Shatpath Brahman 1 2 — पृष्ठ 1181–1190

शतपथ ब्राह्मणम् भाष्य - १-२ - मोतीलाल शास्त्री · पृष्ठ 1181–1190

पृष्ठ 1181

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पञ्चम अध्याय स गत्राहारण प्रथमकाण्ड स्थलों में भी प्रकीर्णक रूप से इस विद्या का स्पीकरगा हुआ है । वेदशास्त्रप्रतिपादित सभी विद्याओं के, तत्त्व-विज्ञानों के सम्बन्ध में यही एक ऐसी विप्रतिपत्ति है, जिसके कारण उन विद्याओं का हम भलीभाँति तत्रतक समन्वय नहीं करपाते, जत्रतक कि उन प्रकीर्णक प्रकरणों का एकत्र समन्वय नहीं कर लिया जाता । यह समन्वय निश्चयेन महासमारम्भ - सापेक्ष है । अनन्यनिष्ठा से सम्पूर्ण वेदशास्त्र को जबतक लक्ष्य नहीं बना लिया जाता, तत्रतक उन प्रकीर्णक विषयों का संग्रह असम्भव है । एवं जत्रतक उनका संग्रह नहीं हो जाता, तत्रतक तद्विद्याओं का आनुपूर्वी से परिज्ञान असम्भव है । अवश्य ही उक्त जटिलता के निराकरण के सम्बन्ध में पुरायुग में ' रहत्य, निगद, गाथा, कुम्ब्या ' आदि वैसे स्वतन्त्र ग्रन्थ रहे होंगे, जिनमें उन प्रकीर्णक भावों का, विद्याओं का एकत्र संग्रह रहा होगा । परन्तु दुर्भाग्य से आज तो बे रहस्यात्मक परिभाषाग्रन्थ हमारे दृष्टिपथ से सर्वथा विस्मृत होचुके हैं । यही वेदार्थ की एक वैसी महती जटिलता है, जिसका निराकरण दो - चार व्यक्तियों के स्वल्पज्ञान से कथमपि सम्भव नहीं । होना यह चाहिए कि, वहुसंख्या में योग्य विद्वान् उपलब्ध मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदशास्त्र - प्रन्थों के तत्तत् -- विद्या-प्रतिपादक तत्तन्निगदों का पृथक पृथक रूप से संग्रह करें । सबका एकत्र संग्रह करते हुए उनका समन्वय करें । इत्यंभूत महाग्रारम्भ प्रयास से अवश्य ही इस दिशा में उक्त जटिलता दूर की जासकती है । उदाहरण के लिए वृष्टिविद्या को ही लीजिए । अस्यवामीयसूक्त के ५२ मन्त्रों में से केवल ३ मन्त्र ऐसे है, जिनसे वृष्टिविद्या के कुछ एक सिद्धान्तों का विश्लेषण हुआ है । वे तीनों मन्त्र भी एक साथ पटित नहीं है । अपितु तीनों का क्रमशः ३६-४७-६१ यह संख्या क्रम है । यही स्थिति अन्य स्थलों की है । यही वह जटिलता है, जिसके निग्रह मे प्रकृत ब्राह्मण के प्रत्येक प्रकरण में हमें अनावश्यक विस्तारदोष, पुनरुक्तिदोष का का विवश होकर अनुगमन करना पड़ रहा है । परिणाम स्वरूप पाठकों के लिए हमारा यह अव्यवस्थित प्रयास सुविधा के स्थान में जटिलता का ही जनक जनता जारहा है । इस सम्बन्ध में हम अपनी ओर से इससे अधिक क्या निवेदन कर सकते हैं कि, जबतक देश के विद्वान् सम्मिलित रूप से उक्त पद्धति के अनुसार वेदार्थ का समन्वय नहीं कर लेंगे, तबतक एक दो व्यक्तियों की स्वल्प शक्ति मात्र के आधार पर इस दिशा में सफलता प्राप्त कर लेना तो असम्भव ही होगा । हमारे ये अव्यवस्थित प्रकरण तो केवल यही पुरुषार्थ करसकते हैं कि, जिनकी दृष्टि में भारतीय शास्त्र केवल शब्दजाल है, वे यह अनुभव करने लगे कि वेदशास्त्र एक विज्ञानशास्त्र है, एवं उसमें प्रतिपादित विद्याएँ प्राकृतिक नित्यविज्ञानों का ही विश्लेषण कर रही हैं । जिन कतिपय प्रतीच्य विद्वानों की बाह्यदृष्टि में भारतीय शास्त्र अधिक से अधिक ' आमा ' का समर्थक है, तदनुयायी उच्छिष्टभोगी अर्वाचीन जो प्रान्य विद्वान् अपनी निधि के वास्तविक स्त्ररूपज्ञान से नञ्चित रहते हुए इसके प्रति न केवल उदासीन ही हैं, अपितु इसका उपहास करना भी जिनके जीवन का एक प्रधान पुरुषार्थ बना हुआ हैं, अवश्य ही उनकी भ्रान्ति का ये अव्यवस्थित प्रकरण भी मुर्गात्मा नहीं, तो अंशतः तो निराकरण कर हीं सकेंगे । एकमात्र इसी लक्ष्य से जानबूझ कर ही इस पद्धतिका अनुगमन करना हमने श्रन्या समझा है । जिह्न वस्तु-गत्या वेदेदधिद्या का रहस्यज्ञान प्राप्त करना है, उनसे तो हम यही निवेदन करेंगे कि, वे क्षक्षिण-कण्डु मिटाने वाले हमारे इन प्रस्तुत प्रयामों को एक ओर रखने हुए आनुपूर्वी से स्वयं मूल ग्रन्थों को ही अपने स्वाध्याय का विषय बनायें । इस प्रासङ्गिक निवेदन के साथ ही वृष्टिविद्या के प्रकीक श्रंशों का दिग्दर्शन कराने वाले निम्नलिखित ऋङ मन्त्र पाठकों के सम्मुख उपस्थित होरहे हैं ---१८५३

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पञ्चम अध्याय गवाह्मण शतपथब्राह्मण

१ – मप्ता गर्भा भुवनत्य रेतो विष्णोतिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्म्मणि ।

