Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1081–1090
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1081–1090
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चतुर्थ अध्याय श्राघ । ब्राह्मण शतपथब्राह्मण श्रत सिद्धान्त के अनुसार वाक्तत्त्व का ऊर्ध्व वितान अवश्य होता है, तथापि यह स्वयं मनोमय हृद्य निरुक्तभाव तो वाक्पथातीत ही है । इसी मनोऽनुरूपता की मिद्धि के लिए मनोऽनुगत पूर्वाधार तूष्णी हीं किया जाता है । उपाशु ही अनिरुक्त है । अनिरुक्तता ही मन का स्वाभाविक धर्म है | ' स्वाहा ' यह वाग्विवर्त्त का प्रत्यक्ष अभिनय है, जैसाकि आगे के प्राख्यान से स्पष्ट होने वाला है । हृय मनोमय प्रजापति के लिए पराङमुखा वाक् ग्रहव्यवाहना है | अतएव मनःसम्पत्तिसग्राहक पूर्वाधारकर्म में वागनुगत स्वाहा का उच्चारण निषिद्ध है | वाक्तत्त्व का मनःप्राणगर्भित वाङमय सर्वलक्षण निरुक्त प्रजापति से सम्बन्ध है | यह तत्त्व स्वस्वरूप से ( आकाशरूप से ) भी प्रकट है, स्ववितानात्मक पञ्चमहाभूतात्मक अर्थप्रपञ्च की दृष्टि से भी प्रकट है, एवं वागिन्द्रियरूप से भी व्यक्त है । प्रत्यक्षदृष्ट पाञ्चभौतिक पदार्थ वाङमय हैं, इनके गर्भ में ' हित ' नामक, क्रियाप्रवत ' के ' प्राणतत्त्व ' प्रतिष्ठित है, सर्वालम्बन सुसूक्ष्म काममय मन है । क्योंकि वाक्तत्त्व व्यक्तलक्षण है, इधर उत्तराधार वाक्सम्पत्तिसंग्रह के लिए विहित है । अतएव वागनुगत उत्तराचारकर्म्म मन्त्रोच्चारण, लक्षण व्यक्तभाव से ही सम्पन्न होता है । मनोऽनुगत पूर्वाधार का तूष्णीं रूपेण, तथा वागनुगत उत्तराधार का मन्त्र-रूपेण सम्पादन करना भी मनोवापर्वो का ही संग्रह करना है, यही उपपत्ति - निष्कर्ष है, जिस का कि पाँचवीं, तथा छटी कण्डिकाओ से स्पष्टीकरण हुआ है ॥ ५, ६, ॥ भूकेन्द्रावच्छिन्न मनोमय अनिरुक्त प्रजापति ' अत्यतिष्ठद्दशांगुलम् ' ( यजुः मं ० ३१।१ ) सिद्धान्तानुसार प्रादेशमित ( १० || श्रं ंगुलमित ) प्राणरूप से हृदय में प्रतिष्ठित है । इस बैठे हुए मनोमय प्रजापति के आधार पर ही इन्द्रा - विष्णू की अनुगता प्रतिस्पर्द्धा से वाकसाहस्री का उर्ध्वं वितान होता है । उर्ध्ववितता यह वाक्साहस्त्री केन्द्र में प्रतिष्टित ( ग्रामीन ) मनोमय प्रजापति की अपेक्षा खड़ी हुई सी है । मनस्तत्त्व हृदय में श्रासीनवत् है, वाकतत्त्व हृदय से परिधि पर्य्यन्त तिष्ठनवत् है । मनोवाक पत्रों की इस स्वाभाविकी स्थिति को लक्ष्य में रख कर ही मनोऽनुगत पूर्वाधार यासीन बनकर ( चैट कर ) किया जाता है, एवं वागनुगत उत्तराद्द।र तिष्ठन्रूप से ( खड़े होकर ) किया जाता है । इसप्रकार यासीन, तिष्ठन् रूप से कृत पूर्व - उत्तराचार के द्वारा भी आसीन मनस्तत्त्व, एवं तिष्ठन् वाक्तत्त्व का आहवनीय यज्ञाग्नि में प्रधान होजाता है । पूर्वाधार श्रासान रूप से, तया उत्तराघार तिष्ठन् रूप से क्यों किया जाता है? इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है । वागनुगत उत्तराघार तिष्ठन् क्यों किया जाता है? इस प्रश्न की एक दूसरी भी उपपत्ति है । जहाँतक यज्ञात्मिका वाक्साहस्री व्याप्त रहती है, वहाँतक रथन्तरसाम की व्याप्ति मानी गई है, जैमा कि प्रकरणाम्भ में स्पष्ट किया जाचुका है । भृकेन्द्र में प्रतिष्ठित वाङमय अग्नितत्त्व रसाग्नि ' ' नाम से प्रसिद्ध है । इस वाहमय रसाग्नि का त्रिवृत् पञ्चदश एकविंश स्तोमरूप से क्रमश: अग्नि वायु आदित्य रूप से ऊर्ध्व वितान हुआ है, जैसा कि निम्न लिखित ब्राह्मणश्रुति से प्रमाणित है— तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्त्तताग्निः । स त्रेधात्मानं व्यकुरुत आदित्यं -तृतीयं वायुं तृतीयम् । स एष प्राणस्त्रेधा विहितः " । - शत ० १० | ४ | ७ | २,३, । रसात्मक वाङमय अग्नि के ऊर्ध्व वितान - सम्बन्ध स ही एकविंस्तोमावच्छिन्न यज्ञाग्निलक्षण पार्थिव साम ( अग्निसाम ) ' रसतमसाम ' कहलाया है । यह रसतमसाम ही परोक्षप्रिय देवताओं की परोक्ष भाषा में १३५०
