Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1101–1110
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1101–1110
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पचमन्यध्याय प्रवरब्राह्मण ७- सम्मर्शन कर्म्म -शतपथब्राह्मण अथाध्वर्यु ं चाग्नीध्र ं च संमृशति । मनो वा श्रध्वर्युः वागू होता । तन्मनश्चैनैतद् वाचं च सन्दधाति ॥ २१ ॥
तत्र जपति - णू मोरिहसस्पान्तु अव रात्रिश्च ' इति । एता मा देवता स्ति - यमेता देवता आर्चेर्गोपाययुः ॥ २२ ॥
: अग्निश्च पृथिवी च प्रपश्च वाजश्च गोपायन्तु इत्येवैतदाह । तस्यो हि न हला-- उपावर्त्तनकर्म ८-अथ होतृपदनमुपावर्त्तते । स होतृपदनादेकं तृणं निरस्यति - ' निरस्तः परावसुः ' इति । परावसुर्ह नै नामासुराणां होता, स तमेवैतद् होतृपदनाद् निरस्यति ॥ २३ ॥
अथ होतृपदने उपविशति ' इदमहमर्वावसोः सदने सीदामि ' इति । वसु नाम देवानां होता, तस्यैतत् सदने सीदति ॥ २४ ॥
तत्र जपति - ' विश्वकम्मैतनृपा अमि । मा मोदोषिष्टम् मा मा हिंसिष्टम्, एष वां लोकः ' इति । उदङ् एजति । अन्तरा वा एतद् - आहवनीयं च गार्हपत्यं चास्ते । तदु ताभ्यां निहते. मा - I- मोदोषिष्टम् मा मा हिंसिष्टम् इति । तथा हैनमेतौ न हिंस्तः ॥२५ ॥
६- अग्नीक्षणकर्म्म— अथाग्निमीक्षमाणो जपति- ' विश्वेदेवाः शास्तन मा यथेह होता वृतो मनवै यन्नि-पद्य । प्र मे ब्रत भागधेयं यथा वो येन यथा हव्यमा वो वहानि ' ( ऋ ० सं ० १०. ५२. १ ) इति । यथा येभ्यः पक्कं स्यात्, तान् ब्रूयात्, - ' अनु मा शास्त- यथा वऽ आहरिष्यामि यथा व परिवेदयामि ' इति । एवमेतद् देवेषु प्रशासन मिच्छते-' अनु मा शान्त, यथा वोनुष्टया वषट् कुर्याम्, अनुष्टया हयं रहेयम् ' इति । तस्मादेवं जपत ॥२६ ॥
इति - प्रथमकाण्डे पञ्चमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणं चतर्थप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणं उपरतम् प्रवराह्मणात्मकम् १२७२
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पञ्चम श्रध्याय मूलानुवाद-— प्रवरब्राह्मण प्रथम काण्ड पाँचवें अध्याय में पहिला, तथा चौथे प्रपाठक में दूसरा ब्राह्मण १ – श्रावक--उपक्रान्त " प्रवरब्राह्मण " २१ – प्रवरण कर्म्म ( अनुवाद ) - ( श्रावनीयाग्नि में ब्राह्मणानुगत सूत्रप्रदर्शित पद्धति क्रमानुसार पूर्वोत्तराघारद्वय-सम्पादन के अनन्तर ) बह ( अध्वर्यु ' नामक ऋत्त्विक् के वरण के लिए, “ श्रो श्राप " इत्यादिरूप से ) प्रवरक के लिए ( ' होता ' नामक ऋस्त्रिक श्रावण करता है । सो जो कि वह अध्य हाता के वरण के लिए श्रावण करता है ( उस श्रावणकर्म की उपपत्ति यही है कि ), वह आश्रावण ( यज्ञस्त्ररूप सम्पादक होने से ) यज्ञ ही है । यज्ञ का आश्रय लेकर ( ही ) मैं होता का वरण करूँ, इसीलिए प्रवरकर्म्म के लिए आश्रवण करता है । ( १ ) ॥ वह श्रध्वर्यु ' इध्मसन्नहनों ( यज्ञियकाष्ठसम्भार के बाँधने के तृणसमूहों ) को ही लेकर श्रश्रावण करता है | वह अध्वर्यु यदि यज्ञ ( यज्ञ को वस्तु ) को न लेकर आश्रावण करेगा, तो वह निश्चयेन प्रथम तो कम्पित होजायगा, अथवा तो ( पतनादिलक्षण ) अन्य किसी पीड़ा का भागी बनेगा, ( इसलिए इध्मसन्नहनरूप यज्ञ से सम्बन्ध करके ही आश्रावण करना चाहिए ) ॥ ( २ ) । कितने एक याज्ञिक वेदि पर बिछे बर्हि को लेकर अथवा इध्मकाष्ठ की बल्कल को इध्म से पृथक कर उसे हाथ में लेकर आश्रावण करते हैं, और ऐसा करते हुए ( वे अपने इस बर्हि, अथवा इध्मत्रल्कल - ग्रहण की उपपत्ति यह बतलाते हैं कि ) वह बर्हि, अथवा इष्मवल्कल यज्ञ का ही कुछ भाग ( यज्ञावयव होने से यज्ञरूप ही ) है । हम इस यज्ञ को श्राश्रय बना कर ही आश्रा-वरण करें । ( भगवान् याज्ञवल्क्य इस सम्बन्ध में अपना निर्णय प्रकट करते हुए कहते हैं कि ) -श्रावणक ऐसे ( वर्हि, अथवा इध्मवल्कल लेकर ) न करे । ये ही यज्ञ के निश्चयेन कुछ ( भाग ) हैं, जिन ( तृणसमूहों ) से काष्ठभार बाँधा जाता है, जिन से अग्निसम्मानकर्म्म करते हैं । ( ऐसी दशा में इन इध्मसन्नहनों का ग्रहण करने से ही ) निश्चयेन यज्ञ को आश्रय बनाकर आश्रात्रण करता है ( आश्रवण करने में समर्थ होजाता है ), अतः इध्मसन्नहनों को आश्रय बना-१३७२
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पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण शथपथनाहागा कर ही आश्रवण करना चाहिए । ( तात्पर्य यही है कि, जो प्रयोजन बाई, अथवा इध्मबल्कल-ग्रहण का है, वह प्रयोजन जब इध्मसन्नहन से गनार्थ होजाता है, साथ ही इध्मसन्नह्नग्रहण जब पद्धति से अनुगृहीत है, तो ऐसी दशा में इध्मसन्नह्नों को आश्रय न बनाकर बाई, अथवा इध्मवल्कल को आश्रय बना कर आश्रवण करना व्यर्थ तथा पद्धतिविरुद्ध है ) ॥ ( ३ ) ॥ २ - दिव्य होता ( प्राणाग्नि ) का वरण-( इसप्रकार इध्मसन्नहनों का ग्रहण कर ' ओ श्रावय ' इस रूप से ) वह अध्वर्यु श्राश्र -रण कर ( अनन्तर ) जो कि देवताओं ( प्राणदेवताओं ) का होता है, सबसे पहिले उसी अग्नि का वरण करता है । { सर्वप्रथम ' अग्नि ' नामक दिव्य होता का वरण करता हुआ यह अध्वर्यु ) अपने इस अग्निवर कर्म से अग्नि के लिए, एवं देवताओं के लिए ही ( अपने आपका ) निव ( अपराध के लिए क्षमायाचना ) करता है । जो कि सर्वप्रथम अग्नि को अपना लक्ष्य बनाता है ( अग्नि का वरण करता है ), इससे ( तो ) अग्नि के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है, एवं जो देवताओं का होता है, उसे सर्वप्रथम अपना लक्ष्य बनाता है, इससे देवताओं के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है । ( तात्पर्य यही है कि, जिस दिव्य अग्नि का अव सर्वप्रथम वर करता है, वह स्वस्वरूप से अग्नि है, एवं दिव्य देवताओं का होता बनता हुआ सर्वदेवमूर्त्ति भी है । इसके वरण से अग्नि का प्रातिस्त्रिक अग्निस्वरूप से भी निह्नत्र होजाता है, एवं होतृरूप से सर्वदेवस्वरूप से भी निह्नत्र होजाता है । इसप्रकार एक ही अग्नि के चरण से अग्नि, तथा देवता, दोनों से निह्न होजाता है ) ॥ ( ४ ) ॥ ( उपपत्ति बतलाकर अच पद्धति बतलाते हैं ) - वह अध्वर्यु - " अग्निर्देवा दैव्यो होता " ( हे अग्ने! आप देवता- द्युलोकस्थ दिव्य तत्त्व हैं, साथ ही आप दिव्य देवताओं के दिव्य सम्वत्सरयज्ञ के होता हैं ) यह मंन्त्र बोलता है । अग्निदेवता निश्चयेन ' होता ' हैं, इसीलिए ' अग्निर्देवो देव्यो होता ' यह कहा गया है । इस ( मन्त्रभाग ) से अग्नि के प्रति, तथा देवता के प्रति किए गए अपराध का ही शमन करता है । जो कि सर्वप्रथम अग्नि का वरण करता है, इससे तो अग्नि के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है, एवं जो देवताओं का होता है, उसके सर्वप्रथम वरण से देवताओं के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है || ( ५ ) || * " अग्निर्देवो देव्यो होता देवान् यक्षद्विद्वांश्चिकिंच्चान् मनुष्वद्भरतवत् " - इति निगमन्त्रः । १३७४
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पञ्चम श्रध्याय प्रवरब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( आगे का मन्त्रभाग है ) - “ देवान् यक्ष द्विद्वांश्चिक्किच्चान् " ( हे अग्ने! अपने हौत्रकर्म्म के प्रभाव से आप दिव्य प्राणदेवताओं को भलीभाँति पहिचानते हैं, इसी स्वरूपज्ञान के आधार पर आप देवताओं का यजन करने में समर्थ हुए हैं । ) में निश्चयेन दिव्य प्राण देवताओं के ज्ञाता हैं, जोकि हैं । वे अग्नि इन दिव्य - देवताओं को जानते हुए इनका यथाविधि यजन करें, ( मन्त्रभाग से ) यही कहा गया है ॥ ६ ॥
( आगे का मन्त्रभाग है ) - " मनुष्वद्भरतवत् " ( हे अग्ने! मनु की भाँति, तथा भरत की भाँति अपने हौत्रकर्म्म से हमारे इस यज्ञ को सुसम्पन्न बनाइर ) । मनु ने हीं सर्वप्रथम यज्ञ के द्वारा ( दिव्यप्राणों का पार्थिवप्राों के साथ ) यजन किया था । उस मानत्रयज्ञ को आधार बनाकर ( अनुकरण कर के ) ही ये ( वर्त्तमान ) प्रजाएँ यज्ञानुष्ठान करतीं हैं । इसी अभिप्राय से' ' मनुष्वत् ' कहा है | श्रपिच ( यज्ञसम्प्रदाय में यज्ञ के लिए यज्ञवेता ) ' यह मनु का यज्ञ है ' यह कहा करते हैं । इस अभिप्राय से भी ' मनुष्यत् ' यह कहा गया है । ( तात्पर्य यही हुआ । कि, यह यज्ञ मनुकृत यज्ञ की प्रतिकृति है, इस अभिप्राय से, तथा यह यज्ञ उस प्रसिद्ध मनुर्यज्ञ की भाँति महत्त्वपूर्ण है, इस अभिप्राय से ‘ मनुष्वत् ' कहना सुसङ्गत बन जाता है ) ॥ ( ७ ) ॥ ( उक्त मन्त्रभाग में ) ' भरतवत् ' यह पठित है । ( इसका तात्पर्य यही है कि ) यह ( अग्नि ) ही ( दिव्यलोकस्थ प्राणात्मक ) देवताओं के लिए ( भूलोक से ) हव्य लेजाते हैं । इसी इत्र्य - धारण-धर्म से ( श्रग्नि के सम्बन्ध में वैज्ञानिक लोग ) ' यह अग्नि भरत है ' यह कहा करते हैं । पिच यही ( प्राणविध अग्नि ) प्रारण रूप में परिणत होकर इन पार्थिव प्रजाओं का भरण - पोषण करता है, इसलिए भी ' भरतव त् ' यह कहा गया है । ( तात्पर्य यही है कि, देवताओं के लिए हरिर्वहन करने से भी ये अग्नि ' भरत ' हैं, एवं मानव प्रजावर्ग का प्राणरूप से भरण - पोषण करने से ' कहना अचर्य बनता है ) ॥ 