Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1171–1180
शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1171–1180
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पश्चम श्रध्याय ख गवाह्मण प्रथमकाण्ड ' सूर्यो ह वा अग्निहोत्रम् । तद्यदेतस्या अग्राहुतेरुदैन, तस्मात सूर्योऽग्निहोत्रम् | सयत सायमतमिते जुहोति य इदं तस्मिन्निह सति जुहवानि इति । अथ यत् प्रात-नुदिते जुहोति य इदं तस्मिन्निह सति जुवानि - इति । तस्माद्वै सूर्योऽग्निहोत्रम् । ' - शत ० ब्रा ० ०/३/१ १.२ उक्त सूर्य्याग्निहोत्र में अग्निहोत्रसाधक श्रग्नि, थङ्गारादि, जिन साधनों का उल्लेख किया गया है, वे सक अग्नि, मोम, इन दो तत्त्वों पर ही विश्रान्त हैं । अग्नि, धूम, समित, अङ्गार, त्रिस्फुलिङ्ग इन का तो अग्नि में अन्तर्भाव है, शेष सोममात्र रह जाता है । अतएव अवश्य ही इस अनेक साधनानुगत भी यज्ञ का ' अग्नौ सोमाहुतिर्यज्ञः ' यह लक्षण किया जासकता है । पञ्चाग्निविद्या का तात्पर्य यही है कि, एक ही यज्ञ स्थानभेद से पाच संस्थाओं में विभक्त होरहा है । सौरसंस्था आधिदैविकी है, पार्थिव संस्था आधिभौतिकी हैं. पुरुपसंस्था आध्यात्मिकी है । आधिदैविकसंस्था का २ विधाओ से, आधिभौतिकसस्था का १ विधा से एवं आध्यात्मिकसंस्था का विधाओं से सम्बन्ध है | | कारण इस संख्या - विपर्य्यं का यही है कि, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक यज्ञों के दाम्पत्यभाव से जहाँ अन्य दाम्पत्ययज्ञ ( प्रजा ) उत्पन्न होता है, वहाँ आधिभौतिक पाषाण- लोष्टादि यज्ञों से अन्य यज्ञ उत्पन्न नहीं होता । संकेतविधा से यही रहस्य सूचित करने के लिए आधिदैविक - आध्यात्मिक -- यज्ञों के लिए २-२ विधाओं का, एवं मध्यम्य श्रधिभौतिक यज्ञ के लिए एक ही विधा का स्पष्टीकरण हुआ है । तीनों के पाँच अवयवयज्ञों का ही पञ्चाग्निविद्या के द्वारा विश्लेषण हुआ है । उक्तं पञ्चावयव यज्ञ द्यावापृथिव्य है । द्यावापृथिव्य यज्ञ के प्रारणलक्षण -- यज्ञ, प्राणीलक्षरण - यज्ञ, भेद से दो वित्र माने जासकके हैं । प्राकृतिक प्राणों के समन्वय से सम्बन्ध रखने वाला द्यावापृथिव्य यज्ञ ' प्राणलक्षणयज्ञ ' कहलाएगा, एवं प्राकृतिक ग्रम्मदादि प्राणियों के समन्वय से सम्बन्ध रखने वाला द्यावा-पृथिव्य यज्ञ ' प्रापोल न एयज्ञ ' माना जायगा । प्राणतक्षण यज्ञ के पृथिवी, अन्तरिक्षम, द्यौः ये तीन पर्व हैं । प्राणीलक्षय यज्ञ के पुरुष, योषा [ स्त्री ] ये दो पर्व हैं । द्य लोकाधिष्ठाता अहःकालीन दृश्य अकाशानुगत सौर आग्नेय प्राण से पुरुपसृष्टि का आविर्भाव हुआ है । एवं भूलोका विष्ठाता [ जिसमें आन्तरिक्ष्य प्राणवायु का भो समन्वय है । रात्रिकालोन अदृश्य अद्धकाशानुगत चान्द्र सौम्यप्राण से योषा सृष्टि का आविर्भाव हुआ है । य: लक्षण पिता, एवं पृथिवी रूपिणी माता से जैसे प्राणीविध यज्ञ सम्पन्न हुआ है, एवमेव रसानुगन पुरुष ( पिता ), एव पृथिवी - रसानुगता योपा ( माता ) के दाम्पत्य से प्राणीबिध यज्ञ सम्पन्न होता है । योषा पृथिवी की प्रतिकृति है, एवं पुरुष द्यू लोक की प्रतिकृति है । अतएव इस प्राणीविव यज्ञ को भी द्यावापृथिव्य ही माना जायगा । प्राणविव द्यावापृथिव्य यज्ञ में पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः तीनों का सर्वथा पाथत्य है । इधर प्राणीविच द्यावापृधिव्य यज्ञ में अन्तरिक्ष का पृथिवी — प्रतिकृतिरूपा योषा के गर्भाशयरूप ग्रान्तरिक्ष्य ग्राकाश में ही ग्रन्तर्भाव हो रहा है । तव जहाँ प्राविध द्यावापृथिव्य यज्ञ की तीन सम्था होती हैं, वहाँ प्राणीविध द्यावापृथिव्य यज्ञ की पुरुष, योपारूप से दो ही संस्थाएँ रह जाती हैं | सम्भूय ३ – २ क्रम से द्यावापृथिव्य यज्ञ की पाँच संस्था होजाती है, जिनका कि पञ्चा-ग्निविद्या के द्वारा क्रमिक विश्लेषण हुआ है । एव जिस विश्लेषण की द्य, अन्तरिक्ष, पृथिवी, पुरुष, योपा, ये पाँच पृथक पृथक विधा हैं । १४४३
