Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 21–30
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 21–30
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड संन्यास ने, एवं ऐसे संन्यास के कर्णधार संन्यामियोंने हीं तथ्यात्मक उस महान् कारण को जन्म दिया है, जिस संस्मरणीय कारणानुबन्ध से ही भारतराष्ट्र का गृहस्थाश्रमानुवन्धी - विधिभागात्मक बाह्मणग्रन्यनिबन्धन समस्त कर्म्म सौन्दर्य्य, एवं तद्रूपा आचारनिष्ठा सर्वथैव अभिभूत होगई है, जिस श्राचाराभिभूति से ही भारतराष्ट्र का सांस्कृतिक -- गौरव स्मृतिगर्भ में विलीन हुआ है । आचारात्मक - जीवनीय रसानुबन्धी- सृष्टिसौन्दर्य का वैज्ञानिक स्वरूप विश्लेषक विधिरूप ब्राह्मण-भाग, एवं ब्राह्मणभागोक्त वैज्ञानिक - पारिभाषित्र - तथ्यों का इतिहास - पुरस्सर उपबृंहरण करने वाला आर्य्य --सर्वस्वरूप - ' पुराणशास्त्र ', ये दो ही विभाग भारतीय विज्ञानकाण्ड के तत्त्वात्मक, एवं श्राचारानुगत ऐति--हासिक - प्रक्रमों के प्रमुख आधारस्तम्भ थे, जिनका तथोक्त कल्पित संन्यास ने, तदनुप्राणिता केवला उपनिषद्भक्ति ने, एवं तन्निबन्धना ज्ञानैककल्पना ने विगत तीन सहस्रवर्षों से सर्वात्मना श्रभिभव ही कर लिया, जिस अभिभव के कारण ही सामान्य प्रजा की कौन कहे, भारतीय विद्वान भी ब्राह्मणग्रन्थों, एवं पुराणों के प्रति सर्वथा उदासीन ही बन गए और निःसन्देह यही वह घोरघोरतमा भयावहा भ्रान्ति है, जिस ने वेद के ज्ञानविज्ञान सम्मत पारि-भाषिक - अन्तस्तल का संस्पर्श होने ही नहीं दिया । सचमुच ब्राह्मणग्रन्थों की ज्ञानविज्ञानात्मिका - परिभाषाओं के विस्पष्टतम स्वरूप पर दृकपात मात्र करने से ही सहसा हमें वेदार्थ के सम्बन्ध में सहजरूपेणैव वैसी दृष्टि उपलब्ध होजाती है, जो क्रसिद्ध आनुपूर्वी से अनुप्राणित अध्ययन से सभी प्रकार को भ्रान्तियों का आमूल-नूह उत्पाटन ही कर डालती है । इस में तो कोई सन्देह नहीं कि, ब्राह्मग्रन्थों की रहस्यात्मिका परिभाषाएँ स्वयं में हीं एक जटिल समस्या है । और कोई भी बुद्धिवादी प्रकृति - प्रत्यय - धातूपसर्ग - निपातादि मात्र के बल पर स्वप्न में भी इन परिभाषाओं के सन्निकट नहीं पहुँच सकता । यही नहीं, पारिभाषिक - तथ्यों से शून्य रह जाने वाले व्यक्ति के लिए तो ' ब्राह्मणसाहित्य ' उसी प्रकार केवल - ' असदाख्यान ' ( कल्पित - कथानक ) मात्र ही बने रह जाते हैं, जैसा कि ' पुराणशास्त्र ' के अष्टविध प्रात्यानों में एक विभाग - ' निदानभावा-नुबन्धी- असदाख्यान ' का माना गया है । वस्तुस्थिति वास्तव में ऐसी ही कुछ है । = " यज्ञ देवताओं से रूठ कर पृथिवी पर आगया । देवताओं के डर से वह काला हरिण बन गया । देवताओंने उस का चर्म्म उखाड़ लिया, जो कि चर्म्मतीनों वेद थे ” – “ इन्द्र ने वृत्रा-सुर पर वज्र का प्रहार किया वह पानी में छुप गया उस से दर्भ उत्पन्न हुए " - " देवता और असुरों में युद्ध होपड़ा भूपिण्ड पर स्वत्त्वाधिकार स्थापित करने के लिए । दोनों लड़ते हुओं के मध्य में में गायत्री खड़ी होगई | गायत्री पृथिवी ही तो थी । इयं हैव तदन्तरा तस्थौ ” इत्यादि रूपेण उप-वर्णित वेदशास्त्र के इत्थंभूत प्राख्यान एकबार तो मानवप्रज्ञां को सर्वात्मना विजड़ित ही बना देते हैं । जबतक इन्द्र - वृत्र - मृग - यज्ञ - त्रयीवेद - दर्भ- गायत्री - पृथिवी - आदि शब्दो के पारिभाषिक - वैज्ञानिक अर्थों के साथ हमारी - प्रज्ञा समन्वित नहीं होजाती, तबतक हम ब्राह्मणों की इस ग्राख्यान - भाषामात्र के माध्यम से एकाक्षर का भी समन्वय नहीं कर सकते, नहीं हीं कर सकते । अपितु चिना पारिभाषिक बोध के तो हम स्वल्पकाल में ही थक कर ब्राह्मणग्रन्थों के स्वाध्याय से विरत ही होपड़ते हैं । पुराणशास्त्र के स्वाध्याय की उपरति का भी यही कारण है, जिस से कि विद्वानोंने ब्राह्मणग्रन्थों के स्वाध्याय से विराम ग्रहण कर लिया है । और यों पारिभाषिक तथ्यों से पराङमुख बने रह जाने के कारण ही विगत अनेक शताब्दियों से सर्वसामान्य की कौन २१