ते धीतिभिर्मनसा ते विपश्चितः परिभुवः परिभवन्ति विश्वतः ॥

२ – कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो तवत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन - ऋकसं ० १ | १ | ६४ | ३६ | वसाना दिवमुत्पतन्ति । पृथिवी युद्यते I - ऋक्सं ० ] १ | ११६४ | ४७

३ - समानमेतदुदकमुच्चैत्यव चाहभिः ।

भूमिं पर्जन्या जिन्वन्ति दिने जिन्वन्त्यग्नयः ॥

- ऋक्सं ० १ | १ | ६४ | ५१ थोड़ी देर के लिए यह मान लीजिए कि आकाशस्थ मेघों से भूपिण्ड पर जो पानी बरसता है, वह वस्तुतः पृथिबी की ही देन है । अग्निगर्भ- भूपिण्ड के केन्द्र से अङ्गिरोऽग्नि ( प्राणाग्नि ) द्युलोक ( श्राकाश ) की ओर निरन्तर जाया करता है, यह प्रकरण के प्रारम्भ में स्पष्ट किया जाचुका है । ' अग्निर्वा इतो वृष्टि-मुदीरयति ' सिद्धान्त इसी तथ्य का स्पष्टीकरणा कर रहा है । इसप्रकार पार्थिव जलमात्रा ( समुद्र, नद, नदियाँ, कूप, वापी, तड़ाग, पधि - वनस्थित पार्थिव प्राणीशरीर आदि आदि में रहने वाली अलमात्रा ) ऊपर की ओर जाते हुए अङ्गिरोऽग्नि के सम्बन्ध से वाष्परूप में परिणत होकर ऊपर की ओर जाया करती है । इसप्रकार पार्थिव अग्नि पार्थिव जलमात्रा को द्युलोक की ओर ले जाने में एक निमित्त बना हुआ है । दूसरा निमित्त है - ' वायु ' । पार्थिव मृण्ममय परमाणुओं का गुरुत्वाकर्षण भूपिण्ड के जिस नियमित ऊ प्रदेश पर्थ्यन्त व्याप्त रहता है, वहाँतक तो पार्थिव अग्नि हीं पार्थिव जलमात्रा को ऊपर बेंच लेजाता है । ज्यों ज्यों जलमात्रा ऊपर चढ़ने लगती है, त्यों त्यों वह पार्थिव गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होती जाती है । पार्थिवा-करण से विमुक्ता यही जलमात्रा ' बाप ' है । उधर अान्तरिक्ष्य वायु भी एक प्रकार का बाप ही है । आगे जाकर जलमात्रा के ऊर्ध्वगमन का प्रेरक यही ' बाप - वायु ' बनता है । पृथिवी से लोक पर्य्यन्त सप्तविध सूर्य्यनाडियाँ वितत हैं । यही ' महापथ ' कहलाया है । नाड़ीरूप इसी महापथ से सौर पदार्थों का प्रवर्ग्यभाग पृथिवी में, एवं पार्थिव पदार्थों का प्रवर्ग्यभाग सूर्य में भुक्त होता रहता है । यह नाड़ीमार्ग उभय प्रजापतियों के विसम्त भाग की पारस्परिक श्रादान - प्रदान के द्वारा पूर्ति किया करता है । सौरपदार्थ, पार्थिवपदार्थ, दोनों हीं गतिशून्य हैं । इन का गमनागमन होता है नाडीमार्ग से ही, परन्तु निमित्त बनता है - ' वायु ' । ' सदागति मातरिश्वा ' नामक वायु ही अपने गतिधर्म्म से दोनों का संवाहक बनता है । दूसरे शब्दों में - वायु-धरातल पर प्रतिष्टित होकर ही जलमात्रा नाड़ीमार्ग से च लोक की ओर जाती है । तीसरा निमित्त है- ' मूर श्मियाँ ' । सूर्य्यरश्मियाँ पार्थिव तत्त्वों का निरन्तर श्रादान किया करतीं हैं । इस आदानधर्म्म से ही सूर्य्यसंस्था में मुक्त इन्द्र - धाता -- भाग-- पूपा - टि १२ सौर प्राण ' आदत्ते आददानाः ' १४५४

पृष्ठ 1183

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पञ्चम अध्याय गवाह्मरण 5 प्रथमकाण्ड - ÷ इत्यादि निर्वचनों से ' आदित्य ' कहलाए हैं । सर्वरसादानत्व ही आदित्य का आदित्यत्त्व * है । आदित्यरश्मियाँ हीं नाड़ी हैं । नाड़ी रूप रश्मियाँ भूपृष्ठ पर संलग्न होती हैं | अपने स्वाभाविक सत्यधर्म के कारण ऋतधर्म्मात्मक जलादि की भाँति इतस्ततः न जाकर ये रश्मियाँ उसी नियत मार्ग से वापस द्युलोक की ओर लौट जातीं हैं | आता हुआ रश्म्यवच्छिन्न सौर तेज जहाँ ' सावित्री ' कहलाया है, वहाँ प्रतिफलित, साथ ही पार्थिव अङ्गिरोऽग्नि से समवेत वही सौरतेज ' गायत्री ' कहलाया है । प्रतिफलित इस गायत्रतेज में पार्थिव अग्नि, अन्तरिक्ष्य, वायु, पार्थिवरसमात्रा, तीनों प्रतिष्ठित होजाते हैं । श्रतएव कहा जासकता है कि, पार्थिवाग्नियुक्त वायु के संयोग से रश्मिरूप नाडीमार्ग के द्वारा पार्थिव जलमात्रा द्यलोक की ओर जारही है | इसी दृष्टि से रश्मि की अपेक्षया ' आदित्याज्जायते वृष्टिः ' कहा जासकता है । पार्थिवा-ग्न्यपेक्षया ‘ अग्निर्वा इतो वृष्टिमुदीरयति ' कहा जासकता है । एवं अन्तरिक्ष्य वाय्वपेक्षया - ' वायु वृष्टया ईशे ' यह कहा जासकता है । तीनों हीं वचन तत्तदपेक्षया सुसमन्वित हैं । नाड़ी ( रश्मि ) एवं अग्निप्राणयुक्त बायु से सम्बद्ध इसी वृष्टिविज्ञान का स्पस्टीकरण करते हुए हमारा + भौतिक विज्ञानशास्त्र कहता है – “ नाड्यो वायुसंयोगादारोहणम ( अपाम् ) । नोदनापीड़नान, संयुक्तसयोगाच्च " ( वैशेषिक दर्शन -५ / २ / ५,६ सू ० ) । ' नाड्यो वायुसंयोगात् ' श्रारोहित पार्थिव जल से सम्बन्ध रखने वाली वृष्टिविद्या के गमन, स्थिति, चर्पण, ये तीन अधिकरण माने जासकते हैं । यहाँ से पानी जाकर वहाँ पहुँचा, यही पहिला गमन-अधिकरण है, जिसे ' गर्भाधानकाल ' भी कहा जासकता है । वहाँ पहुँच कर पानी नियत समय पर्य्यन्त लोकस्थ वायुधरातल पर ठहर गया, यही दूसरा स्थित्यधिकरण है, जिसे ' दोहदकाल ' भी कहा जा-सकता है । नियत समयानन्तर पानी पुनः बरस पड़ता है, यही तीसरा वर्षणाधिकरण है, जिसे ' प्रसव-काल ' भी कहा जासकता है । इसप्रकार गर्भ, दोहद, प्रसव, भेद से यह वृष्टिकर्म्म त्रिपर्वा बन रहा है । पूर्वोद्धता ऋङ मन्त्रत्रयी से वृष्टिकम्मं के इह्रीं तीनों पर्वों का स्पष्टीकरण हुआ है, जिसके तात्त्विक समन्वय के लिए खगोल से सम्बन्ध रखने वाली कुछ एक बाह्यपरिभाषाओं का ही स्पष्टीकरण अपेक्षित होगा । सदा सर्वदा ही पार्थिवाग्नि- रश्मियाँ ऊपर की ओर जाती रहतीं हैं । वायु भी सदा ही प्रवाहित है ।. फलस्वरूप पार्थिवरस - मात्राओं का भी सदा ही ऊर्ध्वगमन सिद्ध है । और इसी दृष्टि से यह भी कहा जासकता

