Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1111–1120

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1111–1120

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पचन - अध्याय प्रवरब्राह्मगा शतपथब्राह्मण सूत्रानुगतपद्धतिसंगृहः-" आहवनीयाग्नि के दक्षिण भूप्रदेश में खड़े होकर श्राहवनीयाग्निज्वाला में समन्त्रक बागनुगत उत्तराधार करने के अनन्तर ( जुहू स्थित श्राज्य की विधि धारारूप स आहुति देने के अनन्तर ) वह अध्वर्यु श्राहवनीय से पश्चिम भाग में लौट आता है । वहाँ आकर उपभृन् से असंस्पृष्ट जुहू के चाज्यशेव का ध्रुवापात्रस्थ श्राज्य से सम्बन्ध करा देता है " यह इतिकर्त्तव्यता पूर्वसूत्र से ( ३२२ ) प्रतिपादित हुई है । अत्र क्रमप्राप्त सूत्रानुगत आगे की इतिकर्त्तव्यता बत-लाई जाती है । जुहूस्थित आज्यशेष का ध्रुवास्थित श्राज्य के साथ समञ्जन कराने के अनन्तर, दूसरे शब्दों में पूर्वोत्तरावारद्वय की इतिकर्त्तव्यता समाप्त करने के अनन्तर वह अब उपभृत, जुहू, नाम के दोनों स्रु कुपात्रों को स्वस्थान में ( उनके लिए पहिले से नियत स्थान में ) रख देता है । इस प्रकार पात्रद्वयी के यथास्थान रखने के अनन्तर वह अध्वर्यु होता से उत्तरमार्ग के द्वारा । निकल कर उऩकरकुण्ड के पश्चिम भाग की ओर पूर्वाभिमुख खड़ा होकर इध्मसन्नहनों ( काष्ठ बाँधने के दर्भतृणों ) को अपने हाथ में लेता हुआ " ओ श्रावय " इस निगद्मन्त्र का उच्चारण करता है । ऋषिवंशसम्बन्धी अस्त्र ' आर्षेय ' कहलाने वाले यज्ञकर्त्ता यजमान के वंश का कीर्त्तन करने के उद्देश्य से ही ' ओ श्रावय ' मन्त्र का उच्चारण होता है । इसका तात्पर्य यही निकलता है कि, हे आग्नीध! अब तुम यजमान की दिव्य देवताओं के प्रति सुनवाई करो । अध्वर्यु के मुख से निकलते हुए ' ओ श्रावय ' लक्षण ' श्रावण ' की सफलता सूचित करता हुआ आग्नीध्र नामक ऋत्त्विक अभ्व से उत्तर दक्षिणाभिमुख खड़ा हुआ रुपय, तथा इध्मसन्नहनतृण हाथ में लेकर बोलता है - " अस्तु श्रीषट् ” । श्रध्वर्यु कृत ओ ' श्रात्रय ' कर्म्म ' श्रावण ' कर्म है, एवं आग्नीधकृत ‘ अस्तु श्रौषट् कर्म्म ' प्रत्याश्रावण ' कर्म है । यह श्राश्रावण, तथा प्रत्याश्रावण कर्म्म यज्ञसम्बन्ध को प्रक्रान्त रखने के लिए इध्मसन्नहनों को हाथ में लिए ही करना चाहिए | कितने एक याज्ञिक यज्ञसम्बन्ध की प्रक्रान्ति के लिए वेदि पर बिछे दर्भतृण को, अथवा इध्म की वल्कल को उखाड़ उसे हाथ में लेकर श्राश्रावरण- प्रत्याश्रावरण करते हैं, जिस पक्ष का कि, शात-पथीश्र ुति ने स्वण्डन किया है । इसप्रकार प्रवरणकर्म में सर्वत्र अध्वर्यु श्रावण करता है, आग्नीध्र प्रत्याश्रावण करता है । कर्काचार्य का इस सम्बन्ध में यह स्पष्टीकरण और है कि, इध्मसन्नहनग्रहण केवल होतृवरण सम्बन्धी श्रावण - प्रत्याश्रावण- कर्म्म में ही होता है । आश्रा-वरण प्रत्याश्रावण की इसी इतिकर्त्तव्यता का निम्न लिखित सूत्रचतुष्टयी से स्पष्टीकरण हुआ है-१३८२

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एस श्रध्याय प्रवब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( १ ) — " निधायेध्मसन्नहनान्यादा ' यो श्रावये ' त्याह " ( क ० श्र ० सू ० ३।२।३ । ) ।

