Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1141–1150
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1141–1150
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पंचम श्रयमय स्त्र गब्राह्मण प्रथमकाउ के [ देवदेवता ] बन गए, जो कि [ आज उन का ] यह देवस्वरूप [ त्रैलोक्यात्मक सम्वत्सरमण्डल प्रतिष्ठित ] है | [ अर्थात् देवदेवताओंने अनुनय विनय के द्वारा वापस लौटे हुए यज्ञकर्म्म से ही अपना देवत्त्व सुरक्षित रक्खा, यज्ञ ही देवों का देवत्त्व बना ॥ [ ६ ] ॥ सो जो कि अध्वर्यु [ नामक ऋत्विक ' ओश्रावय ' इत्यादि रूप से ] श्रावण - कर्म करता है, [ अपने इस आश्रम से प्राकृतिक देवदेवताओं की भाँति ] यज्ञ को ही अनुनय विनय से बुलाता है कि आप हमारो सुनो, हमारी ओर लोट आओ । [ तात्पर्य, अध्ययुकृत आश्रावरण-कर्म्म लोकान्तर में गत यागस्वरूप- सम्पादक यज्ञ को स्व वैधयज्ञ में वापस बुलाने के लिए ही विहित है ] । [ अध्वर्यु कृत आश्रावण के अनन्तर आग्नीध नामक ऋत्विक्- ' अस्तु श्रोपट ' इत्या-कारक जो प्रत्याश्रावणकर्म्म करता है - उस प्रत्याश्रावणकर्म से वह पलायित यज्ञ ' त्रैसा ही हो ' इस स्वीकृति के साथ लौट आता है । [ तात्पर्य, आग्नीधकृत प्रत्याश्रावणकम्म यज्ञ के स्वीकृति--पृर्वक वापस लौट आने के स्थान में ह्रीं विहित है ] । इसप्रकार [ अध्यर्यु कृत आश्रावरण, एवं आग्नी-प्रकृत प्रत्याश्रावण से समीप आए हुए यज्ञ के बल से यजमान को [ इस यज्ञ म्यरूपसम्पादानकर्म में ] परोक्ष रखते हुए ऋत्विक लोग सम्प्रदाय का अनुगमन करते हैं- परस्पर एक दूसरे के प्रति योग्य इतिकर्त्तव्यता का विभाजन करते हुए यज्ञतिकर्तव्यता पूर्ण करते हैं ] । [ तात्पर्य -- श्रावण, प्रत्याश्रावणरूप - वाङ्मय निगदकर्म से यज्ञ का स्वरूप सम्पन्न होता है । इस में चारों ऋत्विजों का क्रमशः सहयोग रहता है । केवल यजमान इस निगद्कर्म में भाग नहीं लेता ] जिसप्रकार [ लोक में किसी बृहतपात्र को पूर्ण करने के लिए समवेत अनेक व्यक्ति अपने आगे आगे की व्यक्तियों को जलपूर्ण घट पात्र सौंपते हुए बृहतपात्र पूर्ण कर देते हैं, तथैव इस पारस्परिक प्रदान-कसे इस यज्ञ के । वे ऋत्त्विक सम्प्रदाय का अनुगमन करते हैं । ( यहाँ पारस्परिक सम्प्र-दान किसी भौतिक द्रव्य का नहीं होता, अपितु केवल वाक्प्रयोग लक्षण निगढ़मन्त्र- प्रयोग से ही सम्प्रदायानुगमन होता है । इसी अभिप्राय को अव्यक्त करती हुई श्रुति कहती है किं ) इस वाक् ( वाङ्मय निगद्मन्त्रप्रयोग ) के द्वारा ही सम्प्रदान - पूर्वक ऋत्विक लोग अनुष्ठान करते हैं । चाक्रू ही यज्ञ है, और बाक ही निश्चयेन यज्ञका रेत है । अतः बाकू के द्वारा ही सम्प्रदानपूर्वक यज्ञानुष्ठान
करते हैं । ( ७ ) ॥
( आश्रावण, प्रत्याश्रावण- कर्म के पारिस्परिक सम्प्रदान से सभी ऋत्विजों का व्यवस्थितरूप से शान्त - अनुद्विग्न - वृत्ति मैं रहना आवश्यक है । इस निगद्कर्म में उन्हें उतना हीं कुछ बोलना है, जितने का निगड़कर्म से सम्बन्ध है । प्रस्तुतानुपयोगिनी लौकिकवार्त्ता अत्र सर्वथा निषिद्ध है । इसी विशेषादेश का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है कि वह अध्वर्यु ( अपने मुख से होता १४१३
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पञ्चम अध्याय ख़ गब्राह्मण शतपथ ब्राहाण नामक ऋत्त्विक् से प्रति अनुवाक्या के लिए मैप करता हुआ ) केवल ' अनुत्र हि ' [ अनुवचन करो ] इतना भर कह कर अप्रासङ्गिक ओर कुछ न बोले । नाहीं होता ही ओर कुछ अप्रासङ्गिक उच्चारण करे । [ क्योंकि अध्वर्यु कृत प्रप से अनुवचन द्वारा होता में भी बागुरूप यज्ञ का समावेश होजाना है ] | [ अनन्तर ] अध्वर्यु ' [ आग्नीध्र को लक्ष्य बनाकर ' श्रश्रावय ' इत्यादिरू से ] आश्रावण करता है । इस श्रवण से यज्ञ आग्नीध्र के समीप लौट आता है [ आग्नीध्र यज्ञसन्तान से युक्त हो-जाता है ] || [ 5 ] ] || क्योंकि अध्वर्यु कृत श्रवण से आग्नीध में यज्ञसम्पत् का समावेश हो गया है, अतएव जबतक आग्नीध्र [ ' अस्तु श्रौपट इत्यादिरूप से ] प्रत्याश्रावण न करले, तबतक यह निष्प्रयोजन कुछ न बोले | [ अव्ययुकृत आश्रावण के अनन्तर ही अन्य निष्प्रयोजन बाक का संयम करता हुआ ] आग्नीध्र [ ' अस्तु श्रौषट् रूप से अध्वर्यु के प्रति ] प्रत्याश्रावण करता है । [ आग्नीधकृत ] इस श्रत्याश्रावणकर्म्म अध्वर्यु कृत श्रवणक का ही समाधान है ॥ [ ६ ] ॥ [ आग्नीध्रकृत प्रत्याश्रावण से मज्ञसम्पन से युक्त हुआ । वह अध्वर्यु जबतक [ होता के प्रति ] ' यज ' [ यजन करो ] इस निगद का प न करले, तबतक अन्य कुछ निष्प्रयोजन न बोलें । अपने ' यज ' इस प्रप से ही अध्वर्यु होता के लिए यज्ञसम्पन् समर्पित कर देता है [ फलस्वरूप यहाँ कर होता भी यज्ञ सम्पन युक्त होजाता है ] ॥ [ १० ] ॥ [ अध्वर्यु कृत ' यज ' निगढ़ के द्वारा यज्ञसम्पन से युक्त होता हुआ ] यह ' होता ' जबतक ' वोपट ' निगढ़ का उच्चारण न करले, तबतक अन्य कुछ अप्रस्तुत न बोले । [ होता के मुख से वौषट् सुनने के साथ ही ] वपटूकार के द्वारा आहवनीयाग्निलक्षणा योनि में उस [ नियत यज्ञिय ] हवि -व्यरूप रेत की आहुति दे देता है । अग्नि निश्चयेन यज्ञ की योनि है । इसी में [ रेतोभूत हविः प्रदान से ] यज्ञ [ दैवात्मलक्षण स्वर्गप्रापक यज्ञातिशय ] उत्पन्न होता है । हविर्यज्ञ के सम्बन्ध में चाकूसंयम की [ ऋत्विजानुगता ] यही [ उक्त ] व्यवस्था है । अब [ प्रसङ्गोषात्त ] सोमयाग में [ होने बाली वाक्संयमव्यवस्था के सम्बन्ध में भी कह देते हैं ] ॥ [ ११ ] ॥ ( सोमयाग में ) वह अध्वर्यु ( सोमरस से परिपूर्ण काम ) ग्रह ( सोमपात्र ) का ग्रहण कर जबतक उद्गातालोग स्तोत्रपात्रले क्षरण उपाकरणकम् न करलें, तबतक अप्रस्तुत कुछ न बोलें । ( ग्रहपात्र - श्रह्णानन्तर उद्गाताओं के प्रति अध्वर्यु ' उपावर्त्तध्वम् ' ( समीप लौट आइए ) इस बा-क्योच्चारणमात्र से गज्ञसम्पन उद्गाताओं के लिए समर्पित कर देता है । [ फलस्वरूप उद्गाता लोग यज्ञसम्पन से: युक्त होजाते हैं ) ॥ [ १२ ] ॥ १४१४
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पञ्चम श्रध्याय न गवाहागा प्रथमकाण्ड ( अध्वर्युकृत ' उपावर्त्तध्वम ' निगद से यज्ञसम्पन से युक्त होजानेवाले ) ये उद्गाता लोग जबतक ( अपनी स्त्रोत्रियाओं में से ) अन्तिम स्तोत्रिया का उद्गान न करलें, तबतक अप्रस्तुत कुछ न बोलें | ( स्त्रोत्रिया की समाप्त्यनन्तर उद्गातालोग अन्त में होता को लक्ष्य बनाकर - ' एषोत्तमा ' यह अन्तिम स्तोत्रिया है - इस निगद का उच्चारण करते हैं । श्रुति कहती है कि ) उद्गातालोग ) ' एषोत्तमा ' इस उच्चारण से ही होता के लिए यज्ञसम्पत समर्पित कर देते हैं - ( फलस्वरूप होता भी यज्ञसम्त से युक्त होजाता है ) ॥ ( १३ ) ॥ ( उद्गातृकर्तृक स्तोत्रियोद्गानकम्मे की अन्तिम सोत्रिया से सम्बन्ध रखने वाले ' एषोत्तमा ' इस निगद से यज्ञसंपत से युक्त होजाने वाला ) वह होता जबतक यह वौपट रूप से बपट्कार न वरले, तबतक अप्रस्तुत कुछ न बोलें । ( होतृकर्तृक वपट्कारानन्तर वपट्कार के साथ ही ) अध्वर्यु पटुकार के द्वारा आहवनीयाग्निलक्षण योनि में उस ( नियत ' ग्रह ' नामक सोमरूप ) रेत की आहुति दे देता है । न निश्चयेन यज्ञ की योनि है । इसी में ( रेतोभूता सोमाहुति से ) यज्ञ ( यज्ञातिशय, जिस के आकर्षण से यजमान मानुषात्मक ऐहलौकिक आयुर्भोगानन्तर त्रिणाचि-केतस्वर्ग में प्रतिष्ठित होगा ) उत्पन्न होता है । ( सोमयाग के सम्बन्ध में बाक्संयमकम्र्म्म की यही प्रासङ्गिकी मीमांसा है ) ॥ ( १४ ) ॥ ( आश्रावण, प्रत्याश्रावण -- निगद्कर्म्म में यदि ऋत्विक लोग अप्रस्तुतवाक् का उच्चारण करदें, तो क्या अनिष्ट हो?, इसी प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि ) यदि वह ऋत्वि अप्रस्तुतत्राकू का उच्चारण कर देगा, तो ( वह परम्परया ) जिस यज्ञसम्पन को प्राप्त करता है, ( अप्र-स्तुत वागुच्चारण से उस यज्ञसन्तान का विच्छेदक बनता हुआ वह होता ) उसी प्रकार यजमान को यज्ञसम्पन् से पृथक् कर देगा, जैसे कि ( स्वल्पपात्रों से बृहततपात्र को परिपूर्ण करने वाले व्यक्ति असावधानी से उस पूर्णपात्र को रिक्त कर देते हैं ( रख देते हैं ) । ( तात्पर्य - लौकिक कर्म्म जैसे अन्यवृत्ति से अपूर्ण रह जाता है, एवमेव अप्रस्तुत वागुच्चारण से यज्ञकर्म्म स्वसन्तानधारा खोता हुआ अपूर्ण रह जायगा, एवं यही अप्रस्तुत वागुच्चारण से महान् अनि होग । ) । ( ठीक इसके त्रिप-रीत ) जिस यजमान के यज्ञ के [ श्रावण - प्रत्याश्रावण - निगद में ] ऋत्विक लोग [ अप्रस्तुतवाक् का संयम करते हुए परस्पर एक दूसरे के प्रति यज्ञसम्पन् समर्पित करते हुए निगढ़कर्म का अनु गमन करते हैं, उस कर्म में सभी कुछ [ यज्ञसम्पत्तियाँ ] सम्पन्न होजातीं हैं, इस सावधानी से कोई भी ऋत्विक् अपने लक्ष्य से च्युत नहीं होता । इसलिए [ ऋत्विजों को चाहिए कि वे इसप्रकार [ विहित नियमानुसार ] ही [ यज्ञेतिकर्त्तव्यता पूरी करते हुए ] यज्ञ को पुष्ट | परिपूर्ण ] करें ॥ [ १५ ] ॥ L १४१५.
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पञ्चम अध्याय [ प्रस्तुत नगद कम्मे में पाँच बतलाती हुई श्रुति कहती है ] - [ इस स्र गब्राह्मण शतपथब्राह्मण व्याहृतियाँ होती है । इस पञ्चसंख्या की मौलिक उपपत्ति श्रावण - प्रत्याश्रावण - कम्मे में ] निश्चयेन ये [ निम्न लिखित ] पाँच व्याहृतियाँ होतीं हैं - ' श्र श्रावय ' - • तु श्रौषट् – ' यज ' – ' ये यजामहे ' -- ' चौषट् ' | [ प्राकृतिक सम्वत्सरयज्ञ, सम्बत्सरयज्ञाचारेण वितागमान प्राकृतिक पार्थिव यज्ञ, ये दोनों ] यज्ञ पञ्चावयव हैं, [ यज्ञ से उत्पन्न ] पशु [ भी ] पश्चात्रयत्र हैं, [ प्राकृतिक ] सम्वत्सर [ ज्ञ ] की [ भी ] पाँच [ हीं ] ऋतुएँ हैं । यही [ पञ्चावयत्रयता ही ] इस यज्ञ की एक सीमित प्राकृतिक ] सम्पन है | [ इसी प्राकृतिक सम्पत् -- संग्रह के लिए यहाँ पाँच व्याहृतियाँ विहित हैं ] || [ १६ ] ॥ उन पाँचों व्याहृतियों के अक्षर १७ होते हैं । इस सप्तदश संख्या की उपपत्ति बतलाती हुई श्रुति कहती है कि, उन पाँच व्याहृतियों के ( श्रो- श्रा - व - य - अस्तु श्रो- पट - य - ज - ये - य. जा - म - हे-बो - षट् इस क्रम से ) सत्रह अक्षर हैं । प्रजापति निश्चयेन सत्रह [ संख्या में समतुलित सप्तदशा-वयत्र ] है । प्रजापति [ ही ] यज्ञ है । यह [ भी ] इस यज्ञ की एक प्राकृतिक सीमा है, यह [ भी इस यज्ञ की ] सम्पत् है । [ इसप्रकार पचव्याहृतियों के सप्तदृश अक्षरों से सप्तदश -- लक्षणा प्राजापत्य-सम्पत् भी प्राप्त होजाती है ] ॥ [ १५ ] ॥ ( उक्त पाँच प्राकृतिक त्र्याहृतियों से प्राकृतिक साम्वत्सरिक-- प्राणदेवताओं के द्वारा वृष्टिकर्म्म भी सञ्चालित है । फलतः इस वैध मानुष यज्ञ में भी यदि यजमान वृद्धिकामना रखता है, तो उस की एक विशेष - पद्धति के अनुगमन से यह कामना भी पूरी होसकती है । उसी प्राकृतिक विशेष-पद्धति का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है ) - ( प्रारणलक्षण ) देवदेवताओं ने ' श्रावय ' इस व्याहृति शे ( वृष्टिप्रबर्त्तक ) ' पुरोवात ( पुरवाई हवा - मान्सून ) उत्पन्न की । ' अस्तु. श्रौषट् ' से ( आकाश ) बद्दलों से व्याप्त कर दिया । ' यज ' इस व्याहृति से बिजली उत्पन्न की । ' ये यजामहे ' इस व्याहृति से ' कड़क ' उत्पन्न की । एवं- ' बोष ' इस व्याहृति से पानी बरसा दिया । ( इसप्रकार पाँच व्याहृतियों के समन्वय से दृष्टिकर्म पूरा कर दिया, एवं करते रहते हैं ॥ [ १८ ] | यह यजमान यदि वृषि की कामना रखता हो, वही यजमान फलान्तरसाधनभृता सौरी श्रदि इषि से बजन करने वाला हो, उसे [ इष्टिप्रकृतिभृता इस ] दर्शपूर्णमासेष्टि से ही [ ऋत्विजों से ] यह कह देना चाहिए कि, मैं वृष्टि की इच्छा रखता हूँ । इस वृष्टिकर्म में उस यजमान को ' अध्वर्यु ' से तो यह कहना चाहिए कि तुम अपने मानस संकल्प से पुरोवात, और विद्य ुत्, का ध्यान करो । ' आग्नीध ' नामक ऋत्त्विक् से यह कहना चाहिए कि, तुम मन १४१६