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पञ्चम अध्याय म गब्राह्मण शतपथब्राह्मगा ( १ ) सर्वप्रथम क्रमप्राप्त ' द्य विधा ' का ही समन्वय कीजिए । दद्य लोक श्रग्नि है, आदित्य समित है, रश्मियाँ धूम है, अहःकाल अर्चि है, चन्द्रमा अङ्गार है, नक्षत्र विस्फुलिङ्ग हैं इन्द्रज्येष्ठ देवदेवता स्वव्यापार से द्युलोकाग्नि में ' श्रद्धा ' रूप हविटव्य की आहुति देते हैं । ग्राहुत श्रद्धातत्त्व, और आहुतिग्राहक ग्नितत्त्व, दोनों के अन्तर्य्याम ( चिति ) सम्बन्धात्मक रासायनिक उस सम्मिश्रण से – जिसमें दो के याग से दोनों के पूर्वस्यरूपोपमह'न के द्वारा तीसरा अपूर्वभाव उत्पन्न होजाता है, – ' सोम ' नामक तत्त्वान्तर उत्पन्न होत । है । श्रद्धातत्त्व का रूपान्तर यही सोम आन्तरिक्ष्य यज्ञ में आहुतिद्रव्य बनने वाला है । सोमोत्पत्ति ही इस द्य - यज्ञ का प्रधान फल है । द्युलोक लोक है, तत्र प्रतिष्ठित सौरप्राणाग्नि ( सावित्राग्नि ) लोकी है । सूर्य्यपिण्ड भूताग्नि है, पिण्ड केन्द्र को ग्रालम्बन बनाकर सौर द्य लोक की अन्तिम सीमा में व्याप्त रहने वाला प्राणाग्नि हीं देवाग्नि है | लोक - लोकी का अभेद मान कर ही यहाँ - " असो वा लोको गोतम! अग्निः ' यह कह दिया गया है । भूताग्नि - पिण्डरूप आदित्य ( सूर्य्यपिण्ड ) प्रज्ज्वलित सा दिखाई देता है । इसीसे आग्नेय ब्राम्पलक्षण ' धूम ' का उदय होता है । इसी समिन्धन से सूर्य्यपिण्ड ' समित ' माना गया है । जिसप्रकार प्रज्ज्वलित समित् ( काष्ठ ) से धूम निकला करता है, एवमेव प्रज्ज्वलित सूर्य्यपिण्डात्मक समित् को गर्भ बनाकर इससे चारों ओर रश्मियों का वितान होता है । रश्मियाँ आग्नेय वाष्प की प्रतिकृतियाँ हैं । अतएव इह्न अवश्य ही ' धूम ' कहा जासकता है । जिसप्रकार धूम से युक्त समित् से निकलने वाली अग्निज्ज्वाला से चतुर्दिक में ( चहुँ ओर ) प्रकाश होजाता है, एवमेव रश्मियुक्त सूर्य से निकलने वाली रश्मियों के सहस्रवा - वितान से सम्पूर्ण त्रैलोक्य प्रकाशित होपड़ता है । प्रकाश ही अर्चि [ ज्ज्वाला ] है । यहाँ प्रकाशात्मक ग्रहः ही ' श्रर्चि ' है । जत्रतक ज्ज्वाला [ श्रर्चि ] बनी रहती है, तत्रतक समित् अङ्गाररूप में परिणत नहीं होता । ज्ज्वाला के शान्त होजाने पर ही अङ्गार की अभिव्यक्ति होती है । तापलक्षणा वह ज्ज्वाला यहाँ ग्रहलक्षणा श्रर्चि [ प्रकाश ] है । जबतक यह रहती है, तत्रतक चन्द्रमा प्रकाशित नहीं होता [ अभिव्यक्ति नहीं होती, अपितु अभिभव रहता है ] | ग्रह के अन्तलीन होजाने पर चन्द्रमा उसी प्रकार अभिव्यक्त होजाता है, जैसे कि ज्ज्वलं पिशम पर अङ्गार अभिव्यक्त होजाता है । इसी सादृश्य से चन्द्रमा अङ्गार माना जासकता है । चन्द्रमा सोममय है | सोममय चन्द्रमा की उत्पत्ति इसी दिव्य आदित्ययज्ञ से हुई है । इसलिए भी चन्द्रमा को आदित्ययज्ञ का अवयव माना जासकता है । चन्द्रमा का प्रकाशधर्म्म भी सौरप्रकाश का ही प्रवर्ग्यरूप है । प्रतिफलित सौर प्रकाश ही चान्द्रज्योति का जनक बनता है, जैसा कि – ' इत्था चन्द्रमसो गृहे ' - ' तरणिकि-रणसङ्गादेप पानीयपिण्डः - दिनकर- दिशि चञ्चञ्चन्द्रिकाभिश्चकास्ते ' इत्यादि वचनों से स्पष्ट है । इसलिए भी चन्द्रमा को अवश्यमेव श्रादित्ययज्ञावयव माना जासकता है । ' चन्द्रमा अन्तरा सुपर्णो धावते दिवि ' इत्यादि मन्त्रवर्णनानुसार चन्द्रमा अपूप्पड है । नक्षत्र अपतत्त्व के ही प्रवर्ग्यरूप हैं, श्रतएव इहें – ' उड्ड ' [ पानीयपिण्ड ] नाम से व्यवहृत किया जाता है | नाक्षत्रिक आयप्राण जहाँ गणात्मक है, वहाँ चान्द्रमस श्रप्यप्राण प्रतिष्ठावा है । अवयव, एवं अवयवी का १४४४
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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण पथनकाण्ड जो सम्बन्ध है, वही चन्द्रमा, और नक्षत्रों का सम्बन्ध है । अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा, इन चारों “ प्रतिष्ठावा देवताओं के क्रमशः वसु - रुद्र आदित्य - नक्षत्र, ये चार गणदेवता कहलाए हैं । जिसप्रकार अङ्गी अङ्गार से ङ्गात्मक विस्फुलिङ्ग विनिर्गत हैं, एवमेव श्रङ्गी श्राप्य चन्द्रमा से अङ्गात्मक ग्रन्थ नाक्षत्रिक तेज का विकास हुआ है । अतएव नक्षत्रों को अवश्य ही अङ्गार - चन्द्रमापेक्षया ' त्रिस्कुलिङ्ग ' कहा जास-कता है । पार्थिव, अन्तरक्ष्य, दिव्य, इन तीनों में क्रमशः अग्नि, वायु, इन्द्र इन तीन प्रतिष्ठावा