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चतुर्थ - अध्याय श्राधारब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' रथन्तरसाम ' कहलाया है, जैसा कि " रसतम ह वै तद्रथन्तरमित्याचचते परोक्षम् ( शत ० ६.१ ९६२-| ३६ | ) इत्यादि अति से प्रमाणित है भूकेन्द्र से २१ में ग्रहण पर्यन्त व्याप्त मनोवाग्गर्भित प्राणमय यज्ञ भी इसी रसतम अग्नि के सम्बन्ध से ' रथ ( देवरथ ) कहलाया है । प्रदत्त आहुतिद्रव्य के द्वारा यजमान इस रसतमात्मक यशरथ में प्रतिष्ठित होकर वुलोक की और गमन करता है । इस रथ के बहुन करने वाले ( प्राणात्मक यज्ञ का भूकेन्द्र से रथन्तरसाम की परिधिपर्यन्त वितान करने वाले ) ' मन, वाक ' नाम के दो अश्व माने गए हैं । इह । दोनों के द्वारा यज्ञात्मक अग्निरसरूप ' रथ ' का वहन होता है । शरथ में नियुक्त इन दोनों मनो - या ) अश्वों में मनो लक्षण अश्व अपरिमित है, एवं बागलक्षण अश्व परिमित है । दिग्देशकालानवच्मि काममय मन इसी अपरिमित भार के सम्बन्ध से ' कामसमुद्र ' कहलाया है । " मनो वै बृहन् " ( ता ० ब्रा ० ७ ६।१७ ), " मनो वै समुद्रः " ( ७/५/२/५२ ) " अनन्तं मनः " ( शत ० १४ | ६ | १ | ११ ) इत्यादि अतियाँ मन के इसी असीमभाव का समर्थन कर रहीं हैं । मन - प्रति-टारूप हृदय स्वयं अनन्त है, तदनुगत मन भी अनन्त है । इसकी अपेक्षा वाक्तत्त्व दिग्देशकालावच्छिन्न बनता हुआ परिमिततर है, सीमित है अमावाक T ( भौतिक पदार्थ ) भी परिमित हैं, कट - त - प - आदि लक्षणा शब्दात्मिका वाक् भी सीमित है । इसप्रकार यज्ञस्थवाहक दोनों अश्वों में एक ( मन ) ग्राकार, प्रकार में बड़ा है, तो दूसरा ( चाक ) अपेक्षाकृत हमीयान् है । यदि ऐसे विपमाकार अश्व रथ का वहन करते हैं, तो वहनकर्म्म भयाक्रान्त बना रहता है । आवश्यक है कि, मनोरूप अश्वपरिमाण को समतुलित करने के लिए वागूरूप अश्वपरिमाण में श्राकारवृद्धि की जाय । इस लक्ष्य की सिद्धि के लिए ही वागनुगत उत्तरापार बड़े बड़े किया जाता है । सिकार लोक में नाटे श्रश्व को दीर्घकाय अश्व से समतुलित करने के लिए घंटे अश्व के स्कन्ध- प्रदेश में स्थूल काष्ठपीड लगा दिया जाता है, ठीक उसी लौकिक कर्म के अनुरूप यहाँ तिष्ठन्भाव का आश्रय लिया जाता है । खड़े होकर उत्त-राधार करना नागश्व को मनोरूप अश्व के समानाकार से ही समतुलित करना है । तिष्ठन्नुतराचार की यही दूसरी उपपत्ति है । इन दोनों उपपत्तियों का ही सातवीं करिका से स्टीकरण हुआ है || ७ || पूर्वाघार का सम्पाटन श्राहवनीयाग्नि के उत्तर भू प्रदेश में बैठ कर प्रज्ज्वलित समिद्ध आहवनीयाग्नि के उत्तराग्निभाग में होता है, एवं उत्तराधार का सम्पादन ] आहवनीयाग्नि के दक्षिण भूप्रदेश में लड़े होकर प्रज्ज्वलित समिद्ध आहवनीयाग्नि के दक्षिणाग्नि में होता है, जैसा कि ' सूत्रानुगतपद्धतिसंग्रह ' में स्पष्ट किया जाचुका है । इन दोनों आधारों के सम्बन्ध में एक अनुक्ता उपपत्ति का प्रासङ्गिक समन्वय और कर लेना चाहिए । पूर्वाधार का मन से, तथा उत्तराचार का वाकू से सम्बन्ध है । भावनामय मन देवप्रारण की प्रतिष्ठा है, एवं वासनात्मिका बाकू पितृप्राण की प्रतिष्ठा है । इसी आधार पर पितरो वाक्यमिच्छन्ति, भावमि-च्छन्ति देवताः ” यह सूक्ति प्रतिष्ठित है । मनोऽनुगृत देवप्राण आग्नेय है, एवं वागनुगत पितृप्राण सौम्य है । रथन्तरसामात्मक यज्ञमण्डल के पूर्वार्द्ध भाग में अग्नितत्त्व का प्राधान्य है, एवं उत्तरार्द्ध में सोमतत्त्व का साम्राज्य है । मण्डलकेन्द्रभूत मध्यस्थ सप्तदश स्थान में दोनों का समन्वय होता है, जैसा कि प्रथमकडिका - विवेचन में स्पष्ट किया जाचुका है । क्योंकि मनोऽनुगत आग्नेय देवताओं का पूर्वाद्ध से सम्बन्ध है, अतएव मनोऽनुगत आधार पहिले किया जाता है, अतएव च यह आधार ' पूर्शचार ' कहलाया है । एवमेव वागनुगत सौम्य पितरों का उत्तरार्द्ध से सम्बन्ध है, अतएव वागनुगत ग्राघार पीछे किया जाता हैं, अत-१३५१
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चतुर्थ अध्याय श्राधारब्राह्मण शतपथब्राह्मण एवच यह आधार ‘ उत्तराधार ' कहलाया है । उत्तरादिक देवताओं की है, तव देवानुगत पूर्वाधार आह्व-नीय के उत्तर भूप्रदेश में बैठ कर आहवनीयाग्नि के उत्तर भाग में सम्पन्न होता है एवं दक्षिणादि पितरों की है, अतएव पित्र्यनुगत उत्तराचार ग्राहवनीय के दक्षिण भूप्रदेश में खड़े होकर आहवनीयाग्नि के दक्षिण भाग में सम्पन्न होता है । दोनों आधारों से अग्नीषोमात्मक पूर्ण यज्ञमण्डल का संग्रह हो जाता है । उत्तरापार का सम्पादन दक्षिण में बड़े लड़े होता है, इस सम्बन्ध में एक उपपत्ति और बतलाई आती है । भीमस्वर्गव्यवस्थात्मक देवयुग में जब जब भी भीमदेवता वैव - पशमं का वितान करते थे, तत्र तत्र ही दक्षिण अफ्रिका में निवास करने