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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण प्रथमकाण्ड चाहिए कि, तुम स्तनयित्नु, से बद्दलों का ध्यान करो । ' होता ' नामक ऋत्विकू से यह कहना से यह कहना चाहिए कि, आप और पानी का ध्यान करो | ' ब्रह्मा ' नामक [ वि ] ऋत्विकू के ] उस यज्ञ में पानी बरसता पुरोवातादि सब का मन से ध्यान कीजिए । अवश्य ही के [ समन्वय यजमान से पवाहृतिलक्षण - यज्ञ में ) है, जिस यज्ञ में ( उक्त ) ऋत्विक अपने ( उक्त संकल्पों ऐकमत्य होकर अनुष्ठान करते हैं । [ १६ ] ॥ प्रत्याश्रावण - कर्म्म से अपने प्राकृतिक पार्थिव यज्ञ में प्राणदेवता पचव्याहृत्यात्मक से दोहा करते इसी हैं । इसी एक ओर अपनी सम्पूर्ण यज्ञकामनाएँ विराडगोरूपा इसी पृथिवी कि ) ' ओश्रावय ' इस व्याहृति से देव-प्रासङ्गिक फल का विश्लेषण करती हुई श्रुति कहती है श्रौषट् ' इस व्याहृति से देतताओंने विराट् ( गौरूपधरा पृथिवी ) का आह्वान किया । ' अस्तु से वत्स को पृथक् किया । ' मुक्त किया । ' यज ' इस व्याहृति [ स्तनपानार्थ ] वत्स को पा बैठ गए । एवं- ' वौषट् ' इस ' ये यजामहे ' इस व्याहृति से [ दोहनार्थ ऊध - थन ] के समीप । यह पृथिवी ही निश्चयेन विराट् वषट्कारात्मिका व्याहृति से ही उस विराट् का दोहन कर लिया प्राकृतिक प्राणदेवता इस विराट्-है । इसी का यह [ उक्त लक्षण ] दोह है । [ जिसप्रकार पूरी किया करते हैं ] उसीप्रकार रूपधरा- गोरूपधरा - पृथिवी के दोहन से अपनी सम्पूर्ण कामनाएँ प्रदान कर देतीं हैं, जो विराट्गौ के यह विराङ्गौ इस यजमान के लिए वे सम्पूर्ण कामनाएँ उक्तलक्षण प्राकृतिक दोइ का रहस्य जानता है ॥ [ २० ] ॥ श्राश्रावण- प्रत्याश्रावण - निगद समाप्त —२— पाँचवें अध्याय में दूसरा, तथा चौथे प्रपाठक में तीसरा “ स्रु गूब्राह्मण ” समाप्त मूलानुवाद- समाप्त १४१७
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पञ्चम श्रध्याय सूत्रानुगतपद्धतिमंगूहः— ! स गब्राह्मण शतपथब्राह्मण १४५८ १, २ - स्रुगापादन, तथा श्रावणक वरणकर्म की समाप्ति के अनन्तर ' होता ' नामक ऋत्विक अध्वरयुं, और अग्नी के श्रंसदेश में स्पर्श करता है । इस होतृकर्तृक सम्मर्शन [ स्पर्श ] कम्र्मानन्तर अव और आग्नीध्र, दोनों यथास्थान बैठ जाते हैं जैसा कि - ' संमृष्टा उपविशतः ' ( का ० श्री ० सृ ० ३।२ / १५ ) इत्यादि सूत्र व्याख्यान में स्पष्ट कर दिया गया है । सूत्रानुगता इस पद्धति के अनन्तर क्रमप्राप्त ' स्रुगादापनक ' की इतिकर्त्तव्यना आरम्भ होती है । अन्यत्र जहाँ तूष्णीं बिना मन्त्रप्रयोग गादापकर्म होता है, वहाँ प्रकृत इष्टि में मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही त्रुगादापन विहित है । चरणकम्मं से वृत होता ' अग्निर्होता वेत्वग्नेर्होत्रम् ' इत्यादि मन्त्रलक्षण स्रुगादावननिगढ़ का पाठ करता है । इधर होता मन्त्रपाठ आरम्भ करता है, उधर अध्वर्यु जुहू - उपभृत् नामक स्रुक् का ग्रहण करता है । यही समन्त्रक ' स्रुगादानकर्म ' है । होतृकर्तृक निगदमन्त्र के -'अग्निर्होता वेचग्नेर्होत्रं वेत्तु पावित्रं साधु देवता - योऽग्नि होतारमवृथा घृतवतीमध्वर्यो स्रुचमा-स्व देवयुवं विश्ववारामीडामहै देवाँ ३ || ईडेन्यान्नमस्याम नमस्यान् यजाम यज्ञियान् ' इस स्वरूप के उच्चारण में भी थोड़ी विशेषता है । आरम्भ से ' यजमानदेवता ' पय्र्यन्त तो होता उपांशु - मन्दस्वरपूर्वक - उच्चारण करता है । ' योऽग्नि ० ' से आरम्भ कर ' यजाम यज्ञियान ' पर्य्यन्त उच्चस्त्रर से उच्चारण करना है । जिस समय होता के मुख से - ' घतातीमध्छार्यो! त्र चमास्यम्म ' उच्चरित होता है, उसी समय [ एतन्मन्त्रभागोचारणकाल में हीं ] अध्वर्यु स्रुक् का ग्रहण करता है । होतृक क नगद