देवताओं का प्रभुत्व है । अतएव पार्थिव देवताओं को आग्नेय, श्रन्तरिदय देवताओं को वायव्य, एवं दिव्य देवदेवताओं को ऐन्द्र कहा जासकता है । उक्त दिव्ययज्ञसंस्था में ये ऐन्द्रदेवता ही ऋत्विक् हैं, सूय्यं केन्द्रस्थ हिरण्यगर्भ प्रजापति ही इस यज्ञ के यजमान हैं । दिव्य ऐन्द्रदेवताओं के द्वारा श्रद्धातत्त्व की सावित्राग्नि में आहुति होरही है । इसप्रकार ' तस्मिन्नेतस्मिन्नन्नौ देवाः ' से यहाँ ऐन्द्र दिव्य देवता ही ग्रहीत हैं । अत्र शेष रह जाता है केवल ' श्रद्धा ' तत्त्व । पूर्वब्राह्मण - भाष्यों में अनेकधा श्रद्धा के तात्त्विक स्वरूप का विश्लेषण किया जाचुका है । अतएव पिष्टपेषण अनावश्यक है । प्रकरण सङ्गति के लिए यह जान लेनामात्र ही पर्याप्त होगा कि, पारमेष्ठ्य अपतत्त्वानुगत चान्द्रमोम से सम्बन्ध रखने वाला, ' श्रत [ सत्य ] ' को धारण करने वाला, मनोऽनुगत स्नेहतत्व ही ' श्रद्धा ' है । ' श्रद्धा, रेतो, यश: ' इन तीन चान्द्र - मनोताओं का क्रमशः वाङ्मय शरीर *, शुक्र, मन, इन तीन आध्यात्मिक पर्वों से सम्बन्ध है । तीनों हीं प्राकृतिक अनुग्रह हैं । जिन के मन, शुक्र, तथा शरीर में चान्द्र - श्रद्धा - रेत यश का प्रकृत्या समावेश रहता है, वे ही श्रद्धालु, रेतोधा, एवं यशस्वी होते हैं । मनोमयी श्रद्धा पितृप्राण की, शुक्रमय रेत मानव - प्रारण की, एवं वाङमय यश वषट्कार सम्बन्ध से देवप्राण की प्रतिष्ठा बनता है । श्रद्धा तत्त्वानुगत पितृकर्म इस श्रद्धातत्त्व के सम्बन्ध से ही ' श्राद्ध ' कहलाया है । ' श्रद्धा वा आप ' तै ० ० ३२ | ४ | १ ] के अनुसार श्रद्धा वास्तव में श्रापोमत्र तत्त्वविशेष ही है, जिसका उपलब्ध भाष्यों में तत्त्वदृष्ट्या समन्वय नहीं हुआ है । अपनत्व श्रद्धा का प्रथम रूप है एवं सोमत श्रद्धा का उत्तररूप है । ' तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ' [ ईशोपनिषत् ] -- ' आपो भृग्वङ्गिरोरूपमापो भृग्वङ्गिरोमयम ' [ गोपथ ब्राह्मण ] इत्यादि श्रुतियों के अनुसार भृगुलक्षण स्नैहतत्त्व, एवं अङ्गिरालक्षण तेज, दोनों ही ' आप ' हैं । अतएव श्रापोमयी श्रद्धा के लिए ' तेज एवं श्रद्धा ' [ शत ० ११.३ । १ । १ । ] यह भी कह दिया जाता है । जत्रतक आपोमयी श्रद्धा परमेष्टी में मुक्त है, तबतक यह श्रद्वा है । यादित्याग्नि में हुत होते ही श्रदित्याग्नि, तथा श्रद्वारस, दोनों के समन्वय से पूर्वस्वरूपवद्दद्वारा श्रद्धा ' सोम ' रूप में परिणत होजाती है । आपोमयी श्रद्धा में आप्पप्राण की प्रधानता रहती है । परन्तु तद्रूपान्तरभूत सोम प्राप्यप्राण से सर्वथा * ' यशः शरीरे भव मे दयालुः ' – कविकुलगुरुः । १४४५
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पञ्चम अध्याय स गब्राह्मण शतपत्राह्मण बहिष्कृत - है । यह विशुद्ध दवान्न बन जाता है । यही ग्रु लोकोपलक्षित - आधिदैविक यज्ञसंस्था के ग्रुप-त्मक प्रथमपर्व का साक्षात निदर्शन है, जिसका निम्न लिखित श्रुति से स्पष्टीकरण होरहा है-द्यौः ( १ ) “ असौ बाव लोकों गोतम! अग्निः । तस्य आदित्य एव समित्, रश्मयो धूमः, हरचिः, चन्द्रमा अङ्गाराः, नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन्नतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति । तस्या श्राहुतेः सोमो राजा सम्भवति " । ( दिव्ययज्ञः ) * * * * * [ २ ] – दूसरा ग्राधिदैविक यज्ञपर्व अन्तरिक्ष से सम्बन्ध रखता है । जिसप्रकार पृथिबी का श्रुतिष्ठावा ' यथाग्निगर्भा प्राथची ' के अनुसार ' अग्नि ' है, द्युलोकातिष्ठावा आदित्य [ इन्द्र ] है, एवमेव अन्तरिक्ष के तिष्ठावा वायुदेवता माने गए हैं । इस बायुतत्त्व के अनेक विवर्त्त हैं । उनमें से सोमतत्त्व का अनुयोगी, एवं वृत्रतत्त्वका प्रतियोगी, आयप्राणानुगत वायुविशेष ही प्रकृत की सृष्टि में अभिप्रेत है । वही श्रान्त-रिक्ष्य वायुविशेष ' पर्जन्य ' कहलाया है । यही उस द्युलोकानुगत सोम को अपने गर्भ में रखने के कारण ' अग्नि ' [ श्राप्याग्नि ] कहलाया है । आय अग्नि के सम्बन्ध से ही इसे - ' पर्जन्यो वा अग्निः ' [ शत ० १४ / -६।१।