Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1131–1140
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1131–1140
पृष्ठ 1131
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय प्रवरब्राह्मण शतपथब्राह्मण कस्ता के लिए यह होता मनःस्थानीय अध्व का स्पर्श
वाग्व्यापार प्रतिष्ठाशून्य है । उसी मनःप्रतिष्ठा प्राप्ति का अनन्य फल है । २१ ॥
है | मनोवाक् का परस्पर ग्रन्थिबन्धन ही इस स्पर्श आपध, वाजा अहव स्पर्शम्र्मानन्तर यह होता " मोर हसस्पातु - अग्निश्च पृथिवी च रखने वाला के अनुसार ग्रह से सम्बन्ध रात्रिश्व " इस मन्त्र का जप करता है । ' अहोरात्रवाद वाला ' सिद्धान्त चान्द्र सौम्य तत्व 1 के दो ही सर्वसृष्टि के उपादान सौर आग्नेय तस्य, तथा रात्रि से सम्बन्ध रखने है । अह का अग्नि से सम्बन्ध है, रात्रि का हैं । इन दो के तीन विवर्त्तो का ही यहाँ स्पष्टीकरण हुआ है, रात्रि का आप से सम्बन्ध है । अग्नि, पृथिवी से सम्बन्ध है । अहः का वाज से सम्बन्ध ' प्राण ' का वाचक है । ' एब उ एवं बिभ्रद्वाजः ' ( ऐ ० प्रा ० पृथिवी, जल, तीनों प्रसिद्ध हैं । ' वाज प्रकृत में करने वाला विधर्त्ता प्राण ही ' बाज ' है 1 अन्ना शशश ) इस अति के अनुसार भूतशरीर को धारण है ( वाजवत कथेन ) अन को भी ' वाज ' कह दान के द्वारा ही इस की शरीर में प्रतिष्ठा रहती जहाँनक पृथिवी है, यहाँतक अग्नि है 1 पार्थिव प्रजा दिया जाता है । ' यथाग्निगर्भा पृथिवी नुसार है पानी का भी कहीं अभाव नहीं है- ' सर्गमापोमयं के लिए सर्वत्र पृथिवी एवं तमिल अग्नि की व्याप्ति के अनुसार सर्वव्यापक है अहोरात्र की जगत् ' वाजयत्मक प्राण भी ' नेन्द्राहते पवते धाम किशन को लक्ष्य में रहते हुए अति ने इ ' ' उर्बी कहा सर्वव्याप्ति तो स्पष्ट ही है । इन ६ श्री की इसी सर्वव्याप्ति पासकता । होता किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं है । जिस के लिए ये ६ ॐ पर्व अनुकूल रहते हैं, वह ॥ कभी इसी देवषट्कानुग्रहप्राप्ति की कामना करता है ॥ २२ ' नामक अपने बैठने के स्वययन अपकर्म समाप्ति के अनन्तर होता अपने लिए एक नियत तूह ' होतृपदन निकाल कर फेंकता हुआ होता — स्थान की ओर लौट जाता है । यहाँ खाकर अपने दर्भासन से कि, ' परावसु ' नामक असुर ' निरस्तः परावसुः ' मन्त्र बोलता है जिस की उपपसि श्रति इस ने देवयज्ञमण्डल यह बतलाई है से बाहिर फेंका जाता है । असुरों का ' होता ' था । तृण निष्कासन - व्याज से उसी को भांति असुरों ने भी यश किया हो, एवं उनके ऐतिहासिक तथ्य की दृष्टि से बहुत सम्भव हो, भीम देवताओं हो की । परन्तु