Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1121–1130

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1121–1130

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पञ्चम श्रध्याय प्रवरब्राह्मण ३ – ग्रामप्रवस्कम्र्मोपपत्तिः— शतपथब्राह्मण ' अग्निर्देवो देव्यो होता ० ' इत्यादि मन्त्रपाठ के द्वारा अपने इस वैध यज्ञ में प्राकृतिक दिव्य प्राणाग्नि की भावना करना हीं अग्नि का होतृत्वेन वरण करना है, जिस का ४ थी से ८ वीं कडिका पर्यन्त: काण्ड-काओं में स्पष्टीकरण हुआ है । अब क्रमप्राप्त आर्षेयप्रवरणकर्म की उपपत्ति का दिग्दर्शन कराया जाता है । यज्ञकर्त्ता यजमान के वशगौरव का कीर्त्तन ही ' आवरण ' है । इस वरा से यज्ञाघिकार - योग्यता का ही समर्थन हुआ है । यज्ञकम्मे लौकिक कर्म्म नहीं है, अपितु वैदिक दिव्य - कर्म्म है । लौकिक कर्म्म का अधिकार जहाँ मनुष्यमात्र को है, वहाँ वैदिक यज्ञ तपः - दान - कर्म्मत्रयी का अधिकार एकमात्र द्विजा-ति - प्रजा को ही है, जिसके वीर्य में जन्मतः ऋपिप्रारण तथा देवप्रारण प्रतिष्ठित रहता है । यह वैध वैदिक यज्ञकर्म प्राकृतिक नित्य दिव्य यज्ञ की विधि पर ही वितत होता है, जैसा कि अनेकथा स्पष्ट किया जाचुका है । प्राकृतिक यज्ञ ही सम्वत्सरयज्ञ है, जैसा कि इसी ब्राह्मण की १६ वीं कण्डिका में स्पष्ट होने वाला है । सम्वत्सरयज्ञ का ' अदितिमण्डल ' से सम्बन्ध है । इस अदितिमण्डल के गर्भ में त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्ना अग्निप्रवाना पृथिवी, पञ्चदशस्तोमाव-च्छिन्न वायुप्रधान अन्तरिक्ष, एवं एकत्रिंशस्तो मात्र च्छिन्न इन्द्रप्रधान द्युलोक, ये तीनों स्तौम्यलोक प्रति-ष्ठित हैं, जैसा कि - " अदितिचौर दितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः " ( ऋक् सं ० ११८ ६ | १० | ) इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । अदितिगर्भ में प्रतिष्ठित अग्निप्रमुख पार्थिव वसुदेवता, बायु-प्रमुख आन्तरिक्ष्य ११ रुद्रदेवता इन्द्रप्रमुख दिव्य १२ आदित्य देवता, नासत्य- इस्र नामक २ सान्ध्य देवता, सम्भूय ३३ प्राणदेवता प्रतिष्ठित हैं ये ही ३३ देवता प्रदित्यवच्छिन्न सम्वन्मरयज्ञ के स्वरूप - सम्पा-दक हैं । अतएव — ‘ येस्थ त्रयश्च त्रिंशश्च मनोर्देवा यज्ञियामः ' ( ऋक्सं ० ८ | ३० | २ | ) इत्यादि श्रुति के अनुसार ये ही देवता ' यज्ञिय देवता ' कहलाए हैं । इस सम्वत्सरयज्ञ में प्रातःकाल, मध्याह्न, सायङ्काल, भेद से तीन सवन है । वसुदेवतानुगत प्रातःकाल प्रातः सत्रन है, रुद्रदेवतानुगत मध्याह्न माध्यन्दिनसवन है, एवं आदित्यदेवतानुगत सांयकाल सायंसवन है । रात्रिगत पूषाप्राण इस सवनत्रयात्मक सम्ब त्सर यज्ञमण्डल की सीमा से बहिर्भूत है । मानवजा में से जिसके वीर्य में जन्मतः प्रातः सवनीय देवता प्रतिष्ठित रहते हैं, वह वर्णतः ब्राह्मण है । जिसके वीर्य में माध्यन्दिनसयनीय देवता प्रतिष्ठित रहते हैं, वह वर्णतः क्षत्रिय है । एवं सायंसत्रनीयदेवयुक्त प्रजा वर्णतः वैश्य है । रात्रित पाप्राणप्रधान प्रजावर्ग शुद्ध है । स्त्रीप्रजा का भी इसी पूपाप्राण से सम्बन्ध है । इसप्रकार प्रकृत्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, यह द्विजातिप्रजा तो यज्ञसीमा के अन्तर्गत है । एवं स्त्री, तथा शूद्र, दोनों प्रजावर्ग यज्ञसीमा से बर्हिभूत है । इसी आधार पर भगवान् व्यास का — ' स्त्री - शूद्र - द्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरारा ' यह वैज्ञानिक सिद्वान्त स्थापित हुआ है । प्राकृतिक, नित्य, अपौरुषेय - तत्त्वात्मक बंद की प्रतिकृतिरूप वेदशास्त्र, एवं तत्त्वा-त्मक वेद पर प्रतिष्ठित नित्ययज्ञ की प्रतिकृतिरूप वैदिक यज्ञकर्म्म, दोनों का एकमात्र द्विजाति - मनुष्यप्रजा को ही अधिकार क्यों है? इस प्रश्न का यही संक्षिप्त उत्तर है । यदि कोई व्यक्ति कर्म्मणा वर्णाभिमान रखता हुआ यज्ञ में प्रवृत्त होना चाहता है, जैसी कि उच्छङ्घ-लता आजकल देखी सुनी जारही है, तो यह उस का व्यामोह है, अनधिकार चेष्ठा ही नहीं है, अपितु अभ्युदय १३६२