१३ ] इत्यादि रूप से अग्नि कया गया है । वर्षा से पहिले जो सनसनाता हुआ पूर्वत्रायु [ पुरवाई हवा ] प्रवाहित होता है, वही ' पर्जन्य ' कहलाया है । इसी अभिप्राय से पर्जन्य का ' क्रन्दतीव हि पर्जन्य: ' शत [ ० ६ । ७ । ३ । २ ] यह लक्षण किया गया है । अष्टमूर्ति शिवतत्त्व - परिभाषा में यही पर्जन्य ' भव ' नाम से व्यवहृत हुआ है । पर्जन्य ही वृष्टि के द्वारा सर्वप्रषञ्च का प्रभव बनता है । अतएव ' पर्जन्याद्धीदं सर्वं भवति ' के अनुसार अवश्य ही इसे ' भवः ' कहा जासकता है [ देखिए शत ० ६ | १ | ३ | १५ ] | श्राप्य अग्निलक्षण वायव्य तत्त्वात्मक पर्जन्य के उक्त बस्तुस्वरूपा-त्मक श्रीत निरूपण के विद्यमान रहते भी यदि इस का ' पर्जन्यो नाम वृष्ठ पकरणाभिमानी देवताविशेषः ' [ शाङ्करभाष्य ] यह अर्थ किया जाता है, तो आश्चर्य इसलिए नहीं होता कि, देश का तत्त्वविज्ञान गत तीन महस्राब्दियों से सर्वथा स्मृतिगर्भ में हीं विलीन रहा है । श्राप्यप्राणात्मक वायु [ पर्जन्य ] वृष्टि का उपकरण भी है, प्राणधर्म्मत्वेन इसे देवता भी कहा जासकता है । परन्तु यह ' अभिमानियपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम ' वाला अभिमानी देवता तो नहीं है, जैसा कि - शतपथभाष्य- प्रथम वर्ष के ' अष्टविध देवताविज्ञान ' प्रकरण में स्पष्ट किया जाचुका है । अभिमानी देवता का सम्बन्ध एकमात्र उपासनाकाण्ड से ही माना गया है । कर्मकाण्डा-गत देवता का तो विशुद्ध तत्त्ववाद से ही सम्बन्ध है । जिसप्रकार द्युलोकोपलक्षित आदित्याग्नि प्राणाविध था, एवमेव यह अान्तरिक्ष्य आय [ न्य ] भी प्राणविध होने से देवाग्नि ही माना जयगा । क्रन्दनधर्मा प्रत्यक्षानुभूत पुरोबात इसी पर्जन्य का भौतिकरूप माना जायगा । वही भूतत्रायु प्राणात्मक पर्जन्यवायु का उत्तेजक बनता है, श्रतएव इसे पर्जन्या-ग्नि की समित् माना जासकता है । पर्जन्याग्नि, भूतत्रायु आन्तरिक्ष्य अपत्य, अग्निसम्बन्धन उत्पन्न बाष्प [ धूम ], इन के समन्वय से ही ' अ ' का स्वरूप सम्पन्न होता है । इन उपकरणों में ' बाष्प ' ही प्रधान है । अतएव तद्वादन्याय से १४४६
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पवम अध्याय स्र गब्राह्मण थमकाण्ट अभ्र को ' धूमात्मक ' कह देना अन्वर्थ बन जाता है । यह वाष्प रूप से अन्तरिक्ष में सर्वत्र व्याप्त है । पर्जन्यानुगत समिध - स्थानीय भौतिक वायु [ मान्सून ] के व्यापार से ही इतम्ततः ऋतरूप से बिखरे हुए बाध्प एकत्र पूञ्जीभूत होते हैं । वही वाष्पपुञ्ज ' अभ्र ' कहलाया है, जिस की उत्तरावस्था मेघ कहलाई है । क्योंकि समित् से धूम का निर्गम होता है, इधर समिल्लक्षण भूतवायु ही वाष्पपुञ्जका जनक [ संग्राहक ] है । इसलिए भी अभ्र को धूम कहा जासकता है । श्रान्तरिक्ष्य ज्योति विद्युत् है । यही पर्जन्याग्नि की अर्चि [ प्रकाश ] है । अतय अवश्य ही विद्युत् को आन्तरिक्षयाग्नि - ज्वालारूप अर्चि कहा जासकता है । चत्र अङ्गार हैं, गर्ज्जन तर्ज्जन विस्फुलिङ्ग हैं, जैसाकि आगे विस्तार से बतलाया जाने वाला है । एवंविध पर्जन्याग्नि में श्रान्तरिक्ष्य वायव्य - देवताओं के द्वारा सोम की आहुति होती है । पर्जन्याग्नि, सोम, दोनों के रासायनिक सम्मिश्रण से ही ' वृष्टि ' का प्रादुर्भाव हुआ | । यही आधिदैविक यज्ञ की दूसरी विधा है, जिस का कि निम्न लिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है । श्रन्तरिक्षम् ( २ ) “ पर्जन्नो वान गौतम! अग्निः । तस्य वायुरेव समित् श्रभ्रं घूमः, विद्य दचिः, अशनि रङ्गाराः, हादनयो विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन्नेतस्मि-नग्न देवाः सोमं राजानं जुह्वति । तस्या बहुतेर्वर्षं सम्भवति " ( आन्तरिक्ष्ययज्ञः ) । ** [ ३ ] - पिण्डात्मिका [ भूतात्मिका ] पृथिवी ' भूमि ' कहलाई है, एवं महिमात्मिका [ प्राणा--f त्मक ] ] पृथिवी ' पृथिवी ' कहलाई है । भूपिण्ड के आधार पर वितत प्राणाग्नि ही प्रकृत में ' पृथिवी ' शब्द स ग्रहीत है । यही प्राणाग्नि पार्थिव भौतिक यज्ञ की मूलप्रतिष्ठा बनता है । यही भौतिक यज्ञ की योनि है, जिस के लिए ' अग्नि योनिर्यज्ञस्य ' यह कहा जाता है । भूपिण्डानुगत प्राणाग्नि भूकेन्द्र से निकल कर १७ में अहर्गण पर्यन्त व्याप्त रहता है, जैसा कि पूर्ण के - ' सप्तदशो