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किञ्चिदिव- आवेदन कहे, भारतीय मेघावी विद्वान् भी ' ब्राह्मण ', और ' पुराण ' साहित्य के अध्ययनाध्यापन से पराङमुख हो बनते चले आ रहे हैं । ब्राह्मण, और ( पुराण, दोनों की निरूपणीया - शैली में श्रद्भुत साम्य का अनुगमन प्रतीत हो रहा है । दोनों की निरूपया -- शैली ' आख्यानोपाख्यानान्विता - इतिवृत्तशैली " - ( इतिहास शैली ) " से समन्विता है, जैसा कि - ' एतद्ध सौपर्णमाख्यानमाख्यान विद आचक्षते ' ( शतपथब्राह्मणे ) इत्यादि से स्पष्ट--तमरूपेण प्रमाणित है । एवं पुराणशास्त्र की श्राख्यानशैली से अनुगतता तो सुप्रसिद्धा ही है, जैसाकि निम्न लिखित सुप्रसिद्ध पुराणवचन से ही स्पष्ट है-श्राख्यानैश्चाप्युपाख्यानैर्गायाभिः कल्पशुद्धिभिः । पुराणसंहितां चक्रे भगवान् वादरायणः ॥ - पुराणेषु ' पुराणसंहितां चक्रे ' वाक्य से अनुगत ' संहिता ' शब्द एक विशेष तथ्य की ओर ही हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है ' सुप्रसिद्ध है कि, भगवान् वेदव्यासन ने सुप्रसिद्ध बदरिकाश्रम में सत्त्रपूर्वक समाधिस्थ बनते हुए – ऋक् · -यजुः - साम- श्रथर्व - नाम की चार तो ' वेदसंहिताओं ' का संकलन किया, एवं पाँचवी -' पुराणसंहिता ' का संकलन किया, जिस के श्राधार पर तच्छिष्य महाभाग सूत के द्वारा श्रष्टादश - पुराणों, एवं श्रष्टादश -- उपपुराणों का संकलन हुआ, जो पुराणसाहित्य बादरायण की मूलदृष्टि से श्रनुप्राणित होते हुए ' व्यासकृति ' रूपेणैव प्रसिद्ध हुए उसी प्रकार, जैसे कि भगवान् बादरायण की शब्दरचना से अनुप्राणित भी महाभारतान्तर्गत ' गीताशास्त्र ' भगवान् -- वासुदेव श्रीकृष्ण की मूलदृष्टि से अनुगत होता हुआ ' भगवद्--गीता ' नाम से ही प्रसिद्ध हो रहा है । ' वेदसंहिताओं के संकलन से जहाँ सत्यवती सूनु- ' वेद यास ' नाम से प्रसिद्ध हुए, वहाँ ' पुराण-' संहिता ' के संकलन से ये ही भगवान् बादरायण - ' पुराणपुरुष ' नाम से भी लोक में प्रसिद्ध हुए । ' संकलन ' क्या अर्थ १, प्रश्न का समाधान भी सर्वथा ऋजुभावापन्न है । तत्त्वात्मक अपौरुषेय--मन्त्रब्राह्मणात्मक - वेद के दृष्टा महात्रियों के द्वारा बुद्धिपूर्विका वाक्य - रचना - पूर्वक सम्पन्न - शब्दात्मक -- मन्त्र--ब्राह्मणमाग शाखाभेद से तत् तत् विश - परम्पराओं में प्रकीर्णकरूपेण विभक्त होरहा था । एवमेव पुग--गगाथाएँ भी भिन्न भिन्न ऋषिवंशों में विभक्त होरहीं थीं । भगवान् बादरायणने अपनी लोकोत्तरा प्रतिभा के बल पर प्रचण्ड तपश्चर्या के द्वारा उम्र शब्दात्मिका वेदराशि का एवं पुराणगाथाराशि का संकलन किया । एवं इस ' संकलन ' से ही शाखायुक्त - वेदमन्त्रों का संकलित रूप ' वेदसहिता ' नाम से, एवं पौराणिक -तथ्यों का शब्दगाथात्मक संकलन - ' पुराणसंहिता ' नाम से लोक में प्रसिद्ध हुआ । और य - श्राम से पाँच सहस्र -- वर्षपूर्व भगवान् बादरायण ने भारतीय संस्कृति की अखण्डा -- ज्ञानज्योति को इस संकलनरूप तैला-हुति से पुनः प्रज्ज्वलित किया, जिस के लिए भारतीय प्रजा यावच्चन्द्रदिवाकरौ इस महापुरुष के प्रति श्रद्धा-लियां हीं श्रर्पित करती रहेगी । एक प्रासङ्गिक, किन्तु महत्त्व पूर्ण प्रश्न | भगवान बादरायण ने पहिले - पुराणसंहिता का संकलन किया, अथवा तो पहिले वेदसंहिताओं का?, इस महत्व पूर्ण प्रश्न का जो उत्तर पुराणरहस्य-२२
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड वित्, पुराणकथाप्रतिपादक महाभाग सूत ने दिया है, वह भी एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण तथ्य की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा है, जिस उत्तर का विकलरूप है— पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ॥ - पुराणेषु वचनाक्षरार्थ- यही है कि ' भगवान् चतुर्मुख ब्रह्माने सम्पूर्ण शास्त्रों से पहिले ' पुराण– शास्त्र ' का ही स्मरण किया है । अर्थात् उनके मुखपङ्कज ' से सर्वप्रथम ' पुराणशास्त्र ' ही अभिव्यक्त हुआ है । पुराणशास्त्र की प्राथमिकी अभिव्यक्ति के अनन्तर ही ब्रह्मा की मुखचतुष्टयी से वेदशास्त्र का विनिर्गमन हुआ है । " वेद और पुराण के स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्मा माने गए हैं, - पुराणशास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कि मान्यता वैदिक - तत्त्ववाद से सर्वथा अभिन्ना बनी हुई है । " ब्रह्माने पहिले पुराण बनाए, श्रनन्तर वेद ” यही उक्त पुराणवचन का फलितार्थ है, जिस पर सम्भवतः कोई भी वेदभक्त विद्वान् सहसा इस लिए श्रास्था नहीं करेगा कि, उस वेदभक्त की मान्यता में ' वेद ' ही ब्रह्मा की प्रथमा कृति है, एवं वेदशास्त्र पुराणों से कहीं प्राचीनतम शास्त्र है | वेदभक्तों की इत्थंभूता मान्यता का भी समादर ही किया जायगा महाभाग सूत के द्वारा उपनिबद्ध अष्टादश - पुराणों, तथा अष्टादश - उपपुराणों की दृष्टि से भी, एवं पुराणपुरुष भगवान् व्यासदेव के द्वारा संकलिता ' पुराणसंहिता ' की अपेक्षा से भी, जो कि व्यासदेव के द्वारा संकलिता ' पुराणसंहिता ' अन्यान्य वेदशाखा — संहिताओं की भाँति भारतीय - प्रजा के दुर्भाग्य से आज अनुपलब्धा है । क्योंकि संकलिता-पुराणसंहिता, एवं तदाधारेण उपनिषद्ध अष्टादशपुराणोपपुराणों का संकलन तथा निर्माण अवश्य ही शब्दात्मक वेदशास्त्र के अनन्तर ही हुआ है । और इसी स्थूलदृष्टि से वेदों का पूर्वभावित्त्व, तथा