तत्त्वदृष्ट्या वह तमोमयप्राण, जोकि किसी यज्ञ में ' परावसु ' नामक ' असुर ब्राह्मण ' होता बना ( सम्पत्ति ) को यज्ञमण्डल से परागू करने अपने स्वाभाविक आसुरभाव से देवयज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले वसु, जैसा कि ' सहरता इत्यसुरक्षसां वाला है, ' परावसु ' है । इसी के लिए ' सहरक्षा ' शब्द प्रयुक्त हुआ है जाचुका है । दिव्यप्राणाग्नि दूत आस ' इत्यादि रूप से पूर्व के ' हिङ्कारत्राह्मण ' में विस्तार होतारं से बतलाया विश्ववेदसम ' इत्यादि कहा गया है । देवदेवताओं के होता है । रहीं के लिए ' अग्नि दृतं वृणीमहे ये अग्निदी ' अर्वावसु ' नामक ' अग्निं तं मन्ये वसु ' इत्यादि के अनुसार यसु ( सम्पस ) के प्रवतक में व्याप्त रहते हैं । फलतः यर मण्डल में देवदेवताओं के होता है । दोनों ही प्राणात्मक दूत अन्तरिक्ष वायु है । मन्त्रशक्ति के द्वारा तृनिदा-दोनों का सम्बन्ध अनिवार्य है । दोनों में ' परावसु ' का सम्बन्ध यज्ञविघातक सीदामि ' यह मन्त्र बोलता नेन उसे तो निकाल बाहिर कर दिया जाता है, एवं ' इदमहमर्वावसोः सदने बनाता है २३-२४ हुआ स्वयज्ञ में केवल ' अर्वावसु ' नामक दिशाग्नि होता के सम्बन्धको हदमूल कहिकाओं में इसी उपपत्ति का स्पष्टीकरण हुआ है ॥ २२ २४ ॥ १४०२
पृष्ठ 1132
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय प्रवरखाह्मण प्रथमकाण्ड असि मा मोड़ो-इसप्रकार होतृत्रदनस्थान में बैठने के अनन्तर होता बोलता करता है - " हुआ विश्वकस्तनूपा होता उत्तर की ओर थोड़ा सा पिष्टं मा मा हिंसितुमेप वां लोकः " । इस मन्त्र का उच्चारण अग्नियों के मध्यम में पड़ता चलता सा हैं । होतृषदनस्थान गार्हपत्य, तथा आहवनीय, दोनों से द्यावापृथिव्य श्राज समिद्ध बन कर अतिशयरूप से ही है । दोनों अग्निदिव्याग्नि हैं, विशेषतः श्राहवनीय तो समिन्धन तन्मध्यस्थ होता का अनिष्ट होसकता है । शक्तिमान् बन गया है । अवश्य ही बिना इनकी अनुग्रहप्राप्ति के अतएव होता स्तुति के द्वारा इन का अनुग्रह प्राप्त करता है ॥ २५ ॥
० ' इत्यादि मन्त्र बोलता है, अनन्तर आहवनीयाग्नि की ओर देखता हुआ - ' विश्वेदेवाः शास्तन जिस का स्पष्टीकरण मूलानुवाद से ही गतार्थ है ॥ २६ । इति विवेचनाप्रकरणम् इति - होतृप्रवरब्राह्मणं समाप्तम् । इति प्रथमकाण्डे - पञ्चमाध्याये प्रथमं ब्राह्मण चतुर्थप्रपाठके च द्वितीयं ब्राह्मणं “ प्रवरब्राह्मणं ” नामकमुपरतम् १४०३
पृष्ठ 1133
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः इति - शतपथब्राह्मणविज्ञान भाष्ये-मथमकाण्डे पंचमाध्याये -- प्रवरब्राह्मणम्
पृष्ठ 1134
