Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1151–1160
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1151–1160
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पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण प्रथमकाण्ड है । ग्रहण होता है दोनों का, प्रेरणा मिलती है एक के ग्रहण की । यही ' असत्ये वर्त्मनि स्थित्त्वा ततः सत्यं समीहते ' * लक्षणा श्राहार्थ्यारोपमूला प्रत्ययालम्बनता है, जिसका गीता विज्ञान भाष्यान्तर्गत तृतीय खण्ड के ' ख ' विभागात्मक ' उपासनोत्तरखएड ' के ' उपासनाभेदनिर्वचन ' नामक प्रकरण में विस्तार त्रिश्लेषण हुआ है । इसी भावना को व्यक्त करती हुई श्रुति कहती है- ' तस्मादेकामिवैन्वाह ' ॥ २ ॥ से
मन्त्र का अगला भाग है – ' देवयुवां विश्ववाराम् ' । श्रध्यात्मस्थित प्राणदेवताओं भौतिक तत्सम पदार्थों के माध्यम से आधिदैविक प्राणदेवताओं के साथ चितिलक्षण का अन्तर्याम- आधि-सम्बन्ध कर देना हीं यज्ञ का फलितार्थ है ' । होतृकर्तृ के निगदपाठ से प्राणाग्नि का समावेश तो होगया है । परन्तु अभीतक इनका यजमान के प्राध्यात्मिक प्राणदेवताओं यज्ञमण्डल में सम्बन्ध नहीं हुआ है । यह काम मध्यस्था आधिभौतिकी ज्याहुति पूरा करती के साथ ग्रन्थि - बन्धन-आधिभौतिक पदार्थ है, एवं आहुति के लिए जुहू में प्रतिष्ठित प्राज्यमात्रा भी है आधिभौतिक । जुहू नामक कुत्री भी दोनों पर यजमान की भूतात्मसत्ता श्राक्रान्त है, जिस वित्तानुगता श्रात्मसत्ता के लिए ही ' ही है । इन यह सिद्धान्त स्थापित हुआ है । निष्कर्षतः श्राज्यपूर्णा जुहू में यजमान के प्राणदेवता प्रतिष्ठित यावद्वित्तं हैं तावदात्मा । उधर ' ग्राह्यनीय -- कुडम्थ समिद्ध अग्नि में द्युलोक से आगत आधिदैविक प्राणाग्नि प्रतिष्ठित हैं हुति होती है । परिणाम यह होता है कि, आज्यानुगत यजमान के प्राणदेवताओं का । इनमें श्राज्या-नीयस्थ प्राणाग्नि के साथ ग्रन्थिबन्धन होजाता है । इसप्रकार श्राज्य पूर्ण जुहू यजमान श्राज्याहुति के द्वारा श्राहव-का प्राकृतिक प्राणदेवताओं के साथ योग कराने वाली बन रही है । यही ' देवयुग ' रूप के पहिला आध्यात्मिक प्राणों यन्ययावत् ( ३३ ) प्राणदेवताओं के द्वारा । यह जुहू ( श्राज्य के सम्बन्ध से ) वरणीया है । सभी धर्म है । इसकी इच्छा रखते हैं | देवप्रिया, देवयुवा, जुहू वास्तव में यज्ञकर्त्ताओं के लिए स्तुत्या है, प्रशंसनीया प्राणदेव मन्त्रभाग के द्वारा जुहू के उक्त दोनों धम्मों का ही विश्लेषण हुआ है, साथ ही उस की है । हुई है । सर्वत्र चैतन्य का साक्षात्कार करने वाली ऋषिदृष्टि के लिए जुहू की स्तुति प्रशंसा स्तुति, एवं प्रशंसा विज्ञान सम्मत है । अवश्यमेव तत्त्व--मन्त्र का अगला भाग है-- " ईडाम है देवाँ ३॥ ईडेन्यान्, नमस्याम नमस्यान् यान् ” । ज्योतिर्म्मय तत्त्व ही ' देवता ' है । यह ज्योतिर्भाग पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, यजाम यज्ञि -तीन स्थानों में विभक्त होता हुआ विभिन्न तीन नाम रूप - गुण - कम्मों में इन तीन लोकों के भेद से द्य लोकस्थ सौरप्राणमूर्ति देवतत्त्व ही है । सौरज्योतिर्भाग ( प्रकाश ) परिणत सर्वप्रथम होरहा है । तीनों में मूलतत्त्व सौम्य चान्द्रपिण्ड मे मुक्त होता है । चान्द्रमसी ज्योति वस्तुगन्या प्रवृक्त सौरी ज्योति अन्तरिक्ष-- लोकोपलक्षित पृथिवीलोक है । यहाँ आकर भूतभाग के प्रात्यन्तिक आवरण से सौरज्योति का ही है । तृतीय स्थान ज्योति का परज्योतिर्माग, दोनों अभिभूत होजाते हैं । अतएव पार्थिव ज्योति केबल स्वज्योतिर्भाग, तथा चान्द्र-रूपज्योति में [ पार्थिवी ज्योति में ] उस पार्थिव प्राणाग्नि का समावेश है, जोकि ' रूपज्योति - ' ' कहलाई है । वैश्वानर ' नाम से
* उपायाः शिक्षमाणानां बालानामुपलालनाः ।
सत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥
१४२३ — भर्तृहरिः