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पञ्चम श्रध्याय प्रवस्त्राह्मण प्रथमकाण्ड के स्थान में सर्वनाश का आमन्त्रण है । यज्ञकर्म में वही दीक्षित होसकता है, जो जन्मना द्विजाति है, जिस के पिता- पितामह प्रपितामहादि जन्मना द्विजाति हैं, जिस के वीर्य में उक्त लक्षण वर्णानुगत देवप्राण के साथ साथ गोत्रम्टष्टप्रवर्तक ऋषिप्राण का परम्परया समावेश है । ऐसा ऋपिवंशज, अतएव ' आर्षेय ' कहलाने योग्य, देवप्राणयुक्त, वर्णतः द्विजाति ही यज्ञ में अधिकृत है । एवं हमारा प्रस्तुत ' यारणकर्म ' इसी अधि-कार - मर्यादा का विश्लेषण कर रहा है । यजमान वतः द्विनति है, इस का ऋषिवंश से सम्बन्ध है, वज्ञप्रवृत्ति से पहले यह स्पष्ट हो जाना अनिवार्य है । चिना ऋषि, तथा देवप्राणसम्बन्ध ख्यापन के यजमान यज्ञ में न धिकृत है । अतएव दिव्य होतृवरणकरम के अनन्तर तथा मानुष होतृवरणकर्म्म से पूर्व यजमान के इन दोनों वर्ण - धर्मो का स्पष्टीकरण आवश्यक है । एकमात्र इही उद्दश्य से ' रण ' कर्म विहित है । जो महा-नुभाव शास्त्ररहस्यानभिज्ञता से कर्म्म ा वर्गों की व्यवस्था करते हुए एक हेलया मनुष्यमात्र को यज्ञ का अधि-का बनाते हुए उनका अनिष्ट कर रहे है, हम उनसे पूँछते हैं कि, वे ' कर्म ' में किन गोत्र ऋषियों का उच्चारण करावेंगे? जब कि जन्मना शूद्र ऋषिगोत्र से सर्वथा चहिर्भूत है । उस समय बे – “ ऋषिभ्य-श्चैवैनमेतद्दं बेभ्यश्र निह्नुते ' इस श्रुति का कैसे समन्वय करेंगे?, यह उह्नीं वेदभक्तों से पूँछन । चाहिए । ऋषि, तथा देवप्राण, दोनों का वीर्य से सम्बन्ध है, न कि कर्म्म से । जन्मतः ऋषि एवं देवप्राण का सम्बन्ध वीर्य में ही रहना चाहिए । वहीं द्विजाति वही यज्ञाधिकारी है । इस जन्मानुगत वीर्य्यभाव ( वर्णभाव ) का स्पष्टीकरण करने के लिए ही कहा गया है— ' अयं महावीर्यो, यो बज्ञं प्राप्त ' । इसी वीर्य्य-ख्यापन द्वारा यजमान का यज्ञाधिकारत्त्व स्पष्ट करने के लिए श्रायवरण होता है । एवं यही इस कर्म की संक्षिप्त उपपत्ति है— ' तस्मादार्पेयं प्रवृणीते ॥ ६ ॥

उपपत्यनन्तर वरणा - विशेषता बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, सृष्टिक्रम के अनुराध से पितामह, पिता पुत्र, इन क्रम से ही ऋषिवश परम्परा का उल्लेख होना चाहिए । इस सृष्टिमर्थ्यादा के संरक्षण के अतिरिक्त स्वयं यज्ञकर्म की दृष्टि से भी ' परस्तात् अर्वाक ' ही वरण होना चाहिए । दैवात्मलक्षणा दिव्यप्रजोत्पत्ति ही यज्ञकर्म का प्रभान लक्ष्य है । एवं उत्पत्ति क्रमानुगत प्रकृतिसिद्ध सापिण्ड्य * सन्बन्धानुबन्ध से ' पितामह - पिता-पुत्र - पौत्र, यही कम है । अतः इस प्रजोत्पादक यज्ञकर्म में भी श्रायवरण करते समय पहिले यजमान के पितामह का अनन्तर पिता का, एवं सर्वान्त में पुत्रस्थानीय यजमान का ही नाम उल्लेख करना आवश्यक, तथा क्रमसङ्गत है — ' तस्मात् परस्तादक प्रवृणीते ॥। १० ॥ इति - आर्षेयप्रवरणकम्र्म्मोपपत्तिः ३ * पितामहाद्यनुगत इस सापिण्ड्य सम्बन्ध के सुविशद वैज्ञानिक विवेचन के लिए देखिए ' खण्डच. तुष्टयात्मक श्राद्धविज्ञान ' ग्रन्थ का ' सापिण्ड्य विज्ञानापनिपन ' नामक तृतीय खण्ड | १३६३