पुराणों का उत्तर - भावित्व भी मान्य मान लिया जासकता है । किन्तु?...... । ' किन्तु ' का प्रयोग इसलिए करना पड़ रहा है कि, पुराणशास्त्र ने जिस ' पुराण ' का भगवन् ब्रह्मा के मुख से वेदों से भी पहिले उद्गम बतलाया है, उस ' पुराण ' का सृष्टिरहस्य के प्रतिपादक, सङ्क ेतभाषामय-परम्परासिद्ध - ज्ञानविज्ञानात्मक उन चिरन्तत - आख्यानोपाख्यानों के साथ ही सम्बन्ध है, मिन का स्वयं वेद-शास्त्र ' एतद्ध सौपर्णमाख्यानमाख्यानविद श्रचक्षते इत्यादिरूप से बड़े गौरव से संस्मरण कहता रहा है । श्राख्यानविदों की परम्परा में अनादिकाल से चले आने वाले इन सृष्टीतिवृत्तों - आख्यानोपाख्यानों-को मूलसूत्र मानकर ही शब्दात्मक - वेदशास्त्र का आविर्भाव हुआ है ऋषिप्रज्ञा के द्वारा । इसी वस्तुतथ्य के आधार पर असंदिग्धरूपेण यह मान लिया जासकता है कि - ' पुरा नवं भवति - इति - पुराणम् ' ( जो आरम्भ में नवीन था, वही ' पुरा - नव ' रूपेण - ' पुराणम् ' कहलाया ) इत्यादि निर्वचन से अनुप्राणित परम्परया श्रख्यानोपाख्यानरूपेण श्रुतोपश्रुतित, वेदशास्त्र, एवं पुराणसंहिता, तथा अष्टादशपुराणों का मूलाधार-स्तम्भरूप “ पुराण ” सचमुच ही तो वेदशास्त्र से भी पूर्व ही विनिर्गत है भगवान् ब्रह्मा के मुखपङ्कज से । इदमत्रावधेयं विशेषरूपेण । लोकप्रवृत्तियों में हम देखते हैं कि, जो भी लोकविद्वान् अपने चिरन्तन-अध्यवसाय - श्रम - परिश्रम से जिस विषय में जो भी नवीन अन्वेषण, किंवा नवीन अधिकार करता है, उस के २३
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किञ्चिदिव आवेदन उस अन्वेषण, किंवा आविष्कार की लोकसाधारण में स्वतः ही एक ' कहानी ' बन जाया करती है, जिस का सुसंस्कृतरूप है - ' कथा ' लोकसंस्कृत में जो ' कथा ' कहलाई है, छन्दोऽम्यस्ता नाम की वेदभाषा में वही ' गाथा ' नाम से प्रसिद्ध है । वैदिकी गाथा, लौकिकी कथा, एवं सामान्यजनानुबन्धिनी ' कहानी ' तीनों श्रभिन्नार्थक मान लिए जासकते हैं, क्योंकि तीनों का श्राविर्भावात्मक मूलधरातल अधिकांश में समतुलित ही है | राजस्थान का अमुक वर्गविशेष अमुक - विशेष - तारों से समन्वित- ' सारङ्गी ' समतुलित - वाद्ययन्त्र के आधार पर राजस्थान के लोकेतिवृत्तों के द्वारा ग्रामीण जनता का मनोऽनुरञ्जन किया करता है, जो श्राज के स्वतन्त्र भारत के स्वतन्त्र – सत्ताधीशों की दृष्टि में भारत की ' लोकसंस्कृति ' का आसन ग्रहण किए हुए हैं । तथाकथित वादकवृन्द ध्रुच - प्रल्हाद - मीरा - श्रादि के ऐतिहासिक चरित्रों का - सत्यवचनसंरक्षक - महाभाग तेजाजी के पावनचरित्र का, अपने उदारदान से समर्थों के प्रति ग्रात्मसमर्पण में सुप्रसिद्ध सर्वश्री दूँगजी - जवाहरजी, एवमेव अन्यान भी लोकप्रसिद्ध चरित्रों का तद्वाद्ययन्त्र के द्वारा श्रोतृवर्ग का अनुरञ्जन करते रहते हैं । गा - गा-कर सुनाए जाने वाले इत्थंभून ऐतिहासिक चरित्र भी एकप्रकार की - ' लौकिकी गाथाएँ ' हीं मानीं जायँगी | स्वयं - वैदिकयुग में भी सुप्रसिद्ध - शास्त्रीय वाद्ययन्त्र - ' वीणा ' के माध्यम से अमुक यज्ञ कर्म्म- विशेषों में इसप्रकार की सृष्टि चरित्रात्मिका इतिवृत्तरूपा यशोगाथाओं के गान का समावेश था, जैसा कि - ' वीणागाथिनो गायन्ति ' इत्यादि से स्पष्ट है । सुप्रसिद्ध ' राजसूय यज्ञ में तो राजसूययज्ञानुष्ठानकर्त्ता के राजमन्दिर में प्रतिष्टित दो श्रेष्ठतम वीणावादक ब्राह्मणों के द्वारा एकवर्ष पर्य्यन्त तथाविधा यशोगाथाओं का विधान हुआ है । निवेदन - निष्कर्ष यही है कि, गाथारूप - कथा - कहानी की परम्परा अनादि है, और इन गाथा-कथा - कहानीरूप अनादि उन चरित्रों- आख्यानोपाख्यानों का नाम ही है- पुराण ' ', जिनके आधार पर ही शास्त्रीय, एवं लौकिक, सभी प्रकार के तथ्य समय - समय पर आविर्भूत - तिरोभूत होते रहते हैं । अतएव इत्थंभूत चिरन्तन ' पुराण ' को अवश्यमेव ' प्रथमशास्त्र ' माना जासकता है । और एकमात्र इसी सहज तथ्य के आधार पर ' पुराणं सर्गशास्त्राणां प्रथमं ब्रह्मणा स्मृतम् ' इत्यादि पूर्वोक्त वचन समन्वित हुआ है | जिसप्रकार भगवन् बादरायण ने तत्तद् ऋषिवंशों में प्रतिष्ठित प्रकीर्णभावापन्न वेर्दो के संकलन से ' वेदसंहिता ' का स्वरूप- समन्वित किया था, तथैव लोकप्रसिद्ध - वेदशास्त्रमूलक - परम्परया श्रुतोपभुत ' गाथा ' - ' कथा ' रूप सृष्टीतिवृत्तात्मक मूलसूत्रों का भी संकलन किया, और वही संकलन ' पुराणसंहिता ' नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिस के आधार पर महाभाग सूतने अष्टादशपुराणोपपुराणों का विस्तार किया । ' पुराण ' प्रसङ्गतः वेद, श्रीर पुराण से अनुप्राणित पौर्वापर्य्यं का दिग्दर्शन कराना पड़ा, जिससे प्रकृत में यही निवेदनीय है