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पञ्चम अध्याय स्नु गब्राह्मण शतपथब्राह्मण प्रसिद्ध है, जिसे कि यजुः -- संहिताने ' विराट्पुरुष ' कहा है । एवं जिस से कि ' पुरुष - अश्त्र - गौ- श्रवि-श्रज - इन पाँच यज्ञिय पशुओं का स्वरूप निर्माण हुआ है, जो कि पुरुष ( मनुष्य ) पशु में अपनी पूर्ण मात्रा से बिकसित है | यही वैश्वानराग्नि भूताभिभव से अप्रत्यक्ष है, मृग्यमाण है । अतएव ' कृष्णोऽस्याखरछः ' इत्यादि रूप से इस पार्थिव अग्नि को कृष्णमृग ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । I उक्त कृष्णमृगाग्नि की सहयोगिनी रूपज्योति, दूसरे शब्दों में पार्थिवप्राणाग्नियुक्त दिव्य वृक्त ज्योतिर्भाग ही पार्थिवदेवता हैं । आान्तरिक्ष्य चान्द्र तोमावच्छिन्न विशुद्ध ज्योतिर्म्मय भाग अान्तरिक्ष्य देवता है । एवं सौर-मण्डलस्थ ( सम्वत्सरमण्डलस्थ ) सावित्राग्नियुक्त ज्योतिर्भाग दिव्य देवता हैं । दिव्यदेवताओं से यज्ञ तपो दान - लक्षण विद्यासमुच्चित् प्रवृत्तिकर्म का स्वरूप सम्पन्न होता है । श्रान्तरिक्ष्य चान्द्र देवताओं से इष्ट- श्रापूर्त्त - दत्त - लक्षण विद्यानिरपेक्ष सत्कर्म का स्वरूप निष्पन्न होता है । एवं पार्थिव देवताओं से लौकिक - ब्यबहारिक - यथाजात कम्र्मों की प्रवृत्ति होती है । पार्थिव ज्योतिर्भाग मानत्रसर्ग की, आन्तरिक्ष्य चान्द्रज्योतिर्भाग पितृसर्ग की, एवं दिव्य ज्योतिर्भाग देवसर्ग की मूलप्रतिष्ठा है । मनुष्य, पितर, देव, तीन प्रजा हैं, रूप - पर - स्व - तीन ज्योतियाँ हैं, एवं पृथिवी अन्तरिक्ष्य - यो - तीन लोक हैं । इसप्रकार एक ही दिव्यज्योति त्रिः प्रजासर्ग, त्रिज्योतिः सर्ग, त्रिलोकसगंरूप में परिणत हो रही है । लोकाच्छिन्न देवता यज्ञिय हैं, अन्तरिक्षलोकावच्छिन्न पितर नमस्य हैं, एवं पार्थिव लोकावच्छिन्न ' मनुष्य ईडेन्स हैं । द्युलोकस्थ देवता न तो केवल स्तुति प्रशंसा से ही अनुग्रह करते, न केवल नमस्कार से ही उन्हें ( साम्प्रदायिक भक्तिमार्ग की भाँति ) तुष्ट किया जासकता । अपितु तत्त्वाधार पर प्रतिष्ठित वैध - यज्ञ-बक्रिया से आहुति के द्वारा ही उन्हें प्रसन्न किया जासकता है । दिव्यप्राणदेवताओं का आध्यात्मिक प्राणदेव-ताओं से सम्बन्ध होजाने से दिव्यप्राणशक्तियों की प्राप्ति होजाती है । यही उनका अनुग्रह है । यह अनुग्रह केवल स्तुति - नमस्कार से नहीं मिल सकता । पितु इसके लिए तो यज्ञकर्म का ही अनुगमन करना अनिवार्य होगा । अतएव इन दिव्य देवताओं को हम ' यज्ञिय ' कह सकते हैं । वाङ्मय आन्तरिक्ष्य पितर- ' पितरो वाक्यमिच्छन्ति ' के अनुसार केवल नमस्कार से भी तुष्ट किए जासकते हैं । अतएव इहें ' नमस्य ' कहा जासकता है । वाग्विकृतिरूप भृतमय मनुष्य केवल नमम्बार से ही प्रसन्न नही होते । अपितु दृह्रौं प्रसन्न करने का अन्यतम साधन है - ' स्तुति ' । तनप्रशंसा से, यशःख्यापन से, लोकैषरणा के कीर्त्तन से धीर से धीर मनुष्य के अन्तर्जगत को भी स्खलित किया जासकता है । अतएव इहें ' ईडन्य ' कहा जामकता है । प्रकृत यज्ञकर्म में हमें यजनीय यज्ञिय देवताओं के अतिरिक्त पितरों की भी सहानुभूति अपेक्षित है, उन ऋत्विक दर्शक मनुष्यों का सहयोग भी अपेक्षित है, जिनके अन्तः बाह्य-सहयोग से यज्ञियदेवताओं का यजनक साङ्गोपाङ्ग पूर्ण होगा । इसी त्रिविध प्राकृतिक प्रजासर्ग के अनुग्रह--प्राप्त करने के लिये -- ' ईडाम है ईडेन्यान् ' इत्यादि मन्त्रप्रयोग विहित है । II: I
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पञ्चमन्यध्याय गवाहाण पृथिवी अग्निः रूपज्योतिः मनुष्याः ईडेन्याः २ अन्तरिक्ष सोमः परज्योतिः पितरः नमस्याः द्यौः इन्द्रःस्वज्योतिः देवाः प्रथमकाण्ड तान्-- ईडाम है तान् -- नमस्यामः तान् - यजामः दूसरो दृष्टि से देवत्रत्री का समन्वय कीजिए! उपासनाकाण्ड से सम्बन्ध रखने वाले आधिदैविक सगुगा इष्टदेवता [ अग्नि, विष्णु, इन्द्र आदि प्रतिष्ठावा देवता ], एवं माता, पिता, आचार्य, ये तीन आधिभौतिक मगुण पूज्य मनुष्य देवता, ईडेन्यवर्ग से सम्बन्ध रखते हैं । उपास्य देवता स्तुतिभावात्मक श्रात्मसमर्पण से तुष्ट होजाते हैं, इसी लक्ष्य से इहें ' ईडेन्य ' कहा जासकता है । माता - पिता - आचार्य्यं, इन तीन से भिन्न ज्येष्ठ भ्राता, समाज के शिष्ट पुरुष, सम्मान्य विद्वान् इत्यादि पूज्य वर्ग नमस्कारमात्र से तुष्ट किए जासकते हैं । अतएव इहें ' नमस्य ' कहा जासकता है । आधिदैविक त्रिवर्त्त में स्वेष्टदेवता से भिन्न देववर्ग नमस्य माना नासक्ता है | तीसरा विभाग यज्ञिय देवताओं का है, जो कि अधिभूत -- अधिदैवत, उभयत्र समान हैं । ऋतु, छन्द आदि वयोनाधात्मक देवपशु [ देववाहन ] लक्षण देवताओं का भी यज्ञिय - विभाग में ही अन्तर्भाव है । तीनों श्रेणियों का ही प्रकृत में येन - केन रूपेण अनुग्रह अपेक्षित है । अतः तीनों का संस्मरण आवश्यक मान लिया गया है || यजनीय देवताओं से सम्बन्ध रखने वाला यज्ञ एक वैसा महत्त्वपूर्ण साधन है, जिसके अनुगमन से त्रैलोक्य की चर - अचर सम्पत्ति प्राप्त की जासकती है । त्रैलोक्य