Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1091–1100
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1091–1100
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चतुर्थ अध्याय आधारब्राह्मण शतपथब्राह्मण विभक्तिभाव ही बाकू का विभक्तिकरणलक्षण व्याकरण है, एवं ज्ञानमूर्ति प्राज्ञ इन्द्र ही इस व्याकरण के प्रवर्त्तक हैं । इसप्रकार वायुवन् इन्द्र का भी वाक्तत्त्व में समावेश सिद्ध होजाता है । अतएव ‘ बाक् ' को ‘ इन्द्र ' माना जासकता है । अधिदैवत में बाकू आकाश है, यही इन्द्र है | इन्द्रात्मक आकाश ( वाक् ) ही चलग्रन्थितारतम्य से पञ्चमहाभूतरूप में परिणित हुआ है । इन्द्र ज्योति का अधिष्ठाता है, एवं ज्योति ही इन्द्र है | वाक् ( शब्द ) व्यापार इसी इन्द्र के द्वारा ज्योति ( ज्ञान ) का उद्बोधक बनता पञ्चप्रकृति के अनुसार सौरमण्डल वाङ् मय है, यहीं इन्द्र प्रतिष्ठित । इसप्रकार अनेक दृष्टियों से वाक्, तथा इन्द्र का अविनाभाव सिद्ध हो रहा है । इसी आधार पर - " इन्द्रो वागित्याहुः ' ं यह निगम प्रतिष्ठित हैं । अतएव वागनुगत उत्तराधाराहुति - साधक मन्त्र में इन्द्र को उद्देश्य मान लिया गया है ॥ ४ ॥
पूर्वाह्मण में यह स्पष्ट किया गया है कि, पूर्वाधार इस यज्ञपुरुष का मूलस्थानीय हृदय है, एवं उत्त-रावार तूलस्थानोय शिरोभाग है । अशे आत्मभाग ( ' चत्वारः आत्मा ' से सङ्कतित मध्याङ्ग -शरीर ) रह जाता है । जिसप्रकार आत्मभाग- ( धड़ ) –स्थ [ उदरस्थ ] रस से सम्पूर्ण श्राध्यात्मिक यज्ञ का पोषण होता है, एवमेव रसात्मक ग्राज्य से परिपूर्ण ध्रुवापात्र के रस [ श्राज्य ] से सम्पूर्ण वैध यज्ञ की इतिकर्त्तर्व्यता पूरी होती है । इसी समानता से ध्रुवापात्र को इस यज्ञ - पुरुष का ' आत्मा ' कहा गया है । बिना शिर के आत्मा [ धड़ ] अपूर्ण है, मर्त्य है । इसकी इस अपूर्णता को दूर करने के लिए ही उत्तराधारानन्तर जुहू में शेष बचे श्राज्य का [ जुहू को उपभृत् से पृथक रखते हुए ] ध्रुवा के साथ योग कराया जाता है । उत्तराघारशेषांश शिरःम्थानीय है, ध्रुवा श्रात्मस्थानीय है । शेषांश का ध्रुवा से योग कराना श्रात्मा [ धड़ ] में शिरोभाग स्थापित करते हुए यज्ञ - पुरुष को पूर्णाङ्ग ही बनाना है । " चत्वार आत्मा, द्वौ पक्षौ, पुच्छं प्रतिष्ठा " [ शत ० ६ | १ | १ | ६ | ] इत्यादि श्रौत सिद्धान्त के अनुसार चार मर्त्य प्राणों से घड़ [ मध्याङ्ग ] का, एक मर्त्यप्राण से दक्षिणहस्तपादरूप दक्षिणपक्ष का, एक मर्त्यप्राण से वामहस्तपादरूप वामपक्ष का एवं एक मत्यप्राण से मेरुदण्डमूलानुगता प्रतिष्ठात्मिका त्रिकास्थि से सम्बद्ध प्रतिष्टाभाव का निम्माण होता है । इसप्रकार सप्तपुरुष - पुरुषात्मक चित्याग्नि से शिरो-विरहित शेष सम्पूर्ण शरीर की चिति होती है । इन सातों मर्त्य पुरुषों [ प्राणों ] का ऊर्ध्व विदूहन होता है । सातों के मन्थन से समुद्भूत दधिमन्थनोत्थ श्राज्य - स्थानीय सारभाग ही ' श्री ' भाग है । यही सप्त अमृतप्राणात्मक श्रीभाग मस्तक का स्वरूप निर्मापक बनता है । इसी ' श्री ' के सम्बन्ध से मस्तकप्रदेश ' शिरः ' कहलाया है । सम्पूर्ण शरीर में इसी श्री के सम्बन्ध से शिरोभाग श्रेष्ठ माना गया है । इसी आधार पर जिस लोकसंस्था में जो श्रेष्ट ' मुखिया ] होता है, वही उस संस्था का ' शिर ' कहलाया है । श्रात्मरूप मर्त्यभाग [ ध्रुवा ] में इसी ' शिरोरूप श्रीभाग ' ( उत्तराघार - शेषांत्ररूप आाज्यभाग ) को
प्रतिष्ठित किया जाता है । यही समञ्जन की दूसरी उपपत्ति है ॥ ५ ॥
ममञ्जनक के सम्बन्ध में एक प्रश्न शेष रह जाता है । जुहू को उपभृत् से पृथक रखते हुए ही क्यों जुहृस्थित आज्य का ध्रुवा से सम्बन्ध कराया जाय? इस प्रश्न का उत्तर उपभृत् के नैदानिक स्वरूप से सम्बन्ध रखता है । ध्रुवापात्र निदानेन यज्ञकर्त्ता यजमान की प्रतिकृति है, एवं उपभृत्पात्र निदानेन यजमान के शत्रु की प्रतिकृति है । इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन पूर्व में किया जाचुका है । उपभृत् यजमान के शत्रु का नैदानिकरूप है । ऐसी अवस्था में यदि जुहू के साथ उपभृत् का सम्बन्ध रखते हुए यजमानस्थानीय १३६०
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चतुर्थ अध्याय श्राधारखाहारण प्रथमकाण्ड ध्रुवा से प्राज्य- समञ्जन कराया जायगा, तो यजमान के शत्रु में भी श्री का स्थापन हो जागया । केवल यजमान ही श्री से युक्त रहे, इस उद्देश्य से केवल जुहू से ही ( उपभृत् को जुह से सर्वथा पृथक् रखते हुए ही ) समञ्जनकर्म किया जाता है ॥ ६ ॥
ध्रुवापात्र आत्मस्थानीय है, एवं जुहृस्थित श्राज्यशेषांश शिरः स्थानीय है, इस कथन से समञ्जनकर्म्म की आध्यात्मिक – यज्ञानुगता उपपत्ति का स्पष्टीकरण हुआ । अत्र समञ्जन - मन्त्रार्थ के द्वारा श्राधिदै वकयज्ञानुगता उपपत्ति का स्पष्टीकरण किया जाता है । " तस्यासावेव द्यौर्जुहूः, श्रथेदमन्तरिक्षमुपभृत, इयमेत्र ध्रुवा । तद्वाऽश्रस्या एवेमे सर्वे लोकाः प्रभवन्ति । तस्मादु धुवाया एब सर्वो यज्ञः प्रभवति ” ( शत ० १ | | २ ५ | ४ | ) इत्यादि श्रुति के अनुसार आधिदैविक ( त्रैलोक्यात्मक ) पाकृतिक यज्ञ की दृष्टि से निदानेन जुहूपात्र लोकस्थानीय है, एवं ध्रुवापात्र पृथिवीस्थानीय है । यज्ञ के द्वारा पार्थिव आङ्गिरस प्राणदेवताओं का, तथा लोकस्थ सौर सावित्र प्राणदेवताओं का ही परस्पर सम्बन्ध अपेक्षित है । इस सम्बन्ध का अधिष्ठाता मध्यस्थ वह अन्तरिक्ष ही है, जिस में घृतात्मक तेजोरस व्याप्त रहता है । " घृतमन्तरिक्षस्य " ( शत ० ७५ | १ | ३ | ) के अनुसार अन्तरिक्ष श्राज्यरस से परिपूर्ण है । इसी श्राज्यरससे भुवारूप पृथिवीलोक में प्रतिष्टित अङ्गिराज्योति - ( रूपज्योति ) - मंय पार्थिवदेवताओं का, तथा जुहूरूप द्युलोक में प्रतिष्ठित सावित्रज्योति - ( स्वज्योति ) - मय दिव्य देवताओं का परस्पर सम्बन्ध होरहा है । जुहूस्थित श्राज्य का ध्रुवास्थित आाज्य से सम्बन्ध कराना द्युलोकस्थ ज्योतिर्मय देवताओं का पार्थिव ज्योतिर्मय देवताओं के साथ सम्बन्ध कराते हुए देवसङ्गमन लक्षण यज्ञस्वरूप का ही सम्पादन करना है । इसी आधिदैविक - उपपत्ति को लक्ष्य में रख कर श्रुति ने कहा है - " ते ह्येतदुभे ज्योतिषी सङ्गच्छेते । तस्मादेवं समनक्ति " । ७ ॥ पूर्वाधार मनःसम्पत्ति का संग्राहक है, एवं उत्तराघार वाक्सम्पत्ति का संग्राहक है । मनोऽनुगत पूर्वाधार तूष्णीं ( उपांशु रूपेण ) किया जाता है, एवं वागनुगत उत्तराधार मन्त्रपूर्वक ( निरुक्तरूपेण ) किया जाता है । तूष्णीं, मन्त्रेण, की उपपत्तियाँ पूर्व में बतलाई जाचुकीं हैं । अत्र मनोऽनुगत पूर्वाधार से सम्बन्ध रखने वाले तृष्णींभाव की एक अन्य उपपत्ति बतलाने के लिए, साथ ही प्रसङ्गोपात बाङमय त्रिप्राण के स्वरूप - विश्ले-ण के लिए एक वैज्ञानिक आख्यान उपस्थित होरहा है । " मन, और वाक्, दोनों में ' अहंभद्र ' को लेकर विवाद चल पड़ा । वाक् कहने लगी- मैं बड़ी हूँ, मन कहने लगा- मैं बड़ा हूँ । वागपेक्षया अपना श्रेष्ठत्त्व स्थापित करता हुआ मन कहने लगा कि, मेरे संकल्पित - भावित - अर्थों के अनुरूप ही तुझे चलना पड़ता है । मनोऽपेक्षया अपना श्रेष्ठत्व स्थापित करती हुई वाक् कहने लगी कि, तेरे संकल्प को मैं ह्रीं बाह्यरूप प्रदान करती हूँ । दोनों अपने इस विवाद को लेकर प्रजापति की सेवा में उपस्थित हुए । प्रजापति ने मन का पक्ष ग्रहण करते हुए यही निर्णय किया कि, ' तुम दोनों में मन ही श्रेष्ठ है ' । प्रजापति के इस निर्णय से बाकू का दर्पदलन होगया, उसका अभिमान विदीर्ण होगया । परिणामत: इस अपमान से खिन्न होने वाली वाक् ने यह कह डाला कि, ' हे प्रजापते! आपने मुझे मन से छोटा बतलाया है, अतएव आज से मैं आपके लिए हविद्रव्य का बहन नहीं करूँगी । " १३६१
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चतुथ अध्याय श्राचारब्राह्मण शतपथब्राह्मण उक्त आाख्यान से मन, तथा वाक् के स्वाभाविक स्वरूपों का ही विश्लेषण हुआ है । प्राणवाग्गर्भित मनोमय प्रजापति हृदय में प्रतिष्ठित है । यहाँ से - " आत्मा बुद्धया समेत्यर्थान मनो युङ को विवक्षया " इत्यादि शिक्षा - सिद्धान्त के अनुसार वायु के सहयोग से वर्णात्मिका ( शब्दात्मिका ) वैखरीवाक् का उद्गम होता है, जैसा कि पूर्व के सामिधेनी - ब्राह्मण में हिङ्कारानुगत - नाद - श्र ति - स्त्ररूप - विश्लेषणात्मक्र सन्दर्भ में विस्तार से बतलाया जाचुका है । मानस ज्ञान ही इस बवाकू का आधार बनता है । मानस ज्ञान के अनुरूप ही वस्वरूप की निष्पत्ति होती है । फलतः मन इसका जनक है, वाक् इसकी पुत्री है । यही कारण है कि, सुयवस्था में जब मन विज्ञानात्मा ( बुद्ध ) के साथ मिल कर पुरीतति नाड़ी में चला जाता है, तो वाग्व्यापार अवरुद्ध होजाता है । मन को आलम्बन बनाए बिना वाग्व्यापार असम्भव है । उधर मन बिना वाक् के ( अनुष्टुप् - वागलक्षणा वैम्बरीवाक् के ) सहयोग के त्रिना भी ( परावाकू के सहयोग से ) व्यापार ( संकल्प ) सञ्चालन में समर्थन होजाता है । इह्रीं कतिपय कारणों से निश्चित है कि, मन - वाक् इन दोनों में वागपेक्षया मन ही ज्येष्ठ, तथा श्रेष्ठ है । " प्रजापति ने यह निर्णय किया " इस कथन का यही तात्पर्य है कि, मन की श्रेष्ठता का कारण उसका हृदयावच्छिन्न प्राजापत्य - धर्म ही है । परिधि, हृदय, दोनों में हृदय ही परिधि का मूलाधार, एवं प्रथम अबतक है । ' तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा " * के अनुसार हृदयावच्छिन्न मनोमय अनिरुक्तत्रजापति ही वाङमय बहिर्म्मण्डल का प्रवर्तक, तथा आधार है । अनुष्टुप् वाक् का हृदय से बाहिर की ओर ही विकास होता है । वाक् की बहिर्गति है । फलतः हृदयावच्छिन्न मनोमय प्रजापति को वाग्व्यापार से कभी हव्य नहीं मिल सकता । कैसा महत्त्वपूर्ण समन्वय है । हमारा जितना भी वागूव्यापार है, वह सत्र केवल बाह्य प्रपञ्च का ही उपोद्बलक है । कभी शब्दजाल से आत्मतुष्टि सम्भव नहीं है । क्योंकि पराङमुख शब्द की अन्तर्मुख हृद्य प्रजापति की ओर गति ही नहीं है । ' नेति नेति ' ही उसकी वास्तविक उपनिषत् है । लोकदृष्टि से भी जो व्यक्ति अपने कर्म्म का वागू के द्वारा बखान करते रहते हैं, निश्वयेन उनका कर्म्म आत्मसम्पत्ति से सर्वथा ही वञ्चित होजाता है । ऐसा कर्म्म निर्बल है । सत्रल - सार्थक - वही कर्म्म माना कायगा, जो आत्मशक्ति से युक्त रहेगा । एवं आत्मशक्ति से बड़ी कम्र्म युक्त रहेगा, जिसमें वाग्व्यापार का अधिकाधिक अभाव रहेगा । वाग्व्यापारसंकोच से मनोबल अधिकाधिक जितना हीं प्रवृद्ध बनेगा, कर्म में उतनी हीं अधिक बलवृद्धि होगी । अतएव कर्म्मसिद्धि के लिए, अपने कर्म को सुदृढ़ - सफल - सत्य बनाने के लिए बिना उसका बखान किए चुपचाप ही कर्म का अनुगमन करना चाहिए । यही कर्मसिद्धि का अन्यतम द्वार है । * प्रजापतिश्चरति गर्भेऽन्तरजायमानो बहुधा विजायते तस्य योनिं परिपश्यन्ति धीरान्तस्मिनूह तस्थौ भुवनानि विश्वा । - यजुः संहिता
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चतुर्थ अध्याय श्राघारब्राह्मण प्रथमकाण्ड पूर्वाधार मनोऽनुगत है, यहाँ वाग्व्यापार प्रकृत्या अवरुद्ध है । तव मनोऽनुतग पूर्वाधार उपांशु ही किया जाता है । न केवल मनोनुगत पूर्वाधार ही, अपितु यज्ञ में जितने भी प्राजापत्य कम्मं विहित हैं, सत्र इसी सिद्धान्त के आधार पर उपांशु ही किए जाते हैं ॥८,६,१०,११,१२ ॥ हृदगाबच्छिन्न मनोमय प्रजापति के लिए वाकू क्यों ' अहत्र्याबाटू ' बनी?, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है । श्रुति ने इसका समाधान यह किया हैं कि, प्रजापति के निर्णय से वाक् का गर्भपात हो गया । अपमानिता बाकू आवेश में आकर यह निश्चय कर डाला कि, मैं प्रजापति के लिए इत्र्यवहन नहीं करूँगी । वाक् के गर्भ का क्या स्वरूप १, अपमान का क्या स्वरूप १, इन प्रश्नों के समाधान के लिए सुप्रसिद्ध धामच्छद अत्रिप्रारण