-- इन्द्रो - धाता भगः - पूषा मित्रोऽथ वरुणो ऽर्यमा ।

शु - विवस्वान्त्वष्टा च सविता- विष्णुरेव च ॥

* " स प्राणमेवाग्नेरादत्त, रूपमेव वायोरादत्त, चितमेव पुरुषस्यादन, चक्षुरेव पशूनामादत्त, भामेव चन्द्रमस आदत्त । तद्यदादत्त - तस्मादादित्यः " । - शत ० ब्रा ० १ ९ १६ ४७, ८.६, १०,१११ + भारतीय विज्ञान अधिदैवत, अध्यात्म, अधिभूत भेद से तीन भागों में विभक्त माना गया है । वेदान्तदर्शन, सांख्यदर्शन, वैशेषिकदर्शन, तीनों से क्रमशः तीनों विभागों का स्पष्टी-करण हुआ है, जैसाकि गीता विज्ञानभाष्यभूमिका - द्वितीय खण्ड के ' आत्मपरीक्षा ' नामक ' क ' भाग में विस्तार से वैज्ञानिक विवेचन हुआ है । १४५५

पृष्ठ 1184

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पञ्चम श्रध्याय स्त्र गन्राह्मगा शतपथब्राह्मण है कि, जैसे जलमात्रा का गमन निरन्तर होता रहता है, एवमेव द्युलोक से उसका आगमन भी निरन्तर ही होता रहता है । इस नित्य गमनागमन - लक्षण वृष्टियज्ञ से ही ' अहरहर्यज्ञ ' नामक ' भैषज्ययज्ञ ' का स्वरूप-निर्माण हुआ है । प्रकृत में हमें विचार उस ' वृष्टिकर्म्म ' का करना है, जिस का षड् ऋतुमूर्ति सम्वत्सर ( वर्ष ) के एक ऋतुविशेष ( वर्षाऋतु ) में हीं भोग हुआ करता है । वर्षा ऋतु में लोकस्थ मेघों से जो जल बरसता है, उसी के सम्बन्ध में यह जानना है कि, कब तो यह पानी भूण्ड से ऊपर गया?, कहाँ प्रतिष्टित हुआ?, कबतक प्रतिष्ठित रहा?, एवं कच बरस पड़ा? । तात्पर्य यही है कि, " हमें सुप्रसिद्ध वर्षाऋतु से सम्बन्ध रखने वाले वर्षाजल के ही गर्भ - दोहद - प्रसव भात्रों की मीमांसा अपेक्षित है । चतुर्मासात्मक शीतकाल ' गर्भकाल ', चतुर्मासात्मक श्रीष्मकाल ' दोहदकाल ', एवं चनुर्मासा-त्मक वर्षाकाल ‘ प्रसवकाल ' माना गया है । मार्गशीर्ष से आरम्भ कर फाल्गुन पन्त पार्थिव-जनमात्रा का द्युलोक में गर्भाधान होता है । चैत्र से आरम्भ कर आषाढ पर्यन्त गर्भ का पोषण होता है । एवं श्रावण से आरम्भ कर कार्त्तिक पर्यन्त वर्षा की प्रसूति होती है । खगोलीय अव रोहिणी, अलक्ष्मी, निऋति, आदि नामों से प्रसिद्ध, वृश्चिकराशि में मुक्त ' ज्येष्ठा ' नक्षत्र का मार्गशीर्ष की अमावस्या से सम्बन्ध है । ज्येष्ठा नक्षत्रानुगता मागशीर्ष - कृष्णामावस्या ही गर्भाकाल का उपक्रम माना गया है । एवमेय ज्येष्ठमास की पूर्णिमा के साथ भी ज्येष्ठा - न [ -नक्षत्र का सम्बन्ध है । यही पूर्णिमा प्रसवकाल का उपक्रम माना गया है । इस सम्बन्ध में वृष्टिविद्याचार्यों के जो परीक्षण हुए हैं, नाक्षत्रिक स्थिति के तारतम्य से वे सभी प्रामाणिक है । मूलनक्षत्र के उत्तरार्द्ध में जब सूर्य का भोग रहता है, तो गर्भकाल आरम्भ होता है । एवं आर्द्रानक्षत्रभुक्त सूर्य्य प्रसवकाल का उपक्रम बनता है । सूर्य्य की मूल नक्षत्रभुक्ति पौष मास में एवं आर्द्रा-नक्षत्रभुक्ति आषाढ मास में होती है । इस दृष्टिकोण से पौप गर्भ का, और पाढ प्रसव का उपक्रम बन जाता है । • एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार सूर्य दक्षिणायनानुगत पात गर्भ का, एवं सूर्योत्तरायणानुगत पात प्रसव का उपक्रम है । मूल, पूर्वाषाढ, उत्तराप ढं, अभिजित, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिपक्, पूर्वभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद, रेवती, अश्विनी, भरणी, ये १२ नक्षत्र चान्द्रसोम के सहयोगी बनते हुए गर्भ के उत्तेजक बनते हैं । आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पूर्वफल्गुनी, उत्तरफल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, ये ११ नक्षत्र सौर अग्नि के सहयोगी बनते हुए प्रसव के प्रवर्त्तक बनते हैं । चन्द्रचार जहाँ गर्भ की मूलप्रतिष्ठा है, वहाँ सूर्य्याचार प्रसव की मूल प्रतिष्ठा माना गया है । स्नेहगुणक संकोचधर्म्या चान्द्रसोम पार्थिव जलमात्रा का जहाँ संवरण कर उसे स्थितिभाव प्रदान करता है, वहाँ तेजोगुणक विकासधर्म्मा सौर अग्नि जलमात्रा को द्रुत बनाता है । निम्न लिखित प्राप्तवचन इसी सिद्धान्त का स्पष्टी-करण कर रहा है— पौपे मूलभरण्यन्तं चन्द्रचारेण गर्भति । आर्द्रादितो विशाखाःते १५६ चारेण वर्षति ॥ - श्रीगुरुप्रणीत - कादम्बिनी ( वृष्टिविद्या )