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पञ्चम श्रध्याय प्रवरवाद्यण शतपथब्राह्मण ४ -- अग्नि - ब्राह्मणानुगृहप्राप्तिकम्मोपपत्तिः--ऋषिवंशप्रसूत, तथा जन्मना ( वर्णतः ) द्विजाति यह यजमान यज्ञ का अधिकारी अवश्य है, परन्तु इस का यह अधिकार तबतक कार्यरूप में परिणत नहीं होसकता, जबतक कि इस के इस यज्ञमण्डल मे, ग्राह-- प्रवर्त्तक नीयाग्निकुण्ड में दिव्य प्राणदेवताओं का सम्बन्ध नहीं होजाता । यह देवाह्वानकर्म एकमात्र ब्रह्मवीर्य्य से अग्नि प्राणाग्नि, तथा तद्वीर्य्यप्रधान ऋत्विग् ब्राह्मणों के अनुग्रह, सहयोग पर ही निर्भर है । दिव्याग्निवरण देवता यज्ञमण्डल में पधार अवश्य आते हैं, परन्तु प्रकृति के नियत सूत्र के आधार पर इन का देवाह्वान-कम्र्म्म तो वैज्ञानिक, अनूचान उन ब्राह्मणों के सहयोग पर ही अवलम्बित है, जो उस परोक्ष रखते प्राकृतिक हैं । ' अग्निर्देवो सूत्रलक्षगा आधार का मन्त्रात्मक स्तोत्र - शस्त्र -ग्रह, आदि कम्मों के द्वारा संग्रह करने की शक्ति यजमान दैव्यो होता ' इत्यादि पूर्वोक्त निगदमन्त्र से आगत अग्नि का होतृत्त्वेन वरण कर लिया आगत , यज्ञफलभोक्ता , तथा वृत अग्नि के वंशख्यापन - लक्षण आर्षेयवरण से इसे यज्ञाधिकारी भी सिद्ध कर दिया गया । अब है । इसी उभयोद्देश्य की के देवाह्वानलन्नृण अनुग्रह की तथा यज्ञस्वरूपसमर्पक ब्राह्मणों के अनुग्रह की अपेक्षा अस्य यज्ञस्य सिद्धि के लिए आर्षेयप्रवरणानन्तर तथा मानुषहोत्रवरण से पहिले - ' ब्रह्मवदा च वक्षत् ब्राह्मणा है || ११,१२ ॥ प्रावितार: ' इस निगदमन्त्र का पाठ किया जाता है, जिस का शब्दार्थ मूलानुवाद से ही गतार्थ इति – अग्निब्राह्मणानुगृहप्राप्तिकम्मोपपत्तिः-५- मानुष होतृवरणोपपत्तिः-४ - * ---प्राणविध सम्वत्सरयज्ञ में होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा, यजमान, आदि यज्ञ में भी ऋत्विक ' प्राणविध , यजमा- ' ही हैं । इस प्राणविध प्राकृतिक यज्ञ की विधा पर ही वितायमान इस प्राणोविध मानुष यजमान ) के अनुरूप नादि यज्ञस्वरूपसंग्राहक ‘ प्राणीविध ' ही हैं । द्यावापृथिव्य प्राणात्मक सम्वत्सर - प्रजापति बना हुआ ( यजमान प्राणीविध अपनी पत्नी के यज्ञसंयोग से पृथिवीरूप बना हुआ, एवं स्वस्त्ररूप से द्य स्थानीय उद्गाता, ब्रह्मा, नामक यजमान है । प्राणविध अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा, इन होता, ब्राह्मण अध्वर्यु ' हो , ' है । प्राणीविध, ऋत्त्विजों के अनुरूप प्राणीविध, अग्न्यनुगृहीत, ऋग्वेद का ज्ञाता, आदित्यानुगृहीत, सामवेद बाय्वनुगृहीत, यजुर्वेद का अनुधान ब्राह्मण अध्वर्यु है । प्राणीबिध तथा थगर्भिता । एवं प्राणीविध, चन्द्रमानुगृहीत, अथर्वेद का, का अनूचान ब्राह्मण उद्गाता यहाँ होत्र - कर्म के लिए नियत हुआ है, त्रयीविद्या का परिज्ञाता त्राह्मण ब्रह्मा है! जो ऋग्वेदी ब्राह्मण से पहिले यह ब्राहामा ' होता ' प्राणाग्नि के वरणानन्तर उसका भरण होना भी आवश्यक है । अधिकार इस रकम प्रदान के लिए ही अधिकारप्रदानस्था-है, अतएव अभी यह देवाह्वान - कर्म में अनधिकृत है । इस, श्रपयवरण, अग्नि-नीय वरणकर्म किया जाता है । इसप्रकार ब्राह्मणोक्त श्राश्रावण अनन्तर , दिव्याग्निवरण वह अध्वर्यु ' - ' असौ मानपः ' - इस ब्राह्मणानुग्रह - सम्पादन, इन कम्मों के क्रमानुष्ठान के IIII I

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पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण प्रथमकाण्ड निगदमन्त्र का पाठ करता हुआ होत्रकर्म के लिए ग्रागत मानुष होता का वरण करता है । यही प्राकृतिक होता ( अग्नि ) का प्रतिनिधि है ॥ १३ ॥

इति मानुष होतृवरणोपपत्तिः -६ – स्वस्त्ययनजपापपत्तिः--५ अध्वर्यु ' प्रयुक्त ' असौ मानुष: ' इस निगदमन्त्र से हौत्रक के लिए भार वृत आ गया होता है, आज जो हाँत्रकर्म्म वास्तव में से ' होता ' बन गय । है । इसी क्षण से इस पर उस सम्पूर्ण उत्तरदायित्त्व का होता ' स्वस्त्ययनजप ' करता है, सम्बन्ध रखता है । अपने इसी उत्तरदायित्त्व को सफल बनाने की कामना से के अनुग्रह से जिस का एकमात्र तात्पर्य यही है कि, प्राकृतिक सम्वत्सरयज्ञ के सञ्चालक जिन प्राणदेवताओं प्राणदेवताओं का मन्त्रशक्ति के मनुष्य अपने शास्त्रीय कम्मों में सफलता प्राप्त करने में समर्थ होते हैं, अधिकारप्राप्त उन होते ही अधिकार सिद्ध द्वारा अनुग्रह प्राप्त करना । जिसप्रकार लोकाधिकारारूढ अधिकारी प्राप्त करते ही होता उन कम्र्मों को अपने लक्ष्य में ले आता है, ठीक उसीप्रकार वरणकम्म से होत्राधिकार है । प्रत्येक कार्य में प्राणदेवताओं की ओर अनुगत होजाता है, जिन का कि इसे भविष्य में आह्वान चित्रण करना अपने अन्तर्जगत् में नियुक्त होने से पहले यह आवश्यक है कि, उस कार्य की सम्पूर्ण रूपरेखा का नहीं रहती । जो व्यक्ति बिना खचित कर लिया जाय । ऐसा करने से भविष्य में त्रुटि होने की सम्भावना ही अपने स्वाभाविक अधिकारमय्र्यादा, कर्ममय्र्यादा का नियमन किए हठात् कर्म में प्रवृत्त होजाते हैं, अवश्य करना है, अनृतभाव से बे प्रमाद कर बैठते हैं । जिन देवताओं का आह्वान करना है, जिनके लिए को वरणानन्तर वषट्कार ही लक्ष्य जिन के लिए हविःप्रदान करना है, उन सब प्राणदेवताओं के उन सब कर्मकलाओं सम्मता संक्षिप्ता उपपत्ति में ले जाने के लिए स्वम्यनजप कर्म विहित है । यही इस कर्म की लोकनीति -है, जिस का १४ वीं कण्डिका में स्पष्टीकरण हुआ है || १४ || १५ वीं कण्डिका से आरम्भ कर २६ वी कण्डिका पर्यन्त ( ब्राह्मणसमाप्ति - पय्र्यन्त ) स्वस्त्ययन-कम्र्म से सम्बन्ध रखने वाले मन्त्रों की सोपपत्तिक व्याख्या हुई है । उसी का क्रमशः दिग्दर्शन कराया जाता है । सर्वप्रथम वृत होता- ' एतत्त्वा देवसतिवृते ' यह मन्त्र बोलता है । इस के द्वारा होता सविता की ही अनुज्ञा प्राप्त करता है । यह ठीक है कि, मन्त्रशक्ति के द्वारा प्राकृतिक ' होता - अग्नि ' का अनुग्रह प्राप्त करता हुआ यह ‘ मनुष्य - होता ' तत्तत्प्राणदेवताओं के आह्वान में समर्थ होजाता है । परन्तु इस आह्वानकर्म्म की मूलप्रतिष्ठा सरिता देवता ही है । सौरमण्डल को अपने गर्भ में रखने वाले आपोमय परमंष्टी के चारों श्रोर बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति, वरुण, सविता, आदि कतिपय उपग्रह उसी प्रकार परिक्रमा लगा रहे हैं, जैसे कि पृथिव्यादि उपग्रह सूर्य्यग्रह के चारों ओर उन पारमेष्ठ्य उपग्रहों में से ' सविता ' नामक उपग्रह का मुख्य कर्म्म है- प्रेरणाचल प्रदान करना । सौर- त्रिलोकी में जिन प्राणदेवताओं के जो भी कर्म्म हैं, उन सब का प्र'रक यही सविता प्राण है । अतएव इसे देवताओं का प्रसविता ( प्रेरबिना ) कहा गया है । इस पारमे-१३६५