की ओर ही पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । ऋक्साम - तत्त्वों से नित्ययुक्त, ' बन् ' लक्षण • तिमान् प्राण से अनुग्रहीता ' जू ' लक्षणा सत्या वाक् ही यच्चयावत् वाग्विवत्तों की जननी है | इसी वाक से- ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात | वागेव साऽसृज्यत ' ( शत ० ६ | १ | १ | १० ) इत्यादि भीत सिद्धान्त के अनुसार श्रापोमय परमेष्ठी का प्रादुर्भाव होता है । इस परमेष्ठी में उष्ण, शीत, अनुष्णाशीत - मेद से अङ्गिरा ( उष्ण ), भृगु ( शीत ), एवं अत्रि ( श्रनुष्णाशीत ), इन तीन ' मनोता ' नामक तत्त्वों का प्रादुर्भाव होता है । इनमें उष्ण अङ्गिरा देवसृष्टि का शीत भृगु पितृसृष्टि का, एवं अनुष्णाशीत अत्रि भूतसृष्टि का प्रवर्त्तक बनता है । भूतसृधामच्छदा है, स्थाना-वरोधिनी है ( जगह रोकती है ) । यह धामच्छदुधर्म उसी अत्रि का धर्म है । यही बाक का गर्भ है । इसी गर्भ से यह वाकू हृदय की ओर न जाकर बहिम्मंण्डल की ओर अनुगत होती है । मनः -- प्राण - बाङ् मय श्रात्मा में मन ज्ञानात्मक बनता हुआ अधामच्छद है, प्राण क्रियात्मक बनता हुआ अधामच्छद है | परन्तु वाक् अर्थात्मिका बनती हुई धामच्छुदा है । अपने अर्थधम्म से वाक् तमोगुण का प्राधान्य होजाता है । यह तमोभाग ही अत्रिभाग है, जो कि वाक् का प्रातिश्विक वीर्य्य माना गया है । इसी त्रिलक्षण तमोभाग के समावेश से भूतसर्ग प्रवृत्त हुआ है । ऋतुमती स्त्री में वातोलक्षण इसी धामच्छद अत्रिप्राण का समावेश रहता है । अतएव ऋतुमती स्त्री ' आत्रेयी ' कहलाई है । अत्रिभाग तमोगुण प्रधान है, मलीमस है, अतएव रजस्वला स्त्री असच्छूद्रवत अस्पृश्या मानी गई है । श्रुति कहती है कि, जो आत्रेयी स्त्री का स्पर्श करता है, वह पापाभिभूत होजाता है । ' चर्म्मन ' शब्द प्राणीलक्षण चेतन भूतसर्ग के लिए प्रयुक्त हुआ है, एवं ' यस्तिन वा ' वाक्य प्राणलक्षण अचेतन भूतसर्ग के लिये प्रयुक्त हुआ है । चेतन भूत एवं अचेतन भूत भूतात्मक उभयविध धामच्छदसर्ग वागू - गर्भरूप अत्रि से ही समुद्भूत है । प्रकृत में इस अत्रि - मीमांसा से यही निष्कर्ष निकलता है किं, धामच्छद अत्रि के सम्बन्ध से वाक्तत्त्व अर्थप्रधान बनता हुआ बहिर्मुख ही बन जाता है । अर्थातीत हृद्यभाव की ओर इसका अनुगमन अवरुद्ध होजाता है । इसी अर्थमात्रा से इसका आत्मधर्मानुगत स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होरहा है । यही १३६३
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चतुर्थ अध्याय आधारब्राह्मण शतपथब्राह्मण इसका अपमानित होना है । अपमानलक्षणा अर्थगरिमा ही इसे प्राजापत्यानुर्गात से वञ्चित किए हुए है । ' बाकू का प्रजापति की ओर अनुगमन क्यों नहीं होता ' इस प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है || १३ || ( उत्तराधारकर्म्मसमाप्त ) चौथे अध्याय में पाँचवाँ तथा चौथे प्रपाठक में प्रथम ब्राह्मण समाप्त द्विब्राह्मणात्मक - ' आघारब्राह्मण ' समाप्त चौथा अध्याय समाप्त ४ १२६४