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
श्रीः अथ शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये प्रथमकाण्डे पंचमाध्याये -- “ स्रुग्ब्राह्मणम् ” ( वृष्टिविज्ञानात्मकम् )
पृष्ठ 1135
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
॥ श्री ॥ अथ प्रथमकाण्डे पचमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं चतुर्थप्रपाठके च तृतीयं ब्राह्मणं उपक्रान्तम् “ “ स्रगब्राह्मणम् ” ” २२ - स्रुगादापनं आश्रावणं - प्रत्याश्रावणञ्च २ - त्रुगादापन निगद ' — ( मूल ) - ' अहिता वेबर नेत्रम् ' इति । अग्निरिदं होता वेत्त - इत्येवैतदाह । प्रश्नेत्रमिति । तस्यो हि होत्रम् | ' वेत्तु प्रवित्रम् ' इति । यज्ञो वै पावित्रम् । वेत्त यज्ञमित्येवैतदाह । ' साधु ते यजमान! देवता ' इति । साधु ते यजमान देवता - यस्य अग्निर्होता इत्येतदाह । ' घृतवतीमध्वर्यो! स्त्रचम स्यस्व ' इति । तदध्वयु " प्रमोति । स यदेकामिवाह ॥ १ ॥
यजमान एव जुहूमनु, योऽस्मा श्ररातीयति स उपभृतमनु । सयद् द्व े व त्रयाद्-यजमानाय द्विषन्तं भ्रातृव्यं प्रत्युद्यामिनं कुर्यात् । अत्तव जुहूमनु, श्राद्य उपभृतमनु । स पद्द्व े इव ब ूयाद - अत्र आद्य प्रत्युद्यामिनं कुर्यात् । तस्मादेकामिवैवाह || २ || ' देववं विश्ववाराम् ' इति । उपस्तोत्यवैनामेतद्, महयत्येव यदाह, देवयुवं विश्ववा-रामिति । ईडाम है देवाँ ३ || ' ईडेन्पान्, नमस्याम नमम्यान, यजाम यज्ञिवान् ' इति ।
मतान् देवान - -य ईडेन्याः, नमस्याम तानू - ये नमस्याः, यजाम यज्ञियान् - इति ।
मनुष्या वा ईडेन्याः, पितरो नमस्याः, देवा यज्ञियाः ॥ ३ ॥
१४७७
पृष्ठ 1136
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय सोनीन्नापव्याहरेत् उपावर्तने ॥ ६ ॥
गुत्राह्मण शतपथब्राह्मण १४०८ या प्रजा यज्ञ अनन्वाभक्ताः- पराभूता ताः । एवमेतद् या इमाः प्रजा अप राभूताः - ता यज्ञ भजति । मनुष्यान् अनु पशवः, देवान् अनु वयस्योपधयो वनस्पतयो यदिदं किञ्च - एव तत्सर्वं यज्ञ ' आभक्तम् ॥ ४ ॥
तावातावव्याहृतयो भवन्ति । नवेमे पुरुषे प्राणा: - एतानेवास्मिन् एतद् दधाति । तस्मान्नव व्याहृतयो भवन्ति ॥ ५ ॥
२ - ग्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - निगदः-यज्ञो ह देवेभ्योऽपचक्राम । तं देवा अन्वमन्त्रयन्त ' आ नः शृणु, उप न आवर्तस्व ' इति । स: ‘ अस्तु तथा ' इत्येव देवानुपाववर्त्त । तेनोपावृत्त ेन देवा अयजन्त । तेनेष्ट्वा एतद् अभवन् यदिदं देवाः ॥ ६ ॥