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पश्चम- श्रध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण सविता की प्रेरणा का सर्वप्रथम सूर्य में हीं श्रागमन होता है, अतएव सूर्य को भी यत्र तत्र ' सविता ' नाम से व्यवहृत कर दिया गया है । सूर्य के द्वारा ही सौरत्रिलोकी में प्रतिष्ठित प्रजा में सविताप्राण के प्रेरणा-चल का आगमन होता है, जिस का आधार है- ' बुद्धिक्षेत्र ' | सविता का बृहस्पति से सम्बन्ध है । क्योंकि - ' बृहस्पतिः पूर्वेषामुत्तमो भवति, इन्द्र उत्तरेषां प्रथमः ' इस निगम के अनुसार सूर्य से पूर्व लोकों में सर्वान्त में बृहस्पति प्रतिष्ठित हैं, एवं उत्तग्लोकों में सर्वारम्भ में इन्द्र ( सौर मघवा ) प्रतिष्टित है । इन्द्र से उपर बृहस्पति * है, तदुपरि ब्रह्मणस्पति है, एवं इसके ऊपर सविता है । सविताप्राण का ( अर्करूप से ) आगमन पवित्रधर्मा ब्रह्मणस्पति, तथा वर्चस्व प्रवत्तक बृहस्पति, इन दोनों पारमेष्ठ्य उपग्रहों से संश्लिष्ट होकर ही ( सौर इन्द्रमण्डल में ) होता है । वागधिपति बृहस्पति ही अपने ' वाजपेय ' नामक ' सव ' कर्म से बुद्धि में उस ब्रह्मवीथ्य का आधान करते है, जो ब्रह्मव सावताप्राणात्मिका प्रेरणा से ग्रात्मजान विकास का प्रवर्त्तक बनता है । इसी समसम्बन्ध से सविता को ' श्री ' का प्रवत्त के मान लिया गया है, जैसा कि - ' तत्सवितुर्वरेण्यं, धियो यो नः प्रचोदयात ' इत्यादि मन्त्रवर्णन से प्रमाणित है । तात्पर्य यही है कि, तत्तत् प्राणदेवताओं का यज्ञकर्म में प्रवृत्त होना सविताप्राण के प्रेरणा - बल पर ही अवलम्बित है । जबतक यह होता अपने अाध्यात्मिक सविताप्राण में आधिदैविक सविताप्राण का बल प्राप्त नहीं कर लेता, तबतक अध्यात्मदेवानुगत आधिदैविक प्राणबन्धनलक्षण इस यज्ञकर्म में वह आधिदैविक प्राणदेवताओं का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकता । इसी सविताप्राणानुग्रह - प्राप्ति के लिए सत्र से पहिले इसे मन्त्र के द्वारा यही भावना करनी पड़ती है कि, " हे सविता देवता! देवाह्वान - लक्षण हौत्रकर्म्म के लिए मेरे व्याज से अध्वर्यु ' वस्तुतः आप का ही वरण कर रहे हैं " । इसप्रकार सर्वप्रथम सविता का अनुग्रह प्राप्त कर अनन्तर - ' अग्निहोत्राय ' इस मन्त्र से अग्नि, तथा अग्निमय ३३ यज्ञिय देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करता है । हौत्रकर्म्म का उत्तरदायित्त्व अग्नि पर ही है, यह अनेकधा स्पष्ट किया जाचुका है । साथ ही - ' तद्ग्नये चैनैतदं वेभ्यश्च ' इत्यादि कण्डिकाशेष का स्पष्टी-करण भी पूर्व से गतार्थ है- ( देखिए प्रकृत ब्रा ० की ४ कण्डिका ) ॥ १५ ॥

आधिभौतिक साधनों के द्वारा आध्यात्मिक यज्ञ का जिस आधिदैविक यज्ञ से सम्बन्ध अपेक्षित है, वह ' सम्बत्सर ' नाम से प्रसिद्ध है । सम्वत्सरयज्ञ ही ' सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा ' इत्यादि के अनुसार चतुद्दश-भूतसर्गात्मिका प्रजा का प्रजनयिता ( उत्पादक ) है । सम्वत्सर का प्रवर्ग्य रेतोभाग पार्थिव योनि में आहुत होता है । इसी द्यावापृथिव्यरस के दाम्पत्य से प्रजोत्पत्ति हुई है । अतः अवश्य ही सम्वत्सर को ' पिता ' कहा जासकता है | दक्षिणस्थ ऋत अग्नि तथा उत्तरस्थ ऋत सोम, दोनों के उद्ग्राभ - निग्राभ से ‘ ऋतु ' का बरूप निष्पन्न होता है । ऋतुसमष्टि ही सम्बत्सर है । प्रत्येक वस्तु स्वानुरूप ऋतुप्राण को लेकर ही प्रादुर्भूत होती है । इस दृष्टि से भी ऋतुसमष्टिरूप सम्वत्सर को ' पिता ' कहा जासकता है, जो कि सम्वत्सर अपने तीन सवनों से ' वानर ' बन रहा है । * यह ‘ बृहस्पति ' सुप्रसिद्ध सौर ' उपग्रह भूत बृहस्पति ' से सर्वथा भिन्न है । १३६६