पृष्ठ 1185

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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण प्रथमकाण्ड नियत नाक्षत्रिक काल में भूप्रदेश से जिस दिन जलमात्रा सूर्य्यरश्मि, वायु, एवं अग्नि, के संयोग से उत्क्रान्त होती है, उस दिन से काम कर ठीक ६ महीना १५ दिन [ कुल १६५ दिन ] यह जल मात्र द्युलोक में प्रतिष्ठित रहती है । ठीक १६६ वें दिन उस का प्रसव होजाता है, पानी बरस पड़ता है । अत-एवं इस १६५ दिनात्मक गर्भस्थितिकाल के लिए ' सप्तार्द्ध गर्भा ' कहा जासकता है । सातवें महीने का आवा, अर्थात् १५ दिन और पूरे ६ मास, कुल १६६ दिन, सप्ताद्ध गर्भा का यही निष्कर्ष है । इस सम्बन्ध में कुछ विशेषधर्म्म और जान लेने चाहिए F जिस दिन गर्भाधान होता है, उस दिन यदि पूर्वदिशा में गर्भाधान है, तो १६६ में दिन पश्चिम दिशा से मेघ वृष्टि करते हैं । यदि पश्चिम में गर्भाधान होगा, तो पूर्व की ओर से दृष्टि होगी । एवमेव दक्षिण दिशामें गर्भ है, तो उत्तर से, उत्तरमें गर्भ में है, तो दक्षिण से वृष्टि होगी । यदि दिन में गर्भाधान है, तो रात्रि में, यदि रात्रि में गर्भाधान है, तो दिन में वृष्टि होगी । इसप्रकार गर्भाधानानुगता दिक् - काल से सर्वथा विपरीत दिक् - काल में गर्भ का प्रसव होगा | इस वैधर्म्य का कारगा स्पष्ट है ६ ॥ मास के अनन्तर दृश्यस्थिति के अनुसार आकाशप्रदेश में विपर्य्यय होजाता है निष्कर्ष यही है कि, जिस दिन जिस पक्ष दिशा में गर्भाधान होता है, ६॥ मास के अनन्तर भी आकाश के उमी प्रदेश - काल में गर्भस्थिति रहती है । तथापि पार्थिवपरिभ्रमणानुगत उत्तर दक्षिणायन भेद से विभिन्न बनी हुई हमारी दृष्टि विपर्य्यय का कारण बन जाती है । यों समझिए कि, शुक्लपक्ष में गर्भाधान हुआ । ठीक ६॥ मासानन्तर पानी तो उसी आकाशप्रदेश में रहेगा, जिस प्रदेश में ६ || मास पूर्व पृथिवी से गया था । परन्तु मनभेद से श्राकाश का वही प्रदेश, जो ६ ॥ मास पूर्व शुक्लपक्ष का अनुगामी था, ६ || मासानन्तर कृष्णपक्षानुगामी न जायगा । यही व्यवस्था अहोरात्र, पूर्व - पश्चिमादि दिशाओं के सम्बन्ध में समझिए । प्रदेश विधम् [ विभिन्न [ ] नहीं है, किन्तु परिभ्रमणानुगता दृष्टि का विभेद ही दिक्काल के भेद का कारण है । जिस दिन गर्भाधान होता है, उस दिन द्युलोक में विशेष परिस्थिति उत्पन्न होजाती है । वही निमित्त गर्भाधान का परिचायक बनता है शीतवायु, श्वेतभ्र, विद्युन्, गर्जन, आदि ही गर्भाधान के परिचायक हैं । इन परिचय - चिह्नों का परिज्ञान प्राप्त की जए, दिक - देश - काल- आदि को ठीक ठीक लक्ष्य बना लीजिए | क दिन से ठीक १६६ वें दिन अमुक पक्ष, अमुक दिन, अमुक रात्रि, अमुक दिशा मे अमुक मात्रा से अवश्यमेव पानी बरसेगा । इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखिए कि यदि गर्भपातक, निरोधक, शनि - मंगल-याम्यादि - प्रतिबन्धक सूर्य और चन्द्रमाके मध्य में आजायँगे, तो परिस्थिति के अनुसार कालान्तर में [ जोकि काल गणितानुसार सर्वथा व्यवस्थित है ] प्रथम तो गर्भापात होजायगा । अथवा तो वह जल बनीभूत होकर पाषाण बन जायचा । फलतः १६६ वें दिन वृष्टि नहीं होगी । यदि गर्भपात हो गया, तत्रतो कोई बात शेष रह ही नहीं जाती । यदि गर्भपात नहीं, गर्भनिरोध है, तो कालान्तर में करकापात होगा । वही जमा हुआ पानी करका [ श्रोले ] पात है । इसप्रकार गर्भाधानभाव, गर्भपात, गर्भनिरोध, आदि निमित्तों का सम्यक् परिज्ञान प्राप्त करके वृष्टि. का जो समय बतलाया जायगा, वह प्रकृति का अटल विधान माना जायगा, जिस की उपेक्षा कर ब्राह्मणों ने अपना सर्वस्व ही खोटिया है । ब्राह्मचर्चा समाप्त हुई, अत्र मन्त्रार्थ की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है | ' सप्तार्द्ध ' गर्भा ' इत्यादि मन्त्र का अक्षरार्थ है- " लोकसर्ग के रेतोभूत गर्भ सप्तार्द्ध गर्भा रूप से विष्णु ( आकाश ) के विभिन्न दिक् प्रदेश से प्रतिष्ठित होते हैं । वे अन्गर्भ धीभाव तथा मान सभावों से विपश्विद्भाव से सर्वत्र व्याप्त होजाते हैं । " १४५७