3 – आर्षेयप्रवरण ( यजमानवरण ) [ दिव्यहोतृप्रवरणात्मक होतृप्रवरणकर्म्म के ] अनन्तर बह अध्वर्यु [ ऋषिवंशपरम्परा से सम्बन्ध रखने वाले ऋषिवंशज अतएव ] ' आर्षेय ' [ ऋषिवंशसम्बन्धी उस यजमान ] का बरण करता है । [ अर्थात् दैवहोतृवरणानन्तर ऋषिवंशज मनुष्य यजमान का वरण करता है ] । मनुष्य-यजमानप्रवरणरूप आर्षेयप्रवरणकर्म से वह श्रध्वर्यु ऋषियों, तथा देवताओं के प्रति ही इस [ यजमान ] को निवेदित करता है कि, [ वास्तव में ] यह [ यजमान ] बड़ा पुरुषार्थी है, जो कि यज्ञ को [ यज्ञसम्पादन के लिए ] प्राप्त [ प्रवृत्त ] हुआ है । इसी प्रयोजन के लिए श्रायवरण [ यजमान--चरण ] करता है | [ ६ ] || १३७५
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पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण पर ( पूर्वपीढ़ी ) से अवर ( उत्तरपीढ़ी ) की ओर आय का वरण करता है । ( अर्थात पूर्व-पीढ़ी से आरम्भकर उत्तर पीढ़ी पर्यन्त व्याप्त यजमान के वंशजों का यशोगान करता है । ( पर सेर की ओर वरण करने का कारण यही है कि ) पर से अवर की ओर ही सन्तानक्रम चलता है । ( इसप्रकार परपुरुषों से अवरपुरुष पर्यन्त नामग्रहण ) द्वारा ( वह अध्वर्यु ) उन वंशजों के प्रति कए गए ( यजमान के ) अपराध का ही शमन करता है । यह लोकप्रसिद्ध है - कि, ( वंश-म्बरा में ) पहिले पिता ( का स्थान ) है, अनन्तर पुत्र ( का स्थान ) है, अनन्तर पौत्र ( का स्थान ) है । इसीलिए ( स्वाभाविक प्राकृतिक सन्तानक्रम के आधार पर ही ) पर से अवर की ओर वरण करता है || * ( १० ) ॥ ४ - अग्नि, तथा ब्राह्मणों की अनुग्रहप्राप्ति-( इसप्रकार यजमान - सम्बन्धी वंशजों के नामोल्लेखात्मक ) आर्षेय का उच्चारण करने के अन न्तर वह अध्वर्यु ' “ ब्रह्मण्वत् " ( हे अग्ने! आप प्रतिष्ठात्मक ब्रह्म से समतुलित हैं ) यह मन्त्रभाग बोलता है । ( यज्ञ की मूलप्रतिष्ठा होने से ) यह अग्नि ' ब्रह्म ' है । [ किंवा इस यज्ञकर्म में प्रतिष्ठात्मक ब्रह्म निश्चयेन अग्नि है । ] इसी अभिप्राय से ' ब्रह्मण्वत् ' कहा है । आगे का मन्त्रभाग है । -" या च वदत् " [ ऐसे ब्रह्मलक्षण हे अग्ने! आप यज्ञिय देवताओं का आह्वान करने वाले हैं ] । जिन देवताओं को इस अग्नि के द्वारा इस यज्ञ में बुलाने के लिए कहा गया है प्रकृत-‘ आ च दक्षत् ' इस मन्त्रभाग से उही की ओर सङ्केत हुआ है ॥ [ ११ ] ॥ [ आगे का मन्त्रभाग हैं ] — " ब्राह्मणा अस्व अज्ञत्य प्रावितारः " [ ये ब्राह्मण - ऋत्त्विकं इस यज्ञ के स्त्ररूप - सम्पादक हैं ] । ये ब्राह्मण निश्चयेन यज्ञ के सञ्चालक, तथा रक्षक हैं, जो कि त्रयीवित्वा का ग्रह, शस्त्र, एवं स्तोत्र रूप से अनुवचन करने वाले हैं, ये ही ऋत्विग् ब्राह्मण इस यज्ञ को [ ताग्निरूप से ] वितत करते हैं, वे ही अनूचान ब्राह्मण ( आहुति के द्वारा ) इस यज्ञ ( यज्ञा-तिशवरूप दैवात्मा ) को उत्पन्न करते हैं, ( य ब्राह्मणा इत्यादि मन्त्रोच्चारण के द्वारा ) इह्नीं अनू चान ऋत्विग् ब्राह्मणों के प्रति [ अज्ञानतावश ] किए गए अपराध का शमन करता है । इसी अभि-प्राय ' ब्राह्मणा अस्य यज्ञस्य प्रावितारः ' यह कहा गया है ॥ [ १२ ] ॥ [ इसप्रकार ' अमुत्रदमुवत् ' रूप से पहले अध्वर्युर्वेय वरण करता है, अनन्तर ' ब्रह्म एवदाच वक्षत् ' रूप से श्रग्नि के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है, अनन्तर -- ' ब्राह्मणा * " मुदमुवत् " इति । १३७६
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पञ्चम श्रध्याय प्रबरब्राह्मण प्रथमकाण्ड अस्य यज्ञस्य प्रावितार: ' इस मन्त्र से ऋत्विब्राह्मणों के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है ] । ५ - मानुष होता का वरण– [ अनन्तर ] –'असौ मानुषः " इस मन्त्रपाठ के द्वारा मनुष्य होता का वरण करता है । इस वरणकर्म्म से पहिले पहिले तक ] यह [ आज होतृत्त्वेन वृत यह मनुष्य ] अहोता ही था, आज उक्त मन्त्रपाठरूप वरण से ही यह होता बना है ॥ [ १३ ] ॥ ६- स्वस्त्ययनजप--[ अध्वर्यु के द्वारा होने वाले ' असौ मानुष ' इस मन्त्रपाठात्मक वरणकम्मं से होतृत्त्वेन ] प्रवृत यह होता [ चरणकम्र्मानन्तर स्वस्त्ययनलक्षण मन्त्रों का ] जप [ उच्चारणलक्षण पारायण ] करता । [ इस जपकर्म से यह होता ] प्राणदेवताओं का ही आश्रय ग्रहण करता है । जिसप्रकार याज्याकर्म्मकाल में वषट्कर्त्तव्यप्राणदेवता को लक्ष्य बना कर यथाविधि उनके लिए वपटूकार करने में समर्थ होसके, देवताओं के लिए यथाविधि हव्य- वहन करने में समर्थ होसके, कोई काम पद्धति के विरुद्ध न होजाय, इसी प्रयोजन के लिए जप के द्वारा यह होता देवता का आश्रय लेता है | [ तात्पर्थ्य यही है कि अपने क्षेत्रकर्म्म को निर्विघ्न स्वतिभावपूर्वक पूरा करने के लिए जप के द्वारा देव बल प्राप्त करना हीं स्वस्त्ययनअप की उपपत्ति है ] ॥ [ १४ ] ॥ स्वस्त्ययनजप की उपपत्ति बतला कर अथ पद्धति बतलाते हैं ] - यह होता वहाँ [ उस प्रक्रान्त बररणकर्म्मकाल में निम्न लिखित मन्त्र का ] जप करता है - " एतच्चा देव सवितवृण ते " [ हे सविता देवते! मुझ मानुष होता के वरणत्र्याज से अध्वर्यु लोग आप ही का वरण कर रहे हैं ] । इस मन्त्रजप से होता सविता की ओर ही उनकी अनुज्ञा के लिए अनुधावन करता है - अभिमुख होता है । वही [ सविता हो ] देवताओं का [ देवताओं के यज्ञात्मक कर्म्म का ] प्रेरयिता है । [ तात्प--यही है कि, श्रत्र ने जो मेरा वरण किया है, उसका उत्तरदायित्व उस प्राणात्मक सत्रिता देवता पर ही है, जिसके अनुग्रह से मैं अपने हौत्रकर्म में सफल बन सकूँगा ] । [ आगे का मन्त्र भाग है ] – “ अग्नि नेत्राय " [ अध्वर्यु ' लोग हौत्रकर्म के लिए अग्नि का ही वरण करते हैं ] | इस मन्त्रजप से यह मानुष होता अग्नि के प्रति, तथा अग्निमय प्राणदेवों के प्रति किए गए अपराध का ही शमन करता है । जो कि सर्वप्रथम यह अग्नि को हाँत्रकर्म्मका लक्ष्य बनाता है. इससे तो अग्नि के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है । एवं साथ ही जो अग्नि देवताओं का होता है, उसे प्रथम लक्ष्य बनाता है, इससे देवताओं के प्रति किए गए अपराध का शमन करता है || [ १५ ] ॥ १२७७