पृष्ठ 1126

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पञ्चम अध्याय पृथिवी त्रिवृत् ( घ ) प्रातः सवनम् घनाग्निः ( अग्निः ) प्रवब्राह्मण अन्तरिक्षम् पञ्चदशः ( १५. ) माध्यन्दिनवनम् तर लाग्निः ( बाबुः ) १३६७ प्रथमकाण्ड द्यौः एकविंश: ( २१ ) मायसवनम् विरलाग्निः ( आदित्य ) भूपिण्ड के अदितिष्ठ से संलग्न त्रिवृनम्तोम प्रातः सवन है, यही स्तोमत्रिलोकीप सम्वत्सर का पृथिवीलोक है, यही पहिला विश्व है, इसी में घनावस्थानपन्न अग्नि ( अग्नि ) नामक ' नर ' ( नायक ) प्रतिष्ठित है । त्रिवृत पृष्ठ से संलग्न दशस्तोम माध्यन्दिनमवन है, यही सम्बत्सर का अन्तरिक्षलोक है, वहीं दूसरा विश्व है, इसी में तरलावस्थापन अग्नि ( वायु ) नामक ' नर ' प्रतिष्ठित है । पञ्चदश से संलग्न एकविंशस्तोम सायंसवन है, यही सम्वत्सर का लोक है, वही तीसरा विश्व है, इसी में विरलावस्थापन अग्नि ( आदित्य नामक ' नर ' प्रतिष्ठित है । सम्वत्सर के त्रिवृत - पञ्चदश- एकविंश- स्थानीय - पृथिवीं अन्तरिक्ष - यौ नामक तीन विश्वों के अग्नि-वा श्रदित्य नामक तीनों नरों के पारस्परिक यज्ञ सम्बन्ध से सम्वत्सर त्रिलोकी में व्याप्त ' विराट-हिरण्यगर्भ - सर्वज्ञ ' नामक तीन अपूर्व भावों का उदय होता है । त्रिवृदग्नि में पञ्चदश वायु, एकविंश आदित्य, दोनों की आहुति से अग्निप्रधान त्रिमूत्तिं जिस भाव का जन्म होता है, वही ' विराट ' है । पञ्चदश वायु में त्रिवृदग्नि, एकविंश आदित्य, दोनों की आहुति से उत्पन्न वायुप्रधान त्रिमूर्त्तितस्त्र ही ' हिरण्यगर्भ ' है । एकत्रिंश आदित्य में त्रिवृदग्नि, पञ्चदश वायु, दोनों की आहुति से उत्पन्न आदित्यप्रवान त्रिमूर्त्तितत्त्वही ' सर्वज्ञ ' है । तीनों के अग्नि वायु - आदित्य- श्राधान्य सूचित करने के लिए जहाँ बिराट् हिरण्य - गर्भ - सर्वज्ञ, ये तीन पृथक पृथक नाम हैं, वहाँ तीनों का समवात्मक एक नाम ' वैश्वानर ' है । ' विश्वेभ्यो नरेभ्यो जातो बैंश्ानरः ' इस निर्वचन से तीनों त्रिमूर्त्तियों का वैश्वानरत्व गतार्थ है । अतएव विराट् - हिर-एयर्भ - सर्वज्ञमूर्त्ति सम्बत्सर को श्रुति ने- ' सम्वत्सरो वै पिता वैश्वानरः ' कह दिया है । यज्ञ के द्वारा यह वैश्वानरसम्पत्ति प्राप्तव्य है । केवल अग्नि के अनुग्रह से ऐसा सम्भव नहीं है । अपितु वहाँ अग्नि का वह व्यापक स्वरूप अपेक्षित है, जो सम्वत्सररूप से, किंवा वैश्वानररूप से त्रैलोका में व्याप्त है । इसी भावना के लिए ' अग्नि होत्राय सह पिता ' वैश्वानरेण ' इस मन्त्र का जप किया जाता है ।

पृष्ठ 1127

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पञ्चम श्रध्याय ' अग्निः ' १- वायुः अदित्ययः प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण > अग्निप्रधानस्त्रिमूर्त्तिर्विराट् - वैश्वानरः ' वायुः ' २- श्रग्निः श्रादित्यः ' श्रादित्यः ' ३- श्रग्निः • वायुप्रधानस्त्रिमूनिर्हिरण्यगर्भः वैश्वानरः सम्वत्सरो वैश्वानरः - आदित्यप्रधानस्त्रिमृतिर्हिरण्यगर्भः वैश्वानरः स्वस्त्ययन जप - मन्त्र का अगला भाग - ' अग्ने! पूजन! बृहस्पते! प्रच बढ़ प्रच यज ' । अनुवचन, और यजनकर्म में पार्थिव अग्नि, पार्थिव भूत, एवं वाक्, ये तीनों साधन अपेक्षित हैं । पार्थिव भूतभाग यजनकर्म्म का अनुगामी है, वाग्भाग अनुवचनकर्म का अनुगामी है । जिस अग्नि का वरण किया जाता है, वह द्यावापृयिवी में व्याप्त वैश्वानरलक्षण प्राणाग्नि था, एवं प्रस्तुत मन्त्र में पठित अग्नि भूपिण्डलक्षणा पृथिवी से सम्बन्ध रखने वाला भूताग्नि है । इस भूताग्नि का पोषण जिस पार्थिव प्राण से होता है, वह ' पूपा ' नाम से प्रसिद्ध है । शूद्रसृष्टिप्रवर्तक अदन्तक पाप्राण, रेवती नक्षत्रात्मक पूषाप्राण, आदित्यलक्षण पूप जाण, तीनों में से प्रकृतमन्त्र के ' पूषा ' शब्द से अदन्त पार्थिव पूषाप्राण ही अभिनेत है । बाकू - गौ - द्यौः, ये तीन पृथिवी के ' मनोता ' माने गए हैं । इन तीनों में पार्थिवी - वाक् का बृहस्पति से सम्बन्ध है, जिस बार्हस्पत्या वाक् से पार्थिव वषट्कार का स्वरूप निर्माण होता है । पार्थिवी - गौ का अग्नि से सम्बन्ध है, जिस से – ' गौर्चा अग्निहोत्रम् ' के अनुसार पार्थिव अग्निहोत्रयज्ञ सम्पन्न होता है । एवं पार्थिव द्यौ मनोता का पूषा से सम्बन्ध है । इन तीनों पार्थिव तत्त्वों के समन्वय से ही पार्थिव यज्ञ के जाज्या, तथा अनुवाक्या -कर्म्म सम्पन्न होते हैं । मन्त्र, के द्वारा उहीं तीनों का संग्रह किया जाता है. ॥ १६ ॥