पृष्ठ 1186

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पञ्चम अध्याय गब्राह्मण शतपथब्राह्मण बेद, लोक, देव, धर्म्म, इन चार प्राकृतिक सर्गों की प्रवृत्ति क्रमशः प्राणमुख, आपोमुख, बाङ्मुख अन्नगर्भित अन्नादमुख, इन चार मुखों से मानी गई है । प्राणादि प्रकृतियाँ ब्रह्म के चार मुख हैं । इह्रीं से सृष्टिचतुष्टयी का विकास हुआ है । ' लाका बासु प्रतिष्ठिताः ' - ' सर्वमापोमयं जगत् ' - इत्यादि के अनुसार अप्तत्त्व ही लोकसृष्टि का मूलप्रवतक माना गया है । यही लोकसर्ग का प्रारम्भक है । अतएव ' जीवनं भुवनं वनम् ' रूपसे ‘ आपः ’ को ‘ भुवन ( लोक ) ' नाम से भी व्यवहृत किया जाता है । प्तत्त्व भुवन का आरम्भक हैं, अतएव इसे अवश्य ही ' भुवनस्य रेतः ' कहा जासकता है । पार्थिव भुवन की रेतोभूता नलमात्रा अग्नि-वायुसहयोगिनी सूर्य्यरश्मियों के द्वारा रोहित होती है । आरोहिता उर्ध्वगता जलमात्रा सौररश्मियों में ६ || महीना गर्भाभूता रहती हैं । गर्भीभूता जलमात्रा उत्तराकाश में प्रतिष्ठित रहती है । आकाश परमेष्ठी है, पर-for है! इस काश की अन्तिम सीमा ' योमा ' कहलाई है, यही ' विष्णुपद ' नाम से व्यवहृत हुआ है । अन्तिम सीमा ध्रुवप्रदेश है, यही नाकस्थ विष्णुमण्डल है । उत्तरध्र वानुगत नाकस्थ विष्णुपद ही आकाश का उच्चतम स्थान माना गया है । इसी विष्णुपद के लिए कहा जाता है --तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ॥ - ऋक्स ] ० १।२२।२० । जिसप्रकार चन्द्रमा ' अक्षवृत्त ' के आधार पर भूपिण्ड के चारों ओर घूमता है, भूपिण्ड क्रान्तिवृत्त के आधार पर, सूर्य्यपिण्ड के चारों ओर, सूर्य्यपिण्ड ' अयनवृत्त ' के आधार पर परमेष्ठी के चारों ओर, परमेष्ठी प्राणवृत्त के आधार पर स्वयम्भू के चारों ओर परिक्रमा लगाता रहता है, एवमेव उत्तरध्रुव नाकस्थ विष्णुपद के चारों ओर परिक्रमा लगाया करता है । ध्रुव की यह परिक्रमा २५००० [ पच्चीस हजार ] वर्षों में समाप्त होती है । जिसप्रकार विष्ववृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र ध्रुव है, एवमेत्र क्रान्तिवृत्तीय पृष्ठीकेन्द्र गही कदम्ब [ विष्णुपद ] है । ध्रुव विश्वद्वृत्त का केन्द्र है, तो कब क्रान्तिवृत्त का केन्द्र है । विश्वद्वृत्त, और क्रान्तिवृत्त में २.४ अंश का अन्तर है | वही अन्तर ध्रुव, और कदम्बमूर्ति नाकस्थ विष्णु का है । २४ अंश के व्यासार्द्ध से ४८ अंश के परिसर का जो उत्तराकाशानुगत प्रदेश है, वही विष्णुपद है इसके केन्द्र में प्रतिष्ठित पारमेष्ठ्य प्रागा ही, जो अपने प्राणधर्म से सर्वथा अमूर्त है- विष्णु हैं । इस विष्णु का प्रदेश ही उतराकाश प्रदेश है । यहीं उत्क्रान्त जलमात्रा गर्मीभूत रहती है । जैसा कि बतलाया गया है, भृपरिभ्रमण के कारण सन्ताद्ध गर्भा रश्मियाँ, किंवा तद्र पापः- गर्भाधान स्थिति के टीक विपर्य्यय से चरमतीं हैं । इसी विवस्य-भाव का - ' प्रदिशा विधर्म्मणि ' वाक्य से स्पष्टीकरण हुआ है । गर्भाधान होता है चन्द्रमा के सहयोग से, प्रसव होता है सूर्य के सहयोग से, जैसा कि-' चन्द्रचारेण गर्भति, सूर्ये चारेण वर्षति ' रूप से पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिये कि, चन्द्रमा के द्वारा गर्भाधान होता है एक ही दिन में, परन्तु सूर्यानुगत प्रसव -काल १३ दिवसों में विभक्त है । मन्त्रपात ' मनसा ' शब्द चन्द्रचारानुगत गर्भाधान का सूचक है, एवं ' धीतिभिः ' सूर्य्यचारानुगत प्रसवकर्म का सूचक है । कारण स्पष्ट है । चान्द्रसोम मनोमय है, एवं सौर अग्न छीलक्षण है । मन का चन्द्रमा से एवं बुद्धिका सूर्य से सम्बन्ध है । मनसा [ चान्द्र सोमेन ] धाय्र्यमाण गभ १४५८