( २ ) — ' अस्तु श्रौपडित्यग्नीत् " का ० ३ । २ । ४ । ) ।

( ३ ) — “ वेदिबर्हिरिघ्मशकल म पिच्छिय के " ( वा ०३।२।५ ॥

( ४ ) – “ एवं सर्वत्र ऽऽश्रुत प्रत्याश्रुतेषु " ( का ० ३।२।६ । ) । श्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्मानन्तर वह अध्वर्यु इध्मणों को अपने हाथ में रखता हुआ ही दिव्याग्निलक्षण होता का अपने इस यज्ञ में अग्निर्देवो देव्यों होता देवान् है यतद्विद्वां । इस चिकित्वान्मनुष्वद्भरतवत् " इस निगद्मन्त्र का उच्चारण करता हुआ वरण निम्न करता लिखित सूत्र से प्रकार सर्वप्रथम दिव्याग्नि का ही वरण किया जाता है, जिस वरणकर्म का स्पष्टीकरण हुआ है-" अथ प्रवृणीते ऽग्निर्देवो देव्यो होता देवान्यक्षद्विद्वांश्चिकित्वान् मनुष्वद्भरतवत् " ( का ० ३ | २ | ७ | ) इति । दिव्याग्नि का इसप्रकार होतृत्त्वेन वरण करने के अनन्तर श्रार्षेय - यजमान का नामग्रह्ण पूर्वक वरण करता है । यजमान के सम्बन्ध से ही त्रिसंस्थ ये आर्षेय ' यजमानार्षेय ' कहलाए हैं । पर से इस ओर ' गोतमवत् - भरवत् - अङ्गिरोवत् ' इत्यादि रूप से - ' कश्यपवत् वत्सा-, रवत् -- नैध ७ ववत् ' इत्यादि रूप से, - ' भृगुवत् - व्यवनवत, अप्तवानवत् ' का इत्यादि निगद रूप मन्त्रात्मकत्त्वेन से गौतम कश्यप, भृगु, भरद्वाजादि, यजमान - गोत्रानुसार यजमान के तीनों वंशजों में उपवर्णित हैं, उन उच्चारण करता है । अथवा यजमानकुल में जितने भी मन्त्रद्रा प्रवराज्याय । सब का नाम लिया जासकता है । किसी का मन्त्रकृत एक ऋषि है, वही एक प्रवर कहलाया है । वे कनशः किसी के दो मन्त्रकृत हैं, किसी के तीन हैं, किसी के चार, क्रिसी के पाँच हैं प्रवर हैं, उन सब एकप्रवर, द्विप्रवर, त्रिःप्रवर, चतुष्प्रवर, पञ्चप्रवर कहलाए हैं के । जिसके सम्बन्ध जितने में निष्कर्ष यही है कि, का भी वरण करना पक्षान्तर है, यही तात्पर्य है । दोनों पक्षों वृणीते, आर्षेय प्रवरण में ' आर्षेयं वृणीते ' यह कह कर भगवान श्रापस्तम्ब ने कहा है- एकं | ) । द्वौ वृणीते, त्रीन् वृणीते, न चतुरो वृणीते न पश्चातिवृणीते ' ( ही आप रण ० श्र न्यायप्राप्त ० २।१६ होता यदि सूत्रगत त्रिःपक्ष को विधिपरक मान लिया जाता है, तो तीन का जाता है, एवं यही कात्यायन का प्रथम पक्ष है । यदि ' आर्षेयं वृणीते ' इसे विधि - परक माना है, तो सभी मन्त्र - द्राओं का वरण प्राप्त होजाता है, एवं यही कात्यायन का उत्तरपक्ष है । १३८२

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पञ्चम- श्रध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण अभिषिक्त क्षत्रिय [ राजा ], अनभिषिक्त क्षत्रिय, तथा वैश्य, इन तीनों में वरणकम्र्मानुगता इति-कर्त्तव्यता कुछ विशेषता रखती है । यदि अभिषिक्त क्षत्रिय यज्ञ कर रहा है, तो अध्वर्यु उस क्षत्रिय राजा के कुलपुरोहित के आयों का भी वरण कर सकता है, अथवा स्वयं राजा के आयो का भी वरण कर सकता है । यदि अनभिषिक्त सामान्य क्षत्रिय का, तथा वैश्य का यज्ञ है, तो उस अवस्था में प्रत्येक दशा इनके कुल - पुरोहितों के आयों का ही वरण होता है । एक पक्ष यह भी है कि - ब्राह्मण, अभिषिक क्षत्रिय राजा, अनिभिषिक्त सामान्य क्षत्रिय - वैश्य, सत्रका ' मनुवत् ' इस निगद मन्त्र के द्वारा भी वरण किया जासकता है । निम्न लिखित सूत्रपञ्चक से इमी श्रार्षेय - वरणकर्म्म का स्पष्टीकरण हुआ है--( १ ) – मुदमुव ' दिति यजमानार्षेयाण्याह परस्तादर्वाञ्च त्रीणि ' ( २ ) – ' यावन्तो वा मन्त्रकृतः ' ( ३ ) – ' पुरोहितार्ष्णेयेण वा ' ( ४ ) – ' क्षत्रित्र - गैश्ययोश्च नित्यम् ' ( ५ ) - ' मनुव ' दिति वा सर्वेषाम् ' ( का रा ) । ( का ० ३।२८ ) । ( का ० ३ | २ | ) | ( का ० ३।२।१० ) । ( का ० ३।२।१२ । ) । उक्त प्रकार से आर्षेयोच्चारणानन्तर बह अध्ययु ' ' ब्रह्मण्वदा च वक्षद् ब्राह्मणा अभ्य यज्ञस्य प्रावितारः ' इस निगदशेषमन्त्र का उच्चारण करता है । अनन्तर- ' मुक्तरक्त - शम्र्मा होता मानुषः ' ( असौ मानुषः १ ) यह बोलना है । यह उच्चारण मानुष होता का ही वरण साधक है । मानुष होता का उच्चस्वर से नाम बोलना एक पक्ष है, धीरे से ( उपांशुरूष से ) नामोच्चारण करना पक्षान्तर है । इसप्रकार मानुष होतृवरणानन्तर वह होता ( मानुष होता ) ' एतत्त्वा देव सवित-वृ णीने ० ' इत्यादि [ शतपथब्राह्मणोक्त स्वस्त्ययनजप करने के अनन्तर ] अध्य, तथा आग्नीध दोनों के स्कन्ध प्रदेश का स्पर्श करता है । स्पर्शानन्तर अध्य, तथा आग्नीध, दोनों यथा-स्थान बैठ जाते हैं । इसी इतिकर्त्तव्यता वा उल्लेख करतेहुए सूत्रकार कहते हैं-( १ ) – ' ब्रह्मदा च वक्षद् ब्राह्मणा अस्य यज्ञस्य प्रात्रितारोऽसौ मानुषः ' इति होत नामग्रहणम् ( २ ) – ‘ उपांशु वा ’ ( ३ ) ---- ' सम्मृष्य उपविशतः ' इति सूत्रानुगतपद्धतिसंगूहः ( का ० ३।२।१३ । ) । ( का ० ३ | २ | १४ | ) । ( का ० ३ | २ | १५ | ) । • " असेऽध्ययु मन्त्रारभेत - पार्श्वस्थेन पाणिना, आग्नीधमङ्कदेशेन " - श्र ० श्र ० सू ० १ ३ २५ २६ | १३८४