में जो कुछ यज्ञिय पदार्थ हैं, उन सब का यज्ञकर्त्ता के साथ भोग्यत्त्वेन सम्बन्ध होजाता है । जो पदार्थ, किंवा जो प्राणी यज्ञ के दिव्यभाग में भाग नहीं लेते, अथवा तो प्रकृत्या जिनके स्वरूप - निर्माण में दिव्ययज्ञमात्रा का सहयोग नहीं होता, वे पदार्थ, और वे प्राणी अपने स्वरूप से भी मुकुलित. [ बुद्धिशून्य ] रह जाते हैं, साथ ही यज्ञ में अन्वाभक्त प्रजा के व्यवहारों में भी उनका विशेष उपयोग नहीं होता । मनुष्य यदि यज्ञिय है, तो किंपुरुष यज्ञिय है । एवमेव श्रश्व, गौ, अत्रि, अज, चारों यज्ञियप्रजा के अनुकूल क्रमश: गौर, गत्रय, उष्ट्र, शरभ, ये चार यज्ञिय-प्रजा है । एवमेव बङ्गा, बगधा, चेरपाड़ा, यह प्रजात्रयी भी ' प्रजा छ तिस्रो प्रत्यायमियुः ' के अनुसार पराभूता है, यज्ञो ऽनन्वाभक्ता है । माषादि श्रोषधियाँ यज्ञिय हैं । इन यज्ञिय, अतएव पराभूत पदार्थों के अतिरिक्त जितने भी स्थिर -- चर यज्ञिय पदार्थ हैं, उक्त सर्गत्रयी से उन सब का ग्रहण होजाता है । इसप्रकार ईडेन्य मानवसर्ग से अश्वादि यज्ञिय पशुओं का, यज्ञिय देवसर्ग से कपिञ्जलादि पक्षियों का, बीहि, यवादि श्रोषधियों का, पलाश, कार्य्यादि वनस्पतियों का, ओर ओर भी जितनें यज्ञिय पदार्थ बच रहते हैं, उन सब का ग्रहण होजाता है । इसप्रकार - ' जायमानो वै जायते सर्वाभ्यो एताभ्यो एव देवताभ्यः ' निगमानुसार यच्च-यावत् यज्ञिय पदार्थों का यज्ञ से ग्रहण होजाता है । फलतः यज्ञ का इष्टकामधुक्त्व सर्वात्मना चरितार्थ होजाता १४२५.
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पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण शतपथब्राह्मण है । यही यज्ञ का वह महतो महीयान् श्रेष्ठतम कर्म्मत्त्व है, जिसे लक्ष्य बनाते हुए याज्ञिक लोग इस में प्रवृत्त हुआ करते हैं । जिह्नोंनें यज्ञ का अनुगमन किया, उहें सब कुछ मिल भी गया, साथ ही उन का पराभव भी नहीं हुआ । जिह्नोंनें यज्ञ का तिरस्कार किया, उनकी सत्ता ही उच्छिन्न होगई ॥ ४ ॥
यज्ञपद्धति में विद्दित प्रत्येक आधिभौतिक कर्म से यजमान के मानुषात्मा में कोई न कोई यज्ञातिशय उत्पन्न किया जाता है । यज्ञकर्म्मसमष्टि से वह यज्ञातिशय सर्वाङ्गीण बनता हुआ यजमान के मानुषात्मा के साथ अन्तर्याम - सम्बन्ध करता हुआ उसे आधिदैविक फलानुगामी बनाता है । यही यज्ञातिशय ' दैवात्मा ' कहलाया है, जिस का स्वरूप-- विश्लेषण पूर्वब्राह्मणों में अनेकधा होचुका है । तत्तत् कर्म्मविशेषो से इस यज्ञातिशय-लक्षण दैवात्मा में तत्तत् -- शरीर हस्तपादादि श्रवयव ही स्थापित किए जाते हैं । प्रश्न होता है कि, नवव्याहृत्या-त्मक इस स्रुगादापनकर्म्म से [ जिन नौ व्याहृतियों का मूलानुवाद में भी उल्लेख किया जाचुका है ] दैवात्मा में कौन से शरीरावयव स्थापित किए जाते हैं? । वों कण्डिका इसी प्रश्न का समाधान कर रही है । हमारा अध्यात्मसंस्था के पाञ्चभौतिक शरीरभाग में ऊर्ध्व, अवान, भेद से सौर- पार्थिव, दो जाति के प्राण प्रतिष्ठित हैं । सौर प्राण का केन्द्र ब्रह्मरन्ध्र है, एव पार्थिव अपान प्राण का केन्द्र ब्रह्मग्रन्थि है । ब्रह्मरन्ध्र में प्रतिष्टित सौर प्राण उक्था स्थापन्न है । इससे अर्करूप जो सात अवान्तर प्राण निकलते हैं, वे ही ' साकञ्ज ' [ साथ रहने वाले ] ' सप्तशीर्षण्य प्रारण ' कहलाए हैं । दो श्रोत्रप्राण, दो चक्षप्राण, दो नासाप्राण, एक मुखत्राण, इसप्रकार सातों में ६ प्राण तो यमजप्राण हैं, जोड़ले हैं, एवं सातवाँ मुखप्राण एकाकी है * । इसीप्रकार ब्रह्मग्रन्थि में प्रतिष्ठित पार्थिव पानप्राण उक्थ है । इस से निकलने वाले कत्मक प्राण दो भागों में विभक्त हैं । ये ही क्रमशः उपस्थत्राण, गुदप्राण नामक श्रवाञ्चप्राण हैं । सम्भुय दो के अवान्तर नौ प्राण होजाते हैं । स्रुगादापन -निगद में पठित नौ व्याहृतियों से निगदमन्त्रभागानुगता संख्या -- सम्पत् के समतुलन से दैवात्मा में सप्तशीर्षण्य सौर प्राण, एवं दो बाच पार्थिवप्रारण, इन नौ प्राणों का ही प्राधान होता है । क्यों नौ व्याहृतियाँ होती है?, प्रश्न की यही संक्षिप्त उपपत्ति है ॥ ५ ॥
इति - गादापनकम्पपत्तिः-: **:
* साकजानां सप्तथमाहुरेकजं पडिमा ऋषयो देवजाः ।
तेषामिष्टानि विहितानि धामशः स्थात्रे रेजन्ते विकृतानि रूपशः ॥
- ऋ सं ० १ / १६४।१५ ।
- सप्तशीर्षण्याः ( प्राणा: ), द्वाववाञ्ची ' [ ऐ ० ब्रा ० १ । ३ । ६ ॥
१४२ः