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श्रीः इति - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये-मथमकाण्डे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ४
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श्रीः अथ - शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये प्रथमकाण्डे पंचमोऽध्यायः ५
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श्रीः शतपथब्राह्मणविज्ञानमाष्यान्तर्गत -- प्रथमकाण्डे पञ्चमोऽध्यायः ५-अथ - प्रथमकाण्डे पञ्चमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं चतुर्थप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणं उपक्रान्तम् " प्रवरब्राह्मणम् " २१ – प्रवरणकर्म्म १ -- प्रत्ररायाश्रगणम ( मूल ) —स वै श्रवरायाश्रावयति । तद् यत् प्रवरायाश्रावयति - यज्ञो वा श्राश्रा-वणम्, यज्ञमभिव्याहृत्याथ होतारं प्रवृणै - इति । तस्मात्प्रवरायाश्रावयति ॥ १ ॥
स इध्मसन्नहनान्येवाभिपद्य - श्राश्रावयति । स यद् ह अनारम्य यज्ञमध्वर्यु राश्रा-वयेद् - वेपनो वा ह स्याद्, अन्यां वाऽऽर्त्तिमाच्छेत् ॥ २ ॥
तद्ध के वेदेः स्तीर्णायै बहिर भिपद्याश्रावयन्ति, इध्मस्य वा शकलमपच्छिद्याभिप-द्याश्रावयन्ति - ' इदं वै किश्चिद् यज्ञस्य; इदं यज्ञमभिपद्या श्रावयामः ' इति वदन्तः । तदु तथा न कुर्यात् । एतद् वै किञ्चिद् यज्ञस्य - यैरिध्मः सन्नद्धो भवति, अग्निं संमृजन्ति । तदेव खलु यज्ञमभिपद्याश्रावयति, तस्मादिध्मसन्नहनान्येवाभिपद्या श्रावयेत् ॥ ३ ॥
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पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण २ — होतृप्रवरणम् शतपथब्राह्मण स श्राव्य - य एव देवानां होता, समेवाग्रे प्रवृणीते - अग्निमेव । तद् अग्नये चैवेतद् देवेभ्यश्च निह्नुते । यदहाऽग्नि प्रवृणीते - तद् अग्नये निह्नुते, अथ यो देवानां होता, तमग्रे प्रवृणीते, तद् देवेभ्यो निह्नते ॥ ४ ॥
सह- ' अग्निर्देवा दैव्यो होता इति । अग्निर्हि देवानां होता, तस्मादाह ' अग्निर्देवो दैव्यो होते ' ति । तद् अग्नये चैवैतद् देवेभ्यश्च निह्नते । यदहाग्रेऽग्निमाह-तदग्नये निह्नुते । अथ यो देवानां होता, तम् आह तदु देवेभ्यो निह्नुते ॥ ५ ॥
' देवान्यक्ष दिहांश्चिकित्वान् ' इति । एष वै देवाननु विद्वान् - यदग्निः । स एना-ननु विद्वान् - यदग्निः । स एनाननु विद्वान् अनुष्ठया यक्षद् – हत्येर्वैतदाह ॥ ६ ॥
' मनुष्वद् भरतवद् ' इति । मनुर्ह वा अग्र यज्ञेनेजे, तदनकृत्येमाः प्रजा यजन्ते, तस्मादाह- मनुष्वदिति । मनोर्यज्ञः - इत्यु वा आहुः तस्माद्ववाह - मनष्य दिति ॥ ७ ॥
: -भरतवदिति - एप हि देवेभ्यो हव्यं भरति, तस्याद्भरतोऽग्निरित्याहुः । एष उबा इमाः प्रजाः प्राणो भूत्वा विमर्ति, तस्माद्रवाह - भरतादिति ॥ ८ ॥