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पञ्चम अध्याय वैज्ञानिक - विवेचना-: - श्रावणकम्मोपपत्तिः-प्रवरब्राह्मण प्रथमकाण्ड ( भाग्य ) - उत्तराधार - कर्मानन्तर जुहू स्थित श्राज्यशेष का ध्रुवास्थित श्राज्य से समञ्जन कराया जाता है, अनन्तर जुहू - उपभृत् नामक दोनों स्र कपात्रों को यथास्थान रख दिया जाता है । इस कर्म के अनन्तर वरक आरम्भ होने वाला है । जिन दतृणसमूहों से यशिय इथ्म ( काष्ठ ) ऋषि जाते है, यह तृण समष्टि ' इध्म-सन्नन ' नाम से बहुत हुई है । इसे अपने हाथ में लेकर ही अध्वर्यु " तथा जाग्नी नामक ऋत्विक, श्राश्रावण - कर्म्म की इतिकर्तव्यता पूरी करते हैं । पहले अध्वर्यु ' ' श्र श्रावय ' इस निगदमन्त्र का उच्चारणं करता है, अनन्तर आग्नीध ' अस्तु औपट् ' इस निगदमन्त्र का उच्चारण करता है, यही प्रत्याश्रावणानुगत आम की इतिकर्तव्यता है, जैसा कि सूत्रानुगत पद्धतिप्रकरण में स्पष्ट किया जाचुका है । मादा की १, २, ३, इन तीन कण्डिकाओं में उपपत्ति- प्रदर्शनपूर्वक इस श्रावणकर्म्म का ही प्रतिपादन हुआ है । वरण से पहिले आश्रावण क्यों किया जा है? अति कहती है - ' यह आश्रावण कर्म निश्चयेन यज्ञ है । इसी प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान करती हुई से वृत ऋत्विजों के द्वारा यशे विकत व्यता का ही सम्पादन ] अभीष्ट है । दूसरे शब्दों में वरणकर्म एकप्रकार का यज्ञाधिकार ( यज्ञे तिकसव्यता- निर्वाहा-धिकार ) -प्रदान है । इस यज्ञाधिकार - प्रदानलक्षण वरण कर्म के उपक्रम में प्राकृतिक यज्ञ का सम्बन्ध अपेक्षित है । इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आश्रयात्मक यज्ञ का वरणकर्म से पहिले अनुगमन किया जाता है । ' श्र श्रावय ' इस निगदमन्त्र का तात्पर्य यही है कि जिसका आज हम इस यज्ञ में वरण करना चाहते हैं, उसे प्राकृतिक देवता स्वीकार करलें । इसे हम आपके वजनरूप यज्ञकर्म के लिए आज होता बना रहे हैं " यही श्रावण का निष्कर्ष है । यङ्गिरस पार्थित्र प्राण - देवताओं का आहुति द्रव्य के द्वारा सावित्र-लोकस्थ प्राण - देवताओं के साथ अन्तम सम्बन्धात्मक यजन करना ही ' यज्ञ ' है आभावणकम् से दिव्य प्राणदेवताओं की दृष्टि क्योंकि इस यशक की ओर होजाती है एतावता ही देवप्राणाकर्षकरूप आश्रा वण को यज्ञ कहा जासकता है । इसप्रकार श्राश्रावणकर्म करना दिव्यप्राणात्मक यज्ञ का ही अनुगमन करन । है I जिसकी स्वरूप निष्पत्ति के लिए वस्गक अभीष्ट है, अश्रवणकम्मे से वह लक्षीभूत बन जाता है । अतएव वरण से पहिले श्राश्रावण कर्म्म आवश्यक बन जाता है ॥ १ ॥

जिन दर्भतृगणसमूहों से ( दर्भरज्जु से ) यज्ञिय इध्य काष्ठ अधि जाते है, वे ' इध्मसन्नहन ' ( लकड़ी की दर्भरज्जु ) नाम से व्यवहृत हुए हैं । वेदि पर जो तृण श्रादि गिर पड़ते हैं, उहें इसी दर्भरज्जु से हटाया जाता है । इम दरर्भज्जु को हाथ में लेकर ही श्रावणकर्म करता है । यह श्राश्रावणकर्म्म इध्मसन्नहन हाथ में लेकर क्यों किया जाता है?, इसी प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि, " यदि वद् अध्वर्यु ' यशात्मक इस मसनदन को आलम्बन बनाए बिना आश्रावणा करेगा, तो इसकी अध्यात्मसंस्था कम्पित हो जायगी, अथना और किसी विपत्ति का इसे सामना करना पड़ेगा ” | द्युलोस्थ प्राण - देवताओं का आकर्षणात्मक श्राश्रावण - कर्म्म ' यज्ञ ' है, जैसा कि पूर्व कण्डिका में स्पष्ट किया जाचुका है । ' यज्ञात्मक आश्रावणक यज्ञ को आलम्बन बना कर ही करना चाहिए ' १३८५