स यदाश्रावयति गज्ञमेवैतदनुमन्त्रयते ' आ नः शृणु, उप न आवर्तस्व इति । अथ यत्त्रत्याश्रावयति - यज्ञ एवैतदुपावर्तते ' अस्तु तथा ' इति । तेनोपावृत्तेन रेतसा भूतेन ऋत्विजः संप्रदायं चरन्ति यजमानेन परोक्षम् । यथा पूर्णपात्रेण सम्प्रदायं चरेयुः-एवमनेन ऋविजः संप्रदानं चरन्ति । तद्वाचैवेतत् संप्रदायं चरन्ति, बाग हि यज्ञः, वाग् उहि रेतः, तदेतेनैतत् संप्रदायं चरन्ति ॥ ७ ॥
सः ' अनुत्र हि ' इत्येवोक्त्वा अध्वर्युनविव्याहरेत् नो एव होतापव्याहरेत् । श्राश्रा-वयति अध्वर्युः तदग्नीधं यज्ञ उपावर्तते ॥ ८ ॥
प्रत्याश्रावणात् । प्रत्याश्रावयत्यग्नीत् तत् पुनरध्वर्यु ज्ञ सोऽध्वर्यु ' नपव्याहरेत्- ' यज ' इति वक्तोः । यजेत्येवाध्वर्यु हो यज्ञ सम्प्रयच्छति ॥ १० ॥
स होता नाकन्याहरेत् - आ वषट्कारात् । तं वपट्कारेणानावेव योनौ रेतोभृत सिञ्चति । 1 योनिर्यज्ञस्य स ततः प्रजायते - इति नु हवियज्ञे । अथ सौम्य ऽध्वरे ॥ ११ ॥
सवै ग्रहं गृहीत्वाध्वनपव्याहरेद् या उपकरणाद् । ' उपावर्त्तध्वम् ' इत्येवाध्वर्यु त्रै रुद्गातृभ्यो यज्ञं संप्रयच्छति ॥ १२ ॥
त उद्गातारों नापव्याहरेयुः या उत्तमायाः । ' एषोत्तमा ' इत्येवोद्गातारो होत्रे यज्ञं संप्रयच्छन्ति ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1137
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय खू गत्राह्मण प्रथमकाण्ड स होता नापव्याहरेत् श्रा वषट्कारात् । तं वपट्कारेणाग्नावेव योनौ रेतोभूत सिञ्चति 1 । अग्नि योनिर्यज्ञस्य स ततः प्रजायते ॥ १४ ॥
स यद् सोऽव्याहरेत् - यं यज्ञ उपावर्तते, यथा पूर्णपात्रं परासिञ्चेद् एवं हस यजमानं परासिञ्चेत् । स यत्र हैवमृत्विजः संविदाना यज्ञेन चरन्ति - सर्वमेव तत्र कल्पत े , न मुह्यति । तस्मादेवमेव यज्ञो भर्तव्यः ॥ १५ ॥
तावा एताः पञ्च व्याहृतयो भवन्ति ' ओ श्रावय ' ' अस्तु यजामहे, ' ' वौषट् ' इति । पाङ को यज्ञः, पाङक्तः पशुः, पञ्चतवः यज्ञभ्य मात्रा, एपा सम्पत् ॥ १६ ॥
पड् ', ' यज ', ' ये संवत्सरस्य । एका तासां सप्तदशाक्षराणि । सप्तदशो वै प्रजापतिः । प्रजापतिर्यज्ञः । एपैका यज्ञस्य मात्रा, एमा सम्पत् ॥ १७ ॥
' ओ श्रावय ' इति नैं देवाः पुरोवात ' ससृजिरे । ' अस्तु श्रौषट् ' इति अभ्राणि ममप्लावयन् । ' यज ' इति विद्यतम् । ' ये यजामहे ' इति स्तनयित्नुम् । वषट्कारेणैव प्रावर्षन् || १८ || स यदि वृष्टिकामः स्यात्, यदीष्ट्या वा यजेत, दर्शपूर्णमासयोर्वैव ब्रूयाद् ' वृष्टि-कामो वा अस्मि ' इति । तत्रो अध्वर्युं ब्रूयात् पुरोवात च विद्युतं च मनसा ध्याय ' इति । ‘ अभ्राणि मनसा ध्याय ' इति श्रग्नीधम् । ' स्तनयित्नु ' च वर्षं च मनसा ध्याय ' इति होतारम् । ' सर्वाण्येतानि मनसा ध्याय ' इति ब्रह्माणम् । चर्षति हैव तत्र — यत्रै ऋत्विजः संविदाना यज्ञेन चरन्ति ॥ १० ॥