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पञ्चम श्रयध्य प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण आगे का मन्त्रभाग है ) — " सह पित्रा वैश्वानरेण ” ( वे ऋत्त्विक पिता वैश्वानर से युक्त अग्नि का वरण करते हैं ) पिता वैश्वानर निश्चयेन ( सबनयत्रयात्मक यज्ञ मूर्त्ति ) सम्वत्सर है, जो कि ( सम्बत्सर ) प्रजापति है । अतः ( ' सह पित्रा वैश्वानरेण ' इस मन्त्रजप के द्वारा ) यह होता सम्वत्सरप्रजापति के प्रति किए गए अपराध का ही शमन करता है । ( आगे का मन्त्रभाग है ) -" अग्ने पुषन् बृहस्पते प्र च वद, प्र च यज " ( हे अग्ने! हे पूषन्! हे बृहस्पते! श्राप द्दी प्रत्र-चन कीजिए, आप ही यजन कीजिए ) । यह हाता अनवाक्या ' ' नामक ऋचाओं का उच्चारण करेगा एवं इस अनुवचनकर्म्मपूर्वक ' याज्या ' नामक ऋचाओं से देवताओं का यजन करेगा | जिन देव-ताओं के लिए यह अनवचन, तथा यजन करने वाला है, उक्त मन्त्रजप के द्वारा ) यह होता इन देवताओं के प्रति गिए गए अपराध का ही शमन करता है । ( मन्त्रद्वारा अपना उत्तरदायित्त्व हटाता हुआ | यही भात्र व्यक्त कर रहा है कि ) हे देवताओ! आप ही अनुवचन कीजिए, एवं आप -ही याज्या कीजिए । ( अर्थात् मैं अनुवचन, यजन नहीं कर रहा, अपितु देवता हो यह कर्म्म मुझ से करवा रहे हैं ) ॥ ( १६ ) ॥ ( आगे का मन्त्रभाग है ) – ' वसूनां रातौ स्याम, रुद्राणामुर्वायां स्वादित्या अदित स्थामनेहस: " ( हम इस स्वस्त्ययनजपलक्षण कर्म्म से वसुदेवताओं की सम्पत्ति में प्रतिष्ठित हों, आदित्यदेवता हमारे लिए सुप्रतिष्ठात्मक बनें, त्रिदेवाधारभूता अदिति के लिए हम निर्दोष बनें रहैं ) । निश्चयेन ( सम्वत्सर - त्रिलोकी में ) ये तीन ह्रीं ( मुख्य अतिष्ठावा ) देव हैं, जो कि बसु - रुद्र आदित्य ( नाम से प्रसिद्ध ) हैं । " हम ( यज्ञद्वारा सम्बत्सर - सम्पत्ति को प्राप्त करते हुए ) इह्रीं तीनों की रक्षा में प्रतिष्ठित रहैं " मन्त्र से यही कया गया है । ( १७ ) ॥ ( आगे का मन्त्रभाग है ) — “ जुष्टामद्य देवेभ्यो वाचमुद्यासम् ” ( हम इस यज्ञकर्म में देव-ताओं के लिए उनके लिए सेवनीय - श्रनुकूल - चाकू का प्रयोग करें ) ' श्राज हम देवताओं के लिए शोभनत्राणी बोलने में असमर्थ हों, मन्त्र से यही कहा गया है । वही [ यज्ञ के लिए ] समृद्ध [ समृ-द्विप्राप्ति का कारण ] है, जो कि देवताओं के लिए [ होता ] शोभन प्रिय वाणी का उच्चारण करता है ॥ [ १८ ] ॥ [ आगे का मन्त्रभाग है ] – “ जुष्टां ब्रह्मभ्यः " [ यज्ञ में उपस्थित ऋत्विजादि ब्राह्मणवर्ग के लिए मैं प्रियवाणी का प्रयोग करूँ ] । " मै ब्राह्मणों के लिए शान्ता अनुद्वेगकरी प्रियभाषा का प्रयोग करूँ, मन्त्र से यही कहा गया है । वहीं समृद्ध है, जो कि ब्राह्मणों के लिए प्रियवाणी बोलता है । [ १६ ] ॥ १३७८