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पञ्चम अध्याय वराह्मण शथपब्राह्मण इस कथन से श्रुति इध्मसन्नहन को भी यज्ञात्मक बतला रही है । तात्पर्य इस कथन का यह है कि, यज्ञतत्त्व अध्यात्म - अधिभूत - अधिदैवत - भेद से तीन भागों में विभक्त है । सौरसम्वत्सरावच्छिन्न, सावित्रा ग्न--पारमेय सोमात्मक, लोकोपलक्षित गज्ञ ' आधिदैविक यज्ञ ' है । पार्थि सम्वत्सरावच्छिन, आङ्गिरसाग्नि - चान्द्र सोमात्मक, भूलोकोपलक्षित यज्ञ ' आधिभौतिक यज्ञ ' है । एवं वैश्वानराग्नि, तथा अन्न सोमात्मक - शरीर यज्ञ ही आध्यात्मिक यज्ञ है | श्रावणकर्म्मा देवताकर्षक बनता हुआ आधिदैविकयज्ञ है, आश्रावणकर्त्ता अध्य आध्यात्मिक यज्ञ है । एवं इध्म सन्नहन निदानेन आधिभौतिक यज्ञ है । साथ ही विष्णुयज्ञात्मक पारमेष्ठ्य अपतत्त्व के ज्योतिर्म्मय भाग से उत्पन्न होने के कारण दर्भ साक्षाद्रूप | से भी पार्थिव यज्ञ है । इधर ' अद्भ्यः पृथिवी ' सिद्धान्तानुसार, अप्तत्त्व से उत्पन्न पार्थिवयज्ञ चात्मक [ वेनात्मक ] दर्भ का सजातीय भी है । जत्रतक अध्यात्मयज्ञ इस ओर के पार्थिव [ आधिभौतिक ], एवं उस ओर के दिव्य [ श्राधिदैविक ] यज्ञ, दोनों से अनुगृहीत रहता है, तभीतक इसका स्वरूप प्रतिष्ठित रहता है । दोनों में भी पार्थिवशरीर-प्रधाना अध्यात्मसंस्था की प्रधान प्रतिष्ठा आधिभौतिक पार्थिव यज्ञ ही है । इस प्रतिष्ठा के निकल जाने से ही निघनावस्था का आगमन होता है, प्रतिष्टाविच्युति से ही इस पर अन्यान्य विपत्तियाँ आक्रमण करती हैं । जब पार्थिवी यज्ञप्रतिष्ठा उच्छिन्न होजाती है, तो केवल द्युलोका कणा का प्राधान्य रह जाता है । द्युलोका का का प्राधान्य ही पार्थिवप्रतिष्ठोच्छेद का कारण है । यावदायुपर्यन्त उभयानुग्रह्माप्ति के लिए ही लोक-स्थानीय आहवनीय तथा भूलोकस्थानीय गाईपत्य, दोनों के मध्य में खड़े होकर ' अप अस्पर्श [ आचमन ] कर्म्म किया जाता है, जैसा कि, " तमुपन्नन्तरेणाहवनीयञ्च गार्हपत्यञ्च प्राङ तिष्ठन्नप उपस्पृशति ” [ शत ० १ | १ | १ | १ | ] इत्यादि रूप से विस्तार से बतलाया जाचुका है । ठीक नही प्रयोजन यहाँ अपेक्षित है । यदि अध् पार्थिव यज्ञ को आलम्बन बनाए बिना द्युलोकानुगत आधिदैविक यज्ञ - संग्राहक । श्रावरणकर्म्म करेगा, तो विशुद्ध दिव्ययज्ञ के प्राधान्य से इसकी पार्थिवी यज्ञप्रतिष्ठा पर आघात होगा । फलतः प्रतिष्ठाविच्युति होजायगी, अथवा तो अन्य किसी विपत्ति का अनुगमन करना पड़ेगा । इस आपत्ति से बचने के लिए श्रावण कर्म्म करते समय [ आधिदैविक यज्ञसम्पत्ति - संग्रह करते समय ] पार्थिवी प्रतिष्ठा को आलम्बन बनाना आवश्यक होजाता है । इसी उद्देश्य से इध्मसन्नहन को [ पार्थिव यज़िय - द्रव्य को ] हाथ में में लेकर ही श्रावणकर्म किया जाता है । २ ॥ " “ इयं [ पृथिबी ] वै बेदिः ” [ शत ० ७ | ३ | १ | १५ | ] इस श्रुति के अनुसार आधिभौतिक यज्ञ की प्रतिष्ठा [ वितानस्थान ] पृथिवी ही है, एवं यही इस यज्ञ की वेदि है । प्रकृत यज्ञ में जो वेदि बनाई गई हैं, वह निदानेन पृथिवी - स्थानीया है, और यही इस यज्ञ की प्रतिष्टा है । वेदि पर बिछे हुए दर्भतृण श्रोषधि - वनस्पति-स्थानीय हैं, जिह्न यज्ञ - समतुलन की दृष्टि से वेदिरूप शरीर के लोम [ श्रधि ] केश [ वनस्पति ] भी कहा गया है । अग्नि को प्रज्ज्वलित करने के लिए, तथा सामिधेनीककम्मं - सम्पादन के लिए जो इश्मभार् ( काष्ठभार ) लाया जाता है, वह निदानेन अग्नि है । ' शेषे वनेषु मात्रोः सन्त्या मर्त्तास इन्यते ' ( ऋक्सं ० ८ ६०१५ ) इत्यादि मन्त्रश्रुति के अनुसार काष्ट में अग्नि सुप्त है । यही मृग्यमाण अग्नि है, जिसे अप्रत्यक्ष सम्बन्ध से ' कृष्ण - मृग ' कहा जाता है । वेदि, और इध्मकाष्ट, दोनों पार्थिव ( आधिभौतिक ) यज्ञात्मक हैं । श्राश्रावणक्रम में पार्थिवी प्रतिष्ठा ही अमित है । अतएव प्रथम तो वेदि पर बिछे दर्भतृण १३८६