३ - - श्रार्षेयप्रवरणम् – अथार्षेयं प्रवृणीते । ऋषिभ्यश्व वैनम् - एदद् देवेभ्यश्च निवेदयति- ' श्रयं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापद् ' इति, तस्मादार्षेयं प्रवृणीते ॥ ६ ॥
परस्तादर्वाक् प्रवृणीते । परस्ताद्धि अर्वाच्यः प्रजाः प्रजायन्ते, ज्यायसस्पतय उ चैतभिते । इदं हि पितैवाग्रे, अथ पुत्रः अथ पौत्रः । तस्मात्परस्तादक प्रवृणीते ॥ १० ॥
४- अग्नि-- ब्राह्मणानुग्रह - कम-समुक्त्वा आह- ' ब्रह्मवद् ' इति । ब्रह्म ह्यग्निः, तस्मादाह - ब्रह्मवदिति । ' आ च वक्षद् ' इति । तथा एवैतद् देवता श्रावोढवा आह, ता एवैतदाह - श्रा च वक्षदिति ॥ ११ ॥
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पवन प्रत्याय प्रवब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' ब्राह्मणा । अभ्य यज्ञस्य प्रावितारः ' इति । एते वै ब्राह्मणा यजम्य प्रावितारो ये नूचानाः । एते ह्येनं तन्वते, एन एनं जनयन्ति । तदु तेभ्यो निह्न ुते । तस्मादाह - ब्राह्मणा अस्य यज्ञस्य प्राचितार इति ॥ १२ ॥
५- मानुष होतृचरण कर्म्म -' असौ मानुषः ' - इति तदिमं मानुषं होतारं प्रवृणीने । अहोता हैपपुरा, थै होता ॥ १३ ॥
६ - स्वस्ययनजपः प्रवृतो होता जयति देवता उपधावति । यथानुष्ठया देवेभ्यो हव्यं वहेद्, यथा न ह्वद् एवं देवता उपधावति ॥ १४ ॥
तत्र जपति- ' एतवा देव सक्तिर्वृणन ' इति तत्सविता प्रसवायोपधावति । स हि देवानां प्रसविता । ' अग्निहोत्राय ' इति । तदग्नये चैतद् देवेभ्यश्च निह्नते । यद-हाग्रेऽग्निमाह — तद् अग्नये निह्नते । अथ यो दवाना होता तमग्रे ग्रह तदु देवेभ्यो निते ॥ १५ ॥
' सह पित्रा वैश्वानरेगा ' इति । संवत्सरो वै पिता वैश्वानरः प्रजापतिः | तत्सम्ब-सरायंत्र एतत्प्रजापतये निहु ते ॥ ' अग्ने पूषन बृहस्पते प्र च वद, प्र च यज ' इति । अनुत्रच्यन् वा एतद् यक्ष्यन् भवति तदेताभ्य एवैतद् देवताभ्यो निह्नते- ' यूथमनुत्रत, यूयं यजत ' इति ॥ १६ ॥
' वसूनां रातौ स्याम्, रुद्राणाम् उर्वायाम्, स्वादित्या अदितये स्यामानेहसः ' इति । एते त्रया देवा: - यद् वसवो रुद्रा आदित्याः । एतेपामभिगुप्तौ स्याम - इत्ये तदाह ॥१७ ॥
' जुष्टामद्य देवेभ्यो वाचमुद्यासम् ' इति । जुष्टमद्य देवेभ्योऽनूच्यायमित्येवैतदाह । तद्धि समृद्ध - यो जुष्टं देवेभ्योऽनुवत् ॥ १८ ॥
' जुष्टां ब्रह्मभ्यः ' इति । जुष्टामद्य त्राह्मणेभ्योऽनूच्याममित्येव तदाह । तद्धि समृद्ध-यो जुष्टं ब्राह्मणेभ्योऽनुत्रवत् ॥ १६ ॥
' जुष्टां नराशमाय ' इति । प्रजा नै नरः । तत्सर्वाभ्यः प्रजाभ्यः आह । तद्धि समृद्धम् । यश्च वेद, यश्च न, साध्वन्त्रवोचन - साध्वन्यवोचद् इत्येव विसृज्यन्ते यदा । होतृवर्ये जिह्मं चक्षुः परापतत्, अग्निष्टत् पुनराश्रियाज्जातवेदा विचषेणिः ' इति । यथा यानग्रेऽग्नीन होत्राय प्रावृणत - ते प्राधन्वन, एवं यन्मेऽत्र प्रवरेणामाथि, तन्मे
पुनराप्याययइत्येतदाह । तथौ हास्यैतत्पुनराप्यायते ॥२० ॥
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