पृष्ठ 1187

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पञ्चम श्रध्याय गब्राह्मण प्रथमकाण्ड धीतियों [ सौररश्मियों ] के चार से ही तो प्रसूत होता है । श्रुति का ' विपश्चितः ' शब्द अतिशयरूपेण रहस्यपूर्ण है । विपरीता, किंवा त्रिदिकू चिति ही इस शब्द से सूचित हो रही है । ' विपरीते ' -विदिग्भागे चयनम् - चित् - येषां ते गर्भा ' ही ' विपश्चितः ' का रहस्यार्थ है । ' बि ' पूर्वक ' पश् ' ही ' विपश्चितः ' का मौलिक आधार है । संख्या - संकेत - विज्ञानानुसार ‘ प ’ कार १ संख्या का सूचक है, ' श ' कार ५ संख्या का सूचक है । ' पश् ' का अर्थ होता है - १५ संख्या । ' अङ्कानां वामतो गतिः ' के अनुसार १-५ ( १५ ) की वामस्थिति के क्रमसे ५ - १ ( ५१ ) निष्कर्ष निकलता है । वह यहां अभिप्रेत है नहीं । अभिप्रेत है १५ ही । यही भाव ' वि ' से सूचित होरहा है । ' पशू - भात्रं-( १५ संख्यां ) विरुद्धं ( १५ ) कुर्य्यात् ५१ स्थाने १५ विघात ' यही रहस्यार्थ ' विपश् ' से सूचित हुआ है । तात्पर्य यही निकलता है कि, जिस नक्षत्र में आकाश - प्रदेश में गर्भाधान होता है, जलमात्रा की चिति ( सञ्चय ) होती है, उस नक्षत्र के १५ वें नक्षत्र में उस गर्भीभूत जल की वृष्टि होती है । इसप्रकार १५ नक्षत्रभाव से ही जल की चिति होती है । अतएव गर्भीभूता आपोमयी रश्मियों को अवश्य ही ' विपश्चितः ' कहा जासकता है | यदि मूलनक्षत्र में मनसा ( चन्द्रचारेण ) गर्भाधान है, तो आर्द्रा नक्षत्र में ( जो कि मूल से १५ वाँ नक्षत्र है ) -धीतिभिः सूर्य्यचारेण ] उस गर्भ की प्रसूति होजायगी, जैसा कि ' पोपेमूलभर-एयन्तम् ' इत्यादिरूप से पूर्व में स्पष्ट किया जाचुका है । इसप्रकार ' सप्तार्द्धगर्भाः ' इत्यादि मन्त्र गर्भस्थिति का स्वरूप बतलाता हुआ चन्द्रचारानुगत गर्भाधान, सूर्यचारानुगत प्रसवकर्म्म, दोनों का भी स्पष्टी-करण कर रहा है । अत्र क्रमप्राप्त - ' कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा ' इत्यादि मन्त्र की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया जाता है । मन्त्रार्थ के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य नहीं है । पार्थिव जल किस के द्वारा किस मार्ग से कहाँ जाता है?, कहाँ से कब, किस के द्वारा बरसता है?, इत्यादि प्रश्नों के पूर्वोक्त समाधानों का ही - ' कृष्णं नियानम् ० ' इत्यादि मन्त्र से स्पष्टीकरण हुआ है । शुक्लमार्ग उत्तरायण कहलाया है, कृष्णमार्ग दक्षि-गायन कहलाया है । कृष्णमार्ग का पार्थिव कृष्णवर्ण मृग्याग्नि से सम्बन्ध है, शुक्लमार्ग का सौर शुक्ल सावित्राग्नि से सम्बन्ध है । ' ऊपर ' का अर्थ है ' उत्तर ' एवं ' नीचे ' का अर्थ है - दक्षिण ' | दक्षिण दिशा भूपिड की आवासभूमि है, उत्तरदिशा सूर्य की श्रवासभूमि है । अतएव सौर इन्द्र का उत्तर से सम्बन्ध माना गया है । दक्षिणभाग पृथिवी का अपना स्थान है, यह पार्थिव कृष्णाग्नि के सम्बन्ध से कृष्ण है । यही अधः प्रदेश है । यही - ' कृष्ण - यानम् ' है । इसके निम्नभाव का ही ' नि ' से सङ्केत हुआ है । फलतः कृष्णं नि -- यानम ' का अर्थ होता है - दक्षिणस्था - अधोऽत्रस्थिता पृथिवी । इसी को लक्ष्य बनाकर उत्तरमार्गस्थ, किंवा शुक्लपथानुगामिनी सूर्य की रश्मियाँ अपने स्वाभाविक हरण लक्षण आदानधर्म्म से जहाँ - ‘ हरयः ' ( हरन्ति आहरन्ति ) कहलाई हैं, वहाँ अग्निलक्षणा सुचित के सम्बन्ध से इहें ' सुपर्णाः ' कहा गया है । पूर्व में बतलाया गया है कि, सूर्य से आगत साक्षात् सौरतेज सावित्री है, पिण्ड से टकरा कर प्रतिफलित होने वाला सौर तेज गायत्री है । यह गायत्रतेज ही सुपर्ण है, जिसके गर्भ में— ' नाड्यो वायुसंयोगादारोहणम ' सिद्धान्तानुसार पार्थिवी जलमात्रा प्रतिष्ठित रहती है । ' एति च प्रति चान्वाह ' ही इस गायत्र सुपर्ण का तात्त्विक इतिवृत्त है, जिसका पूर्व के ' सामिधेनी - ब्राह्मण ' में विशद बैज्ञानिक विवेचन किया जाचुका है । आगमनावस्था में सूर्य्यरश्मियाँ केवल रश्मियाँ है, गमनदशा ( गायत्री-१४५६