' ओ श्रावय ' इति वै देवा विराजमभ्याजुहुवुः । ' अस्तु श्रापड् ' इति वत्समुपावा-सृजन् । ' यज ' इति उदनयन् । ' ये यजमाहे ' इति उपासीदन् । वपट्कारेणैव विराज-महत । इयं वै त्रिराट् अस्यै वा एप दोहः । एवं ह वा अस्मै इयं विराट् सर्वान् कामान् दुहे - य एवमेतं विराजो दोहं वेद ॥ २० ॥
इति- प्रथमकाण्डे पञ्चमाध्याये द्वितीयं ब्राह्मणं चतुर्थप्रपाठके च तृतीयं ब्राह्मणं उपरतं- “ स्रु ग्वाह्मण ” नामकम्
पृष्ठ 1138
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय मूलानुवाद: --व गब्राह्मण शतपथब्राह्मण पाँचवें अध्याय में दूसरा, एवं चौथे प्रपाठक में तीसरा ब्राह्मण ५ – - गादावननिगद -" सुग्ब्राह्मण " ( पूर्व के ‘ प्रवरत्राह्मण ' में अध्वर्यु के द्वारा होने वाले यजमान, दिव्य अग्नि, एवं मानुष होता के वरक की इतिकर्त्तव्यता बतलाई गई है । अब प्रकृत ' गुनाह्मण ' में ' स्रुगादापन-कर्म ' का स्पष्टीकरण किया जाता है । कहा गया है कि, अध्वर्यु के द्वारा होतृत्त्वेन वृत ‘ होत ì ’ नामक ऋत्विक अपने हौत्रकर्म की निर्विघ्नपारसमाप्ति के लिए स्वस्थान होतृपदन में प्रतिष्ठित होकर - ' एतत् त्वा देव विवृणते ' इत्यादि मन्त्रजप - लक्षण ' स्वस्त्ययनजन ' कर्म्म करता है । इस कर्म्म के अनन्तर ही स्रुगादापनक चिह्नित है, जिसकी इतिकर्त्तव्यता क्रमप्राप्त आरम्भ करती हुई श्रुति कहती है ) -( स्वस्त्ययनमन्त्रजप के अनन्तर होता नामक ऋत्विक् ) - ' अग्निर्होता वेच्चग्नेर्होत्रम् ' ( प्राग्निलक्ष दिव्य होता इस अनुष्ठेय अपने हौत्रकर्म्म को जाने ) यह मन्त्र बोलता है । ' इस ( अनुष्ठेय कर्म्म ) को दिव्याग्निरूप यह होता जाने ' मन्त्रभाग से यही कहा है । ' अग्नि-हत्रिम् ' इस मन्त्रभाग का यही तात्पर्य है कि यह हाँत्रकर्म्म निश्चयेन अग्नि का ही है । ( अनन्तर ) ' वेत् प्रावित्रम् ' ( वह दिव्याग्निरूप होता यज्ञ को जाने ) यह मन्त्रभाग बोलता है प्रावित्र निश्चयेन – ( ' प्रकर्षेण अवति ' इस व्युत्पत्ति से ) यह यज्ञ है । ( इस मन्त्रभाग से ) ‘ होता रक्षक यज्ञ को जाने ', यही कहा है । ( अनन्तर ) ' साधु ते यजमान! देवता ' ( हे यजमान! जिस तुझा होता दिव्य अग्नि है, वह तुहारा देवता तुह्मारा लिए कम्मसिद्धि के लिए साधु-योग्य है ) यह मन्त्रोच्चारण करता है । मन्त्र से यही कहा गया है । ( अनन्तर ) - घृतवतीमध्वर्यो! स्रुचमास्यस्त्र ' ( हे अध्वर्यु! आप घृतपूर्णा च का ग्रहण कीजिए ) यह मन्त्रोचारण करता है । ( इस मन्त्र के द्वारा होता ) अध्वर्यु को ( गाढ़ापनकर्म के लिए प्रेरित करता है । सो जो कि होता ( कोजु उपभृत, इन दोनों में से ) केवल जुहू के लिए प्रेरित करता है, ( उस की उपपत्ति बतलाते हैं ) ॥ १ ॥
