युः - प्राणतत्त्वसम्पादकः – बाज्या कर्म्मणा ३ –उद् ॥ता — सामवाक्सम्पादक: - स्तोत्रकर्म्मगा [ वाक् ] [ मनः ] ३ [ प्राण: ] २ ४ श्रध्व: - यजुर्वामम्पादक: रा ] [ वाक् ] [ [ ] ] ५. — होता — ऋग्वाकुसम्पादकः शस्त्रकर्म्मणा [ वाक् ] -१ श्राधि-लाभावानां यजमानात्मक तदित्थं मनःप्राणवाङमयानां । सम्बन्धः यज्ञाग्नौ भौतिक आधिभौतिक यज्ञाग्नि में मन - प्राय - वा - सम्पति का समावेश आवश्यक है । पूर्वोत्तराचारकर्म्म से पहले ' होता ' नामक ऋत्विक के द्वारा सामिधेन्यनुवचन - क्रम्मं होता है, जैसा कि प्रकरणारम्भ में स्पष्ट किया -जाचुका है । लौकिक भूतान में मन्त्रशक्ति से युक्त इप्यभ्याधान के द्वारा दिव्य प्रातस्य का आाधान करना हीं इस सामिवेन्यनुवचनकर्म का एकमात्र फल है । इसप्रकार होतृकर्त्तके सामिधेनी - कर्म से यह अधिभूत-यज्ञ प्राणसम्पत्ति से शुरू हो जाता है । इस प्राथमम्पत्ति का मनोवा से सम्बन्ध सूचित करने के लिए ही प्रकृत आपारब्राह्मण के श्रारम्भ में प्रथम प्रथम - " तं वा ममि समेन्धित समिद्धं देवेभ्यो जुवाम ' ( शत ० १२४ | ४ | १ | ) यह कहा गया है इस सिंहावलोकन से श्रुति सङ्केत कर रही है कि, आधिभत १३४७