वै प्रजापतिः ' इत्यादि निगदव्याख्यान में स्पष्ट कर दिया गया है । सप्तश अहर्गणात्मक ग्राग्नेय मण्डल ही वह पार्थिव सम्वत्सर है, जिस का सौर सावित्रप्राणाग्निमण्डलरूप दिव्य सम्वत्सर के साथ १७ में गंगा में प्रतिमान होरहा है । सप्तदशत्रिन्दु ही उभयसम्वत्सर की मूलप्रतिष्ठा मानी गई है । यह सम्वत्रमण्डल वाङमय है । वाक्तत्त्व ही भूतविवर्त ' का जनक क्षर तत्त्व है । अतएव प्राणाग्नि जहाँ देवाग्नि कहा जा सकता है, वहाँ वागग्निरूप सम्वत्सर को भूताग्नि कहा जासकता है । इसी पूर्वसमतुलन से सम्वत्सर-मण्डल इस पार्थिव प्राणाग्नियज्ञ की समित् माना जासकता है । परमाकाश, पुराण | काश, शरीराकाश, दहाकाश, [ दखाकाश ], इत्यादि भेद से श्राकाश के अनेक विवर्त्त ' माने गए हैं | स्वायम्भुव परमेत्र्योमन् ही परमाकाश है । सौरमण्डल [ सौररोदसीत्रैलोक्य ] से सम्बन्ध रखने वाला अर्णव समुद्रावच्छिन्न आकाश ही पुराणाकाश हैं । शरीर एवं दहराकाश श्रध्या त्मिक आकाश है । पुर | काशलक्षणा सौरी त्रिलोकी में पार्थिवाकाशलक्षण सम्बत्सर मण्डल प्रतिष्ठित १८४७
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पञ्चमश्रयाय न गवाह्मण शतपथब्राह्मण है | सम्बत्सर के अग्न्यात्मक, कालात्मक, वयोनाधात्मक, भेद से तीन विवर्त्त हैं । अग्न्यात्मक सम्वत्सर तो समित् है । कालात्मक सम्वत्सर भातिसिद्ध बनता हुआ व्यवहार की प्रतिष्ठा बन रहा है । वयोनाधात्मक सभ्य -त्सर ही पार्थिव आकाश है । वाकूपरिमाणात्मिका सम्वत्सरमण्डलसीमा ही वयोनाधात्मक सम्वत्सर है । यही व्योमात्मक सम्वत्सर कहलाया है, जैसा कि – व्योमा हि सम्वत्सरः [ शत ० ८ | ४ | १ | ११ ] इत्यादि वचन से प्रमाणित है । भूपृष्टपर प्रतिष्ठित अस्मदादि पार्थिव प्रजावर्ग जिस श्राकाश का साक्षात्कार किया करते हैं, वह यही पार्थिवाकाश है, जिस का वाह्य स्वरूप पार्थिवाग्नि से उत्थित बाष्प से ही निष्पन्न हुआ है । इसी बाष्प के सम्बन्ध से आकाश को प्रकृत भूतयज्ञ का ' धूम ' माना जासकता है । सौर दिव्याग्नि ज्योतिर्मय है । वही ' यज्ञो ह देवेभ्यो अपचक्राम । स कृष्णो भूत्वा चचार ' इत्यादि सिद्धान्तानुसार प्रवर्ग्य के सम्बन्ध से पार्थिवजगत् में भुक्त होता हुआ कृष्णरूप में परिणत होरहा है । अहः काल में पार्थिवसंस्था जहाँ सौर ज्योतिष्मान् सावित्राग्नि से अनुगृहीत रहता है, वहाँ रात्रि में पार्थिव कृष्णा-ग्नि का स्वाभाविक विकास रहता है । अतएव कृष्णभावात्मिका तमोमयी रात्रि ही इस पार्थिव यज्ञाग्नि की ' अर्चि ' मानी गई है । अग्नि के अनुरूप ही तो अर्चि होती है । पार्थिव अग्नि यदि कृष्ण है, तो तद्विकासात्मिका कृष्णा रात्रि भी अवश्य ही कृष्णाग्नि की कृष्णाचि है । रात्रिरूपीणि अर्चि जत्रतक रहती है, तत्रतक दिशाओं का बोध नहीं होता । रात्रि के अवसान पर ही दिशाएँ परिज्ञात होतीं हैं । अर्चि के अवशान्त होने से ही तो अङ्गार का जन्म होता है । इसी समतुलन से दिशाओं को श्रृङ्गार माना जा सकता है । अङ्गार अवयवी है, तो विस्फुलिङ्ग अवयव हैं, अनेक हैं, सर्वतो व्याप्त हैं । " सर्वत इव हीमा अवान्तरदिशः " ( शत ० २२६ | १ | ११ ) के अनुसार सभी प्रान्त अवान्तर दिशाएँ हैं । इसी समतुलन से अवयवात्मिका अवान्तर दिशाओं को ' विस्फुलिङ्ग ' माना जासकता है । उक्त परिग्रहों से युक्त पार्थिव अग्नि में पार्थिय आग्नेय देवताओं के द्वारा वृष्टि की आहुति होती है । पार्थिव मृण्मय भूताग्नियुक्त प्राणाग्नि, तथा अन्तरिक्ष्य वृष्टि ( जल ), दोनों के रासायनिक सम्मिश्रण से ब्रीहि यत्रादि लक्षण ' अन्न ' उत्पन्न होता है । यही मध्यस्थ आधिभौतिक पार्थिव यज्ञ की मात्र एक विधा है, जिसका यी विश्लेषण हुआ है -पृथिवी - ( ३ ) - " पृथिवी वाव गौतम! अग्निः । तस्याः सम्बत्सर एव समित्, आकाशो धूमः, रात्रिरचिः, दिशोऽङ्गाराः, अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन्ने-तस्मिन्नग्नौ देवा वर्ष जुह्वति । तस्या बहुतेरन्नं सम्भवति " । ( पार्थित्रयज्ञ: ) । ( ४ ) - द्विविध आधिदैविक यज्ञ, तथा एकक आधिभौतिक पार्थिव यज्ञ के उक्त स्वरूप - विश्लेषण के अनन्तराधिदैविक आधिभौतिक यज्ञ से कृतरूप आध्यात्मिक यज्ञ के वृषाल क्षरण पुरुषयज्ञ - विवर्त्त का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है कि, हे गौतम! पुरुष निश्चयेन ( इस आध्यात्मिक यज्ञ का ) अग्नि है | १४४८