यजमानही जुहू को लक्ष्य बनाता है, ( एवं ) जो इस ( यजमान के लिए ) शत्रुता करता है, वह ( यजमान का शत्रु ) उपभृत को लक्ष्य बनाता है ( अर्थात् जुहू निदानेन यजमान की, तथा १४१०
पृष्ठ 1139
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय स्त्र गब्राह्मण प्रथमकाण्ड उपत इसके शत्रु की प्रतिकृति है ) । ( ऐसी स्थिति में ) यदि वह होता ( अध्वर्यु को ) दो ( जुहू-उपभृ: दोनों ) स्रुचों के लिए प्रेरित करेगा, तो यजमान के लिए द्वे करने वाले शत्रु • को यजमान की प्रतिस्पर्द्धा में खड़ा कर देगा ( अर्थात द्वेषी शत्रु को बलप्रदान करने वाला सिद्ध होगा, अतः एक ही जुहू के लिए प्रेरित करना उचित है ) । ( अब इसी की एक दूसरी उपपत्ति और बतलाते हैं ) - अत्ता ( भोक्ता ) ही जुहू को लक्ष्य बनाता है, एवं आद्य ( भोग्य ) उपभृत् को लक्ष्य बनाता है । ( अर्थात जुहू निदानेन ' अत्ता ' की, तथा उपभृत् ' आय ' की प्रतिकृति है ) [ ऐसी स्थिति में ] यदि वह होता दो नु चों के लिए प्रेरित करेगा, तो अत्ता के लिए आय का प्रतिस्पर्द्धालु बनावेगा । [ अर्थात् भोक्ता, भोग्य की तुलना में भाग्य को सबल बनावेगा । ऐसा न हो, इसलिए ] एक ही रूप से [ एक स्रुच के लिए ] मन्त्र बोलना है || २ || [ अनन्तर ' देवयुवं विश्ववाराम् ' [ देवताओं के सहयोग की इच्छा रखने वाली, तथा सम्पूर्ण देवताओं से वरणीय, ऐसी जुहू के लिए मैं अध्वर्यु को प्रेरित करता हूँ ] यह मन्त्रो-चारण करता है । वह होता इस जुहू की प्रशंसा हो करता है, बढ़ावा ही देता है, जो कि— " देवयुवं विश्ववाराम " यह कहता है । अनन्तर ] " ईड़ाम है देवाँ ३ || ईडन्यान्, नमस्याम नम-स्यान, यजाम यज्ञियान् ” [ स्तुति करने योग्य मनुष्यों का मैं स्तुति करता हूँ, नमस्कार करने योग्य पितरों को मैं नमस्कार करता हूँ, एवं यजन में भाग लेने वाले आहुति ग्रहण करने वाले व ' यज्ञिय ' कहलाने वाले देवताओं का मैं यजन करता हू ] यह मन्त्रोच्चारण करता है । मनुष्य निश्चयेन स्तुति करने योग्य हैं, पितर नमस्य हैं, एवं देवता यज्ञिय हैं ॥ ३ ॥
जो प्रजाएँ यज्ञ में भागरहित हैं [ जिनका यज्ञ में भाग नहीं है ], वे प्रजाएँ निश्चयेन पराजित हुई हैं । इसीप्रकार [ ठीक इसके विपरीत ] जो प्रजाएँ अपराजित हैं, उह्रीं को यज्ञ में समाविष्ट करता है [ अर्थात प्राकृतिक यज्ञ में जिन प्रजाओं ने भाग नहीं लिया, वे परास्त हुई, एवं जिह्नोंने यज्ञ में भाग लिया, वे विजयिनीं हुई । प्रकृत यज्ञ में उन विजयिनी प्रजाओं का ही समावेश किया जाता है ] । मनुष्य को लक्षित कर पशुप्रजा, देवताओं को लाक्षत कर पक्षी, ओप धियाँ, बस्पतियाँ, तथा । जिन का सृष्टिकर्म में उपयोग है वह ] वह सबकुछ यज्ञ में समाविष्ट है । [ ४ ] ॥ १८२१