वाले भीम - मनुष्यविध - असुर दक्षिण भूप्रदेश से आकर यज्ञ पर आक्रमण किया करते थे । दक्षिणदिगनुगत इस असुराक्रमण से आरा पाने के लिए देवताओंने दक्षिण सीमा पर खड़ा पहिरा नियुक्त कर दिया था । इही भीम - देवताओंसे भारतीय द्विजातिवर्गने यज्ञविद्या प्राप्त की । फलतः ' देवा-ननुविधा वै मनुष्याः ' इस नियम के अनुसार इह्नोंनें भी अपने यज्ञ में दक्षिणदिगनुगत कर्म्म को खड़े खड़े ही करना अर्थ माना । ऐतिह्य कारणातिरिक्त तिष्ठन् रूपेण उत्तराधार करने की वैज्ञानिक उपपत्ति भी है एवं वही प्रधान है । भूपिण्ड का उत्तर प्रदेश ज्योतिर्म्मय स्कम्भ के वितान से देवप्राणप्रधान है । उत्तरानुगत स्कम्भप्रदेशोपल-क्षित सम्बत्सरचक्र ही देवताओं की देवयजन भूमि है, यज्ञश्तिान- प्रदेश है । अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्र -मादि प्राणात्मक विपत्विजों के हौत्राद कम्मों से इस देवयजनभूमि में सम्वत्सरयज्ञ का वितान होता रहता है । भूपिण्ड का दक्षिणप्रदेश तमोमयी शनैश्चरकदा के सम्बन्ध से असुरप्राण - प्रधान है । इस दक्षिणदिग-नुगत असुरप्राण का उत्तरानुगत प्राणदेवपशभूमि पर सतत आक्रमण होता रहता है । साथ ही दक्षिगाथ अग्नि-सहयोगी ज्योतिर्मय इन्द्र के सम्बन्ध से यह आक्रमण व्यर्थ भी होता रहता है । सम्वत्सरयज्ञोपलक्षित देवमण्डल इसप्रकार तिष्ठन् रूपेण उपस्थित इन्द्र के द्वारा असुराक्रमण से बचा रहता है । प्राकृतिक यज्ञ में दक्षिण - दिशा में यज्ञरक्षक इन्द्र खड़े रहते हैं, इस स्थिति का उत्तरायणकाल से ही सम्बन्ध है । दक्षिणगोल में उत्तरायण होता है, एवं उत्तरगोल में दक्षिणायन होता है उत्तरायण कालोपक्रम में सूर्य दक्षिण - परमक्रान्ति से उत्तर की ओर अपना रुख कर लेता है । सूर्य्य इन्द्रप्राणात्मक है । इसका उत्तर की ओर अपना रुख करना हीं खड़ा होना है । वहीं देवयजनकालोपन है और इन्द्रप्राण के सम्बन्ध से दक्षिणगोलस्थ असुंरप्राण का आक्रमण व्यर्थ चला जाता है, फलतः उत्तरायणानुगत दिव्ययज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न होजाता है । वैधश प्रकृत में इस दक्षिणस्थ असुरप्राण के समावेश से त्राण पाने के लिए ही यशवेदि प्रथम तो प्राक्वा बनाई जाती है, अथवा तो उदकपणा बनाई जाती है, जैसा कि पूर्व के ' वेदिब्राह्मण ' में विस्तार से बतलाया जाचुका है 1 क्योंकि प्रकृतिवत् इस मानुष यज्ञाग्नि में भी दक्षिणस्थ असुरप्राणाक्रमण स्वाभाविक है, अतएव इस ओर खड़े होकर ही उत्तराधार किया जाता है । खड़ा होना वीर्योत्कर्ष का ही सूचक है । * जहाँ आज ' स्वेज ' नहर है, पुरायुग में यहाँ भूप्रदेश था । इसी मार्ग से असुरत्रिकी में रहने वाले भीम - असुर भीम देवताओं के यश पर आक्रमण किया करते थे । I
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चतुर्थ - अध्याय श्राघारवाला प्रथमकाण्ड ' उच्छ्रितमित्र हि वीयम् ' श्रुति का यह वाक्य बड़ा महत्त्व रखता है । लोकदृष्टि से भी इस सिद्धान्त का पूर्व महत्त्व है । आलस्यनिमग्न, शयालु मनुष्यों का स्वाभाविक वीर्य्यं कालान्तर में मूच्छित होजाता है, उत्साह मन्द होजाता है, एवं निरालस, उत्तिष्ठन्, पुरुषार्थी ही वीर्य्यसम्पत्ति से युक्त रहता | ' सेना ' इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । प्रत्येक सैनिक को यह आदेश मिलता है कि, वह अपने रक्षाकर्म में तन कर ही खड़ा रहे । तन कर खड़े रहने से मंरुदण्ड का स्वस्तिक की ओर लम्बन होजाता है, हृदयावच्छिन्न ऊर्ध्व - श्रधः बितत नाड़ियाँ ऋजुभाव में परिगति होती हुई रक्तादि के सञ्चार से वीर्य्यवती बन जातीं हैं । इस-प्रकार उच्छितभाव प्रत्येक दशा में वीर्य्याधायक बना रहता है । सैनिक तन कर चलते हैं, तन कर रक्षास्थानों में पहिरा देते हैं । सचमुच शरीरयष्टि का यह तनाव उक्त श्रतसिद्धान्त ** के अनुसार वीर्य्य का ही प्रवर्तक है, जिसे हमने भुला दिया है । यहाँ वही सैनिकानुगत रक्षाकर्म्म अभीष्ट है । रक्षाकर्म वीर्य्यसापेक्ष है, वीर्य्यसञ्चार उच्छ्रितभावानुगति पर ही निर्भर है । अतएव वागनुगत उत्तराघार तिष्टन् रूपेणैव किया जाता है । तिष्ठनुरूप से, तथा श्राज्याहुति से अतिशयरूपेण प्रज्ज्वलित श्राहवनीयाग्नि से उभयथा दक्षिणस्थ असुरा-क्रमण का भय निवृत्त होजाता है- " तस्माद्दक्षिणत स्तिष्ठन्नाघारयति ” । आहवनीयाग्नि एक है, इसी में दोनों आघाराहुतियाँ हुत होतीं