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पञ्चम अध्याय प्रवरनादाण प्रथम काण्ड • को लेकर ही श्राश्रावण करना चाहिए, अथवा इध्मखण्ड को लेकर आश्रावणकर्म्म करना चाहिए | वेदतृ से श्राक्षात् रूप से, एवं इध्मखण्ड से परम्परया पार्थिवी प्रतिष्ठा प्राप्त होजाती है " इस उपपत्ति को ग्रागे कितने एक साम्प्रदायिक श्रावणक में वेदिस्थित दर्भतृण अथवा इध्मखण्डग्रहण का समर्थन करतेहुए कर रहे हैं भगवान् याज्ञवल्क्य की दृष्टि में वेदितृण, अथवा इध्मखण्ड, दोनों में से किसी को भी लेकर श्रावणक करना विज्ञान विरुद्ध है । कारण स्पष्ट है । यह ठीक है कि, वेदितृण तथा इध्यखण्ड, दोनों हीं पार्थिव - प्रतिष्ठात्मक हैं । परन्तु ये दोनों अन्य कर्म में विनियुक्त हैं । वेदितृा को लेना एक दृष्टि से पृथिवी की औषधि वनस्पति को पृधिवी ( वेदि ) से पृथक कर उसे ऊसर बनाना है । इस के अतिरिक्त वेदस्थित दर्भ सुपदा भव ' के अनुसार देवताओं का प्रतिष्ठात्मक श्रासन है । इसे उठाना श्रागत देवताओं को प्रतिष्ठा से विच्युत करना है । ऐसी दशा में वेदितृण - ग्रहण करना सर्वथा ही अनुचित ठहरता है । इध्मकाष्ट इन्धन - समिन्धन - कर्म के लिए नियत है । इसका खण्ड लेना समिन्धनकर्म को अपूर्ण बनाना है । फलतः इध्मवण्ड - ग्रहण भी अवैध बन जाता है । याज्ञवल्क्य उन साम्प्रदायिकों से प्रश्न करते हैं कि, जिन दर्भतृणों से इम्मकाष्ठ बाँधा जाता है, क्या वे इध्मसन्नहन यज्ञय नहीं हैं? | क्या इनमें पार्थिव-प्रतिष्ठा नहीं है? । जब कि इन दर्भतृणों से यज्ञात्मक इध्म बाँधा जाता है, इन से अग्निमम्मार्जनक होता है, आगत तृणादिनिरसनात्मक अन्यान्य भी अनक परिशिष्ट कर्म्म होते हैं, तो इन की यज्ञरूपता में क्या सन्देह रह जाता है? | अतः जो इव्यसन्नहनतृण ऐसे ऐसे परिशिष्ट कम्मों के लिए ही नियत हैं, साथ ही वेदितृण, तथा इध्मशकल का ग्रहण अनुचित है, तो प्रत्येक दशा में इध्मसन्नहन - ग्रहणपूर्वक ही त्र्याश्रावणकर्म करना चाहिए || ३ || इत्याश्रावणकम्र्मोपपत्तिः १ २ - दिव्याग्निप्रवर एकम्मोपपत्ति: ----चतुर्थी ( ४ ) से आरम्भ कर ८ वीं कण्डिका - पर्य्यन्त पाँच कण्डिकायों में प्राकृतिक, दिव्य, प्राणाग्नि के वरण की सोपपत्ति इतिकर्तव्यता का ही स्पष्टीकरण हुआ है । दिव्ययज्ञ में होतृत्त्वन वृत्त प्राणाग्नि के क्या क्या धर्म्म हैं?, प्रतिपाद्य उपपत्ति- प्रकरण में इसी प्रश्न का समाधान हुआ है । जिन इध्नसन्नहनलक्षणदर्भतृण-समूहों से यज्ञिय काष्ठ - सम्भार बाँधा जाता है, पूर्वकथनानुसार उहें हाथ में लेकर वह अध्वर्यु ' - ' ओ श्रावय ' इस निगदमन्त्र का उच्चारण करता हुआ ' श्रावण ' कर्म्म करता है । ग्रध्वर्यु के इस ग्राश्रावण--कर्म्म के अनन्तर ग्राग्नीध्र नामक ऋत्विक ' अस्तु श्रवट् ' इस निगदमन्त्रोच्चारण से ' प्रत्याश्रावरण ' कर्म्म करता है | अध्यय्र्यु कर्त्तक इस आश्रावण, तथा श्राग्नीप्रकर्त्तक प्रत्याश्रावणा - कर्म के अनन्तर अध्वय्यु उन इध्मसन्नह्नतृर्थों को अपने हाथ में रखता हुआ ही " अग्निर्देवो देव्या होता देवान तद्विद्वां-चिकित्वान मनुष्यद्भरतवन " इस निदगमन्त्र का उच्चारण करता हुआ दिव्याग्नि का ही अपने इस बंध यज्ञ में होतृत्वेन वग्गा करता है, जो कि अध्वय्यु कर्तृ ' के कर्म्म ' होतृवरण कर्म्म ' कहलाया है । १३८७