पाठकाल में अध्वर्यु के द्वारा सुकु - प्रहण ही ' स्रुगादापनकर्म्म ' है, यही निश्कर्ष है | भगवान् कात्यायन कहते हैं कि, त्रुगादापनकर्म्म प्रयाजकर्म के समीप ही विहित है । अतएव मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही सुगाढ़ापन कर्म्म करना चाहिए । होता के द्वारा प्रयुक्त निगढ़मन्त्र के-‘ घृतवतीम् ' भाग के उच्चरित होने पर अध्वर्यु जुहू -- उपभृत नामक स्रुचों का ग्रहण कर हविष्यों पूर्व, परिधियों से पश्चिममार्ग से बामपाद से वैदि के दक्षिण पार्श्व में जोकि - ' यजति ' | देश माना गया है, जाकर ईशानाभिमुख खड़ा होजाता है । यहाँ खड़ा होकर वह ---- ':' श्री श्रावय ' यह व्याहृति [ अग्नीध्र के प्रति 1 बोलता है । प्रत्युत्तर में श्राग्नीध-- श्रश्तु श्रौपट इस व्याहृति का प्रयोग करता है । अनन्तर पुनः अध्वर्यु - होता को लक्ष्य बना कर -- समिधो यज ' इस व्याहृति का उच्चारण करता है । प्रत्युत्तर में होता - ' ये यजामहे इस व्याहृति का उच्चारण करता है । सर्वा में अव जुहू को प्राङ्मुख बनाता हुआ ' आप ' इस वपकारात्मिका व्याहृति के
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पञ्चम अध्याय स्रगब्राह्मण प्रथमकाण्ड ' उच्चारण के साथ साथ जुहूस्थित आज्य में तृतीयांश की आहुति दे देता है । सुगादापन, तथा आश्रावण- प्रत्याश्रवण -- कम्म की इसी इतिकर्त्तव्यता का स्पष्टीकरण करते हुए सूत्रकार कहते है --( १ ) -- अग्निर्होतेति त्र गादावनं प्रयाजेषु सन्निधेः । ( का ० श्र ० सु ० ६।२।१३ । ) ( २ ) – घतवतीमित्युक्तं श्रचावादाय, अतिक्रम्य, आश्राव्य आह— समिधो यजे ' ति | ( का ० श्रौ ० मू ० ३।२।१७ | ) इति सूत्रानुगतपद्धतिमंगूहः वैज्ञानिकविवेचना-१ - गादापन कम्मोपपत्तिः --( भाप्य ) अध्वर्युकृत वाक से न होता स्वस्त्ययनजप- कम्मनन्तर- ' अग्निर्होता वग्ने त्रम'-इत्यादि ब्राह्मणपटिस ' गादापननिगढ़ ' का पाट करता है । वरणकर्म्म से वृत यह मनुष्यहोता अपने स्वा-भाविक श्रौःपत्तिक - सहजसिद्ध ग्रन्तभाव से प्रज्ञापराध का सहज पात्र है । असावधानी कर बैठना मनुष्यत्त्वेन इसका स्वभाव है । यज्ञकर्म जैसा प्राकृतिक कर्म है, जिसमें होजानेवाली थोड़ी भी सावधानी यजस्वरूप को त्रिकृत कर देती है, फलस्वरूप इष्टजनक भी यह यज्ञ अनिष्टजनक बन सकता है । इस ग्रनिष्टजनकता वर्त्तक मानुषदोष के निराकरण के लिए यह मनुष्यहोता अपने हौत्रकर्म का उत्तरदायित्त्व मन्त्रशक्ति के द्वारा प्राकृतिक प्राणात्मक दिव्याग्निलक्षण दिव्यहोता की समर्पित करता हुआ, उसे ही लक्ष्य बनाता हुआ कहता है कि-" मैं इस यज्ञ का होता नहीं हूँ । होता तो दिव्याग्नि हैं जो वास्तविक होता हैं, वे ही अपने इस क्षेत्रकम् की इतिकर्त्तव्यता का ध्यान रक्वें । मुझसे जो असावधानी होगी, वह उह्रीं की असावधानी मानी जायगी " । लौकिक कर्म हो, अथवा वैटिक ( शास्त्रीय ) कर्म, दोनों के लिए प्रेरणाबल हमें प्राकृतिक प्राण-देवताओं से ही मिलता है । होता है सबकुछ प्राणदेवताओं की प्रेरणा से ही, हम करते सब कुछ है – प्राकृतिक बल -- प्रेरणा से ही । परन्तु योगमाया के बन्धन से हन्ताभिमान हमें होता रहता है । हम यह मान नेटते हैं कि, हम हीं मत्रकुछ कर रहे हैं, जबकि तत्त्वतः-" तृणस्य कुछ जो करणेऽप्यशक्ताः " सिद्धान्तानुमार उन प्राकृतिक शक्तियों के आगे हमारी स्वतन्त्र -सत्ता का कुछ भी तो मूल्य नहीं है । “ केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथानियुक्तोऽस्मि तथा करोमि के अनुसार हृदयावच्छिन्न दिव्यप्राणशक्तिचन अन्तर्य्यामी की प्रेरणा से ही हमारा सम्पूर्ण कर्मकलाप सञ्चालित है । जो व्यक्ति अपने कम्मों में हृदयम्थ देवप्राणमूर्त्ति इस ग्रन्तर्थ्यामी को साक्षी बनाए रहता है, निश्चयेन इस अ । भ्यात्मिक भावनामात्र से उसका कर्म्म मानुषभाव से पृथक् रहता हुआ सफल होजाता है यही भारतीय भक्तिकाण्ड का मुप्रसिद्ध ' आत्मसमर्पण ' लक्षण ' भक्तियोग ' है, जिसके अनुगामी भक्त सदा निर्द्धन्द्ध ही बने रहते हैं । १४१६