कि, आख्यानोपाख्यानरूपा गाथा - कथाओं के रूप में परम्परया व्यवस्थित सृष्टिविज्ञानेति-वृत्तात्मक - वेदतोऽपि पूर्वभावी जिस पुराण के आधार पर ऋषिप्रज्ञा के द्वारा वेदमन्त्र उपनिबद्ध हुए हैं, उन वेदमन्त्रो के व्याख्याभूत ' विधि ' नामक वेद के ब्राह्मणभाग में ( शतपथ- ऐतरेय तैत्तिरीय - गोषथ-जैमिनी - शाङ्खायन आदि सुप्रसिद्ध ब्राह्मणग्रन्थों में ) वेदपूर्वभावी गाथाकथात्मक पुराण की आख्यानो-पाख्यानप्रधाना पारिभाषिकी शैली का ही अनुगमन हुआ है । अर्थात् मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र के ब्राह्मला-नुगत ' विधि ' भाग में प्रमुखरूपेण ऋषियोंनें वेदाधारभूत पुराण की आख्यानोपाख्यानशैली को ही प्रधानता टी है । और आगे चलकर व्यासकृता वेदोत्तरभाविनी व्यासकृता पुराणसंहिता में, तथा तदनुगत पुराणोष-पुराणों में भी इसी आख्यानोपाख्यानशैली का विस्तार से उपबृंहण हुआ है । इस साम्य का यही २४
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड निष्कर्ष है कि, ब्राह्मणग्रन्थों के पारिभाषिक आख्यानोपाख्यानों, तथा पुराणों के आख्यानोपाख्यानों का तत्त्वा त्मक - पारिभाषिक - समन्वयबोध जबतक नहीं प्राप्त कर लिया जाता, तत्रतक न तो मूलसंहिताओं के मन्त्रों से अनुप्राणित विज्ञान - स्तुति - इतिहास - रूपा ज्ञातव्यत्रयी का ही समन्वय सम्भव, एवं न विधि - आरण्यक -उपनिषत् - द्वारा प्रतिपादिता कर्म्म - उपास्ति - ज्ञान- त्रयी - रूपा कर्त्तव्यत्रयी का ही स्वरूप - समन्वय सम्भव | तात्पय्य - ब्राह्मणग्रन्थों के, और पुराणशास्त्र के पारिभाषिक -- रहस्यात्मक -- नैगमिक - - समन्वय के बिना शेषभूत ज्ञातव्य कर्तव्य - भावापन्न वेदशास्त्र का, एवं तदनु स्वयं ब्राह्मणग्रन्थों, एवं पुराणों का भी एकाक्षर भी तो गतार्थ नहीं बन सकता, कदापि नहीं बन सकता । ब्राह्मणग्रन्थों की रहस्यपूर्णा परिभाषाओं के स्वरूप - विश्लेषक ' गाथा ' ' निगद ' - कुम्च्या ' निवित आदि नामक अवश्य ही स्वतन्त्र पारिभाषिक - प्रन्थ -- रहे होंगे, जिनके कि -- मूल ब्राह्मणग्रन्थों में यत्र तत्र उपलब्ध हो रहे हैं । एवमेव भगवान् व्यासदेव के द्वारा संकलिता - ' पुराणसंहिता ' में पुराणशास्त्र के सृष्टि - प्रतिसृष्टि-वंश - वंशानुचरित - गाथा - कल्पशुद्धि - सिद्धान्त - संहिता - डामर -- जामल - तन्त्र - ज्योतिष्चक्र -- ( खगोल ) भुवनकोश ( भूगोल ) दुगार्गल - आख्यान -- उपाख्यान - आयती - श्रायतन, नामक सुप्रसिद्ध पुराणोक्त अठारह तात्त्विक विषयों की परिभाषाओं का भी अवश्यमेत्र स्पष्टीकरण हुआ होगा । किन्तु दुर्भाग्यवश वैदिकी-परिभाषा के विश्लेषक गाथा - कुम्ब्या - निगद् - आदि - ग्रन्थों की भाँति पुराणपरिभाषाओं का विश्लेषक ' पुराणसंहिता ' नामक ग्रन्थ भी आज अनुपलब्ध है । अतएव ब्राह्मणसाहित्य, और पुराणसाहित्य, दोनों ह्रीं महत्त्वपूर्ण साहित्य अनेक शताब्दियों से अपने अत्यन्त रहस्यपूर्ण - पारिभाषिक -- वैज्ञानिक - परम्परासिद्ध-तात्त्विक ·· अर्थसमन्वय से पराङमुख ही प्रमाणित होते आरहे हैं, जिस इस पराङ्मुखता का ही यह भीषण परिणाम है कि – भारतीय विद्वत्समाज अनेक शताब्दियों से ब्राह्मणों, एवं पुराणों के तात्त्विक अध्ययना-ध्यापन से अधिकांश में तटस्थ बनता हुआ साम्प्रदायिक -- मनोऽनुगता - काल्पनिक - व्याख्याग्रन्थों को ही ' प्रमुख-शास्त्र ' मान बैठने की महती भ्रान्ति करता हुआ अपने वेद -- पुराण -- सिद्ध गरिमामहिमामय - सांस्कृतिक - महान्-कोश की तत्त्वमीमांसा से, तथा तदनुगता आचारनिष्टा से विगत तीन सहस्राब्दियों से वञ्चित ही होता रहा है, और यही भारतराष्ट्र के आत्मिक बौद्धिक -मानसिक तथा शारीरिक- पारतन्त्र्य का प्रमुख कारण है, जो भवावह घोरघोरतम कारण दुर्भाग्यवश आज तो काल्पनिकी ' धर्मनिरपेक्षता ' के द्वारा ओर भी अधिक भयावह प्रमाणित होगया है । सैषा स्थितिः । साम्प्रतं स्थितस्थ गतिश्चिन्तनीया । प्रत्यक्ष में पारिभाषिक तत्त्वबोध का कोई ऋजुसूत्र हमें उपलब्ध नहीं होरहा | ऐसी विषमा - अवस्था में ब्राह्मणों, और पुराणों के आख्यानोपाख्यानों से सम्बन्ध रखने वाली रहस्यपूर्णा - ज्ञानविज्ञानात्मिका परिभाषाओं के स्वरूपबोध का क्या उपाय १, जब यह महान् प्रश्न हमारे सम्मुख उपस्थित होता है, तो वेदग्रन्थिविमन्थनपटु - परिभाषातत्त्वाविष्कारक - श्राचार्य्यचरण श्रद्धय पूज्य प्रज्ञाजी महामहाराज का यही ' उद्बोधनसूत्र ' दृष्टि के सम्मुख अभिव्यक्त होपड़ता है कि, " वेद की पारि-भाषिकी गहनाटवी में प्रवेश करने के लिए हमें - ' आर्य सर्वस्व ' रूप महान् आलोक को ही माध्यम बनाना पड़ेगा " * । श्रार्य्यजाति का सांस्कृतिक - महान् गौरव जिस पुराणशास्त्र में बोधगम्या * विगत तीन सहस्राब्दियों के अनन्तर अपनी आयु के चालीस वर्षों के गुहा निहित अजस्र - तपोमय महान् सत्त्र से विलुप्तप्राया वैज्ञानिकी परिभाषाओं के आविष्कारक वेदसमुद्र पूज्यचरण प्राचार्य्यप्रवर ( पू ० श्रद्धेय श्रीमधुसूदनजी महाराज मैथिल ) ने पुराणों को — ' आर्य्यसर्वस्व ' श्रभिघा से ही समन्वित किया है । २५