पृष्ठ 1117

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पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण यज्ञकर्म में होनेवाले होत्र - कर्म की इतिकर्तव्यता जिस ऋग्वेदी ऋत्विक के द्वारा सम्पन्न होती है, वही ' होता ' कहलाया है । होत्रकर्मेतिकर्त्तव्यता- लक्षण अधिकारप्रदान के लिए होने वाला अध्वर्युकच ' क कर्म्म हीं ‘ होतृप्रवरणकर्म्म ' है । इस मानुष होतृप्रवरण- कर्म से पहिले दिव्याग्नि का सम्बन्ध कराना क्यों आवश्यक समझा गया?, दूसरे शब्दों में दिव्याग्निवरण क्यों अपेक्षित है?, इसी प्रश्न का सोपपत्तिक समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि, इस वरणकर्म से देवताओं के होता अग्नि से, तथा प्राणदेवताओं से अपनी धृष्टता का ही निराकरण किया जाता है । तात्पर्य यही है कि, प्राकृतिक, साम्वत्सरिक, अग्नीषोमात्मक यज्ञ ही वास्तविक यज्ञ है । इस यज्ञ का होतृत्त्व पार्थिव - प्राणाग्नि पर ही अवलम्बित है । पार्थिव प्राणाग्नि के ' एति - प्रेति ' लक्षण गमनागमन व्यापार से ही पारमेष्ठ्य सोम का अपहरण होता है । सुबर्णात्मक इस गायत्राग्नि से अपहृत सोम ही पार्थिव आग्नेय ३३ प्राणदेवताओं के यज्ञ का स्वरूप- सम्पादक बनता है । इस यज्ञस्वरूप - निष्पत्ति के अतिरिक्त द्युलोकस्य सौर - सावित्र - देवप्राण का पार्थिव प्राणाग्नि के साथ सम्बन्ध कराना भी उक्त लक्षण गायत्राग्नि का ही कर्म है । इस देवाह्वान - लक्षण देवयजन ( देवानां सङ्गमनं ) कर्म से भी ये अग्नि ' होता ' कहलाए हैं । यजमान का यह वैधयज्ञ प्राकृतिक यज्ञ नहीं है, अपितु उसकी प्रतिकृति है । ठीक उसी के अनुरूप इसका वितान हुआ । है । श्रतएव श्रावश्यक है कि, जैसा, जो कुछ वहाँ होरहा है, यहाँ भी ठीक वैसा ही किया जाय । प्राकृतिक होत. - अग्नि का इस वैध यज्ञ में नियुक्त करना अशक्य है । अगत्या मानुष होता का ही वरा किया जाता है । जो महत्त्वपूर्ण कर्म्म ( हौत्रकर्म्म ) प्राणाग्नि का है, आज वैसा दिव्य कर्म्म एक मनुष्य करना चाहता है । जो देवयज्ञलक्षण आह्नानकर्म प्राणाग्नि का है, वह श्राज एक मनुष्य करना चाहता है | क्या अनृतसंहित, पाप्माओं से युक्त, मरणधर्मा मनुष्य ( ऋत्विक् ) सत्यसंहित, विधूतपाप्मा, अजर - अमृत - धर्मा प्राणाग्नि के द्वारा होने योग्य होत्रकर्म में सफलता प्राप्त करसकता है? | नहीं भी, और हो भी । ' नहीं ' इसलिए कि, वह अमृतलक्षण है, यह मरणधर्मा है । वह प्राणप्रधान है, यह भूतप्रधान है । ' हाँ ' इसलिए कि, मन्त्रशक्ति के द्वारा अध्व इस मरणधर्म्मा मनुष्य में भी प्राणाग्नि के अनुग्रह की भावना कर लेता है । फलतः यह मनुष्य रहता हुआ भी प्राणाग्न्यनुग्रह से तत्सम कर्म में समर्थ होजाता है । उसी अनुग्रह की प्राप्ति के लिए, दूसरे शब्दों में- " हम तो इस यज्ञ में होतृत्त्वेन आप ही का वरण कर रहे हैं, आप ही के शक्ति - समावेश से यह मानुप होत । आप के द्वारा होने योग्य इस हाँत्रकर्म्म में प्रवृत्त हो रहा है " इस भावना के द्वारा वैध यज्ञ में होतृत्त्वेन गृहीत मनुष्य-होता में प्राणाग्नि - धर्म के समावेश के लिए ही सर्वप्रथम मन्त्रशक्ति के द्वारा प्राणाग्नि का वरण करना आवश्यक समझा गया है । यदि ऐसा न किया जाता, तो क्या अनिष्ट होता? उत्तर स्पष्ट है । चिना प्राणाग्निसम्बन्ध के देवता, तथा अग्नि, दोनों के प्रति इस मनुष्य होता की घृष्टता ही नहीं होती, अपितु प्राणाग्नि- सम्बन्धाभाव में ब्राणाग्निकत्त ' के हौत्रकर्म्म में भी अनेक विघ्न उपस्थित होजाते । विघ्नों की ही क्या कथा, उस दशा में तो यह इस कर्म में सफल होना तो दूर रहा, अपितु यह अपना अनिष्ट ही करा बैटता, और फलस्वरूप यज्ञ सर्वथा विकृत होता हुआ, प्रकृतिविरुद्ध बनता हुआ अभ्युदय - लक्षणा इष्टप्रवृत्ति के स्थान में प्रत्यवाय - लक्षणा अनिष्टप्रवृत्ति का ही कारण चन जाता । " जैसा प्रकृति में हो रहा है, वैसा ही यहाँ होना चाहिए, तभी यज्ञ की रूपसमृद्धि है " यही यज्ञानुगता शूल - प्रतिष्ठा है । १३८८

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पञ्चम श्रध्याय प्रबरब्राह्मण प्रथमकाण्ड अत्र इस सम्बन्ध में एक प्रश्न ओर बच रहता है । यज्ञ में प्राणाग्नि, तथा अन्य यज्ञिय देववर्ग, दोनों का सम्बन्ध होता है । फलत: इस प्राकृतिक वरणकर्म में दोनों का अनुग्रह अपेक्षित है । यहाँ केवल प्राणाग्नि का तो वरण होजाता है, परन्तु देवानुग्रह के लिए कुछ नहीं किया जाता । ऐसी दशा में प्राणाग्नि से अपराध - क्षमापन होजाने पर भी देववर्ग से अपराध क्षमापन नही होता । इस विप्रतिपत्ति के निराकरण का क्या उपाय? | श्रुति उत्तर देती है कि केवल प्राणाग्नि के वरण से ही प्राणाग्नि, तथा देववर्ग, दोनों का अनुग्रह प्राप्त होजाता है । ' अग्निर्देवो देव्यो होत ० ' इत्यादि मन्त्र से होने वाले वरगाकर्म में पहिले ' अग्निर्देवः ' इत्यादि रूप से अग्नि का ग्रहण हैं । इस से तो प्राणाग्नि का अनुग्रह प्राप्त होजाता है । एवं-' दैव्यो होता ' इस अग्निधर्म से देववर्ग का ग्रहण होजाता है । देवदूत प्राणाग्नि देववर्ग से अविनाभूत है । केवल ' अग्नि ' कहने से अवश्य ही देववर्ग का ग्रहण नहीं होता । परन्तु ' देवताओं का जो होता हैं, ऐसे अग्नि का मैं बरण करता हूँ ' इस कथन से होता - प्राणाग्नि के सम्बन्धी देववर्ग का ग्रहण भी परम्परया स्वतः सिद्ध है | यद्यपि मन्त्रभाग स्पष्टार्थ है । तथापि इस सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक होगा कि, ' अग्निः सर्वा देवता: ' सिद्धान्त के अनुसार प्रासाग्नि हीं अपनी घन - तरल विरलावस्थाओं से त्रयस्त्रिंशद्विध ( ३३ ) जनता हुआ सर्वदेवमूर्त्ति बन रहा है । श्रतएव इसे अवश्यमेव ' देव ' ( सर्वदेवमयः, कहा जासकता है । ' अग्निर्देवः ' मन्त्रभाग से श्रग्नि के इसी देवधर्म का स्पष्टीकरण होरहा है । यह अग्नि अपने अवस्था - भेदों से जहाँ सर्वदेवमूर्ति है, वहाँ अपने पार्थिव गायत्ररूप से यही द्युलोकस्थ देवताओं के यजन का भी निमित्त बना हुआ है, जो कि यजन कर्म है । देवह्वान ही इस प्राणाग्नि का दूसरा धर्म है, जिसका ' दैथ्यो होता ' उस मन्त्रभाग से स्पष्टीकरण हुआ है । ३, ५, कण्डिका - द्वी की यही संक्षिप्त उपपत्ति है ॥ ४,, ॥ ' देवान यक्ष द्विद्वांश्चिकित्त्वान् ' यह मन्त्र का अगला भाग है । यह अग्नि देवताओं के स्वरूप को जानने वाले हैं, इनके सूदनम्वरूप को पहिचानने वाले हैं, एवं प्राण - देवताओं का परस्पर यजन करने वाले हैं । भले बुरे ( सत् - असत् ) का परिज्ञान करने वाला सदसद्विवेकी ' विद्वान् ' कहलाया है, एवं मौलिक स्वरूपपरिज्ञाता ' चिकित्त्वान ' कहलाया है । अध्यात्मपरिभाषानुसार भौतिकतत्व का परिज्ञाता विद्वान है. एवं प्राणतत्त्वों का परिज्ञाता चिकित्त्वान है । लोकपरिभाषानुसार शाब्दिक ज्ञानाधिष्ठाता विद्वान् है, एवं व्यवहारनिष्ठ चिकित्त्वान् है । सामान्यरूपेण परिज्ञाता विद्वान है, एव विशेषरूपेण परिज्ञाता चिकित्त्वान है, देखिए ऋक् सं ० मं ० | १६४ सू ० । ६ मं ० सायणभाष्य ] | प्राणाग्नि पार्थिव - विवर्त्त का विद्वान् भी है, और चिकित्त्वान् भी । अपने भौतिकरूप से ये उभयलोक के विद्वान् हैं--' वयुनानि विद्वान ' । एवं अपने प्राणरूप से ये पार्थिव दिव्यदेवताओं के प्राणम्वरूप के विशेष परिज्ञाता नते हुए चिकित्वान भी हैं । यज्ञकर्म में उभयविध देवताओं का भृतों के आधार पर यजन होता है । फलतः अपने वैधयज्ञ में भी वही सफलता प्राप्त कर सकता है, वही ठीक ठीक [ अनुध्या ] यजन कर सकता है, जो भूतों का विद्वान्, तथा प्राणों का चिकित्त्वान् है । यजमान के इस यज्ञ में प्राणाग्नि के इह्रीं दोनों धर्मों का समावेश कर प्राणाग्नि के अनुग्रह से यज्ञसफलतासिद्धि के लिए ' देवानयज्ञ ' इत्यादि कहा गया है ॥ ६ । ' मनुध्वद्भरतत्रत ' यह मन्त्र का अगला भाग है । सूय्यं केन्द्रावच्छिन्न, इन्द्रप्राणात्मक, बृहती - सम्पत्ति से युक्त, अव्यय के श्वोवसीयम् नामक शाश्वत मन से अनुगृहीत, सृष्टि - लय - कालप्रवत्त के प्राणतत्त्व ही आधि-१३८६