स्वस्त्ययनजपमन्त्र का अगला भाग है- ' वसूनां रातौ स्याम, रुद्राणामुत्र्यां, स्वदित्या दित स्याम हसः ' । पार्थिवयज्ञ के पाकयज्ञ, वितानयज्ञ, भेद से दो विवर्त्त हैं । स्मार्त्त गृह्यनज्ञ पाकयज्ञ है । एवं श्रौत ताग्नियज्ञ वितानयज्ञ है । पार्थिव गार्हपत्याग्नि का वसुदेवता से, अान्तरिक्ष्य धिष्ण्याग्नि १३६५

पृष्ठ 1128

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1128 का मूल पृष्ठ
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पञ्चमश्रध्याय प्रवरत्राह्मण प्रथमकाण्ड का रुद्रदेवता से, तथा दिव्य आहवनीयाग्नि का आदित्यदेवता से सम्बन्ध है । देवत्रयी से अनुग्रहीता अग्नित्रयी कवितान ( पृथिवी से द्य लोक पर्यन्त फैलाव ) ही वितानयज्ञ है । इन तीनों गणदेवताओं के संग्रह से प्राकृतिक वितानयज्ञ की सम्पत्ति का संग्रह होजाता है । प्रकृत मन्त्र से उसी वितानसम्पत्ति का संग्रह किया जाता है । पार्थिव न सम्पत्ति, पशुसम्पत्ति तथा द्रव्यसम्पत्ति, तीनों की समष्टि ' राति ' है । जिसे ' दौलत ' कहा जाता है, उसी के लिए वेद में ' राति ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । यह ' राति ' अन्न - पशु - द्रव्य भेद से विधा विभक्त है । एवं तीनों पार्थिव वसुदेवता से सम्बद्ध हैं । अतएव सम्पत्ति को ' सु ' भी कहा जाता है । भूतात्मक पार्थिव अग्नि ही बसु हैं, यही पार्थिवी सम्पत्ति है । इसी अभिप्राय से ' वसूनां रानौ स्याम ' कहा गया है । निम्न लिखित मन्त्र इसी ' बसु - अग्नि ' के स्वरूप का स्पष्टीकरण कर रहा है—

अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्त यं यन्ति धेनवः ।

तमन्त शवोऽस्तं नित्यासो वाजिन इर्ष स्तोतृभ्य आभर ॥

- ऋक सं ० ५ | ३ | १ | है, जैसा कि, ' उन्तिरिक्षम वेमि ' रुद्रदेवता अन्तरिक्ष के अधिष्ठाता हैं । अन्तरिक्ष उरु है, विशाल इत्यादि ब्राह्मणश्रति से प्रमाणित है । रुद्रदेवताश्री की आवासभूमि यह ग्रन्तरिक्ष भी उरु है, एवं --' असंख्याताः सहस्राणि ये रुद्राः ' इत्यादि यजुर्मन्त्रवर्णनानुसार इस उरु- अन्तरिक्ष में रहने वाले अधिदेवता ( रुद्र ) भी आनन्त्यलक्षण उरु भाव से युक्त हैं । अन्न - पशु - द्रव्यादि पार्थिव सम्पत्तियाँ सङ्कोचधर्म्मा हैं जबतक इस पार्थिवसम्पत्ति के भोक्ता में आन्तरिक्ष्य उरुभाव ( विशालता - उदाराशयता ) नहीं आजाती, तबतक पार्थिवसम्पत्ति मोह का ही कारण बनी रहती है । अतएव ' पार्थिव वसु - राति ' के साथ साथ ही ग्रान्तरिक्ष्य रुद्र क । ‘ उरुभाग ' भी आवश्यक रूप से अपेक्षित है । ' रुद्राणामुयम ' से उसी भूमाभाव की प्राप्ति अभी-प्सित है । रुद्रनिवासात्मक अन्तरिक्ष के इस ओर वसुनिवासात्मक त्रिवृत्स्तोमावच्छिन्ना पृथिवी है, एवं उस ओर श्रादित्यनिवासात्मक द्यलोक है । मध्वस्थ अन्तरिक्ष की प्रतिष्ठा पृथिवी, तया द्युलोक ही है । अतएव अन्त— रिक्ष को उभयतः [ द्यावापृथिवी से ] परिच्छिन्न माना गया है, जैसा कि - " अमूलमुभयतः परिच्छिन्नम् ' इत्यादि ब्राह्मणति से प्रमाणित हैं । यज्ञकर्त्ता यजमान अपनी स्वाभाविक प्रकृतिदत्त ] प्रतिष्ठा में याव-ढायुर्भोगपर्य्यन्त प्रतिष्ठत रहता हुआ यज्ञ के द्वारा अन्तरिक्ष में जाता हुआ स्वर्गेपलक्षिता द्यु प्रतिष्ठा में प्रति-ठित होना चाहता है, जो कि द्य प्रतिष्ठा तदविदेवता - सम्बन्ध से ' आदित्यप्रतिष्ठा ' कहलाई है । शेष मन्त्रभाग से इसी ' आदित्यप्रतिष्ठा ' का संग्रह हुआ है । राति - प्रवर्त्तक बसु भूमाप्रवर्त्तक रुद्र, एवं प्रतिष्ठाप्रवर्त्तक आदित्य, तीनों देवता त्रैलोक्यव्यापिनी अदिति के गर्भ में प्रतिष्ठित है * । ' अदितये स्यामनेहसः ' इस मन्त्र भाग से सर्वान्त में उसी देवमाता अदिति का अनुग्रह प्राप्त किया जाता है || १७ || * दित्यां जज्ञिरे देवास्त्रयस्त्रिंशदरिन्दम! । आदित्या वसवो रुद्रा, अश्विनौ च परन्तप! । - वाल्मीकि रामायणे १३६६

