Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1161–1170
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1161–1170
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पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण प्रथमकाण्ड फुस्टतमा है । इस पञ्चावयव विश्वयज्ञ ( आधिभौतिकयज्ञ ) से समुत्पन्न अध्यात्मसंस्था के आत्मा, शरीर, इन्द्रियवर्ग, ये तीन विवर्त्त ' हैं । आत्मा मूलाधार है, यही ' ब्रह्मसत्य ' है । इसके श्रव्यक्त, महान, विज्ञान, प्रज्ञान, भूतात्मा, ये पाँच ही विवर्त हैं । शरीर भूतसत्य है । इसके पृथिव्यादि पाँचों पर्व प्रसिद्ध ही हैं । इन्द्रियवर्ग देसत्य है । इसके भी वाक् प्रारण - चक्षु - श्रोत्र - मन, ये पाँच ही विवर्तक हैं । इस प्रकार अधिदैवतयज्ञ, अधिभूतयज्ञ एवं उभययज्ञ से सम्पन्न अध्यात्मयज्ञ के आत्मा - शरीर - इन्द्रिय, तीनों वित ', सभी प्रकृत्या पाक ( पञ्चावय ) बने हुए हैं । ' प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या ' न्याय से इस वैध यज्ञ में भी वही प्राकृतिक - यज्ञशङ कता अभिप्रेत है । इस आध्यात्मिक दृष्टि से भी श्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म्म में पाँच व्याहृतियों का प्रयोग करना [ अन्वर्थं बन रहा है । ( २ ) दूसरी दृष्टि से पाक्कता का समन्वय कीजिए । प्रस्तुत यज्ञ सोमयाग का अङ्ग है । सोगयाग का स्तोम्य त्रिलोकी से सम्बन्ध है । पार्थिव स्तोम्य त्रिलोकी के त्रिवृत्, पञ्चदश, एकविंश, त्रिरणव, त्रयस्त्रिंश [ ६--१५--२१--२७--३३ ] ये पाँच स्तोम माने गए हैं । पांचों में क्रमश: अग्नि, वायु, आदित्य, भास्वर सोम, दिकसोम, ये पाँच देवता प्रतिष्ठित हैं । इह्रीं से क्रमशः वाक् ( अग्नि ), प्राण ( वायु ), चक्षु [ आदित्य ], मन [ भास्वर सोम ], श्रोत्र [ दिक्सोम ], इन पाँच आध्यात्मिक इन्द्रियदेवताओं का स्वरूप – निर्माण हुआ है । पांचों स्तौम्य देवताओं में आरम्भ के तीन देवता [ अग्नि - वायु आदित्य ] अग्निप्रधान हैं । एक ही अग्नि की धुत्र धर्त्र - धरुण [ घन - तरल - विरल ] अवस्थाएँ क्रमश: अग्नि, बाग, आदित्य हैं । अन्त के दो देवताओं की [ दिक्सोम, भास्वर सोम की ] सोमता स्पष्ट ही है । फलतः पाँचों का अग्नि, एवं सोम में पय्यवसान सिद्ध होजाता है । अग्नि सोम का समन्वितरूप ही यज्ञ है । इसके एवंविध पाँच अवान्तर विवर्त्त हैं । इस पाक सोमयाग के अङ्गभूत ( अतएव ‘ प्राक्सौमिक ' नाम से प्रसिद्ध ) प्रकृत के इस ' इष्टियज्ञ ' में भी अङ्गी सोमयाग के पाङक्तधर्म्म का सम्बन्ध अपेक्षित होजाता है । एवं पञ्च व्याहृति के सम्बन्ध से वह अपेक्षा भी सफल होरही है । ( ३ ) तीसरे दृष्टिकोण से समन्वय कीजिए । यज्ञ को पूर्व में वाङ्मय बतलाया गया है । वाङमय यज्ञ का रेत वाक्तत्त्व ही है | भूकेन्द्र से प्रारम्भ कर महिमा पर्य्यन्त इस वात के अवान्तर ३३ विवर्त्त हो-जाते हैं, जो कि - ' त्रयस्त्रिंशत्तन्तत्रो में वितत्नरे ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार ' तन्तुदेवता ' कहलाए हैं । इन ३३ अहर्गणात्मक तन्तुदेवताओं में ३ अहर्गणात्मक तीन देवता ( ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र ) हृय हैं । शेष ३० रह जाते हैं । इन के ६-६ के स्तूप से पाँच विभाग होजाते हैं । ३३ सों का केन्द्र अग्नीषोम का विभाजक १७ व अहर्गण है । ये ही ६ विभाग हैं । इसप्रकार एक ही वाक् के गौरूप १००० विवर्तों के पहिले ३०-३० गौ के संकलन से ३३ सूक्ष्म विभाग होते हैं, अन्त में ६ स्थूल विभाग मान लिए जाते हैं । यह उसी वाक्तत्त्व का षट्कारण - लक्षण वषट्कार है । चाकू का पट्कार ही पट्कार है । वषट्कारमण्डल ही वाक् का प्रातिश्विक स्वरूप है । इसका ३३ त्रीं अहर्गण ही अग्नीषोमात्मक पार्थिव यज्ञ की अन्तिम सीमा है । इस ' चौपटू ' रूप वषट्कारयज्ञ ( वाग्यज्ञ ) की अन्तिम सीमा के ( ३३ के ) गर्भ में क्रमशः २७--२१-१७--१५-६ - ये पाँच पर्व प्रतिष्ठित हैं । छठा स्वयं ३३ ब हैं । यज्ञसम्पत् का इस ६ ठे वषट्कारपर्व से ही सम्बन्ध है, जिस के गर्भ में पाँच पर्व प्रतिष्ठित हैं | यज्ञ के इन पांचों पर्वों के संग्रह के लिए भी पाँच व्याहृतियों का ग्रहण अन्वर्थ बन रहा है । १४३३