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पञ्चम- श्रध्याय प्रवरब्राह्मण प्रथमकाण्ड [ आगे का मन्त्रभाग है ] - " जुष्टां नराशंसाय " बज्ञ में दर्शकरूपेण उपस्थित इतर द्वि-जाति प्रजा वर्ग के लिए मैं प्रिय बाणी बोलू ] | नर निश्चयेन प्रजा है । मन्त्रभाग से सर्वसाधारण सम्पूर्ण प्रजा के लिए [ प्रिय भाषण करने के लिए ही कहा गया है । वही समृद्ध है, [ जिस कर्म को लक्ष्य बनाकर ] जो इस कर्म को जानता [ देखता ] है, जो नहीं जानता [ देखता है, सभी बड़ा साधुकर्म है, बड़ा साधु कम्मं है, इस शिवभाषा का प्रयोग किया करते हैं । [ सभी जिस क की प्रशंसा करैं, वही कर्म्मतास्तव में समृद्ध माना जाता है, यही तात्पय्यं है ] । [ सर्वान्त में निम्न लिखित ऋङ्मन्त्र का जप करता है ] -" दद्य होतृवर्ये जिह्म ' चक्षुः पररा'तत् । अग्निष्टत् पुनराभ्रियाञ्जातवेदा विचर्षणिः ॥ " " आज इस होतृवरणकर्म्म में जिस किसी को भी कुटिल दृष्टि पड़ गई है - [ जिस कुटिल दृष्टि से ौत्र कर्म का स्वरूप विकृत हो गया है ] - जानवेदा, विचर्षणि अग्निदेवता उस का पुनः रान्धान कर दें " । मन्त्रतात्पर्य का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है जिसप्रकार जिन [ तीन त्या नामक अग्नियों का पहिले वरण किया था, वे [ भय से ] पलाबित होगए थे, इसी प्रकार इस होतृवर कर्म में मेरा जो कुछ [ यज्ञसम्पद्भाग कुटिलदृष्टि निक्षेप से ] पलायिता होगया है, हे श्रग्ने! आप उस की पुन: क्षतिपूर्ति कर दिजिए, मन्त्र के द्वारा यही कहा गया है । इसप्रकार सत्यभायनात्मक उक्त मन्त्रप्रयोग के द्वारा श्रवश्यमेव इस का यह क्षतभाग पुनः आप्यायित होजाता है ॥ २० ] ॥ ७ सम्मर्शन ( स्पर्श ) कम्र्म -[ उक्त मन्त्र - परम्परा जप के ] अनन्तर वहु होता श्रध्वर्यु, तथा आग्नीध का स्पर्श करता है । [ निदानेन ] मन है, एवं होता [ निदानेन ] वाक् है । [ श्राग्नी निदानेन प्राणात्मक है ] । ऐसी स्थिति में बागरूप अध्यु तथा प्राणरूप आनीध का स्पर्श करता हुआ ] मन, तथा बाक् [ प्राण-का भी ] का परस्पर सन्धान [ मेल करता है || [ २१, ॥ [ मनः श्रारण् - बाक् - संधानात्मक स्पर्शकम्र्मानन्तर यह होता पुनः अन्यारब्ध ] जपकर्म्म का अनुगमन करता है | [ उपमन्त्र है ] ' परमो वरंहसस्पान्तु अग्निश्च पृथिवी च, अपच, बाज-श्व, अश्व, रात्रिश्व ' [ अग्नि, पृथिवी, जल, अन्न, दिन, रात, महत्त्वशाली ये ६ त्र देवता मेरी दुरिषुभाव से रक्षा करें । ये ६ देवता आपत्तियों से मेरी रक्षा करें, मन्त्रभाग से यही कहा गया है । उस व्यक्ति के लिए आपत्ति की अणुमात्र भी आशङ्का नहीं है, जिस की ये अग्न्यादि ६ श्री देवता आपत्तियों से रक्षा करते रहते हैं ॥ [ २२ ] ॥ १३७६