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पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण श्राधिदेविक सम्वत्सरयज्ञ के स्वरूप समर्पक बन रहे देविक मनु है | यही साम्बत्सरिक प्राणाग्नि के सहयोग से इन्द्रप्राणात्मक, मनोऽनुगृहीत प्राणतन्त्र हैं । हृदयावच्छिन्न, प्रज्ञाप्राणमूर्ति आयुः स्वरूपाधिष्ठाता के सहयोग से आध्यात्मिक यज्ञ के स्वरूप- समर्पक हैं । ही आध्यात्मिक मनु है । ये ही शारीर प्राणाग्नि के व्यवस्थाक, आदिब्रह्मा भगवान स्वयम्भू आधि-वेद, धर्म, लोक, प्रजा, नाम की सृष्टि चतुषुयी यज्ञ - स्थिति के अनुसार सर्वप्रथम वैधयज्ञ का भौतिक ( ऐतिहासिक ) मनु हैं [ थे ] । इहोंने ही प्राकृतिक - अध्यात्म- अधिभूत तीनों दृष्टियों से त्रिविध का अनुष्ठान किया है [ थ 1 ] इसप्रकार अधिदैवत -सम्प्रदाय में ' यह यज्ञ मनु का है ' [ मनोज्ञइत्यु मनु हीं यज्ञ के प्रवर्त्तक हैं । अतएव याज्ञिक वाहुः ] यह प्रसिद्ध है । पुलिङ्गात्मक ] है, एवमेव उकारान्त जिसप्रकार ' धनुः ' शब्द उभयलिङ्गात्मक [ नपुंसलिङ्ग तथा है । ' मनुष्या ' दि रूप सान्त मनु: -' मनु ' शब्द पुलिङ्ग है, एवं सकारान्त ' मनु ' शब्द उकारान्त नपुंसकलिङ्ग सम्बन्धी हैं । प्रकृत में सान्त मनुःशब्द का ही शब्द से सम्बन्ध रखते हैं, एवं ' मानत्रा ' दि शब्द है- ' मनुरिय ' । जिसप्रकार मनु ने यजन किया था, ग्रहण हुआ है । फलत: ‘ मनुष्यत ' का तात्पर्य निकलता का यजन करे, ' मनुध्वन् ' मन्त्र भाग का यही एक एवमेत्र यह प्राणाग्नि भी होता बन कर इस यज्ञ में देवता न कर ' मनोरिव ' यह विग्रह किया जाता है, तो इसका तात्पर्य है । यदि ' मनुष्वन ' का ' मनुरिव ' विग्रह होता बनकर अग्निने देवताओं का यजन किया तात्पर्य्य यह निकलता है कि, जैसे मनु के यज्ञ में बनकर देवताओं का यजन करें । ' मनुई वा था, तथैव इस यज्ञ में भी वे अग्नि होता अपेक्षित है । एवं ' मनोर्यज्ञ ऽइत्यु वा श्राहुः ' इससे यज्ञ ' नेजे ८ ' इससे ' मनुरिव ' विग्रहानुसार प्रथमार्थ प्रथमार्थ से आधिभौतिक मनु का स्पष्टीकरण हुआ ‘ मनोरित्र ' विग्रहानुसार द्वितीयार्थ अभिप्रेत है । 1 आधिदैविक मनु का स्पष्टीकरण हुआ है । है । एव द्वितीयार्थ से श्रध्यात्मिक मनुर्युक्त अभाव ( रश्मिभाव ) प्राणाग्नि है । उक्थार्क हृदयभावावच्छिन्न उक्थभाव मनु है, परिध्यवच्छिन्न मनु को पृथक, तथा अग्नि को पृथक् तत्त्व मान लिया गया का क्योंकि स्थानभेद से पार्थक्य है, अतएव होजाता है । तत्त्वतः उक्थार्क अभिन्न हैं । इस दृष्टि से है । एवं इसी दृष्टि से ' मनोरिव ' का समन्वय आधार पर - ' एतमेके वदन्त्यग्नि, मनुमन्ये ' * उक्थ मनु, और अर्क अग्नि, दोनों अभिन्न । हृदयानि हैं । इसी उक्थलक्षण मनु युक्त, तदर्करूप, पत्र ( मनु: १२ १२३ ) यह कहा जाता है यज्ञ के स्वरूप- सम्पादक है, मनुष्बन का यही तात्पर्यार्थ तदभिन्न, अतएव तद्रूप प्राणाग्नि हीं है || ७ || होते ( देवा उपजीवन्ति ) ( ऐ ० आ ० मन्त्र का अन्तिम भाग ' भरतवन् ' है । ' इतः प्रदाना सम्वत्सरमण्डल में प्रतिष्ठित सौर दिव्य देवताओं ( २१ ) इत्यादि ऐतरेय ति के अनुसार द्य लोकात्मक रहता है; पार्थिव तिरोऽग्नि नामक प्राणाग्नि के का जो प्रवर्ग्य भाग पार्थिव सर्ग में विश्वस्त [ खर्च ] होता * एतमेके वदन्त्यग्नि, मनुमन्ये प्रजापतिम् ॥ इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्मशाश्वतम् ॥ १३६० —मनुः