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किञ्चिदिव श्रावेदन प्राञ्जलभाषा में संकलित हुआ है, वह पुराणशास्त्र पूज्य आचार्य्यचरण की दृष्टि में “ आन्यों का सर्वस्त्र ' ही बना हुआ है । एवं अध्यापनकाल में पुनः पुनः आप पुराणस्वाध्याय पर ही विशेष बल देते रहते थे । ' उद्बोधनसूत्र ' कोई नवीनतम सूत्र नहीं है । स्वयं मान्य विद्वान् भी शास्त्रचर्चा - प्रसङ्गावसरों पर सामिमान अनुदिन- " इतिहासपुराणभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ' की तुमुल घोषणा करते सुने गए हैं । किन्तु जहाँतक ' पुराणशास्त्र ' के अध्ययनाध्यापन का सम्बन्ध है, वहाँतक तो विद्वानों की वह तुमल– बोषणा सर्वथा - यातयामा ही बनी हुई है । विगत शताब्दियों में तत् तत् सत्तातन्त्र विशेषों के अनुरञ्जन के लिए विनिर्मित काव्य - नाटक - चम्पु - प्रशस्ति- कविता आदि से काल्वालीकृत मनोऽनुगत काल्पनिक साम्राज्य में विचरण करते रहने को ही विद्वत्ता की चरम सीमा मान बैठने वाले हमारे देश के तथाकथित मूर्द्धन्य विद्वानों की दृष्टि में ' पुराणशास्त्र ' तो एक सर्वथा उपेक्षणीय शास्त्र ही बना हुआ है । यही नहीं, पुराणकथानुगति से अनुप्राणित . तो इनके लिए सर्वथा.... आलयालम् | अलमति पल्लवितेन श्रापातरमणीय - कणकटु-+ पुराणपाठक सङ्ग ेन । हमारी तो अपनी ऐसी श्रात्मनिष्ठा है कि, पुराणशास्त्र के पारिभाषिक स्वाध्याय के बिना ब्राह्मण साहित्य का पारिभाषिक - तर्त्वार्थबोध सर्वथा ही असम्भव है, एवं ब्राह्मणभाग की परिभाषाओं के बिना उस ओर की मन्त्रसंहि-ताओं का, तथा इस चोर के आरण्यकोपनिषद् भाग का तत्त्वात्मक पारिभाषिक - समन्वय भी असम्भव ही है । यों पर-म्परया वेदार्थसमन्वय में प्रथम पुराणशास्त्र, तदनन्तर वेद का ही ब्राह्मणभाग, ये दो ही प्रमुख आधारस्तम्भ बने हुए हैं, जिन दोनों को ही अपनी स्वाध्याय परम्परा से पराङमुख कर देने वाले देश के मूर्द्धन्य विद्वान् भी राष्ट्र के मौलिक साहित्य - वेदशास्त्र के ज्ञानविज्ञानात्मक - अभ्युदय - निःश्रेयस् – संसाधक - महतोमहीयान् उदर्क से एकान्ततः वश्चित ही बने रह गए हैं । क्या पुराणोक्त आख्यान- उपाख्यानों से सम्बन्ध रखने वाले विश्वित्रतम प्रत्यक्ष दृष्टया असम्भवतम-प्रतीत होने वाले कथोपकथनों से अनुप्राणिता परिभाषाओं का पुराणवाचनमात्र से समन्वय होनायगा?, यही वट जटिलतम प्रश्न है, जिसे हमने उपयोगितापादानुबन्धी - बुद्धिवादात्मक महान् बुद्धिव्यामोहन से आज उस सीमापय्यन्त भयानक प्रश्न बना लिया है, जिसका ढूँढे से भी कोई समाधान हमें उपलब्ध नहीं होरहा । इसी तथाकथिक प्रश्न से सम्बन्ध रखने वाली एक रहस्यपूर्णा समाधान - परम्परा का भगवान् वेदपुरुष के स्वयं के मुख से ही निम्नलिखित संस्मरण कर लेना प्रासङ्गिक मान रहे हैं कि-उत त्रः पश्यन्न ददर्श वाचं, उतत्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसले जायेव पन्ये- उशती सुत्रामा ॥ - ऋक्संहिता १० / ७१।४ । मन्त्रचरार्थ स्पष्टतम है, जिसका निष्कर्ष यही है कि, कुछ एक अध्ययनशील महाभाग तो इस श्रेणि को समलङ्कृत कर रहे है कि, मन्त्रार्थ पर दृष्टि रखते हुए भी जो इस दृष्टि से वञ्चित ही बने रह जाते हैं । : - शास्त्रैर्विहीनाश्च- पुराणपाठकाः २६
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शतपथब्राहारण २ खण्ड कितने एक महानुभाव सुनते हुए भी वाग्देवी के स्वरूप - श्रवण से पराङ्मुख ही प्रमाणित होते रहते हैं । और कुछ एक वैसे भी ग्रात्मनिष्ठ सहज श्रार्षमानव श्रेष्ठ है, जिनके लिए स्वयं वाग्देवी अपने बाह्य-आभ्यन्तर - सम्पूर्ण स्वरूप को स्वतः ही उसी प्रकार अभिव्यक्त कर देती है, जैसे कि पतिपरायणा सहधर्म्म -चारिणी गृहिणी अपने पति के लिए सर्वथा अभिव्यक्ता बनी रहती है । परिभाषाओं का स्वरूपबोध क्या देखने - सुनने मात्र से सम्भव है?, प्रश्न का तथाकथित श्रौत समाधान से अतिरिक्त और क्या समाधान होगा? । अहर्निश वेद - पुराण के अक्षरों पर दृष्टिपात किए रहने मात्र से, किंवा अहर्निश पुण्यपाठ - श्रवणमात्र से कदापि तत्रतक इस शब्दब्रह्म के पारिभाषिक - तथ्यों की अभिव्यक्ति सम्भव ही नहीं है, जबतक कि हम अपने वैय्यक्तिक - बुद्धिवाद के माध्यम से, सहजभाषा में बुद्धि प्रतिभा - मेधा - लगन के बलातिमान से इस ओर प्रवृत्त रहते हैं । अवश्य ही बुद्धिवादात्मिका मेधा हमें