हैं । इसप्रकार ग्राहवनीयाग्नित्त्वेन दोनों श्राघाराहुतियों का प्रदेश समान है । साथ ही काल, स्थिति, एवं अग्निप्रदेश की अपेक्षा से दोनों आहुतियों का परस्पर पार्थक्य है । पूर्वाधाराहुनि पहले दी जाती है, उत्तरप्रदेश में बैट कर दी जाती है, ग्राहवनीयाग्नि के उत्तरभाग में दी जाती है । उत्तराघाराहुति पीछे दी जाती है, दक्षिणप्रदेश में खड़े होकर दी जाती है, श्राह-वनाग्नि के दक्षिण भाग में दी जाती है । इसप्रकार आहवनीयाग्नित्वेन जहाँ दोनों समान हैं, वहाँ दक्षिणो-त्तरप्रदेशवादिरूपेण दोनों भिन्न भिन्न हैं । इन समान, तथा नाना, दोनों भावों के संग्रह के लिए ही ऐसा किया जाता है । कारण यही है कि, पूर्वाधारानुगत मनःपर्व का, तथा उत्तराधारानुगत वाकूपर्व का, दोनों का स्वरूपात्रस्थान समान रहता हुआ पृथक पृथक ही है । मन, तथा वाक्का समानत्त्व इसी से सिद्ध है कि, बलग्रन्थितारतम्य से रसबलसममात्रावन्छित्र उसी मन में जब बलमात्रा का यतकिञ्चित् उद्रोंक होता है, तो वही मन ' प्राण ' रूप में परिणत होजाता है । बल-मात्रा के पूर्णोद्रेक से वही मन वागूरूप में परिणत होजाता है । इसी आधार पर तो हृदयावच्छिन्न मनोमय श्रनिरुक्त प्रजापति को पूर्व में प्राण - वाग्गर्भित बतलाया गया है । मानस प्रत्यय में भी परावागनुगता उपांशुवाक् का अवश्यमेव समावेश रहता है, जैसा कि " न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते " इत्यादि हरि-' उच्छ्रितमिव हि वीर्य्यम् ' के अनुसार रक्षादि, तथा पुरुषार्थसाधनादि कम्मों के अनुगामी को तनकर ही खड़ा रहना चाहिए, तन कर ही चलते - फिरते रहना चाहिए । इस ऋषिसम्मता जीवनीया आचार-पद्धति को भावुकतापूर्णा पिन्दमाना- मृद्वी - शिथिलता से जहाँ हमने विस्मृत कर दिया हैं, वहाँ आज की प्रतीच्य-रक्षा - पद्धति में सैनिक सिपाही इसी तनन - पद्धति के अनुगामी बने हुए है, जो पद्धति प्रतीव्यभाषा में सम्मवतः ' अटेन्शन ' नाम से प्रसिद्ध है । १३५.३
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चतुर्थ अध्याय आधारब्राह्मण शतपथब्राह्मण सिद्धान्त ÷ से प्रमाणित है । प्रत्येक मानस व्यापार ( संकल्प ) में उपशुवाक् निहित है । एवमेव प्रत्येक वाग्व्यापार ( शब्दप्रयोग ) में मानसज्ञान आधार बन रहा है । इसी ज्ञानीय प्रज्ञेन्द्र से वविभागानुगता अर्थनिष्पत्ति होती है । मन से वञ्चिता वागू अलग्लाग है, स्बलितवाक् है, निरर्थकवाक् है, अवाक् - रूपा वाक् है । विशुद्ध मानस व्यापार में उपांशुवाक् के समन्वय से, तथा विशुद्ध वाग्व्यापर में आलम्बनत्त्वेन मन के समन्वय से दोनों का समानत्त्व [ समानक्षेत्राश्रयत्त्व ] भलीभांति सिद्ध होजाता है । इसी समानता - संपत्ति संग्रह के लिए समान क्षेत्ररूप एक ही आहवनीयाग्नि में मनोऽनुगत पूर्वाधार की, तथा वागनुगत उत्तराघार की, दोनों को आहुति जाती है । यदि मनोवाक् समान हैं, तो दोनों के लिए दो आधार क्यों किए जाते हैं? इस प्रश्न का निराकरण दोनों का स्वरूपमेद [ जातिभेद ] है । मन हृदयावच्छिन्न अनिरुक्त तत्त्व है, तो वाक् परिध्यवच्छिन्न निरुक्त तत्त्व है । एक [ मन ] अनद्धा है, देवप्राणानुगत है । एक [ वाक् ] श्रद्धा है, पितृप्राणानुगत है । इस जातिभेद से दोनों ममा-नक्षेत्रानुगामी रहते हुए भी विभिन्न स्थानानुगत हैं, पूर्वापरमावानुगत हैं । इसी नाना - मम्पत्तिसंग्रह के लिए विभिन्न स्थानानुगतिरूप उत्तर - दक्षिण प्रदेश में दो आघ. राहुतियाँ दी जाती हैं- " तस्मादिदं मनश्च वाक् च समाममेव, सन्नानेव " । आचारद्वय से सम्बन्ध रखने वाली सभी उपपत्तियों का संक्षेप से दिग्दर्शन करा दिया गया । अत्र पूर्वोक्त स्रुव - स्रु गादियुक्त उपपत्तियों का एक दूसरे दृष्टिकोण से समन्वय किया जाता है । प्रत्येक वस्तु के ' मूल - तूल ' भेद से दो विवर्त्त ' होते हैं । अनिरुक्त हृद्यभाव ही मूलस्थान है, निरुक्त दृश्य पिण्ड ही तूलस्थान है । मूल-स्थान मनःप्रधान होने से ' हृदय ' है, तूलस्थान वाकप्रधान होने से ' शिर ' नाम से व्यवहृत हुआ है । यहाँ हृदयावच्छिन्न मनोऽनुगत पूर्वाधार हृद्य मन के सम्बन्ध से इस यज्ञाग्निलक्षण पुरुष का मूल है, एवं परिध्यव-च्छिन्न वागनुगत उत्तराधार परिधि वच्छिन्ना वाक् के सम्बन्ध से यज्ञ का शिर है । पूर्वाधार मूलस्थान की प्रति-कृति है, तो उत्तराधार तूलस्थानलक्षण शिर की प्रतिकृति है ॥८ ॥