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पञ्चम अध्याय स्व गब्राह्मण -9 शतपथब्राह्मण ' ओ श्रावय ' से त्रिवृत ( ६ ) का, ' अस्तु श्रोपट् ' से पञ्चदश ( १५ ) का, ' यज ' से सप्तदश ( १७ ) वा, ' ये यजामहे ' से एकविंश का, वौषट् से सप्तविंश ( २७ ) का, एवं समप्रिरूप ६ ठे वपट्कार लक्षण त्रयस्त्रिंश ( ३३ ) का ग्रहण होजाता है । इसप्रकार अनेक दृष्टियों से यज्ञ की पाङक्कता का समर्थन किया जासकता है । पाङक्त यज्ञ से उत्पन्न पशुसर्ग भी पुरुष, अश्व, गो, अत्रि, अज, भेद से पाँच विवत्तों में हीं विभक्त है । पाङ सोमयाग से सम्बन्ध रखने वाले सम्वत्सरयज्ञ का स्वरूप भी वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरत, हेमन्त भेद से पञ्चपर्वा ही बना हुआ है । अहोरात्र, पक्ष, ऋतु, श्रयन, सम्वत्सर, भेद से भी सम्वत्सरयज्ञ की पाङ कता स्फुट है । इसी पाङकता के आधार पर अग्निहोत्र ( अहोरात्र ) दर्शपूर्णमास ( पक्ष ), चातुर्मास्य ( ऋतु ), पशुबन्ध ( अयन ), प्रयाग ( सम्बत्सर ), इसप्रकार वैध मानुष यज्ञ के भी पाँच पर्व प्रतिष्ठित हैं । प्राकृतिक यज्ञ की इसी पाङ- सम्पत् की प्राप्ति के लिए प्रकृत कर्म - सम्पादक निगदमन्त्र में पाँच व्याहृतियों का समावेश हुआ है ॥ १६ ॥
सर्वसाधक यज्ञ ही प्रजापति है । ' प्रजापतिस्त्वेवेदं सर्वं यदिदं कि इस निगम के अनुसार यज्ञा-त्मक प्रजापति ही अपने वित्रस्त भाग से सब कुछ बना हुआ है । इस प्रजापति के स्थिति भेद से अनिरुक्त, उद्गीथ, सर्व, ये तीन विवर्त्त होजाते हैं । पिण्ड, और पिण्डमहिमा, प्रत्येक वस्तु में ये दो मुख्य पर्व माने हैं । पिण्ड स्पृश्य है, एवं पिण्डमहिमा दृश्य है । पिण्ड - केन्द्रावच्छिन्न तत्त्व अनिरुक्त प्रजापति है, महिमा - केन्द्रावच्छिन्न तत्त्व उद्गीथ प्रजापति है । एवं महिमामण्डल की रथन्तरसामात्मिका उद्दच नाम्नी अन्तिम परिधि से सम्बन्ध रखने वाला तत्त्व सर्वप्रजापति है । पिण्डाधारेण प्रतिष्ठित महिमा-मण्डल वही पूर्वपरिचित वषट्कारमण्डल है, जिस के ३३ अहर्गण बतलाए गए है । वहीं यह भी स्पष्ट किया गया है कि, ३०-३० गौ का एक एक अहर्गण होता है । फलतः १००० गौ के ३०-३० के बिभाग से ( ६.० ६.० में हीं ) ३३ ग्रहण पूर्ण होजाते हैं, १० गौ शेष रह जाती हैं । यही अन्तिम चौतीस सर्वप्राजा-पत्यस्थान माना गया है | इसी के लिए ' चतुस्त्रिंशः प्रजापतिः ' कहा जाता है । जिस कर्म्म में येन केन रूपेण ३४ संख्या का समावेश होजायगा, वह कर्म्म संख्या-समतुलनमात्र से सर्वप्राजापत्य - सम्पत्ति से युक्त होजायगा । जिस कर्म में सर्वथा पशुभाव का समावेश होगा, वहाँ तन - सम अनिरुक्त हृद्य ( पिण्डके न्द्रावच्छिन्न ) प्रजापति का अनुग्रह प्राप्त होजायगा । एवं जिस कर्म में सप्तदश ( १७ ) संख्या का समन्वय होगा, वहाँ स्वतः एव तन-समतुलित ' उद्गीथ प्रजापति ' की अग्नियज्ञसम्पत का ग्रहण हो जायगा । ३३ अहर्गणात्मक महिमामण्डल का केन्द्र १७ बाँ ग्रहण है । यही सत्रहवाँ अहर्गण उस ' नवा यज्ञ ' की उपक्रमभूमि है, जिसे पुराणपरिभाषानुसार ' श्वेतद्वीप निवासी सत्यनारायण विष्णु ' कहा जाता है । १७ से आरम्भ कर २५ वें ग्रहण पर्य्यन्त ग्रहणों की व्याप्ति मे जो ज्योतिर्मय अपूत्र यज्ञ प्रतिष्ठित है, वही ' नवाह्यज्ञ ' कहलाया है । इस नवाह यज्ञ का केन्द्र २१ वाँ अहर्गण है । यहीं भगवान् सूर्यनारायण प्रतिष्टित हैं । इह्रीं के सम्बन्ध से ये यज्ञात्मक विष्णु ' सत्यनारायण ' कहलाए हैं, जो पूर्वप्रतिपादित त्रिविक्रम विष्णु से पृथक् तत्त्व हैं | ' तद्यत तत् सत्यमसौ स आदित्य ' के अनुसार सूर्य सत्य की प्रतिमा है । आपो-मय पारमेष्ठ्य समुद्र के गर्भ में प्रतिष्ठित रहने के कारण येही ' नारायण ' हैं । प्रतिमास की पूर्णिमा तिथि में तत्त्वज्ञ उपासक व्रतप्रक्रिया के द्वारा इसी तत्व को आत्मसात् किया करते हैं । १४२४