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पचम यान स्र गब्राह्मण ७१ शतपथब्राह्मण ठीक इसके विपरीत चान्तर्य्यामी की, दूसरे शब्दों में दिव्यप्राणशक्तियों की उपेक्षा कर जो मनुष्य अपने बल का अभिमान करते हुए कम्मों में प्रवृत्त होते हैं, अवश्यमेव उनसे प्रज्ञापराध होपड़ता है । फलस्वरूप उनका कर्म्म पूर्ण रहता हुआ अनिष्टजनक ही बन जाता है । सम्भव है, लौकिक कम्मों में मनुष्य अपनी शक्ति के भरोसे पर भी यथाकथञ्चित् सफलता प्राप्त करले । परन्तु उन वैदिक - कम्मों को सफलता तो-जिनका विधान एकमात्र प्राकृतिक फलों को लक्ष्य लेकर ही हुआ है उन प्राकृतिक त्राणदेवताओं के प्रति श्रात्मसमर्पण से ही सम्भव है । लौकिक कम्मों में जहाँ बाह्य इन्द्रियवर्ग काम देदेता है, वहाँ अलौकिक वैदिक परीक्ष कम्मों में हमारी बाह्यदृष्टि अवरुद्ध है । अतएव इनके सम्बन्ध में हमारा शक्त्यभिमान सर्वथा निरर्थक ही सिद्ध होजाता है । अतएव श्रावश्यक है, कि हम अपने यज्ञात्मक वैदिक कम्मों का भार प्राकृतिक प्राणदेवताओं पर ही डाल दें । अवश्य ही इस आत्मसमर्पण से हमारा दिव्य कर्म्म बिना किसी विघ्न - बाधा के साङ्गोपाङ्ग सम्पन्न होजायगा । एकमात्र इस भावना को व्यक्त करने के लिए ही, भावना के द्वारा स्वाभिमान - निराकरण-पूर्व देवानुग्रह की प्राप्ति के लिये ही होता कहता है कि - ' होता अग्नि हीं अपने हक को जानें ' । इसी भावना का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है- ' अग्निरिदं होता वेत्तु ' इत्येवैतदाह ' । मन्त्र का अगला भाग है— ' बेत्त प्राचित्रम् ' । अनुष्ठेय होत्रकर्म्म की सफलता से द्दी यज्ञस्वरूपसिद्धि सम्भव है । अतः प्रथम अनुष्ठेयकर्म की सफलता अभीष्ट है । उसीके लिए ' अग्निर्होता वेचग्नेर्होत्रम् ' यह कहा गया है । अनुष्ठेय हौत्रकर्मानन्तर दूसरा लक्ष्य यज्ञ है । इसके लिए भी उसी प्राणाग्निदेव को साक्षी बनाना आवश्यक है । अवश्य ही यज्ञ जैसे पवित्र कर्म का उत्तरदायित्त्व भी अग्नि अवश्य ही ग्रहण कर लेंगे । निन्द्य - पातकजनक - सत्कर्म जहाँ दिव्यप्राण - मर्थ्यादा से बहिष्कत हैं, वहां पुण्यातिशयजनक श्रेष्ठ-सनकर्म्म [ यज्ञ - तपो - दानादि शास्त्रीय कर्म्म. एवं इष्ट- श्रापूर्त्त - दत्तादि लौकिक कर्म्म ] दिव्यप्राण मर्यादा के अन्तर्भूत माने गये हैं । पवित्रतम प्राणदेवता सजातीय पवित्रतम कम्मों के ही साक्षी बना करते हैं । आसुर अपवित्र कम्र्मों के लिए जहाँ अतुर मलिन प्राणों से प्रेरणावल मिलता है, वहाँ दिव्य - पवित्र कम्मों के लिए दिव्य - पवित्र - प्राणों से प्रेरणा उपलब्ध होती है । उस यज्ञ से अन्य और कौन - सा कर्म्म अतिशयरूपेण दिव्य, एवं पवित्र कर्म्म होगा, जिसके आधार पर प्रजापति का पवित्रतम सृष्टिकर्म्म प्रतिष्ठित है, प्रजापति की प्रजा का जीवन सुरक्षित है । इष्टकामधुक् यज्ञ अपने प्रधान दो अवयवों से अन्य पवित्र कम्मों की तुलना में विशेषरूप से पवित्र बना हुआ है । ' अग्नि और सोम, दोनों तत्त्वों के रासायनिक सम्मिश्रण से उत्पन्न उभयात्मक अपूर्णभाव ही ' यज्ञ ' हैं । अग्नि की पवित्रता लोक में भी प्रत्यक्ष है । दूषित मलिन - अशुचि - भावों को नष्ट कर देना अग्नि का मुख्य काम है । इसी आधार पर तो पात्रादि की अशुचि अग्निताप से लोक में दूर की जाती है । जत्रतक शरीर में अग्निदेवता ' परमया जून्या बल्बलीति ' ( प्रज्वलित रहते हैं ), तभीतक अध्यात्मसंस्था ( श्रात्मयुक्त शरीर ) पवित्र रहता है । अग्निदेव के उत्क्रान्त होते ही आसुर जलीय वारुणप्राण का प्रभुत्त्व होजाता है, ' फलस्वरूप शवशरीर सर्दथा अशुचि - पूतिगन्ध से ही युक्त होजाता है । अग्नि का यह पावकधर्म्म दासोमाहुति पर ही निर्भर है । जबतक दाह्यसोम दाहक अग्नि में बहुत होता रहता है, तभीतक अन्नाद्ाग्नि प्रज्वलित रहता है । अतएव पवित्र का मूलप्रवर्त्तक पारमेष्ठ्य ' अम्भः ' नामक सोमतत्त्व ही माना गया है, जिसका कि " पवित्र ' ते विततं ब्रह्मणस्पतेः ' इत्यादि ऋङ मन्त्र से विश्लेषण हुआ है । १४२०