पृष्ठ 1079

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1079 का मूल पृष्ठ
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चतुर्थ अध्याय श्राधारखा झण शतपथब्राह्मगा यज्ञाग्ति में पर्व के सामिधेनी - कर्म से प्राणापर्व का तो आाधान होगया । अत्र पर्वोत्तराघारकर्म्मद्वयी से इस प्राणात्मक आहवनीयाग्नियज्ञ में मनो - वाक् पर्वो का आधान बतलाया जाता है । होतृकृत प्राणाधानलक्षण सामिधेन्यनु-वचन – कर्म्मानन्तर अध्वर्यु ' नामक ऋत्विक् स्रुवपात्र से पूर्वाधारकर्म्म का, तथा कुपात्रद्वयी से उत्तराघार-कर्म्म का सम्पादन करता है । पूर्वाधार मनःपर्व का संग्राहक है एवं उत्तराधार वाक पर्व का संग्राहक है । इसप्रकार समिन्धन - कर्म से प्राणयुक्त, पूर्वाधारकम्मं से मनीयुक्त, एवं उत्तराधार से वागयुक्त, सम्भूय तीनों कम्र्मों से मनः - प्राण - वाङ्मय बनता हुआ आहवनीयाग्निलक्षण आधिभौतिक यज्ञ आध्यात्मिक - यज्ञलक्षण यजमानात्मा के मन: - प्राण - वाक - पर्वों से ( आहुति के द्वारा ) युक्त होता हुआ आधिभौतिक - यज्ञाग्निप से सम्बद्ध आधिदैविक यज्ञ के मनः प्राण वाक् - पर्वो से अन्तर्य्यामात्मक समन्वय सम्बन्ध प्राप्त कर लेता है । केन्द्रावच्छिन्न मनःपर्व ( प्राणवागूगर्भित मनोमय अनिरुक्त प्रजापति ) हृदयावच्छेदेन पूर्वभावी है, एव रथन्तरसामावच्छिन्न वाक् - पत्र ( मनःप्राणगर्मित वाङमय निरुक्त प्रजापति ) परिध्यवच्छेदेन उत्तरभावी है । मन: सम्पत्ति से सम्बन्ध रखने वाला घार पर्वभावी है एवं वाकसम्पत्ति से सम्बन्ध रखने वाला आघार-उत्तरभावी है । इस पूर्ब, तथा उत्तरभाव से ही यज्ञाग्नि में पूर्वभावी मनःपूर्व का, तथा उत्तरभावी वाकपर्व का आधान होरहा है । मनोऽनुगत आचार पूर्वाधार क्यों कहलाया?, वागनुगत आधार उत्तरावार क्यों कहलाया?, पूर्वाधार पहिले, एवं उत्तरात्रार पीछे क्यों किया जाता है?, समिन्धनानन्तर पर्वोत्तराघारकर्म्मद्वयी क्यों आवश्यक है?, इसके द्वारा मनोवाक - सम्पत्तिमग्रह क्यों अपेक्षित है?, इत्यादि श्राधारक सम्बन्धी प्रश्नों की इसी उक्त उपपत्ति का प्रथम कण्डिकाशेष में स्पष्टीकरण हुआ है । १ – " अग्नि समैन्धिपत ". २ – “ मनसे चैत्र ' ३– “ वाचे च ” ' – प्राण संग्रहः- - सामिधेन्वनुवचनकर्मणा । -मनः संग्रहः –— पूर्वाव । रकर्म्मणा । — बाक्संग्रहः – उत्तराघारकर्म्मणा । पूर्वाधारक उपांशु रूप से किया जाता है, एवं उत्तराघारकर्म्म वागुच्चारण [ मन्त्रोच्चारण ] पूर्वक किया जाता है | हृदयस्थ पूर्वभावी मन उपांशु है । मन का स्वरूप हृदयावच्छेदेन सर्वथा अव्यक्त है । श्रतएव न तो हृदयावच्छिन्न मन का ही पराङमुख इन्द्रियों से साक्षात्कार किया जासकता, एवं न मानम - व्यापार [ भावना--वासनात्मक मानस संकल्प ] का ही अन्य व्यक्ति के द्वारा प्रत्यक्ष किया जासकता । यही मन का उपांशुधत्व है । क्योंकि मन उपांशु है, अतएव तत् - सम्पत्तिसंग्राहक पुर्वाधारक की इतिकर्तव्यता का भी उपांशु ही सम्पादन होना चाहिए । इस समानधर्म के सम्बन्ध से उपांशुरूपेण कृत पूर्वाधारक से श्राहवनीयाग्नि में श्रवश्यमेव मनःपर्व का आधान होजाता है, एवं यह श्राहित मन उपांशुरूप से ही लोकस्थ प्राणदेवों के लिए आहुति - द्रव्यप्रापक बन जाता है । रथन्तरसामात्मिका परिधिस्था उत्तरभाविनी वाक् निरुक्ता है । वाक् १३४८

पृष्ठ 1080

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चतुर्थ अध्याय श्राधारखाह्मण प्रथमकाण्ड का स्वरूप सर्वथा व्यक्त है । तव वाग्व्यापार का अन्य इन्द्रिय [ श्रोत्रेन्द्रिय ] से भी प्रत्यक्ष होजाता है, एवं अन्य व्यक्ति भी इसका साक्षात्कार कर लेते हैं । इन्द्रियत्रागातिरिक्त पञ्चभूतरूप से भी वाग्ववर्त्त प्रत्यक्ष का विषय बनता हुआ व्यक्त बन रहा है । द्य क्योंकि बाक् निरुक्ता है, अतएव तत्सम्पत्तिसंग्राहक कर्म की इतिकर्तव्यता भी वागुच्चारणपूर्वक ही सम्पादित होती है । इस समानधर्म के सम्बन्ध से बाग्रूपेण कृत उत्तराघारकर्म्म से आहवनीयान में अवश्य-मेव वाकूप का आधान होजाता है, एवं यह श्राहित बाक् वागूरूप से [ वघटकाररूप से ] ही य, लोकस्थ प्राण-देवताओं के लिए आहुतिद्रव्य - प्रापिका बन जाती है । इसप्रकार उपांशुरूप से पूर्वाधार तथा वागुरूप से उत्तराधार करता हुआ भी अध्यय् श्राहवनीयाग्नि में मनोवाक् पर्वों का ही आधान कर रहा है । इन दोनों क्रमिक आधारों से आधिभौतिक यज्ञ के मनोवाक्पूर्व तृप्त होजाते हैं [ सर्वाङ्गीण बन जाते हैं । ] सर्वाङ्गीण बनकर ये दोनों पर्व प्राणात्मक यज्ञाग्नि के आधारपात्र [ वर्त्तनी ] वनते हुए निश्चयेन द्यलोस्थ प्राणदेव के लिए आहुतिप्रापक बन जाते हैं । तात्पर्य उपपत्ति का यही है कि, देवतृप्ति का साधन आहुतिप्राप्ति है, एवं आहुतिप्राप्ति का साधन मनोवाक्पत्रों की सर्वाङ्गीणलक्षणा तृप्ति है । इस तृप्तिभावप्राप्ति के लिए भी आघारद्वयानुष्ठान आवश्यक है । मनोवाक् पर्व कैसे, किस रूप से प्राणदेवों के लिए यज्ञवहन करते हैं?, प्रकृत द्वितीय कण्डिका से इसी प्रश्न का सो प्रतिक समाधान हुआ है ॥ २ ॥