पृष्ठ 1129

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री, पृष्ठ 1129 का मूल पृष्ठ
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पञ्चम अध्याय प्रवरत्राह्मण शतपथब्राह्मण स्वस्त्ययनजपमन्त्र का अगला भाग है - " जुष्टामद्य देवेभ्यो वाचमुद्यासम " । होत्रकर्म्म की • सफलता के लिए जिन जिन देवताओं का अनुग्रह अपेक्षित था, पूर्वमन्त्रभार्गो के जप से होताने वह प्राप्त कर लिया । अत्र यह स्वयं अपने उस आध्यात्मिक वाङमय देवता के अनुग्रह की कामना कर रहा है, जिस की प्राप्ति से सबकुछ सफल है, एवं जिस के प्रभाव में सबकुछ व्यर्थ है । अनुवचनकर्म से सम्बन्ध रखने वाले जिन देवताओं के लिए होता अनुवाक्या करता है, यदि उन मन्त्रों के उच्चारण में अक्षर - पद--वाक्य आदि का उच्चारण- सौष्ठव माधुर्य्य है, तो यथानुरूप उच्चरित मन्त्र अपनी उदात्त अनुदात्त - स्त्र --रित आदि स्त्ररमर्यादा से, तथा गायत्री, त्रिष्टुप, जगती, आदि ' छन्दोमर्यादा ' से तत्तत्स्वर - छन्दोमय प्राकृतिक प्राणदेवताओं से समतुलित होते हुए तह बतावाहन में समर्थ होजाते हैं । ऐसी देवाकर्षिणी शोभना - व्यवस्थिता मनुद्वेगकरी मन्त्रावाकू ही प्राणदेवताओं के लिए आकर्षण की वस्तु बनती हुई " जुष्टावाक् कहलाई है | यदि मन्त्रोच्चारण में खर -- स्वरता है, स्वरदोष है, उच्चारणदोष है, स्खलनदोष हैं, तो इस की सन्तानधारा विच्छिन्न है । ऐसी विच्छिन्ना मन्त्रवाक् कभी देवाकर्षणकर्म में सफल नहीं हो सकती । लोक में भी सब कुछ साधन - सामग्रियों के विद्यमान रहने पर भी केवल अपनी उद्वेगभावापन्ना अव्यवस्थिता सेसबकुछ व्यर्थ होजाता है । अतएव इतर सब साधनों की अपेक्षा उस अपने वाक् -- साधन का वाक सौष्ठव प्रत्येक दशा में अपेक्षित है, जिस के अनुग्रह से सभी साधन प्राप्त होजाते हैं, एवं कार्य्य भी समृद्ध बन जाता है | अतएव – ' तद्धि समृद्धम्, यो जुष्टं देवेभ्योऽनुनयन ' इत्यादि रूप से जुष्टा - वाक् को ही यज्ञ की प्रधान समृद्धि माना गया है ॥ १८ ॥

मन्त्राधीन देवता है, अतएव मन्त्रवाक् का सौष्ठव सर्वप्रथम अपेक्षित है । मन्त्र ब्राह्मणों के आधीन हैं, अतएव ब्राह्मणों का अनुग्रह भी आवश्यक रूप से अपेक्षित है । तत्त्वात्मिका वैज्ञानिकी वाक् का रहस्य जानने वाले मन्त्रवित ब्राह्मण भूदेव हैं । इन के प्रति भी सदा अनुद्वेगकरी -- जुष्टावाक् का ही प्रयोग करना चाहिए । विशेषतः उस वैदिक यज्ञकर्म्म [ यज्ञकर्म से उपलक्षित तप, तथा दानकर्म्म में भी ] में तो यह सावधानी रखनी हीं चाहिए कि, कहीं किसी भी ब्राह्मण के लिए उद्वेगकरी वाक् का प्रयोग तो नहीं होगया । ब्राह्मण की अप्रसन्नता यज्ञस्वरूप के विघात के लिए पर्याप्त है, एवं ब्राह्मण की प्रसन्नता यज्ञस्वरूपसमृद्धि के लिए पर्याप्त है । उन यज्ञकम्मों की मीमांसा कीजिए, जिन में यजमानलोग ब्राह्मणों का अपमान कर दिया करते हैं । उन दानकम्मों के कुफलों का अन्वेषण कीजिए, जिन में मदान्ध दानदाता अप मान - पुरस्सर दान करते हुए अपना सर्वनाश करा रहे हैं । उन अविवेकियों की उस जघन्यवृत्ति का भी अन्वे-पण करना न भूलिए, जो केवल धन को ही बुद्धिमत्ता का जनक समझते हुए ब्राह्मणवर्ण का अपमान कर अपने भविष्य की अप्रतर्क्यतम से ही श्रभिभूत करते जा रहे हैं । हमारा अपना तो ऐसा आत्म - विश्वास है कि, भारतवर्ष की वर्त्तमान दीनदशा के अन्यान्य कारणों में से ब्राह्मणचल की सुपुति तथा ब्राह्मण का अपमान भी एक मुख्य कारण है । ' तद्धि समृद्धं, यो जुड़ ब्राह्मणेभ्योऽनुत्रात ' इत्यादि श्रौता देश भी इसी कारण का स्पष्टीकरण कर रहा है । ' जुष्टां ब्रह्मभ्यः ' यह मन्त्रभाग इसी ब्राह्मणानुपह - प्राप्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है ॥१६ ॥