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पञ्चम अध्याय स्र ुग्ब्राह्यण शतपथब्राह्मण दशा ) में ही ये जल का आहरण करती हैं, तभी इनकी ' सुपर्णता ' अन्वर्थ बनती है । अतएव गमनावस्थापन्ना, गायत्रतेजोमयीं सूर्यरश्मियों को ही ' हरयः सुपर्णाः ' कहा जायगा । ये रश्मियाँ निम्न - ( दक्षिण ) भागस्थ कृष्णयान ( भूपिण्ड ) को लक्ष्य बनाकर ( भूषिण्ड से संश्लिष्ट होकर ] तत्रस्था जलमात्रा को अपने गर्भ में धारण करती हुई द्यलोक की ओर प्रतिकलित होजातीं हैं । ' कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो बसाना दिवमुतपतन्ति ' यह मन्त्रपूर्वाद्ध पार्थिव जलमात्रा की इस गर्भाधानावस्था का ही विश्लषेण कर रहा है । आप, वायु, सोम, तीनों भागवतत्त्व ' ऋत ' कहलाए हैं । ' ऋतमेव परमेष्ठी ' इस श्राथर्वा सिद्धान्त के अनुसार आषोमय परमेष्टी ही ऋत है, इसी को पूर्वमन्त्रप्रकरण में ' विष्णुपद ' कहा गया है । यह पारमेष्ठ्य ग्रप्तत्त्व बन -- तरल -- विरल - भेद से आप: - बायुः सोमः, इन तीन अवस्थाओं में परिणत रहता है । मनावस्थापन्न अपूतत्त्व का आसुर वारुणप्राण से, तरलावस्थापन्न वायुतत्त्व का सोमरक्षक गन्धर्वप्राण से, एवं विरलावस्थापन्न सोमतत्त्व का सौम्य पितृप्रारण से सम्बन्ध माना गया है । यही सोमतत्त्व विष्णुका स्वरूप- समर्पक माना गया है । अतएव इनका यत्र तत्र ' सोमवंशी ' रूप से उपवर्णन उपलब्ध होता है । सोमसम्बन्ध से उत्तर स्थान विष्णुपद है, अप सम्बन्ध से यही उत्तरस्थान वारुण भी है । ऋत श्रवरूपतालक्षणा ऋत - सोमात्मकता ही उत्तरस्थान की ऋतसदनता है, जिसका निम्नलिखित रूप से विश्लेषण हुआ । है -वरुणश्योत्तम्मनमसि वरुणस्य स्कम्भ सर्जनीस्थो वरुणस्थ ऋतसदन्यसि । वरुणस्य ऋतसदनपसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद ॥ --- यजुः सं ० ४।४६ | दक्षिणस्थ भूपिण्ड से सूर्य्यरश्मियों के द्वारा द्युलोक में गर्भीभूत नलमात्रा कत्र वापस भूलोक में बरसती है?, इसी प्रश्न का समाधान करती हुई श्रुति कहती है कि, वे गर्भमय सुबर्ण [ रश्मियाँ ] जब ऋतसदन से [ उत्तर दिशा से ] परागर्त्तित होती हैं [ दक्षिणायन का अनुगमन करती हैं ), आदित्- श्रन्याहितोत्तत्तरकाल में हीं घृत [ जल ] से पृथिवी काल्नालीकृत होजाती है, जलमयी बन जाती है । यही गर्भ की प्रसृति है । क्रमप्राप्त - ' समानमेतदुदकम् ० ' इत्यादि तृतीय मन्त्र का विश्लेषण पूर्व में किया ही जाचुका है । इसप्रकार यह ऋङ मन्त्रत्रयी वृष्टिविद्या का अंशतः स्पष्टीकरण करने में सफल होरही है | यह तो हुई श्रुतिचर्चा । अत्र दो शब्दों में पुराणचर्चा का भी समन्वय इसलिए कर लेना चाहिए कि, तथाकथित भ्रान्तों को दृष्टि में ' पुराण ' आन एक निरर्थक - शास्त्र बन रहा है । जिन तत्त्वविज्ञानों का वेद-शास्त्र में प्रकीर्णकरूप से विश्लेषण हुआ है, पुराणने बड़ी ही प्रसादभाषा में एकत्र उनका समन्वय कर दिया है । तभी तो - ' इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ' कथन चरितार्थ होरहा | अधिक विस्तार में न जाकर वृष्टिविद्या से सम्बन्ध रखने वाले कुछ एक वचनमात्र ही यहाँ उद्धत कर दिये जाते हैं—