बाचाल बना देगी, तर्कपटु प्रमाणित कर देगी, लोकसमाज में हमें धुरन्धर विद्वान् भी प्रमाणित करा देगी | किन्तु इन सच आडम्बरों के सफल होजाने पर भी बुद्धिवादात्मक दावानल से सर्वात्मना झुलस जाने वाला श्रद्धारस सर्वथैव अभिभूत हो जायगा, जिसके बिना स्वयं की परितृप्ति - तुष्टि कदापि सम्भव नहीं है । श्रद्धाविहीन ऐसे शुष्कतम - बुद्धिवादात्मक - पाण्डित्य का ही नाम है - ' व्यक्तित्त्वविमोहन ' जिसका प्रमुख आधारस्तम्भ मानी गई है — ‘ दिग्देशकाल - निबन्धना - लौकैषणा, लोकख्याति ', जिसका सीधासा अर्थ यही है कि, “ हम अपने आप में भले ही करुण चीत्कार ही करते रहें अपनी रिक्तता के कारण, किन्तु लोक - समाज में हमारा अमुक स्थान प्रतिष्ठित होजाय " । वित्तैषणागर्भिता इत्थंभूता सर्वनाशकारिणी लोकैषणा से ही हमारे बौद्धिक क्षेत्र में प्रतिमानात्मक वह बुद्धिवाद अभिव्यक्त होपड़ता है, जिसके कारण हमारी बुद्धि दिग्देशकालातीत - अनन्त - श्रात्मा से श्रनुप्राणित स्वात्मन्त्रोध से पृथक् रहती हुई दिग्देशकालनिबन्धन - सामयिक - तात्कालिक - उन्नतिमूलक - ‘ उपयोगितावाद ’ की घोरघोरतमा मन्त्रणा से पीड़ित होजाती है, जिस उपयोगितावादात्मक - कारणतावाद से ही हमारी बुद्धि स्वस्वरूप से विमुग्धा बनती हुई ' उतो स्वस्मै तन्त्रं विससे जायेव पत्ये उशती सुवासा ' रूप महान् अनुग्रह से सर्वथैव वञ्चित रह जाती है । और हम अत्र पूर्व के अमुक तथ्यों को गौण मानते हुए इसी तथ्य पर आते हैं कि, अमुक सीमा-पर्य्यन्त पुराण साहित्य, तथा ब्राह्मणसाहित्य की परिभाषाओं से अपरिचित रह जाने का प्रमुख कारण दिग्देश-कालानुबन्धी- कारणतावाद के आकर्षण से अनुप्राणित बुद्धिवादात्मक स्वस्वरूप का व्यामोहनात्मक वह अतिमान ही है, जिसके कारण राष्ट्र की प्रचण्ड - मेवाएँ भी वेदशास्त्र की ज्ञान - विज्ञानात्मिका परिभाषाओं के सम्पर्क से पराङमुख बनीं रह गई । ' त्रयं वेदज्ञाः ' - ' वयं पुराणाचार्याः ' - ' वयं शास्त्रमर्म्मज्ञाः ' रूप व्यक्तित्त्वविमोहन ने ही राष्ट्र की मूर्द्धन्या भी प्रज्ञाओं को तत्त्वार्थ के सम्पर्क में नहीं आने दिया । क्योंकि सभी की अपनी अपनी स्वतन्त्र - व्यक्तित्त्वमूला मान्यताएँ हैं । अपनी मान्यता बना कर उसके आधार पर मान्य विद्वान् वेदार्थ समन्वय में प्रवृत्त होते हैं । सहजभावानुसार- हमने वेदाक्षरों के ऋजुभावापन्न समन्वय की उपेक्षा कर उसके द्वारा अपनी मान्यताओं का समर्थान्वेषण आरम्भ कर दिया । और यों सहज ऋषि की ऋजुप्रज्ञा से सहनरूपेणैव स्वत: एव विनिर्गता वेदवाणी को हमने बुद्धिवादात्मक दिग्देशकाल के उम्र पलड़े पर तौल डाला, जिस लौकिकी तराजू में बुद्धिवाद के द्वारा लोकानुबन्धी- भूत - भौतिक - दिग्देशकालात्मक - पदार्थों २७
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किञ्चिदिव श्रवेदन काही तुलन हुआ करता है । इसी महती भ्रान्ति से वेद का ऋजुभावापन्न पारिभाषिक अर्थ हम से उत्तरो-तर विदूर ही होता गया । और इसी भ्रान्तिपरम्परा के कारण उस दूरव ने कालान्तर में इस महान् शास्त्र को ‘ दिग्देशकालानुत्रन्धिनी - उपयोगिता कारणता ' के माध्यम से सर्वथा उपेक्षणीय ही प्रमाणित कर दिया, जैसाकि कुछ ही समय पूर्व राजस्थान के ही एक उच्चपद पर समासीन ( स्वयं किसी युग के प्राच्य -संस्कृतिभक्त ) एक महानुभाव ने प्रस्तुत वैदिक - साहित्य के - परोरजा - स्वयम्भू - इन्द्र- वरुण आदि पारिभा-चिक - तथ्यों को ककर्णिपरम्परया सुन कर अपने इत्यंभूत महान्? उद्गार प्रकट किए थे, कि " आज के युग में इन तथ्यों का क्या उपयोग १, वर्त्तमान के जनजीवन में इनकी क्या उपयोगिता ” । बुद्धिवादात्मक तथाकथित व्यक्तित्त्वत्रिमोहन ही एकमात्र वह महान् प्रतिबन्धक है, जिसके अनुबन्ध से हम वेदाक्षरों को देखते हुए भी नहीं देखते, सुनते हुए भी नहीं सुनते । अपितु सबकुछ देख सुन कर भी हम तद्वस्तुतथ्य से पराङमुख ही बने रह जाते हैं, जब कि बुद्धिवादात्मक प्रतिमानात्मक विमोहन से संस्पृष्ट रहने वाले ऋजुप्रज्ञ महज मानवों के लिए वे ही वेदाक्षर स्वयं ही अपना परिभाषिक तथ्य अभिव्यक्त कर दिया करते हैं, एवं ‘ उत त्त्रः पश्यन्न ददर्श वाचम् ' इत्यादि पूर्वमन्त्र के द्वारा इसी तथ्य का स्पष्टीकरण हुआ है । लोकैषणानुगत - यशोनामख्याति - लालसा से समा लुत - दिग्देशकालानुबन्धी- उन्नतिमूलक - कारणतावाद के प्रति प्रतिक्षण आकर्षित बुद्धिवादात्मक व्यक्तित्त्व - विमोहन का परित्याग ही वेद - पुराणादि श्रार्षशास्त्रों के गुहानिहित - रहस्यात्मक - पारिभाषिक ज्ञानविज्ञान भावों के बोध का एकमात्र कारण है, जिसका निष्कर्षार्थ यही है-' निष्कारणबुद्धया शास्त्र - स्वाध्यायानुगति ' । क्या तथ्य, किंवा क्या