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श्चम अध्याय स्रुग्ब्राह्मण प्रथमकाण्ड पवित्र अग्नि एवं अग्निस्वरूप रक्षक पचित्र ब्रह्मणस्पति- अम्भ नामक पारमेष्ठ्य सोम, इन दोनों पवित्र तत्त्वों के समन्वितरूप का ही नाम पूर्वकथनानुसार यज्ञ है । जिसका स्वरूप विश्व के सर्वश्रेष्ठ दो पवित्र तत्त्वों के सम्मिश्रण से निष्पन्न हुआ हो, उसे ( यज्ञ को ) हम अन्य पवित्र तत्त्वों की अपेक्षा अवश्य ही अतिशय रूप से पवित्र कह सकते हैं । इसीलिये तो श्रेष्ठकम्मों की परिगणना में इसे ' यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म्म ' इत्यादि रूपसे श्रेष्ठतम बतलाया जाता है । यज्ञ की यही अग्नि- सोममयी - उभयधम्र्मात्मिका अतिशय-पवित्रता सूचित करने के लिए श्रुति ने इसे ' जामित्र ' [ प्रकर्षेण अगति ] कहा है । प्रावित्र शब्द से यद्यपि प्रकृत में रक्षाकर्म ही अभिप्रेत है । तथापि रक्षात्मक यह यज्ञकर्म क्योंकि पवित्रतम है, अतएव प्रसङ्गोपात्त परम्परया ' प्राचित्र ' से यज्ञ के पवित्रतम धर्म का भी विश्लेषण कर दिया गया है । अग्नीषोमात्मक यज्ञ की अग्निसमात्मिका पवित्रता ही रक्षाकर्म का प्रधान निमित्त बनती है । एक-मात्र इसी आधार पर ' प्रावित्र ' से ' पवित्रतम ' रूप फलितार्थ भी निकाला जा सकता है । प्रकृष्ट रक्षात्मक धर्म तो यज्ञ का स्पष्ट ही है । ग्राध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, तीनों ही संस्थाओं की रक्षा ग्रग्नी-श्रोमात्मक यज्ञ पर ही निर्भर है । अन्नादानात्मक यज्ञ आध्यात्मिक संस्था का रक्षक है, आदानविसर्ग-क्रियात्मक यज्ञ आधिभौतिक संस्था का रक्षक है, एवं पारमेय सोमाहुत्यात्मक यज्ञ आधिदैविक सौरसंस्था का स्वरूपरक्षक हैं । सर्वरक्षता ही यज्ञ का ग्रन्यरक्षकापेक्षया प्रकृष्ट रक्षाधर्म है - अतएव यह ' प्रावित्र ' है । प्रावित्रयज्ञ का यथानुरूप स्वरूप ज्ञान ही हीत्रकर्म की सफलता का मूल है । अतएव श्रनुष्ठेय अग्निकर्मात्मक हौत्रकर्म्म के परिज्ञान के साथ - साथ - ' वेत्त प्रावित्रम् ' से यज्ञकर्म की ओर भी दिव्याग्नि का ध्यान आकर्षित किया गया है । यज्ञकर्मानुगता इसी भावना का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है -- ' यज्ञो वै प्रात्रिम् वित्ते यज्ञमित्यैतदाह " । उभय - वाक्य निष्कर्ष यही है कि " मेरा ( मानुष होता का ) होत्रकर्म्म, तथा तनद्वारा सम्पन्न होने वाला यज्ञकर्म, दोनों के प्राणाग्निदेव साक्षी बने रहें । उह्नीं से इन दोनों की सफलता के लिए प्रेरणा बल मिलता रहे । " मन्त्र का अगला भाग है - ' साधु ते यजमान देवता ' ( योऽग्नि होतारमवृथाः ) । देवबलानुग्रह-प्राप्यनन्तर होता को यह दृढ़ आत्मविश्वास होजाता है कि, अब निश्चयेन यजमान का यज्ञकर्म निर्विघ्न सुसम्पन्न होजायगा | अपने इसी श्रात्मभाव को वह यजमान के प्रति इन शब्दों में प्रकट कर रहा है कि हे यजमान! तुमने किसी सामान्य व्यक्ति का हौत्रकर्म के लिए वरण नहीं किया है । अपितु मेरे व्याज से तुमने उस दिव्यत्राणाग्नि का ही हौत्रकर्म के लिए वरण किया है, जिसके अनुग्रह प्राप्त होजाने पर ग्रवश्यमेव यज्ञकर्म्म सफल होजाया करता है । तुमने जिस अग्निदेवता का आश्रय लिया है, तुह्मारे वे अग्निदेवता इस हौत्रकर्म के लिए साधु हैं, पूर्ण समर्थ हैं । यह तुह्मारा सौभाग्य है कि, अग्नि जैसे श्रेष्ठ देवता का तुझें सहयोग मिल रहा है | स्वाभाविकी यज्ञपद्धति के साथ - साथ ही इस विश्लेषणा से श्रुति संकेतरूपेण हमें यह ' लोकशिक्षा ' भी दे रही है कि, हमें अपने लौकिक - कम्मों में उह्नीं सहयोगियों का सहयोग लेना चाहिये, जो स्वयं भी उस कर्म में रुचि रखते हों, साथ ही उनमें उसे सफल बनाने की योग्यता भी हो । वैसे योग्य-प्रामाणिक - समर्थ - सहयोगियों के लिए लोक में भी यही सूक्ति व्यवहृत हुइ है कि अब उनका का अवश्य सफल होजायग, क्योंकि अमुक योग्य प्रामाणिक व्यक्ति ने उसका भार उठा लिया है ' । १४२१