काममय विश्व में पुरुष, तथा स्त्री, इन दोनों का सहयोग अपेक्षित है । यद्यपि पुरुष भी काममय है, स्त्री भी काममयी ही है, तथापि प्रधानता पुरुष की ही मानी गई है । पुरुष ' स्व ' तन्त्र में प्रतिष्ठित है, एव स्वी ‘ पुरुषतन्त्र ' की अनुगामिनी है । पुरुषकाम ही स्त्रीकाम है । दूसरे शब्दों में स्त्री कृतानुकरा है, अनुगामिनी है । इसी प्राकृतिक नियमानुसार कामनामय मन को हम पुरुष कह सकते हैं, एवं कामनामय मन के संकल्पानुसार स्वब्यापार के सञ्चालन में समर्थ होने वाली वाकू को ' स्त्री ' कहा जा सकता है । पुरुषानुगत प्राण ' वृषा ' कहलाया है, स्त्र्यनुगत प्राण ' योषा ' कहलाया है । अनुधावन करने वाला पुरुषप्राण ही वृषा है, एवं जिस के प्रति वृषाप्राण । अनुधावन होता है, वही योषा है । इस दृष्टि से भी मन तृषा है, एवं वाक्योषा है । वाक् का मन की और अनुधान नहीं है, अपितु संकल्परूप से मन ही वाक् की ओर अनुधावन करता है । इस प्रकार कामनामयत्त्वेन, वाक्तन्त्र सञ्चालकत्वेन, अनुधावकत्वेन हृक्यावच्छिन्न मन का वृषाप्राणात्मक पुरुषत्त्व भलीभाँति सिद्ध होजाता है । एवं कामनानुगतत्त्वेन परिध्यवच्छिन्ना वाक् का योपाप्राणात्मक स्त्रीत्त्व सर्वात्मना सिद्ध होजाता है । उधर आहुतिपात्रों में स्रुवपात्र पुल्लिंगत्त्वेन वृषः प्राणात्मक काममय मन से समतुलित है, जुहू - उपमृत् नामक स्रुक्पात्रद्वयी स्त्रीलिङ्गत्वेन योषाप्राणात्मिका कामनुगता वाकू से समतुलित है । मनोऽनुगत पूर्वाधार मनः सम्बन्ध से वृषा है, अतएव पूर्वाघाराहुति वृषात्मक स्रुव से ही होती है । बागनुगत उत्तराधार वाक् के सम्बन्ध से योषा है, अतएव उत्तराघाराहुति योषात्मिका स्रुकृपात्रद्वयी से ही होती है । पूर्वोत्तराघारकर्म्म का क्रमशः स्रुव, एवं स्रुक् से क्यों सम्पादन होता है? इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है, जिसका कि तृतीय- चतुर्थ - कएडकाओं से स्पष्टीकरण हुआ है । ३, ४ ॥ पूर्वाचार मनोऽनुगत है उत्तराधार वानुगत है, यह कहा जाचुका है । प्राणवागगर्भित मनोमय अनिरुक्त-प्रजापति हृद्य है । यहाँ से यद्यपि – “ पराचि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः " ( कठोपनिषत ४ | १ | ) इत्यादि १३४६