स्रुवपात्र से पूर्वाधार के द्वारा यज्ञपुरुष के मूल का सम्पादन होता है, एवं स्रुक्वात्रद्वयी से उत्तराघार के द्वारा शिरोभाग का सम्पादन होता है । यज्ञमूलानुगत पूर्वाधार तूष्णीं इसलिए होता है कि, हृदयावच्छिन्न अनिरुक्त मनोलक्षण मूलभाग के साथ पराङ्मुखा वाक् का सम्बन्ध नहीं है । यज्ञशिरोऽनुगत उत्तराघार मन्त्रो-च्चारणपूर्वक इसलिए होता है कि, परिध्यवच्छिन्न निरुक्त वागलक्षण शिरोभाग ही वाक्प्रयोग [ शब्दप्रयोग ] का आधार है । यज्ञमूलानुगत पूर्वाधार बैठे बैठे इसलिए किया जाता है कि, हृद्य मनोमन भूल भाग स्व अनिरुक्त भाव से बैठा हुआ सा ही है । यज्ञशिरोऽनुगत उत्तराधार खड़े खड़े इसलिए किया जाता है कि, वाङमय शिरो-भाग स्व निरुक्तभाव से शरीरसंस्था में खड़ हुआ सा ही है । इसप्रकार तुष्णी, मन्त्रेण, आसीन, तिष्टन्, इन व्यापारों से मनोबाकू पर्वों की अनुरूपता ही प्राप्त की जाती है ॥६,१०,११,१२,॥
- न सोऽस्ति प्रत्ययो यो लोके यः शब्दानगमाद्ऋते ।
विज्ञानं सर्व शब्देन भासते ॥
I - हरिः- वाक्यपढ़ी-१३५४
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चतुर्थ अध्याय पारब्राह्मण २ - श्रग्नसम्मान कर्मोपपत्तिः प्रथमकाण्ड आहवानीयाग्नि के उत्तरभूप्रदेश में बैठकर स्रुवपात्र से तूष्णीं आहवनीयाग्नि के उत्तराग्नि - प्रदेश में मनोऽनुगत पूर्वाधार का सम्पादान किया जाता है । इस कम्मं के अनन्तर अग्निसम्माजन - कर्म होता है, जो आग्नीध्र नामक ऋत्विक से सम्बन्ध रखता है । ' समानमेव सन्नानेव ' इस उक्त सिद्धान्त के अनुसार मनः सम्पत्ति भी वाग्गर्भिता बनती हुई उभयात्मिका है, एवं वाक् सम्पत्ति भी मनोगर्भिता बनती हुई उभयात्मिका है | मनोवा का आहवनीयाग्नि में योग करना यज्ञरथ में मनोवाग रूप अश्वों का ही योग करना है | लोक में रथ को सज्जीभूत करने के लिए पहिले रथ के धुर [ जूड़े ] को ऊँचा कर उसे अश्व, किंवा वृषभयुग्म के कन्धों पर डाला जाता है, अनन्तर चर्म्मबन्धन से उन दोनों अश्वों की ग्रीवा को रथ के धुर से दृढ़ता से बाँध दिया जाता है, जिससे कि अश्वयुग्म रथधुर से पृथक् न होजाय । इसप्रकार अश्वयोग में स्कन्धप्रदेश के साथ रथर का योग, तथा चर्म्मपाश से ग्रीवा बन्धन, ये दो कर्म्म अपेक्षित हैं । इह्रीं दोनों कम्मों की सिद्धि के लिए यहाँ पूर्वाधार, तथा तदनन्तर अग्निसम्मार्जनक होता है । मनोऽनुगत पूर्वाधार वागूगर्भित: नता हुआ पूर्वकथनानुसार मनोवागुरूप दोनों अश्वों का संग्राहक बन रहा है । पूर्वाधार करना दोनों अश्वों के साथ रथ-धुर का ही योग करना है || १३ || अनन्तर होने वाला अग्निसम्माजनकम्मे नाश - वन्धन स्थानीय है । सम्मार्जनक घूम - घूम कर होता है, यह पद्धति में स्पष्ट किया जाचुका है । श्राहवनीयाग्नि की तीनों परिधियों से सम्बन्ध रखने वाले परि-चित्रय से संलग्न अग्नियों का ' इष्मसन्नहन ' नामक तृ समुद्दों से भस्मादि अषाकरण के द्वारा प्रज्ज्वलन करना हीं अग्निसम्मार्जनक है । स्कन्धप्रदेश के साथ रथधुर का योग तो एक स्थान से ही होजाता है । परन्तु ग्रीवा -नुगत चर्म्मपाशबन्धन के लिए सारथी को श्त्रों के इतस्ततः घूमना पड़ता है । इस परिक्रमा से ही चर्म-पाश का ठीक ठीक योग होता है । क्योंकि यह सम्मार्जनकम्म पाशबन्धन स्थानीय है, अतएव इस की इतिकर्त्त-व्यता बन्धनानुगता अनुरूपसम्पत्ति प्राप्ति के लिए परिक्रमणरूप से ही पूरी की जाती है । कहा गया है कि, तीन परिधियों का प्रत्येक का तीन - तीन बार सम्मार्ज्जन होता है । इस त्रिस्त्रिवार विहित सम्मार्जनकर्म में एक-एक बार तो मन्त्रप्रयोग होता है, एवं दो - दो बार तूष्णीं परिधिसम्मार्जन होता है । सम्भूय ६ बार परिधि - सम्मा-र्जन होजाता है | ६ संख्या त्रिवृतस्तोम की संग्राहिका है । यज्ञ की मूलप्रतिष्टा श्रग्नितत्त्व ही माना गया है, जैसा कि – “ अग्निरु वै यज्ञः " [ शत ० ५ | २ | ३ | ६ | ] इत्यादि श्रुति से प्रमाणित है । अग्नि वायु - श्रादित्यात्मक यज्ञमण्डल तत्त्वतः श्रग्न्यात्मक ही है । अग्नि ही पञ्चदशस्तोमप्रदेश में जाकर तरलरूप में खाता हुआ ' वायु ' कहलाने लगता है, एवं अग्नि ही एकत्रिंशस्तीन वदेश में भुक होकर विरलावस्था में परिणत होता हुआ ' आदित्य ' कहलाने लगता है । इसी आधार पर " अग्निः सर्वा देवता: " [ ताण्ड्यम ० ब्रा ० ६ | ४ | ५ | ] यह निगम प्रतिष्ठित है । इस अग्नि का अपना प्रदेश भूकेन्द्र से आरम्भ कर में अहर्गण पर्यन्त व्याप्त नत्र अहर्गणात्मक त्रिवृत्स्तोमप्रदेश ही है । इसी अग्निमुक्ति से, तथा तत्प्रतिष्ठारूप त्रिवृत्स्तोम के सम्बन्ध से अग्नि यज्ञ ' त्रिवृत ' [ नवपर्यात्मक ] मान लिया गया है । वहीं ग्रग्नियज्ञसम्बत् इस अग्निसम्मान - कर्म से अपेक्षित है । अतएव त्रिवृरूप से ही परिधित्रयानुगत अनि सम्मार्जनकर्म होता है ॥ १४ ॥