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पञ्चम श्रध्याय गब्राह्मगा प्रथमकाण्ड यहाँ ' पुरुष ' शब्द से वह आध्यात्मिक षडङ्ग वैश्वानर अग्नि ही अभिप्रेत है, जो सम्पूर्ण प्राणीवर्ग की प्रतिष्ठा बना हुआ है । एवं जिसका ' अहं वैश्वानरो भूत्त्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः ’ ( गीता १५।१४ । ) इत्यादि रूप से विश्लेषण हुआ है । पञ्चाग्निविद्योपक्रम में यह स्पष्ट किया गया है कि, यह यज्ञ प्राणयज्ञ, प्राणीयज्ञ, भेद से दो भागों में विभक्त है । पार्थित्र प्रारण अपान है, अन्तरिक्ष्य प्राण व्यान है, दिव्यप्राण प्राण है । दिव्यप्राणलक्षण प्राण, पार्थिव श्रपानलक्षण प्रारण, इन दोनों प्राणा-पानों से मध्यस्थ व्यानल क्षरण श्रन्तरिक्ष्य प्राण का उसीप्रकार ग्रहण होजाता है, जैसे कि ' द्यावापृथिवी ' शब्द से द्यु – पृथिवी के मध्यस्थ अन्तरिक्ष का ' तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते ' न्याय से ग्रहण हो-जाता है । पार्थिव अपानानि पार्थिव नर ( नायक - अध्यक्ष ) है, अन्तरिक्ष्य वायव्यामि श्रन्तरिक्ष्य नर है, दिव्य प्राणाग्निदिव्य नर है । पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौः, तीनों लोकों के अपानात्मक अग्नि, व्यानात्मक वायु, प्राणात्मक आदित्य, तीनों नरों के पारस्परिक अन्तर्याम सम्बन्ध से उत्पन्न होने बाला, केश - लोम - नखाप्र - भागों को छोड़कर ( श्रा लोमभ्यः, श्र नखाग्रेभ्यः ) सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहने वाला तापधर्म्मा आध्यात्मिक अग्नि ही ' वैश्वानर ' कहलाया है । इस की आध्यात्मिक – षडङ्गता को लक्ष्य में रखकर ही श्रुति ने कहा है- ' पविधो वै पुरुषः ( वैश्वानरः ) पडङ्गः ' ( ऐत ० ब्रा ० २।२६ । ) । वैश्वानरलक्षण आध्यात्मिक घडङ्ग अग्नि में क्योंकि त्रैलोक्याग्नि का समावेश है, अतएव इसके लिये-' वैश्वानरो वै सर्वे अग्नयः ' ( शत ० ६ | २ | १३५ ) यह कहा जाता | शरीर में मस्तक भाग द्युलोक है, नाभि - पर्य्यन्त भाग अन्तरिक्ष है, गुद - नाभ्यन्तर भाग पृथ्वी लोक है, और यही आध्या-त्मिक त्रैलोक्य है । इन तीन लोकात्मक तीन पुरों की समष्टिरूप शरीरपुर में सीमित रहने से ही — ' स एषोऽग्निर्वैश्वानरो यत् पुरुषः ' ( शत ० १० | ६ | १ | ११ ) यह लक्षण किया जाता है । महद्योनि के भेद से प्रत्येक अध्यात्मसंस्था [ प्राणिशरीर ] का वैश्वानर पृथक् - पृथक् शरीराकारों में विभक्त होता हुआ पृथग्वर्त्मा बना हुआ है, जैसा कि – ' एप बै पृथग्वर्त्मा चैखानर: ' [ शत ० ब्रा ० १० १६ | १ | ७ ] इत्यादि वचन से प्रमाणित है । एवंविध सर्वाग्नि [ लोकत्रयाग्नि ] लक्षण इस आध्यात्मिक अग्नि के उक्त ' वैश्वानर'-' पुरुष ' - भावों का ही निम्न लिखित वचनों से स्पष्टीकरण होरहा है— ( १ ) — " स यः स वैश्वानरः - इमे स लोकाः । अन्तरिक्षमेव विश्वं वायुर्नरः । द्यौरेव इयमेव पृथिवी विशां अग्निर्नरः । विश्वं, आदित्यो नरः । ( त्रिभ्यो नरेभ्यो जातोऽग्निर्वैश्वानरः ) ( शत ० ६ । ३ । १।३ ) । ( २ ) — " हमे वै लोका पूः । श्रयमेव पुरुषः, योऽयं पवते । सोऽस्यां पुरि शेते, तस्मात् पुरुष: " ( शत ० २३।६।२।१ ) । ( ३ ) – " प्राण एप स पुरि शेते । तं पुरि शेते - इति पुरिशयं सन्तं प्राणं ' पुरुष ' इत्याचक्षते ( परोक्षम् | परोक्षप्रिया व हि देवाः, प्रत्यक्ष द्विषः " ) – गो ० ब्रा ० पू ० १ | ३६ | Y