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पञ्चम अध्याय स्व गत्राह्मण शतपथब्राह्मण प्रकृत में होता - ' साधु ते ० ' इत्यादि मन्त्र के द्वारा यजमान की कर्म्मनिष्ठा को ही प्रेरणाचल प्रदान कर रहा है । यजनान का आत्मविश्वास भी तो यज्ञ की सफलता के अन्यान्य कारणों में से एक अन्यतम कारण है । इसी भावना का स्पष्टीकरण करती हुई श्रुति कहती है- ' साधु ते यजमान देवता, यस्य तेऽ--ग्निर्होता ' इत्येतदाह " । मन्त्र का अगला माग है - ‘ घृतवतीमध्वर्यो स्रुचमास्यस्व ' यह वाक्य अध्वर्यु ' को लक्ष्य बना कर कहा जाता है । अग्नि के अनुग्रह - प्राप्ति का अर्थ है- अग्निदेवता का यज्ञसीमा में प्रविष्ट होजाना । हौत्र-कर्म को आप लक्ष्य बनावें, यज्ञ को लक्ष्य बनावें, यजमान! अब तुझारा यह काय सफल हुआ समझा, जहाँ अग्नि जैसे होता ने अनुग्रह कर दिया " इस भावना को व्यक्त करने वाले निगदमन्त्रभाग से अवश्यमेव प्राणाग्नि यज्ञमण्डल में प्रविष्ट होजाते हैं । आागत अग्निदेव की परिचय उसी व्यवहारमर्यादा की भाँति आवश्यक है, जैसे कि आगत सम्मान्य अतिथि का अर्घ्यदानादि से सम्मान किया करते हैं । अग्निदेव की परितृप्ति से सम्बन्ध रखने वाली याज्याहुति है । यह ग्राहुतिकर्म्म अध्वर्यु से सम्बन्ध रखता है । अतएव अनुग्रह -- प्राप्त्यनन्तर होता का यह भी आवश्यक कर्तव्य होजाता है कि, वह आगत सम्मान्य अतिथि के स्वागत से सम्बन्ध रखने वाले आाज्याहुतिकर्म्म की ओर ग्राहुतिप्रदाता अवयु का ध्यान याकर्षित कर दे । एकमात्र इसी अभिप्राय से ‘ अध्वर्यो! श्राप घृतवती सक् का ग्रहण करें ( क्योंकि आहुतिग्राहक अग्निदेव पधार आए हैं ) यह प्रेरणात्मकं मन्त्र भाग प्रयुक्त हुआ है, जिसका तात्पर्य - ' तदध्ययु प्रसौति ' इस ब्राह्मणवचन से स्पष्ट हुआ है । पद्धतिप्रकरण में यह कहा जाचुका है कि, होता के मुख से ' घृतवतीम ' व्याहृति के उच्चरित होते ही वजह, उपभृत् नामक दोनों चों को आहुति के लिए हाथ में ले लेता है । ग्रहण होता है जुहू, उपभृत्, दोनों का । परन्तु होता के द्वारा ग्रहण की प्रेरणा होती है --- केवल एक ( जुह ) स्रुक्की ही । ऐसा क्यों? | जब पद्धति में दोनों का ग्रहण विहित है, तो मन्त्रभाग में भी ' घृतवत्यौ चौ ' इत्यादि रूप से द्विवचन का ही प्रयोग होना चाहिए था । इसी विप्रतिपत्ति का निराकरण करती हुई श्रुति कहती है कि-( १ ) -- निदानविद्या के अनुसार जुहू नामक खुक् यजमानस्थानीया है, एवं उपभृत् नामक स्रुक् यजमान के शत्रु की प्रतिकृति है । इसके अतिरिक्त जुहू अत्ता की प्रतिकृति है, तो उपभृत् आद्य ( भोग्य ) की । ऐसी स्थिति में यदि होता ' जुहूपभृतावास्यस्त्र ' इत्यादि रूप से द्विवचन का प्रयोग करेगा, तो यजमान का शत्रु यजमान के लिए प्रतिस्पर्द्धा करनेवाला बन जायगा । इसके अतिरिक्त भोग्य सम्पत्ति भी भोक्ता यजमान के लिए प्रतिकूल बन जायगी । भावनात्मिका यज्ञप्रक्रियाओं का फलाफल एकमात्र भावना पर ही अवलम्बित है । एवं इन भावनाओ के मूलाधार उसी प्रकार आधिभौतिक यज्ञिय द्रव्य हैं, जैसे कि उपासनाकाण्ड में उपास्य की प्राप्ति के लिए उपास्य के यत् किंचित् समधम्मों से समतुलित आधिभौतिक पदार्थों में आहार्य्यारोपविधा से उपाम्य की कल्पना कर ली जाती है । इसी आहारोपविधा के आधार पर उपभृत् को शत्रुभावना से, एवं भोग्यभावना से युक्त समझा जाना है । जुहू को यजमान की भावना से, तथा भोक्ता की भावना से युक्त मान लिया जाता है । उपभृत् को जुहू की तुलना में रखना शत्रु को समान बलशाली ही बनाना है, भोग्य को प्रतिकूल ही नाना है । यह भावना यजमान के लिए अनिष्टकर ही बनती है । अतः एकवचन का ही प्रयोग किया जाता ९ ४२२