परिध्यनुगत अग्निसम्माज्जंन के अनन्तर स्वयं ग्राहवनीय अग्नि का ऊपर से तीन बार तूष्णीं सम्मार्जन और किया है । रथयुग का अश्वयुग्म के स्कन्ध प्रदेश के साथ योग कराने के अनन्तर चर्म्मपाश से श्रीवा— १३५५
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चतुथ अध्याय घारबाह्मण शतपथब्राह्मण बन्धन किया जाता है । इन दोनों कम्मों से जब रथ सजीभूत होजाता है, तो अनन्तर सारथी स्वस्थान में बैठ कर कशाघात करता हुआ ' प्रेहि ' [ चल चल ], ' वह ' [ रथ का बन कर ] इत्यादि प्रेरणात्मक वाक्यों का प्रयोग करता है, रथ चल पड़ता है । उपरिष्टात् होने वाला तूष्णीं भावात्मक यह त्रिवारात्मक आहवनीयाग्नि - सम्मार्ज्जन कशाघातानुगत प्रेरणाकर्म के संग्रह के लिए ही विहित है । पहिले पूर्वाधार, अनन्तर उत्तराधार, दोनों आधारकम्मों के मध्य में अग्नि समार्जन कर्म्म । पूर्वा-घारकर्म्म थुरयोगस्थानीय, परिधिसम्मार्जनकर्म्म चपाशबन्धनस्थानी, एवं श्राहवनीयाग्निसम्मानकर्म्म कशाचातानुगत प्रेरणा कर्म - स्थानीय । अत्र इस सम्बन्ध में केवल यही प्रश्न बच जाता है कि, दोनों आघारों के मध्य में श्रग्निसम्माज्जनकर्म क्यों किया जाता है? । इसी प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि, पूर्वाधार मनः स्थानीय है, एवं उत्तराधार बाकस्थानीय है । दोनों यद्यपि गर्भीभाव से समान है, तथापि स्वरूप से दोनों पृथक - पृथक हैं । इस पार्थक्य - सम्पत्ति - संग्रह के लिए ही मनोऽगत पूर्वाधार, तथा वागनुगत उत्तराधार, दोनों के मध्य में अग्निसम्मार्जनकर्म किया जाता है । यही अग्निसम्मान--कर्म की संक्षिप्ता उपपत्ति है, जिसका ब्राह्मण की १३, १४, १५, इन तीन कण्डिकाओं से स्पष्टीकरण हुआ है ॥ १५ ॥
पूर्वाधार कर्म्मसमाप्त चौथे अध्याय में चौथा, तथा तीसरे प्रपाठक में ६ ठा ब्राह्मण समाप्त तीसरा प्रपाठक समाप्त —३— १३५१
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चतुर्थ अध्याय श्राघारब्राह्मण प्रथमकाण्ड चौथे अध्याय में पाँचवाँ एवं चौथे प्रपाठक में पहिला ब्राह्मण उपक्रान्त द्विब्राह्मणानुगत - द्वितीय ब्राह्मण ३ – उत्तराघारकम्र्मेतिकर्त्तव्यतोपपत्तिः दक्षिण दिशा से उत्तर दिशा की ओर अपनी गति रखने वाला ऋताग्नि तथा उत्तरदिशा से दक्षिण दिशा की ओर अपनी गति रखने वाला ऋतसोम, दोनों का परस्पर अन्तर्थ्याम - सम्बन्ध होता है । ऋताग्नि, ऋतसोम, के सम्बन्ध से अग्निसोममयी वसन्तादि ऋतुओं का प्रादुर्भाव होता है । ऋतु से ही प्राकृतिक नित्य सम्बत्सरयज्ञ की स्वरूपनिष्पत्ति होती है । सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप - निर्माण ऋतुसमन्वय पर ही निर्भर है, ऋतुस्वरूपाविर्भाव ऋताग्नि - सोम समन्वय पर ही निर्भर है । एवं यह सम-न्वय गतिधर्मा वायु पर ही निर्भर है । न स्वयं अग्नि में गति है, न सोम में गति है । गतिधर्म्मा है -एकमात्र वायु । इस वायु के व्यापार से ही सूर्य से प्रवृक्त दक्षिणस्थ अग्नि उत्तर की ओर जाता है, एवं चन्द्रमा से प्रवृत उत्तरस्थ सोम दक्षिण की ओर आता है । इसप्रकार वायु के व्यापार से ही दोनों ऋतभावों का समन्वय होता है, एवं इसी समन्वय से अनिमोममय ऋतुभाव का जन्म होता है । यही वायु-तत्त्व इस प्राकृति ऋतुयज्ञ ( ऋतुसमष्टिलक्षण सम्वत्सरयज्ञ ) का स्वरूप- सम्पादक हैं, जिसका गतिधर्म्मा तत्त्वात्मक यजुर्वेद से ही सम्बन्ध है । यजुम्मूर्त्ति वायु ही क्योंकि ऋतुस्वरूप का सम्पादन करते हुए अग्निषोमा-त्मक सम्वत्सरयज्ञ के ( परम्परया ) स्वरूपाधाता हैं, अतएव इनका यह कर्म ऋतुसम्बन्ध से, किंवा ऋता-ग्नि - सोम - सम्बन्ध मे " आविज्य " कहलाया है । ऋत का समन्वय कर देना हीं ' आत्त्विज्य ' कर्म्म है । इसी ऋतात्मक ऋतुसम्बन्ध से वायु ऋत्विक कहलाए हैं । अग्नेय, सौम्य देवताओं का संगमनलक्षण यजन कराने से ही इस ' वायु ' नामक प्राकृतिक अध्वर्यु का यह कर्म्म ' याज्या ' कहलाया है । इसप्रकार प्राकृतिक ऋताग्निसोममय आग्नेय सौम्य देवताओं का श्राविज्यकर्म्म