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पञ्चम- अध्याय प्रवरब्राह्मण प्रथमकाण्ड द्वारा वह विश्वस्त भाग यहाँ से जाकर उस बिस्रस्त भाग की पूर्ति किया करता है । ' इत एत उदाहन, दिवस्पृष्ठान्यारुइन, ग्रामङ्गिरसो ययुः ' इत्यादि मन्त्रवन के अनुसार भूलोक से निकलकर लोक की ओर जाता हुआ ग्रङ्गिरोऽग्नि ही देवक्षतिपूर्ति का कारण बनता है! ' श्रमुतः प्रदानाद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति ' [ ऐ ० ० २२ ] ] के अनुसार वहाँ से [ द्युलोक से ] देवप्राण का प्रवर्ग्यरूप से निरन्तर आगमन भी होता रहता है, इसीसे प्रजा का स्वरूप निर्माण होता है । एवं पूर्वकथनानुसार राि के द्वारा पार्थिव प्रवर्ग्य भाग जाता भी रहता है । इसी पारस्परिक अन्न अन्नाद - लक्षण आदान - प्रदान प्रक्रिया का नाम ' यज्ञ ' है । इस प्राकृतिक यज्ञ में द्युलोकस्थ देवताओं के लिए पार्थिव हविद्रव्य का लेजाना एकमात्र पार्थिव प्राणाग्नि पर ही अवलम्बित है । इसीलिए उन्हें एहि देवेभ्यो हव्यं भरति ' निर्वचन से ' भरत ' कहना अन्वर्थ बनता हैं । भृषिएड से सम्बन्ध रखने वाले हविर्यज्ञ [ प्राकृतिकयज्ञ ] से पार्थिव जा का स्वरूप - निर्माण हुआ है । इस पार्थिव - प्रजा में भौम प्रवर्ग्य अग्नि प्रतिष्ठित रहता है, जिसे ' पिप्पलादोपनिपत् ' की परिभाषा में ' प्राणाग्नि ' भी कहा जाता है । ' प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे [ शरीरे? जाति ' [ प्रश्नोपनिषन ४ | ३ | ] के अनुसार अपान, समान, व्यान, उदान, प्राण, भेद-भिन्न पञ्चचा विभक्त प्राणाग्नि ही इस शरीरसंस्था [ अध्यात्मसंस्था ] में सदा जागते रहते है । इस प्राणाग्नि के द्वारा ही प्रजा का भरण - पोषण होता है । जिस दिन प्राणाग्नि शरीर से उनकान्त हो जाता है, अन्नादानलक्षण अहरहर्ग्रज्ञ [ भैषज्ययज्ञ ] बन्द हो जाता है, तनक्षण भूतात्मा उनक्रान्त हो जाता है । उक्त अध्यात्मसंस्था की दृष्टि से भी ' वैश्वानर ' लक्षण इस अग्नि को ' भरत ' कहना अन्वर्थ चनता है । जिस युग [ देवयुग ] में इसी पृथिवी पर भौम- देवव्यवस्था थी, उस युग में जैसे भौम - स्वर्ग के शवन सोपान [ श्रतिष्ठात्रा, अधिष्ठाता ] देवता इन्द्र थे, अन्तरिक्ष के शवन सोपात् वायु में, एवमेव स्वयम्भू मनु सम्राट से शासित इस पृथिवी के शवन सोशत् अग्निदेवता थे । पार्थिव प्रजा से ' कर ' ग्रहण कर देवताओं के प्रति उसे पहुँचाना, पार्थिव प्रजा की वामदेवादि के सहयोग से भरण - पोषण व्यवस्था करना इह्रीं भौम अग्निदेवता ( मनुष्यदेवता ) का कार्य्यं था । इस आधिभौतिक ( ऐतिहासिक ) दृष्टि से भी अग्नि को ' भरत ' कहना अन्वर्थ बनता । इसी भरण - पोषण धर्म से ये अग्नि भरत, ' किवा ' भारत ' कहलाए हैं । इह्रीं के सम्बन्ध से यह पवित्र देश ' भारतवर्ष ' कहलाया है । जिसप्रकार उक्त तीनों यज्ञ - संस्थाओ का सञ्चालन भरताग्नि से हुआ है, एवमेव हमारे इस वैधयज्ञ की इतिकर्त्तव्यता भी उसी भरताग्नि से सम्पन्न हो, इसी भावना को लिए ' भरतात ' कहा गया है ॥ ८ ॥

इति - दिव्याग्निवर एकम्मोपपत्तिः I II **: १३६१