अगला मन्त्रभाग है --- ' जुष्टं नाराशंसाय ' । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, इन चारों वर्णों में ब्राह्मणवर्ण इतर तीनों वर्णों का मूलप्रभव है, ब्रह्मस्थानीय हैं । ब्रह्म एकाकी सृष्टि करने में असमर्थ १४००

पृष्ठ 1130

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पञ्चम अध्याय प्रवखाह्मगा प्रथमकाण्ड होता हुआ अपने तप से इतर वर्णों को उत्पन्न करता है - [ देखिए शत ० ब्रा ० १४ कां ० । ४ अ ० | २ ब्रा ० । २३ कं ० । ] । ब्रह्म सर्वादितत्त्व है, अतएव वह सृष्टिमर्यादा से सम्बन्ध रखने वाले प्रजासर्ग से बहिर्भूत है । ब्रह्ममूलक ब्राह्मणवर्ण प्रजा का ( धर्म्मसूत्र से ) सञ्चालक है, क्षत्रिय - वैश्य - शूद्रवर्णं प्रजावर्ग है । इस सर्वसामान्य प्रजावर्ग के लिए ही वेदभाषा में ' नर ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । ब्राह्मण नर ( मनुष्य ) नहीं है, अपितु देवता ( भूदेव ) है । सामान्य प्रजावर्ग से इस का पार्थक्य बतलाने के लिए, साथ ही इसे ब्रह्मात्मक बतलाने के लिए पूर्व ( १६ ] कण्डिका में - ' जुष्टां ब्रह्मभ्यः ' कहा गया है । अत्र प्रस्तुत कण्डिका में ब्राह्मणातिरिक्त सम्पूर्ण प्रजावर्ग के लिए जुटा वाकू के प्रयोग का विधान हुआ है । प्रत्येक कर्म्म में सभी के शुभसंकल्प अपेक्षित हैं । वही कर्म्म समृद्ध माना गया है, जिस को देखने वाले, न देखने वाले, सभी एकस्वर से साधुवाद दिया करते हैं । तात्पर्य्य, लोकसंग्रहदृष्टि से भी सभी की शुभ कामनाएँ, अपेक्षित हैं । इस के लिए सभी के प्रति जुष्टा वाक् का प्रयोग होना चाहिए । अगला मन्त्रभाग है -- “ यदद्य होतृवर्ये जिह्मं चक्षुः परापतत्, अग्निष्ठुत् पुनराम्रियाज्जातवेदा विचर्षणिः " । होता यद्यपि यथाशक्ति प्राण देवताओ का तत्सम ब्राह्मणों का, एवं प्रजावर्ग का सभी का अनु ग्रह भी प्राप्त कर लेता है । मन्त्रप्रयोग भी यथाविधि ही करता है । इसप्रकार अपनी ज्ञातदशा में यह अपने कर्म में कोई त्रुटि नहीं करता । तथापि संसार में समालोचकों की कमी नहीं है । सर्वश्रेष्ठ निर्दोष कम्र्मों की भी आलोचना करने वाले मिल ही जाते हैं । होसकता है -- लौकिक कम्मों का इस दृष्टिदोष से कुछ न बिगड़ता हो । परन्तु वैदिक - कम् अवश्य ही इस दृष्टिदोष से भी विकृत होसकते हैं । दृष्टिसूत्र के द्वारा वह कुत्सित--भावना यज्ञवातावरण में यदि प्रवेश कर जाती है, तो उसीप्रकार यज्ञस्वरूप विकृत हो जाता है, जैसे कि श्रागन्तुक तृणादि से स्वच्छ भी घर मलिन होजाता है । होता का यह भी एक कर्त्तव्य होजाता है कि, ऐसे दुष्ट समालोचकों की दुष्टदृष्टि से दोष से दोषयुक्त बने हुए यज्ञकर्म को निदुष्ट बनाने के लिए अग्नि से प्रार्थना कर ले | हम नहीं जानते कि, किस के दृष्टिदोष से कर्म्मस्वरूप विकृत हुआ । परन्तु सब कुछ जानने वाले, अतएव ' जातवेदा ' नाम से प्रसिद्ध ग्रग्नि अवश्य ही उसे जानते हैं । वे अवश्य ही हमारी भावना से प्रेरित होकर उस दृष्टिदोष को हटा कर पुनः यज्ञत्रुटि का सन्धान करने की क्षमता रखते हैं ॥ २० ॥

' जातवेदा विचर्षणिः ' यहाँतक स्वस्त्ययनजप करने के अनन्तर वह होता श्रध्वर्यु ', तथा श्राग्नीध्र नामक ऋत्त्विजों का स्पर्श करता है । वस्तुतः श्रध्वर्यु प्राणव्यापार का, उद्गाता, तथा होता, दोनों बाग्व्यापार के, एवं ब्रह्मा मनोव्यापार के प्रवर्त्तक माने गए हैं । परन्तु यहाँ स्थितिभाव को लक्ष्य बना कर श्रुति ने अध्वर्यु ' को ' मन ' मान लिया है । मन उक्थरूप से हृदय में प्रतिष्ठित रहता है । ' दूरङ्गमञ्जो -तिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ' इत्यादि मन्त्र के द्वारा मन का जो विदूर गमन बतलाया गया है, वस्तुतः वह वाङमय संस्कारों का ही गमन समझना चाहिए । कारण स्पष्ट है । मन पर बुद्धि प्रतिष्टित रहती है । बुद्धिस्थ प्रज्ञात्मक प्राण ही चित् का अनुग्राहक है । जबतक मन है, तभीतक बुद्धि है । जबतक बुद्धि है, तभीतक चित् है । जबतक चित् है, तभीतक जीवनसत्ता है । फलतः मन के विदूरगमन का संस्कारात्मक परिभ्रमण पर ही विश्राम मानना पड़ता है । जिसप्रकार मन स्वस्थान में स्थित रहता है, एवमेव अवका व्यापार स्वस्थान ( पृथिवी ) से ही सम्बन्ध रखता है । उधर होता का अनुवचनकर्म्मद्य लोकानुगत रहता है । इसी सादृश्य से निदानेन अध्वर्यु को मन, तथा होता को वाक् मान लिया जाता है । बिना मन के १८०१