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पञ्चम श्रध्याय स ग्वाह्मण शतपथब्राह्मण १५-२१-२५, ये तीन अहर्गण क्रमशः ब्रह्मविष्टप, विष्णुविष्प, इन्द्रविटप, कहलाए हैं | यही त्रिविष्टपस्वर्ग है, जिसका अन्यत्र विशदीकरण हुआ है । तीनों में से १७ वें का पार्थिव उस यज्ञविष्णु [ त्रिविक्रम वामनविष्णु ] से सम्बन्ध है, जिसकी सम्वत् प्रकृत यज्ञ में अपेक्षित है । इसकी अन्तिम सीमा क्योंकि १७ वाँ ग्रहण है, अतएव इसे -- ' सप्तदशो वै प्रजापतिः ' इत्यादि रूप से ' सप्तदश ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । भूषृष्ट से आरम्भ कर सत्रहवें ग्रहण पर्य्यन्त व्याप्त १७ अवयवों से ही इस यज्ञप्रजापति का स्वरूप निर्माण हुआ है । पाँच व्याहृतियों से जहाँ यह ' उद्गीथ ' नामक सप्तदश प्रजापति पञ्चावयव है, वहाँ अहर्गणात्मक १७ अवयवों से यह सप्तदशावयत्र भी बन रहा है । पञ्चावयव, सप्तदशराशिरूप इसी यज्ञात्मा का व्याहृति के सप्तदश अक्षरों से संग्रह होजाता है । यही पञ्च व्याहृतिसमष्टि के १७ अक्षरों की मौलिक उपपत्ति है, जिसका निम्न लिखित स्मार्त्तवचन भी स्पष्टीकरण कर रहा है-चतुर्भिश्व-- चतुर्भिव--- द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । १ २ ३ ४ ——– १२३४-१२-१ २ ३ ४ ५ [ श्र - श्रा - व - य ] —– [ अस्तु श्रौ- पद् - -- [ -य - ज ] -- [ ये - ग - जा - म - हे ] [ १-२--३--४ ] —– [ ५--६--७-८ ] —- -- [ ६-१० ] - [ ११-१२-१३-१४-१५ ] --- ४ -२ हूयते च पुनर्द्वाभ्यां--[ १६--१७ ] [ त्रौ -- पट् ] १६-१७ तस्मै यज्ञात्मने नमः ॥ उद्गीथप्रजापतये अत्र १७ कण्डिका - उपरता अथ - वृष्टिविज्ञानम् — सप्तदशस्तोमात्मक आहवनीय - - प्रदेश ही जिसे हमने ' ब्रह्मविप ' कहा है -- नाचिकेत श्राग्नेय स्वर्ग कहलाया है । सुप्रसिद्ध स्वयग्नि का जिसका नचिकेता के द्वारा प्रश्न हुआ है, एवं यम के द्वारा इष्टकात्रिति-रूप से समाधान हुआ है - इसी सप्तदशस्थान से सम्बन्ध है । प्रारूसौमिक पर्वयज्ञ - ममष्टिला सोमयाग से उत्पन्न स्वर्गप्रापक दैवात्मा इसी सप्तदश स्थान में प्रतिष्टित होता है । दूसरे शब्दों में दर्शपूर्णमा सेनुगत, सोमयागाप पर्य्यायक, ज्योतिष्टोम से प्राप्तव्य स्वर्ग सप्तदशस्तोमावच्छिन्न यही नाचिकेत स्वर्ग है, जिसके लिए कहा गया है-- ' दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत, ज्योतिलोमेन स्वर्गकामो यजेत " | पञ्चावयवा सप्तदशकलात्मिका, स्वर्ग्याग्निलक्षणा प्राजापत्यसम्पत्ति इस दृष्टिकोण से दैविक - सम्पत्ति मानी जासकती है, जिसकी आधिभौतिक शरीर के निधनानन्तर प्राप्ति होती है । १४३५
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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण शतपथब्राह्मण मानवीय मन परोक्षफलाकर्षण की अपेक्षा प्रत्यक्ष भौतिक फलाकर्षण की ओर विशेषरूप से आकर्षित रहता है । उस की बाह्यदृष्टि पहिले ऐहलौकिक- फलकामना की ही अपेक्षा रखती है । जब उसे किमी कर्म्म के प्रति यह विश्वास होजाता है कि, मुझे अमुक कर्म से प्रत्यक्ष में भी, इसी जीवन में भी कोई भौतिक रूल मिल सकता है, तो वह उस कर्म में अपेक्षा बुद्धिपूर्वक प्रवृत्त होजाता है । यही क्यों, आधिभौतिक साधन साध्यों से सम्पन्न कर्म्मकाण्ड का तो अधिकारी भी वही माना गया है, जिसकी प्राथमिक लक्ष्यभम आधिभौतिक ही बनती है । उच्चपीठिका में प्रतिष्ठित जो उच्चाधिकारी केवल परोक्ष - याधिदैविक - लक्ष्य प्राप्ति के लिए कर्म में प्रवृत्त रहते हैं, उनका वह कर्म तो उपासना, किंवा ज्ञानयोग ही बन जाता है । प्रवृत्तिलक्षण कर्म्मकाण्ड ( यज्ञकाण्ड ) का सामान्य अधिकारी तो प्रत्येक दशा में भौतिक ऐहलौकिक फल की अवश्यमेव कामना करेगा । प्रकृत ग्राश्रावण - प्रत्याश्रावण - कर्म के उस प्रत्यक्ष भोतिकफल का ही १८,१६,२० इन तीन कण्डिकाओं में स्पष्टीकरण हुआ है । तात्पर्य, वैदिक यज्ञकर्म केवल पारलौकिक आधिदैविक स्वर्गादि फलों के ही जनक नहीं हैं, अपितु परोक्षफल के साथ साथ इनसे प्रत्यक्ष भौतिक योग - क्षेम - संवाहक वर्षादिफल भी प्राप्त होजाते हैं । इन प्रत्यक्ष फलों को हम ज्योतिश्चक्र [ खगोल- आकाश ], एवं भुवनकोश [ भूगोल - पृथिवी ] मेद से दो भागों में विभक्त कर सकते हैं । हमारी यच्चयावत भौगोलिक पार्थिव कामनाओं की प्रति-या ऋतु अनुकूला वर्षा ही है । ' निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु ' इत्यादि यजुम्र्म्मन्त्रवर्णनानुसार समय समय पर पर्जन्य देवता के अनुग्रह [ व्यापार ] से होने वाली वर्षा ही ओषधि वनस्पति के उत्पादन के द्वारा पार्थिव योग - प्रेम का संचालन कर रही है । हमारी समस्त ऐहलौकिक कामनाओं का, एवं पार्थित्र भौगोलिक कामनाओं का केन्द्रीकरण अन्न बल पर ही अवलम्बित है एवं इसकी मूलप्रतिष्ठा खगोलीया वर्षा ही है । वर्षा प्रकृति का प्रथम प्रत्यक्ष अनुग्रह है, एवं पार्थित्र