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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण शतपथब्राह्मण पाञ्चभौतिक शरीर चित्याग्निमय है, भूताग्निमय है । यही बाङमय अग्नि है । यही शरीरपरिच्छिन्न वैश्वानर नामक पुरुषाग्नि की समित् है । इसी शरीरपुरुषरूप वागग्नि [ शरीर ] से यह समिद्ध रहता है । श्वासप्रश्वासात्मक प्राण ही इस समिद्ध शारीराग्नि से अजस्ररूप से निकलने वाला धूम है । जिह्वोपलक्षित ध्वन्यात्मक शब्द ही [ वैश्वरीवाक् ही ] इस की अर्थ है । आदित्यप्राणात्मक चक्षु ही अन्धकार में अङ्गारवत् प्रतीयमान [ जिस स्थिति का पशुओं की आखों में रात्रि में प्रत्यक्ष किया जासकता है ] चक्षु ही श्रृङ्गार है । वागग्निविकारभूत शब्दश्रुति का अधिष्ठात । श्रोत्र ही विस्फुलिङ्ग है । ऐसे इस आध्यात्मिक पुरुषाग्नि में आध्यात्मिक इन्द्रियदेवताओं के द्वारा वर्षाविकारभूत अन्न लक्षण हविद्रव्य की ग्राहुति होती है । भुक्तान्न रस - मल के क्रमिक विशकलन से क्रमश: रस, अस्क, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, इन धातुरूपों में परिणत होता हुआ अन्ततोगत्वा रेतोरूप में परिणत होजाता है । यही आध्यात्मिक यज्ञ की प्रथमा विधा है, जिस का निम्न लिखित शब्दों में स्पष्टीकरण हुआ है । पुरुषः ( वृषा ) - ४ -- " पुरुषो वाव गौतम! अग्निः । तस्य वागेव समित्, प्राणो धूमः, जिह्वा अर्चिः, चतुरङ्गाराः, श्रोत्रं विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन्नेतस्मि न्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति । तस्या ते रेतः सम्भवति ” ( वृषायज्ञ: ) । ( ५. ) — श्राध्यात्मिकयज्ञ का दूसरा पर्व है - योपा - यज्ञ । वृषाप्राण जहाँ पुरुषसर्ग की प्रतिष्ठा है, वहाँ योषाप्राण ' स्त्रीसर्ग ' की प्रतिष्ठा बनता है । वृपाप्राण आग्नेय है, गोपाप्राण सौम्य है 1 | आग्नेय वृषा का दृश्य सौर अर्द्धाकाश से सम्बन्ध है । एवं सौम्या योषा का अदृश्य चान्द्र ग्रर्द्धाकाश से सम्बन्ध है । गोत्राप्राणात्मिका स्त्री के शोणित मे प्रतिष्टित अग्नितत्त्व ही योगा - यज्ञ की मूलप्रतिष्ठा है । गर्भाशयगत शोणित में प्रतिष्ठित माङ्गलिक [ मङ्गलग्रहप्राणात्मक ] आग्नेयप्राण ही इस यज्ञ का आहुतिग्राहक अग्नि है । इस योगाग्नि का उत्तेजक उपस्थ ही समित् है, उपस्थ- समित् के संयोग से उत्पन्न योषाग्नि- क्षोभ ही धूम है । अन्तस्थ रक्तवर्ण - कन्दल योनि है, यही है । इत्यादि लक्षण इस गोत्राग्नि में पुरुषशरीरस्थ प्राणदेवताओं के द्वारा रेत की आहुति होती है । यही हुत रेत कालान्तर में गर्भरूप में परिणत होजाता है । पञ्चपर्वात्मक यज्ञ के इसी अन्तिम श्राध्यात्मिक यज्ञपर्व का दिग्दर्शन कराती हुई श्रुति कहती है--स्त्री- ( योपा ) – ५ – “ योषा वाव गौतम! अग्निः । तस्या उपस्थ एव समित् । मन्त्रयते, सधूमः । योनिरर्चिः । तदन्तः करोति, तेऽङ्गाराः । श्रभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति । तस्या बहुतेर्गर्भः सम्भवति " | छान्दोग्योपनिषत्-५० ४,५,६,७,८ खण्ड।ः । * . * * १४५०
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पञ्चन - अध्याय गवाहाण प्रथमकाण्ड उक्त ‘ पञ्चाग्निविद्या ’ - २ मक पञ्चपर्यात्मक यज्ञ का निष्कर्ष यही हुआ कि, द्यलोको पक्षित आदि-याग्नि, अन्तरिक्षलोको पक्षित वायव्य पर्जन्याग्नि, भूलोकोपलक्षित पार्थिव अग्नि, पुरुषात्मक वृक्षा-लक्षण वैश्वानराग्नि [ शरीराग्नि ], योपाप्राणात्मक रक्ताग्नि, इन पाँच श्रग्नियों में क्रमशः श्रद्वा, सोम, वृष्टि, अन्न, रेत, इन पाँच हविद्रव्यों की आहुति होती है । वही श्रद्धालक्षण: ( तत्व ) उत्तरोत्तर प्रतिष्ठित अग्निसम्बन्ध में सोम - वृद्धि - अन्न - रेतोरूप में परिणित होता हुआ अन्तिम पाँचवीं रेतो आहुति से पुरुषस्वरूप ( गर्भस्वरूप ) का ग्रारम्भक [ उपादान ] बन रहा है । इसीलिए यह निश्वयेन कहा जासकता है कि--" इति तु पञ्चम्यामाहुतानापः पुरुषवचसो मगन्ति " १-१- ( १ ) चौः --—- आदित्यः ( असौलोकः ) - श्रद्धा २ -२ ( २ ) अन्तरिक्षम - वायुः ( पर्जन्यः ) – – सोमः} -आधिदैविकयज्ञः -प्राणयज्ञः _३-३- ( १ ) त्रिवो --- अग्निः ( पृथिवी ) – त्रृष्टिः ] --आधिभौतिकयज्ञः ४- १- ( १ ) वृषा ---- वैश्वानरः ( पुरुषः ) ——अन्नम् ५-२- ( २ ) योपा —- माङ्गलिकः ( योषा ) -- ~ -- रेतः श्राध्यामिकयज्ञः - प्राणियज्ञः पचग्नियज्ञः पञ्चाग्निविद्यात्मक पञ्चयज्ञ के द्वितीय यज्ञपर्व कं ] [ पर्जन्ययज्ञ को ] सोमाहुत के द्वारा त्रृष्टि का प्रवर्तक बतलाया गया है, जो कि ' अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति ' इत्यादि पूर्वोक्त तृतीय पृष्टिकोण से सर्वथा विरूद्ध पड़ता है । पार्थिव अग्नि पार्थिवपानी को वाष्परूप