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पञ्चमाध्याय गब्राह्मण २ - श्रावण - प्रत्याश्रावण - कम्मोपपत्तिः प्रथमकाण्ड हो गदापकर्म के अनन्तर अध्वर्यु श्राग्नीघ्र होता, ब्रह्मा आदि ऋत्वजों के सह-योग से श्राश्रावण, प्रत्याश्रावण - कर्म की इतिकर्त्तध्यता सम्पन्न होती है । एक वैज्ञानिकी श्राख्यायिका के द्वारा इसी कर्म्म की उपपत्ति का ( ६ टी कण्डिका से ) स्पष्टीकरण हुआ है । वसन्त - ग्रीन्म - वर्षा - शरन-हेमन्त शिशिर - ( हेमन्त शिशिर योः समासेन ) इन पाँच ऋतुओं का स्वरूप अग्नीषोमात्मक माना गया है | अग्नि, और सोम के उत्ग्राम - निग्राम ( चढ़ाव उतार ) से ही पञ्चतु का स्वरूप सम्पन्न हुआ है । अग्नीषोममयी पाँचों ऋतु की समष्टि ही ' सम्वत्सर ' है, यही वह यज्ञ है, जिसके द्वारा सूय्यकेन्द्रस्थ हिरण्यगर्भ - प्रजापति रोदसी - त्रैलोक्य में प्रतिस्टत चर - चर- प्रजा व स्वरूप निर्माण किया करते हैं । इस प्राजापत्या अग्नीषोममयी यज्ञमात्रा का प्रजासर्ग में प्रतिक्षण विखसन हुआ रता है । प्रजा के स्वरूप-निर्माण में साम्बत्सरिक अग्नि- सोम मात्राओं का उपादान - कारणता के सम्बन्ध से खर्च होना अनिवार्य है । यही व्ययभाव ' विस्रं सन ' कहलाया है । इसी विलसन को लक्ष्य में बनाकर यह कहा जासकता है कि, “ सौरमण्डलस्थ दिव्यदेवताओं का अग्नीषोममय यज्ञ सौरमण्डल से अप्रक्रान्त हो गया " । तात्पर्य पार्थिव प्रजासर्ग के निर्माण के लिए सौर देवयज्ञ की अपकान्ति स्वाभविक है । यह यज्ञापक्रान्ति नियतापक्रान्ति, अनियतापक्रानि, भेद से दो भागों में विभक्त मानी जासकती है | सौर सम्वत्सरमण्डलावच्छिन्न ज्योतिर्भाग ही श्रग्नीषोमात्मक यज्ञ है । प्रत्यक्षदृष्ट सौर प्रकाश ही इस यज्ञ का बाह्य शरीर है । टाहक अग्नि में डाल पारमेष्ठ्य सोम आहुत होरहा है । इसी सोमाहुति प्रक्रिया से इस उभयात्मक यज्ञ का स्वरूप सम्पन्न हुआ । है । इमी यज्ञ से ( सोमाहुति से ) ' त्व ज्योतिया वितमो ववर्थ ' इत्यादि ऋग्वर्णनानुसार प्रकाश का जन्म हुआ है । प्रकाश में आग्न, सोम, दोनों का समन्वय है, अतव अवश्य ही सौर - प्रकाश - मएडन की ' यज्ञ ' कहा जासकता है । यह सौर ज्योतिमांग सर्वत्र ( लोकालोक - पर्यन्त ) व्याप्त रहता हुआ हमारे भूपिण्ड की ओर भी रहा है । भूपिण्ड के विष्कम्भ ( व्यास ) की उभय परिधियों से सम्बन्ध रखने वाला सार ज्योतिर्भाग ही प्रकृत में ' यज्ञ ' शब्द से व्यवहृत हुआ है । भूपिण्ड की परिधि को काटकर यह यज्ञ ( प्रकाश ) भूपिण्ड से आगे निकल जाता है । इसी सौर प्रकाश के विच्छेद से ' सैंहिकेय ' नामक छायामय - तमीमय ' राहू ' क | जन्म हुआ है | भूपिण्ड की ओर सौर मण्डल से नियतरूप से आकर अपना नियताकार बनाने वाले यज्ञ की पक्रान्ति ही नियतापक्रान्ति मानी जायगी । यज्ञ के इस नियतापक्रान्तरूप का ही नाम ' ब्रह्मोदन ' है, जिससे किसी भी पार्टिव पदार्थ की उत्पत्ति सम्भव नहीं है । इसी नियतापक्रान्त यज्ञ से भम्वत्सर का स्वरूप निष्पन्न हुआ है, जिसकी कि छान्दोग्यादि उपनिषदों में ' अश्व ' रूप से स्तुति हुई है । सौर प्रकाश आता है, भूपिण्ड से टकराकर पुनरावर्तित होजाता है, [ वापस लौट जाता है ] । दूसरे शब्दों में यज्ञ आता है, भूपिण्ङ से संस्पृष्ट होकर वापस लौट जाता है । वापस लौटे हुए प्रकाशलक्षण इस यज्ञ का आकार भून्छाया [ गह ] से ही समतुलित है । सूचीमुख राहू के आकार से समतुलित भूपृष्ट से सूर्य पर्यन्त व्याप्त [ वापस लौटकर व्याप्त होने वाला ] सौर प्रकाश ही वह ' अश्व ' है, जिसका ' उपा ' मस्तक माना गया है । इस नियतकान्ति से सम्बद्ध पुनर्गमन से सम्बन्ध रखने वाला यज्ञात्मक अश्व, किंवा अश्वात्मक यज्ञ, प्रकृत आख्यान में अभिप्रेत नहीं है । अपितु यहाँ नियतापक्रान्ति से सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ का ही ग्रहण हुआ है । १४२७
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पश्चम अध्याय स्र गब्राह्मण शतपथब्राह्मग नियतापक्रान्त - पुनर्गत - स्थिर - ब्रह्मौदन लक्षण [ सूर्य्य के स्वभोग्य - लक्षण ] सम्वत्सरयज्ञ से यज्ञमात्रा का विस्र ंसन होता रहता है, जिसका तापोत्सर्ग से प्रत्यक्ष किया जासकता है । सूर्य अस्त होजाता है । फिर भी हवा में गर्मी बनी रहती है । यह गर्मी [ अग्नि, जिसके गर्भ में अग्नि - स्वरूपरक्षक सोम भी प्रतिष्ठित है ] विस्ता वह यज्ञमात्रा है, जिसे ' प्रवर्ग्य ( उच्छिष्ट ) ' कहा गया है । ' उच्छिष्टात - जज्ञिरे - सर्वम् इस प्राथर्वण - सिद्धान्तानुसार इस विस्रस्त प्रवर्ग्य भाग से ही पार्थिव - प्रजा की स्वरूप - निष्पत्ति होती है । पार्थिव चान्द्र परिभ्रमण के अनुसार तत्तत् ऋतु विशेषों में प्रवृक्त ततयज्ञमात्राओं के प्रवर्ग्यभाग से ही तत्तद्विशेत्र पार्थिव पदार्थ उत्रन्न हुआ करते हैं । जो प्रत्रयभाग तत्तद्विशेषभावोत्पत्ति में तत्तत्समयविशेषों से सम्बन्ध रखता है, वही उस सौरयज्ञ की अनियतापप्रक्रान्ति है । एवं प्रकृत श्राख्यायिका में अनि-यतापकान्तिलक्षण इसी प्रवर्ग्ययज्ञ का ग्रहण हुआ है । कल्पना कीजिए, यदि प्राकृतिक सौर सम्वत्सरयज्ञ की सम्पूर्ण मात्रा पार्थिवप्रजासर्ग में हीं उपयुक्त होजाय, तो सम्वत्सरमण्डल, एवं उसमें रहने वाले ज्योतिर्म्मय - दिव्य देवताओं की क्या दशा हो? । कल्पना यही उत्तर देगी कि, केवल विस्रंसन से तो एक दिन वह समय भी आ सकता है कि, सम्वत्सर का ही उच्छेद होजाय । मानना पड़ेगा कि, अवश्य ही विस्रस्तभाग की क्षतिपूर्ति भी उसी अनुपात से होती रहती है । यदि सौर पदार्थ पार्थिवसर्ग के निर्माण में खर्च होते रहते हैं, तो — ' इतः प्रदाना ह्येते - ( देवा उपजीव-न्ति ) ' इत्यादि श्रौत सिद्धान्तानुसार पार्थिव पदार्थों के विस्रस्त भाग के गमन से वह कमी पूरी भी होती रहती है । यदि पृथिवी उसे खाती है, तो वह भी पृथिवी को खाता रहता है । परस्परानुगत यह आदान-प्रदान, अन्नान्नादभाव ही तो उभयलोक, किंवा सर्वलोक प्रतिष्ठा बन रहा है । सौरदेवताओं के स्वरूपरक्षक यज्ञ की प्रवर्ग्य के द्वारा पक्रान्ति अवश्य होती रहती है । परन्तु सृष्टि-नियमानुसार अपक्रान्त यज्ञ वापस भी लौट जाया करता है । ' यो मा ददाति स इ देवमात्रत् ' सिद्धान्ता-नुमार जो हमें देता है, वही अन्त में हमें खा भी जाता है । प्राणाग्निरूप होता, प्राणवायुलक्षण अध्य-, आदित्यप्राणात्मक उद्गाता, चान्द्रसोमात्मक ब्रह्मा, इत्यादि प्राकृतिक देवात्मक ऋत्त्विजों के व्या-पार से अपकान्त यज्ञ पुन: स्वप्रभव देवमण्डल की ओर लौट आता है । इसीसे देवस्वरूप- रक्षा हो रही है । यज्ञपुनर्गमन ही देवताओं का देवत्त्व है । इसप्रकार स्वस्वरूपस्थिति के लिए ऋत्विजों के सहयोग से सम्वत्सर-भुक्त प्राणदेवता पृथिवी की ओर अपक्रान्त यज्ञ को वापस बुला लिया करते हैं । पुनरागत उस यज्ञ से यजन कर वे अपना देवत्त्व सुरक्षित रखने में समर्थ होजाते हैं । प्रकृत श्राख्यान प्राकृतिक यज्ञ के इस प्राकृतिक गमनागमनभाव का ही स्पष्टीकरण कर रहा है ॥ ६ ॥
प्रकृत वैध यज्ञ का वितान उस प्राकृतिक नित्य यज्ञ की विधा पर ही हुआ है । जैसा, जो कुछ, वहाँ होरहा है, वैसा, वही सबकुछ, यहाँ कल्पित है, जैसा कि – ' देवाननु त्रिधा वै मनुष्याः - ' यद्वै देवा कुस्तत करवाणि ' इत्यादि निगम - वचनों से प्रमाणित है । जिसप्रकार सौरमण्डलस्थ देवसर्ग की अपेक्षा से यज्ञमात्रा पृथिवी की ओर अपकान्त होरही है, एवमेव हम पार्थिव प्रजाओं की अपेक्षा से यज्ञमात्रा सौर-मण्डल की ओर अपक्रान्त होरही है । जैसे उहें अपने स्वरूप निर्माण - - रक्षा के लिए इस अपक्रान्त पार्थिव यज्ञ की अपेक्षा है, एवमेव हमें यजमान के देवप्राणमय दैवात्मा के स्वरूप - निर्माण - रक्षा के लिए अपक्रान्त १४२८
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पश्चम अध्याय गब्राह्मण प्रथमकाण्ड सौरयज्ञ की अपेक्षा है । ' श्रश्रात्रय ' इत्यादि मन्त्रवाक् के द्वारा मनुष्यविध ऋत्विक उस अपकान्त दिव्य यज्ञसम्पत् का स्व - वैध - भौतिक यज्ञ में समावेश करने के लिए ही श्राश्रावण प्रत्याश्रावणकर्म करते हैं । अवश्य ही इस मन्त्रवाक से क्रान्त दिव्ययज्ञनात्रा का इस वै यज्ञ में समावेश होजाता है । क्योंकि, ' ओश्रावय ' इत्यादि लक्षण जिन व्याहृतियों का यहाँ प्रयोग होता है, उन से प्राकृतिक दिव्य बज़ ही लक्ष्य बन रहा है । ग्राग्नीघ्र को लक्ष्य बनाकर ध्व ' के मुख से निकलते हुए ' श्रश्रावय ' का तात्पर्य है -- ' देवताओं के लिए यज्ञ सुनाओ ' । अर्थात् देवता इस यज्ञ की ओर लक्ष्य दें, ऐसी भावना करो । श्राग्नीध्र- ' स्तुश्रौषट् ' से बही व्यक्त कर रहा है कि, ' हाँ देवताओं ने सुन लिया ' । जिसका तात्पर्य्यं यही है कि, देवताओं का [ देवात्मक पकान्त यज्ञ का ] यहाँ पुनरागमन होगया । इसप्रकार ' श्रश्रावय ' इत्याकारक ‘ आश्रावण ' दिव्यदेवात्मक यज्ञ का आह्वान कर रहा है, एवं ' अस्तु श्रौषट् ' इत्याकारक ' प्रत्या-श्रावणकर्म्म ' उसका श्रागमन सूचित कर रहा है । फलितार्थ यही निकलता है कि, ' श्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म ' अपक्रान्त दिव्ययज्ञ की प्राप्ति के लिए ही है । मन्त्र भावना के द्वारा श्रागत भावात्मक देवप्रागणमय यज्ञ ही इस वैधयज्ञ की मूल प्रतिष्ठा है । उसी प्राकृतिक दिव्ययज्ञबल के आधार पर यजमान का यह वैध यज्ञ यज्ञातिशयरूप दैवात् सम्पत्ति प्राप्त करने में समर्थ होता है । ऋत्विक सहायक बनते हैं । ऋत्विग् भी तभी इस प्राप्तिकर्म में सहायक बन सकते हैं, जब कि वे इस उपावृत्त यज्ञरेत को अपनी भावना में प्रतिष्ठित कर लेते हैं । ऋत्विजों की भावना ही तो मुख्य है । यजमान तो सम्पूर्ण उत्तरादायित्व इह्रीं पर डाल देता है । अतएव यज्ञसम्पत् - संग्रहमूलक श्राश्रावण-प्रत्याश्रावणकर्म में. यजमान का समावेश करना अनावश्यक है । ऋत्विजों की भावना के द्वारा प्राप्त यज्ञ की स्वरूप दृढ़ता के लिए बड़े संयम से सम्प्रदायपूर्वक श्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म का अनुगमन करते हैं । सम्वत्सरप्रजापति स्वयं इस श्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म में परोक्ष रहते हैं । तदवयवभूत तद्स से परिपुष्ट अग्न्यादि देवता ही इस कर्म्म की इतिकर्तव्यता पूरी करते हैं । अतः प्रजापतिम्थानीय यजमान भी यहाँ ( इस कर्म में ) परोक्ष ही रहता है । अग्न्यादि के प्रतिनिधि ऋत्विक ही इस कर्म का अनुगमन करते हैं । जैसा वहाँ होरहा है, वैसा ही यहाँ होता है । इसी समीक्रिया की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कहते हुए श्रुति ने कहा है — ' तेनोपावृत्तेन रेतसाभृतेनऽविजः सम्प्रदायं चरन्ति, यजमानेम परोक्षम ' । ऋत्विजों के भावनात्मक मानस जगत् में प्रक्रान्त दिव्य यज्ञसम्पत् का समावेश होगया । द्युलोकस्थ महामहनीय देवप्राणमूर्ति यज्ञभगवान् का श्रागमन होगया । अव यह आवश्यक है कि, अपने इस भावनात्मक दिव्ययज्ञ के बितान के लिए ऋत्विग्गण पारस्परिक सहयोग के वाक् सम्प्रदान के द्वारा वाक्तत्त्व का श्राश्रय लें । भावनात्मक मनोगर्भित प्राणतत्त्व ही यज्ञ का प्रातिम्बिक स्वरूप है । यह मनोगर्भित प्रागयज्ञ भृता-मिका वाकू के आधार पर ही प्रतिष्ठित रहता है । इस और मन है, उस और वाक है, मध्य में दोनों से परिगृहीत प्राण है । प्रारण यज्ञ है, मनोबाक यज्ञाधार हैं । अतएव भनोवाक को यज्ञ की वर्त्तनी कहा जाता है । इस ओर ऋत्विजों की भावना ( मन ) है, उस ओर मन्त्रप्रयोग ( वाक् ) है । दोनों से मध्यस्थ प्राणात्मक यज्ञ भलीभाँति परिगृहीत होजाता है । यद्यपि यज्ञ का मौलिक स्वरूप प्राण ही है, तथापि एक विशेष १४२६
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पञ्चम अध्याय स्रु गब्राह्मण शतपथब्राह्मण हेतु सेबाक् को भी बज़ का मौलिक स्वरूप मान लिया जाता है । वह विशेष हेतु यही है कि, प्रारण बिना मनो - बाकू के नहीं रहता । उधर ' वाक् ' से मनः - प्राण - वाक्, तीनों का ग्रहण होजाता है, जैसाकि वाक्-शब्दनिर्वचन से सुप्रमाणित है । ' उ - अच् से ही तो ' बाकू ' शब्द निष्पन्न हुआ है । ' उकार ' प्राग़ का, एवं ' अकार ' मन का वाचक है । उकार अकार ( प्राण - मन ) की स्वम्वरूपरक्षा के लिए कामना करने वाला तत्त्वविशेष ही ' अच् ' सूचित हुआ है । इसप्रकार बाच् ( बाक् ) से तीनों का संग्रह हो -जाता है । मनोगर्भित प्राणात्मक यज्ञ अपने केवल मनोमय प्राणरूप से तबतक व्यापार करने में असमर्थ बना रहता है, तबतक कि यह भूतमयी वाक को भी अपनी वर्त्तनी नहीं बना लेता है । भूत ही प्राणव्यापार का श्रालम्बन बनता है । भूताधारेणैव प्रारण स्वबल के प्रयोग में समर्थ होता है । अतएव श्रुति ने मनो-गर्भित प्राणात्मक यज्ञ का रेत ( बलप्रयोगसाधन ) भी वाक को ही माना है, एवं यज्ञस्वरूप भी वाङमय ही माना है । यज्ञस्वरूपसम्पादिका वाक् में ग्रधिभौतक मर्त्यभाग, श्राधिदैविक अमृतभाग, दोनों का समावेश है । मर्त्यवाक् का आधार अमृतावाक् है । श्रमृतवाक का ही वितान होता है । इसी वितान से भृतयज्ञ भूलोक से द्युलोकपर्य्यन्त, पृष्ठ से रथन्तरसाम पर्य्यन्त बितत होता है । लौकिकी वा मृतवागगर्भिता मर्त्या वाक् है । लौकिक व्यवहार सञ्चालन इसी वाक् से होता है । अलौकिकी वाक् मर्त्यवाग्गर्भिता श्रमृतावाक् है । वैदिककर्म्म सञ्चालन इसी वाक् से होता | मर्त्या से व्यञ्जनात्मिका अनुष्टुवा समतुलित है । अमृतबाकू से उदात्त - अनुदात्तादि स्वरात्मिका बृहती-चाक समतुलित है । अतएव वैदिकी मन्त्रवाक् में तत्त्वानुगत स्वरों के अनुसार ही उदात्तादि स्वरों का सन्निवेश हुआ है । यह स्ववा ही