ओषधि वनस्पति जल - पशु - वित्तादि द्वितीयानुग्रह है । प्रथमानुग्रह [ वर्षा ] के आधार पर ही द्वितीयानुग्रह प्रतिष्ठित है । १७, १८, इन दो कण्डिकाओं में पहिले खगोलीय प्रथमानुग्रह का, एवं २० त्रीं कण्डिका में द्वितीय भौगोलिक पार्थिव अनु-ग्रह का ही विश्लेषण करती हुई श्रुति भ्रान्त जनों की उस भ्रान्ति का आमूलचूड़ खण्डन कर रही है, जिस भ्रान्ति में पड़ कर वे भ्रान्त मनुष्य यह कहते सुने गए हैं कि, “ शास्त्रीय कर्म्मकाण्ड, यज्ञकर्म्म, तो मरने के पश्चात् ही फल देते | हमारा पहिला लक्ष्य अन्न - वस्त्र है । यह चिन्ता शास्त्रीय कर्मकाण्ड से निवृत्त नहीं हो सकती । " अवश्य ही भारतीय यज्ञकाण्ड न केवल पारलौकिक परोक्ष फलों का ही प्रवर्त्तक है, अपितु परोक्ष | तिशय के साथ साथ प्राकृतिक रस्यपूर्ण वैज्ञानिक - शिक्षणापूर्वक श्राधिभौतिकी समस्त प्रत्यक्ष कामनाएँ भी इसी यज्ञकाण्ड से सम्पन्न की जासकती हैं । यही तो यज्ञ के - ' इष्कामधुक ' विशेषण का फलितार्थ है, जिसे न समझकर श्रद्धदग्ध भ्रान्त जन शास्त्रानुगत भारतीय वैदिक कर्मकाण्ड की उपेक्षा से अपना सर्वनाश ही करा रहे हैं । पुरोवात, अभ्र, विद्यत, स्तनयित्नु, इन चारों सहयोगियों के एकत्र समन्वय से ही ' वर्षाकर्म्म ' की प्रवृत्ति मानी गई है । सुप्रसिद्ध ' पुरवाई हवा ' ही ' पुरोवात ' है । प्रत्यक्ष दृष्ट धूम - ज्योति - सलिल-१४३६
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पञ्चन - अध्याय स्र गब्राह्मण प्रथमकाण्ड मरुत ( बाप- अग्नि- पानी वातत्रायु. ) की समष्टिरूप ' बद्दल ' ' अभ्र ' है । प्रत्यक्षदृष्ट चाक चिक्य ' विद्युत् ' है, एवं प्रत्यक्ष श्रुत ' गर्जन तर्जन ' हो ' स्तनयित्नु ' है । सर्वप्रथम पुरोवात का सञ्चार होता हैं | पुरोवात के सञ्चार से इतस्ततः ऋतभाव [ खण्डभाव ] से बिखरे हुए अभ्रखण्डों का नियताकाशप्रदेश में एकत्र समन्वय होजाता है । अवनता से समुत्पन्न वायु - अग्नि जलीय घर्षण से विद्युत् उत्पन्न होजाती है, साथ ही गर्जन तर्ज्जनलक्षण स्तनयित्नु भी इस सम्पूर्ण सामग्री -सम्भार के समवेत होते ही--' तड़ तड़ ' प्रतिध्वनि के साथ वर्षा होने लगती है । प्राकृतिक प्राणदेवताओं के प्राकृतिक सम्वत्सरयज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले श्राश्रावण प्रत्याश्रावणकर्म की ' ओ श्रावय ' रूपा प्रथमा व्याहृति का फल ' पुरोवात ' है । ' अस्तु श्रौषट् ' व्याहृति से अभ्र का सम्बन्ध है । ' यज ' से विद्युत् का, ' ये यजामहे ' से स्तनयित्नुका, ए तड़तड़ प्रतिध्वनिपूर्विका वर्षा का ' वोपट ' इस पाँचवीं व्याहृति से सम्बन्ध है । इसप्रकार प्राकृतिक प्राणदेवता पञ्चाव्याहृत्यात्मक इसी श्राश्रावण - प्रत्या आवणकर्म से वर्षों के प्रवर्तक बन रहे हैं, जिस वर्षा के तात्त्विक स्वरूप का निम्न लिखित शब्दों में दिग्दर्शन करा देना प्रासङ्गिक न माना जायगा । भारतीय वैदिक - विज्ञान के सम्बन्ध में सबसे बड़ी विप्रतिपत्ति यही है कि, उसका अनेक रहस्यपू परिभाषाओं से ही विशेष सम्बन्ध है । बिना उहें अवगत किए केवल अक्षरार्थं के आधार पर तत्तद्वैज्ञा--निकप्रकरण शून्य से, निरर्थक से, कल्पित से, एवं कहानी से ही प्रतीत होने लगते हैं । साथ ही दूसरी जटिलता यह भी है कि, परोक्षप्रिय ऋषियों की परीक्षा भाषा [ वेदभाषा ] के अनुग्रह से किसी भी विज्ञान का किमी एक ही प्रकरण में क्रमबद्ध निरूपण नहीं मिलता । जबतक समस्त वेदराशि का मन्थन नहीं कर लिया जाता, तत्रतक किसी भी विज्ञानसिद्धान्त का यथानुरूप समन्वय सम्भव नहीं बन सकता । जिस ' वृष्टिविद्या ' के सम्बन्ध में प्रकृत में कुछ निवेदन करना है, उसके लिए भी ये ही जटिलताएँ विद्यमान हैं । प्रकृत ब्राह्मण की ' श्र श्रावयेति देवाः पुरोवानं समृजिरं ' इत्यादिरूपा १८ वीं कण्डिका में त्रुष्टिविज्ञान का निरूपण तो हुआ है | परन्तु यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि, केवल इम कण्डिकामात्र से अरंशतः भी तो वृष्टिबिज्ञान का विश्लेषण नहीं होरहा । देवता पुरोवान, अत्र विद्युत्, स्तनयित्नु, वपटू आदि किसी भी तल का तो यहाँ विश्लेषण नहीं हुआ । अवश्य ही इन तत्त्वों के स्वरूप परिज्ञान के लिए एक-चार हमें उन सम्पूर्ण वैदिक स्थन - विशेषां की ओर अपना ध्यान आकर्षित कर ही लेना पड़ेगा, जिनमें ततत्प्रकरण