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पश्चम- श्रध्याय ८ - उपावर्तन कर्म-—अग्निदर्शनकर्म्म— " विश्वेदेवाः प्रबरब्राह्मण शतपथब्राह्मण -- ऋक्सं ० १०५०।१ । १३८० [ उक्त मन्त्रजपानन्तर जपस्थान सें ] वह होता होतृपदन [ स्वस्थान ] की ओर लौट आता है } वहाँ आकार होतृपदन से एक दर्भतृण लेकर - " निरस्तः परावसुः " ( परावसु नामक असुर यज्ञ सैं निकल गया ) यह मन्त्र बोलता हुआ [ उस तृण को दक्षिण की ओर ] फैंक देता है । परावसु नामक [ असुरबंशज व्यत्ति ] असुरों का ' होता ' था । [ तृणनिरसनब्याज से ] वह होता इसे ही होतृ-बदन से बाहिर निकालता है | [ २३ ] || तृणनिरसनानन्तर बह होता होतृपदनस्थान में - " इदमहमर्वावसोः सदने सीदामि " [ मैं अर्वावसु के स्थान में बैठता हूँ ] यह मन्त्र बोलता हुआ बैठता है । अर्वावसु नामक [ देववंशज व्यक्ति ] देवताओं का ' होता ' था । [ श्राज ] होता उसी के स्थान में बैठता है || [ २४ ] ॥ ( होतृपदन - स्थान पर बैठ कर वह होता निम्न लिखित ) मन्त्र का जप करता है— ' विश्वकस्तनूपा असि ' ( हे विश्वकर्मन! आप शरीर की रक्षा करने वाले हैं ) । अनन्त ' मामोदोषिष्टं मा मा हिंसिष्टं एष वां लोक: ' ( हे गाईपत्याग्ने!, आहवनीयाग्ने! आप मेरे शरीर को अतिशयरूप से ताप न पहुँचाइए, आप मेरी हिंसा न कीजिए, क्योंकि यह आपका लोक है । मैंने जब इसीका आश्रय लिया है, तो भला उस दशा में आप क्यों मुझे त्रास देंगे ) इस मन्त्र का उच्चारण करता हुआ स्वस्थानरूप होतृघसदनस्थान से उत्तर की ओर मुख करता हुआ थोड़ा सा चलता है । इसप्रकार यह होता आहवनीय, तथा गर्हपत्य, दोनों के मध्यस्थान में प्रति--है | मन्त्रजप के द्वारा इन दोनों के प्रति किए गए अपराध का ही शमन करता है | इससे ये दोनों इसे पीड़ा नहीं पहुँचाते ॥ ( २५ ) ॥ ( ईषदुत्तरतश्चलना ) नन्तर यह होता श्राहवनीयाग्नि की ओर देखता हुआ निम्न-लिखित मन्त्र का जप करता है -स्तनमा यथेह होता वृतो मन यन्निषद्य | त भागधेयं यथा वो येन पथा हव्य मा वो बहानि ॥ " हे विश्वेदेवो! आप मुझे आज्ञा दीजिए कि जिसप्रकार इस यज्ञ में होता बनता हुआ।-होतृत्त्वेन वृत होता हुआ । यहाँ प्रतिष्ठित होकर आपका यजन करूँ । साथ ही मुझे उन देवभागों
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पञ्चम अध्याय प्रवराह्मण प्रथम काण्ड को बतलाइए, जिन्हें मैं यथानियत मार्ग आपके लिए पहुँचा सकूँ | ( लोकदृष्टान्त से मन्त्र-तात्पर्य का समन्वय करती हुई श्रुति कहती है कि, ) लोक में जिन अतिथियों के लिए पाचक के द्वारा पक ( अन्न ) होता है, सम्पन्न होजाने पर पाचक उन भोजन करने वालों से पूँछता है । कि, भोजन सम्पन्न है, आज्ञा दीजिए, आपके लिए ले आऊँ, परोस दूँ । ठीक इसी लोकमर्यादा के अनुसार यह होता ( स्त्रप्रदत्त हव्य के सम्बन्ध में हव्यग्राहक ) देवताओं की इस रूप से ) आज़ा ( ही ) चाहता है कि- आज्ञा दीजिए, मैं आपके लिए यथाविधि वपटूकार करूँ, विधिपूर्वक विका करू । इसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए उक्तरूप से मन्त्रजप करता है ॥ २६ ॥
इति - स्वस्त्ययनजपः पाँचवें अध्याय में पहिला, तथा चौथे प्रपाठक में दूसरा ब्राह्मण समाप्त " प्रवरण ब्राह्मण " अत्र उपरत मूलानुवाद समाप्त १३८१