तत्सम देवमूर्ति यजुरात्मक वायुदेवता के द्वारा ही सञ्चालित है । उत्तराघारकर्म्म एकप्रकार का आविज्यकर्म्म हो है । इसी से ग्रग्नीषोमात्मक वैध यज्ञ की स्वरूप--निष्पत्ति होने वाली है । इस देवसम्मिश्रण ( अग्नि - सोम - सम्मिश्रण ) लक्षण प्रार्त्विज्यकर्म्म का सम्पादन यजुर्वेदी श्रध्वर्यु ' करता | देववर्ग की अपेक्षा मनुष्यवर्ग निम्नश्रेणि में प्रतिष्ठित है । उच्च श्रेणिस्थ दो महापुरुषों का सम्बन्ध एक निम्नश्रेणि का व्यक्ति नहीं करा सकता । यदि कराता है, तो यह उसकी घृष्टता है । आज मनुष्य अध्वर्यु को अगत्या इसी घृष्टता का अनुगमन करना पड़ रहा है । उत्तराधार के द्वारा यह आज दोनों देवताओं का प्राविज्य करने वाला है । अपने अगतिकगतिक इस धृष्टतादोष से बचने के लिए ही उत्तराघारलक्षण विज्यकर्म से पहिले ही देवता, तथा पितरों को नमः, एवं स्वधारूप से यह प्रार्थना कर लेता है कि, " यद्यपि मैं एक त्रनुष्य हूँ, निम्नश्रेणि में प्रतिष्ठित हूं, आप देवता हैं, द्य लोक में प्रतिष्ठित हैं । ऐसी स्थिति में आपके संगमनरूप यजन की मुझमें योग्यता नहीं है । तथापि १२५.७
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चतुथ अध्याय आघारब्राह्मण शतपथब्राह्मण आपके ही अनुग्रह से मैं श्राविज्यकर्म करने जा रहा हूं " । धृष्टता - निवृत्पनुगत इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए ही उत्तराघार से पहिले जुहू -- उपभूत् को रख कर इनके पूर्वभाग में ' अञ्जलिनिधान ' किया जाता है । आग्नेयप्राण देवता हैं, एवं सौम्यप्राण पितर हैं । यज्ञ में इह्रीं दोनों का सङ्क्रमन अपेक्षित है । इसी अभिप्राय से - ‘ नमो देवेभ्यः - [ ऋताग्नये ], स्वधा पितृभ्यः [ ऋतसोमाय ] ' यह कहा गया है । भञ्जिलि--पुनेिधान की इसी उपपत्ति को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने कहा है- “ तह वेभ्यश्चैवैतत् पितृभ्यश्चाविज्यं करिष्यन् निहनुते ” । अपराधनिवृत्यनन्तर श्राज्यपूर्ण जुहुनुभृत् को अपने दक्षिण हाथ में उठाता है, साथ ही मन्त्रशक्ति के द्वारा इस ग्राज्य को स्कन्न बनाने की भावना करता है । तात्पर्य्य इस स्कन्नभावना का यही है कि, यदि श्राहवनीय के दक्षिण भाग की ओर आज पूर्ण स्रु पात्रद्वयी को उत्तराधार के लिए ले जाते हुए जुहू से आाज्यमात्रा भूमि पर गिर जायगी, तो यज्ञ की अविच्छिन्ना धारा टूट जायगो । जूहू — स्थित श्राज्य देवयज्ञ - वितान के लिए ही नियत है । इस आाज्य का कम्पित होजाना यज्ञपुरुष का ही कम्पित होजाना है, एवं नीचे गिर जाना यज्ञसन्तान का ही विच्छिन्न होजाना है । साथ ही यह भूमिष्ठ आज्यभाग शत्रुसमृद्धि का भी कारण बन जाता है । क्योंकि " य " यज्ञस्यातिरिक्तं तद्भ्रातृत्र्यम् ” इस निगम के अनुसार यज्ञोपयोग से वहिर्भूत यज्ञिय द्रव्य यज्ञकर्त्ता यजमान के शत्रु का ही पोषक माना गया है । न च यज्ञस्वरूपविघातकः कम्पन, विच्युति, आदि दोषों से बचने के लिए श्रध्वर्यु ' को बड़ी सावधानी से ही श्राज्यपूर्ण स्रुक् को दक्षिण की ओर ले जाना चाहिए । जिससे न तो आज्य में कम्पन ही हो, एवं न श्राज्यमात्रा भूमि पर ही गिरे । दक्षिणभाग असुरप्राणाक्रान्त है । अतएव इस आज्यरक्षा के लिए ही यह विशेष विधान हुआ है ॥ १ ॥
उत्तराघार के लिए नियत सञ्चरमार्ग से अध्वर्यु को यज्ञात्मक ग्राहवनीययाग्नि के दक्षिण भूप्रदेश की ओर आना पड़ता है । श्राहवनीयाग्नि साक्षात् बज्ञपुरुष है, विष्णु है । इसका अतिक्रमण करना भी एकप्रकार की धृष्टता ही है । साथ ही यज्ञ से अपने आपको पृथक् करना भी है । दक्षिणभाग यज्ञिय है, यहाँ आना यज्ञसम्बन्ध को तोड़ना है, पूर्व से दक्षिण की ओर श्रावा इसका अतिक्रमण करना है । इन दोनों दोत्रों से बचने के लिए -- " अङित्रणा विष्णो मा त्वाऽवक्रमिषम् " मन्त्र बोलता हुआ ही दक्षिण की ओर गमन करता है | मन्त्र का भाव यही है कि, मैं अवज्ञा से यज्ञ का अतिक्रमण नहीं कर रहा, आपेतु यज्ञस्वरूपनिर्माण के लिए ही तुझे अगत्या दक्षिण की ओर जाना पड़ता है " । उत्तरभाग सौरज्योति के सम्बन्ध से ज्योतिर्म्मय है, एवं दक्षिणभाग असुरप्राण के सम्बन्ध से छायामय है । छायामय खासुर भूप्रदेश यज्ञस्वरूप का विघातक है । आाज उत्तराघार के लिए अध्वर्यु ' को अगत्या इस प्रदेश में आना पड़ रहा है । इस छायामय श्रासुरभाव की निवृत्ति के लिए ही “ वसुमतीमग्ने ते छायामुप-स्थेषम् ” इस मन्त्रबल का आश्रय लिया जाता है । प्रदेश छायामय अवश्य है, परन्तु यही छायामय प्रदेश उत्तराधार के द्वारा अग्नि - सम्बन्धी वसु ( सम्पत् ) का जापक है, यज्ञसाधक है । हम आसुरप्रदेशात्मक छायामव भाग में नहीं जारहे, अपितु ग्राहवनीयाग्नि- लक्षण यज्ञमण्डल की ही छत्रच्छाया में ( आश्रम में ) जारहे हैं । अत्रगमन से ही यज्ञैमिद्धिलक्षणा सम्पत् की प्राप्ति होगी । इस कथन से असुरभाब का निराकरण करता है, एवं वसुभाव का स्थापन करता है ॥ २ ॥