सन्दर्भ की अपेज्ञा से ततत् -- विशेष भावों का स्पष्टीकरण हुआ है । प्रसङ्गोपात वृष्टिविज्ञान से सम्बन्ध रखने वाला प्रस्तुत प्रकरण पाठकों के लिए विशेषरूप से अनुरञ्जन का साधन बनेगा, इसी आशा के साथ संक्षेप से तत्सम्बन्ध में कुछ निवेदन कर देने का साहस, किंवा दुस्साहस कर लिया जाता है । वृष्टिविद्या के सम्बन्ध में एक ही तत्ववाद का अनेक दृष्टियों से समन्वय हुआ है । उन विभिन्न दृष्टिकोणों में से प्रकृत में ' छान्दोग्य उपनिषत् से सम्बन्ध रखने वाले ' पञ्चाग्नित्रिधातुगत दृष्टिकोण ' काही विशेष सम्बन्ध मानना पड़ेगा । छान्दोग्य उपनिषत् में यह स्पष्ट किया गया है कि, दृष्टि का मूल--तत्र ' श्रद्धातत्त्व ' है । यही श्रद्वातच आगे जाकर ' सोमरूप ' में परिणत होता हुआ ' वृष्टिरूप ' में परिणत होता है, यही एक औपनिषद -- दृष्टिकोण है । दूसरा दृष्टिकोण यह है कि विद्यानिरपेक्ष इष्ट - आपूर्त्त इत्त- नामक सनक के अनुयायी जीवात्मा निधनानन्तर कृष्णमार्ग के अनुगामी बनते हैं । पहिले वे शरीरच्छायात्मक ' III
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पञ्चम श्रध्याय स्र गब्राह्मण शतपथब्राह्मण धूमार्द्ध मण्डल में जाते हैं । यहाँ से रात्रि में, रात्रि से कृष्णपक्ष में, कृष्णपक्ष से दक्षिणायन--मासपट्कमण्डल में, मासों के द्वारा पितृलोक में, पितृलोक से आकाश [ पितृयाण ] में, आकाश से चन्द्रलण्डल में पहुँचते हैं । वहाँ यावतसत्कर्मातिशयपर्यन्त पितृस्वर्गसुन - भोगा-नन्तर पुनः उसी मार्ग से लौट आते हैं । चन्द्रमण्डल से आकाश में, आकाश सेवायुमण्डल में आकर बारूप में परिणत होजाते हैं । वायु से धूम ( वाष्प ) रूप में, धूम से अभ्ररूप में परिणत होते हैं । अत्रावस्था से मेचावस्था में परिणत होते हैं । मेव से वृष्टिजलरूप में बरि--त होकर जीवात्मा ब्रीहि, यव, ओषधि, वनस्पति, तिल, माप, आदि किसी एक भौतिक पार्थिव द्रव्यरूप में परिणन होजाते हैं । पार्थिव अन्न ही जल के द्वारा जीवत्माओं का बाह्य शरीर बनता । इस अन्न की पुरुषाग्नि में आहुति होती है । इस यज्ञ के द्वारा अन्नगत प्राणात्मा ( औप-पातिक जीवात्मा ) शुक्र के द्वारा स्त्री के गर्भाशय में प्रतिष्ठित शाणिताग्नि में आहुत होकर यथाकर्म्मविद्य भौतिक शरीर धारण कर लेता है । इस दृष्टिकोण के अनुसार जीवात्मा वृष्टि का धूमावस्था के द्वारा प्रधान निमित्त बन रहा है, जिस इस दृष्टिकोण का निम्नलिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है-" अथ य इमे ग्रामे - इष्टापूर्चे दत्तमित्युपासते, ते धूममभिसम्भवन्ति । धूमाद्रात्रिं । रात्रे रपरपक्षं. अपरपवाद्यान् पड़ दक्षिणैति मासांस्तान् । एते सम्वत्सरमभिप्राप्नवन्ति । मासेभ्यः पितृलोकं, पितृलोकादाकाशं, आकाशाच्चन्द्रमसम् । एष सोमो राजा । तद्ददेवा-नामन्नम् । तं देवा भन्ऩपन्ति । ( इति - जीवात्मनः - श्रारोहणम् ) " । ( अथातः - अवरो हणम् ) – “ तस्मिन् बावत् सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं - पुनर्निवर्त्तन्ते यथेतम् । आका शाद्वायु, वायुभूचा धूमो भवति, धूमेाभूत्वाऽभ्रं भवति, अभ्रं भूत्वा मेवो भवति, मेघो भूत्वा प्रवर्षति । त इह वीहि यवा - ओषधि - वनस्पतयः -- तिल - माषा इति जायन्ते । अतो वें खलु दुर्निष्प्रपतरं यो यो नमचि, यो रेतः सिञ्चन्ति तद्भूय एव भवति " । + - छान्दोग्योपनिषत् ५ प्रा ० १० ० । ३,४,५,६ कं ० । लोकस्थ श्रद्धातत्त्व सोम के द्वारा वृष्टिरूप में परिणत होता है, इस प्रथम दृष्टिकोगा से, एवं अवरोहणक्रम में जीवात्मा वृष्टिरूप में परिणत होता है, इस द्वितीय दृष्टिकोण से हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ रहा है कि, द्य लोकस्थ खगोलीय तत्त्व विशेष ही वृष्टि का जनक है । अब उक्त दोनों दृष्टि-कोणों से सर्वथा विभिन्न एक तीसरे दृष्टिकोण को लक्ष्य बनाइए । जिसप्रकार यु लोकाधिष्ठाता सूर्ख से रश्मियों के द्वारा सौर साबित्राग्नि ( यादित्याग्नि ) जलरूप से भूलोक की ओर याता रहता है, एवमेत्र भूलोका-x इस विषय का विशद वैज्ञानिक विवेचन चतुःखण्डात्मक श्राद्धविज्ञान के -' आत्मगतिविज्ञानोपनिषत् ' नामक चतुर्थ खण्ड में देखना चाहिए । १४३८