क्योंकि सामात्मिका बनती हुई यज्ञवितान का कारण बनती है, इसलिए भी वाक कोही यज्ञ कहना श्रन्वथं बनता है । वाक्तत्त्व के इसी यज्ञस्वरूपप्रतिष्ठात्मक भाव को लक्ष्य बनाकर श्रु तिने कहा है — ‘ वाक् - हि यज्ञः, बागु रेतः ' । देवाह्वानलक्षणा श्रोश्रावयेत्यादिस्वरूपा मन्त्रबाक के द्वारा आज ऋत्विजों को अपक्रान्त यज्ञसम्पत् का सम्पादन करना है । प्राकृतिक सम्वत्सरयज्ञ के सत्रह अवयव माने गए हैं । ' अग्निरु वै यज्ञ: ' इस निगम-वचन के अनुसार सोमगर्भित अग्नि ही यज्ञ है, जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । भूकेन्द्र से प्रारम्भकर भूमहिमा के १७ वें अहर्गणपर्यन्त यह यज्ञाग्नि व्याप्त है । सत्रहवाँ स्थान ही श्राहवनीयकुण्ड माना गया है | इसमें प्रतिष्ठित प्राणाग्नि में १७ से ३३ पर्य्यन्त व्याप्त रहने वाले सोम की आहुति होती है । यज्ञाग्नि प्रज्ज्वलित होपड़ता है! प्रज्ज्वलित होकर यज्ञ यज्ञाग्नि २१ वें अहर्गणपर्य्यन्त व्याप्त होजाता है । २१ पर्य्यन्त व्याप्त यज्ञाग्नि के ६-१५-२१- ये तीन विक्रम मान लिये जाते हैं । त्रिवृत् ( ६ ) स्तोमात्मक प्रथम विक्रम पार्थिव है, पञ्चदश ( १५ ) स्तोमात्मक द्वितीय विक्रम श्रान्त-रिक्ष्य है, एवं एकविंश ( २१ ) स्तोमात्मक तृतीय विक्रम दिव्य है । यज्ञ ही विष्णु है । यही त्रिविक्रम विष्णु है । वक्तव्य यही है कि, यज्ञाग्नि यद्यपि प्राहुति के सम्बन्ध से २१ पर्यन्त ( सूर्य पर्य्यन्त, क्योंकि — ' एक-त्रिंशो वा इत आदित्यः ' इत्यादि श्रुति के अनुसार सूर्य्यसत्ता भूपिण्ड से २१ वें ग्रहण पर ही मानी गई है ) व्याप्त होजाता है, तथापि इसका मौलिक स्वरूप १७ वें ग्रहण पर्य्यन्त ही व्याप्त माना गया है | १४३०
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पञ्चम अध्याय प्रथमकाण्ड सप्तदशस्तोमानियाग्नि के १७ ग्रहण ही १७ अवयव हैं । ये १७ दीं वाह मय अवयव बिना किसी विच्छेद के परम्पर एकरूपवत् सतत है । सप्तदशावयवों के अविच्छिन्न सन्तानभाव से सम्बद्ध आवश्यक है कि, इतस्तत: दृष्टिपात न करते हुए, अन्य बाबू लक्ष यज्ञाग्नि का ही यहाँ संग्रह अपेक्षित है । अतएव प्रस्तुत वाक् का प्रयोग न करते हुए केवल मन्त्र दूसरे के प्रति यशमात्रा समर्पित करते अविच्छिन्न - सन्तान परम्परा से सम्बन्ध सम्पादन ---- परम्परा से उसी ---सम्प्रदान से पूर्णपात्र जलपरिपूर्ण द्याभावना अत्याधायण धर्म का ही अवधानपूर्वक एक हुए यज्ञ के १७ अवयवों का अविच्छिन्न रूप से सम्पादन किया जाय । सपने बाला सप्तदशावयव दिव्ययज्ञ अविच्छिन्न भावात्मक प्रकार परिपूर्ण – समृद्ध – सफल बन जाता है, जैसे कि अविछिन होजाता है । भगवान् शङ्कर के लिए सतत् जलधारा अपेक्षित है । इस कर्म को सतत अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए शिवप्रतिमा के सान्निध्य में पार्श्व, अथवा उर्ध्वप्रदेश में एक पाषाणमय जलकोश ( हौज़ ) बना दिया जाता है । सम्मलित १० - ५ व्यक्ति श्रद्धाभाव से उसे भर दिया करते हैं । दसों व्यक्ति कूप प्रदेश से जलकोश त नियमित रूप से खड़े हो जाते हैं । एवं केवल मृद्घटों को लक्ष्य में रखते हुए तन्मयता से जल भरना आरम्भ कर देते हैं । एक दूसरे को क्रमवार निरूप से घट सौंपता जाता है । जलकोश परिपूर्ण होता है । पारस्परिक अविछिन्न सम्प्रदान का यह एक लौकिक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है । अथवा तो - ' यथा पूर्णपात्रं परासित ' का यह तात्पर्य भी लगाया जासकता है कि जलपूर्ण पात्र का निरर्थक प्रदेश में जैसे डालना है, वैसे ही अस्तुति वाकू से यज्ञ की परिपूर्णता नष्ट करनी है । सिद्ध कार्य को बिगाड़ देना, और आधावण-प्रत्याश्रावगा - कर्म में अप्रस्तुत वाणी का प्रयोग करना समतुलित है । इन् ही यहाँ भी यशकोश परिपूरिका सप्तदशमात्राओं का अविच्छिन्नरूप से ही अनुगमन करना चाहिए, यही फलितार्थ है ॥ ७ ॥