तात्पर्य्यं है इस निष्कारणता का, जिसे हम अत्र स्वाध्यायनिष्ठा में अन्यतम कारण मान रहे हैं?, प्रश्न का शतपथब्राह्मण के पूर्व प्रकाशित प्रथम-खण्ड – की भूमिका में — ' ब्राह्मणेन निष्कारणं षडङ्गो वेदो ध्येयो ज्ञेयश्च ' रूप महान् सूत्र की मीमांसा करते हुए विशद समाधान किया जाचुका है । श्रतएव श्रत्र तत्पष्टपेषण अनावश्यक है । सन्दर्भसङ्गतिमात्र के लिए अत्र इस सम्बन्ध में यही स्पष्टीकरण पर्याप्त होगा कि -मानव का बुद्धिसहकृत प्रज्ञान मन जब दिग्देशकालानुबन्धी किसी व्यक्त - कारण की चर्व्वणा में तल्लीन होजाता है, तो बुद्धि, और मन की चिन्तन - मनन- शक्तियाँ - विकीर्ण होजाती हैं । सहजभाषा में बुद्धि का चिन्तनधर्म, एवं मन का मननधर्म्म, दोनों स्वाध्याय में अनन्य न रह कर कारणरूप फल के प्रति विभक्त होजाते हैं । एकतानता का उच्छेद होजाता है, एवं लक्षीभूत स्वाध्याय से श्रनुगत वह पारिभाषिक तथ्य परोक्ष ही बना रह जाता है चिन्तन - मनन की एकातानता के अभाव में निष्कारण बुद्धि से ही मानव में ऐकान्तिकी गुहा निहितवृत्ति का उदय होता है । और इत्थंभूता गुहानिहितवृत्ति क्योंकि समाज - लोक बाह्य-भावों में सहजरूपेणैव उदासीनवत् बने रहने वाले आत्मयाना नैष्ठिक ब्राह्मण से ही समन्वित मानी गई है । अतएव सर्वथैव निष्कारणभावानुगत ब्राह्मण, एवं सर्वश्री राजन्यत्रन्धु क्षत्रिय ) तथा भलन्दनवंशज वैश्यमहाभाग, वेदस्वाध्यायाधिकारी इन तीनों त्रैवर्शिकों में से तथाभूता निष्कारणता में सर्वात्मना सफल ' गुहानिद्दित ' ब्राह्मण ही बन सकता है । क्योंकि क्षत्रिय अपने ' सौय्यंमारुति कधर्म ' से, तथा वैश्यत्रन्धु अपने ' वातात पिकधर्म्म ' से दिग्देशकालानुचन्वौ कारणता - समन्वित - लोक बाह्य जीवन से सर्वथैव निष्कारण २८
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शतपथब्राह्मण २ खण्ड प्रमाणित नहीं हो सकता । अतएव ऋषिप्रज्ञाने एकमात्र गुहानिहित ब्राह्माण के लिए ही निष्कारणतानुबन्धी प्रचण्डतम आदेश विहित माना है, जैसाकि ' ब्राह्मणेन निष्कारणं पडङ्गः ० ' इत्यादि पूर्वोक्त आदेशवचन से स्पष्ट है । क्योंकि ‘ ब्राह्मणमानव ' ही मनोऽनुग ' काम ', एवं शरीरानुगत ' अर्थ ' इन दोनों प्राकृत - दिग्देश-कालानुत्रन्धी - बाह्य - पर्वों से सम्बन्ध रखने वालीं लोक - समाजानुगता कारणताओं के प्रति ( अपने आत्मबुद्धि-निबन्धन ग्राभ्यन्तरधर्म्म से ) तटस्थ - निरपेक्ष बना रहता हुआ मानमिक, तथा शारीरिक उत्पीड़नरूपा-ऐहलौकिकी क्लेशपरम्परा का साभिनन्दन समादर करता हुआ गुहानिहितवृत्या स्वाध्यायनिष्ठा में निष्कारण-बुद्धया सत्त्ररूपेण प्रतिष्ठित बना रह सकता है, और यही ब्राह्मण की स्वरूप - परिभाषा मानी है पुराणपुरुष भगवान् बादरायण ने * । जो ब्राह्मण मनःशरीरानुबन्धी लोकानुगत समाज - सापेक्ष - लौकैषणाप्रवद्धक- अपने ' बाह्य व्यक्तित्व ' को विस्मृत कर दिग्देशकालातीत अनन्तब्रह्म की अनन्तनिष्ठा के माध्यम से गुहनिहितनृत्या जरामर्य्यसत्त्रवत् स्वाध्यायनिष्ठ नहीं बना रहसकता, कदापि वह ' ब्राह्मणत्त्व ' को अन्वर्थ नहीं बना सकता । एवं ऐसे ब्राह्मण वरूप ब्राह्मणबन्धु से कदापि निष्कारणबुद्धया स्वाध्याय - प्रक्रान्ति सुरक्षित नहीं रह सकती । अपितु ऐसा लॊक -- समाज- लिप्त ब्राह्मण तो राजन्यबन्धु-- वैश्यबन्धु-- महानुभावों की श्रेणि में आता हुआ बुद्धिवादात्मक उस व्यक्तित्त्वविमोहन का ही सत्पात्र? बना रह जाता है, जिस बुद्धिवादात्मक - विमोहन की प्रत्येक मान्यता ‘ कारणता ' को गर्भ में प्रतिष्ठित करके ही प्रवृत्त हुआ करती है, और जो कारणता लक्ष्य से परा: परावता प्रमाणित होती हुई ' कारणता ' पर ही परिसमाप्त होती रहती है मानव के दिग्देशकालानुचन्धी मनः शरीरानुगत - कामार्थप्रधान - प्राकृत जीवन की क्षणिक - - मृत्यु के साथ साथ ही । निरतिशय परिताप के साथ हमें इस नग्न सत्य का श्राज स्पष्टीकरण करना ही पड़ रहा है कि, विगत-भुक्त - प्रक्रान्त -- अनेक शताब्दियों से भारतराष्ट्र की ब्राह्मणप्रज्ञा भी इतर वर्णों की भाँति दिग्देशकालानुगता-कारणाता की, उन्निबन्धना ' उपयोगिता ' की, एवं तदनुप्राणिता - सामयिकी - ' उन्नति ' की चर्व्वणा से चर्च्छितान्तः-करण बनी रहती हुई बुद्धिवादात्मक - मनः शरीरानुगत - कामार्थमय उस व्यक्तित्त्वविमोहन की अनुगामिनी ही प्रमाणित होती आरही है, जिस विमोहन ने ही उन शताब्दियों में इस ' भूसुरश्रेष्ठ ' को वेद - पुराणादि श्रार्ष-ज्ञानविज्ञानात्मक - गुहानिहित - पारिभाषिक तथ्य के साथ अन्तर्य्याम - सम्बन्ध नहीं स्थापित करने दिया । अपितु ठीक इसके विरीत विगत शताब्दियों में इस विद्वान् भी, मेधावी भी, शब्दशास्त्रपारङ्गत भी ब्राह्मण ने - दिग-देशकालानुन्धी - सत्ता - समाज - लोक - सापेक्ष - तात्कालिक लाभों के आकर्षणों से आकर्षितमना बनते हुए उसी प्रकर उन परमावों के तात्कालिक - समर्थन - अनुरञ्जन - प्रचार- प्रसार - आदि बाह्यभावों में हृीं अपने को समर्पित कर दिया, जैसे कि आज भी राष्ट्र के तथाकथित कतिपय सांस्कृतिक - विद्वान् वर्त्तमान सत्तातन्त्र--समाजतन्त्र के तात्कालिक- अनुरञ्जन के लिए शब्दानुकरण- सादृश्यमात्र से अपने प्रचण्ड तर्क से समन्वित बुद्धि-बाद के बल पर आज की यातयामा तात्कालिकी मान्यताओं को भी वेदाद शास्त्रों के द्वारा प्रमाणित करते
* - ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न कामार्थाय जायते ।
इह क्लेशाय, तपसे, प्रत्यत्वनुपनं सुखम् ॥
- महाभारते शान्तिपर्वणि ३२१ अध्याये २६
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किञ्चिदि आवेदन हुए अपनी लोकख्याति - मूला- ' उन्नति ' के पथ में सोल्लास समारूढ़ हैं, इति नु - श्रब्रह्मण्यम्! अब्रह्मण्यम्!! महती विडम्बना!!! उक्त अप्रासङ्गिक, नहि नहि सर्वथैव न केवल प्रासङ्गिक ही, अपितु वेदस्वाध्याय- धरातले अनिवार्य -रूपेण श्रावश्यकतम ही तथोक्त सन्दर्भ के आधार पर राष्ट्र के श्रद्ध ेय भूसुरउन्द से प्रणतिपुरस्सर हमें दो शब्दों में यही नम्र आवेदन कर देना है कि, वही वेदशास्त्र है, वही पुराणशास्त्र है, और ऋषिप्रज्ञानुप्राणिता वही है श्राप की प्रज्ञा । केवल व्यक्तित्त्वविमोहनरूप महान् प्रतिबन्धक - के कारण ही ब्राह्मणप्रज्ञा वेद - पुराण के ज्ञान --विज्ञानात्मक -- पारिभाषिक-- समन्वय से पराः परावता प्रमाणित हो रही है । जबतक विद्वान् ब्राह्मणों का कारणता-नुबन्धी- उपयोगितावादात्मक मनःशरीरनिबन्धन तथाभूत बुद्धिवादात्मक व्यक्तित्त्वविमोहन स्मृतिगर्भ में विलीन नहीं होजाता, जत्रतत्र लोक - समाजानुबन्धी- बाह्य भावों से सर्वात्मना अपने आप को उदालीनवदान-वत् बनाते हुए ऐकान्तिकी गुहा निहितवृत्या से अपनी जीवनपद्धति को समन्वित नहीं कर लिया जाता, तत्रतक अन्यान्य प्रयत्न- सहस्रों से भी वेदपुराणशास्त्र की ज्ञानविज्ञानात्मिका परिभाषाओं की अभिव्यक्ति का तो अनुग्रह कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । और वैसी अवस्था, किंवा दुरवस्था में न तो ब्राह्मणप्रज्ञा तत्त्वानुगता ही बन सकती, न आर्षनिष्ठानुगत श्राचार से ही समन्वित । रही बात लोकख्याति की, सो तो लोकप्रवृत्तियों का वैसा सहज उत्कर्ष है, जो मानवेतर पशु - पक्षी श्रादि प्राकृत - प्राणी भी अमुक कौशलों से उपलब्ध कर ही लिया करते हैं । हम समझ रहे हैं कि, तथाविध स्पष्टीकरण विद्वान् ब्राह्मणों के लिए न केवल कर्णकटु ही बन रहा होगा, अपितु वे अपने मनोराज्य में हम पर अग्निश्च वायुश्च ही बन रहे होंगे । किन्तु व्यक्तित्त्वविमोहन रूप श्रतिमान के स्वरूप - विश्लेषण का समन्वय बिना तथाविध स्पष्टीकरण के सम्भव ही नहीं है । बुद्धिवादात्मक-व्यक्तित्त्वविमोहनरूप काल्पनिक व्यक्तित्त्व को जबतक निष्ठापूर्वक जलाञ्जलि समर्पित नहीं कर दी जाती, तत्रतक ब्राह्मणप्रज्ञा में समब्रह्ममूला उस ' ऋजुना ' की अभिव्यक्ति सम्भव ही नहीं है, जिस ' ऋजुता ' के बिना मानस घतल पर वेद का तत्त्वार्थ सहजरूपेणैव स्वत: ही अभिव्यक्त नहीं हो सकता । स्वयं वेदमहर्षि ने वेदार्थ--समन्वय की योग्यता के स्वरूप - विश्लेषण के लिए एक ऐसे ही ' उद्बोधनसूत्र ' का स्पष्टीकरण किया है, जिसे भत्र समुद्ध त कर देना प्रासङ्गिक नहीं माना जायगा । विज्ञान - परम्पराओं की रहस्यभेदिका, निरतिशयरूपेण दुरधिगम्या सुप्रसिद्धतमा ऋग्वेदसंहिता का ' अस्यवामीय ' नामक ' सूक्त विद्वत्जगत् में सुप्रसिद्धतम है । जिस केवल ५२ ( बावन ) मन्त्रात्मक स्वल्पकाय सूक्त में ब्रह्माग्निरूपा वामपलितविद्या - सप्ताहोरात्ररूपा सम्वत्सचक्रविद्या, सप्ततन्तु - विताना-त्मिका प्रजातन्तुवितानविद्या, रसगर्भानुगता गातत्वविद्या, रोदसी - क्रन्दसी - संयती - रूपा- त्रैलोक्य-त्रैलोकी विद्या, सप्तप्राणात्मिका सप्तर्षिविद्या, सुपर्णविद्या, यज्ञविद्या, वाग्विद्या, वृष्टिविद्या, आदि आदि भेदेन अनेक रहस्यपूर्ण उन सृष्टिविद्याओं का सूत्ररूपेण संकलन हुआ है, जिन में से एक एक ही विद्या में बड़े से बड़े प्रज्ञाशील मेधावी विद्वान् के भी शिरोविकम्पन की क्षमता विद्यमान है । अत्यन्त रहस्यपूर्णा एवंविद्या जटिलता अनेक सृष्टिविद्याओं को अपनी सूत्रमयी संक्षिप्ततमा आर्धवाणी में केवल ५२ मन्त्रों के माध्यम से स्पष्टीकरण कर देने वाले, मन्त्रसमष्टिरूप स्वामीयसूक्त के द्रष्टा महामहर्षि दीर्घतमा महाभाग का व्यक्तित्त्व कैसा, और कितना महतो महीयान् रहा होगा?, प्रश्न के संस्मरण का भी मादृश अकिञ्चन को अभि-३०