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पञ्चम श्रयमय खुग्ब्राह्मण प्रथमकाण्ड धिष्ठाता पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि अपने प्राणरूप से भूपिगड से निकल कर अजस्ररूप से द्युलोक की ओर जाया करता है । द्युलोक से आते हुए श्रादित्याग्नि से जहाँ सुप्रसिद्ध - " आदित्यानामयनम् ” नामक यज्ञ का स्वरूप निष्पन्न होरहा है, वहाँ भू से जाते हुए अङ्गिरोऽग्नि से सुप्रसिद्ध " अङ्गिरसामयनम् " यज्ञ सम्पन्न हो— रहा है । भूलोक से निकला हुआ प्राणलक्षण अङ्गिरोऽग्नि तो द्युलोक की ओर जा ही रहा है । साथ ही द्युलोक से भूठ पर आकर आदित्याग्ति भी प्रतिफलित होकर ' अश्व ' रूप में परिणत होता हुआ य लोक की ओर ही जा रहा है । दोनों के इमी सहगमन से उक्त दोनों अयनसत्त्रों का स्वरूप सम्पन्न हुआ है । सुप्रसिद्ध अङ्गिरा, तथा आदित्य की म्प का म्नष्टीकरण करने वाले याख्यान ने इसी सत्त्रविज्ञान का प्रतिपादन किया है । बक्तव्य यही है कि, पार्थिव अग्नि ( प्राणात्मक अङ्गिरोऽग्नि ) भूपिण्ड से निकल कर वाङमय स्तोमों के आधार पर अभिप्लवरूप से, एवं पृष्टरूप से निरन्तर द्यलोक की ओर जाया करता है । स्तोमसम्बन्धेन निरोऽग्नि का यह ग्र - गमनमार्ग सर्वथा नियत है । ङ्गिरोऽग्नि के इसी लोकगमन का स्पष्टीकरण करती
हुए मन्त्र श्रति कहती है: -इत एत उद्दारुहन दिवस्पृष्टवान्यारुहन् ।
प्रभूयो यथा पथा द्यामङ्गिरसो ययुः ॥
--अथर्वसं ० १८ | १ | ६ | ६।१ भूपृष्ठ पर व्याप्ता जलमात्रा बाष्परूप में परिणत होकर द्युलोक की ओर जाते हुए अङ्गिरोऽग्निगर्भ में प्रतिष्ठित होजाती है । अग्निगमन के साथ - साथ बाष्परूप से परिणता पार्थिवी जलमात्रा भी अन्तरिक्ष में चली जाती है । अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित मरुत् नामक वायुविशेत्र के धरातल पर वह जलमात्रा गर्भीभूत बन जाती है । यही पार्थिवल का गर्भधारण है । जबतक सौररश्मियाँ तीव्र नहीं बन जातीं, तबतक वह पार्थिव जलमात्रा उसी वायुगर्भ में प्रतिष्ठित रहती है । जब ( आत्यन्तिक ग्रीष्मका लोपलक्षित निदाघकालावसान में ) सौररश्मियाँ अपने निम्नभाव में परिणत होजातीं हैं, तत्काल वायुधरातलस्थ पानी भूपिण्ड पर गिर पड़ता है । इसप्रकार पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि के द्वारा मरुधरातल में अवस्थित पानी हीं कालान्तर में पृथिवी पर बरस पड़ता है । इस दृष्टिकोण के अनुसार पार्थिव जल ही द्युलोक में जाकर वृष्टि का कारण बन रहा है । हम समझते हैं, वृष्टि केवल भूपिण्ड में हीं होती है । परन्तु यथार्थ में परिस्थिति तो यह है कि, भू - य, दोनों ही लोकों में समानरूप से वृष्टि होरही है । अन्तर केवल यही है कि, लोक में पार्थित्र अङ्गिरोऽग्नि वृष्टि के प्रवर्त्तक हैं, एवं भूलोक में आन्तरिक्ष्य पर्जन्य- देवता वृष्टि * - " श्रादित्याह वायङ्गिरसश्च उभये प्राजापत्या स्पर्द्धन्त वयं पूर्णे स्वर्ग लोकमेष्यामो वयं पूर्वइति । ( शत ० १२ २ १६ ) - " एतदादित्यानामयनम् एतदङ्गि-रसमयनम् " ( शत ० ४ । ५ । १।१६,२० ) । १४३६
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पञ्चम अध्याय शपथब्राह्मण के प्रवर्त्तक हैं । यहाँ से वहाँ गया हुआ पानी यहाँ बरसता है - पर्जन्य के द्वारा । एवं यहाँ से वहाँ पानी बरसता है - पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि के द्वारा । पार्थित्रवृष्टि में पार्थिव अहर्गण निमित्त बनते हैं, एवं दिव्य वृष्टि में सौर अहर्गण निमित्त बनते हैं । निम्नलिखित मन्त्रश्रुतियाँ इसी दृष्टिकोण का समर्थन कर रहीं हैं । ( १ ) अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति, मरुतः सृष्टां नयन्ति । यदा खलु वा असावादित्यो व्यङ रश्मिभिः पर्यावर्त्तते, अथ वर्षति । -तै ० सं ० कां ० । ४ प्र ० । १० आ ० | २ कं ० | ( २ ) ' समानमेतदुदकमुच्चेत्यव चाहभिः । भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति, दिवं जिन्वन्त्यग्नयः ॥ ' - ऋक्सं ० ] १।१६४१५१ एक अन्य दृष्टिकोण का भी समन्वय कीजिए । भगवान् मनु कहते हैं कि, द्विजातियों का यज्ञकर्म्म ही वृष्टि का मूल है । आहवनीयाग्नि में यथाविधि जो आहुति दी जाती है, वह लोकस्थ आदित्य में पहुँच जाती है । पार्थिव आहुतिग्राहक श्रादित्यदेवता प्रतिदान [ बदले ] में वृष्टि करते हैं, वृष्टि से अन्न उत्पन्न होता है, अन्न से प्रजोत्पत्ति होती है । इसप्रकार यज्ञाहुति ही परम्परया वृष्टिप्रवर्तिका बन रही है । देखिए!