पृष्ठ 1140
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चम अध्याय स्रु ग्वाह्मण शतपथब्राह्मण इसप्रकार [ पूर्व कथनानुसार गाढ़ापन कर्म से सम्बन्ध रखने वाले ' गाढ़ापननिगढ़ ' ] मन्त्र की व्याहृतियाँ [ वाक्य ] होजातीं हैं । पुरुष [ आध्यात्मिक यज्ञ ] में नौ [ मात शीर्षण्य, दो वा प्राण सम्भूय ६ ] प्राण हैं । [ नवव्याहृत्यात्मक इस त्रुगादापनमन्त्र से ] वह होता अपने इस वैध आधिभौतिक यज्ञ में इह्रीं ६ प्राणों को स्थापित करता है । इसी नवप्राणाधानसम्पत्ति के लिए ] गादानमन्त्र की ६ व्याहृतियाँ होतीं हैं ॥ [ ५ ] ॥ गादापन निगदसमाप्त -9-२ आश्रावण - प्रत्याश्रावणनिगद-' अग्निर्होता वेच्चग्नेर्होत्रम् ० ' इत्यादि नवव्याहृत्यात्मक होत्रकर्तृक ' सुगादापन क के अनन्तर अध्व होना, उद्गाता, ब्रह्मा, इन चारों ऋत्विजों के सहयोग से श्राश्रावण - प्रत्या-श्रावण- कर्मेतिकर्त्तव्यता सम्पन्न होती है । एक दूसरे ऋत्विक् का एक दूसरे ऋत्विक् के प्रति यज्ञस्वरूप की महिमा का वर्णन खान हीं आश्रवण- प्रत्याश्रवरण- कर्म कहलाया है । यह कर्म किया क्यों जाता है?, इस प्रश्न के उत्तर में प्रथम एक वैज्ञानिक आख्यान उद्धृत होरहा है, जिस-का तात्त्विक विश्लेषण विवेचना - प्रकरण में होगा । मौलिक उपपत्ति से सम्बन्ध रखने वाले उसी वैज्ञानिक आख्यान का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है । - [ किसी युग में ] यज्ञ देवताओं को छोड़कर चला गया । [ लोकान्तर में पलायित उस ] यज्ञ को देवताओंने बड़े अनुनय विनय के साथ बुलाना आरम्भ किया कि [ हे यज्ञदेव! ] तुम हमारी सुनो ( मानो ], हमारी देवदेवताओं की अनुनय विनय युक्ता वाणी से प्रभावित होकर लोकान्तर में ओर लौट आओ । गया हुआ ] बह् यज्ञ समीप लौटे हुए उस ' वैसा ही हो ' [ यह स्वीकृति वचन ] कहता हुआ देवों की ओर लौट आया । यज्ञ से देवोनें अपना यागकर्म सम्पन्न किया [ यज्ञ तिकर्त्तव्यता पूरी की ] । इस यज्ञ से वजन कर * १ – “ यग्निर्होता ” । २ – ‘ ' वेच्चग्नेर्होत्रम् ” । ३ – “ वेत्त प्रावित्रम् ” । ४ -- " साधु ते यजान! देवता " । ५ - " घृतवतीमध्वर्यो! ५-चमाच्यस्य ” । ६ - " देवबुवं विश्ववाराम् ” । ७ - ईडाम है देवाँ ३ ॥ ईडेन्यान् ” । ८- " नमस्याम नमस्यान् " । ६ - " जाम यज्ञियान् " । इति - त्रुगादापननिगढ़व्याहृतयः [ ६ ] १४१२