१ - श्रष्टमास तं गर्भं भास्करस्य गभस्तिभिः ।

रसं सर्वसमुद्राणां द्यौः प्रवते रसायनम् ॥

१४६० - ाल्मीकिरामायणे

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पञ्चम अध्याय स्र गब्राह्मण

२- विवस्वानष्टभिम्म सरादायापो रसात्मिकाः ।

वर्षत्यम्बु ततश्चान्न- मन्नादमखिलं जगत् * ॥

३ - प्रदत्त रश्मिभिर्यत्त क्षितिसंस्थो रसो रविः ।

तमुत्सृजति भूतानां पुष्ट्यर्थं सस्यवृद्धये ॥

४. सरित् - - समुद्र - स्तथापः प्राणिसम्भवाः ।

चतुः प्रकारा भगवानादचे सवितांशुभिः ॥

५ - विवस्वानंशुभिस्तीच्णैरादाय जगतीजलम् ।

सोमं पुष्णाति सोमस्तु वाबुनाडीमयैर्दिवम् ॥

६- जलैर्विक्षिप्यतेऽस्रपु घृमाग्न्यनिलमूर्त्तिषु । अस्थाः प्रपतन्त्यापो वायुना समुदीरिताः || इत्यादि --ब्रह्मपुराणे प्रथमकाण्ड बुद्धिगम्या भाषा से सम्बन्ध रखने वाले पूर्वप्रतिपादित वृष्टिविज्ञान का तैत्तिरीय संहिता में भी [ कारीरि-प्रकरण में ] दिग्दर्शन कराया गया है, जिसका निष्कर्ष यही है कि, अग्नि - सोम - सूर्य्य- मित्र - वरुण-अर्य्यमा पर्जन्यादि प्राकृतिक देवताओं के समन्याय से ही वृष्टिकम्म सञ्चालित है । यदि राष्ट्र में अनावृष्टि-जनित दुष्काल की सम्भावना हो, तो वैज्ञानिक ब्राह्मणो को उस ' कारीरी ' इष्ट का ही अनुष्ठान करना चाहिए, जिसमें वृष्टयधिष्ठाता उक्त प्राणदेवताओं के आधिभौतिक द्रव्यों के माध्यम से अनुग्रहप्राप्ति का विश्लेषण हुआ । है । प्रकरण आवश्यकता से अधिक विस्तृत होता जा रहा है । अतएव तै ० सं ० का वह स्थल यहाँ उद्घृतमात्र कर दिया जाता है । अवश्य ही उद्धृत प्रकरण वैज्ञानिकों का ध्यान वृष्टिविद्या के महत्त्वपूर्ण विश्लेषण की ओर आकर्षित करेगा । प्राच्यङ्गम् - ( १ ) - " मारुतमसि मरुतामोजोऽपां धारां भिन्धि ( १ ) || रमयत मरुतः श्येनमायिनं मनोजवसं वृपणं सुवृक्ति । येन शर्थ उग्रमत्रसृष्टमेति तदश्विना परिधत्त स्वस्ति ( २ ) || पुरोवातो वर्षन् जिन्वरावृत् स्वाहा ( ३ ) || वातावद्वर्षन्नुग्रवृत् स्वाहा ( ४ ) || स्तनयन् वर्षन् भौमरावृन स्वाहा ( ५ ) || अनशन्यवस्फूर्जन दिद्य द्वन् त्वेष नृत् स्वाहा ( ६ ) || अतिरात्रं वर्षन् पतिरात् स्वाहा ( ७ ) ॥ बहु हायमनृषादिति श्रुतरोवृत् स्वाहा ( ८ ) | श्रातपति वर्षन् विराडावृत् स्वाहा ( ६ ) अवस्फूर्जन् दिद्यद्वन् भूपवत् स्वाहा * " सर्वमिदमन्नम्, सर्वमिदमन्नादः । द्वयं वा इदं न तृतीयं अस्ति अत्ता ( अन्नादः ), चैत्र - आद्य ं ( अन्न ) च ' । ( श्रुतिः ) । १४६१

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पञ्चम अध्याय शतपथब्राह्मण ( १० ) || मान्दा वाशाः शुन्ध्यूरजिरा ज्योतिष्मतीस्तमस्वरीरुदन्तीः सुफेनाः । मित्रभृतः सुराष्ट्रा इह मावत ( ११ ) | | कृष्णो अश्वस्य सन्दानमसि, वृष्ट्य त्वोपनह्यामि ( १२ ) " ॥ - तै ० सं ० २ / ४ / ७ / – प्राच्यङ्गमन्त्रव्याख्यानम् - ( १ ) - " मारुतमसि मरुतामोज इति, - कृष्णं वासः कृष्ण-तृषं परिधत्त े । एतद्वै वृष्ट्य रूपम् । सरूप एव भूत्वा पर्जन्यं वर्णयति ( १ ) ॥ रमयत मरुतः श्येनमायिनम् - इति, -पश्चाद्वातं प्रतिमीवति । पुरोवातमेव जनयति वर्णस्याबरुद्ध यँ ( २ ) ॥ वातनामानि जुहोति । " वायुर्नै वृष्ट्या ईशे " | वायुमेव स्वेन भागधेयेनोपधा-वति । स बावास्मै पर्जन्यं वर्णयति ( ३ ) । अष्टौ जुहोति । चतस्रो वै दिशः, चतस्रोऽवा-न्तरदिशः । दिगभ्य एव वृष्टिं सम्प्रच्यावयति ( ४ ) ॥ कृष्णाजिने संयोति हविरेाकः । अन्तर्वेदि संगौति, अवरुद्ध ( ५ ) ॥ यतीनामद्यमानानां शीर्षाणि परापतन् । ते खर्जूरा अभवन् । तेषां रस ऊर्ध्वोऽपतत्, तानि करीराज्यभवन् । सोम्यानि नैं करीराणि । सौभ्या खलु वा आहुतिर्दिवो वृष्टि घ्यावयति ( ६ ) ॥ यत् करीराणि भवन्ति - सौम्यमेवाहुल्या दिवो वृष्टिमवरुन्धे । मधुपा संयोति I । अपना एप ओषधीनां रसः यन्मधु । अदृस्य एवषधी वो वर्णति 1 । अथो अस्य एवोपधीम्यो वृष्टिं निनयति । मान्दा वाशाः - इति संयौति । नामधेयैरेनैना अच्छेति । अथो यथा ब्रूयात् असावेहीति एवमेवैना नामधेयै-राच्यावयति ( ७ ) ॥ वृष्णो अश्वस्य सन्दानमसि । वृष्टय त्वोपनयामि इत्याह वृषा वा अश्व:, वृषा पर्जन्यः | कृष्ण इव खल नै भूत्वा वर्षति । रूपेणैगैनं समर्धयति - वर्णस्याव-रुद्धयै ( ८ ) || - - तै ० सं ० २ | ४ | ६ | उत्तराङ्गम् - ( २ ) देवा वसव्या असोम सूर्य ( १ ) || देवाः शमण्या मित्राव-रुणामन् ( २ ) || देवाः - सपीतयोऽपां नपादाशुहेमन् ( 3 ) ॥ उद्गो दत्तोदधिं भिन्त, दिवः पर्जन्यादन्तरिक्षात् पृथिव्यास्ततो नो वृष्टयावत ( ४ ) || दिवा चित्तमः कृण्वन्ति पर्जन्येनो-दवान, पृथिवीं यद् व्युन्दन्ति ( ५ ) ॥ श्रयं नरः सुदानवो ददाशुषे दिवः कोशमचु-न्युः, विपर्जन्याः सृजन्ति रोदसी अनु धन्वना यन्ति वृष्टयः ( ६ ) || उदीरयथा मरुतः समुद्रतो यूयं वृष्टिं वर्णयथाः पुरीषिणः, न वो दस्रो उपदस्यन्ति धेननः, शुभं यातामनु अनृत्सत ( ७ ) ॥ सृजा वृष्टि दिन, आद्भिः समुदं पृण, अब्जा अमि प्रथमजा, बलमसि समुद्रियम् ( ८ ) | उन्नम्भय पृथिवीं भिन्द्वीदं दिव्यं नमः,, उद्गो दिव्यस्य नो देहीशानो १४६२