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक् - श्रादित्यमुपतिष्ठते ।
श्रादित्या जायते वृष्टि - वृष्टेरनं ततः प्रजाः ॥
- मनुः ३ | ७ | ६ एक पाँचवाँ दृष्टिकोण ओर लीजिए । अक्षर से ब्रह्म [ तर ] का विकास होता है, ब्रह्म से कर्म्म उत्पन्न होता है, कर्म्म से यज्ञ उत्पन्न होता है, यज्ञ से पर्जन्य उत्पन्न होता है । पर्जन्य से वृष्टि के द्वार! अन्न उत्पन्न होता है, एवं अन्न से भूतसृष्टि होती है । यहाँ अक्षर को ही वृष्टि का मूलाधार माना जा रहा है | देखिए!
अन्नाद्भवन्ति भूतानि, पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो, यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि. ब्रह्माक्षरसमुद्भुगम् । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञ े प्रतिष्ठितम् ॥ - गीता ३१४, १५३ यद्यपि उक्त दृष्टिकोणों की विवेचना - शैली में, [ साथ ही द्यावा - पृथिवी - रूप से ] अंशत: सिद्धान्त में भी भेद प्रतीत होरहा है, तथापि वस्तुगत्या सभी दृष्टिकोणों का निर्विरोध समन्वय किया जासकता है । जैसा कि, श्रारम्भ में निवेदन किया गया है, प्रथम दृष्टिकोण का प्रस्तुत ब्राह्मणप्रकरण के साथ विशेष सम्बन्ध है । १४४०
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पञ्चम अध्याय सुगब्राह्मण प्रथमकाण्ड श्रुतएव उसी को आधार बनाकर यहाँ वृष्टिविद्या का दिग्दर्शन कराना समीचीन माना जायगा | छान्दोग्यश्रुति ने जिस पञ्चाग्निविद्या के आधार पर अप्सर्ग के द्वारा पुरुषसर्ग का प्रतिपादन किया है, उस का वैज्ञानिक तत्त्व उसी की भाषा में स्पष्ट है । अरुणपुत्र, अतएव ' आरुणेय ' इस उपनाम से प्रसिद्ध श्वेतकेतु अपनी तात्त्विक जिज्ञासाओं की पूर्ति के लिए तत्समय की सुप्रसिद्धा कुरुपञ्चालों की विद्वत्पर्यन [ परिपत् ] में उपस्थित होते हैं । प्रारम्भिक योग्यता की परीक्षा के लिए पत् के मान्य विद्वान् जैथिलि श्वेतकेतु से प्रश्न करते हैं कि, कुमार! क्या तुझें तुम्हारे पिता [ अरूण ] ने तत्त्वज्ञान के शिक्षण से मुक्त कर दिया है? । कुमार श्वेत-केतु उत्तर में ज्यों हीं हाँ भगवन! कहते हैं, त्योंहीं जैचिलि उन के सम्मुख प्रश्नपरम्परा रख बैठते हैं । जैबिलि के द्वारा श्वेतकेतु से होने वाली प्रश्नपरम्परा का पाँचवाँ प्रश्न है - ' वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतात्रापः पुरुष--बचसो भवन्ति ' – जानते हो तो बताओ! पाँचवी आहुति में अतत्व कैसे पुरुपस्वरूप में परिणत होजाता है? | श्वेतकेतु समाधान करने में असमर्थ रह जाते हैं । फलतः स्वयं जैविलि की ओर से ही पांचों प्रश्नों का तात्त्विक विश्लेषण होता है । सुप्रसिद्ध वेदान्तसूत्र [ व्याससूत्र ] के तृतीयाध्याय के आरम्भ से श्रात्मगति विषयक सिद्धान्तों का कतिपय सूत्रों से प्रतिपादन हुआ है । वहाँ का प्रारम्भिक सूत्र है - " तदन्तरप्रतिपत्तौ रंहति, सम्परिष्वक्तः, प्रश्ननिरूपणाभ्याम् " ( व्या ० सू ० ३ । १ । १ । ) । जीवात्मा पाञ्चभौतिक मर्त्य अनित्य शरीर से पृथक् श्रमृत - नित्य तत्त्व है, जब पूर्वसन्दर्भ से ( प्रतिपादिता श्रध्यायद्वयी से ) यह सिद्ध होजाता है - [ तदन्तरप्रतिपत्तौ ] तो, यह भी स्वतः एवं सिद्ध होजाता है कि, मय स्थूलशरीर के छूट जाने पर जीवात्मा लोकान्तर में गमन करता है- ( रहति ) | क्या विशुद्ध आत्मा का लोकान्तर में गमन होता है?, प्रश्न का ' नेति ' रूप से समा-धान करते हुए भगवान बादरायण कहते हैं कि, विशुद्ध आत्मतत्त्व का गमन असम्भव है । अतएव मानना पड़ता है कि, जीत्रात्मा सूक्ष्म भूतों से बेष्टित होकर ही [ श्रतिगहिक सूक्ष्मशरीर धारण करके ही ] लोकान्तर में गमन करता है [ सम्परिष्ाको भूतसूक्ष्मैः - गच्छति ] । प्रमाण के लिए जैबिलि, और श्वेतकेतु में होने वाली प्रश्नोत्तर- परम्परा ही पर्य्यात है । वहाँ पुरुष-मर्ग के सम्बन्ध में जो प्रश्नोत्तर हुए हैं, उनसे यह प्रमाणित होता है कि, जीवात्मा भूतसूक्ष्मों से सम्प-रिक्त होकर ही लोकान्तरों में गमन करता है - ( प्रशनिरूपणाभ्याम् ) । * प्रश्न निरूपण का तात्पर्य यही है कि, अवरोह ( उत्पत्ति ) क्रम में अपतत्त्व से ही पुरुष की उत्पत्ति हुई है । यदि आरोइक्रम में अप्तत्त्व का पुनर्गमन न माना जायगा, तो एक न एक दिन वह निःशेष ही होजायगी । फलतः निर्माणक्रम अबरुद्ध होजायगा । उधर ‘ स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ' - धाता यथापूर्व-मकल्पयत् ' इत्यादि श्रुतिप्रामाण्यानुसार सृष्टिक्रम शाश्वत माना गया है । इसकी यह शाश्वतता तभी अक्षुण्ण बनी रह सकती है, जब कि जीवावरोहणात् जीवारोहण में भी अप तत्त्व का गमन माना जाय | इसी