में परिणत कर आन्तरिक्ष्य बाबु-धरातल में सचित कर देता है: अग्नि के द्वारा त्रायु के गर्भ में सचित ही पार्थिव पानी का कलान्तर में बरस पड़ता है । यह कथन श्रवश्यमेव उक्त पर्जन्ययज्ञमीमांसा का प्रतिद्वन्द्वी प्रतीत होरहा है । ' श्रद्धा सोमरूप में, सोम पर्जन्याग्नि में बहुत होकर वृष्टिरूप में परिणित होता है । ' श्रवश्यमेव यह सिद्धान्त तृतीय- दृष्टिकोण में व्याघात उत्पन्न कर रहा है । कौनसा सिद्धान्त प्रामाणिक माना जाय?, जबकि दोनों हीं श्रुति - सम्मत सिद्धान्त हैं? सम्प्रदाय उत्तर देती है - जहाँ श्रौत - सिद्धान्तों में ही परस्पर विरोध प्रतीत होता हो, वहाँ दोनों ही प्रमाण हैं " । इसलिए कि, यह विरोध केवल स्थूल दृष्टि से हो मम्बन्ध रखता है । तत्त्वदृष्टि के आधार पर जब समन्वय किया जाता है, तो विरोध का सर्ववा उन्मूलन होजाता है । केवल निरूपणीया शैली के भेद से विरोध की प्रतीमात्र ही होती है । वस्तुतः बिरोध है नहीं । सृष्टिक्रमारम्भविज्ञानदृष्टि से जहाँ पर्जन्ययज्ञानुगत वृद्धिसिद्धान्त प्रामाणिक है, वहाँ स्थितिक्रमानुगता विज्ञानदृष्टि से ' अग्निर्वा ० ' इत्यादि तृतीय दृष्टिकोण सुसमन्वित है । १४५१
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पञ्चम श्रध्याय गब्राह्मण शतपथब्राह्मण सृष्टिक्रन से सम्बन्ध रखने वाली पञ्चाग्निविद्या में अधिदैवत - अभिभूत - अध्यात्मरूप से जिस पञ्चपर्वात्मक यज्ञ का विश्लेषण हुआ है, उसीका एतरेय आरण्यक में उक्थविद्या के रूप से उपबृंहण हुआ है । वहाँ योत्रात्मक पाँचवें पर्ग को छोड़ दिया गया है । केवल प्रारम्भ के प्राणयज्ञात्मक पृथवी - अन्तरिक्ष-द्यौः -- इन तीन पर्वों का, एवं चौथे पुरुष पर्व का सग्रह करते हुए पुरुषयज्ञ [ प्राणीयज्ञ ] में तीनों प्राणयज्ञों का समन्वय बतलाया गया है - [ देखिये- ऐत ० ० २ ० | १ ० २ ० ] | इसी उक्त विद्या का आगे जाकर तृतीय खण्ड में रेतसः सृष्टिरूप से जो विश्लेषण हुआ है, वह अपना एक स्वतन्त्र ही दृष्टिकोण रख रहा है । वहाँ दूसरे ही क्रम से सृष्टियज्ञ का विश्लेषण हुआ है । देखिए! “ अथातो रेतमः सृष्टि - प्रजापते रेतो देवाः, देवानां रेतो वर्ष वर्षस्य रेत ओषधयः, श्रोषधीनां रेतोऽन्नं, अन्नस्य रेतो रेतः, रेतसो रेतः प्रजाः, प्रजानां रेतो हृदयं, हृदयस्य रेतो मनः, मनसो रेतो वाक्, वाचो रेतः कर्म्म । तदिदं कर्म्म कृतमयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः " - ( ऐत ० अ ० । १० । ३ खं ० ) । उक्त सम्पूर्ण दृष्टिकोणों के वैज्ञानिक - समन्वय के आधार पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि, पार्थिव सत्याग्नि, आन्तरिक्ष्य सत्य वायु. दिव्य सत्येन्द्र, पर्जन्य ऋन वायु सोम, सुर्य्यश्मियाँ, पुरोवात, अभ्र, विद्युत, स्वयिनत्नु, आदि आदि उत्पादन निमित्त कारणों के समन्वय से ही वृष्टि होती है । निम्मलिखित श्रोत - स्मार्त्त वचन दृष्टि के उक्त कारणों का हीं समर्थन कर रहे हैं— १ – अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति ' २ - ' वायुर्वै वृष्टया ईशे ' -३ - ' दित्याज्जायते वृष्टि: ' -४ - - ' पार्जन्यं वर्षासु यजते'– ५ – ' सोमाहुतेवर्षं सम्भवति ' – ६-- ' रश्मिभिर्वर्ष समदधात्-७ --- - ' पुरोवातं ससृजिरे'-८ ----- ' श्रश्राद् वृष्टि: ' --अम् ६ --- ' वृष्टि याज्या विद्य देव ' --१० --- ' स्तनयित्नुर्घोषोन्वसज्यत'-– अग्निः - सत्यम् - पार्थिवाग्निः - वायुः -- सत्यम् - वायव्याग्निः - श्रादित्यः - सत्यम् - सावित्राग्निः - पर्जन्यः - ऋतम् - - श्राप्याग्निः - सोमः--ऋतम् ---- - चन्द्रसोमः - रश्मयः -- सत्यम् --- प्राणाग्निः --पुरोबात: --ऋतम् - बातवायुः ऋतसत्यम् अग्निः वाय्वादित्य पर्जन्यादिसंघातः --विद्यत् ऋतसत्यम् -- ज्योतिरग्नः -स्तनयित्नु: - सत्यम् -- शब्दाग्निः ऋक्संहितान्तर्गत ' अस्य बामीयसूक्त ' के तीन मन्त्रों का वृष्टिविद्या के साथ विशेष सम्बन्ध है । इसके अतिरिक्त कृष्णजुः जुसंहिता का ' कारीरिष्टि ' प्रकरण भी अंशतः वृष्टिविद्या पर प्रकाश डाल रहा है । एवमेव शतपथ - गोपथ - ताण्ड्यादि ब्राह्मणों के छान्दोग्य - बृहदारण्यकः दि उपनिपदों के तत्तद्विशेष १४५२