८,६,१०,११, इन चार कण्डिकाओं में उसी अविच्छिन्न - वाकसंयमानुगत - पारस्परिक सम्प्रदान- कर्म्म की इतिकत्तव्यता का स्पष्टीकरण हुआ है । १२, १३, १४, इन तीन कडिकाओं में सोमयाग से सम्बन्ध रखने वाले वाक्संयम का प्रासङ्गिक निरूपण हुआ है । १५ हवीं कण्डिका में उस दोष का विश्लेषण हुआ है, जो सम्प्रदानधाराविच्छेद से, एवं अप्रस्तुत याप्रयोग से हुआ करता है । असामधानी करने से जैसे घट विनष्टि, पदभ्रष्टता, आदि दोषों के कारण जलकोश अपूर्ण रह जाता है, एवमेव यदि पारस्परिक सम्प्रदान में ऋत्विक लोग अन्यमनस्कता, अन्य सामयिक वाक् का प्रयोग कर डालेंगे, तो यज्ञ - सन्तान विच्छिन्न होजायगी । फलत: यज्ञस्वरूप न केवल साङ्गोपाङ्ग ही न बनेगा, अपितु यजमान का महान् अनिष्ट भी हो जायगा । श्रतएव इस अव्यवच्छिन्ना - सम्प्रदानपरम्परा का सावधानी से ही अनुगमन करना चाहिए । यह अवधानता केवल आश्रावण प्रत्याश्रावगा - कर्म के लिए ही आवश्यक हो, यह बात नहीं है । अपितु पुरुषार्थला यश से सम्बन्ध रखने वाले और और भी जो स्वर्थकार्म है, उन सबका भी यथाविधि अनन्यमनस्कता से ही अनुगमन करना चाहिए संकेतनिधि से हमें हमारे लौकिक कम्मों के सम् में भी श्रुति यही आदेश दे रही है कि यदि हमें कोई काम करना है, उसे सर्वात्मना सफल बना देना है, तो अनन्यभाव से उसी को लक्ष्य में रखना चाहिए । हम अपने प्रज्ञापराध से, मनोराज्य की चञ्चलता के १४३१
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पञ्चम अध्याय स्र गवाह्मरण ७१ शतपथ ब्राह्नागग अनुग्रह से संकल्पित कर्म के साथ साथ ही अन्यान्य संकल्प भी किया करते हैं । यही वह व्यवधानदोष है, जिसके कारण प्रथमसंकल्पित अनुगमनीय कर्म में अपेक्षित वात ( चल ) नहीं रहने पाता । फलतः अधि-कांश में हमें निराश ही होना पड़ता है । जो काम एकवार लक्ष्य पर चढ़ा लिया, पहिले अनन्यमनस्कता के साथ, यच्चयावत्_ अप्रस्तुत भावों का परित्याग करते हुए उसी में जुट जाना चाहिए । अव्यवच्छेदमूला -साथ ही पारस्परिक -- सम्प्रदानात्मक सहयोगमूला ऐकमत्यभावात्मिका ( संविदानाः ) ऐसी अनन्य मनस्कता ही कर्म्मसिद्धि का अन्यतमद्वार है, जिसका ' एवमेव यज्ञो भर्त्तव्यः ' इत्यादि आदेश से विश्लेषण हुआ है ॥ १५ ॥ ( ८,६,१०,११,१२,१३,१४,१ )
आश्रावण – प्रत्याश्रावण - कर्म से सम्बन्ध रखने वाले निगदमन्त्र की पाँच व्याहृतियाँ हैं । वर्ण, स्वर, पद, वाक्य, भेद से शब्दात्मिका बाकू के चार विवर्त मान गए हैं, जैसाकि - ' चत्वारि वाक् परिमिता पदानि # इत्यादि ऐतरेयश्रु ति से प्रमाणित है । इहीं चारों वाग्विवों के लिए वेद में क्रमश: क्षर ( वर्ण ), अक्षर [ स्वर | व्याहृति [ पद ], पुरुष [ वाक्य ] ये शब्द व्यहृत हुए हैं । वैध्याकरण - सम्प्रदाय में जिसके लिए ' अखण्डवाक्यस्फोट ' वाक्य व्यवहृत हुआ है, वही ' वैदिक अव्यय पुरुष है । प्रत्येक वाक्य में वर्ण, स्वर, पद, तीनों विवतों का समावेश रहता है ऐसा कोई भी उच्चारण नहीं, जिसे वाक्य न माना जासकता हो । ऐसा कोई भी वाक्य नहीं, जिसमें वर्ण - स्वर - पद का समन्वय न हो । यदि किसी व्यक्ति के “ क्या देवदत्त यहाँ है? " " नहीं हैं " - इस प्रश्नोत्तर में हम केवल ' न ' इस एक अक्षर का प्रयोग करते हैं, तो यहाँ भी एकाक्षरवाक्य विद्यमान है । ' न ' कार में भी वर्ण स्वर - पट अन्तर्निगूढ़ हैं, अतएव उनकी प्रतीति नहीं होती । प्रतीति हो रही है उस चौथी वैखरी वाकू की ही, जिसका हम प्रयोग किया करते है – ' तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ' । चारों विवत्तों में ' पद ' विवर्त्त ' ही व्याहृति है । प्रकृत निगदमन्त्र के क्योंकि पाँच पद हैं, अतएव इन्हें ' व्याहृति ' नाम से व्यहृत करना अन्वर्थ बनता है, यही वक्तव्य है । दिव्य यज्ञ अग्निमय है, एवं - ' तस्य वा एतस्याग्नेर्वागेोपनिपन् ' ( शत ० १० ५.११।१ । ) इत्यादि श्रीत - सिद्धान्तानुसार यह अग्नितत्त्व वाङमय है । वाङ्मय अग्निलक्षण यज्ञ के स्वरूप - निर्माण के लिए पञ्चव्याहृत्यात्मक निगदमन्त्र का प्रयोग हुआ । है । प्रश्न स्वभाविक है कि, उस प्राकृतिक वाङ्मय यज्ञ के स्वरूप - संग्रह के लिए पञ्चव्याहृत्यात्मक ही वाङ् मय मन्त्र क्यों विहित हुआ? | प्रश्न का अनेक दृष्टिकोणों से समन्वय किया जासकता है I ( १ ) पहिले आध्यात्मिकयज्ञ की दृष्टि से ही समन्वय कीजिए | अध्यात्मसंस्था की उत्पत्ति अधिदैव-तगर्भित अधिभूत से हुई है । अधिदैवत - लक्षण ' सर्वहुतयज्ञ ' ही सम्पूर्ण विश्व की मूलप्रतिष्ठा है । विश्व-जनक यह यज्ञ प्रारणः, आप:, वाक्, अन्नं, अन्नादः, भेद से पञ्चपर्वा है । पञ्चपर्वा इस आधिदैविक - यज्ञ से उत्पन्न आधभौतिक विश्वयज्ञ के स्वयम्भू ( अवकाश ), परमेष्ठी ( वायु ), सूर्य [ तेज ], चन्द्रमा ( जल ), पृवित्री ये पाँच महापर्व हैं । इसप्रकार जनक सर्वहुत यज्ञवत् तजन्य विश्वयज्ञ की भी पञ्च वयता
-चच्चारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
* - गुहात्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनध्या वदन्ति ॥
—ऐतरेयारण्य के १४३२