* तदन्तरेत्यादिकसूत्रमेतद्ब्रह्म तदर्थं यदि वेत्थ किञ्चत् ।
स प्राह जीवः करणावासे संवेष्टितो गच्छति भूतमूक्ष्मैः ॥
१४४१ - प्राचीन सूक्तिः
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पञ्चम अध्याय स्र गवाह्मण ७-शतपथब्राह्मण आधार पर ' ता एव ह्युपपत्तेः ' इत्यादि के अनुसार मानना पड़ता है कि - ' जीवात्मा भूतसूक्ष्मैः सम्परिष्क्त एव लोकान्तरे गच्छति ' । जीवात्मगतिप्रमिपादक इस सूत्र सन्दर्भ का विशद वैज्ञानिक विवेचन श्राद्धविज्ञानान्तर्गत आत्मविज्ञानोपनिषत् नामक प्रथमखण्ड में देखना चाहिए । अग्निहोत्रयज्ञ से समतुलित इस पञ्चाग्निविद्यात्मक अग्निकर्म से ही पुरुषसृष्टि का आविर्भाव । हुआ है । हमारे वैध ( मनुष्ययजमानकृत ) अग्निहोत्र में अग्नि, समिध, अङ्गार, विस्फुल्लिङ्ग, हविद्रव्य, इत्यादि भौतिक साधनों का समन्वय रहता है । इन सब मौतिक साधनों का अन्नादलक्षण अग्नि, अन्नलक्षण सोम, इन दो साधनों में अन्तर्भाव माना जायगा । क्योंकि प्राकृतिक नित्याग्निहोत्र में ये दो साधन हीं मुख्य माने गए हैं । रोदसी लोक्यविधाता, - ' नैवोदेता, नास्तमेता, मध्ये एकल एवं स्थाता ' - बृहद्ध तस्थौ - भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आविवेश ' - ' सूर्यो बृहतीमध्यूढस्पपति ' इत्यादि वचनों के अनुसार रोदसी - ब्रह्माण्ड के केन्द्र विष्वद्वृत्त नामक बृहतीछन्द में प्रतिष्ठित सूर्यदेवता सावित्राग्निमय है । अग्नित्त्वेन ये निरन्तर उसीप्रकार अन्नादान की इच्छा किया करते हैं, जैसे कि हमारा शरीगग्नि स्वाकरूपा बुभुक्षा के उपशम के लिए सायं प्राप्तः अन्न ( भोजन ) की इच्छा किया करता है । इस स्वाभाविकी अनादानेच्छा से ही यह ' अन्नमत्तीति ' निर्वाचन से ' अन्नाद ' कहलाया है । कल्पना कीजिए उस ब्रह्माण्ड - व्यापक सौर अग्नि के महामहनीय प्रवृद्धतम ग्रन्नादभाव की, जिसकी महिमा के गर्भ में असंख्य अस्मदादि प्राणियों के अन्नाद प्रतिष्ठित हैं, जिन्हें अपने स्वल्प आयतन की पूर्ति के लिए प्रतिदिन सायं प्राप्तः अन्नादान की बुमुक्षा बनी रहती है । अवश्य ही यह मानना पड़ेगा कि, जिसने ब्रह्माण्ड के प्रति अपने आप को अन्नात्मकत्त्वेन समर्पित कर दिया है, हमारे रोदसी - ब्रह्माण्ड में भी बृहदायतन कोई न कोई अन्न निरन्तर इस विभ्राट् की बृहती बुभुक्षा शान्त करता रहता है । उस महदन्नाहुति का ही यह प्रभाव है कि, आरम्भ से आज पर्यन्त सृष्टिनिर्माण - प्रक्रिया में अपनी मात्राओं का समर्पण करता हुआ भी सूर्य स्वशरीर से अक्षुण्णवत् बना हुआ है | जिस उस महदन्न की इस सौर सावित्राग्नि में निरन्तर प्राहुति होती रहती है, जिस ग्रन्नाहुति से ' आ कृष्णेन रजसावर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार जो सौर सावित्राग्नि स्वस्वरूप से कृष्ण रहता हुआ भी ज्योतिर्मय बना हुआ है, वही सौराग्नि का अन्न उस महामहिम पारमेष्ठ्य मण्डल में रहने वाला भागंत्र स्नेहतत्त्व है, जिस परमेष्ठी मण्डल के सामने सूर्य्य एक बुद्बुद् के सदृश अपना महत्त्व रखता है । यही पारमेष्ट्य अन्न सोम ' ब्रह्मणस्पति ' कहलाया है, जिसका मौलिक स्वरूप अवलक्षण श्रद्धातत्त्व ही माना गया है । इसी श्रद्धात्मिका सोमाहुति से सूर्य प्रज्ज्वलित है । सौरप्राणाग्नि अग्नि है, सूरत्मक भूतपिण्ड अङ्गार है । सूर्य से सम्बन्ध के द्वारा इतस्ततः विनिः-सुत म्र, लौहित हरित, आग्नेयपुञ्ज विस्फुलिङ्ग हैं, श्रस्मदादि समस्त प्राणीवर्ग समिन है, पार-सोम हविद्रव्य है । इन सब के समन्वय से ही प्राकृतिक नित्य श्रग्निहोत्र सञ्चालित है, जिसके आधार पर ही रोदसी - ब्रह्माण्ड की जीवनसत्ता अवलम्वित है । इसी प्राकृतिक - सूर्य्याग्निहोत्रविधा के आधार पर मानुष उस ' अग्निहोत्रविधा ' का आविष्कार हुआ है, जिस का याज्ञिक ब्राह्मण साय प्रातः अनुगमन किया करते हैं । अग्निहोत्र के इसी रहस्यात्मक स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए श्रुति ने कहा है-१४४२