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चतुर्थ अध्याय श्राघारब्राह्मण प्रथमकाण्ड छायामय असुरभाव की प्रात्यन्तिक निवृत्ति के लिए ही आगे जाकर – ' " विष्णोः स्थानमसि " इस मन्त्रभाग का उच्चारण विहित है । कौन कहता है कि, यह भूप्रदेश आसुर है १ । वह तो यज्ञमूत्तिं विष्णु का आवास - स्थान है । वहाँ खड़े होना तो यज्ञसान्निध्य में हीं खड़ा होना है । यह यही स्थान है, जहाँ पर खड़े हो -कर सौर इन्द्र दक्षिणस्थ सुरप्राण का विनाश किया करते हैं । यह वही सुरक्षित स्थान है, जहाँ पर खड़े हुए इन्द्र की रक्षा में देवताओं का सम्वत्सस्यज्ञ सम्वत्सर - त्रिलोकी में वितत हुआ है । इसप्रकार यज्ञात्मक, अतएव विष्णुरूप आहवनीयाग्निज्ज्वाला की सीमा के सान्निध्य से, एवं दक्षिणस्थ इन्द्रप्राण के समावेश से यह नियत दक्षिण भूप्रदेश सर्वथा निरुपद्रव, यशिय, एवं यज्ञस्वरूपसम्पादक ही बन रहा है । ' इत इन्द्रो वीर्यमकृणोत् ० ' इत्यादि मन्त्रभाग दक्षिण भूप्रदेश की इस महत्ता का ही संग्राहक बन रहा है ॥ ३ ॥
आहुतिकाल उपस्थित होगया है । अतएव आहुतिग्राहक आहवनीयाग्नि में आहुति का उत्तरदायित्त्व डालने के अभिप्राय से कहा जाता है कि, हे आहवनीयाग्ने! श्राप ही इस यज्ञ के होता हैं, एवं आप ही इस यज्ञ के दूत हैं । हुत आाज्यद्रव्य का स्वसीमा में प्रतिष्ठित प्राणदेवताओं में आाधान करना भी आप ही का काम है, आहुतिद्रव्य ग्रहण के लिए द्युलोकस्थ देवताओं का यहाँ आह्वान करना भी आप ही का काम है, एवं गृहीताज्य । हुति - देवताओं के द्वारा यजमानात्मा को द्युलोकस्थ देवप्राणाकर्षण से युक्त करना भी आप का ही काम है । आहुति देना मात्र मेरा काम, शेष सम्पूर्ण उत्तरदायित्त्व आप पर निर्भर, यही निष्कर्ष है । आहुतिग्रहण करने के अनन्तर समिद्ध श्राहवनीयाग्नि- ' अतन्द्रो हव्यं बहसि हविष्कृत्- आदिद्दे वेषु राजसि ' [ऋकू ०८६०/१५ । ] इत्यादि मन्त्रवर्णन के अनुसार प्राणरूप से इस आहुतिद्रव्य को गभींभूत बना कर अग्नि हीं इस पृथिवीलोक से द्युलोक में ले जाते हैं । द्यावापृथिवीरूप वाङमय वषट्कार- सीमा से सुरक्षित हो-कर ही यह आग्नेयप्राण ऊर्ध्वगमन करता है । साथ ही यही अग्नितत्त्व इसी यज्ञ के द्वारा द्यावापृथिवी का भी स्वरूप रक्षक बन रहा है । आत्मा शरीर का रक्षक है, तो शरीर श्रात्मा का रक्षक है । अग्नि आत्मा है, द्यावापृथिवी शरीर है । दोनों परस्पर एक दूसरे के स्वरूपरक्षक बन रहे हैं । प्रदत्त - आहुति अग्नि के द्वारा निर्विघ्न पृथिवी से द्युलोक की ओर चली जाय, - ' श्रवतां त्वां द्यावा ' इत्यादि मन्त्रभाग का यही निष्कर्ष है । सर्वान्त में— ' स्विटुकड़े वेभ्य इन्द्र आज्येन हविपाभूत् स्वाहा ' इभ मन्त्रशेष का उच्चारण कर स्वाहा के साथ जुहू से उत्तराधार - ग्राहुति दे दी जाती है । आहुति दी जाती है -- यद्यपि आहवनीयाग्नि में हीं, तथापि लक्ष्य है इस आहुति का लोक की अवाप्ति । एकविंशस्तोमावच्छिन्न द्युलोक में इन्द्र का सामाज्य है । भूकेन्द्र से २५ वितत यज्ञ के अन्त में इन्द्र प्रतिष्ठित पर्य्यन्त हैं, अतएव इहें यज्ञपति कहा जाता है । यज्ञपति की तुष्टि ही यज्ञस्वरूप की निष्पत्ति का अन्तमम द्वार है । श्रुतएव वागुद्द े श्येन कृत उत्तराघार का इन्द्र से सम्बन्ध मान लिया गया है । इसके अतिरिक्त यही इन्द्र एक दूसरे दृष्टिकोण से वाक्तत्त्व का भी संग्राहक बन रहा है । वागिन्द्रियलक्षण वाक्तत्त्व ( शब्दपञ्च ) की मूल -प्रतिष्ठा कायाग्नियुक्त आध्यात्मिक वायु है । " वायुः खात्, शब्दस्तत " इत्यादि प्रातिशाख्य- सिद्धान्त के अनुसार वायु ही शब्दात्मका वाक़ का प्रवर्तक है । यदि वाक् में केवल वायु का ही समावेश होता, तत्र तो पशुवाग्वत् मानुषीवाक् में केवल अविच्छिन्ना ध्वनि ही उपलब्ध होत । मानुषीवाक् में व - शब्द - पद- वाक्यादि की भी व्यवस्थित विभक्तियाँ हैं । यह १३५६